रावण के जाने के बाद राक्षसियाँ सीता जी को भाँति-भाँति से डराने लगती हैं। इसी बीच त्रिजटा नामक एक वृद्धा राक्षसी, जो मन ही मन श्रीराम की भक्त थी, अपना एक स्वप्न सबको सुनाती है — स्वप्न में उसने रावण का विनाश और श्रीराम की विजय देखी थी। यह सुनकर भयभीत राक्षसियाँ वहाँ से चली जाती हैं।
अत्यधिक विरह-वेदना से व्याकुल सीता जी अपने प्राण त्यागने का विचार करने लगती हैं, किन्तु त्रिजटा उन्हें समझाकर धैर्य बँधाती है। इसी समय हनुमान जी वृक्ष से श्रीराम की मुद्रिका नीचे गिराते हैं, जिसे देखकर सीता जी चकित रह जाती हैं।