विनयावली के मध्य भाग में तुलसीदास जी अपनी ही दुर्बलताओं, अज्ञान तथा त्रुटियों को अत्यन्त निष्कपट भाव से स्वीकार करते हैं।
यह आत्मनिवेदन (स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर देना) तथा दैन्य-भाव (स्वयं को अत्यन्त दीन मानकर प्रभु-कृपा की याचना करना) भक्ति-साहित्य में अत्यन्त उच्च स्थान रखता है — यहाँ भक्त अपने किसी गुण अथवा साधना के बल पर नहीं, अपितु केवल प्रभु की करुणा पर ही पूर्ण विश्वास रखता है।