हनुमान जी जब वृक्ष पर छिपे हुए हैं, उसी समय रावण अनेक स्त्रियों के साथ अशोक वाटिका में सीता जी के पास आता है। वह मान-मनुहार, धन-वैभव का प्रलोभन और भय — सभी उपायों से सीता जी को अपनी रानी बनाने के लिए मनाने का प्रयत्न करता है।
सीता जी अपने और रावण के बीच एक तिनका रखकर उससे बात करती हैं — यह उनके पूर्ण तिरस्कार का प्रतीक है। वे रावण को जुगनू और श्रीराम को सूर्य के समान बताते हुए स्पष्ट कह देती हैं कि जैसे जुगनू की चमक कभी कमल को विकसित नहीं कर सकती, वैसे ही उसके वचन उनके मन में कोई स्थान नहीं पा सकते। क्रोधित रावण तलवार निकाल लेता है, किन्तु मंदोदरी उसे रोक लेती है। रावण सीता जी को एक मास का समय देकर लौट जाता है और अपनी दासियों को उन्हें भय दिखाकर मनाने का आदेश देता है।