मुरारीवाला, गुजरांवाला, पंजाब — 22 अक्टूबर 1873 । भिलंगना नदी, टिहरी गढ़वाल — 1906
फॉरमैन क्रिश्चियन कॉलेज, लाहौर में गणित के एक प्रोफेसर, जिन्होंने छब्बीस वर्ष की आयु में अपना पद, अपना परिवार और अपना नाम तक त्यागकर हिमालय की राह पकड़ी, फिर बिना पैसे और बिना सामान के वेदांत का संदेश जापान और अमेरिका तक पहुंचाया, और तैंतीस वर्ष की आयु में हिमालय की एक नदी में समा गए।
उनके जीवन की कथाएं, उनके द्वारा कहे गए दृष्टांत, और उनके विषय में कही गई कथाएं — यहां एक साथ संकलित।
हिमालय में एक जीवन
कालक्रम के अनुसार वर्णित उनके जीवन की कथाएं।
मुरारीवाला: निर्धनता में जन्म
उनका जन्म 22 अक्टूबर 1873 को पंजाब प्रांत के गुजरांवाला जिले के गांव मुरारीवाला में हुआ — जो अब पाकिस्तान में है — एक गोसाईं ब्राह्मण परिवार में। पिता पंडित हीरानंद गोस्वामी थे; माता का नाम निहालदेई था। तीर्थराम के जन्म के कुछ ही दिनों बाद माता का देहांत हो गया। उनका लालन-पालन बड़े भाई गोसाईं गुरुदासमल और एक वृद्धा चाची ने किया — कुछ विवरणों में इसका मुख्य श्रेय पिता की बहन श्रीमती धर्मकौर को दिया गया है।
कुछ लोग उनके परिवार का संबंध रामचरितमानस के रचयिता संत तुलसीदास से मानते हैं; कुछ अन्य के अनुसार इसी नाम के एक और संत थे, जिनकी गद्दी चित्रल के निकट स्वात में थी — तीर्थराम अपने पिता के साथ समय-समय पर वहां माथा टेकने जाया करते थे।
पांच वर्ष की आयु में उन्हें मुरारीवाला के प्राइमरी स्कूल में भेजा गया, जहां उनके मुस्लिम शिक्षक ने ही सबसे पहले इस साधारण दिखने वाले बालक में एक असाधारण प्रतिभा पहचानी थी। उस समय की प्रथा के अनुसार उनका विवाह बहुत छोटी आयु में — लगभग दस वर्ष की उम्र में — मुरारीवाला से छह-सात कोस दूर गांव विरोके के एक ब्राह्मण परिवार की पुत्री शिवो देवी के साथ कर दिया गया। आगे की पढ़ाई के लिए पिता ने उन्हें गुजरांवाला हाई स्कूल भेजा, जहां उनकी भेंट भगत धन्नाराम से हुई — पिता के एक मित्र, जिन्हें लोग "रबजी" कहकर पुकारते थे, क्योंकि उनकी कही बात सच हो जाया करती थी। तीर्थराम को वे बाकी लोगों से भिन्न लगे — सांसारिक व्यक्तियों जैसा उनका आचरण नहीं था — और उन्होंने उन्हें अपना पहला आध्यात्मिक मार्गदर्शक स्वीकार कर लिया।
गणित के प्रोफेसर
मार्च 1888 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की, पूरे प्रांत में 38वां स्थान प्राप्त किया, परंतु छात्रवृत्ति नहीं मिली। पिता चाहते थे कि वे अब आगे न पढ़ें, पर तीर्थराम ने आगे बढ़ने का निश्चय किया और फॉरमैन क्रिश्चियन कॉलेज, लाहौर में दाखिला ले लिया। इंटरमीडिएट (1890) में वे पंजाब में 25वें स्थान पर रहे, फिर बी.ए. (1893) और एम.ए. (1895, गणित विषय) दोनों में प्रांत में प्रथम आए। पिता से कोई सहायता न मिलने पर धन्ना जी, उनके मामा रघुनाथमल और शुभचिंतक झंडूमल ने उनकी मदद की — धन्ना जी को लिखे पत्रों में उन्होंने ऐसे समय का वर्णन किया है, जब उनके पास एक पोस्टकार्ड खरीदने तक के पैसे नहीं होते थे।
इन्हीं वर्षों में दो घटनाओं ने उन्हें भीतर से बदल दिया। योगवाशिष्ठ के स्वाध्याय ने संसार को देखने की उनकी पूरी दृष्टि बदल दी; और इसके कुछ ही समय बाद उनकी अत्यंत प्रिय बहन तीर्थदेई की आकस्मिक मृत्यु हो गई — इस घटना ने मानो संसार की असारता और सांसारिक संबंधों की नश्वरता को उनके सामने पूरी तरह उजागर कर दिया।
बचपन से ही वे एक विलक्षण गणनाकार थे — कहा जाता है कि वे सत्रह और अठारह अंकों की दो संख्याओं का गुणनफल कुछ ही क्षणों में एक पंक्ति में लिख देते थे, और विनम्रतापूर्वक कहते थे कि अभ्यास से कोई भी यह कला सीख सकता है। एक परीक्षा में, जहां नौ प्रश्नों का उत्तर देना ही पर्याप्त था, उन्होंने सभी तेरह प्रश्न हल कर दिए।
पत्नी, दो संतानों और पिता के भरण-पोषण की जिम्मेदारी के साथ उन्होंने अमृतसर और सियालकोट में नौकरी के लिए प्रयास किया, जहां वेतन मात्र 50-60 रुपये मासिक था। अंततः 21 दिसंबर 1895 को वे उसी कॉलेज में गणित के प्रोफेसर नियुक्त हुए, जहां से उन्होंने शिक्षा प्राप्त की थी। इसके बाद मिशन कॉलेज, लाहौर में दिए गए उनके भक्ति-विषयक भाषण ने श्रोताओं को चकित कर दिया — पंडित दीनदयाल और श्री गोपीनाथ जैसे विद्वान भी वहां उपस्थित थे और यह देखकर आश्चर्यचकित थे कि इतना युवा गणित-प्रोफेसर धर्म और अध्यात्म के विषय में इतनी गहराई से कैसे जानता है। कुछ समय के लिए वे छात्रावास के सुपरिटेंडेंट भी रहे, परंतु शीघ्र ही त्यागपत्र दे दिया, क्योंकि यह उनकी साधना में बाधा बन रहा था। जब गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर के प्रिंसिपल ने उनका नाम प्रांतीय सिविल सर्विस के लिए भेजना चाहा, तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया — "जिस फसल को मैंने लोगों में बांटने के लिए इकट्ठा किया है, उसे मैं अपनी सुख-सुविधा के लिए कैसे बेच सकता हूं।"
गैरिक वस्त्र की एक झलक
5 नवंबर 1897 को स्वामी विवेकानंद लाहौर आए — उन्होंने वहां हिंदू धर्म, भक्ति और वेदांत पर भाषण दिए, जिनका आयोजन स्वयं तीर्थराम ने किया था, जो उस समय लाहौर की सनातन धर्म सभा के महामंत्री थे। कहा जाता है कि तीर्थराम ने विवेकानंद के समक्ष भक्ति के प्रतिपादन पर असंतोष व्यक्त किया था, और यही अगले दिन वेदांत पर उनके ओजस्वी भाषण का कारण बना। विवेकानंद को गैरिक वस्त्रों में देखकर, और जीवन के परम लक्ष्य के लिए दृढ़ संकल्प तथा विषय-त्याग पर दिए गए उनके आह्वान को सुनकर, तीर्थराम के वैराग्य को मानो पंख मिल गए — अब संसार में एक-एक क्षण बिताना उनके लिए कठिन हो गया।
आगे चलकर उन्होंने द्वारका मठ के शंकराचार्य स्वामी माधवतीर्थ से मार्गदर्शन प्राप्त किया — उन्होंने स्वयं से स्वयं को दीक्षा दी, जो शास्त्रों में केवल परम वैराग्य की स्थिति में ही मान्य मानी जाती है।
दीपावली पर लिखा एक पत्र
अक्टूबर 1897 में वे जीवन के सत्य की खोज में लाहौर से हरिद्वार गए। ऋषिकेश से आगे, ब्रह्मपुरी के घने जंगल की एक गुफा में उन्हें वह प्राप्त हुआ, जिसकी उन्हें तलाश थी — आत्मसाक्षात्कार। वहीं से 25 अक्टूबर 1897 — दीपावली के दिन — उन्होंने पिता को लिखा: "आज दीपावली है। मैं जुए में अपने प्रभु से हार गया हूं। अब मेरा कुछ नहीं है, मेरे पास कुछ नहीं बचा है।" अन्य पत्रों में उन्होंने आत्मसाक्षात्कार को ही जीवन का सर्वोच्च कर्तव्य बताया — "क्या कभी किसी मृतक के पास लौटने का संदेश भेजा गया है? जिसे उससे मिलना है, वह स्वयं उसके पास पहुंचता है।"
फिर भी कुछ समय तक वे जंगल और लाहौर के बीच आते-जाते रहे। जुलाई 1900 में उन्होंने सदा के लिए लाहौर छोड़ दिया, यह विदाई-गीत गाते हुए:
अलविदा मेरी रियाजी! अलविदा!
अलविदा ऐ प्यारी रावी! अलविदा!
अलविदा ऐ दोस्तो-दुश्मन! अलविदा!
अलविदा ऐ दिल! खुदा ले अलविदा!
अलविदा ऐ राम! सबको अलविदा!
फिर भी स्वयं को पूरी तरह परख लेने के इरादे से उन्होंने 1 जनवरी 1901 को भिलंगना नदी के तट पर — उसी नदी के तट पर, जहां आगे चलकर उनकी मृत्यु हुई — औपचारिक रूप से गैरिक वस्त्र धारण किए; उस समय उनके शिष्य नारायण स्वामी उनके साथ थे। यह मानो महाकाश में विचरण की इच्छा रखने वाले किसी पक्षी की आखिरी छलांग थी — इसके बाद तो खुला आकाश ही उसका आश्रय था।
हिमालय की यात्रा
संन्यास लेने के बाद लगभग ग्यारह महीनों तक स्वामी रामतीर्थ ने आज के उत्तराखंड की ऊंची चोटियों, घाटियों और घने जंगलों की यात्रा की — लगभग 600 मील की यह यात्रा उन्होंने बाद में एक पत्र में "सुमेरु यात्रा" के नाम से वर्णित की। 1901 के अंत में वे मैदानों में उतरे, सबसे पहले मथुरा — जहां स्वामी शिवगणाचार्य ने छोटे स्तर पर सर्वधर्म सम्मेलनों का आयोजन किया था; दोनों बार स्वामी रामतीर्थ ही सभाध्यक्ष रहे, और लाहौर के "फ्री थिंकर" पत्र ने उनकी विनम्रता और निर्भयता की प्रशंसा की। परंतु उन्हें लगा कि लोग इस अवसर का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए कर रहे हैं — आध्यात्मिक जिज्ञासा का दिखावा भर कर रहे हैं — इसलिए वे अपनी प्रिय भूमि टिहरी लौट आए।
वहां टिहरी के महाराजा कीर्तिशाह — जिनकी प्रकृति तर्कप्रधान थी और जिन्होंने नास्तिक दर्शनों का भी अध्ययन किया था — स्वामी रामतीर्थ से जीवन के कठिन प्रश्नों के सहज उत्तर पाकर उनके अनन्य भक्त बन गए। महाराजा ने उन्हें गोलकोठी में ठहरने का आग्रह किया, और जब भी अवसर मिलता, घंटों उनके पास बैठकर अपनी जिज्ञासाएं शांत करते।
जापान और अमेरिका, 1902-1904
1902 में समाचार-पत्रों में एक अपुष्ट खबर छपी कि शिकागो के 1893 के सर्वधर्म सम्मेलन की तरह इस बार टोकियो में एक आयोजन होने जा रहा है। महाराजा कीर्तिशाह ने स्वयं यह सूचना स्वामी जी को दी और यात्रा की सारी व्यवस्था कर दी; नारायण स्वामी भी उनके साथ थे, और मार्ग में पड़ने वाले बंदरगाहों पर हिंदू व्यापारियों ने उनका भव्य स्वागत किया।
टोकियो में, इंडो-जापानी क्लब में, स्वामी रामतीर्थ की भेंट क्लब के मंत्री, एक युवा पंजाबी सरदार पूर्ण सिंह से हुई, जो आगे चलकर उनके सबसे समर्पित जीवनीकार बने। नारायण स्वामी ने जब पूर्ण सिंह से पूछा कि वे किस देश के निवासी हैं, तो आंखों में प्रेम के आंसू लिए पूर्ण सिंह बोले, "सारा संसार मेरा घर है" — और वाक्य पूरा होने से पहले ही स्वामी रामतीर्थ ने आगे जोड़ दिया, "...और भलाई करना मेरा धर्म।" बस इन दो पंक्तियों ने पूर्ण सिंह को "पूरन जी" बना दिया। अगले ही दिन वे 1893 के शिकागो सम्मेलन के भाषणों के दो बड़े ग्रंथ ले आए और स्वामी जी की मेज पर रख दिए। स्वामी जी की प्रतिक्रिया थी — "यही तो राम चाहता था। देखा, प्रकृति कैसे राम की इच्छाओं को पूरा कर रही है?" जब पता चला कि टोकियो में ऐसा कोई सम्मेलन हो ही नहीं रहा, तब भी वे विचलित नहीं हुए — "यदि टोकियो ऐसा कोई सम्मेलन नहीं कराना चाहता, तो न सही, राम तो अपना सम्मेलन करेगा ही।"
टोक्यो में एक शाम, बैरन नाइबो कांडो के घर, बातचीत के बीच ही बैरन उठकर भीतर गए और अपनी पत्नी तथा बच्चों को साथ ले आए। क्षमा मांगते हुए उन्होंने कहा — "मुझे क्षमा करें! मैं इस असाधारण आनंद को अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बांटे बिना नहीं रह सकता था।" जब कांडो ने पूछा, "आपने अपना परिवार त्यागा ही क्यों?" तो स्वामी रामतीर्थ का उत्तर था — "केवल एक बड़ा परिवार पाने के लिए, ताकि मैं अपना आनंद पूरे संसार के साथ बांट सकूं।" टोक्यो इंपीरियल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ताकाकुसु ने कहा कि उनमें एक सच्चे कवि और महान दार्शनिक का सह-निवास था, और उनकी हंसी में ऐसी खनक थी जो किसी का भी हृदय खींच ले। 7 अक्टूबर 1902 को टोकियो के हाई कॉमर्शियल कॉलेज में स्वामी रामतीर्थ ने "सफलता का रहस्य" शीर्षक से एक महत्वपूर्ण भाषण दिया; अखबारों में इसका विवरण पढ़कर रूस के राजदूत ने उनसे मिलने का प्रयास किया, परंतु तब तक स्वामी जी सैन फ्रांसिस्को के लिए रवाना हो चुके थे।
सैन फ्रांसिस्को के घाट पर, बिना सामान, बिना पैसे और उन्हें लेने कोई न होने पर, एक जिज्ञासु अमेरिकी ने पूछा कि वे उतरने की जल्दी में क्यों नहीं हैं। "आपका सामान कहां है, महोदय?" उसने पूछा। "मैं अपने अतिरिक्त कोई सामान नहीं रखता," स्वामी जी ने उत्तर दिया। "आप अपना पैसा कहां रखते हैं?" "मैं कोई पैसा नहीं रखता।" "फिर आप जीते कैसे हैं?" "मैं केवल सबसे प्रेम करके जीता हूं। जब मुझे प्यास लगती है, तो सदा कोई एक व्यक्ति जल का प्याला लिए आ जाता है, और जब भूख लगती है, तो सदा कोई एक व्यक्ति रोटी का टुकड़ा लिए आ जाता है।" "पर क्या अमेरिका में आपका कोई मित्र है?" "हां, मैं एक अमेरिकी को जानता हूं — तुम्हें," स्वामी जी ने कहा, और उस व्यक्ति के कंधे को छू लिया। उस स्पर्श ने उस अमेरिकी में मानो कोई पुराना, भूला हुआ परिचय जगा दिया, और वह उनका उत्साही प्रशंसक बन गया। बाद में उसने लिखा — "वे हिमालय से आया ज्ञान का एक मशाल हैं। उन्हें न आग जला सकती है, न इस्पात काट सकता है। आनंद के आंसू उनकी आंखों से बहते हैं, और उनकी उपस्थिति मात्र नया जीवन दे देती है।"
यूनिटी चर्च में उनके विचारों के लिए एक व्याख्यान शृंखला आयोजित हुई, जिसमें "सफलता का रहस्य", "प्रेम द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार", "तुम क्या हो?", "आनंद का इतिहास और निवास" तथा "पाप का निदान — कारण और निवारण" जैसे विषयों पर उन्होंने भाषण दिए। चूंकि उनका संदेश किसी एक जाति, धर्म या संप्रदाय तक सीमित नहीं था, इसलिए विमेन्स क्लब और स्प्रिचुलिस्ट क्रिश्चियन यूनियन जैसी संस्थाओं ने भी उन्हें उतने ही उत्साह से आमंत्रित किया। उन्होंने अमेरिकियों से भारतीय युवाओं को उच्च शिक्षा में सहायता करने का आग्रह किया, और भारतीय युवाओं से यह अपेक्षा रखी कि वे विदेश में ज्ञान अर्जित करने के बाद अपनी मातृभूमि की सेवा के लिए स्वदेश लौटें।
लगभग दो वर्ष अमेरिका में रहने के बाद वे यूरोप — जर्मनी, फ्रांस, इटली — और मिस्र होते हुए 8 दिसंबर 1904 को स्वदेश लौटे। मिस्र में उन्होंने एक मस्जिद में वहां के श्रोताओं को उन्हीं की भाषा अरबी में वेदांत का सार समझाया। कहा जाता है कि वे अपने समय के एकमात्र ऐसे संन्यासी थे, जिन्होंने इस्लाम की शिक्षाओं पर उतने ही अधिकार से विचार रखे, जितने अधिकार से वे वेदांत पर रखते थे।
शास्ता स्प्रिंग्स के दिन
सैन फ्रांसिस्को के बाद स्वामी जी लंबे समय तक डॉ. हिलर के यहां शास्ता स्प्रिंग्स में रहे — एक वृद्ध दंपती, जो उन्हें बहुत चाहते थे और सदा अपने पास रखना चाहते थे। स्वामी जी वहां साधारण मज़दूर की तरह काम करते, पहाड़ों से लकड़ी काटकर घर की आपूर्ति में जोड़ते, क्योंकि अमेरिका जैसे देश में बिना शारीरिक श्रम के रहना उन्हें पसंद नहीं था। शास्ता पर्वत की चोटी पर चढ़ने की एक प्रतिस्पर्धा में, जिसमें कई अमेरिकी प्रतिस्पर्धी भी शामिल थे, वे सबसे पहले पहुंचे — पर प्रथम पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया। इस चढ़ाई का विवरण छापने वाली पत्रिका की प्रतियां इतनी तेज़ी से बिकीं कि इसे एक असाधारण बिक्री माना गया। उन्होंने तीस मील की एक मैराथन दौड़ भी लगाई — केवल दौड़ने के प्रेम में, जीतने या हराने के लिए नहीं — और उसमें भी प्रथम आए।
नदी की तेज़ धारा के ऊपर उन्होंने अपने लिए एक झूला बंधवा रखा था, जिसमें बैठकर वे "अपने पंछियों" के साथ सुर मिलाते हुए गुनगुनाया करते — उनके अपने शब्दों में, "अमेरिका के राष्ट्रपति से भी अधिक प्रसन्न" अनुभव करते हुए। बीच-बीच में वे अपने पहाड़ी एकांत से निकलकर वेदांत पर व्याख्यान देते, और भारत के पक्ष में भी बोलते — अमेरिकियों के समक्ष एक अपील रखी, जिसने उस समय बहुत ध्यान आकर्षित किया। एक धनी महिला भक्त, जिन्हें उन्होंने "गंगा" नाम दिया, ने अपनी संपूर्ण संपत्ति, भूमि और घर उन्हें अर्पित करने की तथा स्वयं संन्यास लेने की इच्छा जताई — जिसे उन्होंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया।
मई 1903 में सिएटल के एक मित्र ने अप्रत्याशित रूप से एक सुंदर झूला भेजा, जिसे तुरंत एक हरे बांज और एक लाल फर के वृक्ष के बीच, ऊंचाई पर बांध दिया गया। बुदबुदाती हंसी और उमड़ते आनंद के साथ स्वामी जी उस झूले में लोट गए। सुगंधित, कोमल हवाएं उन्हें आगे-पीछे झुलाने लगीं, नदी अपने ॐ के स्वर में बहती रही, और स्वामी जी हंसते ही चले गए। एक चहचहाती रॉबिन ऊपर से यह सब देख रही थी; जब स्वामी जी थोड़ी देर के लिए झूले से उतरकर नाचने-कूदने लगे, तो उस चतुर चिड़िया ने खाली झूले में स्वयं झूलने का अवसर चुरा लिया। अगले ही दिन दोपहर, उत्तर की ओर यात्रा कर रहे संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति स्वयं इसी स्प्रिंग्स में कुछ देर के लिए रुके। उन्होंने स्वामी जी से बड़ी सहजता और प्रसन्नता से "भारतवासियों के हितार्थ अपील" नामक पुस्तिका स्वीकार की, उसे अपने दाहिने हाथ में थामे रखा, और भीड़ के अभिवादन का उत्तर देते समय वह पुस्तिका मानो अपने आप कम-से-कम सौ बार उनके माथे तक उठ गई। जब गाड़ी चली, तो उन्हें अपने डिब्बे में उसे ध्यानपूर्वक पढ़ते देखा गया, और एक बार फिर उन्होंने स्वामी जी की ओर हाथ हिलाकर आभार जताया। पर स्वामी जी ने राष्ट्रपति को कभी अपने काव्यमय झूले में झूलने का न्यौता नहीं दिया — क्योंकि उनके अपने शब्दों में, तथाकथित स्वतंत्र अमेरिकियों का यह राष्ट्रपति भी उनके पंछियों और खुली हवा जितना स्वतंत्र नहीं था।
मिसेज़ पॉलीन व्हिटमैन, जिन्हें स्वामी जी ने "कमलानंद" नाम दिया, ने बाद में लिखा कि शास्ता स्प्रिंग्स में स्वामी जी पहाड़ी ढलान पर एक तंबू में रहते और भोजन के लिए ही मुख्य घर आते थे। "सैक्रामेंटो नदी उस घाटी में उफनती हुई बहती थी, और यहीं स्वामी जी घंटों बैठकर पढ़ते, अपनी उदात्त कविताएं लिखते और ध्यान करते।" वे नदी के बीच एक बड़ी चट्टान पर बैठते, जहां धारा बहुत तेज़ थी, दिनों और सप्ताहों तक — घर पर केवल भोजन के समय आते, जब वे सभी को सुंदर बातें सुनाते। "उनकी हंसी सहज ही फूट पड़ती और नदी किनारे से घर तक साफ सुनाई देती। वे उतने ही मुक्त थे जितना एक बालक या एक संत हो सकता है। वे दिनों-दिन ईश्वर-चेतना में लीन रहते।"
स्वदेश वापसी
स्वदेश लौटने पर काशी में — पंडितों और विद्वानों की नगरी में — जब उन्होंने वेदांत पर प्रवचन देना शुरू किया, तो एक तीखा प्रश्न उठा: बिना संस्कृत का विधिवत अध्ययन किए वे उस विषय पर कैसे बोल सकते हैं, जिसके मूल ग्रंथ संस्कृत में हैं? ऊपरी तौर पर यह प्रश्न उचित लगता था — यद्यपि बी.ए. में उन्होंने संस्कृत में अच्छे अंक प्राप्त किए थे। इसके उत्तर में उन्होंने उपनिषदों पर लिखी संस्कृत टीकाओं का गहन अध्ययन किया, जिससे उनकी आंतरिक दृढ़ता और बढ़ी, और उन्होंने वेदों पर एक निष्पक्ष टीका लिखने का कार्य आरंभ किया — जो उनकी मृत्यु के समय अधूरा रह गया।
व्यास आश्रम में रहते हुए वे आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित माया के सिद्धांत में गहरे डूबे रहते, और अक्सर समाधिस्थ रहते। पूरन जी ने लिखा है कि उन्होंने इस कवि-संन्यासी के हृदय को बार-बार छूने का प्रयास किया, पर वे कहीं और खो चुके थे, और शेष रह गया था केवल "परम मौन और गहरा ठहराव" — जैसा तब होता है, जब सुंदरम् और शिवम् सत्यम् में विलीन हो जाते हैं।
व्यास आश्रम: संस्कृत की साधना
काशी और इलाहाबाद के संस्कृतज्ञ पंडितों ने उन्हें चुभते हुए ताने दिए थे — बिना संस्कृत का विधिवत अध्ययन किए वे वेदांत पर कैसे बोल सकते हैं? इन आलोचनाओं से आहत होकर वे ऋषिकेश के ऊपर व्यास आश्रम नामक एक वनस्थली में चले गए, और लगभग एक वर्ष संस्कृत व्याकरण, शंकर के भाष्य और वेदों के व्यवस्थित अध्ययन में बिताया। उन्होंने दाढ़ी बढ़ा ली, और आगंतुकों से कहते — "राम ने अब व्यास की दाढ़ी पा ली है।" पूरन जी ने उन्हें लिखकर पूछा कि आलोचकों की राय के लिए वे संस्कृत व्याकरण के बासी, धूल भरे संसार में क्यों उलझें; स्वामी जी का उत्तर था — "राम के पास अब भी बहुत ऊर्जा शेष है, तो संस्कृत सीखने में उसे लगाने में हर्ज़ ही क्या है।" पूरन जी को दृढ़ विश्वास था कि इस शुष्क भाषाशास्त्रीय साधना ने भीतर के कवि को कहीं मार डाला — "इसने उनकी उन्मुक्त, पंछी-सी आत्मा को सुन्न कर दिया, एक कवि को उदास दार्शनिक में बदल डाला" — और यह भी लिखा कि उनकी जल-मृत्यु को इसी बढ़ती हुई निराशा और चिंतन की उदास प्रवृत्ति से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
वशिष्ठ आश्रम में उदासी
व्यास आश्रम से वे वशिष्ठ आश्रम चले गए, जहां पहाड़ी लोगों ने, उनके दर्शन का कुछ भी न समझते हुए भी उन्हें "देव" — मनुष्य नहीं — पहचानते हुए, एक ही दिन में उनके लिए एक कुटिया बना दी। उनकी पुरानी उन्मुक्त प्रसन्नता को याद करते हुए पूरन जी ने एक बार सीधे पूछ लिया — "स्वामी जी! आप इतने बदल क्यों गए हैं? आप स्पष्ट रूप से उदास हैं।" उत्तर मिला — "पूरन जी! संसार को केवल राम के फूलों से मतलब है, और वे राम को तभी चखते हैं जब वह फूलों के रूप में उनके सामने आता है। पर उन्हें यह नहीं पता कि भूमि के नीचे, अंधेरे कोनों में, अपनी जड़ों में मुझे कितना श्रम करना पड़ता है, जो फूलों और फलों के लिए भोजन जुटाती हैं। अब मैं अपनी जड़ों में हूं। मौन एक बड़ा कार्य है, विचारों को संसार के सामने बिखेरने और उपदेश देने की आतिशबाज़ी से भी बड़ा। गौड़पाद और गोविंद आचार्य का वही मौन शंकराचार्य की उज्ज्वल सफलता के पीछे खड़ा था।"
इसी दौरान उन्होंने पहली बार पूरन जी को खुलकर बताया कि हरिद्वार में जब उनकी पत्नी और पुत्र उनसे मिलने आए थे, तब उन्होंने उनसे भेंट करने से क्यों इनकार किया था — "राम का भी एक हृदय है, पर उस समय उसने उस वस्त्र के नियमों का पालन करना उचित समझा जो वह पहने हुए था। यह उनसे भेंट करने का एक औपचारिक इनकार था। भला कोई अपने निजी संबंध को कैसे भूल सकता है, जब भाव अब भी हृदय में हिलोरें लेता हो — चाहे वह ईश्वर के लिए हो या मनुष्य के लिए? कवियों को निर्जीव पत्थर में नहीं बदला जा सकता। आध्यात्मिक विकास का अर्थ संवेदनहीनता नहीं है। जितना बड़ा विकास, उतनी ही बड़ी अनुभूति।" इन्हीं दिनों उन्होंने गैरिक वस्त्र त्यागकर धूसर ऊनी "पट्टू," एक काली-भूरी पगड़ी, पतलून और कुर्ता पहनना शुरू कर दिया — "क्या अब राम एक बड़ी इमामा वाले मौलवी जैसे नहीं लगते?" वे पूछते। उन्होंने पूरन जी को यह भी बताया कि अगली बार मैदानों में उतरने पर वे सबके सामने अपना गैरिक वस्त्र फाड़ डालेंगे, क्योंकि अब यह वस्त्र मुक्ति का वाहन नहीं रहा — "दास भी अब यह वस्त्र पहनने लगे हैं।"
चलते-चलते कभी-कभी वे लड़खड़ाकर गिर पड़ते और कहते — "आह! राम अपने प्रिय को भूल गया, इसीलिए गिर गया, वरना गिरना संभव ही नहीं। हम पहले भीतर फिसलते हैं, फिर बाहर गिरते हैं। बाहरी गिरावट तो केवल उसका परिणाम है। सदा भीतर सावधान रहो। एक भी सांस उसके बिना न जाने दो। अपनी सांस को उसी से भर लो।" संध्या को वे गाते और तालियां बजाते, नाचते हुए फूट पड़ते — पूरन जी को चैतन्य महाप्रभु के हरि-नृत्य की याद दिलाते हुए। एक बार वे और पूरन जी, नारायण स्वामी के साथ, पोअली कांठा होते हुए बूढ़ा केदार के हिमनदों की ओर निकले, विषुण की चोटी पर चढ़े, और संध्या को एक चरवाहे की झोंपड़ी पाई। चरवाहे ने पहले पूरन जी और नारायण स्वामी की विनती ठुकरा दी, पर जब स्वामी जी स्वयं सीधे भीतर चले गए, तो उनके साथ सबका स्वागत हो गया। अगली सुबह उन्होंने पूरन जी को बद्रीनारायण से लेकर जमनोत्री तक हिमालयी हिमनदों का एक अत्यंत भव्य दृश्य दिखाया, पर आगे बढ़ने से मना कर दिया — "पहाड़ों में घूमने से क्या लाभ, यदि हम उन्हें ही भूल जाएं? यदि हमारे पास वे हों, तो घर बैठे रहना भी धन्य है।" नारायण स्वामी बड़बड़ाए — "आप जैसे लोगों के साथ चलना मूर्खता है... स्वामी जी, आप स्वयं आगे नहीं जाना चाहते और पूरन जी को बहाना बनाते हैं।" पर स्वामी जी अड़े रहे — "नारायण जी! हमें लौटना ही होगा," और वे लौट पड़े। इसी बीच पुलिस की ओर से एक पत्र मिला, जिसमें उन्हें ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रवादी गतिविधियों के संदेह में सूचित किया गया था। उन्होंने उत्तर दिया — "उनसे कह दो, राम अपना बचाव नहीं करेगा। वे मेरे साथ जैसा चाहें व्यवहार करें। मैं जो हूं, उससे अन्यथा नहीं हो सकता। मैं एक भारतीय के रूप में चाहता हूं कि मेरा देश स्वतंत्र हो। वह स्वतंत्र होगा ही, एक दिन — चाहे यह राम उसे स्वतंत्रता दिलाए या हज़ार अन्य राम, यह कोई नहीं जानता।"
स्नान और अंतिम विदाई
जिस दिन पूरन जी वशिष्ठ आश्रम से विदा हो रहे थे, स्वामी जी ने उनसे स्नान कराने को कहा। पूरन जी ने उनका नारियल का कटोरा और तौलिया उठाया और उनके पीछे झरने तक गए। स्वामी जी स्वयं कुछ भी करने में बहुत अनिच्छुक थे। पूरन जी ने उनके वस्त्र उतारे, उन्हें निर्वस्त्र किया; वे धारा में उतरे और पूरन जी ने अपने ही हाथों से उन्हें नहलाया। आकाश उस पूरी सुबह बादलों से घिरा रहा, और जब वे अपनी कुटिया लौटे, तब पूरन जी के प्रस्थान का समय हो चुका था। "पूरन जी! जहां भी जाओ, स्वर्णभूमि में, भीतरी प्रकाश में जीना। जो कार्य राम ने आरंभ किया है, उसे आगे बढ़ाते रहना, क्योंकि अब राम के मौन व्रत लेने का समय आ गया है।" पूरन जी ने हल्के में लेते हुए कहा — "स्वामी जी! जब मैं आऊंगा तो आपकी बगलों में गुदगुदी करूंगा, और आप हंसकर बोल पड़ेंगे, और मैं आपका मौन तोड़ दूंगा।" स्वामी जी की आंखें लाल हो गईं, वे बिल्कुल गंभीर होकर बोले — "मौन को कौन फिर बुलवा सकता है।" पूरन जी आगे एक शब्द भी कहने का साहस न कर सके। वे चल पड़े; स्वामी जी विदा देने कुछ दूर तक साथ आए — नारायण स्वामी और एक अन्य मित्र भी, जिन्हें उन्होंने साथ आने को कहा था। वे वैसे ही आए जैसे धारा से निकले थे, केवल एक छोटी लंगोटी पहने। हल्की बूंदाबांदी होने लगी। पूरन जी की आंखों में आंसू भर आए। और जब उन्होंने झुककर विदा ली, स्वामी जी अचानक और तेज़ी से मुड़कर पहाड़ी पर वापस दौड़ पड़े, बिना एक बार भी पीछे देखे — मानो अपनी विशिष्ट अचानकता से, एक ही झटके में सारे व्यक्तिगत संबंध तोड़ रहे हों। पूरन जी फिर कभी उनसे नहीं मिले। लगभग एक महीने बाद जब नारायण स्वामी टिहरी उतरकर सिमलासू में — राजा के एक घर में — ठहरे, तो स्वामी जी ने उन्हें भी गंगा किनारे दूर एक कुटिया बनाकर वहां रहने भेज दिया, ठीक वही विदाई-संदेश देकर। नारायण स्वामी ने भी उन्हें फिर कभी नहीं देखा। दोनों विदाइयां उनकी निकट आ रही मृत्यु की ही विदाइयां थीं।
भिलंगना में मृत्यु
टिहरी उतरकर वे सिमलासू स्थित चंद्रभवन में — जिसे लोग गोलकोठी भी कहते थे — रहने लगे, प्रेस के लिए लेख लिखते हुए। एक चट्टान से भिलंगना में कूदने के कारण उनके घुटने में चोट लग चुकी थी, और महीनों ठोस आहार से परहेज़ के कारण शरीर अत्यंत दुर्बल हो चुका था — इसलिए वे प्रायः स्वयं नीचे जाने के बजाय भिलंगना का जल मंगवाकर चंद्रभवन में ही स्नान करते थे; उनकी सेवा में एक रसोइया नियुक्त था। इसी दौरान उन्होंने "उन्नति का निश्चित विधान" नामक एक महत्वपूर्ण लेख भी लिखा।
एक दिन सुबह-सुबह रसोइए ने बताया कि वह स्नान करने नीचे जा रहा है। इतनी सुबह स्नान? — चकित होकर स्वामी जी ने कारण पूछा, तो उत्तर मिला, "आज दीपावली है।" स्वामी जी उस समय अपना अंतिम लेख लिख रहे थे — शीर्षक था "उन्नति का मुद्रांकित प्रलेख" — उसका अंतिम अनुच्छेद पेंसिल से लिखा हुआ था। उसे बीच में छोड़ते हुए बोले, "चलो, आज मैं भी चलता हूं" — मानो उन्हें कुछ याद आ गया हो। वे नीचे गए, सीने तक गहरे जल में उतरे, और अपने सदा के अभ्यास अनुसार अपनी उंगलियों से नथुने बंद कर धारा में डुबकी लगाई। वे फिर कभी ऊपर नहीं आए, ऐसे ही जैसे थे। लगता है उनका पैर फिसल गया — शारीरिक रूप से दुर्बल और चोटिल घुटने के कारण असमर्थ, वे तैरकर ऊपर नहीं आ सके, विशेषकर जब वे जल के भीतर ही एक भंवर में फंस गए। रसोइए ने शोर मचाया, पर आसपास कोई सुनने वाला नहीं था। कुछ देर बाद वे जल की सतह पर एक बार फिर दिखे, हल्का-सा संघर्ष करते हुए — पर वह भी शीघ्र थम गया। उनका शरीर धारा के साथ बहता चला गया, मानो उसी अंतिम प्रयास के वेग से ऊपर उठते-उठते ही उनका प्राणांत हो गया हो। उस दिन वे ठीक 33 वर्ष के हुए थे।
कुछ लोग इसे विशुद्ध दुर्घटना मानते हैं; कुछ अन्य मानते हैं कि उन्होंने पहले भंवर से निकलने का प्रयास किया, फिर भावी को स्वीकार करते हुए स्वयं को उस पवित्र धारा को समर्पित कर दिया — मानो अपनी मां गंगा को अपना जीवित शरीर देने के वचन को निभाते हुए — अर्थात उन्होंने स्वयं जल समाधि ले ली। कुछ लोगों ने इसे निराशा में की गई आत्महत्या भी कहा है — पर आत्महत्या तो उसकी होती है, जिसकी कामनाएं अधूरी रह गई हों; जो समस्त कामनाओं से ऊपर उठ चुका हो, उसे इस कसौटी पर नहीं तौला जा सकता।
स्नान के लिए जाने से पहले वे जो लिख रहे थे, वह आज एक पूर्वाभासित विदाई-लेख जैसा प्रतीत होता है:
"ओ मौत! बेशक उड़ा दे इस एक जिस्म को, मेरे और शरीर भी कुछ कम नहीं हैं। सिर्फ चांद की किरणें, चांदी के तार पहनकर मैं चैन से समय काट सकता हूं। पहाड़ों में नदी-नालों के वेश में गीत गाता फिरूंगा, आनंद के महासागर के लिबास में लहराता फिरूंगा। मैं ही मनोहर वायु और प्रातःकालीन समीर की मस्ती हूं। मेरी यह मनमौजी मूर्ति हर समय हलचल में रहती है।
मौत को मौत आ न पाएगी, कस्द करके जो मेरा आएगी।
मुझको काटे, कहां है वह तलवार? दाग दे मुझको, कहां है वह नार?
इस रूप में पहाड़ों से उतरा, मुरझाते पौधों को ताजा किया,
फूलों को हंसाया, बुलबुल को रुलाया, दरवाजों को खटखटाया,
सोतों को जगाया, किसी का आंसू पोंछा, किसी का घूंघट उठाया,
इसको छेड़, उसको छेड़, तुझको छेड़! वह गया! वह गया!! वह गया!!!
न कुछ हाथ, न किसी के हाथ आया।"
पूरन जी ने इसी अंतिम अनुच्छेद का अपना एक अलग, स्वतंत्र अनुवाद भी छोड़ा है, जो मूल भाव को कुछ भिन्न शब्दों में पकड़ता है — "हे मृत्यु! चाहो तो यह शरीर ले लो! मुझे कोई चिंता नहीं। मेरे पास प्रयोग करने को और भी बहुत शरीर हैं। मैं चांदनी की वे चांदी-सी किरणें पहनकर भी जी सकता हूं। मैं पहाड़ी नदियों और झरनों का रूप धरकर एक दिव्य गायक की भांति विचर सकता हूं। मैं सागर की लहरों में नृत्य कर सकता हूं। मैं वह अभिमानी समीर हूं जो चलती है, मैं वह मतवाली हवा हूं। मेरे ये सारे रूप तो बदलते हुए भटकते हुए रूप मात्र हैं। मैं उन पहाड़ों से उतरा, मृतकों को उठाया, सोए हुओं को जगाया, किसी के सुंदर मुख से आवरण हटाया और कुछ रोते हुओं के आंसू पोंछे। बुलबुल और गुलाब, दोनों को मैंने देखा और दोनों को सांत्वना दी। मैंने इसे छुआ, उसे छुआ, फिर अपनी टोपी उतारकर विदा ले ली। यहां जाता हूं, वहां जाता हूं, कोई मुझे पा नहीं सकता।" पूरन जी ने बाद में लिखा कि उस समय उन्हें लगा था यह अनुच्छेद मानो अपनी ही मृत्यु का पूर्वाभास हो, पर अब वे इतने निश्चित नहीं — "यह उल्लेखनीय अवश्य है कि उन्होंने मृत्यु के विषय में सोचा, और वहीं उनकी मृत्यु हुई। इन दिनों में मृत्यु के विचारों का उन पर मंडराना, उनके उदास मन की शिथिलता — यह सब उस अवसाद को दर्शाते हैं जिसे न मैं, न कोई और उस समय पहचान सका, निदान करना तो दूर की बात।"
जब उनका पार्थिव शरीर मिला, तो वह पद्मासन में था, और होठों की मुद्रा से लगता था मानो "ॐ" का उच्चारण करते हुए उन्होंने अपने प्राण समष्टि चेतना में विलीन कर दिए हों।
टिहरी में उनकी विरासत
महाराजा कीर्तिशाह की भक्ति उनकी मृत्यु के बाद भी नहीं थमी। गोलकोठी से अलग, भिलंगना घाटी में "मालद्योल" नामक स्थान पर भी महाराजा के संरक्षण में स्वामी जी के लिए एक आश्रम बनवाया गया था।
आगे चलकर टिहरी में उनके नाम पर एक शिक्षण संस्थान भी स्थापित हुआ। 1969 में टिहरी जिले का पहला राजकीय स्नातक महाविद्यालय, "स्वामी राम तीर्थ परिसर," मूलतः पुरानी टिहरी नगर में खोला गया। जब टिहरी बांध बनने से पुरानी टिहरी जलमग्न होने लगी, तो वर्ष 2000 में इसे टीएचडीसी (टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन) की सहायता से बदशाही थौल में स्थानांतरित किया गया, और 2009 में यह हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय का एक घटक परिसर बन गया।
पुरानी टिहरी में सिमलासू स्थित गोलकोठी — जहां वे अपने अंतिम वर्षों में रहे थे — बांध की झील में डूब गई। जलमग्न होने से पहले वहां स्थापित उनकी प्रतिमा को कोटी कॉलोनी, नई टिहरी झील के निकट, स्थानांतरित कर दिया गया, और 2006 में वहां "स्वामी राम तीर्थ भवन" नाम से एक नया स्मारक भवन बनाया गया। हर वर्ष 16-17 अक्टूबर को इसी स्मारक पर "निर्वाण दिवस" मनाया जाता है — पुष्पांजलि तथा वेदांत और राष्ट्रधर्म पर प्रवचन के साथ।
भाग II
उनके द्वारा कहे गए दृष्टांत
स्वामी रामतीर्थ तर्क से अधिक कथा के माध्यम से वेदांत सिखाते थे। उनके व्याख्यानों में ऐसे सैकड़ों दृष्टांत मिलते हैं; नीचे दिए गए अठारह उनमें से सबसे स्वतः-पूर्ण और सबसे अधिक दोहराए गए हैं।
निन्यानबे
एक निर्धन दंपति एक छोटी-सी झोंपड़ी में बड़े संतोष से रहते थे। पति दिन भर मामूली मज़दूरी करता, पर उसके मन में न कोई लालच था, न ईर्ष्या — वह जो कमाता उसी में प्रसन्न रहता। पड़ोस में रहने वाला एक बहुत धनी व्यक्ति इसके विपरीत सदा चिंतित और अशांत रहता, उसका मन अपनी संपत्ति के इर्द-गिर्द ही भटकता रहता। एक वेदांती संन्यासी दोनों घरों में गया और धनी व्यक्ति से कहा कि उसकी संपत्ति ने ही उसे बांध रखा है — "देखो उस निर्धन को, उसके पास कुछ नहीं, पर उसके चेहरे पर संतोष का तेज है, उसकी भुजाएं बलिष्ठ हैं, वह गुनगुनाता हुआ प्रसन्नचित्त घूमता है।" धनी व्यक्ति को विश्वास नहीं हुआ, सो संन्यासी की सलाह पर उसने चुपके से निर्धन के घर में निन्यानबे रुपये फिंकवा दिए। अगली रात संन्यासी और धनी व्यक्ति ने देखा कि निर्धन के घर में चूल्हा नहीं जला — जबकि वे प्रतिदिन रात को भोजन बनाया करते थे। पूछने पर निर्धन को सच बताना पड़ा — उसे निन्यानबे रुपयों से भरा एक डिब्बा मिला था, और उसे तथा उसकी पत्नी को यही विचार आया कि पूरे सौ के लिए बस एक रुपया और चाहिए। इसलिए उन्होंने एक-एक दिन छोड़कर भूखे रहने का निश्चय किया, ताकि थोड़े-थोड़े पैसे बचाकर एक सप्ताह में वह शेष एक रुपया जोड़ लें और पूरे सौ हो जाएं। रामतीर्थ कहते थे — यही धनवानों की कंजूसी का रहस्य है। जितना अधिक मिलता है, उतने ही अधिक वे लालची और असंतुष्ट होते जाते हैं — निन्यानबे मिलने पर सौ चाहिए, निन्यानबे हज़ार मिलने पर एक लाख। सुख संग्रह में नहीं, केवल संतोष में है।
फोटोग्राफिक प्लेट
एक महिला अपना चित्र खिंचवाने एक प्रथम श्रेणी के फोटोग्राफर के पास गई। उसने अपने कैमरे को अत्यंत संवेदनशील प्लेट के साथ पूरी सावधानी से तैयार किया। जब उसने नेगेटिव देखा, तो महिला के चेहरे पर चेचक के स्पष्ट चिह्न दिखाई दिए। चकित होकर उसने कहा, "यह क्या? इसका चेहरा तो साफ है, पर इसमें उस भयानक रोग के निश्चित लक्षण हैं।" उसने बार-बार प्रयास किया, पर हर बार वही परिणाम आया, और अंततः उसने महिला से किसी और दिन आने को कह दिया। घर लौटकर कुछ ही घंटों में महिला को सचमुच चेचक हो गई। तब उसे याद आया कि उसे हाल ही में अपनी बहन का एक पत्र मिला था, जो चेचक से पीड़ित थी — उसने पत्र का लिफाफा अपने होठों से गीला कर सील किया था, और वहीं से रोग उस तक पहुंचा। कैमरे ने, अपनी परिष्कृत सामग्री के बल पर, त्वचा के नीचे पहले से काम कर रहे रोग को पकड़ लिया था — नंगी आंखों से अदृश्य, पर प्लेट पर चेहरे पर कोई भी दृश्य लक्षण प्रकट होने से पहले ही मौजूद। रामतीर्थ इसे सीधे इच्छाओं से जोड़ते थे — "हम भी वैसे ही हैं: वे चेचक के चिह्न जो कैमरे में दिख गए, पर चेहरे पर अभी प्रकट नहीं हुए, वैसे ही इच्छाएं भी उन घटनाओं का पूर्वाभास हैं जो अवश्य घटित होंगी। इच्छाएं वस्तुतः उनकी पूर्ति की गारंटी हैं — वे आने वाली घटनाओं का संकेत मात्र हैं।"
पत्र लिखना
एक व्यक्ति अपने उस मित्र को पत्र लिख रहा था, जिसके लिए वह बहुत समय से तड़प रहा था, जिससे वह लंबे समय से बिछड़ा हुआ था। यह एक लंबा पत्र था, और वह पन्ने पर पन्ने लिखता गया, इतना तल्लीन कि लगभग पैंतालीस मिनट तक न रुका, न सिर उठाया। जब पत्र अंततः पूरा हुआ और हस्ताक्षरित हुआ, तब उसने सिर उठाया — और उसका प्रिय मित्र स्वयं उसके सामने खड़ा था। वह उछलकर खड़ा हो गया, मित्र को गले लगाया, और फिर बोल उठा, "तुम यहां हो?" मित्र ने उत्तर दिया, "मैं आधे घंटे से भी अधिक समय से यहीं हूं।" उसने पूछा, "इतनी देर से हो, तो बताया क्यों नहीं?" मित्र ने कहा, "तुम इतने व्यस्त थे, मैं तुम्हारे काम में बाधा नहीं डालना चाहता था।" रामतीर्थ इसका प्रयोग यों करते — "ऐसा ही है, ऐसा ही है। तुम्हारी इच्छाएं इस पत्र-लेखन जैसी हैं। तुम तरसते हो, चाहते हो, इच्छा करते हो, भूखे-प्यासे रहते हो, चिंतित रहते हो — यह सब पत्र लिखना ही तो है, और तुम लिखते ही चले जाते हो। जिसे तुम पत्र संबोधित कर रहे हो — जिन वस्तुओं की तुम्हें कामना है — कर्म के गुप्त नियम के अनुसार वे पहले से ही तुम्हारे सामने उपस्थित हैं। पर तुम उन्हें महसूस या पा क्यों नहीं रहे? क्योंकि तुम इच्छा कर रहे हो, तुम पत्र लिख रहे हो। यही कारण है। जिस क्षण तुम इच्छा करना छोड़ दोगे, उसी क्षण तुम पत्र लिखना बंद कर दोगे, और तुम पाओगे कि सभी वांछित वस्तुएं तुम्हारे सामने ही हैं।"
वह देवी, जो भीख से नहीं आती
एक राजा के प्रधानमंत्री ने लक्ष्मी — भाग्य की देवी — को साक्षात् अपने सामने देखने के लिए हर संभव तपस्या की। उसने मंत्रों और साधनाओं का अभ्यास किया, दस लाख बार पवित्र मंत्रों का जाप किया, ताकि देवी की उपस्थिति का अनुभव हो सके — पर देवी प्रकट नहीं हुई। इसके बाद उसने तीस लाख बार और यह तपस्या दोहराई — फिर भी देवी अदृश्य ही रही। अंततः इन साधनाओं से उसका विश्वास उठ गया, उसने सब कुछ त्याग दिया और संन्यास लेकर जंगलों में चला गया। संन्यास ग्रहण करते ही, महल छोड़ते ही, उसने देवी को अपने सामने खड़ा पाया। वह चिल्ला उठा, "जाओ देवी, अब तुम यहां क्यों आई हो? अब मुझे तुम्हारी आवश्यकता नहीं। मैं संन्यासी हूं। एक संन्यासी को विलासिता और सांसारिक सुखों से क्या लेना-देना? जब मुझे तुम्हारी चाह थी, तब तुम नहीं आईं; अब जब मुझे कोई इच्छा नहीं, तब तुम मेरे सामने आ खड़ी हुई हो।" देवी ने उत्तर दिया, "तुम स्वयं ही बाधा बने हुए थे। जब तक तुम इच्छा करते रहे, तब तक तुम द्वैत का प्रतिपादन कर रहे थे, स्वयं को भिखारी बना रहे थे, और ऐसा प्राणी कुछ भी नहीं पा सकता। जिस क्षण तुम इच्छाओं से ऊपर उठकर उन्हें ठुकरा देते हो, उसी क्षण तुम स्वयं देवता बन जाते हो, और वैभव तो देवताओं का ही होता है।"
यमुना में कृष्ण का नृत्य
रामतीर्थ पुराणों की एक सुंदर कथा सुनाते — कृष्ण यमुना नदी में कूद पड़े, जबकि उनके पिता, माता, मित्र और संबंधी स्तब्ध खड़े देखते रह गए, यह मानकर कि वे सदा के लिए खो गए। नदी के तल में एक हज़ार फणों वाला विशाल नाग निवास करता था। कृष्ण ने अपनी बांसुरी बजानी शुरू की, उसमें ॐ का जाप करते हुए, और नाग के फणों को एक-एक कर कुचलना आरंभ किया — पर जितनी तेज़ी से वे कुचलते, उतनी ही तेज़ी से नए फण उग आते। कृष्ण नाग के मुकुटधारी फण पर उछलते-नाचते रहे, बांसुरी पर मंत्र बजाते रहे, फणों को कुचलते रहे — और आधे घंटे में नाग मर गया। नदी का जल रक्तरंजित हो गया। नाग की सभी पत्नियां कृष्ण के पास आईं, उनके मधुर सान्निध्य का अमृत पीने को उत्सुक, उन्हें प्रणाम करने। कृष्ण नदी से बाहर निकले, और उनके चकित संबंधी और मित्र आनंद-विभोर होकर अपने प्रिय कृष्ण का स्वागत करने दौड़ पड़े। रामतीर्थ इसका दोहरा अर्थ समझाते: नदी अथवा सरोवर मन का प्रतीक है। जो कोई "कृष्ण" — अर्थात परमात्मा — बनना चाहता है, उसे अपने ही मन के सरोवर में गहरे उतरना होगा, और उस विषैले नाग से — वासना और इच्छा के विषधर सर्प से — जूझना होगा, उसके अनेक फणों को कुचलकर सरोवर को स्वच्छ करना होगा। उसे बांसुरी उठानी होगी — बांसुरी ने एक बार पूछा था कि सभी वस्तुओं में से केवल उसे ही कृष्ण के अधरों का चुंबन क्यों मिला; उसका उत्तर था, "मुझमें एक ही गुण है — मैंने स्वयं को समस्त पदार्थ से शून्य कर लिया है।" बांसुरी को अधरों पर रखने का अर्थ है हृदय को शुद्ध करना, मन को पूर्णतः ईश्वर की ओर मोड़ना। उस मनोदशा में ॐ का जाप करते हुए, विषधर सर्प के अनेक फणों को — जो हमारी अनगिनत इच्छाएं और स्वार्थी वृत्तियां हैं — एक-एक कर खोजकर कुचलना चाहिए, ताकि जब साधक मन के सरोवर से बाहर निकले, तो उसका जल विषाक्त न पाया जाए, बल्कि अमृत बहाए। जब वासना का नाग नष्ट हो जाता है, तो इच्छा की वस्तुएं स्वयं साधक की पूजा करने लगती हैं, ठीक वैसे ही जैसे नाग की पत्नियों ने कृष्ण को प्रणाम किया।
राज्य का सबसे निर्धन व्यक्ति
एक संन्यासी के पास कुछ तांबे के पैसे थे, जिन्हें वह कुछ बालकों को देने वाला था। कई निर्धन लोग उसके पास आए, यह आशा लिए कि उन्हें सिक्के मिलेंगे, पर उसने उन्हें देने से मना कर दिया। अंत में एक राजा हाथी पर सवार होकर वहां आया। संन्यासी ने वे तांबे के सिक्के उछालकर सीधे हौदे में डाल दिए, जहां राजा बैठा था। इस अप्रत्याशित कृत्य से राजा चकित रह गया। संन्यासी ने समझाया कि यह धन उसी के लिए था — राजा के लिए — क्योंकि वह सबसे बड़ा निर्धन था। राजा ने पूछा यह कैसे हो सकता है। संन्यासी ने उत्तर दिया कि राजा अपनी संपत्ति के कारण ही सबसे निर्धन है, और अधिक से अधिक राज्य पाने की उसकी निरंतर भूख-प्यास के कारण — इसलिए भिखारी नहीं, बल्कि वही वास्तव में सबसे निर्धन है। सच्ची निर्धनता धन के अभाव में नहीं, बल्कि अधिक और अधिक पाने की अतृप्त लालसा में है।
वह कवि, जिसने अंधे होने का बहाना किया
भारत में एक मुस्लिम कवि था, चतुर और वाक्पटु, जो एक देशी राजा के दरबार में रहता था, जो उससे बहुत प्रभावित था। एक रात राजा ने उसे इतनी देर तक अपने साथ रखा, उसकी कविताओं और चतुर बातों से इतना मुग्ध हुआ कि नींद का ध्यान ही न रहा। रानी की जिज्ञासा इतनी बढ़ गई कि उसने कवि को अंतःपुर में बुलवाया, जहां उसने अपनी कहानियां सुनाकर स्त्रियों को मोहित कर दिया। वहां कवि ने बता दिया कि वह अंधा है, यद्यपि वह बिल्कुल अंधा नहीं था। उसका दुष्ट उद्देश्य यह था कि उसे स्त्रियों के बीच स्वच्छंद विचरण की अनुमति मिल सके — अंधा मानकर वे न घूंघट करतीं, न सतर्क रहतीं। पर, जैसा रामतीर्थ कहते हैं, "सत्य को सदा के लिए छिपाया नहीं जा सकता।" एक दिन, अपनी सम्मानित स्थिति का इतना अभ्यस्त हो जाने पर, कवि ने एक दासी को अपनी कुर्सी हटाने को कहा; उसने मना कर दिया, कहा कि कमरे में कोई कुर्सी है ही नहीं। फिर उसने पानी का एक बर्तन मांगा; उसने कहा कि कमरे में पानी नहीं है। जल्दबाज़ी में कवि स्वयं को भूल बैठा और बोल उठा, "लाओ, यहीं तो है, क्या तुम्हें दिखता नहीं? वो रहा।" सत्य ने झूठे पर अपना खेल खेल दिया था। दासी सीधे रानी के पास दौड़ी और भेद खोल दिया — "इस दुष्ट की आंखें हैं। यह देख सकता है। यह झूठा है, अंधा नहीं है।" उसे तुरंत महल से निकाल दिया गया। पर निष्कासित होने के लगभग तीन दिन बाद वह सचमुच अंधा हो गया। रामतीर्थ समझाते हैं — "कर्म का नियम आकर बताता है कि मनुष्य अपनी ही इच्छा से अंधा बनता है। वह अपने भाग्य का स्वामी स्वयं है। अंधापन उसने स्वयं अपने ऊपर ला डाला।" बाद में, जब सचमुच अंधापन आया, तो वह रोया-चिल्लाया, दांत पीसे, होंठ काटे, और छाती पीटी।
वह व्यक्ति, जिसने मृत्यु को पुकारा
भारत के गर्म प्रदेश में एक वृद्ध, दुर्बल और ज्वरग्रस्त व्यक्ति भारी बोझ अपने कंधों पर उठाए चल रहा था। वह एक पेड़ की छांव में बैठ गया, अपना बोझ फेंक दिया, और पुकार उठा — "हे मृत्यु! मृत्यु!! मृत्यु!!! आओ। हे मृत्यु, मुझे मुक्त करो।" कथा कहती है कि यमराज उसी क्षण उसके सामने प्रकट हो गए। वृद्ध ने जब उन्हें देखा, तो चकित और भयभीत हो गया, और पूछा, "तुम कौन हो?" मृत्यु ने उत्तर दिया, "मैं वही हूं जिसे तुमने अभी बुलाया था; तुमने मुझे बुलाया, और मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करने आया हूं।" वृद्ध कांपने लगा और बोला, "मैंने तुम्हें मरने के लिए नहीं बुलाया था — मैंने तो केवल इतना चाहा था कि तुम इस बोझ को उठाकर मेरे कंधों पर रखने में मेरी सहायता कर दो।" रामतीर्थ की टिप्पणी — यही तो लोग करते हैं: उनकी सारी कठिनाइयां, परेशानियां और दुख उन्होंने स्वयं ही उत्पन्न किए होते हैं; हर कोई अपने भाग्य का स्वामी है, पर जब परिणाम सामने आता है, तो वह रोने-चिल्लाने लगता है। "तुम मृत्यु को आमंत्रित करते हो, और जब मृत्यु आती है, तो तुम रोने लगते हो। पर ऐसा नहीं चल सकता। जब एक बार तुम नीलामी में सबसे ऊंची बोली लगा देते हो, तो वस्तु तुम्हें लेनी ही पड़ेगी।"
दो पत्नियों वाला व्यक्ति
भारत में एक व्यक्ति की दो पत्नियां थीं — एक ऊपरी मंज़िल में रहती, दूसरी निचली में। एक रात एक चोर घर में घुस आया, पूरी संपत्ति चुराने के इरादे से, पर घर में सब जाग रहे थे और उसे चुराने का कोई अवसर न मिला। भोर होते-होते घरवालों ने उसे पकड़ लिया और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। सजा सुनाए जाने से पहले चोर ने विनती की — "महोदय, आप जो चाहें करें, पर एक सज़ा मुझे न दें — मुझे कभी दो पत्नियों का पति न बनाएं।" कारण पूछने पर उसने बताया कि पूरी रात घर का मालिक सीढ़ियों पर ही खड़ा रहा, क्योंकि एक पत्नी उसे ऊपर खींचती रही तो दूसरी नीचे; उसके सिर के बाल नोचे गए, वह ठंड से पूरी रात कांपता रहा — और इसी घरेलू उथल-पुथल के बीच चोर पकड़ा गया, उसे चुराने का कोई अवसर ही नहीं मिला। रामतीर्थ लागू करते हैं — "तुम्हारे सारे कष्ट तुम्हारी परस्पर विरोधी इच्छाओं से आते हैं, और तुम जानते हो, स्वयं से बंटा हुआ घर टिक नहीं सकता। यदि तुम्हारे लक्ष्य में एकता हो, तो तुम्हें कोई कष्ट नहीं होगा, पर यदि द्वंद्व हो, तो तुम्हें कष्ट सहना ही होगा।"
नियाग्रा के भंवर में दो व्यक्ति
दो व्यक्ति नियाग्रा की तेज़ धारा में बह रहे थे। एक को एक बड़ा लट्ठा मिल गया और उसने उसे थाम लिया; दूसरे को किनारे से बचाव के लिए फेंकी गई एक पतली रस्सी मिली — भारी लट्ठे की तुलना में कमज़ोर दिखने वाली — फिर भी उसने उसे थाम लिया और बच गया। पर जो भारी लट्ठे से चिपका रहा, वह उसी के साथ तेज़ धारा में बहता चला गया, गरजते जलप्रपात के नीचे उफनते जल की गहरी क़ब्र में समा गया। रामतीर्थ लागू करते — "तुम इन बाहरी नामों पर भरोसा करते हो — यश, धन, भूमि और समृद्धि। ये लट्ठे जैसे बड़े दिखते हैं, पर रक्षक तत्व वे नहीं हैं। रक्षक तत्व तो वह महीन धागा है, वह सूक्ष्म सत्य, जो तुम्हें छू-पकड़ भी नहीं आता — वही वह रस्सी है जो तुम्हें बचाएगी। संसार की ये सारी वस्तुएं तुम्हारा विनाश ही करेंगी। सावधान, सावधान। सत्य में दृढ़ आश्रय रखो।"
बालक और कल्पित भूत
एक मां ने अपने बालक को यह विश्वास दिला दिया था कि बैठकखाने से सटा हुआ कमरा किसी भूत से ग्रस्त है। बालक भयभीत हो गया और उस कमरे में जाने से इनकार करने लगा। एक शाम पिता कार्यालय से लौटे और बालक से उस कमरे में जाकर कोई वस्तु लाने को कहा। भयभीत बालक रोता हुआ दौड़ा — "पापा, मैं उस कमरे में नहीं जाऊंगा, वहां एक बड़ा भयानक राक्षस है।" एक समझदार व्यक्ति होने के नाते, पिता ने एक उपाय सोचा: नौकर को गुप्त निर्देश दिए, जिसने कमरे में जाकर एक तकिये के एक कोने को काले कपड़े से ढककर खिड़की के एक छेद से बाहर निकाल दिया। पिता ने बालक का ध्यान उस ओर खींचा — "वह देखो, कान जैसा लगता है।" बालक की कल्पना ने तुरंत मान लिया कि वह राक्षस का कान है। पिता बोले, "बेटा, बहादुर बनो; यह छड़ी लो, हम राक्षस को नष्ट करेंगे।" बालक ने प्रहार किया, नौकर ने "कान" को कमरे में खींच लिया; पिता ने प्रशंसा की। फिर दो "कान" प्रकट हुए, बालक ने बार-बार वार किए, चीखें सुनाई दीं, और अंततः पिता ने स्वयं तकिया बाहर निकालकर घोषित किया, "वाह वीर बालक, तुमने राक्षस को पीट-पीटकर तकिया बना दिया!" संतुष्ट होकर बालक बहादुर बन गया, उछलने-कूदने लगा, और सीधे उसी कमरे में जाकर वह वस्तु ले आया जो पिता ने मांगी थी। रामतीर्थ का सार यह था — तकिए को पीटने से "भूत" नहीं भागा; बालक के भीतर यह विश्वास विकसित हुआ कि कमरे में कोई भूत है ही नहीं। भूत वास्तव में कभी था ही नहीं, वह बालक की अपनी ही कल्पना से उपजा था, और उसी झूठी कल्पना का उपचार आवश्यक था।
धर्मयोद्धाओं का भाला
धर्मयुद्धों के समय, भारी रक्तपात के बीच, ईसाई सेना एक झड़प में पराजित होकर पीछे हट गई। सेना के एक सैनिक ने, प्रसिद्धि की चाह में, दावा किया कि उसे दर्शन हुआ है कि ठीक उसके पैरों तले वह भाला गड़ा है, जिसने कभी मसीह के शरीर को छुआ था। यह कथा पूरी सेना में फैल गई, और सैनिक सुबह से रात तक खुदाई करते रहे, पर कुछ न मिला। अंततः उसी व्यक्ति ने चिल्लाकर कहा कि उसे जगह मिल गई है। सब वहां दौड़े और वह भाला खोद निकाला — पुराना, सड़ा हुआ। ईसाई असीम आनंद से भर उठे; भाले की खोज से प्रेरित होकर उन्होंने पुनः शत्रु पर आक्रमण किया और विजय पाई। कुछ समय बाद, वही व्यक्ति जिसने यह कथा गढ़ी थी, मृत्यु-शय्या पर स्वीकार किया कि पूरी कथा एक धोखा थी — वह भाला उसके परदादा का पुराना पारिवारिक भाला था, जिसे उसने चुपके से गड्ढे में फेंक दिया था, ताकि खोदते समय वह मिल जाए। रामतीर्थ की शिक्षा — "भाले में कोई गुण नहीं था, गुण तो लोगों के उत्साह और परिपूर्ण श्रद्धा में था। विजय भाले के कारण नहीं, बल्कि लोगों में निहित शक्ति के कारण हुई। हे ईसाइयो, हे मुसलमानो, हे संसार के विभिन्न संप्रदायो, यदि तुम सोचते हो कि तुम मसीह, बुद्ध या कृष्ण के नाम से तर रहे हो, तो याद रखो, सच्चा गुण तुम्हारे अपने स्व में ही है।"
ग्वालिनें और शंकालु पंडित
एक महान पंडित एक सभा में पवित्र ग्रंथ पढ़ रहे थे, जब कुछ गांव की ग्वालिनें, दूध बेचने जाते हुए, उन्हें यह कहते सुनकर गुज़रीं: "ईश्वर का पवित्र नाम वह महान नौका है जो हमें सागर पार कराती है।" ग्वालिनों ने इसे शब्दशः लिया और इस पर पूर्ण श्रद्धा रखी। उन्हें प्रतिदिन दूध बेचने के लिए एक नदी पार करनी पड़ती थी, और वे नाविक को चार आने चुकाती थीं। उन्होंने सोचा — "क्यों न हम ईश्वर का नाम लेकर, ॐ जपते हुए नदी पार करें?" अगले दिन वे ॐ जपते हुए जल में उतरीं — वे पार कर गईं और डूबीं नहीं। महीने भर बाद, कृतज्ञता से भरकर, उन्होंने उस पंडित को भोजन पर आमंत्रित किया। नदी की ओर ले जाते हुए एक ग्वालिन पल भर में विपरीत किनारे पर पहुंच गई, पंडित को इस किनारे पर खड़ा छोड़कर। लौटकर उसने पूछा कि उन्हें देर क्यों हो रही है; उन्होंने बताया कि वे नाविक की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उसने उत्तर दिया — "आप स्वयं भी अपना धन क्यों नहीं बचाते, हमारे साथ उस पार क्यों नहीं आते? आप ही की शिक्षा से हम बिना किसी हानि के पार पहुंचती हैं।" पंडित ने अपने ही शब्द याद कर स्वीकार किया कि उन्हें भी वही करना चाहिए जो वे उपदेश देते हैं। साथियों ने एक लंबी रस्सी उनकी कमर से बांध दी, ताकि यदि वे डूबें तो उन्हें खींच लिया जाए। वे ईश्वर का नाम जपते हुए जल में कूदे — और कुछ ही कदमों में डूबने लगे; रस्सी से खींचकर उन्हें बाहर निकालना पड़ा। रामतीर्थ की टिप्पणी स्पष्ट है — पंडित जैसी श्रद्धा, मात्र बौद्धिक विश्वास, वह रक्षक तत्व नहीं है; वह तो "तुम्हारे हृदयों की टेढ़ापन" है। सच्ची श्रद्धा इस अनुभूति पर टिकी है कि "इस संसार के सारे भेद मेरी ही रचना हैं। तुम स्वयं परमात्मा हो; इसी क्षण साक्षात्कार करो।"
शम्स तबरेज़
रामतीर्थ उन्हें "संसार के महानतम पुरुषों में से एक, एक पूर्वी संत" के रूप में प्रस्तुत करते — शम्स तबरेज़। कहा जाता है कि उनके पिता ईश्वर-चेतना में इतने रचे-बसे थे कि जब वे सड़कों पर चलते, तो लोगों को उनके शरीर के रोम-रोम से मानो यह गीत निकलता सुनाई देता — "हक़, अनलहक़" — "ईश्वर, मैं ईश्वर हूं।" सामान्य लोग उन पर पाखंड का आरोप लगाते, पर उनके लिए यह शब्द होठों से वैसे ही अनायास निकलते जैसे सोए हुए व्यक्ति के खर्राटे। शम्स तबरेज़ स्वयं बचपन से ही, कहा जाता है, "पूर्णतः दिव्य थे, अपने पिता से भी कहीं अधिक।" एक बार कुछ कलाकारों ने राजा के समक्ष प्रदर्शन किया, जो इतने प्रसन्न हुए कि उन्हें एक हज़ार स्वर्ण मोहरें देने की घोषणा कर दी — फिर पछताकर, बिना पीछे हटता प्रतीत हुए, उन्हें असली सिंह के वेश में प्रदर्शन करने की असंभव मांग रख दी, अन्यथा उनकी संपत्ति ज़ब्त करने की धमकी दी। कलाकार रोते हुए शम्स तबरेज़ के पास आए। ब्रह्मांड के साथ अपने तादात्म्य के कारण करुणा से भरकर उन्होंने कहा कि वे स्वयं सिंह बनकर प्रकट होंगे। अगले दिन, मानो जादू से, एक सच्चा सिंह गड्ढे में कूद पड़ा, दहाड़ा, और राजा के अपने बालक को मार डाला। भीड़ ने उनसे बालक को पुनर्जीवित करने की मांग की, ठीक वैसे ही जैसे मसीह के विषय में कहा जाता था। वे हंसते हुए बोले, "ईश्वर के नाम पर जीवित हो जाओ" — कुछ नहीं हुआ। फिर मुस्कुराते हुए बोले, "मेरे अपने आदेश से जीवित हो जाओ" — बालक तत्क्षण जीवित हो उठा। इस दैवी अधिकार के दावे को सहन न कर सकी भीड़ ने उन्हें विधर्मी कहकर जीवित खाल उधेड़ने की मांग की। अविचलित, क्योंकि उन्होंने अपने ही शब्दों में पहले ही "अपने मांस को मार डाला था," शम्स तबरेज़ ने स्वयं अपने हाथों से अपनी खाल उतार फेंकी। रामतीर्थ समापन में कहते हैं — "यदि सत्य के लिए शरीर त्यागना पड़े, तो त्याग दो। सांसारिक इच्छाओं और स्वार्थी मोह से ऊपर उठो। यदि तुम इनसे मुक्त हो जाओ, तो तुम इसी क्षण सत्य हो।"
साइरस की वसीयत
कहा जाता है कि फारस के राजा साइरस ने, जब तक वे संसार में रहे, केवल अपनी प्रजा की सेवा और भलाई के लिए जिया। मृत्यु के निकट उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा — "मेरे शरीर को किसी भव्य समाधि में न रखा जाए, बल्कि इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर संपूर्ण फारसी साम्राज्य में खाद के रूप में बिखेर दिया जाए।" रामतीर्थ इसे ठीक उसी प्रक्रिया के रूप में समझाते हैं जो एक सच्चे मुक्त व्यक्ति के सूक्ष्म शरीर के साथ घटती है: जीवित रहते उसकी उपस्थिति शुद्धता और आनंद फैलाती है; मृत्यु के बाद, संसार उस विसरण से आश्चर्यजनक रूप से "पुनर्निर्मित" होता है।
कच्चा और सूखा नारियल
किसी ने एक सिद्ध पुरुष से पूछा: "जब मसीह को सूली पर चढ़ाया गया, तो उन्होंने पीड़ा क्यों नहीं महसूस की?" उस समय सिद्ध पुरुष के पास एक कच्चा और एक सूखा नारियल रखे थे। उन्होंने पूछा: "यह कच्चा नारियल है। यदि मैं इसका खोल तोड़ूं, तो गिरी का क्या होगा?" लोगों ने उत्तर दिया कि गिरी भी टूट जाएगी। फिर उन्होंने सूखे नारियल के बारे में पूछा — लोगों ने कहा गिरी को कोई हानि नहीं पहुंचेगी, क्योंकि सूखे नारियल में गिरी पहले से ही खोल से अलग हो चुकी होती है, जबकि कच्चे में वह खोल से चिपकी रहती है। सिद्ध पुरुष ने तब पूछा, "जब मसीह को सूली दी गई, तो क्या सूली दी गई?" "शरीर," उन्होंने उत्तर दिया। "यहां एक ऐसा व्यक्ति था," सिद्ध पुरुष बोले, "जिसने अविनाशी स्व, सच्ची गिरी को, बाहरी खोल से पहले ही अलग कर लिया था। बाहरी खोल टूटा, पर भीतरी तत्व अक्षुण्ण रहा — तो फिर दुःख क्यों मनाया जाए?" रामतीर्थ फिर शिक्षा निकालते हैं — दुर्बलता ठीक यही है, खोल के प्रति यह आसक्ति। "शरीर को ऐसे रहने दो मानो वह कभी अस्तित्व में आया ही न हो। मुक्त पुरुष वही है जो ईश्वरत्व में इस प्रकार जीता है मानो शरीर का जन्म कभी हुआ ही न हो।"
फकीर का चोरी हुआ कंबल
एक घुमक्कड़ फकीर पुलिस में शिकायत करता है कि उसका इकलौता कंबल चोरी हो गया है — पर उसे कई अलग-अलग वस्तुओं के रूप में गिनाता है: एक रजाई, एक गद्दी, एक छाता, एक पाजामा, एक कोट। जब चोर आश्चर्यचकित होकर पकड़ा जाता है, तो फकीर दिखाता है कि उसने एक ही कंबल को अलग-अलग समय पर मोड़कर इन सभी रूपों में उपयोग किया था। रामतीर्थ सिखाते थे — वह एक तत्व अनेक रूपों में प्रकट होकर अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है; प्रबुद्ध व्यक्ति के लिए सारी विविधता एक ही अंतर्निहित सत्य की पहचान बन जाती है।
बुलबुल और दर्पण
एक बुलबुल को एक ऐसे पिंजरे में रखा जाता है, जिसकी दीवारें दर्पणों से जड़ी हैं, और बीच में एक असली गुलाब रखा है। चारों ओर बिखरे गुलाब के अनगिनत प्रतिबिंब देखकर बुलबुल बार-बार उन प्रतिबिंबों की ओर उड़ती है, कांच से टकराकर घायल होती जाती है, अंततः थककर वह पलटती है और पाती है कि असली गुलाब तो शुरू से ही बीच में मौजूद था। "यह संसार ही वह पिंजरा है," रामतीर्थ कहते थे, "और जिस सुख की तुम बाहर तलाश करते हो, वह तुम्हारे भीतर ही है।"
कुली और टेनिस खेलता राजकुमार
"यह मुझे एक बगीचे की याद दिलाता है," रामतीर्थ कहते, "जिसमें ग़रीब मज़दूर कुली रास्तों पर पत्थर तोड़ रहे थे। उनके हृदय भारी थे; वे हर समय जी-तोड़ मेहनत में जुते रहते थे। उसी बगीचे के लॉन में, जहां ये कुली काम कर रहे थे, राजकुमार टेनिस खेल रहे थे। उनका काम एक आनंद था, क्योंकि अपने इस आनंद में वे संभवतः कुलियों से भी अधिक पसीना बहा रहे थे।" श्रम एक-सा था, पर भीतरी भाव विपरीत — एक ओर बोझ, दूसरी ओर उल्लास। "अपने इस संसार के प्रति अपना दृष्टिकोण उन्हीं राजकुमारों जैसा रखो जो टेनिस खेल रहे हैं," वे सिखाते। "ऐसा नहीं कि तुम्हें काम और श्रम छोड़ देना है, बल्कि तुम्हारे कार्य के प्रति तुम्हारी भावना बदलनी चाहिए, और तब काम और आनंद तुम सदैव एक साथ करते रहोगे।" "जो बलपूर्वक कराया जाए, वह कभी बलशाली नहीं होता," वे जोड़ते — फिर सूर्य से प्रकाश, गुलाब से सुगंध, और हिम-शिखरों से शीतलता की तरह, आनंद को भी साधक के भीतरी स्वभाव से सहज ही बह निकलना चाहिए।
रणजीत सिंह की अटक-पार सवारी
"जैसे अंग्रेज़ों में क्रॉमवेल और मुसलमानों में बाबर हुआ, वैसे ही हिंदुओं में इस युग में रणजीत सिंह हुए," रामतीर्थ कहते — पंजाब के इस नरसिंह की एक कथा सुनाते हुए। एक बार शत्रु की सेना अटक नदी के पार डटी थी, और उनके अपने सैनिक नदी पार करने से हिचकिचा रहे थे। रणजीत सिंह ने अपना घोड़ा उस नदी में यह दोहा पढ़ते हुए डाल दिया — "सभी कुछ गोपाल का है, फिर रुकावट कहां? जिसके मन में रुकावट है, वही रुका रहता है।" उनके पीछे उनकी सारी सेना नदी पार कर गई। थोड़े से सैनिकों का यह साहस देखकर शत्रु-सेना के हृदय कांप उठे, और वे सब भाग खड़े हुए। रामतीर्थ पूछते — यह शक्ति कहां से आई? "उनके हृदय में श्रद्धा उमड़ रही थी। वे रातभर ध्यान में लीन रहते; उनकी प्रार्थनाओं में आंखों से आंसू बहते। जैसे हनुमान के शरीर के हर रोम में "राम" नाम लिखा था, वैसे ही रणजीत सिंह में श्रद्धा का यह बल भरा हुआ था। जिनमें ऐसा साक्षात्कार होता है, उनके सामने नदी भी मार्ग दे देती है।"
फ्रेडरिक महान का अकेला किला
जर्मनी के सम्राट फ्रेडरिक महान फ्रांस से युद्ध लड़ रहे थे। उनकी सेना पराजित हो गई, कुछ सैनिक मारे गए, कुछ शत्रु के हाथ पड़ गए। विद्या-प्रेमी और ईश्वर-भक्त इस सम्राट ने अपने बचे-खुचे मुट्ठी भर सैनिकों से कहा — कुछ पूरब से, कुछ पच्छिम से, कुछ उत्तर से, कुछ दक्खिन से, वाद्य-यंत्र बजाते हुए उस क़िले की ओर आएं, जिसे फ्रांसीसियों ने छीन लिया था। इस बीच वे स्वयं, बिना कोई हथियार लिए, अकेले उस क़िले में घुस गए और उच्च स्वर से बोले — "यदि अपने प्राण सकुशल ले जाना चाहते हो तो हथियार फेंक दो और भाग जाओ, नहीं तो मेरी सेना, जो चारों ओर से आ रही है, तुम्हें मार डालेगी।" चारों ओर से बाजों की आवाज़ सुनकर और इस अकेले वीर का साहस देखकर शत्रु घबड़ा गए और तुरंत क़िला छोड़कर भाग गए। रामतीर्थ जोड़ते — "इस दुनिया को भी इसी आत्मबल की आवश्यकता है। जिसके भीतर साहस है, उसके पास शक्ति है, और जिसके पास शक्ति है, उसके पास जीवन है।"
दत्तात्रेय और वेश्या
मस्त महात्मा दत्तात्रेय एक बार कहीं जा रहे थे; आधी रात हो रही थी। दीपक के प्रकाश में उनका तेजोमय रूप एक चरित्रहीन स्त्री को अपने कोठे से दिखाई दिया। इस सूर्यस्वरूप महात्मा के मात्र तीन बार दर्शन पाते ही उस स्त्री के हृदय का अंधकार दूर हो गया और उसकी दशा पलट गई। रामतीर्थ इसे यह सिद्ध करने के लिए सुनाते कि "किसी का महात्मा होना ही सारे संसार को हलचल में डाल देना है, चाहे वह उपदेश दे या न दे। न केवल देश, बल्कि सारे संसार की दशा उसके उत्पन्न होते ही उत्तम हो जाती है" — ठीक वैसे ही जैसे गर्म हवा उठते ही आसपास की हवा को खींचकर पूरे वातावरण में हलचल मचा देती है।
गोल्डस्मिथ और डॉ. जॉनसन का जबड़ा
अंग्रेज़ कवि ओलिवर गोल्डस्मिथ, जिसकी लेखनी की प्रशंसा स्वयं डॉ. जॉनसन ने "स्वर्गदूत जैसी" कहकर की थी, अपने चिकित्सक-ज्ञान के बावजूद इस साधारण प्रश्न पर अड़ गया कि बोलते और खाते समय ऊपर का जबड़ा हिलता है या नीचे का — और हठपूर्वक ग़लत पक्ष पर डटा रहा, यद्यपि वह प्रतिदिन अपने ही जबड़े का सही उपयोग करता था। रामतीर्थ इसका प्रयोग यह दिखाने के लिए करते कि आचरण करना एक बात है, और उस आचरण के पीछे के तर्क को समझा पाना बिल्कुल दूसरी बात — "हर कोई अंग्रेज़ी बोलता है, पर बहुत कम लोग अंग्रेज़ी व्याकरण जानते हैं। हर कोई किसी न किसी रूप में तर्क करता है, पर बहुत कम लोगों ने तर्कशास्त्र पढ़ा है। आदर्श जीवन जीना एक बात है, और उसका दर्शन बता पाना दूसरी।"
अच्छा स्वामी और उसका अवज्ञाकारी सेवक
एक बहुत भले व्यक्ति के पास एक अत्यंत उद्दंड सेवक था, जो हर काम उलटे ढंग से करता, जिसका व्यवहार सबसे गंभीर व्यक्ति को भी क्रुद्ध कर देता। फिर भी वह स्वामी कभी क्रोधित नहीं होता था, बल्कि इस सेवक के साथ सबसे अधिक स्नेह से पेश आता। एक अतिथि ने एक बार इस पर आपत्ति जताई और सेवक को निकाल देने की सलाह दी। स्वामी ने उत्तर दिया — "तुम्हारी सलाह अच्छी है, तुम मेरी भलाई चाहते हो, यह मैं जानता हूं। पर मैं इससे भी अधिक जानता हूं। मैं इसे इसीलिए रखता हूं क्योंकि यह अवज्ञाकारी है — इसका बुरा स्वभाव ही इसे मेरे लिए इतना प्रिय बनाता है। यह मुझे मिलने वाले सभी लोगों में एकमात्र ऐसा है, जो मुझे अप्रसन्न करने का साहस रखता है — बाकी सब इतने विनम्र हैं कि कभी मुझे नाराज़ करने का साहस नहीं करते। यह मेरे लिए एक प्रकार का मुगदल है — शारीरिक व्यायाम के लिए लोग जैसे मुगदल भांजते हैं, वैसे ही यह सेवक मेरी आध्यात्मिक शक्ति को तपाने का साधन है। इसके ज़रिए मुझे एक तरह की कुश्ती लड़नी पड़ती है, और उसी कुश्ती से मुझे बल मिलता है।" रामतीर्थ जोड़ते — "इसलिए यदि तुम्हें अपने पारिवारिक बंधन किसी बाधा-सी लगें, तो निराश न होना। इस स्वामी के उदाहरण का अनुसरण करो; कठिनाइयों को भी शक्ति का नया स्रोत बना लो।"
सुकरात और उनकी क्रोधी पत्नी
यूनान के महान दार्शनिक सुकरात की पत्नी संसार की सबसे अधिक झगड़ालू स्त्रियों में से एक थी। एक दिन सुकरात गहन चिंतन में डूबे थे, तभी उनकी पत्नी ने आकर कठोर वचन कहे, उन्हें भला-बुरा कहा, उनसे अपनी बात मनवाने की ज़िद की — पर सुकरात अपने चिंतन में लगे रहे, क्योंकि उनकी यह आदत थी कि किसी समस्या को सुलझाए बिना छोड़ते नहीं थे। पत्नी गरजती-बरसती रही, फिर क्रोध में आकर उसने गंदे पानी से भरा एक बर्तन उनके सिर पर उंडेल दिया। क्या सुकरात विचलित हुए? रत्ती भर भी नहीं। वे मुस्कुराए और बोले, "आज यह कहावत सच हुई कि जब गरजता है, तो अक्सर बरसता भी है" — पहले जब भी वह गरजतीं, बरसात नहीं होती थी, पर आज गरज के साथ बरसात भी आई। इतना कहकर वे फिर अपने चिंतन में लौट गए। रामतीर्थ इससे यह सिखाते — "इससे स्पष्ट है कि अपने स्वभाव पर नियंत्रण पाने की क्षमता को लेकर निराश नहीं होना चाहिए। यदि एक व्यक्ति — सुकरात — अपने क्रोध पर ऐसा पूर्ण नियंत्रण पा सकता है, तो हर कोई पा सकता है।"
वृंदावन जाने की इच्छुक वृद्धा
एक वृद्ध स्त्री एक महात्मा के पास गई और पूछा कि क्या उसे अपना घर-परिवार त्यागकर कृष्ण की जन्मभूमि वृंदावन में जा बसना चाहिए। उसके साथ उसका छोटा पौत्र भी था। महात्मा ने पूछा — "ज़रा ध्यान दो, कौन है जो इस नन्हे शिशु की आंखों से तुम्हें निहार रहा है? कौन-सी शक्ति, कौन-सी चेतना उसके रोम-रोम से झांक रही है?" वृद्धा ने उत्तर दिया, "अवश्य ही ईश्वर। इस बालक के मन में लोभ या दुष्टता का लेशमात्र नहीं। यह पूर्णतः निष्पाप और पवित्र है। जब यह रोता है, उसमें साक्षात् ईश्वर की ही वाणी है!" महात्मा ने आगे पूछा — "वृंदावन जाकर तुम्हें कृष्ण की एक प्रतिमा की पूजा करनी होगी — पर क्या इस बालक का शरीर स्वयं कृष्ण की उतनी ही सच्ची प्रतिमा नहीं?" वृद्धा चकित रह गई, फिर मान गई — "बिना किसी हानि के, मैं इस बालक को कृष्ण का अवतार मानकर उसी के शरीर में ईश्वर की पूजा कर सकती हूं, क्योंकि यह ईश्वर ही है जो इसकी आंखों से देखता है, इसके कानों से सुनता है, इसके रोम-रोम में कार्य करता है। यह बालक स्वयं भगवान है।" महात्मा ने समझाया कि इसका अर्थ है पौत्र को अब पौत्र के रूप में नहीं, बल्कि केवल ईश्वर के रूप में देखना — "त्याग का अर्थ वैराग्य नहीं है। त्याग का अर्थ प्रत्येक वस्तु को पवित्र बनाना है।" उन्होंने ईशावास्य उपनिषद का पहला श्लोक उद्धृत किया — "जो कुछ इस जगत में दिखता है, उसे ईश्वर से आच्छादित देखो; इसी त्याग से भोग करो, किसी के धन का लालच मत करो" — और इसे सभी संबंधों तक विस्तारित किया — "पत्नी से पत्नी का नाता तोड़ दो, पर उसमें अपना शुद्ध आत्मा या परमात्मा देखो; शत्रु को शत्रु रूप में त्याग दो, उसमें ईश्वर देखो; मित्र को मित्र रूप में त्याग दो, और उसमें दिव्यता का अनुभव करो।"
तीन शोकाकुल याचक
एक महात्मा के पास तीन शोकाकुल लोग बारी-बारी आते हैं। एक स्त्री पूछती है — "महाराज! कुछ महीने हुए मेरे पति का देहांत हो गया। बताइए, उनके उद्धार के लिए मैं क्या करूं?" एक सज्जन कहते हैं — "मेरा इकलौता पुत्र मर गया है, उसका वियोग असह्य है, इसीलिए मैं आत्महत्या करने जा रहा हूं।" एक तीसरे कहते हैं — "मेरी पत्नी मुझसे सदा के लिए बिछुड़ गई है, अब जीना व्यर्थ लगता है।" महात्मा उस विधवा की ओर मुड़ते हैं, जो अत्यंत हताश थी और अपने पति के उद्धार के लिए उत्सुक भी। वे उसे समझाते हैं — "तुम अपने पति को बचा सकती हो, निराश होने की आवश्यकता नहीं। प्रतिदिन, जब भी उदासी या पति की याद उमड़े, शांत बैठो, आंखें बंद करो, और पति के रूप का ध्यान करो। पर जब वह चित्र मन में उभरे, तो तनिक भी चिंतित मत होना, रोना-बिलखना मत। रोने से तुम अपने पति को इसी संसार की मोह-बेड़ियों में और बांध दोगी। इसके बजाय बार-बार यह भाव धारण करो — "तुम ईश्वर हो, तुम प्रभु हो, तुम्हारे ही रूप में मुझे यह दिव्यता दिख रही है।"" फिर महात्मा एक उपमा देते हैं — "जैसे जब हम टेलीफोन के यंत्र को कान से लगाते हैं, तो जो ध्वनि सुनाई देती है वह उस लोहे के यंत्र की नहीं, बल्कि दूसरे छोर पर खड़े हमारे मित्र की होती है — ठीक वैसे ही, जब तुम अपने दिवंगत पति का चित्र देखो, तो जान लो कि उस चित्र के पीछे स्वयं ईश्वर हैं। उन्हें संबोधित कर कहो, "तुम प्रभु हो, तुम ईश्वर हो!" इस प्रकार तुम अपने दिवंगत पति का उद्धार कर सकती हो। और जब हम अपने परलोकगत संबंधियों का उद्धार कर सकते हैं, तो निस्संदेह अपने जीवित मित्रों का भी उद्धार, उन्नति और सहायता कर सकते हैं।"
मरियम और यूसुफ की समाधि
गृहस्थ जीवन पर एक व्याख्यान में रामतीर्थ ने ईसा मसीह के अलौकिक जन्म की एक विशिष्ट व्याख्या दी — "मसीह की माता मरियम अत्यंत पवित्र, धर्मपरायण और ईश्वर-भक्त स्त्री थीं; वे कुछ हद तक साक्षात्कार को प्राप्त, दिव्य तेज से भरी, ईश्वर में लीन थीं। और यूसुफ भी अत्यंत पवित्र, आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त पुरुष थे। दोनों युवा थे। ऐसा हुआ कि जब मरियम और उनके पति दोनों गहन आत्मलीनता की अवस्था में थे, तभी मरियम ने गर्भ धारण किया। बाद में उन्हें यह पूरी तरह विस्मृत हो गया कि ऐसा कुछ घटित हुआ भी था।" इसे स्पष्ट करने के लिए उन्होंने एक सरल उदाहरण दिया — "अक्सर बच्चों को रात में जगाकर दूध या मिठाई खिलाई जाती है, पर अगली सुबह पूछने पर वे कहते हैं, "मुझे तो कुछ मिला ही नहीं!" जबकि वास्तव में उन्हें मिला था — पर उस समय वे साधारण चेतना से परे, एक तुरीय-सी अवस्था में थे, ठीक वैसे ही जैसे नींद में चलने वाला व्यक्ति अनेक कार्य करता है, पर सुबह उसे कुछ स्मरण नहीं रहता। ठीक इसी प्रकार, जब यूसुफ और मरियम दोनों उस साक्षात्कार की अवस्था में लीन थे, तभी मरियम ने गर्भ धारण किया — इसीलिए जब उनसे इसका कारण पूछा गया, तो वे कुछ न बता सकीं, और लोगों ने कहा कि वे पवित्र आत्मा से गर्भवती हुईं।" फिर उन्होंने इसका सीधा व्यावहारिक निष्कर्ष निकाला — "यदि तुम चाहते हो कि मिल्टन, शेक्सपियर या मसीह जैसे महापुरुष फिर जन्म लें, तो अपने अंतःकरण को शुद्ध करो। यदि पति-पत्नी दोनों ऐसे उदात्त विचारों और पवित्र भाव से भरे हों, तो उनकी संतानें स्वयं मसीह-तुल्य होंगी। इस युग में भी मसीह जन्म ले सकते हैं, यदि तुम चाहो।"
जापानी मां का बलिदान
राष्ट्रीय धर्म पर एक व्याख्यान में रामतीर्थ सिखाते हैं कि व्यक्तिगत और पारिवारिक कर्तव्य को कभी राष्ट्रीय कर्तव्य से ऊपर नहीं रखना चाहिए — राष्ट्र के हित में किया गया कोई भी कार्य स्वयं भारत माता को अर्पित यज्ञ है। इसके प्रमाण में वे जापान की एक घटना का उल्लेख करते हैं — "जब एक जापानी युवक को इस आधार पर सेना में भर्ती होने से रोक दिया जाता है कि उसके बाद उसकी वृद्ध मां की सेवा करने वाला कोई नहीं बचेगा, तब वह वृद्धा अपने पारिवारिक कर्तव्य से ऊपर अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को रखते हुए आत्म-बलिदान कर देती है, ताकि उसके पुत्र को अपने देश की सेवा में अपना जीवन अर्पित करने का अवसर मिल सके।" रामतीर्थ इसके साथ ही गुरु गोबिंद सिंह के बलिदान की तुलना करते हैं, और पैगंबर मुहम्मद के इस कथन को उद्धृत करते हैं — "यदि सूर्य मेरे दाहिने हाथ पर और चंद्रमा मेरे बाएं हाथ पर खड़े होकर मुझे पीछे हटने का आदेश दें, तो भी मैं ऐसा नहीं कर सकता" — यह दिखाने के लिए कि जब आत्मा राष्ट्र की आत्मा से एकरूप हो जाती है, तो साधक के हाथ में असीम शक्ति आ जाती है।
नेपोलियन का एक शब्द
महान पुरुषों की शक्ति के स्रोत पर बोलते हुए रामतीर्थ पूछते हैं — वीर पुरुषों में हज़ारों, लाखों लोगों जितनी शक्ति कहां से आती है? "नेपोलियन ठीक उसी समय आता है जब समय को उसकी आवश्यकता होती है, और उसके पास हज़ारों, लाखों लोगों की शक्ति होती है। एक बार एक पूरी सेना नेपोलियन को बंदी बनाने आई, और वह अकेला सीधा उनके सामने गया और बोला "हट जाओ" — और वे रुक गए। यहां एक अकेला व्यक्ति हज़ारों को, जो उसे बंदी बनाने आए थे, मौन कर देता है।" वेदांत इसकी व्याख्या करता है — "वास्तव में हज़ारों के विचार उस एक व्यक्ति में संचित हो जाते हैं। नायक को आत्म-गौरव का कोई अधिकार नहीं। हे वीर! यदि तुम्हारे पास लाखों की शक्ति है, तो तुम स्वयं लाखों हो। यह लाखों लोग ही हैं जो तुम्हारे शरीर में कार्य कर रहे हैं।" वे यही तर्क शेक्सपियर पर भी लागू करते हैं — एक महान नाटककार अकेला नहीं उभरता, बल्कि समय और लोगों के सम्मिलित विचार ही एक शरीर में एकत्र होकर उसे जन्म देते हैं। "मानसिक तल पर तुम सब एक हो।"
महाद्वीपीय कांग्रेस के अध्यक्ष की तलवार
उसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए रामतीर्थ पूछते हैं — अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम कैसे भड़का? "उसी तरह। अमेरिका की पहली कांग्रेस (महासभा) के अध्यक्ष ने, जब लोग उनसे सहमत नहीं हुए, अपनी तलवार म्यान से खींच ली और कहा, "मैं तो युद्ध, युद्ध, युद्ध के पक्ष में हूं।" और सभी लोगों को उनकी यह बात माननी पड़ी — वही कांग्रेस के सदस्य, जो युद्ध के विरुद्ध थे, जो स्वयं उनके विरुद्ध थे, उन्हें भी उनका अनुसरण करना पड़ा।" धर्मयुद्धों के उदाहरण के साथ जोड़ते हुए, जहां एक व्यक्ति के शोक ने पूरे यूरोप को हथियार उठाने पर विवश कर दिया था, रामतीर्थ का निष्कर्ष है — "यदि तुम्हारे हृदय और मन एक न हों, तो ऐसे अद्भुत कार्य कैसे संभव होंगे? हम एक हैं। इस एकत्व का अनुभव करो।"
विद्रोही हाथ की कथा
व्यावहारिक जीवन में भाईचारे का पालन कैसे हो, यह समझाने के लिए रामतीर्थ यह दृष्टांत सुनाते — "यहां एक हाथ है। एक बार वह स्वार्थी हो गया और एकता के नियम का उल्लंघन करना चाहा। उसने सोचा, "मैं दिन भर काम करता हूं, पर इसका सारा लाभ पेट या शरीर के अन्य अंग उठाते हैं; मुझे कुछ नहीं मिलता। मैं मुंह और दांतों को सारा लाभ नहीं लेने दूंगा, सब कुछ मैं स्वयं रखूंगा।" इस निश्चय पर वह हाथ अमल करता है: मेज़ पर रखे दूध को अपने लिए बचाने के लिए वह सुई से अपने में ही एक छेद कर लेता है और उसमें दूध उंडेल लेता है, ताकि मुंह तक न पहुंचे — इससे हाथ बीमार पड़ जाता है, उसे कोई लाभ नहीं मिलता। फिर शहद पाने की चाह में वह एक मधुमक्खी पकड़कर उसे स्वयं को डंक मरवा लेता है (मधुमक्खी डंक मारने के बाद मर जाती है) — इस तरह उसे बहुत सारा शहद और मधुमक्खी का जीवन-रस मिलता है, हाथ मोटा हो जाता है, पर डंक की पीड़ा उसे तड़पा देती है। अंततः, बहुत कष्ट सहने के बाद, हाथ को समझ आता है — "जो कुछ मैं कमाता हूं, वह मुझ अकेले के लिए नहीं जाना चाहिए। जो कुछ मैं कमाता हूं, वह पेट में जाना चाहिए, और वहां से रक्त द्वारा, हाथों-पैरों द्वारा, शरीर के हर अंग द्वारा उपयोग होना चाहिए — तभी, और तभी, मुझ हाथ को भी लाभ मिल सकता है।" हाथ को यह मानने पर विवश होना पड़ता है कि उसका स्व उस छोटे-से क्षेत्र तक सीमित नहीं — उसका स्व वही है जो आंखों का, कानों का, पूरे शरीर का स्व है। रामतीर्थ चेतावनी देते — "दैवी नियम तुम्हें अपने ही जैसों से पृथक होने की अनुमति नहीं देता। वे व्यापारी जो अपने ग्राहकों के हित को अपना हित नहीं मानते, वे जनता द्वारा त्याग दिए जाते हैं और स्वयं का विनाश कर बैठते हैं। हे हाथ, तुम्हारा स्व संपूर्ण विश्व का स्व है — इसे अनुभव करो, इसे साक्षात्कार करो।"
मजिस्ट्रेट की हत्या-गुत्थी
रामतीर्थ पूछते हैं — इस संसार में अपराधी कैसे बनते हैं? एक शक्तिशाली व्यक्ति एक कमज़ोर व्यक्ति के हृदय को आहत करता है, पर वह इतना बलवान होता है कि पीड़ित बदला नहीं ले पाता — केवल मन में द्वेष का भाव भेजकर रह जाता है। वही शक्तिशाली व्यक्ति दूसरे, तीसरे, यहां तक कि बीस, पचास या सौ लोगों को आहत करता है — हर कोई असमर्थ होकर केवल भीतर ही भीतर क्रोध पालता रहता है। अंततः वही व्यक्ति किसी ऐसे बलवान से टकरा जाता है जो उसके बराबर का हो। बहुत मामूली अपमान से ही यह अंतिम व्यक्ति इतना क्रुद्ध हो उठता है कि अपमान की तुच्छता को भूलकर बंदूक उठाकर उस व्यक्ति की हत्या कर देता है। मजिस्ट्रेट जांच करते समय हैरान रह जाता है कि इतने छोटे अपमान के बदले इतना बड़ा क्रोध क्यों — समाचार-पत्र भी इसे "एक अत्यंत चिड़चिड़ा व्यक्ति, जिसे मामूली अपमान ने भी इतना भड़का दिया कि उसने हत्या कर दी" कहकर छापते हैं, पर कोई इसका कारण नहीं समझ पाता। रामतीर्थ इसका वेदांतिक हल देते हैं — "मानसिक तल पर मानो एक संयुक्त पूंजी कंपनी बनी हुई थी। हर आहत व्यक्ति ने अपना-अपना अंश-भर द्वेष जमा किया, बिना उसे व्यक्त किए। जब पर्याप्त हिस्से जमा हो गए, तो वह "बॉस" प्रकट हुआ — और जब इस बॉस का भी अपमान हुआ, तो आध्यात्मिक आकर्षण के नियम से, पहले, दूसरे, तीसरे, बीसवें, सौवें व्यक्ति का सारा संचित द्वेष उसी अंतिम प्रहार में एक साथ उमड़ पड़ा।" रामतीर्थ इसका नैतिक निष्कर्ष सीधा निकालते हैं — "राज्य केवल इस अंतिम व्यक्ति को दंड देगा, पर ईश्वर की दृष्टि में तुम सब भागीदार हो, तुम सब हत्यारे हो। जिसने भी द्वेष का विचार भेजा, वह हत्यारे जितना ही दोषी है — जो अपने भाई से घृणा करता है, वह भी हत्यारा है, ठीक वैसे ही जैसे हत्या करने वाला।"
दूधवाले के लड़के की टूटी बोतलें
रामतीर्थ बताते हैं — "उस दिन राम ने एक दूध बेचने वाले लड़के को दूध की बोतलें एक घर में ले जाते देखा। संयोगवश एक बोतल उसके हाथ से छूटकर टूट गई। वह क्रोध में आ गया और शेष सारी बोतलें भी सड़क पर फेंककर तोड़ डालीं।" रामतीर्थ इसे लोगों के आपसी व्यवहार का प्रतिबिंब बताते — "मित्रों में किसी एक छोटी-सी कमी को देखकर हम उसके सभी गुणों के प्रति अपना सम्मान बहा देने की कैसी प्रबल प्रवृत्ति रखते हैं!" वे इसे भौतिकी की एक उपमा से जोड़ते हैं — जैसे किसी वस्तु पर कुल दाब अनंत हो सकता है, पर परिणामी दाब शून्य, क्योंकि शक्तियां परस्पर एक-दूसरे को निष्फल कर देती हैं — वैसे ही भारत की असंख्य शक्तियां आपस में टकराकर कोई परिणाम नहीं दे पातीं, क्योंकि हर पक्ष केवल दूसरे के दोष पर ध्यान केंद्रित करता है। "किसी को चोर कहो, और वह चोरी करने लगेगा" — यह एक निर्विवाद सत्य है, वे कहते हैं।
अकबर और बीरबल की रेखा
कहा जाता है कि अकबर ने एक रेखा खींचकर अपने बुद्धिमान सभासद बीरबल से कहा कि उसे बिना काटे या मिटाए छोटा कर दिखाओ। बीरबल ने उसके पास एक और लंबी रेखा खींच दी, और अकबर की रेखा बिना छुए ही छोटी हो गई। रामतीर्थ इससे सीधा निष्कर्ष निकालते — "यही सच्ची बुद्धिमत्ता है — लंबी रेखा खींचना। सर्वश्रेष्ठ आलोचना वही है जो लोगों को भीतर से वही अनुभव करा दे, जो तुम बाहर से करवाना चाहते हो, ठीक वैसे ही जैसे बीरबल ने अकबर को भीतर से यह अनुभव करा दिया कि उसकी रेखा छोटी हो गई है।" वे इसे अंधेरे कमरे के उदाहरण से आगे बढ़ाते हैं — "अंधेरे से लड़ने से अंधेरा कभी दूर नहीं होगा। अंधेरे कमरे में चारों ओर पत्थर फेंकते, खिड़कियां तोड़ते, मेज़ उलटते, स्याही बिखेरते और कोसते रहने से क्या अंधेरा दूर होगा? प्रकाश ले आओ, और अंधेरा कभी था ही नहीं। इसी तरह नकारात्मक, हतोत्साह करने वाली आलोचना कभी कुछ नहीं सुधारती। आवश्यकता है केवल सकारात्मक, प्रसन्न, आशावान, प्रेमपूर्ण और उत्साहवर्धक भाव की।" वे जोड़ते हैं — "जीवन की हर दाख से मैं मीठी मदिरा निचोड़ता हूं।"
सिंड्रेला की कथा
आलोचना के विषय पर बोलते हुए रामतीर्थ इसे "ईश्वरीय विधान की कतरन-प्रक्रिया" कहते हैं, जो हमें अधिक सुंदर बनने में सहायता करती है — जैसे संकरी, चट्टानों भरी धारा में बहती नाव को हर टकराहट सतर्क रखती है, वैसे ही मित्रों-शत्रुओं की पीड़ादायक आलोचना हमें अपने सच्चे स्व, ईश्वर के प्रति जगाने वाला एक स्वप्न-भंग है। "जब तुम जाग जाते हो, तो वह दुःस्वप्न कहां रहता है? वह कभी था ही नहीं। जिस क्षण हम स्वयं को प्रेम के नियम के अनुरूप स्थापित करते हैं, हर हानि सकारात्मक लाभ में बदल जाती है," वे कहते हैं, फिर एक ही वाक्य में एक सुपरिचित कथा का सहारा लेते हैं — "बेचारी सिंड्रेला ने अपना जूता खोया, उसकी निष्पापता ने वह जूता वापस खींच लिया, और साथ ही जीवनभर के साथी के रूप में राजा को भी।"
यूसुफ अपने भाइयों से
निष्पक्ष दृष्टि पर बोलते हुए रामतीर्थ बताते हैं कि लोग किस प्रकार अवैयक्तिक, दैवी नियम को व्यक्तियों पर मढ़ देते हैं और उनसे शिकायत करते हैं, जबकि वर्षा या फूल का खिलना जैसे केवल उसी नियम की अभिव्यक्ति मात्र हैं। इसी भाव में वे यहूदा का उदाहरण देते हैं — "यहूदा को यह पता ही नहीं कि उसके विश्वासघाती चुंबन में भी केवल प्रेम का नियम ही पूर्ण शक्ति से कार्य कर रहा है। उस झूठे चुंबन के बाद जो कुछ हुआ, उसके बिना आज मसीह को कौन याद रखता?" फिर वे यूसुफ की ओर मुड़ते हैं — "सुंदर यूसुफ अपने क्षमा-प्रार्थी भाइयों से कहता है, "मुझे कुएं में डालने वाले तुम नहीं थे। प्रेम-स्वरूप प्रभु ने मुझे मिस्र में ऊंचा स्थान देने के लिए मेरे सगे भाइयों से बढ़कर प्रेमी कोई नहीं पाया।" इस "स्पष्ट दृष्टि" से रामतीर्थ यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जब कोई भी वस्तु स्थिर, स्वतंत्र व्यक्तित्व की तरह टिकती ही नहीं दिखती — सब कुछ बहता, बदलता, हाथ से फिसलता प्रतीत होता है — तो फिर किसी की आलोचना करने का प्रश्न ही कहां उठता है।
वृद्ध व्यक्ति और ढीठ बालक
भारतीय राजनीतिज्ञों को विरोध और शिकायत की नीति छोड़ने का आग्रह करते हुए — क्योंकि "यदि दूसरे पक्ष ने गलत किया, तो बदले में गलत करना केवल पहले काले धब्बे में एक और काला धब्बा जोड़ेगा, उसे सफेद नहीं करेगा" — रामतीर्थ यह छोटी-सी कथा सुनाते हैं। एक वयोवृद्ध सज्जन एक बालक को थप्पड़ मारने ही वाले थे, क्योंकि बालक ने उनका अपमान किया था। उन्होंने कहा, "मूर्ख! तूने बदतमीज़ी क्यों की?" बालक ने उत्तर दिया, "महाराज! आपके ही कथनानुसार मूर्ख होने के कारण मैंने शरारत की। पर आप तो बड़े बुद्धिमान हैं — अपने योग्य आचरण कीजिए।" रामतीर्थ इसे विद्युत-प्रेरण की उपमा से जोड़ते हैं — जब कोई विद्युत-आवेशित वस्तु किसी अन्य के संपर्क में नहीं, केवल निकटता में आती है, तो दूसरी वस्तु में विपरीत आवेश उत्पन्न हो जाता है; सच्चा, समान आवेश केवल प्रत्यक्ष स्पर्श से ही बनता है। इसी तरह जब जाति-भेद और नस्ल-भेद की कांच-दीवारें हृदयों को जुड़ने नहीं देतीं, और हम केवल तर्क तथा विवाद से समस्या सुलझाना चाहते हैं, तो हम एक खतरनाक निकटता में तो आते हैं, पर परिणाम बिल्कुल विपरीत निकलता है। "किसी व्यक्ति को जाने बिना तुम उसे प्रेम नहीं कर सकते" — प्रेम ही वह प्रत्यक्ष स्पर्श है, जो तर्क कभी नहीं दे सकता।
भाग IV
उनके विषय में कही गई कथाएं
शिष्यों और समकालीनों के स्मरणों से लिए गए स्वभाव-चित्र — छोटे, अतिथिकाल-रहित क्षण, जो इस बात के प्रमाण के रूप में प्रचलित हुए कि वे वास्तव में कैसे थे।
राम की घड़ी में सदा "एक" ही बजता है
शब्दों के साथ उनका आनंद वैसे ही खेलता था जैसे कोई बालक खिलौनों से खेलता है — वे स्वामी को "सो-एम-आई" कहते, ॐ को "ओऽम," हिंदू को "इंदु" (चंद्रमा), प्रायश्चित (atonement) को "at-one-ment" (एकत्व की अवस्था), और समझने (understanding) को "उसके नीचे खड़ा होना" कहकर पुनर्व्याख्यायित करते। इसी खेल का एक रूप था उनकी घड़ी। लाहौर में प्रोफेसरी के दिनों में, सुबह हो या दोपहर, शाम हो या आधी रात, जब भी कोई उनसे समय पूछता, वे गंभीरता से अपनी घड़ी निकालते, उसे ध्यान से देखते, फिर पूछने वाले की ओर देखकर बस इतना कहते — "प्रिय, अभी एक ही बजा है," और घड़ी दिखा देते। अलग-अलग समय पर यही प्रश्न पूछने वालों ने एक दिन कहा, "गोस्वामी जी! अजीब बात है, जब भी हम आपसे समय पूछते हैं, आप कहते हैं अभी एक ही बजा है!" उन्होंने हंसते हुए उत्तर दिया, "हे प्रिय, राम की घड़ी ऐसी ही है; इसमें सदा एक ही बजता है" — और हंसते हुए आगे बढ़ जाते।
दो राजा एक नाव में नहीं चल सकते
अपनी सिद्ध अवस्था में उन्होंने स्वयं को "राम बादशाह," अर्थात सम्राट राम, कहना शुरू कर दिया था, और यह किसी अलंकारिक शेखी से कहीं अधिक था — वे इसे व्यवहार में भी उतारते थे। पोर्ट सईद में जब उन्हें पता चला कि तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्ज़न उसी जहाज़ से भारत जाने वाले हैं, तो उन्होंने गंभीरता से उनके साथ यात्रा करने से मना कर दिया — "दो राजा एक ही नाव में नहीं चल सकते," उन्होंने कहा — और अपनी पहले से बुक की गई यात्रा रद्द कर अगले जहाज़ से यात्रा की, भले ही इसमें उन्हें व्यक्तिगत असुविधा ही क्यों न उठानी पड़ी।
लाहौर की गर्मी में ठंडे पैर
लाहौर की तपती गर्मियों में जब वे जलती हुई सड़कों पर चलकर आते, तो उनके चरण स्पर्श करने वाले भक्त यह देखकर चकित रह जाते कि उनके पैर बिल्कुल ठंडे हैं। "मैं गर्म लाहौर में चलता ही नहीं," वे समझाते, "मैं तो हर जगह गंगा के अमृत-जल में ही चलता हूं, जिसकी चांदी-सी लहरें चलते हुए मेरे पैरों को छूती हैं और आनंद से भिगो देती हैं। क्या तुम्हें हर जगह गंगा बहती नहीं दिखती?" वे सदा भाव-विभोर, रोटी-कपड़े की परवाह से मुक्त, आंसुओं की निर्मल धारा बहाते हुए, लाहौर में रहते हुए भी तारों के झूलते पालने में जीते थे, नीले आकाश में उस पुराने कदंब वृक्ष को देखते जिसकी शाखाओं पर कभी कृष्ण बैठकर बांसुरी बजाते थे। हरिद्वार में गंगा-स्नान करते समय वे उस वृक्ष पर अपनी ध्यानमग्न दृष्टि में समय और स्थान का सारा बोध खो देते — बंद आंखों से कृष्ण को देखते, बंद कानों से उनकी बांसुरी का प्राचीन संगीत सुनते — और उस संगीत में इतने मग्न हो जाते कि उनके साथ स्नान करते सैकड़ों तीर्थयात्रियों में से कोई भी उसे कभी नहीं सुन पाता।
"राम जाता है," कभी "मैं जाता हूं" नहीं
आत्मसाक्षात्कार के बाद उन्होंने प्रथम पुरुष का प्रयोग करना ही छोड़ दिया, और स्वयं के लिए सदा तृतीय पुरुष में "राम" कहने लगे — उनका प्रथम पुरुष अब ईश्वर का ही था। यह इतना स्वाभाविक हो गया था कि जो पहली बार उन्हें सुनता, वह सचमुच सोचता कि वे किसी और की बात कर रहे हैं। टोक्यो में, जब पूरन जी पहली बार उनके इस तृतीय-पुरुष वर्णन को समझ न सके, तो उन्होंने समझाया — "देखो, जैसे जीवन का क्रम गृहस्थ से संन्यासी में, संसार से ईश्वर की ओर बदल जाता है, वैसे ही इस शरीर के नाम का क्रम भी उलट जाता है। संन्यास से पहले यह तीर्थराम था, अब यह रामतीर्थ है।" बाद में उन्होंने इसे और आगे बढ़ाते हुए अंतिम शब्द से एक छोटा-सा अक्षर "i" हटाकर स्वयं को "राम ट्रुथ" के नाम से हस्ताक्षरित करना शुरू किया, कभी-कभी पत्रों पर "सो-एम-आई / राम ट्रुथ" लिखते।
डॉ. खुदादाद का नाम
हरिद्वार में पंजाब विश्वविद्यालय के एक स्नातक श्री (अब डॉ.) खुदादाद से भेंट कराते हुए पूरन जी ने जब उनका परिचय कराया, तो स्वामी जी ने कहा, "ऐसे लोगों को मेरे पास क्यों लाते हो? ये तो पहले से ही राम के ही सांचे में ढले हैं, राम के पास इन्हें सिखाने को कुछ नहीं है," और अपनी उज्ज्वल मुस्कान से पूरी भेंट भर दी। फिर उन्होंने कहा, "राम को तुम्हारा नाम समझ नहीं आता। खुदा (ईश्वर), दाद (दिया हुआ) — इसे केवल खुदा होना चाहिए था, ईश्वर।" डॉ. खुदादाद ने उत्तर दिया, "जिनके पास आंखें हैं, उनके लिए यह; बाकियों के लिए वह।" इस उत्तर ने उन्हें इतना प्रसन्न किया कि महीनों बाद, जब पूरन जी दोबारा डॉ. खुदादाद से मिले, तो उन्होंने स्वामी जी के पूरे जीवन को एक उर्दू शेर में समेट दिया था: "हे स्वामी राम! तेरी मुस्कान कितनी रहस्यमयी है। जीवन का रहस्य उसी में प्रकट है।"
दार्जिलिंग से लिखा पत्र
दार्जिलिंग के निकट जंगलों से पूरन जी को लिखे एक पत्र में उन्होंने लिखा — "दिन रात में ढलता है, और रात फिर दिन में — और यहां तुम्हारे राम के पास कुछ भी करने का समय नहीं, वह कुछ न करने में बहुत व्यस्त है। इस सबसे अधिक वर्षा वाले ज़िले की निरंतर बारिश से होड़ लेते हुए आंसू बहे चले जा रहे हैं; रोंगटे खड़े हैं, आंखें पूरी तरह खुली हैं पर सामने कुछ भी नहीं देखतीं। बातचीत बंद, काम बंद, दुर्भाग्य से (?) — नहीं, बड़े सौभाग्य से। ओह, मुझे अकेला छोड़ दो। यह अव्यक्त परमानंद की एक लहर पर दूसरी लहर — हे प्रेम! इसे चलने दो। हे यह सबसे मधुर पीड़ा! लेखन को दूर करो। व्याख्यान को छोड़ो। यश और नाम को बाहर फेंको। सम्मान? बकवास। अपमान? निरर्थक। क्या यही खिलौने जीवन का लक्ष्य हैं? तर्क और विज्ञान, बेचारे अनाड़ी! उन्हें मुझे देखने दो और अपना अंधापन ठीक करने दो।"
"मेरे ही स्वरूप में स्त्रियां और पुरुष"
अमेरिका में अपने अधिकांश व्याख्यानों की शुरुआत वे श्रोताओं को अपने से अलग समुदाय के रूप में नहीं, बल्कि "मेरे अपने ही स्वरूप में स्त्रियां और पुरुष" कहकर संबोधित करते थे — उनकी पूरी अमेरिकी यात्रा की सबसे अधिक उद्धृत पंक्तियों में से एक, और उनकी अपनी सिद्ध अवस्था में "राम बादशाह" कहलाने की उसी भावना का विस्तार, जिसमें वे स्वयं को अपने हर श्रोता से पृथक न मानते थे।
प्रत्येक दिन नववर्ष का दिन
डेनवर में उन्होंने अपने व्याख्यान की घोषणा "प्रत्येक दिन नववर्ष का दिन है, और प्रत्येक रात्रि क्रिसमस की रात्रि है" शीर्षक से की, और इस घोषणा मात्र ने श्रोताओं को इतना चकित किया कि देर तक तालियां बजती रहीं — मानो वे अपने व्याख्यानों के शीर्षकों के चुनाव में भी अपने आनंद को इत्र की तरह बिखेर रहे हों।
गंगा और शंकालु अमेरिकी महिला
मिनियापोलिस में एक व्याख्यान के बाद एक महिला ने उनके पास आकर पूछा, "श्रीमान स्वामी, क्या हिंदू स्त्रियां अब भी अपने बच्चों को पवित्र गंगा में मगरमच्छों के आगे फेंक देती हैं?" उन्होंने उत्तर दिया, "धन्य देवी, मुझे भी गंगा में फेंका गया था — पर तुम्हारे उस कथित योना [बाइबिल के जोना] की तरह, मैं तैरकर बाहर आ गया।" फिर वे तथ्य पर आए — "वस्तुतः मैं गंगा के उद्गम से लेकर उसके मुहाने तक पैदल गया हूं। जिन्हें मेरे साथ चलने का सौभाग्य मिला है, वे जानते हैं कि यह छोटा-सा शरीर एक दिन में 40 मील चल सकता है।" उन्होंने बताया कि गंगा के किनारे-किनारे घूमते हुए उन्होंने उसे इतना स्वच्छ, निर्मल और अत्यंत तीव्रगामी पाया कि विज्ञान के नाम पर कोई भी मगरमच्छ या घड़ियाल उसमें जीवित नहीं रह सकता — "मगरमच्छ और घड़ियाल कीचड़-भरी, मंद धाराओं में रहते हैं, और उस नदी में एक भी मगरमच्छ कभी नहीं दिखाया जा सका।" उन्होंने व्यंग्यपूर्वक समापन किया — "इन मधुर हृदय वाले कथा-रचयिताओं को धन्यवाद! भारत के विषय में इस देश में ऐसी ही खबरें प्रचलित हैं।"
सिएटल के छात्र की सम्मोहक आंखें
उन्हें सिएटल, वाशिंगटन से एक हिंदू भाई का पत्र मिला, जो एक विचित्र मुकदमे में फंस गया था। एक रात किसी आध्यात्मिक सभा के कक्ष से लौटते समय उसने एक स्ट्रीटकार ली; उसी गाड़ी में एक लड़की भी सवार हुई। जब वह उतरी, तो वह भी उतरा — क्योंकि वह उसी मोहल्ले में रहता था। एक घंटे बाद एक पुलिसकर्मी आया और उसे गिरफ्तार कर लिया; वह कुछ घंटे हवालात में रहा, और अगली सुबह उस पर मुकदमा चला। लड़की की शिकायत ज्यों की त्यों थी — "उसने मुझे उन "तीखी, काली, अध्यात्मवादी आंखों" से देखा, और मुझे लगा मानो मैं सम्मोहित की जाने वाली हूं, और मैं डर गई।" स्वामी जी की प्रतिक्रिया विषाद और हास्य दोनों से भरी थी — "हे भगवान, अमेरिका आने से पहले बेचारे हिंदुओं को अपनी आंखें कहां रखनी चाहिए थीं?" "इस देश के कुछ हिस्सों में हिंदुओं के प्रति ऐसी ही धारणाएं प्रचलित हैं," उन्होंने जोड़ा।
अंधे व्यक्ति की अद्भुत स्मरणशक्ति
भारत की बौद्धिक संपदा के प्रमाण के रूप में उन्होंने बताया — "भारत में मैंने एक व्यक्ति को स्मरणशक्ति का सबसे अद्भुत कारनामा करते देखा है।" लगभग पचास-साठ लोग एक कमरे में अर्धवृत्त में बैठे थे। हर किसी को किसी भी पुस्तक से एक अंश चुनने को कहा गया — कुछ ने अंग्रेज़ी, कुछ ने अरबी, कुछ ने हिंदुस्तानी और अन्य भाषाओं की पुस्तकों से अंश लिए। जो यह कारनामा दिखाने वाला था, वह स्वयं अंधा था। हर व्यक्ति ने उसे बताया कि उसके चुने अंश में कितनी पंक्तियां हैं। फिर, बारी-बारी से, हर व्यक्ति ने उसे एक-एक पंक्ति सुनाई — पूरा अंश क्रम से नहीं, बल्कि बिखरी हुई, एक व्यक्ति की एक पंक्ति के बाद दूसरे व्यक्ति की एक पंक्ति। जैसे मान लीजिए पहले व्यक्ति ने अपने बीस पंक्तियों वाले अंश की पहली पंक्ति सुनाई; दूसरे ने अपने तेरह पंक्तियों वाले अंश की पांचवीं पंक्ति। दूसरा दौर शुरू हुआ, फिर से हर किसी ने एक और पंक्ति दी — इस तरह पचास-साठ अलग-अलग भाषाओं, अलग-अलग लंबाई के अंशों की पंक्तियां उसे उलझे हुए, अस्त-व्यस्त क्रम में सुनाई जाती रहीं। तेरहवें दौर तक, जब उस व्यक्ति की, जिसका अंश केवल तेरह पंक्तियों का था, बारी समाप्त हो गई, तो अंधे व्यक्ति ने उससे कहा — "अमुक महोदय, आपके अंश की पंक्तियां समाप्त हो गई हैं।" हर बिखरे हुए अंश को मन ही मन सही क्रम में पुनर्गठित कर चुकने के बाद, उसने एक-एक कर हर व्यक्ति का पूरा मूल अंश आरंभ से अंत तक, बिना एक भी त्रुटि के, सुना दिया।
छह महीने की योग-समाधि
वे मनोवैज्ञानिक अनुसंधान के एक और उदाहरण की ओर बढ़ते — "एक निश्चित स्वामी इस देश में आए, जो अपने आप को पांच मिनट के लिए निलंबित चेतना की अवस्था में ले जा सकते थे।" इसे एक मामूली आधार बताते हुए उन्होंने आगे कहा — "पर हिमालय में मैं ऐसे कई स्वामियों से मिला हूं जो स्वयं को छह महीने के लिए प्रत्यक्ष मृत्यु-सी अवस्था में ले जा सकते थे। यहां छह महीने की प्रतीत मृत्यु के बाद पुनरुत्थान का एक मामला है। इनमें से एक स्वामी को एक पेटी में बंद कर भूमि में गाड़ दिया गया, और छह महीने बाद उसे खोदकर निकाला गया, और कुछ विशेष विधियों के माध्यम से, जो उन्होंने स्वयं लोगों को अपने शरीर पर करने का निर्देश दिया था, वे पुनः जीवित हो उठे।" फिर उन्होंने सीधे मसीह के पुनरुत्थान से तुलना की — "धन्य आत्माओ, ज़रा सोचो! एक व्यक्ति तीन दिन की प्रतीत मृत्यु के बाद जीवित हुआ, और लगभग पूरा यूरोप पुनरुत्थान के इस आधार पर उनके व्यक्तित्व में अपना नाम और विश्वास टांक चुका है। भारत में लोग छह महीने की प्रतीत मृत्यु के बाद पुनः उठ खड़े होते हैं, और हम इसे जितना है उतना ही मानते हैं।" उन्होंने सावधानी से इसे चमत्कार नहीं, विज्ञान बताया — "यह अध्यात्म नहीं, बल्कि एक सच्ची शारीरिक और मानसिक प्रक्रिया है, एक वैज्ञानिक प्रक्रिया। यदि आज के चिकित्सक इसे नहीं जानते, तो उन्हें अपने विज्ञान में और बढ़ना होगा। हम इसे जितना है उतना ही मानते हैं।"
अदालत में निडरता
उसी सुबह कुछ विद्यार्थियों से बात करते हुए उनके मुख से निकला था — "मुझे कभी याद नहीं कि मेरा जन्म हुआ हो। वस्तुतः मेरा जन्म कभी हुआ ही नहीं, और संसार की कोई भी शक्ति मुझे यह विश्वास नहीं दिला सकती कि मैं कभी मर भी सकता हूं।" इसी भाव में उन्होंने भारत की एक घटना याद की: न्यायाधीशों, वकीलों और सरकार में बहुत ऊंचे पदों पर आसीन लोगों से भरी एक विशाल सभा में उन्होंने एक बार राजनीति की झलक लिए हुए विषय पर भाषण दिया था। भाषण के बाद इन्हीं गणमान्य लोगों ने उनसे विनती की — "स्वामी जी, भविष्य में ऐसा भाषण कभी न दें, क्योंकि आपको कारागार में डाले जाने या फांसी पर चढ़ाए जाने का भय है।" उनका पूरा उत्तर था — "धन्य आत्माओ, मैं कभी यहूदा इस्करियोती की भूमिका नहीं निभा सकता, सत्य के मसीह को चांदी के तीस टुकड़ों में बेचकर, क्योंकि कोई भी मुझे यह विश्वास नहीं दिला सकता कि इस संसार में कोई तलवार इतनी तेज़ है जो मेरी आत्मा को काट सके, या कोई हथियार इतना शक्तिशाली है जो मुझे घायल कर सके — मैं अमर सत्ता हूं, कभी जन्मा नहीं, मृत्यु को प्राप्त होने में असमर्थ, कल भी वही, आज भी वही, सदा वही — यही मैं हूं! मैं समझौता क्यों करूं?" इसके बाद वे सीधे अपने अमेरिकी श्रोताओं की ओर मुड़े और आगे जो कुछ कहने वाले थे, उसे सत्य के प्रति एक ऋण बताया, जिसे चुकाना उनका कर्तव्य था।
मिसेज़ वेलमैन और "मां" की पुकार
एक बुज़ुर्ग अमेरिकी महिला — मिसेज़ वेलमैन — निजी भेंट में उनके पास आईं और अपने घरेलू दुखों की पूरी कथा सुनाते हुए घंटों उनके सामने रोती रहीं, जबकि वे पालथी मारे, आंखें बंद किए बैठे रहे। उन्हें लगा कि वे असभ्य हैं — एक स्त्री इतनी फूट-फूट कर रो रही थी, और न कोई सांत्वना का शब्द उनके होठों से निकला, न कोई सहानुभूति भरी दृष्टि। स्वामी जी मानो एक पत्थर की मूर्ति की भांति सुनते-अनसुने बैठे रहे — "ये भारतीय कितने उद्दंड और अहंकारी हैं," उन्होंने सोचा। जब उनकी दुख भरी कथा समाप्त हुई, तो स्वामी जी ने आंखें खोलीं, अपनी लाल, उन्मत्त आंखों से उन्हें देखा और बस इतना कहा — "मां" — और फिर अपना प्रिय वैदिक मंत्र जपा, ॐ! ॐ! उन्होंने बाद में पूरन जी को बताया कि उनकी आंखों से मानो एक नई चेतना का विचित्र सूर्योदय उन पर फूट पड़ा। "मुझे लगा जैसे मैं पृथ्वी से उठा ली गई हूं," उन्होंने कहा, "मैं प्रकाश की एक आकृति की तरह वायु में तैर रही थी, और मुझे लगा कि मैं स्वयं ब्रह्मांड की मां हूं। सारे देश मेरे थे, सारी जातियां मेरी संतान थीं। मैं इतने आनंद से भर गई कि मुझे भारत अवश्य जाना था; मुझे वह स्थान देखना था जहां स्वामी जी जन्मे और पले। सो मैं आई। मेरा आनंद कभी कम नहीं होता। ओह! ॐ शब्द मेरी हड्डियों में गूंजता है। "मां" शब्द — यह मुझे परमात्मा तक उठा ले जाता है।"
राम की पत्नी का ध्यान-अभ्यास
विवाहित जीवन पर एक व्याख्यान में, यह समझाने के बाद कि गृहस्थ जीवन ईश्वर-प्राप्ति में बाधा नहीं, बल्कि उसका साधन बन सकता है, उन्होंने अपने ही घर के अनुभव को प्रमाण के रूप में सुनाया — "शास्त्र के नियम के अनुसार, जिसका पालन ‘राम’ अपने गृहस्थ जीवन में स्वयं करता था — पत्नी प्रतिदिन भोर में जाग जाती। और जब ‘राम’ ध्यान में लीन होता, जब ‘राम’ ईश्वर का अनुभव और साक्षात्कार करता, परमात्मा में डूबा होता, या शरीर और मन से परे होता, उस अमरता के मधुर अमृत का पान करता — उस समय पत्नी पास आ बैठती, और जैसे रोमन कैथोलिक अपनी प्रतिमाओं की पूजा करते हैं, वैसे ही अपने शरीर का भान भूलकर ‘राम’ पर अपनी दृष्टि टिका देती। जैसे ‘राम’ अपने शरीर को भूलकर, भौतिकता से परे जाकर ईश्वर में लीन हो जाता, वैसे ही पत्नी भी ‘राम’ में केवल ईश्वर और उसकी महिमा देखती, और कुछ नहीं। इस तरह, ‘राम’ के शरीर से कुछ दूर बैठकर, वह ‘राम’ के माथे पर अपनी दृष्टि टिकाए रखती। स्वयं इतनी उन्नत न होने के कारण, वह पहले उस शरीर का ध्यान करती, और इस तरह, ॐ का जाप करते हुए, ‘राम’ की छवि को इतनी तीव्रता से अपने ध्यान में धारण करती कि अन्य सभी विचार उखड़ जाते, और वह अपने शरीर का भान भी भूल जाती। वह स्वयं को ‘राम’ के शरीर में लीन और रूपांतरित अनुभव करने लगती — पर उसकी अपनी आत्मा का क्या? वह स्पष्ट हो जाती, और उसे अनुभव होता कि उसकी अपनी आत्मा ही ‘राम’ की आत्मा है। उसे यह भी अनुभव होने लगता कि समाधिस्थ, ब्रह्म-अवस्था में लीन होने वाला ‘राम’ नहीं, बल्कि वह स्वयं है, जो उस ब्रह्म-अवस्था में लीन हो रही है। ‘राम’ का ध्यान उसका अपना ध्यान बन जाता, और वह संपूर्ण ब्रह्मांड के साथ अपनी एकता का अनुभव करती; उस समय उसे स्पष्ट होता कि वह स्वयं संपूर्ण ब्रह्मांड का सार और आत्मा है। इस प्रकार, मानो, वह ‘राम’ की सहायक बन जाती, और ‘राम’ उसका सहायक।" फिर उन्होंने अपना ही प्रश्न पूछकर उत्तर दिया — "अब यदि आप पूछें कि पत्नी किस प्रकार सहायक हो सकती है? जब पत्नी अपने पति को ईश्वर मानती है, जब ऐसे विचार और उनका प्रवाह उसके पति को ईश्वर बनाने लगते हैं, तो क्या उसकी मानसिक शक्ति, इस दिशा में प्रवाहित होकर, उसके पति को साक्षात् ईश्वर नहीं बना देगी? अवश्य बनाएगी।" वे समापन में कहते — "कैसा आध्यात्मिक विवाह है! कैसा उत्तम मिलाप है! दोनों परस्पर सहायता करते और सहायता पाते हैं। ऐसे आध्यात्मिक मिलाप पर आधारित विवाह और प्रेम संसार में सबसे अधिक सुखमय होते हैं" — इसके विपरीत, केवल रूप-रंग पर टिका विवाह अंततः हृदय-विदारक दुख में ही समाप्त होता है।
स्वामी रामतीर्थ जी के जीवन-प्रसंग, दृष्टांत एवं उनके विषय में प्रचलित कथाएँ — सार्वजनिक पठन-संकलन पर आधारित।