मेरी लगी श्याम संग प्रीत, दुनिया क्या जाने,
मुझे मिल गया मन का मीत, दुनिया क्या जाने।
छवि लखी मैंने श्याम की जब से, भई बावरी मैं तो तब से,
बांधी प्रेम की डोर मोहन से, नाता तोड़ा मैने जग से।
यह कैसी पागल प्रीत दुनिया, यह कैसी निगोड़ी प्रीति, दुनिया क्या जाने,
मोहन की सुन्दर सूरतिया, मन में बस गई मोहिनी मूरतिया।
लोग कहें मैं भई बावरिया, जब से ओढ़ी श्याम चुनरिया, मैंने छोड़ी जग की रीति, दुनिया क्या जाने।
हर दम अब तो रहूँ मस्तानी, लोक लाज दीनी बिसरानी, रूपराशि अंग-अंग समानी, हेरत हेरत रहूँ दिवानी।
मैं तो गाऊँ खुशी के गीत, दुनिया क्या जाने,
मोहन ने ऐसी बंसी बजाई, सबने अपनी सुध बिसराई, गोप गोपियाँ भागी आयी, लोक लाज कुछ काम न आयी। फिर नाच उठा संगीत दुनिया क्या जाने।
भूल गयी कहीं आना जाना, जग सारा लागे बेगाना, अब तो केवल श्याम को पाना, रूठ जाये तो उन्हें मनाना।
अब होगी प्यार की जीत, दुनिया क्या जाने।