समुद्र-तट पर पहुँचकर श्रीराम वानर-सेना के साथ इस विषय में विचार करते हैं कि विशाल समुद्र को कैसे पार किया जाए। वे विनम्रतापूर्वक तीन दिनों तक समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना करते हैं, किन्तु जब समुद्र की ओर से कोई उत्तर नहीं मिलता, तब श्रीराम धर्म-मर्यादा स्थापित करने हेतु कुछ क्षण के लिए क्रोधित होकर धनुष पर बाण चढ़ाते हैं।
यह देखकर समुद्र देव भयभीत होकर प्रकट होते हैं, क्षमा माँगते हैं और नल-नील वानरों द्वारा सेतु बाँधे जाने का उपाय बताते हैं — क्योंकि बाल्यकाल में ऋषियों के आशीर्वाद से इन दोनों वानरों में यह विशेष गुण था कि इनके स्पर्श से पत्थर भी जल में तैरने लगते थे। इसी उपाय से आगे रामसेतु का निर्माण होता है। यहीं सुन्दरकाण्ड का समापन होता है और लंकाकाण्ड (युद्धकाण्ड) का आरम्भ होता है।