विनय पत्रिका के पद
नमन ग्रन्थ में संकलित 7 पद एवं आह्वान — पृष्ठ 69-71
नमन ग्रन्थ में विनय पत्रिका के 7 चुनिन्दा पद संकलित हैं, जो नीचे मूल रूप में दिये गये हैं। सम्पूर्ण 279 पदों की विषयवार रूपरेखा यहाँ देखें।
पद–1
जाके प्रिये न राम वैदेही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही।।
तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषन बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरू तज्यो कन्त ब्रज बनितन्हि, भये मुद मंगलकारी।।
नाते नेह राम के मनियत सुह्रद सुसेव्य जहाँ लौं।
अंजन कहाँ आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहाँ कहाँ लौं।।
तुलसी सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रानते प्यारो।
जासों होय सनेह राम पद, एतो मंतो हमारो।।
पद–2
राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे।
घोर भव–नीर–निधि नाम निज नाव रे।।।।।
एक ही साधन सब रिद्धि सिद्धि साधि रे।
ग्रसे कलि–रोग–जोग–संजम–समाधि रे।।2।।
भलों जो है, पोच जो है, दाहिनो जो, बाम रे।
राम–नाम ही सों अंत सब ही को काम रे।।
जग नभ बाटिका रही है फलि फूलि रे।
धुवाँ कैसे धौरहर देखि तू न भूलि रे।।
राम–नाम छाड़ि जो भरोसौ करै और रे।
तुलसी परोसो त्यागि माँगै कूर कौर रे।।
पद–3
जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे
काको नाम पतित–पावन जग, केहि अति दीन पियारे।।
कौने देव बराई बिरद–हित, हठि हठि अधम उधारे।
खग, मृग, व्याध, पवान, बिटप जड़, जवन कवन सुर तारे।।
देव, दनुज मुनि, नाग मनुज सब, माया–बिबस बिचारे।
तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे।।
पद–4
तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी।
हौं प्रसिद्धि पातकी, तू पाप–पुंज–हारी।।
नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसो।
मो समान आरत नहिं, आरति हर तोसो।।12।।
ब्रह्म तू, हौं जीव, तू है ठाकुर, हौं चेरो।
तात–मात, गुरू–सखा, तू सब बिधि हितु मेरो।।13।।
तोहिं मोहिं नाते अनेक, मानियें जो भावे।
ज्यों त्यों तुलसी कृपालु! चरन–सरन पावे।।14।।
पद–5
"अबलौं नसानी, अब न नसैहों।"
राम–कृपा भव–निसा सिरानी, जागे फिर न डसैहों।।
पायेउँ नाम चारू चिन्तामनि, उर कर ते न खसैहों।
स्यामरूप सुचि रूचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहों।।
परबस जानि हँस्यो इन इन्द्रिन निज बस हवै न हसैहों।
मन मधुकर पनकैं तुलसी, रघुपति कमल बसैहों।
पद–6
ऐसो को उदार जग माहीं।
बिनु सेवा जो द्रवै दीनपर राम सरिस कोउ नाहीं।।
जो गति जोग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनि ग्यानी।
सो गति देत गीध सबरी कहँ प्रभु न बहुत जिय जानी।।
जो संपति दस सीस अरप करि रावन सिव पहँ लीन्हीं।
सो संपदा विभीषन कहँ अति सकुच–सहित हरि दीन्हीं।।
तुलसिदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो।
तौ भजु राम, काम सब पूरन करैं कृपानिधि तेरो।।
पद–7
सुतु मन मूढ़ सिखावन मेरो।
हरि–पद–बिमुख लह्यो न काहू सुख, सठ! यह समुझ सबेरो।।1।।
बिछुरे ससि–रबि मन–नैनिनतें, पावत दुख बहुतेरो।
भ्रमत भ्रमित निसि–दिवस गगन महें, तहँ रिपु राहु बड़ेरो।।2।।
जद्यपि अति पुनीत सुरसरिता, तिहुँ पुर सुजस घनेरो।
तजे चरन अजहूँ न मिटत नित, बहिबो ताहु केरो।।3।।
छुटे न बिपति भजे बिन रघुपति, श्रुति संदेहु निबेरो।
तुलसिदास सब आस छाँड़ि करि, होहु रामको चेरो।।4।।
आह्वान — प्रभु प्राण बनकर आना
प्रभु प्राण बनकर आना
प्रभु प्राण बनकर आना।
शरण तुम्हारी हूँ, प्रभु, मुझको न ठुकराना।।
(1) दृष्टि जब समतल हो जाये, स्वभाव जब निर्मल हो जाये
शब्द न फूटे जिहवा से, कंठ जब विह्वल हो जाये।
नवगीत बन कर आना, प्रभु प्राण बनकर आना।।
(2) देखता रहूँ तुम्हें अपलक, मिटे न मेरी यह ललक।
श्वांस गति तब जाये चाहे रुक, तुम्हारे लिये हों जब प्राण उत्सुक,
स्वीकार करने आना, नव–प्राण बन कर आना।।
(3) वासनाओं की हो रही अति, शून्य हैं कर्म, शून्य ही गति।
कामना अशेष हो जाये, वासना निस्तेज हो जाये,
इन विकारों की आहुति, अग्नि बन ले जाना।
प्रभु प्राण बन कर आना।।
(4) नाम तुम्हारा न बिसारूँ, स्वप्न शयन में तुम्हें पुकारूँ।
भूल न पाऊँ मैं क्षण भर, बंकिम छवि मैं सदा निहारूँ।।
चित्त मेरा जब तीर्थ बन जाये, बसने उसमें आना।
प्रभु प्राण बन कर आना।।
(5) मिला उसे तेरा सहारा, आर्त स्वर में जिसने पुकारा।
है मुझे विश्वास अब यह, दूर नहीं मुझसे किनारा।।
भव सागर से नैया मेरी, पार करने आना।
प्रभु प्राण बन कर आना।।
(6) जीवन नौका हो चुकी हो जर्जर, डूबती हो हर लहर पर,
मृत्यु दूत हों खड़े द्वार पर, विकराला अपना मुख पसार कर
मुझ अधम को न ठुकराना, नव तेज बनकर आना।
प्रभु प्राण बन कर आना।।