श्री रामायण मन्दिर

गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज मानस-रचना करते हुए
जय श्री राम

श्री रामायण मन्दिर — माधवबाड़ी, बरेली | विकासनगर, देहरादून

आज का दोहा
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।
दैनिक आरती एवं दर्शन समय
दोनों केन्द्रों के दर्शनार्थियों हेतु

माधवबाड़ी, बरेली

  • मंगल आरती (प्रातः)समय शीघ्र जोड़ा जायेगा
  • मध्याह्न भोग-आरतीसमय शीघ्र जोड़ा जायेगा
  • सन्ध्या आरतीसमय शीघ्र जोड़ा जायेगा

विकासनगर, देहरादून

  • मंगल आरती (प्रातः)समय शीघ्र जोड़ा जायेगा
  • मध्याह्न भोग-आरतीसमय शीघ्र जोड़ा जायेगा
  • सन्ध्या आरतीसमय शीघ्र जोड़ा जायेगा

* वास्तविक आरती एवं दर्शन समय की पुष्टि मन्दिर प्रबन्धन से होने पर यहाँ जोड़ा जायेगा।

पर्व एवं उत्सव — सम्वत् 2026
आगामी प्रमुख पर्व (भारतीय पंचांग अनुसार)
26 मार्च
श्री राम नवमी
2 अप्रैल
हनुमान जयन्ती
19 अगस्त
तुलसीदास जयन्तीमन्दिर का 15-दिवसीय महोत्सव इसी अवसर पर
8 नवम्बर
दीपावली

* तुलसी जयन्ती महोत्सव की सटीक प्रारम्भ/समापन तिथियाँ मन्दिर द्वारा पुष्टि होने पर जोड़ी जायेंगी।

एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
तुलसी संगत साधु की, कटे कोटि अपराध।। — गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज

गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की गुरु-शिष्य परम्परा में स्थापित आध्यात्मिक केन्द्र। भजन, आरती, स्तुति, गुरु परम्परा एवं मन्दिर के इतिहास का संग्रह।

स्थापना — 27 मई 1964 34 पीठाधीश्वर गुरु परम्परा वार्षिक तुलसी जयन्ती महोत्सव

हमारे बारे में

श्री रामायण मन्दिर — दो केन्द्र, एक परम्परा

श्री रामायण मन्दिर गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की गुरु-शिष्य परम्परा (गद्दी) में स्थापित एक आध्यात्मिक संस्था है, जिसके वर्तमान में दो प्रमुख केन्द्र हैं।

श्री रामायण मन्दिर, माधवबाड़ी, बरेली, उत्तर प्रदेश मुख्य केन्द्र

स्थापना: 27 मई 1964 — गोस्वामी रामेश्वर दास जी द्वारा। गर्भ गृह में श्री रामचरितमानस, जगतारिणी माँ दुर्गा, भगवान शंकर-पार्वती, श्री गणेश, नन्दी, श्री राघवेन्द्र सरकार (राम दरबार), गोस्वामी तुलसीदास जी, हनुमान जी एवं श्री राधाकृष्ण के विग्रह स्थापित हैं। 6500 वर्गफुट का वातानुकूलित सत्संग भवन है। प्रतिवर्ष 15-दिवसीय तुलसी जयन्ती महोत्सव आयोजित होता है।

श्री रामायण मन्दिर, पंजाबी कालोनी, विकासनगर, देहरादून द्वितीय शाखा

पंजाबी कालोनी, विकासनगर, देहरादून (उत्तराखण्ड) में स्थित यह मन्दिर की दूसरी शाखा है।

भाषा एवं दृष्टिकोण

यह वेबसाइट पूर्णतः हिन्दी में है और नमन ग्रन्थ (2018, द्वितीय संस्करण) में संकलित सामग्री को उसके मूल रूप में — बिना किसी परिवर्तन, संक्षिप्तीकरण अथवा प्रतिस्थापन के — प्रस्तुत करने के सिद्धान्त पर आधारित है।

इतिहास

श्री रामायण मन्दिर का इतिहास — नमन, पृष्ठ 47–49
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अखण्ड भारत में फैली हैं रामायण मन्दिर की जड़ें

माधोबाड़ी स्थित श्री रामायण मन्दिर का इतिहास वैसे तो 54 वर्ष पुराना है। लेकिन वास्तव में इसकी ऐतिहासिकता की जड़ें पाकिस्तान तक जाती हैं। इन अर्थों में यह मन्दिर बहुत पुराना है, बेशक बरेली के कुछ नये मन्दिरों में इसे काफी खूबसूरत माना जाता है। इस मंदिर में पन्द्रह दिन तक चलने वाले तुलसी जयन्ती महोत्सव में श्रद्धालुओं को प्रवचनों, भजन सत्संग आदि के माध्यम से जो असीम शान्ति मिलती है, वही अब इसकी विशेषता बन गया है।

तत्कालीन अखण्ड भारत और अब पाकिस्तान में होती मरदान जिला स्थित है जिसमें गढ़ी कपूरा नामक स्थान पर गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की गदी स्थित है। यह एक सिद्ध स्थान है और उस समय में बाला गढ़ी ग्राम के निवासी सेवक प्रतिदिन पैदल चलकर तथा मार्ग में पड़ने वाली 'दरिया-ए-लुण्डा' को पार करके इस सिद्ध स्थान के दर्शनार्थ जाया करते थे। गोस्वामी तुलसीदास जी की अपनी कोई सन्तान नहीं थी। उनके महाप्राण के बाद उनके शिष्यों ने अनेक स्थानों पर गोस्वामी तुलसीदासजी की गुरू गद्दी स्थापित की तथा गुसाईयों की वंश परम्परा में आज भी इन गद्दियों से भारत वर्ष का बहुत बड़ा हिन्दू समाज जुड़ा हुआ है। गढ़ी कपूरा के अतिरिक्त राम तख्त (तत्कालीन मियाँ गुल की रियासत) तथा ढण्डेरी भी ऐसे ही प्रसिद्ध स्थान रहे हैं। ढण्डेरी में पवित्र जल का एक चश्मा था, जिसमें स्नान करने से लोग रोग मुक्त हो जाते थे।

गढ़ी कपूरा स्थित स्थान पर पीपल का एक विशाल वृक्ष था जो अपने आकार और प्राचीनता के कारण विश्व प्रसिद्ध था। इसी विशाल वृक्ष के नीचे अलमस्त फकीर के रूप में बैठकर बाबा सफाचन्द जी महाराज अपने प्रभु की याद में भजन गाते रहते थे। एक बार बाबा सफाचन्द जी दीवार पर बैठकर भजन गा रहे थे और उन पर पीपल के सूखे पत्ते फूलों की तरह गिर रहे थे। तभी किसी प्राकृतिक कारण से उस क्षेत्र में पलायन शुरू हो गया। प्रत्येक व्यक्ति किसी भी प्रकार से गढ़ी कपूरा को छोड़ देना चाहता था। बाबा के जो मुरीद अपने घोड़ों पर बैठकर उस सिद्ध स्थान के आगे से निकले तो उन्होंने बाबा सफाचन्द जी को भी अपने साथ चलने का आग्रह किया और कहा "बाबा चूड्ड़ा" (पश्तो भाषा)। यह सुनकर बाबा सफाचन्द जी जिस दीवार पर बैठे थे उसी को घोड़े की तरह ऐड़ लगाई और वह दीवार दौड़ पड़ी। बाबा की यह कला देखकर लोग बाबा के चरणों में गिर पड़े। बाबा के समझाने पर पलायन रूक गया और गढ़ी कपूरा तथा बाबा सफाचन्द जी लोगों की शुभ मनोकामना पूर्ति का माध्यम बन गये।

बाबा सफाचन्द जी से गदी प्राप्त करके बाबा नत्थूराम जी अपने सेवकों को समाज कल्याण के लिये प्रेरित करते रहे। आताताईयों की बुरी दृष्टि से बचाने के लिए बाबा नत्थूराम जी ने अपने शिष्यों को कांस्य पात्र में शुद्धता पूर्वक शुद्ध आवरण में ढककर गणेश पूजा का निर्देश दिया। यही गणेश पूजा जाम साहब की पूजा के नाम से प्रसिद्ध हुई। भारत विभाजन के समय बाबा नत्थूराम जी अपने सेवक समाज के साथ भारतवर्ष में महाराष्ट्र प्रान्त के जिला अहमदनगर के कोपरगाँव स्थित स्थान पर आ गये तथा बाबा भजन लाल जी कुछ सेवकों को लेकर पंजाब पहुँच गये।

गुसाईं बाबा नन्द लाल जी के तीन पुत्र हुए। गुसाईं दशबन्दी राम जी, गुसाईं मेहर दास जी एवं गुसाईं मूलराज जी। गुसाईं मूलराज जी अपने पुत्र गुसाईं रामेश्वर दास जी के साथ बरेली आ गए तथा दूसरी ओर गुसाईं दशबन्दी राम जी के पुत्र गुसाईं बाबा तोताराम जी स्वतन्त्रता से 20 वर्ष पूर्व ही हरिद्वार में आकर जप तप में लग गये थे। इधर विभाजन के बाद जो परिवार बरेली आये थे, उन्हें शाहजहाँपुर मार्ग पर शरणार्थियों के शिविरों में स्थान दिया गया तथा उन्होंने वहाँ सनातन धर्म मन्दिर स्थापित करके बाबा नत्थूराम जी से प्राप्त जाम साहब की स्थापना उस मन्दिर में की।

बाद में शरणार्थी कालोनी (मॉडल टाउन) स्थापित होने के समय गुसाईं बाबा रामेश्वरदासजी ने अपने मन में संकल्प किया कि भारतवर्ष में गुसाईं तुलसीदास जी के विचारों को प्रचारित-प्रसारित करने हेतु एक मन्दिर की स्थापना की जाये जिसका नाम रामायण मन्दिर हो तथा जिसमें गुसाईयों द्वारा प्राप्त जाम साहब की स्थापना एवं पूजा अर्चना की जा सके। ये परिवार अपनी जान पर खेल कर जाम साहब की चौकियाँ अपने साथ यहाँ लेकर आये थे।

वर्तमान गुरूदेव गोस्वामी देवेन्द्र जी महाराज के पिता गोस्वामी रामेश्वरदास जी ने अपना यह संकल्प पूरा करने के लिए अपनी समस्त पूँजी लगाकर 27 मई 1964 को इस मन्दिर की नींव रखी। उस समय एक छोटी सी झोपड़ी में यह मन्दिर आरम्भ हुआ था जो सेवक समाज के छोटे-छोटे प्रयासों से आज एक विशाल वट वृक्ष के रूप में समाज को अपनी शीतल छाया प्रदान कर रहा है। सेवक समाज के हरिद्वार जाकर बार-बार आग्रह करने पर हरिद्वारवासी बाबा तोताराम जी ने रामायण मन्दिर की इस गुरू गद्दी को पुनः संभाल लिया तथा वर्तमान में उनके महाप्रयाण के बाद स्वर्गीय गोस्वामी रामेश्वर दास जी के पुत्र गोस्वामी देवेन्द्र जी गद्दी पर विराजमान हैं।

मार्गशीर्ष द्वितीय सम्वत् 2026 (सन् 1969) को श्री रामायण मन्दिर में भगवान के विग्रह की स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा की गयी। विग्रह स्थापना के समय कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद से त्यागपत्र देकर सन्यासी बने स्वामी प्रकाशानन्द जी की अध्यक्षता में श्री रामायण मन्दिर द्वारा विश्व शान्ति यज्ञ का आयोजन किया गया था जो आज भी अद्वितीय है। इस विश्व शान्ति यज्ञ में हिमालय पर्वत की गुफाओं से निकलकर सैकड़ों साधु सन्यासियों ने भाग लिया तथा फिर उन्हीं गुफाओं में लौट गये।

वर्तमान में श्री रामायण मन्दिर में जाम साहब की तीन चौकियाँ स्थापित हैं। जो क्रमशः बाबू जई जिला मरदान (पाकिस्तान), सुन्दर नगर हिमाचल प्रदेश एवं तत्कालीन स्वान्त रियासत जो अब पाकिस्तान में है, से प्राप्त हुईं। इस प्रकार श्री रामायण मन्दिर एवं इसकी गुरू गद्दी का इतिहास अखण्ड भारत के गढ़ी कपूरा (जो अब पाकिस्तान में है) तक जाता है।

श्री रामायण मन्दिर का जो स्वरूप वर्तमान में है वह अपने प्रारम्भिक स्वरूप से काफी भिन्न है। गर्भ गृह में क्रमशः श्री रामचरितमानस, जगतारिणी माँ दुर्गा, भवभीतिहर भगवान शंकर-पार्वती, प्रथम पूज्य गणेश, वृषभ, श्री राघवेन्द्र सरकार, गोस्वामी तुलसीदास जी, हनुमान जी एवं श्री राधाकृष्ण के विग्रह स्थापित हैं।

6500 स्क्वायर फिट का विस्तृत सत्संग भवन, भव्य स्वरूप में निर्माण कार्य किया गया है। सभी सेवक समाज तन, मन, धन से सेवा में संलग्न है। यह भवन पूर्णतः वातानुकूलित है एवं इसमें निरन्तर सत्संग भजन आदि के कार्यक्रम चलते रहते हैं। मन्दिर में ठाकुर दरबारों के दर्शन कर दर्शनार्थी मन्त्र मुग्ध हो जाते हैं।

भूतल में एक सामुदायिक केन्द्र का निर्माण किया गया है। प्रथम तल पर ठाकुर जी की रसोई एवं एक बालकनी है। ऊपरी तल पर शिखर के साथ एक बड़ा ध्यान कक्ष पिरामिड के वैज्ञानिक आधार पर बनाया जा रहा है जिसमें लोग ध्यान एवं योग कर पायेंगे। मन्दिर के उत्तरी द्वार पर सन्त निवास के कमरे बनाये गये हैं।

ग्रन्थ

श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड एवं विनय पत्रिका — गीता प्रेस संस्करण

मन्दिर की परम्परा के अनुसार गीता प्रेस संस्करण मान्य है। नीचे श्रीरामचरितमानस की काण्ड-सूची एवं मंगलाचरण दिया गया है; सुन्दरकाण्ड एवं विनय पत्रिका के लिए सम्बन्धित पृष्ठ देखें।

श्रीरामचरितमानस — सप्त काण्ड

काण्ड-सूची

1. बालकाण्ड 2. अयोध्याकाण्ड 3. अरण्यकाण्ड 4. किष्किन्धाकाण्ड 5. सुन्दरकाण्ड 6. लंकाकाण्ड 7. उत्तरकाण्ड

मंगलाचरण (बालकाण्ड, प्रथम श्लोक)

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।। भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्।।
सुन्दरकाण्ड

सुन्दरकाण्ड की सम्पूर्ण कथा — हनुमान जी की समुद्र-लंघन से लंका-दहन एवं सेतु-निर्माण तक — 13 भागों में।

सुन्दरकाण्ड की कथा पढ़ें →
विनय पत्रिका

नमन ग्रन्थ के 7 चुनिन्दा पद, तथा सम्पूर्ण 279 पदों की विषयवार रूपरेखा।

नमन के 7 पद पढ़ें → 279 पदों की रूपरेखा देखें →

विनय पत्रिका के पद

नमन ग्रन्थ में संकलित 7 पद एवं आह्वान — पृष्ठ 69-71

नमन ग्रन्थ में विनय पत्रिका के 7 चुनिन्दा पद संकलित हैं, जो नीचे मूल रूप में दिये गये हैं। सम्पूर्ण 279 पदों की विषयवार रूपरेखा यहाँ देखें

पद–1

जाके प्रिये न राम वैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही।। तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषन बंधु, भरत महतारी। बलि गुरू तज्यो कन्त ब्रज बनितन्हि, भये मुद मंगलकारी।। नाते नेह राम के मनियत सुह्रद सुसेव्य जहाँ लौं। अंजन कहाँ आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहाँ कहाँ लौं।। तुलसी सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रानते प्यारो। जासों होय सनेह राम पद, एतो मंतो हमारो।।

पद–2

राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे। घोर भव–नीर–निधि नाम निज नाव रे।।।।। एक ही साधन सब रिद्धि सिद्धि साधि रे। ग्रसे कलि–रोग–जोग–संजम–समाधि रे।।2।। भलों जो है, पोच जो है, दाहिनो जो, बाम रे। राम–नाम ही सों अंत सब ही को काम रे।। जग नभ बाटिका रही है फलि फूलि रे। धुवाँ कैसे धौरहर देखि तू न भूलि रे।। राम–नाम छाड़ि जो भरोसौ करै और रे। तुलसी परोसो त्यागि माँगै कूर कौर रे।।

पद–3

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे काको नाम पतित–पावन जग, केहि अति दीन पियारे।। कौने देव बराई बिरद–हित, हठि हठि अधम उधारे। खग, मृग, व्याध, पवान, बिटप जड़, जवन कवन सुर तारे।। देव, दनुज मुनि, नाग मनुज सब, माया–बिबस बिचारे। तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे।।

पद–4

तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी। हौं प्रसिद्धि पातकी, तू पाप–पुंज–हारी।। नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसो। मो समान आरत नहिं, आरति हर तोसो।।12।। ब्रह्म तू, हौं जीव, तू है ठाकुर, हौं चेरो। तात–मात, गुरू–सखा, तू सब बिधि हितु मेरो।।13।। तोहिं मोहिं नाते अनेक, मानियें जो भावे। ज्यों त्यों तुलसी कृपालु! चरन–सरन पावे।।14।।

पद–5

"अबलौं नसानी, अब न नसैहों।" राम–कृपा भव–निसा सिरानी, जागे फिर न डसैहों।। पायेउँ नाम चारू चिन्तामनि, उर कर ते न खसैहों। स्यामरूप सुचि रूचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहों।। परबस जानि हँस्यो इन इन्द्रिन निज बस हवै न हसैहों। मन मधुकर पनकैं तुलसी, रघुपति कमल बसैहों।

पद–6

ऐसो को उदार जग माहीं। बिनु सेवा जो द्रवै दीनपर राम सरिस कोउ नाहीं।। जो गति जोग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनि ग्यानी। सो गति देत गीध सबरी कहँ प्रभु न बहुत जिय जानी।। जो संपति दस सीस अरप करि रावन सिव पहँ लीन्हीं। सो संपदा विभीषन कहँ अति सकुच–सहित हरि दीन्हीं।। तुलसिदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो। तौ भजु राम, काम सब पूरन करैं कृपानिधि तेरो।।

पद–7

सुतु मन मूढ़ सिखावन मेरो। हरि–पद–बिमुख लह्यो न काहू सुख, सठ! यह समुझ सबेरो।।1।। बिछुरे ससि–रबि मन–नैनिनतें, पावत दुख बहुतेरो। भ्रमत भ्रमित निसि–दिवस गगन महें, तहँ रिपु राहु बड़ेरो।।2।। जद्यपि अति पुनीत सुरसरिता, तिहुँ पुर सुजस घनेरो। तजे चरन अजहूँ न मिटत नित, बहिबो ताहु केरो।।3।। छुटे न बिपति भजे बिन रघुपति, श्रुति संदेहु निबेरो। तुलसिदास सब आस छाँड़ि करि, होहु रामको चेरो।।4।।
आह्वान — प्रभु प्राण बनकर आना

प्रभु प्राण बनकर आना

प्रभु प्राण बनकर आना। शरण तुम्हारी हूँ, प्रभु, मुझको न ठुकराना।। (1) दृष्टि जब समतल हो जाये, स्वभाव जब निर्मल हो जाये शब्द न फूटे जिहवा से, कंठ जब विह्वल हो जाये। नवगीत बन कर आना, प्रभु प्राण बनकर आना।। (2) देखता रहूँ तुम्हें अपलक, मिटे न मेरी यह ललक। श्वांस गति तब जाये चाहे रुक, तुम्हारे लिये हों जब प्राण उत्सुक, स्वीकार करने आना, नव–प्राण बन कर आना।। (3) वासनाओं की हो रही अति, शून्य हैं कर्म, शून्य ही गति। कामना अशेष हो जाये, वासना निस्तेज हो जाये, इन विकारों की आहुति, अग्नि बन ले जाना। प्रभु प्राण बन कर आना।। (4) नाम तुम्हारा न बिसारूँ, स्वप्न शयन में तुम्हें पुकारूँ। भूल न पाऊँ मैं क्षण भर, बंकिम छवि मैं सदा निहारूँ।। चित्त मेरा जब तीर्थ बन जाये, बसने उसमें आना। प्रभु प्राण बन कर आना।। (5) मिला उसे तेरा सहारा, आर्त स्वर में जिसने पुकारा। है मुझे विश्वास अब यह, दूर नहीं मुझसे किनारा।। भव सागर से नैया मेरी, पार करने आना। प्रभु प्राण बन कर आना।। (6) जीवन नौका हो चुकी हो जर्जर, डूबती हो हर लहर पर, मृत्यु दूत हों खड़े द्वार पर, विकराला अपना मुख पसार कर मुझ अधम को न ठुकराना, नव तेज बनकर आना। प्रभु प्राण बन कर आना।।

नित्य कर्म

पूजा प्रकाश एवं दैनिक प्रार्थनायें — नमन, पृष्ठ 108-113
प्रातः जागरण के पश्चात स्नान से पूर्व के नित्य कर्म

ब्रह्म मुहूर्त में जागरण — सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घंटे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र में निषिद्ध है।

करावलोकन — आँखों के खुलते ही दोनों हाथों की हथेलियों को देखते हुये निम्नलिखित श्लोक का पाठ करें —

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते कर दर्शनम्।।

भूमि वन्दना — शैय्या से उठकर पृथ्वी पर पैर रखने के पूर्व पृथ्वी माता का अभिवादन करें —

समुद्र वसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व में।।

मानसिक शुद्धि का मन्त्र —

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाकां स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।

श्रीगोविन्ददामोदर स्तोत्रम्

श्रीगोविन्ददामोदर स्तोत्रम् (10 श्लोक)

करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्। वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्द मनसा स्मरामि।।1।। श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव। जिह्वे पिबस्वामृतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति।।2।। विक्रेतु–कामाखिलगोपकन्या मुरारिपादार्पित चित्तवृत्तिः। दध्यादिकं मोहवशादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति।।3।। गृहे गृहे गोपवधूकदम्बाः सर्वे मिलित्वा समवाप्ययोगम्। पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं, गोविन्द दामोदर माधवेति।।4।। सुखं शयाना निलये निजेऽपि नामानि विष्णोः प्रवदन्तिमर्त्याः। ते निश्चतं तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति।।5।। जिह्वैसदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य मनोहराणि। समस्त भक्तार्तिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति।।6।। सुखावसाने इदमेवसारं दुःखावसाने इदमेव ज्ञेयम।। देहावसाने इदमेव जाप्यं गोविन्द दामोदर माधवेति।।7।। जिह्वैरसज्ञे मधुरप्रिया त्वं सत्यं हितं त्वां परमं वदामि। आवर्णय त्वं मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति।।8।। त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे समागते दण्डधरे कृतान्ते। वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या गोविन्द दामोदर माधवेति।।9।। श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश गोपाल गोवर्धन नाथ विष्णो। जिह्वे पिवस्मामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति।।10।।

गुरू वन्दना

गुरू ब्रहमा गुरू विष्णु गुरू देवो महेश्वरः। गुरू साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः। बंदउ चरण सरोज गुरू, मुद मंगल आगार। जेहि सेवत नर होत है, भव सागर से पार।। गुरू के सुमिरण मात्र से नाशत विघ्न अनन्त। तातें सर्वारम्भ में, ध्यावत हैं सब संत।।

गणेश वन्दना

ऊँ गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारूभक्षणम। उमासुतं, शोकविनाशकारकम् नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।।

महामृत्युंजय मन्त्र

ऊँ हौं जूं सः। ऊँ भूः भुवः स्वः। ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारूकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् स्वः भुवः भूः ऊँ। सः जूं हौं ऊँ।।

मन्त्र वन्दना एवं स्नान मन्त्र

क. करागे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते कर दर्शनम्।। ख. समुदवसने देवी पर्वत स्तन मण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्षमस्व में।। स्नान के पूर्व जल स्पर्श कर मन्त्र बोलिए :– गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं करू।। पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्याः सरितस्तथा। अगच्छन्तु मया प्रोक्ताः स्नान काले सदा मम।। प्रदक्षिणा मन्त्र यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि च। तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिणा पदे पदे।। सूर्य को अर्घ्य देने का मंत्र ऊँ एहि सूर्य सहस्रांशो तेजो राशे जगतपते। अनुकम्पय मां भक्तया गृहाणार्घ्य दिवाकरः।। तुलसीं वन्दन तुलसि! श्री सखि शिवे पापहारिणी पुण्यदे। नमस्ते नारदनुते नमो नारायण प्रियें।। ऊँ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धार्य मां देवि पवित्रं कुरू चासनम्।।
क्षमा प्रार्थना

क्षमा प्रार्थना

नमन ग्रन्थ के इस पृष्ठ (116) का निचला भाग मूल स्कैन में प्रकाश की स्थिति व अंगुली की छाया के कारण आंशिक रूप से अपठनीय है। सामान्यतः पूजन के अन्त में क्षमा प्रार्थना पढ़ने की परम्परा है। पूर्ण, स्पष्ट पाठ हेतु मूल पुस्तक की पुनः जाँच आवश्यक होगी।

संपर्क

दोनों मन्दिरों की जानकारी

श्री रामायण मन्दिर, माधवबाड़ी, बरेली

पता: माधवबाड़ी, बरेली, उत्तर प्रदेश

वार्षिक उत्सव: 15-दिवसीय तुलसी जयन्ती महोत्सव

श्री रामायण मन्दिर, विकासनगर, देहरादून

पता: पंजाबी कालोनी, विकासनगर, देहरादून, उत्तराखण्ड

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