श्री रामायण मन्दिरShri Ramayan Mandir — Bareilly | Vikasnagar

हनुमान जी का समुद्र-लंघन

सुन्दरकाण्ड — श्रीरामचरितमानस, पंचम सोपान (1 / 13)

सुन्दरकाण्ड, श्रीरामचरितमानस का पंचम सोपान, वहीं से आरम्भ होता है जहाँ वानर-सेना सीता जी की खोज में समुद्र के तट पर आ पहुँचती है। सामने सौ योजन विस्तृत समुद्र देखकर सभी वानर असमंजस में पड़ जाते हैं कि इसे कौन लाँघे। जाम्बवन्त जी हनुमान जी को उनकी भूली हुई शक्ति का स्मरण कराते हैं — बाल्यकाल में सूर्य को फल समझकर निगल जाने की लीला और ऋषियों से मिले वरदानों का उल्लेख करते हुए वे हनुमान जी को समुद्र लाँघने हेतु प्रेरित करते हैं।

जाम्बवन्त जी के वचन सुनते ही हनुमान जी का हृदय आनन्द से भर उठता है। वे अपना विशाल रूप धारण कर महेन्द्र पर्वत की चोटी पर चढ़ते हैं और श्रीराम का स्मरण कर समुद्र लाँघने हेतु छलांग लगाते हैं। मार्ग में मैनाक पर्वत उन्हें विश्राम का निमंत्रण देता है — क्योंकि एक बार वायुदेव ने इन्द्र के वज्र से मैनाक की रक्षा की थी, अतः वह हनुमान जी के प्रति कृतज्ञता दिखाना चाहता है। हनुमान जी विनम्रतापूर्वक पर्वत का स्पर्श मात्र कर आगे बढ़ जाते हैं, क्योंकि श्रीराम का कार्य अभी अधूरा है।

"राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।"
— तुलसीदास, सुन्दरकाण्ड
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