आकाश-मार्ग से जाते हुए हनुमान जी की परीक्षा लेने देवताओं के कहने पर नागमाता सुरसा उनके सम्मुख आ खड़ी होती हैं और उन्हें निगलने की बात कहती हैं। हनुमान जी विनयपूर्वक श्रीराम का कार्य पूर्ण कर लौटने की बात कहते हैं, किन्तु सुरसा टलती नहीं। अंततः हनुमान जी अपना शरीर क्षण-क्षण में बड़ा करने लगते हैं; सुरसा भी अपना मुख उसी अनुपात में बड़ा करती जाती हैं। जब सुरसा का मुख योजनों तक फैल जाता है, तब हनुमान जी बुद्धिपूर्वक अपना शरीर अत्यन्त लघु कर उनके मुख में प्रवेश करते हैं और तुरन्त बाहर निकल आते हैं। सुरसा प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देती हैं — यह उनकी बल के साथ-साथ बुद्धि की भी परीक्षा थी।
आगे मार्ग में छाया पकड़कर आकाश में उड़ने वाले जीवों को निगल जाने वाली राक्षसी सिंहिका उनका मार्ग रोकती है। हनुमान जी उसकी माया को तुरन्त पहचान लेते हैं और अपने बल से उसका वध कर आगे बढ़ जाते हैं। इसके पश्चात वे लंका के तट पर उतरते हैं।