श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज मानस-रचना करते हुए
जय श्री राम

श्री रामायण मन्दिर — माधवबाड़ी, बरेली | विकासनगर, देहरादून

आज का दोहा
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।
हमारे मन्दिर
दो केन्द्र, एक परम्परा

माधवबाड़ी, बरेली

मुख्य केन्द्र

स्थापना — 27 मई 1964

विकासनगर, देहरादून

द्वितीय शाखा

विकासनगर, देहरादून (उत्तराखण्ड)

आगामी पर्व एवं उत्सव
आगामी प्रमुख पर्व (भारतीय पंचांग अनुसार, सन् 2026)
  • 26मार्चश्री राम नवमी
  • 02अप्रैलहनुमान जयन्ती
  • 19अगस्ततुलसीदास जयन्तीमन्दिर का 15-दिवसीय महोत्सव इसी अवसर पर
  • 08नवम्बरदीपावली

* तुलसी जयन्ती महोत्सव की सटीक प्रारम्भ/समापन तिथियाँ मन्दिर द्वारा पुष्टि होने पर जोड़ी जायेंगी।

परम्परा

गुरु परम्परा

गोस्वामी तुलसीदास जी से वर्तमान गद्दी तक — 34 पीठाधीश्वरों की अखण्ड गुरु-शिष्य परम्परा। यह अखण्ड परम्परा इस संस्था की आधारशिला है, जिसका विवरण नमन ग्रन्थ पर आधारित है।

पूरी परम्परा देखें →
इतिहास

मन्दिर का इतिहास

अखण्ड भारत के गढ़ी कपूरा से बरेली तक — विभाजन, गुरु-गद्दी की स्थापना एवं 27 मई 1964 को मन्दिर की नींव की कथा।

सम्पूर्ण इतिहास →
एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
तुलसी संगत साधु की, कटे कोटि अपराध।। — गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज

गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की गुरु-शिष्य परम्परा में स्थापित आध्यात्मिक केन्द्र। भजन, आरती, स्तुति, गुरु परम्परा एवं मन्दिर के इतिहास का संग्रह।

स्थापना — 27 मई 1964 34 पीठाधीश्वर गुरु परम्परा वार्षिक तुलसी जयन्ती महोत्सव

विनय पत्रिका के पद

नमन ग्रन्थ में संकलित 7 पद एवं आह्वान — पृष्ठ 69-71

नमन ग्रन्थ में विनय पत्रिका के 7 चुनिन्दा पद संकलित हैं, जो नीचे मूल रूप में दिये गये हैं। सम्पूर्ण 279 पदों की विषयवार रूपरेखा यहाँ देखें

पद–1

जाके प्रिये न राम वैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही।। तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषन बंधु, भरत महतारी। बलि गुरू तज्यो कन्त ब्रज बनितन्हि, भये मुद मंगलकारी।। नाते नेह राम के मनियत सुह्रद सुसेव्य जहाँ लौं। अंजन कहाँ आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहाँ कहाँ लौं।। तुलसी सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रानते प्यारो। जासों होय सनेह राम पद, एतो मंतो हमारो।।

पद–2

राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे। घोर भव–नीर–निधि नाम निज नाव रे।।।।। एक ही साधन सब रिद्धि सिद्धि साधि रे। ग्रसे कलि–रोग–जोग–संजम–समाधि रे।।2।। भलों जो है, पोच जो है, दाहिनो जो, बाम रे। राम–नाम ही सों अंत सब ही को काम रे।। जग नभ बाटिका रही है फलि फूलि रे। धुवाँ कैसे धौरहर देखि तू न भूलि रे।। राम–नाम छाड़ि जो भरोसौ करै और रे। तुलसी परोसो त्यागि माँगै कूर कौर रे।।

पद–3

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे काको नाम पतित–पावन जग, केहि अति दीन पियारे।। कौने देव बराई बिरद–हित, हठि हठि अधम उधारे। खग, मृग, व्याध, पवान, बिटप जड़, जवन कवन सुर तारे।। देव, दनुज मुनि, नाग मनुज सब, माया–बिबस बिचारे। तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे।।

पद–4

तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी। हौं प्रसिद्धि पातकी, तू पाप–पुंज–हारी।। नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसो। मो समान आरत नहिं, आरति हर तोसो।।12।। ब्रह्म तू, हौं जीव, तू है ठाकुर, हौं चेरो। तात–मात, गुरू–सखा, तू सब बिधि हितु मेरो।।13।। तोहिं मोहिं नाते अनेक, मानियें जो भावे। ज्यों त्यों तुलसी कृपालु! चरन–सरन पावे।।14।।

पद–5

"अबलौं नसानी, अब न नसैहों।" राम–कृपा भव–निसा सिरानी, जागे फिर न डसैहों।। पायेउँ नाम चारू चिन्तामनि, उर कर ते न खसैहों। स्यामरूप सुचि रूचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहों।। परबस जानि हँस्यो इन इन्द्रिन निज बस हवै न हसैहों। मन मधुकर पनकैं तुलसी, रघुपति कमल बसैहों।

पद–6

ऐसो को उदार जग माहीं। बिनु सेवा जो द्रवै दीनपर राम सरिस कोउ नाहीं।। जो गति जोग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनि ग्यानी। सो गति देत गीध सबरी कहँ प्रभु न बहुत जिय जानी।। जो संपति दस सीस अरप करि रावन सिव पहँ लीन्हीं। सो संपदा विभीषन कहँ अति सकुच–सहित हरि दीन्हीं।। तुलसिदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो। तौ भजु राम, काम सब पूरन करैं कृपानिधि तेरो।।

पद–7

सुतु मन मूढ़ सिखावन मेरो। हरि–पद–बिमुख लह्यो न काहू सुख, सठ! यह समुझ सबेरो।।1।। बिछुरे ससि–रबि मन–नैनिनतें, पावत दुख बहुतेरो। भ्रमत भ्रमित निसि–दिवस गगन महें, तहँ रिपु राहु बड़ेरो।।2।। जद्यपि अति पुनीत सुरसरिता, तिहुँ पुर सुजस घनेरो। तजे चरन अजहूँ न मिटत नित, बहिबो ताहु केरो।।3।। छुटे न बिपति भजे बिन रघुपति, श्रुति संदेहु निबेरो। तुलसिदास सब आस छाँड़ि करि, होहु रामको चेरो।।4।।
आह्वान — प्रभु प्राण बनकर आना

प्रभु प्राण बनकर आना

प्रभु प्राण बनकर आना। शरण तुम्हारी हूँ, प्रभु, मुझको न ठुकराना।। (1) दृष्टि जब समतल हो जाये, स्वभाव जब निर्मल हो जाये शब्द न फूटे जिहवा से, कंठ जब विह्वल हो जाये। नवगीत बन कर आना, प्रभु प्राण बनकर आना।। (2) देखता रहूँ तुम्हें अपलक, मिटे न मेरी यह ललक। श्वांस गति तब जाये चाहे रुक, तुम्हारे लिये हों जब प्राण उत्सुक, स्वीकार करने आना, नव–प्राण बन कर आना।। (3) वासनाओं की हो रही अति, शून्य हैं कर्म, शून्य ही गति। कामना अशेष हो जाये, वासना निस्तेज हो जाये, इन विकारों की आहुति, अग्नि बन ले जाना। प्रभु प्राण बन कर आना।। (4) नाम तुम्हारा न बिसारूँ, स्वप्न शयन में तुम्हें पुकारूँ। भूल न पाऊँ मैं क्षण भर, बंकिम छवि मैं सदा निहारूँ।। चित्त मेरा जब तीर्थ बन जाये, बसने उसमें आना। प्रभु प्राण बन कर आना।। (5) मिला उसे तेरा सहारा, आर्त स्वर में जिसने पुकारा। है मुझे विश्वास अब यह, दूर नहीं मुझसे किनारा।। भव सागर से नैया मेरी, पार करने आना। प्रभु प्राण बन कर आना।। (6) जीवन नौका हो चुकी हो जर्जर, डूबती हो हर लहर पर, मृत्यु दूत हों खड़े द्वार पर, विकराला अपना मुख पसार कर मुझ अधम को न ठुकराना, नव तेज बनकर आना। प्रभु प्राण बन कर आना।।

संपर्क

दोनों मन्दिरों की जानकारी

श्री रामायण मन्दिर, माधवबाड़ी, बरेली

पता: माधवबाड़ी, बरेली, उत्तर प्रदेश

वार्षिक उत्सव: 15-दिवसीय तुलसी जयन्ती महोत्सव

श्री रामायण मन्दिर, विकासनगर, देहरादून

पता: पंजाबी कालोनी, विकासनगर, देहरादून, उत्तराखण्ड

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