बाबा तुलसी के गुण गावे सारी दुनिया,
जगत में जै–जैकार हो रही।
पिता आत्माराम धन्य और धन-धन माता हुलसी,
स्वयं रहे न जग में लेकिन जग को दे गये तुलसी।
हो गयी पाल पोस के धन-धन दासी चुनिया जगत में जै–जैकार हो रही।
बालापन में घर-घर डोले दर-दर ठोकर खाए।
गुरू कृपा भए धनी शरण जब राम धनी की आए, पाए दूध, मलाई, रबड़ी दोनों जुनियाँ जगत में जै–जैकार हो रही।
रत्ना से उद्बोधन पाके, सोवत से जन जागे,
क्रम–क्रम काशी चित्रकूट फिर अवधपुरी को भागे। लागे राम शरण में बनके सन्त सगुनिया जगत में जै–जैकार हो रही।
आगम निगम पुराण निचोड़े सार-सार सब भाखे।
धनी गरीब मूर्ख पंडित अब जो चाहे रस चाखे, बन के श्रोता वक्ता व्यास और कीर्तनिया जगत में जै–जैकार हो रही।
जंगम तुलसी, तरू भए तुलसी रही जगत में छायी, भ्रमर रहे कविता मंजरी पर राम रहे मंडराई।
कह गये सरस्वती मधुसूदन अस निगुर्निया जगत में जै–जैकार हो रही।
संस्कृत भाषा कठिन नारियल खोरत में कठिनावै।
गरी खोल कर तुलसी धरि गये जो चाहे सो पावे, कहते करत बिहारी नारायण मैं सुनिया जगत में जै–जैकार हो रही।
देश-देश घर-घर में गूँजे बाबा की चौपाई, जन-जन के मानस में बैठे तुलसी दास गुंसाई।
धन-धन भए जगात के गायक कवि और गुनिया जगत में जै–जैकार हो रही।