समुद्र पार कर हनुमान जी लंका नगरी के समीप पहुँचते हैं। स्वर्ण-प्राचीरों से घिरी, अत्यन्त सुदृढ़ इस नगरी को देखकर वे सोचते हैं कि रात्रि में लघु रूप धारण कर ही नगर में प्रवेश करना उचित होगा। जैसे ही वे प्रवेश करने लगते हैं, नगर की रखवाली करने वाली लंकिनी नामक राक्षसी उन्हें रोकती है और स्वयं को नगर की रक्षिका बताती है।
हनुमान जी एक ही मुष्टि-प्रहार से उसे भूमि पर गिरा देते हैं। आहत लंकिनी को ब्रह्मा जी का वह पुराना वचन स्मरण हो आता है, जिसमें कहा गया था कि जिस दिन कोई वानर उसे इस प्रकार पराजित करे, समझना कि राक्षसों के विनाश का समय निकट आ गया है। यह पहचानकर लंकिनी हनुमान जी को निर्भय होकर नगर में प्रवेश करने और अपना कार्य सिद्ध करने का आशीर्वाद देती है।