इस भाग में सीधे श्रीराम की स्तुति आरम्भ होती है, जिसमें उनके नाम, रूप एवं गुणों का वर्णन है।
इसी खण्ड में श्रीराम-नाम-वन्दना, श्रीराम-आरती एवं हरिशंकरी पद (जिसमें हरि और शंकर दोनों की एक साथ वन्दना है) सम्मिलित हैं — यह दर्शाता है कि तुलसीदास जी के लिये विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं था।