यहाँ श्रीराम की स्तुति आगे बढ़ती है, तथा इसी क्रम में श्रीरंग, नर-नारायण एवं विन्दुमाधव जी की स्तुतियाँ भी सम्मिलित हैं।
यह दर्शाता है कि तुलसीदास जी की भक्ति यद्यपि मूलतः राम-केन्द्रित थी, तथापि वे भगवान के अन्य स्वरूपों के प्रति भी पूर्ण श्रद्धा रखते थे, क्योंकि सभी स्वरूप एक ही परब्रह्म के रूप माने जाते हैं।