मुद्रिका पर अंकित श्रीराम-नाम पहचानकर सीता जी के मन में हर्ष और विस्मय दोनों उमड़ पड़ते हैं। हनुमान जी वृक्ष से उतरकर विनम्रतापूर्वक अपना परिचय देते हैं — श्रीराम के दूत के रूप में। वे आद्योपान्त श्रीराम-कथा सुनाते हैं, जिसे सुनकर सीता जी को पूर्ण विश्वास हो जाता है।
सीता जी हनुमान जी को अपनी विरह-व्यथा और श्रीराम के प्रति अपने अटूट प्रेम के विषय में बताती हैं। जाते समय वे अपने शीश की चूड़ामणि उतारकर हनुमान जी को श्रीराम के लिए एक पहचान-चिह्न के रूप में सौंप देती हैं, ताकि श्रीराम को पूर्ण विश्वास हो सके कि हनुमान जी वास्तव में सीता जी से मिलकर आये हैं।