स्रोत: नमन ग्रन्थ, पृष्ठ 47–49
माधोबाड़ी स्थित श्री रामायण मन्दिर का इतिहास वैसे तो 54 वर्ष पुराना है। लेकिन वास्तव में इसकी ऐतिहासिकता की जड़ें पाकिस्तान तक जाती हैं। इन अर्थों में यह मन्दिर बहुत पुराना है, बेशक बरेली के कुछ नये मन्दिरों में इसे काफी खूबसूरत माना जाता है। इस मंदिर में पन्द्रह दिन तक चलने वाले तुलसी जयन्ती महोत्सव में श्रद्धालुओं को प्रवचनों, भजन सत्संग आदि के माध्यम से जो असीम शान्ति मिलती है, वही अब इसकी विशेषता बन गया है।
तत्कालीन अखण्ड भारत और अब पाकिस्तान में होती मरदान जिला स्थित है जिसमें गढ़ी कपूरा नामक स्थान पर गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की गदी स्थित है। यह एक सिद्ध स्थान है और उस समय में बाला गढ़ी ग्राम के निवासी सेवक प्रतिदिन पैदल चलकर तथा मार्ग में पड़ने वाली ‘दरिया-ए-लुण्डा’ को पार करके इस सिद्ध स्थान के दर्शनार्थ जाया करते थे। गोस्वामी तुलसीदास जी की अपनी कोई सन्तान नहीं थी। उनके महाप्राण के बाद उनके शिष्यों ने अनेक स्थानों पर गोस्वामी तुलसीदासजी की गुरू गद्दी स्थापित की तथा गुसाईयों की वंश परम्परा में आज भी इन गद्दियों से भारत वर्ष का बहुत बड़ा हिन्दू समाज जुड़ा हुआ है। गढ़ी कपूरा के अतिरिक्त राम तख्त (तत्कालीन मियाँ गुल की रियासत) तथा ढण्डेरी भी ऐसे ही प्रसिद्ध स्थान रहे हैं। ढण्डेरी में पवित्र जल का एक चश्मा था, जिसमें स्नान करने से लोग रोग मुक्त हो जाते थे।
गढ़ी कपूरा स्थित स्थान पर पीपल का एक विशाल वृक्ष था जो अपने आकार और प्राचीनता के कारण विश्व प्रसिद्ध था। इसी विशाल वृक्ष के नीचे अलमस्त फकीर के रूप में बैठकर बाबा सफाचन्द जी महाराज अपने प्रभु की याद में भजन गाते रहते थे। एक बार बाबा सफाचन्द जी दीवार पर बैठकर भजन गा रहे थे और उन पर पीपल के सूखे पत्ते फूलों की तरह गिर रहे थे। तभी किसी प्राकृतिक कारण से उस क्षेत्र में पलायन शुरू हो गया। प्रत्येक व्यक्ति किसी भी प्रकार से गढ़ी कपूरा को छोड़ देना चाहता था। बाबा के जो मुरीद अपने घोड़ों पर बैठकर उस सिद्ध स्थान के आगे से निकले तो उन्होंने बाबा सफाचन्द जी को भी अपने साथ चलने का आग्रह किया और कहा “बाबा चूड्ड़ा” (पश्तो भाषा)। यह सुनकर बाबा सफाचन्द जी जिस दीवार पर बैठे थे उसी को घोड़े की तरह ऐड़ लगाई और वह दीवार दौड़ पड़ी। बाबा की यह कला देखकर लोग बाबा के चरणों में गिर पड़े। बाबा के समझाने पर पलायन रूक गया और गढ़ी कपूरा तथा बाबा सफाचन्द जी लोगों की शुभ मनोकामना पूर्ति का माध्यम बन गये।
बाबा सफाचन्द जी से गदी प्राप्त करके बाबा नत्थूराम जी अपने सेवकों को समाज कल्याण के लिये प्रेरित करते रहे। आताताईयों की बुरी दृष्टि से बचाने के लिए बाबा नत्थूराम जी ने अपने शिष्यों को कांस्य पात्र में शुद्धता पूर्वक शुद्ध आवरण में ढककर गणेश पूजा का निर्देश दिया। यही गणेश पूजा जाम साहब की पूजा के नाम से प्रसिद्ध हुई।
भारत विभाजन के समय बाबा नत्थूराम जी अपने सेवक समाज के साथ भारतवर्ष में महाराष्ट्र प्रान्त के जिला अहमदनगर के कोपरगाँव स्थित स्थान पर आ गये तथा बाबा भजन लाल जी कुछ सेवकों को लेकर पंजाब पहुँच गये।
गुसाईं बाबा नन्द लाल जी के तीन पुत्र हुए। गुसाईं दशबन्दी राम जी, गुसाईं मेहर दास जी एवं गुसाईं मूलराज जी। गुसाईं मूलराज जी अपने पुत्र गुसाईं रामेश्वर दास जी के साथ बरेली आ गए तथा दूसरी ओर गुसाईं दशबन्दी राम जी के पुत्र गुसाईं बाबा तोताराम जी स्वतन्त्रता से 20 वर्ष पूर्व ही हरिद्वार में आकर जप तप में लग गये थे। इधर विभाजन के बाद जो परिवार बरेली आये थे, उन्हें शाहजहाँपुर मार्ग पर शरणार्थियों के शिविरों में स्थान दिया गया तथा उन्होंने वहाँ सनातन धर्म मन्दिर स्थापित करके बाबा नत्थूराम जी से प्राप्त जाम साहब की स्थापना उस मन्दिर में की।
बाद में शरणार्थी कालोनी (मॉडल टाउन) स्थापित होने के समय गुसाईं बाबा रामेश्वरदासजी ने अपने मन में संकल्प किया कि भारतवर्ष में गुसाईं तुलसीदास जी के विचारों को प्रचारित-प्रसारित करने हेतु एक मन्दिर की स्थापना की जाये जिसका नाम रामायण मन्दिर हो तथा जिसमें गुसाईयों द्वारा प्राप्त जाम साहब की स्थापना एवं पूजा अर्चना की जा सके। ये परिवार अपनी जान पर खेल कर जाम साहब की चौकियाँ अपने साथ यहाँ लेकर आये थे।
वर्तमान गुरूदेव गोस्वामी देवेन्द्र जी महाराज के पिता गोस्वामी रामेश्वरदास जी ने अपना यह संकल्प पूरा करने के लिए अपनी समस्त पूँजी लगाकर 27 मई 1964 को इस मन्दिर की नींव रखी। उस समय एक छोटी सी झोपड़ी में यह मन्दिर आरम्भ हुआ था जो सेवक समाज के छोटे-छोटे प्रयासों से आज एक विशाल वट वृक्ष के रूप में समाज को अपनी शीतल छाया प्रदान कर रहा है। सेवक समाज के हरिद्वार जाकर बार-बार आग्रह करने पर हरिद्वारवासी बाबा तोताराम जी ने रामायण मन्दिर की इस गुरू गद्दी को पुनः संभाल लिया तथा वर्तमान में उनके महाप्रयाण के बाद स्वर्गीय गोस्वामी रामेश्वर दास जी के पुत्र गोस्वामी देवेन्द्र जी गद्दी पर विराजमान हैं।
मार्गशीर्ष द्वितीय सम्वत् 2026 (सन् 1969) को श्री रामायण मन्दिर में भगवान के विग्रह की स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा की गयी। विग्रह स्थापना के समय कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद से त्यागपत्र देकर सन्यासी बने स्वामी प्रकाशानन्द जी की अध्यक्षता में श्री रामायण मन्दिर द्वारा विश्व शान्ति यज्ञ का आयोजन किया गया था जो आज भी अद्वितीय है। इस विश्व शान्ति यज्ञ में हिमालय पर्वत की गुफाओं से निकलकर सैकड़ों साधु सन्यासियों ने भाग लिया तथा फिर उन्हीं गुफाओं में लौट गये।
वर्तमान में श्री रामायण मन्दिर में जाम साहब की तीन चौकियाँ स्थापित हैं। जो क्रमशः बाबू जई जिला मरदान (पाकिस्तान), सुन्दर नगर हिमाचल प्रदेश एवं तत्कालीन स्वान्त रियासत जो अब पाकिस्तान में है, से प्राप्त हुईं। इस प्रकार श्री रामायण मन्दिर एवं इसकी गुरू गद्दी का इतिहास अखण्ड भारत के गढ़ी कपूरा (जो अब पाकिस्तान में है) तक जाता है।
श्री रामायण मन्दिर का जो स्वरूप वर्तमान में है वह अपने प्रारम्भिक स्वरूप से काफी भिन्न है। गर्भ गृह में क्रमशः श्री रामचरितमानस, जगतारिणी माँ दुर्गा, भवभीतिहर भगवान शंकर-पार्वती, प्रथम पूज्य गणेश, वृषभ, श्री राघवेन्द्र सरकार, गोस्वामी तुलसीदास जी, हनुमान जी एवं श्री राधाकृष्ण के विग्रह स्थापित हैं।
6500 स्क्वायर फिट का विस्तृत सत्संग भवन, भव्य स्वरूप में निर्माण कार्य किया गया है। सभी सेवक समाज तन, मन, धन से सेवा में संलग्न है। यह भवन पूर्णतः वातानुकूलित है एवं इसमें निरन्तर सत्संग भजन आदि के कार्यक्रम चलते रहते हैं। मन्दिर में ठाकुर दरबारों के दर्शन कर दर्शनार्थी मन्त्र मुग्ध हो जाते हैं।
भूतल में एक सामुदायिक केन्द्र का निर्माण किया गया है। प्रथम तल पर ठाकुर जी की रसोई एवं एक बालकनी है। ऊपरी तल पर शिखर के साथ एक बड़ा ध्यान कक्ष पिरामिड के वैज्ञानिक आधार पर बनाया जा रहा है जिसमें लोग ध्यान एवं योग कर पायेंगे। मन्दिर के उत्तरी द्वार पर सन्त निवास के कमरे बनाये गये हैं।