इसके पश्चात भगवान शिव की विस्तृत स्तुति है (कुल 12 पद), जिसमें तुलसीदास जी शिवजी को श्रीराम के परम भक्त और आदि गुरु के रूप में वर्णित करते हैं।
यह खण्ड शिव-राम अभेद के भाव को अत्यन्त सुन्दरता से प्रस्तुत करता है — शिवजी ही रामनाम के सर्वप्रथम प्रचारक एवं उपासक माने गये हैं, यही कारण है कि तुलसीदास जी अपनी विनय-यात्रा के आरम्भ में उनका आशीर्वाद माँगते हैं।