लंका दहन के पश्चात रावण अपनी सभा में मन्त्रणा करता है। विभीषण जी उसे बार-बार समझाते हैं कि श्रीराम के विरुद्ध जाना विनाश को आमंत्रित करना है और सीता जी को सम्मानपूर्वक लौटा देना ही श्रेयस्कर है। किन्तु अहंकारी रावण यह हितकारी सलाह मानने के स्थान पर अपने ही भाई का अपमान कर उसे लात मारकर सभा से निकाल देता है।
अपमानित विभीषण जी अपने कुछ अनुयायियों सहित श्रीराम की शरण में आ जाते हैं। सुग्रीव सहित कुछ वानर इस विषय में शंका व्यक्त करते हैं कि शत्रु-पक्ष के किसी को इतनी सहजता से शरण देना उचित है या नहीं। किन्तु श्रीराम अपने "सरनागत वच्छल" स्वभाव के अनुरूप — अर्थात् शरण में आये हुए के प्रति सदा वत्सल — विभीषण जी को अभय प्रदान करते हैं और भविष्य में उन्हें लंका के राजा के रूप में अभिषिक्त करने की घोषणा करते हैं।