श्री रामायण मन्दिर

ॐ श्रीराम

श्री रामायण मन्दिर

माधवबाड़ी, बरेली — गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की गुरु-शिष्य परम्परा में स्थापित आध्यात्मिक केन्द्र। भजन, आरती, स्तुति, गुरु परम्परा एवं मन्दिर के इतिहास का संग्रह।

आज का दोहा
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।
— श्री रामचरितमानस, गुरु वन्दना
नमन ग्रन्थ की सम्पूर्ण मूल सामग्री (तुलसी चरित, सभी 24 भजन, समस्त आरतियाँ, 16 छन्द, विनय पत्रिका के 7 पद, नित्य कर्म) तथा हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, राम रक्षा स्तोत्र, हनुमानाष्टक एवं हनुमान बाहुक जैसे पाठ यहाँ मूल रूप में उपलब्ध हैं। सम्पूर्ण रामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड एवं विनय पत्रिका (279 पद — गीता प्रेस संस्करण) चरणबद्ध रूप से आगामी अद्यतन में जोड़े जायेंगे।

हमारे बारे में

श्री रामायण मन्दिर — दो केन्द्र, एक परम्परा

श्री रामायण मन्दिर गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की गुरु-शिष्य परम्परा (गद्दी) में स्थापित एक आध्यात्मिक संस्था है, जिसके वर्तमान में दो प्रमुख केन्द्र हैं।

श्री रामायण मन्दिर, माधवबाड़ी, बरेली मुख्य केन्द्र

स्थापना: 27 मई 1964 — गोस्वामी रामेश्वर दास जी द्वारा। मन्दिर के दो द्वार हैं — एक माधवबाड़ी की ओर, दूसरा पंजाबी कालोनी की ओर। गर्भ गृह में श्री रामचरितमानस, जगतारिणी माँ दुर्गा, भगवान शंकर-पार्वती, श्री गणेश, नन्दी, श्री राघवेन्द्र सरकार (राम दरबार), गोस्वामी तुलसीदास जी, हनुमान जी एवं श्री राधाकृष्ण के विग्रह स्थापित हैं। 6500 वर्गफुट का वातानुकूलित सत्संग भवन है। प्रतिवर्ष 15-दिवसीय तुलसी जयन्ती महोत्सव आयोजित होता है।

श्री रामायण मन्दिर, विकासनगर विवरण शीघ्र

विकासनगर, उत्तराखण्ड स्थित यह मन्दिर की दूसरी शाखा है। इसका पूर्ण विवरण (स्थापना तिथि, पता, न्यासी संस्था) गोस्वामी योगेश जी महाराज से प्राप्त जानकारी के आधार पर शीघ्र जोड़ा जायेगा।

भाषा एवं दृष्टिकोण

यह वेबसाइट पूर्णतः हिन्दी में है और नमन ग्रन्थ (2018, द्वितीय संस्करण) में संकलित सामग्री को उसके मूल रूप में — बिना किसी परिवर्तन, संक्षिप्तीकरण अथवा प्रतिस्थापन के — प्रस्तुत करने के सिद्धान्त पर आधारित है।

इतिहास

श्री रामायण मन्दिर का इतिहास — नमन, पृष्ठ 47–49
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अखण्ड भारत में फैली हैं रामायण मन्दिर की जड़ें

माधोबाड़ी स्थित श्री रामायण मन्दिर का इतिहास वैसे तो 54 वर्ष पुराना है। लेकिन वास्तव में इसकी ऐतिहासिकता की जड़ें पाकिस्तान तक जाती हैं। इन अर्थों में यह मन्दिर बहुत पुराना है, बेशक बरेली के कुछ नये मन्दिरों में इसे काफी खूबसूरत माना जाता है। इस मंदिर में पन्द्रह दिन तक चलने वाले तुलसी जयन्ती महोत्सव में श्रद्धालुओं को प्रवचनों, भजन सत्संग आदि के माध्यम से जो असीम शान्ति मिलती है, वही अब इसकी विशेषता बन गया है।

तत्कालीन अखण्ड भारत और अब पाकिस्तान में होती मरदान जिला स्थित है जिसमें गढ़ी कपूरा नामक स्थान पर गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की गदी स्थित है। यह एक सिद्ध स्थान है और उस समय में बाला गढ़ी ग्राम के निवासी सेवक प्रतिदिन पैदल चलकर तथा मार्ग में पड़ने वाली 'दरिया-ए-लुण्डा' को पार करके इस सिद्ध स्थान के दर्शनार्थ जाया करते थे। गोस्वामी तुलसीदास जी की अपनी कोई सन्तान नहीं थी। उनके महाप्राण के बाद उनके शिष्यों ने अनेक स्थानों पर गोस्वामी तुलसीदासजी की गुरू गद्दी स्थापित की तथा गुसाईयों की वंश परम्परा में आज भी इन गद्दियों से भारत वर्ष का बहुत बड़ा हिन्दू समाज जुड़ा हुआ है। गढ़ी कपूरा के अतिरिक्त राम तख्त (तत्कालीन मियाँ गुल की रियासत) तथा ढण्डेरी भी ऐसे ही प्रसिद्ध स्थान रहे हैं। ढण्डेरी में पवित्र जल का एक चश्मा था, जिसमें स्नान करने से लोग रोग मुक्त हो जाते थे।

गढ़ी कपूरा स्थित स्थान पर पीपल का एक विशाल वृक्ष था जो अपने आकार और प्राचीनता के कारण विश्व प्रसिद्ध था। इसी विशाल वृक्ष के नीचे अलमस्त फकीर के रूप में बैठकर बाबा सफाचन्द जी महाराज अपने प्रभु की याद में भजन गाते रहते थे। एक बार बाबा सफाचन्द जी दीवार पर बैठकर भजन गा रहे थे और उन पर पीपल के सूखे पत्ते फूलों की तरह गिर रहे थे। तभी किसी प्राकृतिक कारण से उस क्षेत्र में पलायन शुरू हो गया। प्रत्येक व्यक्ति किसी भी प्रकार से गढ़ी कपूरा को छोड़ देना चाहता था। बाबा के जो मुरीद अपने घोड़ों पर बैठकर उस सिद्ध स्थान के आगे से निकले तो उन्होंने बाबा सफाचन्द जी को भी अपने साथ चलने का आग्रह किया और कहा "बाबा चूड्ड़ा" (पश्तो भाषा)। यह सुनकर बाबा सफाचन्द जी जिस दीवार पर बैठे थे उसी को घोड़े की तरह ऐड़ लगाई और वह दीवार दौड़ पड़ी। बाबा की यह कला देखकर लोग बाबा के चरणों में गिर पड़े। बाबा के समझाने पर पलायन रूक गया और गढ़ी कपूरा तथा बाबा सफाचन्द जी लोगों की शुभ मनोकामना पूर्ति का माध्यम बन गये।

बाबा सफाचन्द जी से गदी प्राप्त करके बाबा नत्थूराम जी अपने सेवकों को समाज कल्याण के लिये प्रेरित करते रहे। आताताईयों की बुरी दृष्टि से बचाने के लिए बाबा नत्थूराम जी ने अपने शिष्यों को कांस्य पात्र में शुद्धता पूर्वक शुद्ध आवरण में ढककर गणेश पूजा का निर्देश दिया। यही गणेश पूजा जाम साहब की पूजा के नाम से प्रसिद्ध हुई। भारत विभाजन के समय बाबा नत्थूराम जी अपने सेवक समाज के साथ भारतवर्ष में महाराष्ट्र प्रान्त के जिला अहमदनगर के कोपरगाँव स्थित स्थान पर आ गये तथा बाबा भजन लाल जी कुछ सेवकों को लेकर पंजाब पहुँच गये।

गुसाईं बाबा नन्द लाल जी के तीन पुत्र हुए। गुसाईं दशबन्दी राम जी, गुसाईं मेहर दास जी एवं गुसाईं मूलराज जी। गुसाईं मूलराज जी अपने पुत्र गुसाईं रामेश्वर दास जी के साथ बरेली आ गए तथा दूसरी ओर गुसाईं दशबन्दी राम जी के पुत्र गुसाईं बाबा तोताराम जी स्वतन्त्रता से 20 वर्ष पूर्व ही हरिद्वार में आकर जप तप में लग गये थे। इधर विभाजन के बाद जो परिवार बरेली आये थे, उन्हें शाहजहाँपुर मार्ग पर शरणार्थियों के शिविरों में स्थान दिया गया तथा उन्होंने वहाँ सनातन धर्म मन्दिर स्थापित करके बाबा नत्थूराम जी से प्राप्त जाम साहब की स्थापना उस मन्दिर में की।

बाद में शरणार्थी कालोनी (मॉडल टाउन) स्थापित होने के समय गुसाईं बाबा रामेश्वरदासजी ने अपने मन में संकल्प किया कि भारतवर्ष में गुसाईं तुलसीदास जी के विचारों को प्रचारित-प्रसारित करने हेतु एक मन्दिर की स्थापना की जाये जिसका नाम रामायण मन्दिर हो तथा जिसमें गुसाईयों द्वारा प्राप्त जाम साहब की स्थापना एवं पूजा अर्चना की जा सके। ये परिवार अपनी जान पर खेल कर जाम साहब की चौकियाँ अपने साथ यहाँ लेकर आये थे।

वर्तमान गुरूदेव गोस्वामी देवेन्द्र जी महाराज के पिता गोस्वामी रामेश्वरदास जी ने अपना यह संकल्प पूरा करने के लिए अपनी समस्त पूँजी लगाकर 27 मई 1964 को इस मन्दिर की नींव रखी। उस समय एक छोटी सी झोपड़ी में यह मन्दिर आरम्भ हुआ था जो सेवक समाज के छोटे-छोटे प्रयासों से आज एक विशाल वट वृक्ष के रूप में समाज को अपनी शीतल छाया प्रदान कर रहा है। सेवक समाज के हरिद्वार जाकर बार-बार आग्रह करने पर हरिद्वारवासी बाबा तोताराम जी ने रामायण मन्दिर की इस गुरू गद्दी को पुनः संभाल लिया तथा वर्तमान में उनके महाप्रयाण के बाद स्वर्गीय गोस्वामी रामेश्वर दास जी के पुत्र गोस्वामी देवेन्द्र जी गद्दी पर विराजमान हैं।

मार्गशीर्ष द्वितीय सम्वत् 2026 (सन् 1969) को श्री रामायण मन्दिर में भगवान के विग्रह की स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा की गयी। विग्रह स्थापना के समय कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद से त्यागपत्र देकर सन्यासी बने स्वामी प्रकाशानन्द जी की अध्यक्षता में श्री रामायण मन्दिर द्वारा विश्व शान्ति यज्ञ का आयोजन किया गया था जो आज भी अद्वितीय है। इस विश्व शान्ति यज्ञ में हिमालय पर्वत की गुफाओं से निकलकर सैकड़ों साधु सन्यासियों ने भाग लिया तथा फिर उन्हीं गुफाओं में लौट गये।

वर्तमान में श्री रामायण मन्दिर में जाम साहब की तीन चौकियाँ स्थापित हैं। जो क्रमशः बाबू जई जिला मरदान (पाकिस्तान), सुन्दर नगर हिमाचल प्रदेश एवं तत्कालीन स्वान्त रियासत जो अब पाकिस्तान में है, से प्राप्त हुईं। इस प्रकार श्री रामायण मन्दिर एवं इसकी गुरू गद्दी का इतिहास अखण्ड भारत के गढ़ी कपूरा (जो अब पाकिस्तान में है) तक जाता है।

श्री रामायण मन्दिर का जो स्वरूप वर्तमान में है वह अपने प्रारम्भिक स्वरूप से काफी भिन्न है। इस मन्दिर का एक द्वार माधोबाड़ी में तथा दूसरा द्वार पंजाबी कालोनी में स्थित है। गर्भ गृह में क्रमशः श्री रामचरितमानस, जगतारिणी माँ दुर्गा, भवभीतिहर भगवान शंकर-पार्वती, प्रथम पूज्य गणेश, वृषभ, श्री राघवेन्द्र सरकार, गोस्वामी तुलसीदास जी, हनुमान जी एवं श्री राधाकृष्ण के विग्रह स्थापित हैं।

6500 स्क्वायर फिट का विस्तृत सत्संग भवन, भव्य स्वरूप में निर्माण कार्य किया गया है। सभी सेवक समाज तन, मन, धन से सेवा में संलग्न है। यह भवन पूर्णतः वातानुकूलित है एवं इसमें निरन्तर सत्संग भजन आदि के कार्यक्रम चलते रहते हैं। मन्दिर में ठाकुर दरबारों के दर्शन कर दर्शनार्थी मन्त्र मुग्ध हो जाते हैं।

भूतल में एक सामुदायिक केन्द्र का निर्माण किया गया है। प्रथम तल पर ठाकुर जी की रसोई एवं एक बालकनी है। ऊपरी तल पर शिखर के साथ एक बड़ा ध्यान कक्ष पिरामिड के वैज्ञानिक आधार पर बनाया जा रहा है जिसमें लोग ध्यान एवं योग कर पायेंगे। मन्दिर के उत्तरी द्वार पर सन्त निवास के कमरे बनाये गये हैं।

स्रोत: नमन (द्वितीय संस्करण, 2018), पृष्ठ 47–49 — मूल पाठ, अक्षरशः

गुरु परम्परा

34 पीठाधीश्वर — गोस्वामी तुलसीदास जी से वर्तमान गद्दी तक
अब प्रत्येक गुरु का अपना पृष्ठ भी उपलब्ध है — सीधा लिंक साझा करने हेतु यहाँ गुरु सूची देखें →

यह सूची नमन ग्रन्थ (पृष्ठ 50) में मुद्रित गुरु वंशावली पर आधारित है। पुस्तक में #33 गोस्वामी देवेन्द्र जी को "वर्तमान पीठाधीश्वर" लिखा गया है (2018 के अनुसार); वर्तमान में #34 गोस्वामी योगेश जी महाराज पीठाधीश्वर हैं। जिन गुरुओं के नाम रेखांकित (underlined) हैं, उनके विषय में विस्तृत जानकारी उपलब्ध है — नाम पर क्लिक करें।

स्रोत: नमन, पृष्ठ 50 — गुरु वंशावली
एक खुला प्रश्न: नमन के इतिहास-अंश (देखें "इतिहास" पृष्ठ) में बाबा सफाचन्द जी के बाद गद्दी पर "बाबा नत्थूराम जी" का उल्लेख है, परन्तु उपरोक्त आधिकारिक गुरु वंशावली (पृष्ठ 50) में यह नाम सूचीबद्ध नहीं है — क्रम #29 पर "श्री खुशीराम जी" अंकित है, बिना किसी टिप्पणी के। यह विसंगति नमन ग्रन्थ में ही है; इसे मूल पाठ में सुधारे बिना यहाँ ज्यों का त्यों दर्शाया गया है। इसका स्पष्टीकरण गोस्वामी योगेश जी महाराज से अपेक्षित है।

तुलसी चरित

गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज का कथात्मक जीवन परिचय — नमन, पृष्ठ 6–46 (मूल पाठ, अक्षरशः)
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(एक)

प्रयाग के निकटवर्ती जिले बाँदा के राजापुर ग्राम में पंडित आत्माराम दुबे घर के बाहरी भाग में अपने कुछ परिचितों के साथ बैठे हैं। भीतर वाले कमरे में उनकी पत्नी हुलसी के प्रसव के लिए एक दाई, दासी चुनिया तथा दो-तीन स्त्रियाँ उपस्थित हैं।

तभी भीतर कांसे की थाली बज उठती है जिसका अर्थ है कि बालक का जन्म हुआ है। पंडित आत्माराम ज्योतिष के अच्छे ज्ञाता हैं। आस-पास के गाँवों में उनकी काफी प्रसिद्धि है। पंचांग, पत्रिकायें उठा पंडित जी ग्रह नक्षत्र की गणना करने लगते हैं।

थोड़ी देर तक गणना करते-करते माथे की त्योरियों को बल देते; ढीला छोड़ते जैसे उन्हें स्वयं पर विश्वास नहीं हो पा रहा था। पुनः गणना करने लगे। बार-बार की गणना से भी एक ही निर्णय पर पहुँचने के पश्चात उनका मुख विवर्ण हो उठा। बालक अभुक्तमूल नक्षत्र में जन्मा था, जिसका अर्थ था कि बालक माता-पिता ही नहीं ग्राम के लिए भी घोर विपत्ति का कारण सिद्ध होगा।

पंडित आत्माराम निर्णय नहीं ले पा रहे थे कि क्या किया जाये। ज्योतिष पर उन्हें दृढ़ विश्वास था। उन्होंने बालक का मुख भी न देखने का निश्चय किया। उधर बालक के जन्म के पश्चात उसकी माता के स्वास्थ्य में अत्यंत गिरावट आती जा रही थी। गिरते हुए स्वास्थ्य के बीच ही जब उन्हें बालक के भविष्य तथा पंडित जी के निश्चय के विषय में ज्ञात हुआ तो उनकी दशा और बिगड़ने लगी। वे जानती थीं कि पंडित जी को अपने ज्योतिष पर अत्यन्त विश्वास है। वे बालक को कदापि स्वीकार नहीं करेंगे।

जब हुलसी को लगा कि उसके प्राण अब नहीं बचेंगे तो अपनी विश्वस्त दासी चुनिया को बुला बालक को उसे सौंपते हुए कहा कि वह बालक को लेकर अपनी ससुराल हरिहरपुर चली जाये। हुलसी को अब अपने जीवन का कोई विश्वास नहीं रहा। बालक के पोषण और देखभाल के लिए हुलसी ने चुनिया को अपने गहने और कुछ धन भी दिया। चुनिया से बालक का दायित्व संभालने का वचन ले कर हुलसी ने श्वांस छोड़ दिया।

जहाँ जन्म के समय बधाइयाँ बजने जा रही थी वहाँ शोक ने अपना साम्राज्य फैला दिया।

बालक को गोद में लेते ही चुनिया ने गहरी निःश्वांस भरकर देखा तो उसके मुख पर एक विचित्र सी मुस्कराहट दिखायी दी। मानो कोई सुन्दर स्वप्न देख रहा हो। चुनिया सोचने लगी — 'इसके आने से कितने भरे हृदय सूख गये, कितनी सूखी आँखों में बाढ़ आ गयी। यह अभागा अपने सम्बन्ध में क्या जानता है? यह कैसे जान पायेगा कि इसके आगमन ने जब इसकी माता का जीवन छीन लिया तो पिता के मन में भी कोई उत्साह नहीं बचा। इसके स्वागत में न मेवे बंटे न ही किसी ने बधाई गायी।' चुनिया ने स्वार्थ, मोह और रूढ़िग्रस्त समाज से बच्चे को बचाने का निश्चय किया और रात ही रात में अपनी ससुराल हरिहरपुर आ गयी।

साढ़े पाँच वर्ष तक बालक का यथा संभव पालन पोषण करने के बाद एक दिन चुनिया भी चल बसी। पहले से ही अनाथ बालक का अन्तिम आश्रय भी शेष न रहा। बालक द्वार-द्वार भटकने लगा। इधर-उधर भिक्षा माँगकर पेट भर कर खुले आकाश के नीचे सो जाता।

(दो)

साढ़े पाँच वर्ष का नन्हा बालक कन्धे पर झोला लटकाये भिक्षा माँगते द्वार-द्वार भटकता फिर रहा है। बालक पर छायी अमंगल की छाया से भी बचने के लिए लोग उससे दूर भागते हैं, उसे भरपेट भिक्षा मिलने में भी अत्यन्त कठिनाई आती है। ऐसे ही माँगते-माँगते बालक आज एक द्वार पर खड़ा हुआ है —

"कुछ खाने को दे दो न माँ!" बालक ने बड़ी दीनता से कहा। "चल-चल अभागा कहीं का! अपनी माँ को खा गया, चुनिया को खा गया, अब यहाँ क्या खाने आया है? चल भाग यहाँ से।" वह कर्कशा स्त्री बालक को फटकारते हुए बोली। "कुछ दे दो न माता! बहुत भूख लगी है।" बालक ने करुण स्वर में कहा। "अब जाता है या लगाऊँ दो हाथ?" कर्कशा क्रूरता पर उतर आयी।

अपमानित बालक चुपचाप अपनी राह हो लिया। कुछ दूर जा कर एक स्थान पर बैठ जाता है। परन्तु भूख से व्याकुल प्राण उसके नन्हें पाँवों को फिर एक घर की ओर मोड़ देते हैं। "दया करो माता! कुछ खाने को दे दो।" "कौन? रामबोला! अभी रसोई नहीं बनी है। जा आगे बढ़ जा।" "तीन दिन हो गये माँ। कुछ भी नहीं खाया है।" करूण कंठ से बालक ने याचना की। "कह दिया न रसोई नहीं बनी।" गृह स्वामिनी ने भीतर से ही कठोर स्वर में बालक को फटकार दिया।

भूख, पीड़ा और अपमान से क्षुब्ध बालक आगे बढ़ जाता है। बालक मार्ग में ही एक स्थान पर बैठ जाता है। बालक का कोमल, निर्मल मन राम से आश्रय माँगने लगा — "प्रभु! और किसके आगे हाथ फैलाऊँ? ऐसा दूसरा कौन है जो सदा के लिए मेरा माँगना मिटा दे?"

श्री राम से प्रार्थना करते-करते बालक खाली पेट एक वृक्ष के नीचे लेट गया। भूख के कारण नेत्रों में नींद नहीं उतरती। रह-रह कर आँतों में मरोड़ उठता है तो बालक पानी पीकर फिर लेट जाता है। इस प्रकार जैसे-तैसे दिन बीतने लगे।

(तीन)

इस जीवन से बालक रामबोला इतना ऊब चुका था कि उसने अब आगे भीख न माँगने और वह स्थान छोड़ देने का निश्चय कर लिया। कई दिनों तक इधर-उधर भटकते हुए बालक सूकर खेत वाराह क्षेत्र (वर्तमान में सोरों जी जिला एटा) जा पहुँचा। वहाँ सरयू के किनारे एक हनुमान मंदिर बना था। वहीं एक चबूतरे पर बालक रामबोला पड़ा रहता। मन्दिर में आने वाले हनुमान जी के भक्त वानरों को जो गुड़ चना खिलाते वही वह भी उठाकर खा लेता। परन्तु भिक्षा किसी से नहीं माँगता। प्रातः उठकर हनुमान जी का स्थान साफ कर स्नानादि कर वहीं बैठ भजन करना उसका नित्य कर्म बन गया।

इस प्रकार कई माह बीत गये। कुछ समय बाद भगवान शिव की प्रेरणा से बालक रामबोला को बाबा नरहरि दास का सान्निध्य मिल गया। एक दिन बाबा नरहरि दास घूमते हुए उस मन्दिर की ओर आ निकले जहाँ बालक रामबोला रहता था। बाबा को देख बालक ने चरण छूकर प्रणाम किया। दैव योग से बाबा का चित्त बालक की ओर खिंचा। बाबा जान गये कि कालवश अनाथ सा फिरने वाला यह बालक किसी संस्कारी कुल का है।

बाबा ने बालक के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा — "कहाँ रहते हो बेटा? तुम्हारा नाम क्या है?" बालक ने सकुचाते हुए कहा — "बाबा! मैं श्रीराम का एक तुच्छ सेवक हूँ। मेरा नाम रामबोला है। मेरा काम यही है कि दिन में दो-चार बार राम नाम ले लेता हूँ जिससे प्रसन्न होकर रामजी मेरी देख-भाल करते हैं।" बालक की सरलतापूर्वक कही गयी बात सुनकर बाबा मुस्करा दिये। उन्हें बालक के कुलीन होने में सन्देह न रहा। बाबा ने बालक को साथ चलने को कहा। रामबोला तो वैसे ही आश्रय चाहता ही था सो बाबा के साथ चल दिया।

(चार)

देते समय बाबा का चित्त बालक की ओर खिंचा। बाबा जान गये कि कालवश अनाथ सा फिरने वाला यह बालक किसी संस्कारी कुल का है। उसकी दशा देख बाबा स्वतः ही उसके विषय में बहुत कुछ जान गये। बालक के सिर पर हाथ फेरते हुए बाबा नरहरि ने उसे अपने पास रख लिया। जीवन के चतुर्थ सोपान 'सन्यास आश्रम' में पहुँच चुके बाबा। बाबा समय पाकर उसे शिक्षा भी देने लगे।

धीरे-धीरे बाबा की सेवा और हनुमान जी की पूजा, कृपा से बालक के संस्कार जाग्रत होने लगे। बालक की श्रीराम में गहरी आस्था देख बाबा नरहरि ने उसे अयोध्या ले जाकर वहीं दीक्षित करने का निश्चय किया।

(पाँच)

उन दिनों उत्तर भारत में अत्यन्त उत्पात मचा हुआ था। मुगलों और पठानों के दमन से हिन्दू समाज अत्यन्त पीड़ित था। अनेक छोटे-बड़े मन्दिर तोड़ कर मस्जिदें बना दी गयी थीं। अयोध्या में पावन रामजन्म भूमि मन्दिर को तोड़कर बाबर ने मस्जिद बना दी थी।

इन्हीं दिनों बाबा नरहरि बालक को ले कर अयोध्या पहुँचे। बाबा नरहरि के परिचित सन्तों और एक मठ के महन्त के सम्मुख बालक की वैष्णवी दीक्षा की व्यवस्था हुयी। संवत 1561, माघ शुक्ल पंचमी दिन शुक्रवार को बालक के सभी संस्कार सम्पन्न हुए। बालक रामबोला के मुण्डन, यज्ञोपवीत, उपनयन आदि संस्कार सम्पन्न कराते हुए बाबा नरहरि ने बालक को अर्थ पंचक, पंच संस्कार और 'अ' कार त्रय के विषय में विस्तार से समझाया।

बाबा बोले — "रामबोला! ध्यानपूर्वक सुन! अर्थ पंचक में पाँच बातों का ज्ञान दिया जाता है। प्रथम — समस्त जगत के स्वामी, चराचर के उपास्य उस परमात्मा का स्वरूप क्या है? द्वितीय — उसके अंश स्वरूप उपासक जीवात्मा का क्या स्वरूप है? तृतीय — उस परम पिता की प्राप्ति कैसे हो? चतुर्थ — प्रभु की प्राप्ति के पश्चात उनसे क्या माँगना चाहिए? पंचम — प्रभु की प्राप्ति के मार्ग में कौन-कौन सी बाधायें आती हैं? इन सब बातों का ज्ञान होना ही 'अर्थ पंचक' ज्ञान कहलाता है।"

गंभीर हो कर सुन रहे रामबोला ने बाबा से कहा — "बाबा! अब 'पंच संस्कार' के विषय में बताने की कृपा करें।" नरहरि बाबा बोले — "पंच संस्कारों में सर्वप्रथम है गुरू देव के हाथों कण्ठी अर्थात् तुलसी की माला धारण करना। द्वितीय संस्कार है — ललाट पर श्री सहित भगवद चरणारविन्द की आकृति का उर्ध्वपुण्ड तिलक धारण करना। तृतीय संस्कार है — भुजाओं के मूल में शंख, चक्र अथवा धनुर्वाण आदि भगवद आयुधों का चिन्ह धारण करना। चतुर्थ संस्कार है — कान में सद्गुरू से परंपरा प्राप्त ईष्ट मन्त्र का श्रवण मनन और जप करना। पंचम संस्कार है — उस उपासक जीवात्मा का दास्य परक नामकरण। इस प्रकार तुम्हारे चार संस्कार पूर्ण हो चुके हैं। इस क्रम में केवल तुम्हारा नाम रखना शेष है।"

रामबोला ने पूछा — "गुरूदेव! कृपया अब 'अ' कार त्रय का भाव भी स्पष्ट करने की कृपा करें।" बाबा बोले — 'अ' कार त्रय का सम्बन्ध हृदय के भावों से है। इन तीन भावों की हृदय में पुष्टि होनी चाहिए। प्रथम — यह समझना कि मैं प्रभु का ही एक अंश हूँ। द्वितीय — यह जानना कि मैं प्रभु सेवा का ही एक उपकरण मात्र हूँ। तृतीय — मैं प्रभु के द्वारा संचालित एवं व्यवस्थित हूँ।

सारे संस्कार पूर्ण होने के पश्चात नरहरि बाबा ने बालक रामबोला को नया नाम दिया — तुलसी दास।

संस्कार तथा नाम पाकर तुलसी के जीवन में अत्यन्त महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखायी देने लगे। तुलसी अत्यन्त परिश्रम से पढ़ता। जो भी उसे पढ़ाया जाता उसे वह शीघ्र ही कंठस्थ कर लेता। दस माह तक अयोध्या में रहने के पश्चात बाबा नरहरि तुलसी को लेकर पुनः सूकर खेत आ गये। वहाँ पाँच वर्ष तक तुलसी की शिक्षा हुई। इस अवधि में बाबा ने वाल्मीकि रामायण सहित विभिन्न रामायणों की कथायें तुलसी को सुनायीं। रामायण की कथाओं में आने वाले मार्मिक प्रसंगों को सुनकर भावुक तुलसी के नेत्रों से अश्रु बहने लगते।

बाबा ने तुलसी को साहित्य, संस्कृत, पुराण, शास्त्र और वेदों के अध्ययन के लिए काशी ले जाने का निश्चय किया।

(पाँच — काशी में शिक्षा)

काशी के पंच गंगा घाट पर बाबा नरहरि के परममित्र एवं वयोवृद्ध सन्त आचार्य श्री शेष सनातन रहते हैं। आचार्य की गणना काशी के प्रमुख विद्वानों में होती है। बाबा नरहरि तुलसी दास को लेकर आचार्य शेष सनातन के पास पहुँचे। बाबा नरहरि के निवेदन और तुलसी दास के गुणों से प्रभावित हो आचार्य शेष सनातन ने उन्हें अपने पास रख लिया।

तुलसी दास को योग्य जान आचार्य शेष सनातन ने अपने दायित्व सौंपना प्रारम्भ कर दिया। तुलसी ने भी आचार्य को निराश नहीं किया। वेद पुराण, शास्त्र, नीति ही नहीं ज्योतिष में भी आचार्य ने तुलसी को पारंगत कर दिया।

लगभग पन्द्रह वर्ष का समय बीत गया। आचार्य शेष सनातन के परम शिष्य तुलसी अब तेईस-चौबीस वर्ष के हो चुके हैं। पाठशाला में सबसे तेजस्वी दिखने वाला छात्र तुलसी अध्ययन पूर्ण कर अब 'तुलसी दास शास्त्री' बन गया है। उसी पाठशाला में छात्रों को पढ़ाने के साथ-साथ पंडित तुलसीदास शास्त्री काशी के अनेक स्थानों पर प्रायः कथा भी बाँचते हैं। हनुमान जी के प्रति तुलसी की बचपन से ही अगाध श्रद्धा है। इसी अवधि में तुलसी दास ने अपने जीवन की प्रथम महत्वपूर्ण काव्य रचना 'हनुमान चालीसा' की रचना की।

कुछ समय पश्चात आचार्य शेष सनातन के भौतिक लीलाओं को समाप्त कर प्रभु में लीन हो जाने से तुलसी ने काशी को प्रणाम कर बाबा नरहरि के दर्शनों के लिए चित्रकूट जाने का निश्चय किया। मार्ग में ही सूचना मिली कि बाबा नरहरि भी ऐहिक लीला समाप्त कर चुके हैं। सो चित्रकूट को प्रणाम कर तुलसी दास ने एक बार पुनः अपनी जन्मभूमि राजापुर जाने का निश्चय किया।

(छः)

राजापुर पहुँच कर तुलसी को ज्ञात हुआ कि उनके जन्म के समय उनकी माता के निधन के कारण पिता आत्माराम संसार से उदासीन से हो गये। कुछ समय पश्चात वे भी नहीं रहे। ईश्वरीय विधान जान तुलसी ने गहरी निःश्वास भरी। माता-पिता के श्राद्ध-कर्म के पश्चात तुलसी ने उनके निमित्त भण्डारे-भोज आदि की व्यवस्था की।

तुलसीदास के स्वभाव, गुणों को देखते हुए गाँव वालों ने उन्हें वहीं रोक लिया। युवा तुलसी का मधुर कंठ स्वर और काशी नगरी से आगमन तुलसी की लोकप्रियता में अत्यन्त सहायक सिद्ध हुआ। कथा सम्पन्न होते ही उन्होंने अन्य श्रद्धालुओं से तुलसी के विषय में जानकारी प्राप्त कर उनसे अपनी पुत्री के परिणय हेतु तुलसी से बात करने को कहा।

काशी से पधारे पंडित तुलसीदास शास्त्री व्यास आसन पर विराजमान हैं। राजापुर तथा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक श्रद्धालु कथा श्रवण कर रहे हैं। राम के प्रति अगाध निष्ठा और समर्पण का प्रभाव तुलसी की कथा बाँचने की शैली में इतने स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ता है कि मानो वे स्वयं कथा प्रसंगों में उपस्थित रहे हों।

कथा श्रवण के लिए आये श्रद्धालुओं में आज यमुना पार के किसी गाँव से आये एक ब्राह्मण भी उपस्थित हैं। वे मुग्ध भाव से कथा श्रवण कर रहे हैं। परन्तु बार-बार उनका ध्यान कथा प्रसंगों से हटकर तुलसीदास की ओर चला जाता है। तुलसी में उन्हें अपनी पुत्री के योग्य वर होने के सभी गुण दिखायी पड़ते हैं।

कुछ लोगों को साथ लेकर वे तुलसीदास से मिले और उन्हें अपनी पुत्री से परिणय का अनुरोध किया। परन्तु तुलसी ने अस्वीकार कर दिया। वे सांसारिक प्रलोभनों में फँसना नहीं चाहते थे। परन्तु होनी अत्यन्त प्रबल थी।

स्वयं ज्योतिष का ज्ञान होने के कारण तुलसीदास कई बार अपने विषय में अध्ययन कर चुके थे। जिनमें उन्हें हर बार कुछ समय तक गृहस्थ जीवन व्यतीत करने और तत्पश्चात उच्च कोटि का वैराग्य सिद्ध होने के पूर्व संकेत मिलते रहे थे।

तुलसी के सहमति देते ही ज्येष्ठ शुक्ल 13 संवत 1583, गुरूवार को शुभ मुहूर्त में उनका विवाह रत्नावली नाम की अतीव सुन्दर, सुशील, धर्मपरायण एवं विदुषी कन्या से हो गया।

(सात)

पंडित तुलसीदास शास्त्री का रत्नावली से विवाह हुए लगभग चार वर्ष हो गये। गृहस्थी के निर्वाह के लिए वे कथा बाँचते और ज्योतिष का कार्य करते हैं। समय बीतने के साथ-साथ तुलसीदास का रत्नावली के प्रति प्रेम शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की भाँति बढ़ता ही जा रहा था। रत्नावली के सौंदर्य और गुणों पर अत्यधिक आसक्ति के कारण तुलसीदास विवाह से पूर्व जितना समय ध्यान, योग और राम चरणों में लगाते थे सब छूट गया है।

तुलसी के सहमति देते ही ज्येष्ठ शुक्ल 13 संवत 1583, गुरूवार को शुभ मुहूर्त में उनका विवाह हो गया। रत्नावली जब भी जाना चाहती तो तुलसीदास स्वयं उसे रोक लेते थे। परन्तु होनी को कुछ और ही मंजूर था। जब तुलसी दोबारा कथा करने के लिए बाहर गये, रत्नावली अपने पीहर चली गयी।

(आठ)

राजापुर पहुँचते-पहुँचते रात्रि हो गयी। आकाश में घिरे श्याम वर्णी मेघों के मध्य रह-रह कर दामिनी चमक रही थी। तीव्र स्वर के साथ एक दूसरे से टकराते मेघों के मध्य चमकने वाली विद्युत एक विचित्र सा कम्पन उत्पन्न कर रही थी। गाँव पहुँच कर तुलसी विचलित हो गये। इतने दिनों के प्रवास के बाद आज यदि वह घर लौटे भी तो रत्ना उनकी अनुमति के बिना ही मायके चली गयी।

अनन्यमनस्क तुलसी इधर उधर टहलने लगे। बार-बार मन को समझाते परन्तु मन का विचलन जाता न था। कई बार सोने का उपक्रम करते परन्तु फिर-फिर उठ कर बैठ जाते।

इसी प्रकार व्यग्रता में रात्रि बीतने लगी। तुलसी ने विचारा कि ससुराल कौन सी दूर है? यमुना पार करते ही अगले गाँव में रत्ना का घर है। कुछ ही समय में पहुँच जायेंगे।

तीव्र वर्षा और हवा के झोंकों से तुलसी के पग रह-रह कर इधर-उधर पड़ने लगते हैं। वस्त्र गीले हो कर शरीर से चिपक गये हैं। ऐसे भयावह मौसम की अर्धरात्रि में तुलसी यमुना की ओर बढ़ते जा रहे हैं। घाट पर पहुँच एक डोंगी वाले को बड़ी कठिनाई से यमुना पार कराने को तैयार किया। वर्षा तीव्र होती जा रही थी। कई बार डोंगी उलटते-उलटते बची।

डोंगी पार लगते ही नाविक को यथोचित धन देकर तुलसी ससुराल की ओर चल दिये। द्वार पर पहुँच काफी देर तक खटखटाने के पश्चात द्वार खुला। इतनी रात गये ऐसे मौसम में भीगे वस्त्रों में लिपटे पति को सामने देख रत्ना हतप्रभ रह गयी।

"स्वामी! इस अर्द्धरात्रि में आप यहाँ?" "पहले वस्त्र बदल लूँ फिर बताता हूँ।" भीगे वस्त्र बदलते हुए तुलसी बोले — "तुम जानती हो रत्ना! मैं तुम्हें देखे बिना क्षण भर भी नहीं रह सकता।"

रत्नावली विदुषी महिला थीं। प्रिय के प्रेम को पहचान गयीं। बोली — "इतनी रात्रि में उफनती हुयी यमुना को पार कर अपने जीवन को दाँव पर लगाने का कारण मुझसे प्रेम है या कुछ और?" रत्नावली उलाहना देते हुए बोली — "सत्य तो यह है कि आपकी आसक्ति मुझ में नहीं। जीव में बसे राम में नहीं वरन् मेरी अस्थि, चर्म, रक्त और माँस से निर्मित इस देह में है —

अस्थि चर्म मय देह यह, ता पर जितनी प्रीति।
तिसु आधी जो राम प्रति, अवशि मिटे भव भीति।।

रत्ना की बातें बाण की भाँति तुलसी के हृदय में लगीं। तुलसी गहरे विचार में डूब गये। काफी देर तक तुलसी शान्त बैठे रहे।

"नहीं रत्ना! रूठा नहीं!" तुलसी के गंभीर स्वर जैसे किसी गहरे कुएँ से निकल रहा था — "सोच रहा हूँ तुम्हारे माध्यम से मुझे स्वयं सरस्वती ने जो ज्ञान दिया है वह वेद और शास्त्र सम्मत ही है। मैं इसी क्षण तुम्हें अपना गुरू मानता हूँ।" "मेरा अपमान न कीजिए।" रत्नावली का कंठ भर आया। "नहीं रत्ना! यह तुम्हारा अपमान नहीं। तुम्हारे भीतर बैठे राम ने मुझे पतन से बचा लिया। मैं तुम्हारा यह उपकार जीवन भर नहीं भूलूँगा। मैं तुम्हें अपना गुरू मानता हूँ।" तुलसी गंभीर थे।

(नौ)

रात्रि काफी बीत चली है। तुलसीदास विचारमग्न हैं। मन में दूर-दूर तक शान्ति नहीं है। तुलसी जान गये कि सांसारिक विषयों और राम में से किसी एक को चुनने का समय आ गया है। अब तक इतनी आयु व्यर्थ ही नष्ट हो गयी। परन्तु अब शेष नहीं होने दूँगा। श्रीराम की कृपा से संसार रूपी रात्रि बीत गयी है। अब जागने पर माया का बिछौना नहीं बिछाऊँगा —

"अब लौं नसानी, अब न नसैहों।"
राम कृपा भव निसा सिरानी, जागे फिर न डसैहों।।
पायों नाम चारू चिन्ता मनि, उर कर ते न खसैहों।
स्याम रूप सुचि रूचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहों।।
परबस जानि हँस्यो इन इन्द्रिन निज बस हवै न हसैहों।
मन मधुकर पनकैं तुलसी, रघुपति कमल बसैहों।।

तुलसी के मन में उठ रहा बवन्डर समय बीतने के साथ-साथ प्रचण्ड होता जा रहा था। तुलसी ने ठान लिया — जब तक मैं इन इन्द्रियों के वश में रहा उन्होंने मनमाना नाच नचाया मेरी बड़ी हँसी उड़वायी परन्तु अब मैं ऐसा नहीं होने दूँगा। मन के जहाज को अब गंतव्य तक पहुँचा कर ही रहूँगा।

मन के भावों को किनारे लगा तुलसी सो रही पत्नी के समीप पहुँचे। तुलसी उसका मुख निहारने लगे, परन्तु अब उनकी दृष्टि में आसक्ति नहीं केवल श्रद्धा थी। दबे पाँव तुलसी ने पत्नी के चरणों के पास पहुँच शिष्यवत् प्रणाम किया। रत्नावली के मुख पर अन्तिम बार दृष्टि डाल तुलसी बाहर निकल आये।

चलते-चलते रात्रि बीत गयी। रह-रहकर भटकाव भरे विचार एक के बाद एक आ कर मन को मथते जा रहे हैं। बाल्यावस्था से अब तक के जीवन को एक क्रम में जोड़कर देखते हैं। तो दुःखों के अतिरिक्त कुछ नहीं दीखता।

(दस)

भूख लगने पर किसी से कुछ माँग कर खा लिया और प्यास लगने पर किसी बावड़ी, तालाब से पानी पीकर तुलसी इधर-उधर सो जाते। इस प्रकार चलते-चलते तुलसी तीर्थराज प्रयाग आ पहुँचे। प्रयाग पहुँच तुलसी ने गृहस्थ वेष त्याग विरक्त वेष अपना लिया।

करे एक रघुनाथ संग, बाँध जटा सिर केश।
हम तो चाखा प्रेम रस, पत्नी के उपदेश।।

कुछ समय तक प्रयाग में रहकर तुलसी तीर्थाटन का निश्चय कर निकल पड़े। तीर्थों में घूमते-घूमते 'मानसरोवर' जा पहुँचे। वहाँ काकभुशुण्डि जी के दर्शन कर लौटते हुये तीर्थों में होते हुए तुलसी शिव नगर-काशी-आ पहुँचे।

तुलसी का काफी समय अब राम के ध्यान में बीतता है। जब अधिक विचलित हो जाते तो हाथ जोड़ हनुमान जी से विनती करने लगते — "हे संकट मोचक! हे हनुमान जी! मैं आपकी शरण में हूँ। राम भक्ति में बाधक बनने वाले इन विकारों को मुझसे दूर रखें प्रभु!" समय बीतता रहा। तुलसी की भक्ति दृढ़ होती रही। वैराग्य पुष्ट होता रहा। पवनपुत्र की निष्काम सेवा ने उन्हें दिशा दिखायी। कुछ समय पश्चात हनुमान जी ने उन्हें साक्षात् दर्शन दिये।

हनुमान जी के दर्शनों से कृतकृत्य तुलसी ने उनसे श्रीराम दर्शन कराने की प्रार्थना की। हनुमान जी ने उन्हें चित्रकूट चलने के लिए कहा। राम-राम जपते तुलसी चित्रकूट पहुँचे। चित्रकूट की पर्वत मालायें, सघन वन प्रदेश और मन्दाकिनी की पवित्र धारा और शान्त वातावरण में तुलसी को राम भक्ति दृढ़ करने का पर्याप्त अवसर मिला।

(ग्यारह)

तुलसी अब अपने मन की सीमा-रेखा खींच चुके थे। हनुमान जी के दर्शनों के पश्चात रही सही कामनायें भी निस्तेज हो चली थीं। राम को पाने की चाह दृढ़ होती रही। एक दिन तुलसीदास परिक्रमा के लिए जा रहे थे तभी उन्हें मार्ग में दो राजकुमार दिखायी दिये। अति सुन्दर लग रहे दोनों राजकुमार घोड़ों पर सवार होकर वन में आखेट के लिए जा रहे थे। उनकी सुन्दरता ने तुलसी का मन मोह लिया। परन्तु तुलसीदास सोचने लगे कि वन प्रदेश में ऐसे राजकुमार तो प्रायः घूमते ही रहते हैं।

सोचते हुए तुलसी आगे बढ़ते जा रहे हैं कि तभी उनके सम्मुख हनुमान जी प्रकट हुए — "क्यों तुलसीदास जी हो गये राम दर्शन? अब तो आप सन्तुष्ट हैं ना?" तुलसीदास ने हनुमान जी को प्रणाम कर विस्मयपूर्वक पूछा — "कब गुरुदेव?" "दो घोड़ों पर सवार राजकुमार जो अभी आपके सामने से निकले वही तो प्रभु थे। लखनलाल के साथ।" हनुमान जी बोले।

"क्या? वे प्रभु थे?" तुलसी घबरा कर बोले — "मैंने तो उन्हें साधारण राजकुमार समझा था। मैं उन्हें पहचान ही नहीं पाया।" हनुमान जी हँसकर बोले — "यह कलिकाल है तुलसी जी! प्रभु साक्षात् दर्शन किसी को नहीं देते।" तुलसीदास बाबा घबरा उठे — "नहीं गुरूदेव! एक बार। केवल एक बार पुनः कृपा करें।" तुलसीदास की विनय को दयानिधान हनुमान जी टाल न सके — "ठीक है, अब आप रामघाट पर पधारें और वहाँ प्रतीक्षा करें। वहीं पर किसी समय प्रभु अवश्य कृपा करेंगे।"

हनुमान जी को प्रणाम कर तुलसीदास मन्दाकिनी तट पर बने रामघाट पर आ गये। समय बीतने के साथ-साथ तुलसी बाबा के मन में राम दरश की चाह भी बढ़ती जा रही है। व्यग्रता बढ़ जाती है तो गाने लगते हैं —

लोचन रहे बैरी होय!
कर्म हीनहि पाई हीरा दियो पल में खोय।
तुलसीदास जु, राम बिछुरे, कहो कैसी होय।।

(ग्यारह — मौनी अमावस्या — रामघाट पर राम दर्शन)

मन्दाकिनी तट पर बने रामघाट पर एक वृक्ष के नीचे राम-राम जपते हुये तुलसीदास चन्दन घिस रहे हैं। मौनी अमावस होने के कारण घाट पर बहुत भीड़ है। जब से साँवले राजकुमारों के दर्शन हुए हैं, तभी से तुलसी की राम जी के दर्शन पाने की अभिलाषा निरन्तर बढ़ती चली जा रही है।

जिस वृक्ष के नीचे तुलसीदास बैठे हैं उनके ऊपर हनुमान जी शुक (तोते) के रूप में आ पहुँचे हैं। वे चाहते हैं कम से कम आज तो तुलसीदास जी को धोखा न हो, इसीलिए वे सुअवसर देख प्रभु का भेद बताने आ पहुँचे।

"बाबा! थोड़ा सा चन्दन हमें भी देंगे?" किसी बालक का मधु से भी मीठा स्वर सुन तुलसी बाबा ने शीश उठाकर देखा तो किशोर वय के दो बालक दिखायी दिये। "क्यों नहीं मेरे नन्हें प्रभुओं! अवश्य लीजिए।" तुलसी बाबा की दृष्टि उन राजकुमारों के रूप से हटती न थी। आयु में बड़े दिखायी देने वाले किशोर ने बाबा के हाथ से चन्दन की कटोरी ले ली। दोनों किशोर अपने मस्तक पर तिलक लगाते हैं।

"बाबा! आप सबको तिलक लगाते हैं, हम आपको तिलक लगा दें?" बड़े दिखायी देने वाले उस किशोर ने मधुर स्वर में पूँछा। "हाँ-हाँ, क्यों नहीं।" तुलसी बोल उठे। बालक तुलसी दास को तब तक चन्दन लगा देता है।

तुलसीदास कहीं पुनः अवसर न चूक जायें, इसीलिए वृक्ष पर शुक रूप में विराजमान हनुमान जी बोल उठे —

'चित्रकूट के घाट पर भई सन्तन की भीर।
तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुवीर।।'

तुलसीदास अवाक!! "तिलक देत रघुवीर??" तुलसी बाबा चौंक कर जब तक वृक्ष की ओर देखते तब तक हैं, दोनों किशोर अन्तर्ध्यान हो जाते हैं। हनुमान जी प्रकट हो कर पूछते हैं — "अब तो सन्तुष्ट हैं बाबा? हो गये दर्शन?" तुलसीदास नतमस्तक थे — "यह केवल आपकी कृपा से ही संभव हुआ है, गुरूदेव! परन्तु मुझे छद्म नहीं साक्षात् दर्शन चाहिए।" "वह भी हो जायेंगे। धैर्य रखिये और प्रभु को स्मरण कीजिए।" कह कर हनुमान जी अन्तर्ध्यान हो गये।

संवत् 1628 — तुलसी बाबा अपनी कुटिया में बैठे भजन कर रहे हैं। तभी हनुमान जी उन्हें दर्शन देते हैं। प्रणाम करने के बाद बाबा ने उनसे सेवा पूँछी तो हनुमान जी बोले — "जब श्रीराम अपनी लीला का संवरण कर अपने धाम जा रहे थे तो अवध की सारी प्रजा को अपने साथ ले गये। यहाँ तक कि सीता जी की निन्दा करने वाले धोबी को भी। अपने भक्त की कलियुग में रक्षा करने और अयोध्या की देखभाल के लिए मुझे छोड़ गये। जब मैंने उनके बिना धरती पर रहने का आधार माँगा तो अपनी कथा को श्रवण, चिन्तन और मनन करने को ही प्रभु ने मुझे आधार बनाने का आदेश दिया। अब तक तो मैं रामकथाओं के माध्यम से पृथ्वी पर टिका हुआ हूँ परन्तु अब कलिकाल के बढ़ते प्रभाव से देव भाषा संस्कृत को जानने वाले कम हो गये हैं, जिसके कारण कथा के आयोजनों में भी जनरूचि घटती जा रही है। और मैं रामकथा के बिना नहीं रह सकता।"

"गुरूदेव मैं इसमें आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?" तुलसीदास ने पूछा। "आप केवल इतना करें कि संस्कृत भाषा में छपी हुयी रामकथा को लोक व्यवहार में बोली जाने वाली भाषा में रच दें।" हनुमान जी बोले — "ताकि सभी लोग सरलता से रामचरित्र को जान सकें और उन चरित्रों को अपने व्यवहार में लाकर अपना यह लोक तथा परलोक सुधार सकें। इन कथाओं के माध्यम से मुझे भी पृथ्वी पर टिके रहने का आधार मिला रहेगा।"

"किन्तु गुरूदेव! आपकी सहायता और कृपा के बिना यह गुरुतर कार्य संभव नहीं हो सकेगा।" तुलसी बाबा ने निवेदन किया। "उसके लिए मैं सदैव प्रस्तुत रहूँगा। आप अभी से सभी रामायणों और ग्रन्थों का अध्ययन प्रारम्भ कर दें जिससे कि समय आने पर रामायण की लोक भाषा में रचना कर सकें।" हनुमान जी बोले। "आपकी आज्ञा शिरोधार्य है गुरूदेव!" हनुमान जी को दण्डवत करते हुये तुलसी बाबा बोले।

समय बीतता रहा। तुलसी बाबा अध्ययनरत हैं। एक दिन रत्नावली भेंट करने आयी। पहले तो उन्होंने भेंट करने से ही मना कर दिया। परन्तु रत्नावली के बार-बार केवल दर्शन करने के आग्रह को टाल न सके। कभी सुन्दरता की परिभाषा को सार्थक करने वाली रत्नावली का मुख अब निस्तेज हो चुका है। पति को देखते ही वर्षों से बँधा धैर्य का बाँध नेत्रों की दीवार तोड़ कर बह निकला। अश्रु थमने का नाम ही नहीं लेते। कंठ भी भर आने से अवरूद्ध हो गया।

तुलसीदास पत्नी की स्थिति से अपरिचित न थे। कोई भी स्त्री पति के बिना कैसे रहती होगी, इसका अनुमान लगाना कठिन न था। रत्ना को सहानुभूति बँधाते हुए तुलसी गंभीर स्वर में बोले — "रत्ना!" रत्नावली ने धीरे से सिर ऊपर उठाया। पति के नेत्रों पर दृष्टि पड़ते ही मन अपनी विकलता को सह न सका। रत्ना की व्यथा सिसकियों में पिघलने लगी। "क्यों आयी हो?" तुलसी ने पूछा। "आश्रय चाहती थी।" रत्ना ने सिसकते हुये उत्तर दिया।

महीनों के परिश्रम से जमाया हुआ तप कहीं रत्ना की स्थिति देख द्रवित न हो जाये, इसलिए तुलसी न चाहते हुये भी कठोर हो गये — "आश्रय राम से माँगो रत्ना। मैं अब गृहस्थ नहीं विरक्त हूँ।" "आप अब भी मुझसे रूष्ट हैं।" रत्ना बोली। "अब इन बातों का कोई अर्थ नहीं रह गया है रत्ना।" तुलसी ने स्वर को भरसक संभालने का प्रयास किया — "मैं तुम्हारा ऋणी हूँ जो तुमने मुझे राम की शरण में भेज दिया। मैं तुम्हारा उपकार आजीवन नहीं भूल सकता।" "ऐसा न कहें और घर चलें।" रत्ना ने प्रार्थना की। "मेरा अब कोई घर नहीं। कोई पत्नी या परिवार नहीं।" तुलसी दृढ़ थे। "तो मुझे आप अपने साथ रख लें।" रत्ना ने निवेदन किया — "मैं आपके जप-तप, वैराग्य में बाधा नहीं बनूँगी।" "यह संभव नहीं रत्ना।" तुलसी अटल थे — "वैरागी के समीप नारी किसी भी रूप में रहे उसका वैराग्य सध नहीं पायेगा।"

काफी देर की मान-मनौवल के बाद भी तुलसी तनिक न पिघले। यद्यपि उनका वैराग्य अभी तक पूर्ण-रूपेण नहीं सधा था परन्तु राम के प्रति निष्ठा उन्हें रत्ना के प्रत्येक अनुरोध को टालने पर विवश कर रही थी। पति को मनाने के सारे प्रयास निष्फल होते देख रत्ना पति को झोली में रखी (सफेद गोपी चन्दन) कपूर आदि वस्तुयें रखते हैं तब स्त्री का त्याग उचित नहीं या मुझको भी इस झोली में डाल दीजिए अथवा विशुद्ध ज्ञान और वैराग्य को धारण कीजिए —

खरिया खरी कपूर सब उचित न पिय तिय त्याग।
कै खरिया मोहि मेलि कै, विमल विवेक विराग।।

"तुमने सही कहा रत्ना!" तुलसी के मुख पर निश्चय भारी चमक उभर आयी। "वैरागी जितना एकाकी रहे उतना ही श्रेष्ठ है। जब वैराग्य ही लक्ष्य है तो इन वस्तुओं के प्रति मोह भी उचित नहीं। लो इसी क्षण यह झोली झण्डा, कपूर, चन्दन सब त्यागता हूँ।" कहते हुये तुलसी ने तत्क्षण सब वहीं फेंक दिया। पति के हठ योग और वैराग्य के प्रति दृढ़ निश्चय को पहचान रत्नावली पति को प्रणाम कर अन्तः लौट गई।

(तेरह — जारी)

हनुमान जी की आज्ञा का पालन करने तुलसी बाबा अयोध्या की ओर चल पड़े। उन दिनों प्रयाग में माघ मेला लगा हुआ था। तुलसीदास जी ने कुछ समय वहीं रुकने का निश्चय किया। माघ पर्व के छह दिन पश्चात एक वट वृक्ष के नीचे उन्हें भारद्वाज और याज्ञवल्कय मुनि के दर्शन हुए। वहाँ उस समय वही रामकथा हो रही थे जो उन्होंने वाराह क्षेत्र में अपने गुरू नरहरि दास से सुनी थी। तुलसीदास जी ने अति श्रद्धापूर्वक कथा श्रवण की।

माघ मेले के समापन के पश्चात तुलसी अयोध्या पहुँचे। अयोध्या में रमललाहे के दर्शनों की इच्छा ले जब वे जन्मभूमि मन्दिर पहुँचे तो वहाँ बनी मस्जिद को देखकर उनकी आत्मा चीत्कार कर उठी। दासता का यह कैसा युग था? जन्मभूमि मन्दिर को तोड़ मुगल आक्रान्ता बाबर ने मस्जिद बना दी थी। सम्पूर्ण आर्यवर्त मुगलों का दास बना हुआ था।

मस्जिद बनने के बाद से ही राम भक्तों को अपने आराध्य की जन्मभूमि के पास भी नहीं जाने दिया जाता था। पूरे भारतवर्ष में रामनवमी श्रद्धा और आनन्दपूर्वक मनायी जाती परन्तु अयोध्या में तो जैसे यह दिन तलवार की धार पर चलकर आता। रामलला को बन्दी देख जन आक्रोश बढ़ने लगता। गाँव-गाँव से रामभक्त एकत्रित हो योजनायें बनाते और मस्जिद पर आक्रमण करते। कितने शत्रु मरते और कितने रामभक्त बलिदान देते इसकी कोई निश्चित गिनती न थी।

तुलसी बाबा की आत्मा चीत्कार कर उठी। उनके मन में यह स्थिति अत्यन्त क्षोभ उत्पन्न कर रही थी। परन्तु विवश थे। जन्मभूमि तक जाते और सिपाहियों द्वारा फटकारने पर चुपचाप लौट आते। प्रभु की जन्मभूमि की यह स्थिति देख बाबा रोने लगते। कुछ समय तक बाबा अयोध्या में कथा बाँचते रहे। कथा में जो अन्न, द्रव्य आ जाता वही जीविका का आधार बनता।

(चौदह — मीराबाई का पत्र)

तुलसी बाबा अपने निवास में भजन कर रहे हैं। एक राजस्थानी ब्राह्मण ने कुटिया में प्रवेश कर उन्हें प्रणाम किया और बताया — "मुझे मेवाड़ से मीराबाई ने आपके पास भेजा है। उन्होंने आपके लिए एक पत्र भेजा है जिसमें सभी बातें लिखी हुयी हैं। मीराबाई राणा साँगा के ज्येष्ठ युवराज भोजराज की राजरानी हैं। बाल्यावस्था से ही श्रीकृष्ण से प्रेम करने के कारण उन्हें अपना पति मान चुकी हैं। इधर कुछ समय से उनके पति तथा परिवार वाले उनकी भक्ति में बाधक बनने लगे हैं। इन बाधाओं से त्रस्त होकर मीराबाई ने आपकी बहुत चर्चा सुन आपको पितृ तुल्य जान आपसे परामर्श माँगा है कि ऐसी स्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए?"

मीराबाई के विषय में तुलसी बाबा जानते थे। मीरा का पत्र पढ़कर बाबा व्यग्र हो उठे। ऐसे भक्त हृदय की प्रभु ऐसी कठिन परीक्षा ले सकते हैं? धन्य हैं मीराबाई कि राज परिवार में जन्म लेकर भी उन्होंने सांसारिक विषयों में मन नहीं लगाया। श्रीकृष्ण की अनन्य भक्तिन मीराबाई पूर्व में अवश्य ही कृष्ण की सखा रहीं होंगी।

संदेश वाहक ब्राह्मण के भोजन और विश्राम की व्यवस्था कर तुलसी बाबा मीराबाई को संदेश लिखने बैठ गये। उन्होंने विनय पत्रिका के पद लिखकर भेजे — "जाके प्रिये न राम वैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही।।" (देखें: विनय पत्रिका पृष्ठ, पद-1) कविता में लिखे संदेश से संतुष्ट हो बाबा ने मीराबाई के भेजे संदेश वाहक को उत्तर ससम्मान विदा किया।

(पन्द्रह — रामनवमी और रामचरितमानस का श्रीगणेश)

होली बीते-बीते तुलसी बाबा ने 'जानकी मंगल' के रूप में एक प्रबन्ध काव्य की रचना पूर्ण कर ली। 'जानकी मंगल' में सीता-राम विवाह का अत्यन्त मधुर, सरस और सजीव वर्णन हुआ।

इधर ज्यों-ज्यों रामनवमी निकट आती जा रही है। त्यों-त्यों अयोध्या में उत्पात की आशंका बढ़ती ही जा रही है। रामभक्तों के दल के दल जन्मभूमि मुक्त कराने के लिए आपनी आहुति देने को तत्पर हैं किसी भी क्षण कुछ भी हो सकता है।

नवरात्रि आते-आते अयोध्या में मेघ तेजी से घुमड़ने लगे। शासन और रामभक्तों के मध्य टकराव की आशंका से इस बार ऐसा लग रहा था कि अवध में या तो बाबरी मस्जिद रहेगी या राम भक्त प्रजा। तुलसी बाबा भगवान से प्रार्थना करने लगे — "प्रभु कब अपने भक्तों की प्रार्थना सुनेंगे? अपने भक्तों को अपने स्वरूप के दर्शन करा दीजिए।"

श्रीराम ने जैसे अपने दास की प्रार्थना को सुन लिया। मुगल शासकों और हिन्दू प्रजा के मध्य टकराव की बातों के मध्य ही नगर में ढिंढ़ोरा पीटा गया कि — "दिल्ली से अकबर का आदेश आया है कि हिन्दू बाबरी मस्जिद में खाली स्थान पर चबूतरा बना कर वहाँ रामनवमी मना सकते हैं।"

सरकारी घोषणा सुनते ही जैसे अवध की प्रजा बावली हो गयी। तुलसी राम के प्रति नत-मस्तक हो गये। उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु गिरने लगे। चारों ओर श्रीराम की जय-जयकार होने लगी।

रामनवमी का दिन आते-आते तुलसी बाबा की व्यग्रता बढ़ने लगी। प्रातः बेला से ही मन में काव्यांकुर फूटने लगे। सब कुछ हनुमान जी के कहे अनुसार हो रहा था। वही रामजन्म का दिन, वही तिथि, नक्षत्र, ग्रह योग। श्री राम प्राकट्य वाले सभी संयोग उस दिन अयोध्या में उपस्थित थे। राम जन्म का समय आते ही श्री गणेश जी, माँ सरस्वती, भगवान शिव-पार्वती और हनुमान जी को स्मरण कर बाबा तुलसी ने श्रीराम चरित मानस का श्रीगणेश किया —

वर्णनामर्थ संघानां, रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्त्तारौ, वन्दे वाणी विनायकौ।।
भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।
याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्ध, स्वान्तः स्थामीश्वरम्।।
जो सुमिरत सिधि होय, गणनायक करिवर वदन।
करउ अनुग्रह सोई, बुद्धि राशि शुभ गुण सदन।।
मूक होइ वाचाल, पंगु चढ़इ गिरिवर गहन।
जासु कृपा सो दयाल, द्रवउ सकल कलिमल दहन।।
मैं पुनि निज गुरू सन सुनी, कथा सो सूकर खेत।
समुझि नहिं तसि बालपन, तब अति रहेऊँ अचेत।।
तदपि कहिं गुरू बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा।
भाषा बद्ध करिबि मैं सोइ। मोरे मन प्रबोध जेहि होई।।

श्रीराम चरितमानस का रचना कार्य तीव्रता से आगे बढ़ रहा है। भोर होते ही दैनन्दिन कार्यों से निवृत्त हो तुलसी बाबा लिखने बैठ जाते। छन्द चौपाइयों, दोहों और श्लोकों की रचना प्रभु कृपा से इतनी सुन्दर होती कि कब भोर से दोपहर और दोपहर से सांझ हो जाती बाबा जान ही नहीं पाते। इधर रामघाट पर कथा वाचन भी चल रहा है। बाबा जो भी रचते राम कथा में सरस कंठ से रामचरण अनुरागी श्रोताओं को बड़ी तन्मयता से सुनाते। बाल काण्ड, अयोध्या काण्ड के पूर्ण होने के पश्चात इस समय तुलसी अरण्यकाण्ड लिख रहे हैं। लिखते समय बाबा के नेत्रों के सम्मुख वन के दृश्य चलायमान हो रहे हैं।

प्रभु राम जनक नन्दनी सीता तथा अनुज लक्ष्मण सहित वन में विचरण कर रहे हैं। यमुना किनारे के गाँवों के निवासी उन्हें देख-देख कर जीवन सार्थक कर रहे हैं। श्रीराम उनसे ऐसे मिल रहे हैं जैसे वे उनके जन्म से परिचित या सम्बन्धी हों। लिखते-लिखते तुलसी अपनी कल्पना में ऐसे डूब जाते हैं कि जैसे वे स्वयं उस स्थान पर उपस्थित हों। अपनी कल्पना में डूबे तुलसी एक छोटे तपस्वी के रूप में, जो मन वचन और कर्म से श्री राम चरण अनुरागी है, प्रभु के सम्मुख पहुँच जाते हैं। आराध्य के दर्शन पाते ही तुलसी भीगे नेत्रों से प्रभु के सम्मुख दण्ड के समान गिर जाते हैं। श्रीराम उन्हें उठाकर अपने हृदय से लगा लेते।

(सोलह — मार्ग शीर्ष शुक्ल पक्ष — सम्वत् 1633)

दो वर्ष सात माह छब्बीस दिन पश्चात आज राम विवाह के दिन श्रीराम चरित मानस के सातों काण्ड पूर्ण हो गये हैं। तुलसी बाबा अत्यन्त प्रसन्न हैं। भक्ति, निष्ठा, वैराग्य और समर्पण का चतुष्टय संगम एक अनुपम काव्य-कृति के रूप में सामने है। किन्तु तुलसीदास जानते हैं कि यह महाकाव्य उनको माध्यम बना स्वयं हनुमान जी ने रचा है। उनकी भूमिका केवल इतनी है कि वे राम जी के दास हैं और हनुमान जी के शिष्य। कुछ समय तक अयोध्या में स्वरचित रामायण की कथाओं के प्रसंग और चौपाइयों दोहों से उन्होंने जन-जन को राममय कर दिया। अपने धन्धों को चोट पहुँचती देख पण्डे उन्हें बार-बार कष्ट देते रहे। कुछ समय बाद त्रस्त तुलसी काशी चले आये।

(सत्रह — काशी में)

काशी में तुलसी बाबा अपने अभिन्न सखा गंगाराम के निवास पर ठहरे। वहीं उनका परिचय टोडरमल से हुआ। टोडरमल गंगापार के कई गाँवों के सम्पन्न, धर्मनिष्ठ जमींदार थे। तुलसी के व्यक्तित्व और काव्य कला से प्रभावित टोडर ने उन्हें अत्यन्त सम्मान दिया। गंगाराम और टोडरमल की सहायता से तुलसी ने काशी में अखाड़ों की स्थापना की। उनका मानना था कि यदि युवा सबल होंगे तो हमारे धर्म की ओर कोई आँख उठाकर देखने का दुस्साहस नहीं कर सकेगा। इन अखाड़ों में हनुमान जी की मूर्तियों की स्थापना की परम्परा भी तुलसी बाबा ने ही प्रचलित की। अनेक स्थान पर श्री रामलीलाओं का आयोजन, मंचन और प्रचलन भी बाबा जी के द्वारा ही हुआ।

इन सब सामाजिक कार्यों के साथ-साथ रामकथा वाचन भी चलता रहा। रामचरित मानस की चौपाईयों, दोहों पर आधारित रामकथा का मधुर, मार्मिक वर्णन तुलसी बाबा को काशी की गली-गली और जन-जन में लोकप्रिय करता चला गया। जन-जन के मानस पटल पर 'मंगल भवन अमंगल हारी' राम की छवि को तुलसी की मधुर, ओजपूर्ण वाणी ने ऐसा अंकित किया कि काशी में चारों ओर रामचरित मानस की गूँज ही सुनायी देने लगी।

'शैवनगरी काशी' में वैष्णव 'राम' की चर्चा पोंगा पंथियों को नहीं सुहायी। उधर तुलसी अपनी रामकथाओं से पंडों के पाखंड को खंडित करते जा रहे थे। शैव, वैष्णव, सगुण, निर्गुण सभी विचार धाराओं और पंथों के खलों ने मिलकर एक स्वर से तुलसी की निंदा करनी प्रारम्भ कर दी। देव भाषा संस्कृत के स्थान पर जन-भाषा हिंदी में रामायण की रचना और उसकी लोकप्रियता से पण्डों के धंधे पर चोट पहुँची थी। सो सब मिलकर प्रयास करने लगे कि कैसे तुलसी और रामायण की प्रतिष्ठा मिटायी जाये? इधर तुलसी की रामकथाओं में जन-जन को राम से जोड़ने का कार्य चल रहा था उधर षड़यन्त्रकारियों के मस्तिष्क में नित नूतन कुचक्र और योजनायें आकार ले रही थीं।

ऐसे ही एक दिन सब षड़यन्त्रकारियों ने मिलकर काशी नरेश के दरबार में एक स्वर से उन्हें तुलसी के विरूद्ध षड़यन्त्र बताया। काशी नरेश ने तुलसीकृत रामायण की प्रति मंगाकर स्वयं देखी परन्तु उसमें धर्म के विरूद्ध कोई बात नहीं दिखायी दी। पण्डों के बार-बार उकसाने पर काशी नरेश ने निर्णय दिया कि उनकी उपस्थिति में भगवान विश्वनाथ के मंदिर में शयन आरती के पश्चात सब वेद, पुराण और शास्त्रों के साथ रामचरित मानस को रख दिया जाये। तत्पश्चात मन्दिर में कोई नहीं रहेगा। दोनों पक्ष मन्दिर के बाहर अपने-अपने लोगों के साथ पहरा देंगे तथा मन्दिर के कपाट बन्द कर चाबी स्वयं नरेश अपने पास रखेंगे। भगवान विश्वनाथ का जो भी निर्णय होगा वह सर्वमान्य होगा।

बाबा विश्वनाथ के मन्दिर में शयन आरती के पश्चात सब ग्रन्थों के साथ रामचरित मानस रख, भगवान शिव से निर्णय देने की प्रार्थना कर ताला बन्द कर दिया गया। चाबी काशी नरेश ने स्वयं अपने पास रखी।

प्रातः होते ही मन्दिर के कपाट खुलने से पूर्व ही तुलसीदास जी तथा विरोधी पक्ष के लोगों सहित अनेक श्रद्धालु भी भगवान शिव के निर्णय को जानने की उत्सुकता के चलते मन्दिर के बाहर एकत्र हो गये। काशी नरेश की उपस्थिति में मन्दिर का द्वारा खोला गया। काशी नरेश आगे बढ़ कर देखा तो हतप्रभ रह गये। रात्रि में जिस रामचरित मानस को सब ग्रन्थों से अलग दूसरे स्थान पर रखा था उसे भोले बाबा ने स्वयं उठाकर सबसे ऊपर विराजमान कर दिया था। काशी नरेश ने भगवान शिव और रामचरित मानस को प्रणाम किया। दो पग आगे बढ़ कर नरेश ने जब रामचरित मानस को उठा कर देखा तो उसके ऊपर तीन शब्दों में भगवान शिव ने जैसे स्वयं हस्ताक्षर कर दिये थे — सत्यं-शिवं-सुन्दरं।

भगवान आशुतोष का निर्णय देख दुष्ट पण्डों के मुख ऐसे विवर्ण हो गये जैसे किसी ने सारा रक्त निचोड़ लिया हो। काशी नरेश, तुलसी बाबा और सभी श्रद्धालु 'हर हर महादेव!' की जय घोष करने लगे। पण्डों को झिड़कते हुये काशी नरेश ने आदेश दिया कि — "जिसके मन में भी शंका हो वह स्वयं देख ले। प्रत्यक्षं किं प्रमाणं! अब तुलसी बाबा अथवा श्री रामचरित मानस के विरोध में कोई स्वर नहीं उठना चाहिए।" सभी श्रद्धालु रामायण तथा तुलसी बाबा की जय-जयकार करने लगे।

(अट्ठारह — मधुसूदन सरस्वती और चोर प्रसंग)

इस घटना के पश्चात भी दुष्टों की कुचालें समाप्त नहीं हुयीं। वे तुलसी और उनकी रामायण को नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहते थे। तभी किसी ने सुझाव दिया कि स्वामी मधुसूदन जी सरस्वती इस समय काशी में सर्वमान्य तथा सबसे प्रतिष्ठित, अद्वैतवाद का समर्थन करने वाले, निर्गुण भक्ति शाखा के विद्वान तथा प्रतिपादक हैं। उनके पास चलकर प्रार्थना की जाये कि तुलसी ने उनके अद्वैतवाद को चुनौती दी है। सगुणराम की उपासना और प्रतिष्ठा से निर्गुण ब्रह्म के विरूद्ध तुलसी जन मानस में भ्रम फैला रहे हैं।

सारा कार्य योजनानुरूप हुआ। स्वामी मधुसूदन सरस्वती को ग्रन्थ और तुलसी के विषय में भड़काने के लिए इस प्रकार के तर्क-वितर्क और कुतर्कों का आश्रय लिया गया कि स्वामी जी ने अन्ततः कह दिया कि वे स्वयं ग्रन्थ का अध्ययन करने के पश्चात ही कोई निर्णय देंगे।

रामचरित मानस की प्रति मंगा स्वामी जी ने अध्ययन प्रारम्भ किया। स्वामी जी जैसे-जैसे रामायण पढ़ते जा रहे हैं वैसे-वैसे पण्डों का झूठ उजागर होता जा रहा है। रामायण में तुलसी ने कहीं भी अद्वैतवाद का विरोध नहीं किया था अपितु वे तो कह रहे थे कि सगुणहिं अगुणहि नहिं कछु भेदा — "अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम वश सगुण सो होई।"

सम्पूर्ण रामायण पढ़ने के पश्चात भी स्वामी जी को शिवत्व से विरोध करते तुलसी कहीं नहीं दिखायी दिये — 'बिनु छल विश्वनाथ पद नेहू। रामभगत कर लच्छन ऐहू।' 'प्रभु समरथ सर्वज्ञ शिव, सकल कला गुण धाम।' केवल इतना ही नहीं वरन् तुलसी तो अपने आराध्य राम से ही कहलवा रहे हैं कि — "संकर भजन बिना नर गति न पावइ मोरि।" "शिवद्रोही मम दास कहावा। सो नर मोहिं सपनेहूँ नहिं भावा।।"

श्रीराम चरितमानस का अध्ययन सम्पन्न करते ही मधुसूदन सरस्वती जी जान गये कि इस दिव्य ग्रन्थ के प्रति काशी के विद्वान कहलाने वाले पण्डों का द्वेषपूर्ण आचरण केवल उनके मोह, मद में अंधे होने के कारण ही है। विद्वान कहलाने वाले इन प्रपंचियों का मिलन अन्तःकरण शुद्ध करने के लिए इस पवित्र ग्रन्थ का अनुमोदन करना उनके लिए नितांत आवश्यक है। अतएव उन्होंने मानस की प्रति पर यह श्लोक लिख दिया —

"आनन्द कानने हयास्मिन् जंगमस्तुलसी तरूः।
कविता मंजरी यस्क, राम भ्रमर भूषिता।।"

इस काशी रूपी आनन्द वन में तुलसीदास तुलसी का चलता फिरता पौधा है। उसकी कविता रूपी मंजरी अत्यन्त सुन्दर है, जिस पर श्रीराम रूपी भँवरा मंडराया करता है।

मधुसूदन सरस्वती जी के मत को भी तुलसी के पक्ष में जाता देख दुष्ट पण्डे बौखला गये। अबकी बार उन लोगों ने रामायण को ही चुरा लेने का निश्चय किया। निधुवा-सिधुवा नाम के दो चोरों को रामायण चुराने भेजा गया। रात्रि होते ही जैसे ही दोनों चोर कुटिया के पास पहुँचे, उन्हें दो किशोर वय राजकुमार कुटिया की पहरेदारी करते दिखायी दिये। पीताम्बर पहने धनुष-बाण हाथ में लिए दोनों किशोर अत्यन्त सुन्दर थे। रात भर उनके कुटिया की चौकीदारी करने के कारण दोनों चोर कुटिया के पास भी न फटक सके। रात भर उचक-उचक कर दोनों चोर किशोर पहरेदारों की सुन्दरता देखते रहे परन्तु चोरी का साहस न जुटा सके। प्रातः होते ही दोनों पहरेदार दिखायी नहीं दिये। चोर उनके दर्शन के लिए बावले हुए जा रहे थे। वे तुलसी बाबा की कुटिया में पहुँचे और उनसे दोनों राजकुमार जैसे दिखने वाले पहरेदारों को दिखाने का आग्रह करने लगे।

बाबा विस्मित होकर बोले — "मैं निर्धन साधु हूँ। मेरे पास ऐसा क्या है जो कोई चुरा लेगा और उसके लिये मुझे पहरेदार रखने पड़े।" उन चोरों ने बाबा से क्षमा माँगते हुए बताया कि वे धन नहीं चुराने आये थे। उन्हें काशी के कुछ पण्डों ने उनकी रामायण चुराने भेजा था। परन्तु उन दोनों पहरेदारों की रात भर कुटिया की रखवाली के कारण वे कुटिया में प्रवेश नहीं कर सके। उन किशोरों के दर्शन से उनकी बुद्धि शुद्ध हो गयी है। अब वे केवल उन पहरेदारों के दर्शन करना चाहते हैं। जैसे भी बन सके बाबा उनके दर्शन करा दें।

तुलसी बाबा जान गये कि अनुज लक्ष्मण के साथ स्वयं प्रभु राम रात भर उनकी कुटिया की पहरेदारी करते रहे। रात भर प्रभु को कितना कष्ट हुआ होगा। उनका अनुमान लगा, बाबा के नेत्र भर आये। बाबा तुलसी चोरों से बोले — "अरे पागलों! जिनके पीछे हमारे जैसे साधु घर-द्वार छोड़कर जगत भर की धूल फाँकते फिरते हैं और फिर भी जिनके दर्शन नहीं हो जाते, वे ही दोनों भाई राम और लक्ष्मण तुम्हें इतनी सरलता से दर्शन दे गये। स्वयं प्रभु रात भर अपने ग्रन्थ की रक्षा करते रहे। उनके दर्शनों के पश्चात कोई भी व्यक्ति पापी नहीं रहता। तभी तो तुम भी बार-बार प्रभु के दर्शन करना चाहते हो। जाओ अब सम्पूर्ण जीवन प्रभु की सेवा में लगाओ।"

दोनों चोर बाबा के चरणों में गिर पड़े। बोले — "बाबा! ऐसा आशीर्वाद दें कि उन युगल किशारे पहरेदारों के अतिरिक्त कोई हमारे मन प्राण में न बस सके।" दोनों चोरों को आशीर्वाद दे बाबा ने विदा किया। प्रभु की कृपा को स्मरण कर बार-बार बाबा के नेत्र सजल हो उठते। "उनके लिए प्रभु को रात भर कितना कष्ट उठाना पड़ा। रात भर प्रभु उनकी पहरेदारी करते रहे और वे आनन्दपूर्वक सोते रहे।"

तुलसी बाबा मानस की रक्षा के लिए चिन्तित हो उठे। अन्ततः उन्होंने अपना सारा सामान लुटा कर मानस को किसी सुरक्षित स्थान पर रखवाने का निश्चय किया। मानस सुरक्षित रहेगी तो प्रभु को भी उनकी पहरेदारी नहीं करनी पड़ेगी। एक भण्डारे का आयोजन कर बाबा ने सब साधु ब्राह्मणों, भिक्षुकों में वितरित कर दिया। अन्न, वस्त्र, द्रव्य और ग्रन्थ सब कुछ बाँट दिया।

(उन्नीस — श्वपच और गौ हत्या प्रसंग)

सामान वितरित करते समय ही बाबा को एक व्यक्ति ने आकर बताया कि एक व्यक्ति बहुत देर से पुकार रहा है। आप उससे एक बार मिल कर उसकी प्रार्थना सुन लें। उस व्यक्ति ने बाबा को प्रणाम कर बताया कि वह अयोध्या का रहने वाला एक श्वपच (डोम — जो दाह संस्कार करते हैं) है। तुलसी बाबा राम के बहुत बड़े भक्त हैं इसलिए वह उनके दर्शन करने चला आया।

तुलसी बाबा ने जैसे ही सुना कि वह व्यक्ति राम भक्त है और उनकी नगरी अयोध्या से आया है बाबा ने उसे भुजाओं में भरकर हृदय से लगा लिया। वह व्यक्ति घबरा कर बोला — "बाबा! आप यह क्या कर रहे हैं? मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि मैं डोम हूँ अस्पृश्य हूँ। मुझे छूकर आप अपवित्र हो जायेंगे।" वहाँ उपस्थित लोग हतप्रभ होकर एक दूसरे का मुख देखने लगे। तुलसी बाबा का व्यवहार उनकी समझ से बाहर था।

"आप अस्पृश्य नहीं, परम पवित्र हैं।" बाबा ने कहा — "भगवान राम की नगरी में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति तो उनका पार्षद होता है फिर आप अपवित्र कैसे हो सकते हैं। प्रभु ने स्वयं शबरी से झूठे बेर खाये, निषाद राज से मित्रता की, गीध का उद्धार किया। उनकी दृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति सम है। आप अस्पृश्य नहीं हैं। आइये इस दुराग्रह को दूर करने के लिए आप मेरे यहाँ भोजन कीजिए फिर वार्ता होगी।"

बाबा ने उसे आसन पर बिठा भोजन कराया। उपस्थिति समुदाय में से कुछ एक लोगों ने विरोध किया तो बाबा बोले —

तुलसी भक्त श्वपच भलो, जपै रैन दिन राम।
ऊँचौ कुल केहि काम को, जहाँ न हरि का नाम।।

उस श्वपच को भोजन करा ससम्मान विदा किया गया। तुलसी के इस कार्य के प्रशंसक कम और आलोचक अधिक निकले। विरोधियों के अत्यन्त निन्दात्मक प्रचार का बाबा लक्ष्य बने। विरोध के स्वर अभी ठण्डे भी न हुए थे कि एक घटना और घट गयी। एक दिन तुलसी दास अपनी कुटिया में कुछ व्यक्तियों के साथ बैठे भजन चर्चा कर रहे थे तभी एक कृशकाय सा व्यक्ति लड़खड़ाता हुआ द्वार के पास आ पहुँचा। काँपते हाथ, सूखे अधर, विवर्ण मुख, निस्तेज आँखें। कोई भी लक्षण उसमें ऐसा नहीं था जो उसे दीनता की प्रतिमा न बनाता हो। संभल कर खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। काँपते स्वर में बोला — "है कोई राम का प्यारा! जो तीन दिन से भूखे इस गौ हत्यारे को राम के नाम पर भोजन करा सके?" क्षीण स्वर में उसने यही गुहार पुनः लगायी।

तुलसी बाबा उठ कर द्वार की ओर भागे। उसकी स्थिति देख बाबा सब जान गये। उनसे रहा न गया। भीतर लाकर उस व्यक्ति के हाथ पैर धुलाकर उसे भोजन कराने के लिए अपने पास बैठा लिया। उपस्थित लोगों में से कुछ न विरोध किया तो बाबा बोले — "पहले इसे भोजन करें, फिर इस महाअपराध का कारण पूछेंगे।"

भोजन कराकर बाबा ने उससे इस अपराध का कारण पूछा तो वह बोला कि अनजाने में उसके हाथों से चोट लगने से एक गाय की मृत्यु हो गयी जिसके कारण समाज तथा ब्राह्मणों ने उसे गाँव और समाज से बहिष्कृत कर दिया। तीन दिन से वह भूखा फिर रहा है। किसी ने रोटी का एक टुकड़ा तक नहीं दिया। बाबा ने अब भोजन कराकर उसकी प्राण रक्षा की।

उपस्थित लोगों ने तुलसी की इस बात के लिए अत्यन्त निंदा की कि ब्राह्मणों द्वारा समाज से बहिष्कृत व्यक्ति को अपने यहाँ भोजन कराकर उन्होंने न केवल अपराध किया है वरन् उसके चरण धोकर वर्ण व्यवस्था का अपमान किया है। तुलसी बाबा बोले — "संसार में जहाँ पाप संभव है वहाँ उसका प्रायश्चित भी उपलब्ध है। भूल हो जाना एक स्वाभाविक बात है परन्तु उसे स्वीकार कर पुनः भूल से बचना ही मनुष्य में उच्च गुणों के होने का लक्षण है। इस व्यक्ति से अपराध हुआ, यह स्वीकारता है; पुनः ऐसा न करने का संकल्प भी लेता है तो फिर यह पापी कहाँ रह जाता है।" नारद पाँचरात्रग्रन्थ के सनत्कुमार संहिता में लिखा है —

श्री रामेति परं जाप्यं तारकं ब्रह्म संज्ञकम्।
ब्रह्म हत्यादि पापध्निमति वेद विदो विदुः।

इसके अतिरिक्त श्रीमद् भगवत महापुराण, जो सब वेदों शास्त्रों और पुराणों का सार मानी जाती है, उसके अजामिलोपाख्यान प्रसंग में लिखा है कि समस्त प्रकार के पापों का आचरण करने वाला प्राणी भी यदि भगवन्नाम का आश्रय ले तो उसके समस्त पापों का प्रायश्चित हो जाता है। बाबा के प्रमाणित तर्कों से उपस्थित समुदाय शान्त हो गया। परन्तु बाबा के विरोधियों को इस घटना से बहुत बल मिला। बाबा के विरूद्ध उनके षड़यन्त्रों की भूमिका में यह घटनायें होम में घृत का कार्य करने लगीं।

(उन्नीस — जारी — वैष्णव मठ और गोस्वामी पद)

तुलसी बाबा के पुराने मित्र गंगाराम ज्योतिषी एक दिन टोडरमल के साथ बाबा के पास पहुँचे और निवेदन किया कि काशी में ही एक वैष्णव मठ है जिसके गोंसाईं जी स्वर्गवासी हो गये हैं। अब उनके लोभी शिष्यों में गोस्वामी पद के लिए झगड़ा होता रहता है। अब या तो वहाँ कोई योग्य व्यक्ति पद संभाले अथवा मठ को बन्द कर दिया जाये। गंगाराम और टोडर का विचार है कि आप वहाँ के गोस्वामी का पद संभालें। वहाँ के निवासी भी ऐसा ही चाहते हैं।

विरक्त तुलसी पुनः सांसारिक प्रलोभनों में नहीं फंसना चाहते थे। धन, यश, मान और वैभव की प्राप्ति के लिए काशी के मठों में होने वाली वर्चस्व की लड़ाई के समाचारों से बाबा अनभिज्ञ न थे। उन्होंने अस्वीकार कर दिया। गंगाराम और टोडर ने अनेक बार अनुनय-विनय की। तुलसी दोनों का अत्यधिक सम्मान करते थे। उनका कहना टाल न सके। अंततः एक शुभ मुहूर्त में तुलसी दास दाढ़ी, मूँछ, केश मुंडा कर उस मठ के गोस्वामी बन गये। गोस्वामी तुलसीदास।

गोस्वामी जी के आने के पश्चात उस मठ की न केवल आय बढ़ गयी अपितु व्यवस्था भी सुधर गयी। यद्यपि उस वैष्णव मठ में भगवान कृष्ण के विग्रह की पूजा होती थी। परन्तु गोस्वामी जी जानते थे कि श्रीकृष्ण राम का ही अवतार हैं उनमें कोई भेद नहीं। जिस प्रकार उनके लिए शिव और राम वस्तुतः एक ही थे ऐसा ही वे राम और कृष्ण को मानते थे। समय बीता रहा, गोस्वामी जी के सिर और गालों पर उस्तरा फिरता रहा परन्तु उनका मन इन बाहरी क्रियाओं और आडम्बरों से निरासक्त रह राम को साधने में ही सधता रहा। कथा कीर्तन आयोजन चलते रहे।

(बीस — सती विधवा और अकबर प्रसंग)

एक दिन रत्नावली उनसे मिलने मठ में आयीं। गोस्वामी जी ने उनके कुछ दिन तक मठ में ठहरने की व्यवस्था करा दी। रत्नावली काशी में ही रुकना चाहती थीं, परन्तु गोस्वामी जी ने स्वीकृति नहीं दी। रत्नावली बोली — "मैं आपके भजन में बाधा नहीं बनूँगी। काशी में ही कहीं अलग घर में रह लूँगी।" गोस्वामी जी बोले — "देवी यह समय अब पूर्ववत नहीं रहा। लोक धर्म निभाना अत्यन्त कठिन हो गया है। उचित यही होगा कि तुम घर लौट जाओ।" रत्नावली ने गिड़गिड़ाते हुए पुनः आग्रह किया — "मैं आपके ईष्ट साधन में बाधा नहीं बनूँगी। आपकी इच्छा के बिना इस मठ में भी नहीं आऊँगी।" गोस्वामी जी ने दृढ़तापूर्वक शान्त स्वर में कहा — "नहीं! व्यर्थ निंदा से बचने के लिए तुम्हारा यहाँ से जाना अवश्यसंभावी है। अब इस जीवन में हमारा मिलना या साथ रह पाना असंभव है।"

गोस्वामी जी के निर्णय से रत्नावली का कंठ अवरुद्ध हो गया। भीगे नेत्रों से अश्रुकण गिरने लगे। रुंधे कंठ से बोली — "जैसी आपकी आज्ञा! परन्तु एक बात अवश्य जानना चाहती हूँ।" "पूछो!" गोस्वामी जी ने अनुमति दी। "मैंने रामचरितमानस पढ़ी है। अत्यन्त सुन्दर रचना है। परन्तु इस पावन ग्रन्थ के उत्तरकाण्ड में आपने धोबी के निंदा करने पर श्रीराम द्वारा सीता जी के त्याग का प्रसंग क्यों नहीं लिखा?" रत्ना ने पूछा।

गोस्वामी जी चुप रह गये। रत्नावली के प्रति किये अपने व्यवहार से उनके मन में एक अपराध बोध सा उत्पन्न हो उठा। कुछ क्षण चुप रहने के पश्चात तुलसी भावुक स्वर में बोले — "सत्य कहूँ रत्ना! जो अपराध मैंने तुम्हारे प्रति किया है और उससे तुम्हें जो अहित हुआ है वह स्वयं में अक्षम्य है। अनन्त करुणा सिन्धु मेरे राम जगदजननी सीता के प्रति ऐसा अन्याय नहीं कर सकते थे।"

पति की इस बात पर रत्नावली सिसक उठी। उनके मन में आज तक अपने व्यवहार पर इतनी ग्लानि भरी हुयी है। यह जानकर रत्नावली पति के प्रति नतमस्तक हो उठी। चलते समय पति के चरणों में प्रणाम करती हुयी बोली — "एक भिक्षा मुझे देंगे स्वामी!" "कहो देवी!" गोस्वामी जी बोले। "मेरी मृत्यु से पूर्व एक बार दर्शन देने अवश्य आयेंगे।" रत्ना ने प्रार्थना के स्वर में कहा। "वचन देता हूँ! अवश्य आऊँगा।" तुलसी बोले।

प्रणाम कर रत्नावली चली गयी। रत्नावली का कुछ दिन के लिए आना ही नहीं उनका जाना भी गोस्वामी जी के विरोधियों को पचा पाना कठिन हो गया। वे मानने लगे कि पत्नी का त्याग करके गोस्वामी जी ने अन्य गृहस्थ गोस्वामियों की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचाया है।

गोस्वामी जी अब पूर्णतया स्वतन्त्र थे। कथा-कीर्तन करना, स्थान-स्थान पर अखाड़ों का निर्माण और व्यवस्था, अखाड़ों में हनुमान जी की मूर्तियों की प्रतिष्ठा के साथ-साथ गोस्वामी जी ने ध्रुव और प्रहलाद लीला का भी मंचन आरम्भ करवाया। उन्होंने रामलीलाओं के प्रचलन और मंचन से शिवनगरी काशी को राममय कर दिया।

एक दिन गोस्वामी जी कहीं जा रहे थे। उसी मार्ग पर सामने से एक शवयात्रा आ रही थी। शवयात्रा में चल रहे लोगों के पीछे-पीछे शृंगार किये, हाथ में नारियल लिए एक स्त्री चल रही थी। वह मृतक की पत्नी थी जो उसके साथ ही सती होने जा रही थी। मार्ग में गोस्वामी जी को देखकर उसने सोचा दुर्भाग्य में भी कैसा सौभाग्य है। समाप्त होने जा रहे जीवन को सन्त शिरोमणि तुलसी बाबा के दर्शन हुये। कुछ ऐसा ही सोचकर वह श्रद्धापूर्वक गोस्वामी जी के चरणों में प्रणाम करने बढ़ी।

"अखण्ड सौभाग्यवती होओ पुत्री।" — बाबा ने आशीर्वाद दिया। सती होने जा रही उस विधवा ने आश्चर्य चकित होकर तुलसी बाबा को देखा। बाबा से बोली — "यह जो शव यात्रा जा रही है, मेरे पति की है। मैं इसके साथ सती होने जा रही हूँ और आप मुझे अखण्ड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे रहे हैं बाबा?" "क्या?" बाबा चकित रह गये। प्रभु की यह कैसी लीला थी जो ऐसा आशीर्वाद उनके मुख से निकल गया। कौतुहल वश शव यात्रा रोक दी गयी।

विधवा बोली — "बाबा! आप तो 'कहिह सत्य प्रिय वचन विचारी' के उद्घोषक रहे हैं। फिर यह आपने कैसा आशीर्वाद मुझे दिया?" तुलसी बाबा बोले — "राम पर विश्वास रखो बेटी! मेरे मुख से असत्य वचन कभी नहीं निकला है। मेरे राम कभी मेरे लिए झूठे नहीं सिद्ध हुये हैं। आज इस आशीर्वाद के पीछे अवश्य ही प्रभु की कोई लीला छिपी हुयी है। आओ! सब मिलकर राम नाम जपें।"

सब लोगों ने शव के पास बैठ राम-नाम जपना आरम्भ कर दिया। तुलसी बाबा ने प्रभु से अपने सेवक के वचन की मर्यादा निभाने का निवेदन किया। बाबा मृतक के सिर पर हाथ फेरने लगे। कुछ क्षण बाद मृतक उठ बैठा। लोग आश्चर्य में डूब गये। श्रीराम के साथ-साथ तुलसी की भी जय जयकार होने लगी। राम-नाम का महत्व और महिमा समझाकर बाबा ने उस स्त्री और उसके पति को शेष जीवन राम चरणों में अर्पित करने की प्रेरणा दी।

इस घटना से गोस्वामी जी की लोकप्रियता अत्यन्त बढ़ गयी। उनका यश दिल्ली में बादशाह अकबर तक पहुँच गया। अकबर ने ऐसे चमत्कारी सन्त को देखने की इच्छा व्यक्त की। गोस्वामी जी को दिल्ली बुलवाया गया। गोस्वामी जी काशी से वृन्दावन धाम में बाँके बिहारी के दर्शन कर दिल्ली पहुँचे। अकबर ने उन्हें कोई चमत्कार दिखाने को कहा। गोस्वामी जी ने बताया कि वे एक साधारण सन्त हैं कोई चमत्कारी व्यक्ति नहीं हैं। वे तो राम के एक दास मात्र हैं और चमत्कार तो केवल राम ही दिखा सकते हैं।

अकबर को विश्वास न हुआ। वह चमत्कार दिखाने का हठ करने लगा। गोस्वामी जी चमत्कारी व्यक्ति तो वे नहीं, सो सविनय मना कर दिया। क्रुद्ध होकर अकबर ने उन्हें बन्दी बना लिया। गोस्वामी जी को बन्दी बनाने का समाचार जंगल की आग की तरह फैल गया। चारों ओर हाहाकार मच गया। अकबर के इस कृत्य की निंदा होने लगी। काशी में तो गोस्वामी जी के द्वारा स्थापित अखाड़ों के युवकों ने विद्रोह भी कर दिया।

इधर बन्दीगृह में पड़े तुलसी ने संकट मोचक हनुमान जी को स्मरण किया। हनुमान जी तुलसी बाबा को सदैव सिद्ध थे। आज भी प्रकट होकर उन्हें निश्चन्त किया और अकबर को ऐसा चमत्कार दिखाने का वचन दिया कि उसके बाद अकबर जीवन भर चमत्कार का नाम भी नहीं लेगा।

रात्रि होते ही असंख्य वानरों ने सारे नगर को घेर लिया। जहाँ दृष्टि जाती उधर वानर दिखायी पड़ते। अकबर के महल में तो वानर किसी को कहीं आने जाने ही नहीं दे रहे थे। अकबर के शयन कक्ष और स्त्रियों के कक्षों में वानरों ने ऐसा उत्पात मचाया कि अकबर त्राहिमाम कर उठा। सारी बात समझ में आने पर अकबर दौड़ा-दौड़ा कारागार में गया और गोस्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा। उन्हें स्वतन्त्र कर बारबार क्षमा माँगी। गोस्वामी जी ने उसे पुनः किसी सन्त को कष्ट न देने को कहा। अकबर ने गोस्वामी जी को अपने दरबार में ही रूकने और प्रतिवर्ष दो लाख रूपये का पट्टा (आय) लिखने का प्रलोभन दिया। परन्तु अध्यात्म पथ के पथिक, अवध-काशी जैसे स्थानों पर रहने वाले वीतरागी तुलसी रामभक्ति के सम्मुख बड़े से बड़ा प्रलोभन भी कैसे स्वीकार कर सकते थे। सो अकबर से बोले —

'हम चाकर रघुवीर के, पट्टो लिख्यो दरबार।
तुलसी अब क्या होंयेंगे, नर के मनसबदार।।'

(इक्कीस — विनय पत्रिका और हनुमान बाहुक)

तुलसी बाबा की बढ़ती प्रतिष्ठा काशी के अनेक विद्वानों को सहन नहीं हुयी। बार-बार भाँति-भाँति के षड़यन्त्रों से वे तुलसी बाबा को दुखी किये रहते। गोस्वामी जी त्रस्त होकर महादेव से प्रार्थना करने लगे — "हे महादेव जी! मैं आपकी पुरी में रहकर श्रीगंगा जी का सेवन करता हूँ। राम-नाम पर माँग पर पेट भरता हूँ। न किसी से कुछ लेता हूँ और न ही किसी को कुछ देने योग्य हूँ। यदि किसी की भलाई न हो सके तो किसी की बुराई भी नहीं करता। यदि कोई मुझसे दुर्व्यवहार करता है तो उसका बल-प्रयोग मैं आपसी दीन होकर कह देता हूँ। दिन में मुझे ठगों के धक्के खाने पड़ते हैं और रात्रि चोर सताते हैं। अतएव हे शंकर जी! अपनी कृपा दृष्टि की ओर से मेरी ओर देख कर अपनी काशीपुरी में इनसे मेरी रक्षा कीजिए —

"बासर ठासनि के ढका रजनी चहुँ दिसि चोर।
संकर निज पुर राखिये, चिताई सुलोचन कोर।"

गोस्वामी जी की प्रार्थना सुन भगवान शिव की प्रेरणा पा हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिये। तुलसी बाबा की दीनता देख गुरुदेव हनुमान जी ने उन्हें ऐसी विनय पत्रिका लिखने का सुझाव दिया जिसमें वे अपने मनोगत भावों एवं समस्याओं को लिखें, जिससे हनुमान जी उसे राम दरबार तक पहुँचा कर श्रीराम से हस्ताक्षर करवा कर उन्हें कलिकाल के प्रभाव और दुष्टों से मुक्ति दिला सकें।

हनुमान जी के आदेश पर गोस्वामी जी ने विनय पत्रिका लिखनी प्रारम्भ की। श्री गणेश, शिव-पार्वती, सूर्य, गंगा, सरस्वती, इत्यादि सभी देवताओं के साथ-साथ चारों भाईयों सहित श्रीराम और जगदजननी सीता को समर्पित सुन्दर पद रचे गये। श्रीराम के सम्मुख अपनी दासता और दीनता को गोस्वामी जी ने अत्यन्त मार्मिक एवं सुन्दर ढंग से रखा। विनय पत्रिका के पद इतने सुन्दर, करूण, मधुर और मर्मपूर्ण बने कि देखते ही बनता था। अभी विनय पत्रिका का रचना कार्य चल ही रहा था कि एक दिन गोस्वामी जी की भुजा में अत्यन्त तीव्र पीड़ा होने लगी। हाथ में लेखनी पकड़ना भी दूभर हो गया। बाबा जान नहीं पाये कि बिना किसी कारण ऐसा क्या हो गया कि उनकी भुजा में पीड़ा होने लगी। बाबा सदैव की तरह पुनः संकट मोचक हनुमान जी की शरण में थे —

'बाहु बिटप सुख विहंग थलु लगी कुपीर कुआगि।
राम कृपा जल सींचिए वेगि दीन हित लागि।।'

जैसे-जैसे भुजा की पीड़ा बढ़ती जा रही थी वैसे-वैसी कवि-हृदय से स्वतः छन्द फूटने लगे। 'हनुमान-बाहुक' की रचना होती चली गयी।

हनुमान जी की कृपा से बाबा की भुजा में पीड़ा कुछ कम हुई। बाबा सो रहे हैं। निद्रित अवस्था में ही भगवान शिव दर्शन देते हैं। तुलसी प्रणाम करते हैं। आशुतोष शिव बोले — "आपको यह पीड़ा मेरे पार्षद भैरव नाथ के प्रसाद स्वरूप प्राप्त हुयी है। उन्हें आपसे रूष्टता का कारण यह है कि आपने विनय पत्रिका में सभी देवी देवताओं की स्तुति की है परन्तु काशी में रहकर काशी के कोतवाल भैरव जी को आप भूल गये। तुलसी बाबा ने निवेदन किया — "परन्तु मैं तो उन्हें आपका ही स्वरूप मानता हूँ। इसीलिए ऐसी भूल हुयी।" महादेव हँसते हुये बोले — "चलो अच्छा ही हुआ। इस कारण 'हनुमान बाहुक' की रचना हो गयी। अब आप इस त्रुटि को सुधार कर भैरव जी की स्तुति में पद लिख कर उसे विनय पत्रिका में सम्मिलित कर लें।" "जैसी काशी पति की आज्ञा" बाबा ने प्रणाम करते हुए कहा।

(बाईस — विनय पत्रिका पूर्ण — राम हस्ताक्षर)

तभी निद्रा टूट गयी। बाबा चौंक कर उठे। स्वप्न स्मरण था सो तुरन्त उठकर भैरव रूपी शिव की स्तुति रचने लगे। पद पूर्ण होने पर उसे विनय-पत्रिका में सम्मिलित कर लिया।

विनय पत्रिका पूर्ण हो गयी है। तुलसी दास जी अपने अवचेतन में देख रहे हैं कि वे अपने हाथ में विनय पत्रिका के रूप में प्रार्थना का लम्बा कागज लिए रामजी के दरबार की ओर जा रहे हैं। मार्ग में उन्हें श्रीगणेश, माँ सरस्वती, सूर्य, शिव-पार्वती के साथ साथ गंगा, यमुना, काशी-चित्रकूट आदि पावन नदियों एवं स्थलों के भी दर्शन होते हैं। सबको प्रणाम करते हुये वे श्री राम दरबार तक जा पहुँचते हैं। राम दरबार की ड्योढ़ी पर श्री हनुमान जी खड़े हैं। श्रीराम जी के वाम भाग में जगजननी सीता जी सिंहासन पर विराजमान हैं। भैया भरत, शत्रुघ्न और लखन लाल जी प्रभु की सेवा में रमे हुये हैं। तुलसी बाबा हनुमान जी को अपनी विनय पत्रिका देते हुए उन्हें संकेत करके कहते हैं कि पहले भरत जी, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और माँ सीता को प्रणाम कर उनकी स्तुति करो। इनकी कृपा से ही आपकी प्रार्थना रूपी विनय पत्रिका प्रभु तक पहुँच सकती है।

तुलसी दास जी तीनों भाईयों की वन्दना करते हैं। माँ जगजननी को प्रणाम करते हैं। हनुमान जी प्रभु से निवेदन करते हैं और भरत जी का अनुमोदन देख लक्ष्मण जी तुलसीदास के हाथों से विनय पत्रिका ले कर प्रभु के सम्मुख आकर कहते हैं — "हे प्रभु! इस कलिकाल में भी आपके अकिंचन सेवक तुलसी ने आपके नाम के प्रति अपनी प्रीति और प्रतीति को जिस प्रकार निभाया है, वैसी निष्ठा अनन्य है। करूणा सिन्धु कृपया इस अकिंचन तुलसी पर कृपा करें।"

नेत्रों में प्रेमाश्रु भरे खड़े तुलसी के हाथ स्वतः जुड़ते चले गये। प्रभु अपनी चिर मुस्कान बिखेरते हुए बोले — "मुझे सब विदित है तुलसी दास जी! अब आप निश्चन्त रहें। कलियुग आपका कुछ नहीं विगाड़ सकेगा।' श्री लक्ष्मण जी ने लेखनी बढ़ा दी। प्रभु ने विनय पत्रिका पर सही के हस्ताक्षर कर दिये। तुलसी गदगद हो भगवान के चरणों में गिर जाते हैं —

मारुति मन, रूचिं भरत की लिखत लषन कही है।
कलिकालहु नाथ! नाम सों परतीति-प्रीति, एक किंकर की निबही है।
सकल सभा सुन लै उठी, जानि रीति रही है।
कृपा गरीब निवाज की, देखत गरीब को साहब बाँह गही है।
बिहँसि राम कह्यो 'सत्य है, सुधि में हूँ लही है।'
मुदित नाथ नावत, बनी तुलसी अनाथ की, परी रघुनाथ हाथ सही है।।

विनय पत्रिका पर प्रभु के हस्ताक्षर करते ही तुलसी बाबा अवचेतन अवस्था से चौंक कर उठ जाते हैं। प्रभु की अनन्त करूणा और कृपा से उनके मन-नयन भीग उठते हैं। कुछ समय पश्चात गोस्वामी जी योगेश्वर श्रीकृष्ण के दर्शनों का निश्चय कर वृन्दावन आ गये।

(वृन्दावन — नाभादास और पुजारी प्रसंग)

उस समय वृन्दावन में भारत के प्रसिद्ध संत स्वामी नारायण दास जो कि नाभा स्वामी के नाम से जाने जाते थे, भक्तमाल साहित्य की कथायें सुना रहे थे। नाभा स्वामी जी ने चारों युगों के भक्तों की कथा को 'भक्तमाला साहित्य' में अत्यन्त सुन्दर ढंग से लिखा था। वृन्दावन में वे उसी का प्रवचन कर रहे थे। उनकी कथा में राजस्थान के एक राजा रामरैन अपनी रानी सहित उपस्थित थे। नाभा दास जी के मुख से भक्त माल के अनेक प्रसंगों को सुन राजा-रानी द्रवित हो गये। जाते समय वे बहुत सी धनराशि स्वामी जी को अर्पित कर गये। निष्काम हृदय स्वामी जी ने उस राशि से ठाकुर जी के भण्डारे के आयोजन का निर्णय लिया। भण्डारे के आयोजन में सभी छोटे-बड़े सन्तों को आमन्त्रित किया गया था।

उस अवधि में गोस्वामी जी भी वृन्दावन में थे। किसी ने उनसे भण्डारे में चलने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया। कुछ समय पश्चात प्रभु प्रेरणा से सन्त दर्शन की इच्छा ले गोस्वामी जी भण्डारे में चल दिये।

बाबा जब भण्डारे में पहुँचे भोजन प्रसाद पाने के लिए पंक्ति बैठ चुकी थी। गोस्वामी जी पंक्ति के एक कोने में बैठ गये। एक व्यक्ति पत्तल दे गया, दूसरे ने आकर पूड़ी परोस दी। तीसरा व्यक्ति खीर लेकर आया तो उसने बाबा से पूछा कि उनके पास खीर के लिए पात्र (दोना) तो है नहीं, फिर वे खीर किसमें लेंगे? तुलसी बाबा इधर-उधर देखने लगे। पात्र तो दिखायी नहीं दिया परन्तु पास ही में एक सन्त की पनही (जूती) पड़ी थी, उसे उठाकर बाबा बोले — "भैया इसी में दे दो।" खीर बाँटने वाला व्यक्ति भौंचक्का रह गया। बोला "बाबा जूती में खीर लोगे? इस अपवित्र पात्र में?" तुलसी बोले —

"तुलसी जिनके मुखनते, धोखेहु निकसे राम।
तिनके पग की पानही, मेरे मन को चाम।।"

"भैया! संत चरण का आश्रय लेकर तो बड़े-बड़े पत्थर भी पावन हो जाते हैं। फिर यह पनही तो संत चरण से सम्पृक्त रही है यह अपवित्र कैसे हो सकती है? आप खीर इसी में परोस दें।" परन्तु खीर बाँटने वाले उस व्यक्ति ने उन्हें खीर नहीं दी। उसने स्वामी नाभा दास जी के पास जाकर सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। स्वामी जी चकित रह गये। "भावुकता की इस सीमा तक पहुँचा हुआ ऐसा भी कोई व्यक्ति है जो संत की पनही में भी प्रसाद ग्रहण करने को तत्पर है। श्रद्धा की ऐसी पराकाष्ठा?"

स्वामी जी खीर बाँटने वाले व्यक्ति को लेकर तुलसी बाबा के पास आये। गोस्वामी जी को पहचान कर नाभा दास जी उनके चरणों में झुक गये। गोस्वामी जी ने उन्हें रोकते हुये अपने हृदय से लगा लिया। उपस्थित संत तथा भक्त समुदाय को नाभा दास जी ने जब तुलसी बाबा का परिचय दिया तो सारा समाज आश्चर्यचकित रह गया। इतने बड़े संत और ऐसा निराभिमानी व्यवहार?

नाभा दास जी बोले — "भक्त माल साहित्य में मेरे द्वारा संकलित एक सौ आठ भक्तों की माला आज तुलसी नाम के सुमेरू पर पहुँच कर पूर्ण हुई। (108 मनकों में सबसे ऊपर का वह मनका जिस पर पहुँच कर माला पूर्ण होती है, सुमेरू कहलाता है) चारों युगों के इन एक सौ आठ भक्तों की माला में तुलसीदास सुमेरू के समान हैं। बोलिए संत शिरोमणि तुलसीदास की जय!" उपस्थित समुदाय के संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास की जय जयकार से गगन गूँज उठा। संतों और श्रद्धालुओं के आग्रह पर नाभादास जी ने रामचरित मानस तथा तुलसीदास से सम्बन्धित अनेक प्रसंग सुनाये।

(वृन्दावन — राम-कृष्ण अभेद और पुजारी प्रसंग)

वृन्दावन धाम में नाभादास सहित अनेक संतों का दर्शन पाने के पश्चात गोस्वामी जी योगेश्वर कृष्ण के अनेक मन्दिरों तथा लीला स्थलों का दर्शन करने का निश्चय कर घूमते हुए एक मन्दिर में पहुँचे। उस मन्दिर का पुजारी परशुराम नामक ब्राह्मण था। जब तुलसी बाबा ने श्रीकृष्ण विग्रह में भी अपने आराध्य राम को पहचान दण्डवत किया तो उस पुजारी ने बाबा को राम भक्त जान कर कहा — "आप तो श्रीराम के उपासक जान पड़ते हैं। और यह श्रीकृष्ण का मंदिर है। क्या आप जानते नहीं कि किसे नमन कर रहे हैं?"

तुलसी बाबा उसकी भेद बुद्धि को भाँप गये। बोले — "मेरे मन में तो कभी श्रीराम-कृष्ण में भेद नहीं रहा। यदि ऐसी कोई भेदवाली बात होती तो मैं वृन्दावन आता ही क्यों?" परन्तु पुजारी न माना। राम-कृष्ण में भेद के अपने हठ पर अड़ा रहा। बोला — "मैंने सुना है कि श्रीराम मात्र बारह कला के अवतार हैं जबकि श्रीकृष्ण सोलह कला परिपूर्ण अवतार हैं। फिर आप श्रीकृष्ण को ही क्यों नहीं पूजते?"

तुलसी बाबा बोले — "भैया आपने भगवान को बारह कला ही सही, कम से कम ईश्वर तो माना। मेरी आस्था को इससे ही दृढ़ता प्रदान हुयी। रहा प्रश्न दोनों में भेद का तो उसे मैं नहीं मानता, फिर भी मुझे प्रभु का मर्यादा पुरूषोत्तम रूप ही अधिक भाता है।" बाबा के समझाने पर भी पुजारी अपने कुतर्कों पर अड़ा रहा। तुलसी बाबा जान गये कि प्रभु कोई लीला दिखाने चाहते हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण विग्रह (मूर्ति) की ओर देखकर प्रभु से निवेदन किया — "प्रभु आप जानते ही हैं कि मेरे मन में ऐसा कोई दुर्भाव नहीं है। परन्तु आपके दोनों रूपों को एक सिद्ध करने के लिए मैं अब तभी आपके चरणों में शीश झुकाऊँगा जब आप अपने अनन्य स्वरूप श्रीराम रूप में दर्शन देंगे।"

'कहा कहीं छवि आज की भले बने हो नाथ।
तुलसी मरतक तब नवै जब धनुप बाण लो हाथ।।'

निर्मल चित्त, अभेद बुद्धि वाले भक्त की प्रार्थना को प्रभु अस्वीकार कैसे कर सकते थे। सो प्रभु तुरन्त ही —

'मुरली लकुटि दुराय के, धनुप बाण लिए हाथ।
अपने जन के कारणे, श्रीकृष्ण भये रघुनाथ।।'

श्रीकृष्ण के हाथों में मुरली के स्थान पर धनुष-बाण देख गोस्वामी जी भक्त का मान रखने वाले प्रभु के चरणों में गिर पड़े। प्रभु कृपा को पहचान बाबा पुजारी से बोले — "देख लीजिए। अब सिंहासन पर कौन विराजमान है आपके कृष्ण या मेरे राम? अब भी यदि उनकी अनन्यता में कोई भेद दिख रहा हो तो बताईये कि —

'कित मुरली कित चन्द्रिका, कित गोपिन को साथ।
तुलसी निज जन कारणे, श्रीकृष्ण भये रघुनाथ।।'

हतप्रभ पुजारी विस्फारित नेत्रों से कभी सिंहासन की ओर देखता तो कभी गोस्वामी जी को। अन्तः लज्जित होकर ग्लानि भरे स्वर में गोस्वामी जी से अपने अपराध और तुच्छ बुद्धि के लिये क्षमा माँगने लगा। सहृदय गोस्वामी जी बोले — "किसी भी व्यक्ति पर अज्ञान का प्रभाव पड़ना एक स्वाभाविक बात है परन्तु पुजारी होने के नाते आपकी इस भेद-बुद्धि का जन-साधारण पर अनुचित प्रभाव पड़ता है और अन्तः धर्म को ही हानि पहुँचती हैं उत्तम भक्त वही है जो — 'निज प्रभुमय देखिहिं जगत, का सन करिहिं विरोध।'" लज्जित पुजारी बाबा की महानता के प्रति नतमस्तक हो उठा।

(काशी वापसी और महामारी)

तुलसी बाबा काशी लौट आये। कुछ समय पश्चात काशी में पहले अकाल फिर भयंकर महामारी फैली। चारों ओर लोग भागते, कूदते और हाय-हाय कर मर जाते। हजारों व्यक्ति अकाल ही काल कवलित हो गये। काशी पति महादेव की नगरी की दुर्दशा गोस्वामी जी से देखी नहीं गयी। अपने अखाड़ों के सभी युवकों को बाबा ने रोगियों की सेवा और नगर से बीमारी दूर रखने के लिये साफ-सफाई में लगा दिया। नीम की पत्तियाँ उबाल कर काढ़ा बना-बना कर रोगियों को पिलाना उनकी सेवा करना बाबाजी का दैनन्दिन कार्य हो गया।

महामारी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। बाबा ने काशीपति शिव से प्रार्थना की —

'अपनी बीसीं आपुही पुरिहि लगाए हाथ।
केहि विधि बिनती बिस्व की, करौं बिसव के नाथ।।'
बीसीं बिस्व नाथ की विषाद बडों बारानसी।
बूझिए न ऐसी गति संकर सहर की।।
कैसे कहे तुलसी वृषासुर के बरिदानि।
बानि जानि सुधा तजि पीविन जहर की।।

महादेव के चरणों में छन्दों के अनेक पुष्प चढ़ा गोस्वामी जी ने उनसे अपनी बीसीं (एक ग्रह दशा; रूद्र की बीसीं में संहार अधिक हुआ करता है) से काशी की रक्षा करने की प्रार्थना की। काशी नगरी की सभी दिशाओं में संकट मोचक हनुमान जी के मन्दिरों की स्थापना करवा कर त्राहिमाम करती दैहिक, मानसिक यन्त्रणाओं से घिरी प्रजा में पूजा पाठ द्वारा गोस्वामी जी ने आस्था की ज्योति को प्रज्ज्वलित रखा।

कुछ समय पश्चात राम-राम कर महामारी शान्त हो गयी। समय बीतता रहा। बाबा की आयु बढ़ती रही। बाबा काशी से वाराह क्षेत्र गये। वहाँ से जन्म भूमि राजापुर। रत्नावली को दिये वचन को निभाने का समय आ गया था। रत्नावली को दर्शन दे उनका अन्तिम समय सौभाग्यपूर्ण बना बाबा काशी लौट आये।

(अन्तिम काल — महाप्रयाण)

गोस्वामी तुलसी दास शय्या पर पड़े हैं। कई दिन से उनके शरीर में फुँसियाँ निकल आयी हैं। विश्राम कर रहे गोस्वामी जी के मानस पटल पर सम्पूर्ण जीवन वृत्त घूम जाता है। बाबा प्रभु की कृपा को स्मरण कर उठते हैं कि उनके दीन हीन जीवन को प्रभु ने किस प्रकार अपनी शरण में लेकर पतित से पावन कर दिया। सन्त हृदय को विपत्ति में भी प्रभु की कृपा दिखायी दे रही है। वे मान रहे हैं कि इन फुँसियों के रूप में उनके प्रभु का उनके स्वामी का नमक बह रहा है —

"आसन बसन हीन, विषम-विषाद-लीन,
देखि दीन दूबरौ, करैं न हाय-हाय को?
तुलसी अनाथ सों सनाथ रघुनाथ कियो,
दिया फल सील सिंधु अपने सुभाय को।।
नीच यहि बीच पति पाई भरूहाइगो,
बिहाय प्रभु भजन वचन मन काय को।
ताते तनु पेखियत घोर बरतोर मिस,
फूटि फूटि निकसत है लोन राम राय को।।"

आज श्रावण तीज का दिन है। बाबा का स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है। अनेक सेवक सन्त उन्हें घेरे खड़े हुये हैं। बाबा राम मिलन के क्षण को पहचान रहे हैं। बाबा जान गये कि उनके स्वामी, उनके प्रभु को उनकी आवश्यकता है। बाबा के महाप्राण का क्षण पहचान कर शिष्यों ने धरती को गाय के गोबर से लीप दिया है।

बाबा का कंठ अवरूद्ध होने लगा है। शरीर में बल नहीं रहा। स्वर टूट रहा है। बाबा बोले —

"राम नाम जस बरनि के, मयो चहत अब मीन।
तुलसी के मुख दीजिये, अबहीं तुलसी सोन।।"

बाबा की इच्छा पहचान उन्हें धरती पर लिटा दिया गया। तुलसीदल, सोना और गंगाजल उनके कंठ में डाला गया। बाबा के निस्तेज हो रहे नेत्रों में श्री रामदरबार में विराजमान श्रीराम, माँ सीता, अनुज भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न सहित हनुमान जी के चित्र उभर आये।

शून्य में टिकी दृष्टि में उभरे राम दरबार को प्रणाम करने के लिये बाबा के हाथ स्वतः जुड़ते चले गये। श्वांस गति का क्रम बिगड़ने से छाती फूल-पिचक रही है। जीवन के प्रति अब कोई आशा नहीं दीखती। टूटती श्वांसों ने अन्तिम बार सम्पूर्ण साहस बटोर कर 'राम' कहा। इसी के साथ एक अज्ञात से उद्गम से निकली एक लघु सरिता रामभक्ति और कृपा पाकर पावन होते-होते गंगा बन अतल महासागर में विलीन हो गयी।

प्रकृति ने भी मानो उन्हें अन्तिम प्रणाम करने के लिए ही मेघाच्छादित गगन में तीव्र चमक बिखेरती ऐसी दामिनी उत्पन्न की कि उसकी कौंध भीतर कमरे तक आ पहुँची। बाहर तेजी से मेघ बरस रहे थे और भीतर सबके नेत्र.........

।। इति ।।

स्रोत: नमन (द्वितीय संस्करण, 2018), पृष्ठ 6–46 — मूल पाठ, अक्षरशः

ग्रन्थ

श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड एवं विनय पत्रिका — गीता प्रेस संस्करण
मन्दिर की परम्परा के अनुसार गीता प्रेस संस्करण ही मान्य है। पूर्ण श्रीरामचरितमानस (सातों काण्ड, लगभग 1050+ पृष्ठ), स्वतन्त्र सुन्दरकाण्ड एवं सम्पूर्ण विनय पत्रिका (279 पद) — तीनों गीता प्रेस के सटीक (मूल + भावार्थ) संस्करणों में इंटरनेट पर प्रामाणिक रूप से उपलब्ध पाये गये हैं। इनकी उपलब्धता की पुष्टि हो चुकी है। परन्तु इतने विशाल ग्रन्थों (सम्पूर्ण मानस + सम्पूर्ण विनय पत्रिका मिलाकर 1300+ पृष्ठ मूल पाठ व भावार्थ सहित) को एक ही एकल HTML फाइल में — बिना किसी संक्षेप, त्रुटि अथवा प्रारूप-हानि के — सम्मिलित करना एक बड़ा कार्य है, जिसे विश्वसनीयता के साथ पूर्ण करने हेतु कई चरणों में क्रमबद्ध कार्य आवश्यक होगा। नीचे प्रत्येक ग्रन्थ की एक झलक (काण्ड-सूची/प्रथम अंश) दी गयी है; सम्पूर्ण पाठ अगले चरणों में जोड़ा जायेगा।
श्रीरामचरितमानस — सप्त काण्ड

काण्ड-सूची

1. बालकाण्ड 2. अयोध्याकाण्ड 3. अरण्यकाण्ड 4. किष्किन्धाकाण्ड 5. सुन्दरकाण्ड 6. लंकाकाण्ड 7. उत्तरकाण्ड
सम्पूर्ण मूल पाठ + भावार्थ — आगामी चरण में

मंगलाचरण (बालकाण्ड, प्रथम श्लोक)

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।। भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्।।
स्रोत: गीता प्रेस संस्करण (सत्यापित) — पूर्ण भावार्थ सहित काण्डवार पाठ आगामी
सुन्दरकाण्ड (स्वतन्त्र)
मन्दिर की परम्परा अनुसार गीता प्रेस का स्वतन्त्र सुन्दरकाण्ड संस्करण उपलब्ध एवं सत्यापित है। पूर्ण मूल पाठ व भावार्थ अगले चरण में जोड़ा जायेगा।
विनय पत्रिका — सम्पूर्ण (279 पद)
नमन ग्रन्थ में विनय पत्रिका के 7 चुनिन्दा पद संकलित हैं, जो "विनय पत्रिका" पृष्ठ पर मूल रूप में उपलब्ध हैं। सम्पूर्ण 279 पदों वाला गीता प्रेस संस्करण भी सत्यापित एवं उपलब्ध पाया गया है — इसका पूर्ण पाठ भावार्थ सहित आगामी चरण में जोड़ा जायेगा।
नमन के 7 पद अभी पढ़ें →

भजन

नमन ग्रन्थ के 24 भजनों में से एवं अन्य प्रसिद्ध भजन
अब प्रत्येक भजन का अपना पृष्ठ भी उपलब्ध है — सीधा लिंक साझा करने हेतु यहाँ भजन सूची देखें →
नमन ग्रन्थ के सम्पूर्ण 24 भजन

भजन-1 — दर तेरे आवों गुण गावों

दर तेरे आवों गुण गावों, तेरा प्रेम मैं पावों दिन राती। तेरी भगती वेखी अपार गुरू जी, ऐदी महिमा मैं गौंवा दिन राती।। दुःख रोग उदे दूर हो जांदे ने, जो भी चरणां दा दर्शन पांदे मैं। इदा नूर नूरानी वेख के मैं, दिव्य दृष्टि नूँ पावों दिन राती। जो भी श्रद्धा दे नाल इत्थे आ जावे, लाख चौरासी ओदी फेर कट जावे। दया तेरी निरन्तर वसदी है, तेरी रैमतां पावों दिन राती।। तेरे द्वार दा अजब नजारा वेखया, मुक्ति पांदा इत्थे जग सारा वेखया। कण-कण में बिच बाबा तेरा वास देखया, मूरख मन नू फेर क्यों उदास बेखया। 'अनिल' लग जा तू भी गुरु चरणी, ते पा फैर मौज नू दिनराती। सोणी चरनां दी भूड़ी पाके ते, क्यों न रम जावां मैं दिन राती। दर तेरे आवों गुण गावों, तेरा प्रेम मैं पावों दिन राती।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 72

भजन-2 — करे सबदी जो परवा, मेरा बाबा बेपरवाह

करे सबदी जो परवा, मेरा बाबा बेपरवाह मेरा सतगुरू बेपरवाह इक्को सोणा तेरा द्वारा, सारे जग तों जो है न्यारा इत्थे प्रेम पिया वसदा, मेरा बाबा बेपरवाह तेरे नाम दी महिमा गावां नित उठ दरशन तेरा पावों सानू तेरे मिलण दी चाह मेरा बाबा बेपरवाह श्रद्धा लैके जोभी आवे, मुहां मंगियां मुरादां पावे सिर ते इक्को तेरी छाँह, मेरा बाबा बेपरवाह दास नू भी अपनाओ ते मनविच विश्वास जगाओ सोया चित्त चरना विच ला, मेरा बाबा बेपरवाह।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 72-73

भजन-3 — सीताराम, सीताराम, सीताराम

सीताराम, सीताराम, सीताराम। यह नाम बनाया प्रथम पूज्य गणपति को पलभर में और मिला यही अवलम्बन तो शबरी को जंगल में लाखों का बेड़ा पार किया पहुँचाया हरि के धाम। सीताराम, सीताराम, सीताराम। ब्रह्मा के चारों वेदों से यह नाम निकलता है शिवजी के मानस मन्दिर में दीपक सा जलता है। नारद जी की वीणा से भी यह निकला पावन नाम। सीताराम, सीताराम, सीताराम।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 73

भजन-4 — जादूगर श्याम मेरा दिल लुट ले गया

जादूगर श्याम मेरा दिल लुट ले गया, सोणां जिया मुखड़ा मैं वेखदा ही रह गया। नाम दा खजाना दित्ता किरपा बरसा के, जिन्दगी दी डोर मेरे हथ विच फड़ा के। दिल के सिंहासन उत्ते आप आके बै गया, सोणां जिया मुखड़ा मैं वेखदा ही रह गया।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 73

भजन-5 — बाबा तुलसी के गुण गावे सारी दुनिया

बाबा तुलसी के गुण गावे सारी दुनिया, जगत में जै–जैकार हो रही। पिता आत्माराम धन्य और धन-धन माता हुलसी, स्वयं रहे न जग में लेकिन जग को दे गये तुलसी। हो गयी पाल पोस के धन-धन दासी चुनिया जगत में जै–जैकार हो रही। बालापन में घर-घर डोले दर-दर ठोकर खाए। गुरू कृपा भए धनी शरण जब राम धनी की आए, पाए दूध, मलाई, रबड़ी दोनों जुनियाँ जगत में जै–जैकार हो रही। रत्ना से उद्बोधन पाके, सोवत से जन जागे, क्रम–क्रम काशी चित्रकूट फिर अवधपुरी को भागे। लागे राम शरण में बनके सन्त सगुनिया जगत में जै–जैकार हो रही। आगम निगम पुराण निचोड़े सार-सार सब भाखे। धनी गरीब मूर्ख पंडित अब जो चाहे रस चाखे, बन के श्रोता वक्ता व्यास और कीर्तनिया जगत में जै–जैकार हो रही। जंगम तुलसी, तरू भए तुलसी रही जगत में छायी, भ्रमर रहे कविता मंजरी पर राम रहे मंडराई। कह गये सरस्वती मधुसूदन अस निगुर्निया जगत में जै–जैकार हो रही। संस्कृत भाषा कठिन नारियल खोरत में कठिनावै। गरी खोल कर तुलसी धरि गये जो चाहे सो पावे, कहते करत बिहारी नारायण मैं सुनिया जगत में जै–जैकार हो रही। देश-देश घर-घर में गूँजे बाबा की चौपाई, जन-जन के मानस में बैठे तुलसी दास गुंसाई। धन-धन भए जगात के गायक कवि और गुनिया जगत में जै–जैकार हो रही।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 74

भजन-6 — प्रभु बंधे हुये खिंचे हुए चले आयेंगे

प्रभु बंधे हुये खिंचे हुए चले आयेंगे, जरा तारों से तारें मिलाकर तो देख। जिसने गाया मिला उसको मुक्ति का धाम, तरे पत्थर लिखा जिनमें रघुवर का नाम। तेरी नैया किनारे पे लग जायेगी, नाम हृदय में उसका लिखाकर तो देख। पाया धन्ने ने पत्थर को प्रभु मानकर, पाया मीरा ने विष का अमर पान कर। पाया केवट ने धो-धोकर चरण धूल को, उन्हीं चरणों में मस्तक झुकाकर तो देख। वो है ठाकुर पुजारी तू बनकर तो देख, वो है दाता भिखारी तू बनकर तो देख। उसके दर से गया कोई खाली नहीं, उसके आगे तू झोली फैलाकर तो देख। पाया शबरी ने बन्धन सभी काटकर, गौतम नारी ने चरणों की रज चाटकर। पाया कुब्जा ने चन्दन लगाकर उसे, चाहे जिस भाव से लौ लगाकर तो देख। मन के मन्दिर में पगले बिठा ले उसे, जीवन नैया का केवट बना ले उसे। फिर क्या डर है जो पतवार भी दूर हो, अपनी रग रग में उसको बसाकर तो देख। प्रभु बंधे हुये खिंचे हुए चले आयेंगे।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 75

भजन-7 — लिखन वालेया तू होके दयाल लिख दे

लिखन वालेया तू होके दयाल लिख दे। मेरे दिल विच गुरू जी दा प्यार लिख दे। 1. मत्थे ते लिख दे जै गुरां दी, अक्खां विच उसदा दीदार लिख दे।। 2. ओठां ते लिख दे नाम गुरू दा, कनां विच शब्द झंकार लिख दे। 3. हत्थां ते लिख दे सेवा गुरू दी, तन मन धन उसदे बार लिख दे।। 4. पैरां ते लिखदे जाना गुरू दे, सारा ही जीवन उसते वार लिख दे।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 75

भजन-8 — जहाँ ले चलोगे वहीं मैं चलूँगा

जहाँ ले चलोगे वहीं मैं चलूँगा। जहाँ नाथ रख लोगो वहीं मैं रहूँगा। यह जीवन समर्पित चरण में तुम्हारे, तुम्हीं मेरे सरबस तुम्हीं प्राण प्यारे तुम्हें छोड़कर न किससे कहूँगा, जहाँ ले चलोगे वहीं मैं चलूँगा।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 76

भजन-9 — माँ अंजनी के लाल थोड़ा ध्यान दीजिए

माँ अंजनी के लाल थोड़ा ध्यान दीजिए दे ध्यान दीन दास का कल्याण कीजिए। रहते सदा हैं आप राम नाम में मान कहते लगी है आपको श्रीराम की लगान हमको भी भाव भक्ति का वरदान दीजिए माँ अंजनी के लाल थोड़ा ध्यान दीजिए।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 76

भजन-10 — मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है

मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है। करते हो तुम कन्हैया मेरा नाम हो रहा है। पतवार के बिना ही, मेरी नाव चल रही है; हैरान है जमाना, मंजिल भी मिल रही है करता नहीं मैं कुछ भी, सब काम हो रहा है। तुम साथ हो जो मेरे किस चीज की कमी है; किसी और चीज की अब दरकार ही नहीं है तेरे साथ से गुलाम अब गुलफाम हो रहा है मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है। मैं तो नहीं हूँ काबिल तेरा पार कैसे पाऊँ; टूटी हुयी वाणी से तेरा गुणगान कैसे गाऊँ, तेरी प्रेरणा से ही सब यह कमाल हो रहा है। तूफान आँधियों में तुमने है मुझको थामा, तुम कृष्ण बनकर आये मैं जब बना सुदामा। तेरा करम यह मुझपर सरे आम हो रहा है, मुझे हर कदम डगर पर तूने दिया सहारा, मेरी जिन्दगी बदल दी तूने करके इक इशारा। अहसान के बिना यह अहसान हो रहा है, मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 77

भजन-11 (मंगल गीत) — मैली चादर ओढ़ के कैसे

मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तुम्हारे आऊं। हे पावन परमेश्वर मेरे, मन ही मन शरमाऊं।। 1) तुमने मुझको जग में भेजा, देकर निर्मल काया। आकर के संसार में मैंने, इसमें दाग लगाया। जनम-जनम की मैली चादर, कैसे दाग छुड़ाऊं। 2) निर्मल वाणी पाकर तुमसे, नाम न तेरा गाया।। नैन मूंद कर हे परमेश्वर, कभी न ध्यान लगाया। मन वीणा के तार टूटे, अब क्या गीत सुनाऊं।। 3) इन पैरों से चलकर तेरे, मन्दिर कभी न आया।। जहाँ-जहाँ हो पूजा तेरी, कभी न शीश झुकाया।। हे हरि हर मैं हार के आया, अब क्या हार चढ़ाऊं।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 77-78

भजन-12 — सतगुरू दीन दयाल तों, वारी जा बलिहारी जा

सतगुरू दीन दयाल तों, वारी जा बलिहारी जा। संगतां दे रखवाले तों, वारी जा बलिहारी जा। 1. सतगुरु मेरा सब तो सौंणा, तेरे जिया कोई होरे न होणा-2; इस दे रूप निराले तों, वारी जा बलिहारी जा। 2. सुन्दर रूप गुरां दा प्यारा, रोम-रोम मारे लिश्कारां, नूरी मुखड़े वाले तों, वारी जा बलिहारी जा। 3. नाम जहाज गुरां ने बनाया, गुरां द्वारे असी डेरा लाया-2; नाम जपावण वाले तों, वारी जा बलिहारी जा। 4. अंत समय गुरू होण सहाई, छड जांदे सब बहन ते भाई; राह दिखावण वाले तों, वारी जा बलिहारी जा।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 78

भजन-13 — मेरी लगी श्याम संग प्रीत, दुनिया क्या जाने

मेरी लगी श्याम संग प्रीत, दुनिया क्या जाने, मुझे मिल गया मन का मीत, दुनिया क्या जाने। छवि लखी मैंने श्याम की जब से, भई बावरी मैं तो तब से, बांधी प्रेम की डोर मोहन से, नाता तोड़ा मैने जग से। यह कैसी पागल प्रीत दुनिया, यह कैसी निगोड़ी प्रीति, दुनिया क्या जाने, मोहन की सुन्दर सूरतिया, मन में बस गई मोहिनी मूरतिया। लोग कहें मैं भई बावरिया, जब से ओढ़ी श्याम चुनरिया, मैंने छोड़ी जग की रीति, दुनिया क्या जाने। हर दम अब तो रहूँ मस्तानी, लोक लाज दीनी बिसरानी, रूपराशि अंग-अंग समानी, हेरत हेरत रहूँ दिवानी। मैं तो गाऊँ खुशी के गीत, दुनिया क्या जाने, मोहन ने ऐसी बंसी बजाई, सबने अपनी सुध बिसराई, गोप गोपियाँ भागी आयी, लोक लाज कुछ काम न आयी। फिर नाच उठा संगीत दुनिया क्या जाने। भूल गयी कहीं आना जाना, जग सारा लागे बेगाना, अब तो केवल श्याम को पाना, रूठ जाये तो उन्हें मनाना। अब होगी प्यार की जीत, दुनिया क्या जाने।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 79

भजन-14 — मेरा छोटा सा संसार हरि आ जाओ एक बार

मेरा छोटा सा संसार हरि आ जाओ एक बार मेरी नैया पार लगा जाओ मेरी बिगड़ी आके बना जाओ 1. लाखों को दर्श दिखाया है, प्रभु मुझको क्यों तरसाया है यह कैसी तुम्हारी माया है, नित बहती असुअन धार, हरि आ जाओ एक बार 2. जब याद तुम्हारी आती है, तन मन की सुध बिसराती है रह-रह के मुझे तड़पाती है, तन मन धन दूँ सब वार, हरि आ जाओ एक बार 3. मुझको बिछड़े युग बीत गये, क्यों रूठ प्रभु मेरे मीत गये मैं हार गया तुम जीत गये, अब दर्शन दो हक बार, हरि आ जाओ एक बार
स्रोत: नमन, पृष्ठ 79

भजन-15 — बाबा जी मैं तेरी पतंग

बाबा जी मैं तेरी पतंग, सतगुरू मैं तेरी पतंग हवा विच उड़दी जावांगी बाबा ओर हत्थों छुड्डी न मैं कट्टी जावांगी 1) बड़ी मुश्किल दे नाल मिलया; मैनूं तेरा द्वारा है, बाबा तेरा द्वारा है, सानूँ इक्को आसरा नाल तेरा सहारा है, बाबा तेरा सहारा है; हुण तेरे ही भरोसे हवा विच उड़दी जावांगी बाबा डोर हत्थों छुड्डी न मैं कट्टी जावांगी 2) मैनूँ चरणां कमला नालों कदी दूर हटायीं ना; इस झूठे जग दे अन्दर मेरा पेचा लाईं ना जे कट गई तां सतगुरू तां मैं लुट्टी जावांगी 3) अज मलयां बुआ आके बाबा तेरे डारे दा; हथ रख दे इक बारी तू मेरे सिर ते प्यार दा फिर जन्म मरण दे फेरे तो मैं बच्चे जावांगी, बाबा जी मैं तेरी पतंग, सतगुरू मैं तेरी पतंग
स्रोत: नमन, पृष्ठ 80

भजन-16 — पायो जी मैंने राम रतन धन पायो

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। वस्तु अमोलक दी मेरें सतगुरु कृपा कर अपनायो। जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी गुमायो। खर्च जनम कोई न लेवे, दिन-दिन बढ़त सवायो। सत की नाव खेवतिया सतगुरु भव सागर तरि आयो। 'मीरा' के प्रभु गिरिधर नागर, हरप-हरप जस गायो।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 80

भजन-17 — तेरेयीं चरणां विच मेरी अरदास दाता

तेरेयीं चरणां विच मेरी अरदास दाता। कि हरपल बणयां रवे, मेरा विश्वास दाता। 1. बेड़ी दा मल्लाह भी तू, सागर दा किनारा तू, मेरी जीवन नैया का इक तारण हारा तू, अपने भक्तां दी पूरी कर आस दाता। कि हरपल बणयां रवे मेरा विश्वास दाता।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 80-81

भजन-18 — राम नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली-गली

राम नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली-गली लेलो रे कोई राम का प्यारा, शोर मचाऊँ गली-गली 1. माया के दीवानों सुन लो इक दिन ऐसा आयेगा; धन दौलत और माल खजाना यहीं पड़ा रह जायेगा सुन्दर काया मिट्टी होगी, चर्चा होगी गली-गली; लेलो रे कोई राम का प्यारा 2. क्यों करता तू मेरा मेरी यह तो तेरा मुकाम नहीं; झूठे जग में फंसा हुआ है वह सच्चा इंसान नहीं जग का मेला दो दिन का है अन्त में होगी चला-चली; लेलो रे कोई राम का प्यारा 3. जिस-जिस ने यहाँ मोती लूटे वह तो मालामाल हुए; धन दौलल के बने पुजारी आखिर वह कंगाल हुए चाँदी सोने वालों सुन लो बात सुनाऊँ खरी-खरी; लेलो रे कोई राम का प्यारा 4. दुनिया को तू कब तक पागले अपनी कहलायेगा; ईश्वर को तू भूल गया है अन्त समय पछतायेगा दो दिन का यह चमन खिला है फिर मुरझाये कली-कली राम नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली-गली
स्रोत: नमन, पृष्ठ 82

भजन-19 — यह दुनिया मुसाफिर खाना

यह दुनिया मुसाफिर खाना, मत धोखे में आ जाना। हरि नाम सुधा रस पीना, औरों के लिए भी जीना। दुखिया का दिल न दुखाना, मत धोखे में आ जाना। स्वांसा जब बाहर जावे, भीतर आवे न आवे। है किसका कौन ठिकाना, मत धोके में आ जाना। पढ़ना रामायण गीता, भजना श्री रघुवर सीता। प्रभु प्रेम में अश्रु बहाना, मत धोखे में आ जाना। कोई ऐसा काम न करना, जिससे हो मन में डरना। राजेश्वर राम रिझाना, मत धोखे में आ जाना।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 82

भजन-20 — आये तेरे द्वार नमस्कार-नमस्कार

आये तेरे द्वार नमस्कार-नमस्कार सब जग के आधार नमस्कार-नमस्कार मंगलयी माँ हम आये तेरे द्वार 1. सूरज और चाँद में तेरा ही उजाला है; तूने पहन रखी सितारों की माला है सब जग के आधार नमस्कार-नमस्कार 2. पर्वतों की चोटियों को बादल हैं चूमते; पृथ्वी, सूर्य, चाँद-सितारे गा रहे हैं घूमते नियम के अनुसार नमस्कार-नमस्कार 3. कोयल की यह कूह-कूह सबे मन को भा रही; शीतल मन्द पवन तेरा गीत मधुर गा रही जपत रही सो बार नमस्कार-नमस्कार 4. मानुष तन को देखो कितना सुन्दर बनाया है; मन बुद्धि और इन्द्रियों को इसने सजाया है अष्टचक्र नौ द्वार नमस्कार-नमस्कार
स्रोत: नमन, पृष्ठ 83

भजन-21 — आओ तुम्हें भगवान का दरबार दिखायें

आओ तुम्हें भगवान का दरबार दिखायें सीता समेत सांवरे सरकार दिखायें 1. बायीं तरफ भरत हैं तो दायीं तरफ लखन; पीछे चँवर मुलाये रहे भरत शत्रुघ्न बैठे हैं हनुमान हैं चरणों पे निगाहें, आओ तुम्हें भगवान का दरबार..... 2. सब सन्त ऋषि भक्त विराजे हैं सामने; तन मन सभी के मस्त हैं श्री राम नाम में जय हो हमारे रामजी सब टेर लगायें, आओ तुम्हें भगवान का दरबार..... 3. मीरा भी यहीं सूर भी तुलसी भी यहीं हैं; शबरी भी तुकाराम भी नरसी भी यहीं हैं। सब गा रहे हैं राम की महिमा की कथायें, आओ तुम्हें भगवान का दरबार..... 4. है व्यास भजन में न लगन हो तो भजन क्या; विषयों का ही चिन्तन हो तो मानव का जन्म क्या आहों में असर हो तो भला राम न आयें आओ तुम्हें भगवान का दरबार दिखायें
स्रोत: नमन, पृष्ठ 83-84

भजन-22 — पिला दे ओ साकी, हरि नाम की मस्ती

पिला दे ओ साकी, हरि नाम की मस्ती हरी नाम की मस्ती दे दे, श्याम नाम की मस्ती दे दे 1. सतगुरु को नजराना दे दूँ, एक बूँद पिला दे; मन ये प्यासा तरस रहा है, जी भर इसे पिला दे सर देने में जो बूँद मिले एक, तो भी जानूँ सस्ती। 2. रंग की मुझको शर्त नहीं है, कोई भी रंग पिला दे; रोज रोज गर नहीं पिलाना, एक ही बार पिला दे पीने वाले दाम न पूछें, मंहगी हो या सस्ती। 3. तेरे नाम की पीने वाले दुनिया से नहीं डरते; सर जाए तो जाए बेशक, शिकवा कभी नहीं करते तेरे हवाले कर दी मोहन, हमने अपनी कश्ती। 4. मैं तेरे दरबार में आया लेकर दिल में आशा; इतनी कृपा कर दो मोहन जाऊँ न मैं प्यासा बसा रहे तेरा मयखाना उजड़ जाये चाहे बस्ती। पिला दे ओ साकी......
स्रोत: नमन, पृष्ठ 84

भजन-23 — रामा रामा रामा मेरे प्यारे रामा

रामा रामा रामा मेरे प्यारे रामा। मुख से बोलो मन से बोलो प्यार से बोलो रामा।। 01– बिगड़े काम सँवारे सबकी नैया पार लगाये; राम सहारे वाला बन्दा सभी मुरादें पाये। स्वाँस–स्वाँस में एक ही नामा जय रामा जय रामा। रामा–रामा–रामा 02– सबसे ऊँचा राम रमैया कोई पार न पाये–; भक्ति भाव से शरणी आजा, भव सागर तर जाये। पूर्ण ब्रह्म श्री राम ही रामा, जय रामा जय रामा। रामा–रामा–रामा 03– मारुति नन्द जय बजरंगी जिनके चरण पखारे, सीता मैया लखन लाल जिन पर जायें बलिहारे।। वही कृपालु भज मन रामा, जय रामा जय रामा। रामा–रामा–रामा 04– चरण छुआ पत्थर से प्रकटी अबला अहिल्या भाई; दुष्टों का संहार किया, भक्तों की लाज बचाई भक्तों के वत्सल हैं रामा, जय रामा – जय रामा; रामा–रामा–रामा
स्रोत: नमन, पृष्ठ 85

भजन-24 — आसरा इस जहाँ का मिले न मिले

आसरा इस जहाँ का मिले न मिले, मुझको तेरा सहारा सदा चाहिए। चाँद तारे फलक पर दिखे न दिखे, मुझको तेरा नजारा सदा चाहिए। 1. यहाँ खुशियाँ हैं कम और ज्यादा हैं गम, जहाँ देखो वहीं है हरम ही हरम। मेरी महफिल में शमां जले न जले, मेरे दिल में उजाला तेरा चाहिए। 2. कभी वैराग है कभी अनुराग है, जहाँ बदलते हैं माली वही बाग है। मेरी चाहत की दुनिया बसे न बसे, मेरे दिल में बसेरा तेरा चाहिए। 3. मेरी धीमी है चाल और पथ है विशाल, हर कदम पर मुसीबत है, अब तो सम्भाल। पैर मेरे थके यह चले न चले, मुझको तेरा सहारा चाहिए। आसरा इस जहाँ का मिले न मिले,
स्रोत: नमन, पृष्ठ 86
प्रसिद्ध राम/हनुमान/सीता/लक्ष्मण भजन (लोक परम्परा)

ये भजन नमन ग्रन्थ का भाग नहीं हैं — शताब्दियों पुरानी लोक/भक्ति परम्परा से लिये गये हैं, अतः पृथक चिह्नित हैं।

रघुपति राघव राजा राम

रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम। ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान।।
स्रोत: पारम्परिक राम धुन — पूर्ण पाठ शीघ्र

अन्य शीर्षक (पाठ शीघ्र जोड़ा जायेगा)

श्री रामचन्द्र कृपालु भजमन (देखें: स्तुति अनुभाग) ठुमक चलत रामचन्द्र — तुलसीदास पायो जी मैंने राम रतन धन पायो राम सिया राम जय जय राम हे दुःख भंजन मारुति नंदन श्री राम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में सीता राम सीता राम सीताराम कहिये राम लक्ष्मण जानकी जय बोलो हनुमान की लक्ष्मण सा भाई हो
सूची तय — पूर्ण बोल आगामी चरण में

आरती

नमन ग्रन्थ के आरती प्रखण्ड से
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पूजन के अन्त में इष्टदेव की प्रसन्नता हेतु आरती की जाती है। नमन ग्रन्थ के अनुसार पाँच महामन्त्र हैं — ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, गायत्री मन्त्र, हरे राम-हरे कृष्ण महामन्त्र, महामृत्युंजय मन्त्र, तथा ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे।

देवी-देवताओं की आरतियाँ

आरती श्री गणेश जी

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।। पान चढ़े पुष्प चढ़े और चढ़े मेवा। लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करे सेवा।। जय गणेश देवा...... एकदन्त दयावन्त, चार भुजा धारी। मस्तक सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी।। जय गणेश देवा...... अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया। बाँझन को पुत्र देत, निर्धन का माया। जय गणेश देवा...... पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा। सूरश्याम शरण आये सुफल कीजे सेवा।। जय गणेश देवा...... दीनन की लाज रखो शम्भु-सुत वारी। कामना को पूरा करो जग बलिछारी।। जय गणेश देवा......
स्रोत: नमन, पृष्ठ 63

आरती श्री शिवजी

जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा।। जय शिव ओंकारा........ एकानन चतुरानन पंचानन राजे। हंसासन गरुड़ासन वृपवाहन साजे।। जय शिव ओंकारा........ दो भुज चारु चतुर्भुज दसमुख अति सोहे। तीनों रूप निरखता, त्रिभुवन जन मोहे।। जय शिव ओंकारा........ अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी। चन्दन मृग मद सोहे, भाले शशि धारी।। जय शिव ओंकारा....... श्वेतांबर पीतांबर बाघाम्बर अंगे। सनकादिक, ब्रह्मादिक, भूतादिक संगे।। जय शिव ओंकारा........ कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधर्ता; जगकर्ता, जगहर्ता, जगपालन कर्ता।। जय शिव ओंकारा........ चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरों। बाजत ताल मृदंग, अरु बाजत डमरू।। जय शिव ओंकारा........ ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका।। जय शिव ओंकारा........ त्रिगुण शिव की आरती जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, सुख संपति पावे।। जय शिव ओंकारा.........
स्रोत: नमन, पृष्ठ 63

आरती श्री जगदम्बे जी

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी। जय अम्बे.. मांग सिंदूर विराजत, टीको मुगमद को। उज्जवल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको।। जय अम्बे.. कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजे। रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै।। जय अम्बे.. केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी। सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुःखहारी।। जय अम्बे.. कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योति।। जय अम्बे.. शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती। धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदगाती।। जय अम्बे.. चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे। मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे।। जय अम्बे.. ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी। आगम निगम बखानी, तुग शिव पटरानी।। जय अम्बे.. चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों। बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू।। जय अम्बे.. भुजा चांर अति शोभित, वरमुद्रा धारी। गनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी।। जय अम्बे.. कंचन थाल विराजात, अंगर कपूर बाती। गां अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे।। जय अम्बे..
स्रोत: नमन, पृष्ठ 64

आरती श्री कृष्ण जी (कुंज बिहारी की)

आरती कुंज बिहारी की। श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।। गाले में बैजंती माला, बजावे मुरली मधुर बाला, श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद, श्री आनंद कंद, मोहन ब्रुज चंद, राधिका रमण बिहारी की। गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली, लतन में ठाढ़े वनमाली, भ्रमर-सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र-सी झलक, ललित छवि श्यामा प्यारी की। श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।। जहाँ से प्रकट भयी गंगा, कलुप कलि हारिणि श्री गंगा, स्मरण से होत मोह भंगा, बसी शिव शीश, जटा के बीच, हरै अघ कीच, चरण छवि श्री बनवारी की। श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 64

आरती श्री हनुमान जी

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्टदलन रघुनाथ कला की।। जाके बल से गिरिवर काँपे। रोग दोष जाके निकट न झाँके।। अंजनि पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई।। दे बीरा रघुनाथ पठाये। लंका जारि सिया सुधि लाये।। लंका-सो कोटि समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई।। लंका जारि असुर संहारे। सिया राम जी के काज संवारे।। लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि संजीवन प्रान उबारे।। पैठि पाताल तोरि जम-कारे, अहिरावन की भुजा उखारे।। बायें भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा सन्त जन तारे।। सुर नर मुनि जन आरती उतारे। जै जै जै हनुमान उचारे।। कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई।। जो हनुमान जी की आरती गावै, बसि बैकुंठ परमपद पावै।। लंका विध्वंस किए रघुराई। तुलसीदास प्रभु कीरति गाई।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 65

आरती बालकृष्ण की कीजै

आरती बालकृष्ण की कीजै, अपनो जन्म सुफल कर लीजै, श्री यशुदा को परमदुलारो, बाबा की अँखियन को तारो। गोपिन के प्राणन सौ प्यारो, इन पर प्राण न्यौछावर कीजै।। आरती बालकृष्ण की कीजै......... वलदाऊ को छोटो भैया, कनुआ कहि कहि बोलत भैया, परम मुदित मन लेत बलैया, इनको सरबस अर्पण कीजै।। आरती बालकृष्ण की कीजै......... श्री राधावर कुँअर कन्हैया, ब्रजनन को नवनीत खवैया, देखत ही मन लेत चुरैया, यह छवि नैनन में भरि लीजैं।। आरती बालकृष्ण की कीजैं......... तोतरि बोलन मधुर सुढ़ावै, सखन मध्य खेलत सुख पावै। सोई सुकृति जो इनको ध्यावे, अब इनको अपनो करि लीजैं।। आरती बालकृष्ण की कीजैं.........
स्रोत: नमन, पृष्ठ 65

आरती श्री जगदीश जी

ओ३म् जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे।। ओ३म् जय जगदीश हरे...... 1. जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का। सुख संपत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का।। ओ३म् जय जगदीश हरे...... 2. मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी।। ओ३म् जय जगदीश हरे...... 3. तुम पूरण परगात्मा, तुम अंतर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुग सबके स्वामी।। ओ३म् जय जगदीश हरे...... 4. तुम करुणा के सागर, तुम पालन कर्ता। मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता।। ओ३म् जय जगदीश हरे...... 5. तुम हो एक अगोचर, सबके प्रानपति। किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति।। ओ३म् जय जगदीश हरे...... 6. दीन बंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे। करुणा हस्त बढ़ाओ, द्वार पड़ा तेरे।। ओ३म् जय जगदीश हरे...... 7. विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा।। ओ३म् जय जगदीश हरे...... 8. तन मन धन और सम्पति, सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा।। ओ३म् जय जगदीश हरे......
स्रोत: नमन, पृष्ठ 66

राम जी की आरती

है राजा राम तेरी आरती उतारूँ आरती उतारूँ मैं तन मन वारूँ है राजा राम तेरी आरती उतारूँ। 01– कनक सिंहासन राजत जोड़ी, दशरथ नंदन जनक किशोरी, युगल छवि को सदा निहारूँ है राजा राम तेरी आरती उतारूँ। 02– अगर कपूर की बाती जगमग, मन मेरा प्रभु हो तुम–सा निश्चल, निश्छल मन से शीश निवारूँ, है राजा राम तेरी आरती उतारूँ।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 66

सर्व देव आरती (20 छन्द)

जय सिया राम लक्ष्मण जानकी, जय बोलो हनुमान की जय बोलो गणपति गणेश की, जय बोलो गौरां महेश की, जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 1. आओ मिलकर पूजा करें हम भगवान की, एकता बनाएं अपनी जोड़ें जय जयकार की। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 2. वन्दन करें उस गणेश को जो विघ्न हरता है, हर कार्य के आरम्भ में जो शुभ करता है। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 3. जय जय शिव शंकर जय भोलेनाथ की, आरती उतारें हम देव महान की। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 4. जय देवी माँ दुर्गा महाशक्ति अपार, भक्तों की रक्षा करो दे दो आशीर्वाद। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 5. जय लक्ष्मी माँ धन की दाता सुख की दात्री, घर घर में बसो माँ सबकी भाग्य विधात्री। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 6. जय सरस्वती माँ वीणा वादिनी, बुद्धि ज्ञान की दाता जन मन भाविनी। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 7. जय जय कृष्ण मुरारी नन्द के लाल की, भक्ति भाव सागर में डुबो दे आज आत्मा। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 8. जय जय राम रहीम सबके हैं सहाय, पतित पावन तुम हो मिटा दो बुरा भाव। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 9. जय जय हनुमान शक्ति के भंडार, भक्त कल्याण के लिये करते उद्धार। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 10. जय जय कार्तिक सुब्रह्मण्य षडानन, जय सूर्य देव नमस्कार चन्दन। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 11. जय जय विश्वकर्मा देव श्रेष्ठ, सकल जगत के निर्माता ज्येष्ठ। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 12. जय जय नवग्रह शान्त करो ग्रहों को, हे भगवान दो शान्ति सभी मनो को। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 13. जय श्री यमुना जय श्री गंगा माई, जय जय भारत माँ सबकी सुखदाई। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 14. जय जय तुलसी माँ पावन और पवित्र, श्री हरि के चरणों की हो तुम सुप्रिय मित्र। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 15. जय जय शनि देव दुखहर्ता, न्याय के देव और धर्म के धर्ता। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 16. जय जय भैरव काल भैरव नाथ की, जय जय मंगल ग्रह राज रात की। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 17. जय जय नाग देव नागराज नाग की, जय जय वरुण देव सागर जल राज की। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 18. जय जय पवन देव वायु प्रचण्ड की, जय जय अग्नि देव ज्वाल प्रबल की। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 19. जय जय ब्रह्मा विष्णु शिव त्रिदेव, सब देवन में पूज्य हैं ये देव। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी...... 20. जय जय श्री राम हमारे देवता, राम भक्ति में हम सब हैं एकता। जय सिया राम लक्ष्मण जानकी......
स्रोत: नमन, पृष्ठ 66-67

आरती श्री रामायण जी की

आरती श्री रामायण जी की, कीरति कलित ललित सिय-पी की। टेका।। गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद, बालमीकि वियान-विसारद्। शुक सनकादि सेप अरु सारद, वरनि पवनसुत कीरत नीकी।। गावत वेद पुरान अष्टादस, छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस। मुनि जन धन संतन कों सरबस, सार अंस संम्मत सब ही की।। गावत संतत सिंभु भवानी, अरु घट संत यहाँ तहाँ बानी। व्यास आदि कविवर बखानी, कागभुशुण्डि गरुड़ के ही की।। कलिमल हरनि विषय रस फीकी, सुभग सिंगार मुक्ति जुवती की। दलन रोग भव मूरि अमी की, तात मात सब बिधि तुलसी की।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 68

भागवत भगवान की आरती

श्री भागवत भगवान की है आरती, पापियों को पाप से है तारती। यह अमर ग्रंथ ये मुक्ति पंथ, यह पंचम वेद निराला है नव ज्योति जगाने वाला है हरि नाम यही हरी धाम यही, जग के मंगल की आरती, श्री भागवत भगवान की है आरती।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 68
कार्तिक की आरतियाँ

धार्मिक परम्पराओं के अनुसार कार्तिक मास को वर्ष का सबसे पुण्यमय मास माना जाता है। इस मास में की गई प्रत्येक पूजा, अर्चना का अक्षय फल मिलता है।

आरती-1 (कार्तिक प्रभाती)

रैन गुजरी प्रभात होईया वे राम जी, चानड़ी वे फिर गई। चानड़ी वे फिर गई श्रीराम चन्द्र, जागो मैं सारी वारी गई।। तू जागे त्रिलोकी पई जागो रामजी, मन दी चिन्ता मिट गई।। मन दी चिन्ता मिट गई श्रीराम चन्द्र, जागो मैं सारी वारी गई।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 96-97

आरती-2

धन्य-धन्य सो जेहड़ा हरि दा गुण गावे, ते ठाकुर तुलसी दा दर्शन पावे।। 1. गंगा नहावन पाप मिटावन, अधिक फल सोई जन पावे। नाम देवां दा जो मन में ध्यावे, मन वांछित सोई जन फल पावे।। 2. माता तुलसी पिता मेरा ठाकुर, पूजा करां पई मन चित्त लाकर, देवी ते देवा राम जी सब तेरे चाकर, गोविन्द नाम सुने और सुनावा।। 3. जल फल तुलसी ठाकुर जी की सेवा, प्रीत सहित राम तुलसी सेवा, ते सेवा दे फल सोई जन पावे, जो आप जपे और नाम जपावे 4. दासन दास भगवान तेरी मैं आस, नाम दान की जो मन में है प्यास। जब लग जीवां हरि-हर सुमरा मैं स्वांस, गोविन्द नाम सुने और सुनावे
स्रोत: नमन, पृष्ठ 97-98

आरती-3 (तुलसी स्तुति)

मेरी नमो नमः तुलसी महामाया मेरी नमो नमः। 1. सीतल तेरे पातर कोमल मंजरी, चरण कमल लिपटानी। 2. छत्री तेरे भोजन छत्री व्यंजना, तुलसी बिना राम एक न मानी 3. गल मेरे तुलसी ते मुख श्री राम चन्द्र धन्य तुलसी ते सालिग्राम स्वामी भयो पटरानी 4. शिवसनकादिक ते ब्रह्मादिक, खोजत है, ऋषि मुनि जन जानी। 5. दो हाथ जोड़ हनुमान अगे ठाड़े, भक्त दान तू देवें महामाया 6. तुलसी दास स्वामी तेरा यश गावे, कलयुग मेरी लज्जा रखणी भवानी
स्रोत: नमन, पृष्ठ 98-99

आरती-4

सारे ब्रज दे पालन हार भये; घर आवे तौं मोहन मेरा लाल। हे मैं वारी जावां, आवे यशोदा दा लाल; सारे ब्रज दे पालनहार।। 1. मोर मुकट मत्थे तिलक विराजे; ते कुण्डला दे वन जाल। हे मैं वारी जावां; हीरे रत्न जड़ात; सारे ब्रज दे पालनहार।। 2. दस्त कुण्डी वें मोडे काली आ कमली; ते गऊंआ दा चरवाल। हे मैं वारी जावां; गऊँआ दा जीवे रखवाल; सारे ब्रज दे पालनहार। 3. बिन्द्रावन विच रास रचाइयां; ते गोपियाँ ग्वालां दे नाल। हे मैं वारी जावां; खेले तौं आप नारायण; सारे ब्रज दे पालनहार।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 99

आरती-5 (प्रभाती)

1. प्रातः काल उठ आलस त्यागूं, राम नाम गुण मुख से मैं गाऊँ। राम भजन करके नहवायां करां; मन तन घिसा के, चन्दन हरि जी को लागे, राम धूप दीप तन वारा करूँ 2. सोरस पूजां कोई तुम्हारी कमाबां, राम नाम गुण मुख से मैं गाऊँ। राम जी कृपा करो दर्शन पाया करूँ 3. सेवा पूजा मैं कुछ भी न जांणा, आवां जावां मैं पाप मिटांवा दर्शन तेरा भगवन आके मैं पावां; राम तुलसी दास हरि गुण गाया करूँ; कृपा करो दर्शन पाया करूँ
स्रोत: नमन, पृष्ठ 100

आरती-6

तेरे दर्शन तो मैं वारी गई, श्री राम चन्द्र जागो मैं सारी वारी गई।। खोल दे बछड़ा ते चुगो पई माता, रामजी दोहनी वे भर गई। दोहनी वे भर गई श्री राम चन्द्र; जागो मैं सारी वारी गई।। हाथ लै गडवा ते धो लै मुखड़ा रामजी; नींद आलस गई। नींद आलस गई श्री राम चन्द्र; जागो मैं सारी वारी गई।। ग्वाल बाल ते बालक ठाड़े वे राम जी; वन दी हवेल हो गई। वन हवेल हो गई श्री राम चन्द्र; जागो मैं सारी वारी गई।। मोर मुकुट मत्थे तिलक विराजे राम जी; सुन्दर बन्सी बजाई। सुन्दर बन्सी बजाई श्री राम चन्द्र; जागो मैं सारी वारी गई।। दस्त कुन्थी वें मोडे काली आ कमली रामजी; वन-वन धेनु चराई। वन-वन गऊंआ चराई, श्री राम चन्द्र; जागो मैं सारी वारी गई।। काली पीली धोली धुम्बट राम जी जमुना दे तट गई। जमुना दे तट गई श्री राम चन्द्र; जागो मैं सारी वारी गई।। दुध भी देसां मैं मखखन वी देसां राम जी; नाले मैं देवां मिटठी दही। नाले मैं देवा मिट्ठी दही श्री राम चन्द्र; जागो मैं सारी वारी गई।। आर मथुरा ते आर गोकुल श्रीराम जी; विचों श्री जमुना दे गई। विचों श्री जमुना दे गई श्री राम चन्द्र
स्रोत: नमन, पृष्ठ 100-101

आरती-7

भजनमन राम चरन दिन राती वे भजमन 1. भर-भर आव मिटे रस ध्यावत, हरि चर्चा; रामा हरि चर्चा वे सुहाती वे भजनमन 2. रसना कस न भजे तू हरि पद; सुमिरन क्यों अलसाती वे भजमन 3. जाके कहत दहत दुख दारूण, सन जिया ताप रामा; सन जिया ताप बुझाती वे भजमन 4. पढ़ते श्रवण सुयश रघुवर के, अति हिय जुड़ा वे रामा; अति ही जुड़ा हिय छाती वे भजमन 5. श्रोता सुम्मत सुशील सो हरिजन, देत सलाह वे रामा; देत सलाह वे सुहाती वे भजमन 6. रामचन्द्र जी का नाम अमियरस, सोरल काहे वे रामा; सोरल काहे को न खाती वे भजमन 7. सोलह सम्मत सहे इकतीसा, जेठ माघ रामा; जेठ माघं सुहावती वे भजमन
स्रोत: नमन, पृष्ठ 101

आरती-8 (आरती श्री रामचन्द्र जी की — 15 छन्द)

आरती करां श्री रामचन्द्र तेरे चरणां तो बलिहारी जी। 1. दस्त कुन्थी वें मोडे काली कमली, गऊंआ दा चरवाली जी। 2. मात यशोदा दईयां विलोवे, माखन खा गिरधारी जी। 3. मैं चली यमुना जल भरने, मेरे सिर पर गागर भारी जी। 4. गगरी पटक मेरी बईयां मरोड़ी हँस हँस देवां गाली जी। 5. मैं चली यमुना जल भरने, मेरे सिर पर गागर भारी जी। 6. गगरी पटक मेरी बईयां मरोड़ी हँस हँस देवां गाली जी। 7. कंस राजे नूँ मार मुकाया, हया बड़ा हंकारी जी। 8. रावण राजा मार मुकाया, लंका हो गई खाली जी। 9. भक्त सुदामा ते कृपा कीन्हीं, चढ़ गये महल अटारी जी। 10. नरसी भगत पर कृपा कीन्हीं, सांवल हुन्डी तारी जी। 11. भरी सभा मेरी लजिया रखिया, द्रोपदां दुखियारी जी। 12. माता द्रोपदां दी लजिया रखिया मैं अबला दी वारी जी। 13. अपनी भक्ति दे नन्द लाला, अरजां करां गुलजारी जी। 14. इसे मन्दिर विच प्रकट हो जा, रामचन्द्र अवतारी जी। 15. चन्द्र सखी भज बाल मोहन, तेरे चरणां तों मैं वारी जी।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 102-106
प्रेम पुकार

गोविन्द मेरी यह प्रार्थना है

गोविन्द मेरी यह प्रार्थना है गोपाल मेरी यह प्रार्थना है भूलूँ न मैं नाम कभी भी तुम्हारा निष्काम होके दिन रात गाऊँ, गोविन्द दामोदर माधवेति। 1. देहान्त काले तुम सामने हो बन्सी बजाते मन को लुभाते गाता यही मैं तन नाथ त्यागूं, गोविन्द दामोदर माधवेति। 2. माता यशोदा हरि को जगावे, जागो उठो मोहन अब नैन खोलो द्वारे खड़े गोप बुला रहे हैं, गोविन्द दामोदर माधवेति। 3. जागे पुजारी हरि मन्दिरों में, जागो जगाते अपने प्रभु को हे शील सिंधु अब नेत्र खोलो, गोविन्द दामोदर माधवेति। 4. कोई नवेली पति को जगाये प्राणेश जागो अब नींद त्यागो बेला यही है हरि गीत गावो, गोविन्द दामोदर माधवेति। 5. प्यारे जरा तो मन में विचारो, क्या साथ लाये क्या ले चलोगे जाये सदा संग यह ही तुम्हारे, गोविन्द दामोदर माधवेति। 6. नारी धरा धाम सौ पुत्र प्यारे सद मित्र सदबान्धव सब सारे कोई न साथी हरि को पुकारे, गोविन्द दामोदर माधवेति। 7. नाता भला क्या जग से हमारा, आये यहाँ और कर क्या रहे हो सोचो विचारो हरि को पुकारो, गोविन्द दामोदर माधवेति। 8. सच्चे सखा हैं हरि ही हमारे, माता-पिता शील सब बन्धु प्यारे भूलो न भाइयों दिन रात गाओ, गोविन्द दामोदर माधवेति। श्री राधे, श्री कृष्ण, जी अब है मेरी बार, दास जान निज शील को, सुनिए प्रेमी पुकार। दास अटके मंझदार में, हो भवसागर पार, क्यों अटके मंझदार में, हो भवसागर पार।। शील पढ़े जो भाव से, निशदिन प्रेम पुकार।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 107
गुरु आरती

आरती — बाबा जी की

तुहाडी आरती गादी के लाल, के दाता दयाल जी मैं गावां द्वार तुहाडे। 1. सोने की थाली में ज्योत जगावां, सुन्दर तुहाडी गादी दा यश पिया गावां।। तेरी गादी तो जावां बलिहार, कि दाता दयाल, जी मैं गावां द्वार तुहाडे।। 2. धन्य धन्य बाबा तुलसी दास स्वामी, घट घट दे तुसी अन्तर्यामी। तेरी महिमा अपर अपार, कि दाता दयाल जी; मैं गावां द्वार तुहाडे। 3. अपर अपार तुम्हारी माया, इसदा भेद किसे नहीं पाया। ऋषि मुनि गये हार, न पाया पार, मैं गावां द्वार तुहाडे। 4. द्वार तेरे मैं नित पिया आवाँ, सुन्दर तुहाडी गादी दा यश पिया गावां। तेरी गादी तो जावां बलिहार, कि दाता दयाल जी मैं गावां द्वार तुहाडे। 5. सेवक आये शरण तुम्हारी, मेरे बाबा जी तू हे संकट हारी। तेरे दास की है यह पुकार, करो बेड़ा पार मैं गावां द्वार तुहाडे। 6. जो बाबा तुहाड़ी आरती गावे, मन वांछित सोई फल पावे होंदा भव से पार, सुनो करतार, सच्चा दरबार, भरे नी भण्डार, मैं गावां द्वार तुहाडे।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 114

करां मैं आरती सत गुरू दी

करां मैं आरती सत गुरू दी, करां मैं आरती बाबे दी। 1. हुए यह पूरन संत महान, महिमा गा गये वेद पुराण। करूँ कर जोड़, दोनों हथ जोड़, रमावां भूड़ तेरे दर दी।। करां मैं आरती सत गुरू दी, करां मैं आरती बाबे दी। 2. बनाया ऐसा ग्रंथ महान, हस्ताक्षर कर गये शिव भगवान। खुले किवाड़, हुई जयकार, प्रथम वहीं रामायण ही थी।। करां मैं आरती सत गुरू दी, करां मैं आरती बाबे दी। 3. लगा था इनको प्रेम का बाण, मिले जाकर इनको हनुमान। चित्रकूट के घाट, आए रघुनाथ, छवि को देख सांवरे की।। करां मैं आरती सत गुरू दी, करां मैं आरती बाबे दी। 4. पहरेदार बने भगवान संग थे, लक्ष्मण और हनुमान। भगत के काज आये रघुनाथ, कर रहे रक्षा कुटिया की।। करां मैं आरती सत गुरू दी, करां मैं आरती बाबे दी। 5. कहूँ कहाँ लग उपमा मैं, तेरा यह न भेद पाया मैं। गये सब हार न पाया पार, यह रमजा जाणे तीरथ की।। करां मैं आरती सत गुरू दी, करां मैं आरती बाबे दी। 6. दोनों हाथ जोड़ खड़ा दर ते, जानके दीन दया कर दे। जाऊँ बलिहार, तेरे लखवार, प्यासी अखियाँ दर्शन की।। करां मैं आरती सत गुरू दी, करां मैं आरती बाबे दी।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 115

छन्द

नमन ग्रन्थ के सम्पूर्ण 16 छन्द — पृष्ठ 87-96
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छन्द–1

मेरी वन्दना तेरे आगे बारम्बार बाबा जी। 01– मैं हाँ दर तेरे दा चाकर, अरजीं करना शीश निवा कर। जीवों दर्शन तेरा पाकर हर हर बार बाबा जी। 02– तेरी शरण हैं दीन दयाला, मैं हूँ तेरा नियाणा बाला। तेरे जय हो जग के लाला, जग आधार बाबा जी।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 87

छन्द–2

धन बाबा तुलसीदास गड़ी शहर तेरा स्थान, जांवई चरणां तो कुरबान। धन बाबा तुलसीदास गुरू तेरी महिमा है बेअन्त, किस पाया तेरा अन्त तू है पूरण फकीर बक्खों नाम दी जागीर, तू सबदा है महन्त गल विच पाके पल्ला दाता मैं करना तेरा ध्यान; जांवई चरणां तो कुरबान।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 87-88

छन्द–3

तेरे दर्शन नूँ मेरे बाबा जी सब संगत आई होयी आ। 01– सब संगत माई भाई तेरे दर्शन नूँ है आई। गज के जै कार बुलाई, पुल्ली दी बरखा, लाई होयी आ। 02– तू है दीन दखी दा वाली – तेरी शान जहाँ तो निराली। तू है हिन्द बाग दा माली महिमा तेरी अजब संवाई होयी आ। 03– तू दे दर्शन गुरु मेरे मैं आन खड़ा दर तेरे। तेरे अगे मेरी नमस्कार, दास ने खुशी मनाई होयी आ।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 88-89

छन्द–4

नाम तेरे दा मैं यश पिया गांवा, तैनूं ध्यावां मैं तैनू ध्यावां 1. तैनूं ध्यावां जपां तेरा जाप, मैं गुनाहगार मेरे दूर करो पाप हथ बनके ते मैं शीश निवावां, तैनूं ध्यावां मैं तैनू ध्यावां 2. तैनूं ध्यावां तू साचा करतार, इस बेड़े डुबदे नूँ कर देवो पार, तेरे बिना बाबा केड़े पासे जावां, तैनूं ध्यावां मैं तैनूं ध्यावां 3. तैनूँ ध्यावां तू है पूरण ब्रह्म, जमीं आसमान खलवाईया बिन थम्ब तेरे खेलां तो मैं वारी-वारी जावां, तैनूँ ध्यावां मैं तैनूँ ध्यावां 4. तैनूँ ध्यावां तू सबका जो दाता, जो जीवां जन्तु तू सबको रोजी पहुँचाता कहन्दा मोती चन्द तेरियाँ-ठंडियाँ नी छावाँ। तैनूं ध्यावां मैं तैनूं ध्यावां
स्रोत: नमन, पृष्ठ 89-90

छन्द–5

दर तेरे ते आवां बाबा–तू है सिद्ध महान जी, मुश्किल करो आसान जी। 1. धन-धन बाबा जी सफाचन्द, तू कट सेवकां दे फन्द, कर देओ आनन्द बुलन्द बाबा जी, रामटन्ड तेरा निशानजी, मुश्किल करो आसान जी। 2. धन-धन बाबा जी सुखचैन, मैं नाम जपई दिन रैन, पंज दुश्मन मेरे हैन, बचाथीं इन्हां तो मेरी जान, मुश्किल करो आसान जी। 3. स्वामी रामतीरथ सन्यासी, जिन्हां कटी जमां वाली फांसी, करामाती नरसिंह दासी,, वासी शिवे दे दरम्यान जी, मुश्किल करो आसान जी। 4. दर तेरे दा भिखयारी, सुन बैनती हमारी, हुण दास मंगे प्यार तेरा, जिस बिन होन्दी नहीं गुजरान जी। मुश्किल करो आसान जी।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 90

छन्द–6

जिन्हां सिदक गुरां ते रखया उनानें सब कुछ पाया है। ओ तां रह गये मूरख खाली, जिनौनू समझ ना आया है। 1. धन-धन बाबा तुलसी दास, सेवक आये तेरे पास। पूरी कर दे उनां दी आस जिनाने मन चित लाया है। 2. धन-धन बाबा जी सफाचन्द, तेज गुरां दां सबतों बुलन्द। सेवक आके बोलन छन्द मुखों जैकार बुलाया है। 3. धन-धन बाबा जी सुख चैन, वेखां पाप कटन दिन रैन। मालक सृष्टि दे ओ हैन मन नूँ चैन भी आया है। 4. स्वामी राम तीर्थ सन्यासी, जिनौंने कटी जमा दी फांसी। जेहड़ा सतगुरू दे गुण गासी बेड़ा पार हो जांदा है। 5. गवखड़ सतगुरू दे गुण गा ले, जीवन अपना सफल बणा ले। सतगुरू जी दी सेवा कमाले आस पुजावन आया है।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 90-91

छन्द–7

एतवार दा लागदा मेला बड़ा बणया है आनन्द, धन बाबा सफाचन्द 1. एतवार दा लागदा मेला संगत दूरों-दूरों आवे, फिर आके शीश निवावे, फूल ते बतासे गुरू भेंट तेरी चढ़ावे, मुँह मंगया सो फल पावे। ओ वगदा स्वर्ग जावे, छोड़ मोह माया दे फन्द, धन बाबा सफाचन्द। 2. ओ वगदा स्वर्ग जावे छिन में दूर हो जांदे पाप, तू कृपा करे आप। सिख सेवक माई भाई सब जपदे तेरा जाप, तू सबदा माई बाप। भजन दा प्रताप सारे जग विच सरगन्द, धन बाबा सफाचन्द। 3. भजन दा प्रताप सदा खड़े नी ब्रह्मण्ड, सत दीप चौदह नौ खण्ड। मैं पापी औगुण हारा मेरे सिर पांपां दी पन्ड, दे दर्शन पवे ठन्ड। जागीर तेरी रामटन्ड ओ सबना सी बुलन्द। धन बाबा सफाचन्द। 4. जागीर तेरी रामटन्ड जो नित रवई आबाद,, लोकी पूजदे ने समाध। आसां होन्दी पूरी बाबा जे हर जगह करां याद, हासिल होन्दी मुराद। पर हैंवे पूर्ण सन्त आके झुकदे नी दसवन्त। धन बाबा सफाचन्द। 5. पर हैंवे पूर्ण सन्त पहाड़ां तेरा वास, नित ज्योति तेरी प्रकाश। खार ते बट खेला थाना डेरी तुम्हरे पास, लोकी टेलिया तेरा दास। धन बाबा तुलसीदास जिसने ले उड़ाया कन्द। धन बाबा सफाचन्द। 6. धन बाबा तुलसी दास जिसदा गढ़ी विच मकान, लोकी पूजदा सब जहान। अमृत जैसे जल ब्रह्माजी-विच खड़े सावधान, विच भैरों जी दा स्थान। करदा वी व्याख्यान रामजी नित बणावई छन्द। धत् बाबा सफाचन्द। 7. करदा वी व्याख्यान सिठा बैठ के किनारे, ओ सब दा खिदमतगार ए। तुलसीं सफरीं बाबा जी असी ऐ उचारे, मूढ़ मत मेरी गंवार ए। छोन्दा हर जेहड़ा शहरी बार ओ फिरदा चाक चाबन्द। धन बाबा सफाचन्द।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 91-92

छन्द–8

झगड़ों में दिल न फँसा बाबा; गुण नित दिन कृष्ण के गा बाबा। 01– ज़र पास हो यार हजार हुए; बेज़र का कोई न हुआ बाबा। झगड़ों में दिल 02– सब मतलब के नाते रिश्ते; बेमतलब कोई न हुआ बाबा। झगड़ों में दिल 03– कृपा तुझ पर मालिक ने की; भूखे को अन्न खिला बाबा। झगड़ों में दिल 04– धन यौवन मस्ती दो दिन की, अभियान में तू मत आ बाबा। झगड़ों में दिल
स्रोत: नमन, पृष्ठ 92

छन्द–9

धन बाबा तुलसी दास साड़ी पूरी कर देओ आस। गादियाँ वाले अपने सेवकौं दे दुखड़े मिटा दे। तेरी महिमा है पीरा बेअन्त, तैनूँ सेवे सब जीव जन्तु; तू है पूर्ण फकीर बख्शो मैनूँ नजीर। गढ़ी शहर विच सी तेरा स्थान, जित्थे बण गया पाकिस्तान; तेरा थां रह गया साडा दिल बह गया। दर तेरे ते जो नित पिया आवे हाथ बनके ते शीश निवावे; जेड़ा दर तेरे ते आन्दा, ओ ना खाली जान्दा, आस पुजावे दुनियाँ से तूने प्रीत हटाई, राम नाम की रटन लगाई; किया जिसने राम से प्यार, होगा उसदा बेड़ा पार। है आजाद तेरे गुण गावे, मुझे मतियां मुरादां पिया पावे; रख ले मेरी तू लाज है गरीब निवाजा।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 92-93

छन्द–10

इक बार तुवाड़ी रहमत दा, थोड़ा वी इशारा हो जावे। इस बदनसीब दुनिया दे विच, थोड़ा उजियारा हो जावे। इस जन्म मरण दे चक्कर तों, मेरा छुटकारा हो जावे, इक नाम दा जाम पिला देवो, बाबा जी तुसी कर 'कमलां' नाल, इस रंजो अलम दी दुनियां विच, मेरा भी गुजारा हो जावे, मैं आप खुशी नल मर जावां, मरने दा कोई वी रंज नहीं, बाबा तुलसी जी प्रकाश करो, इस सूने मन दे मन्दिर विच, मेरी मंजिल आसां हो जावे
स्रोत: नमन, पृष्ठ 93

छन्द–11

अपनी गादी दा नाल समाधि दा दर्श कराते। सानूँ गढ़ी कपूर पहुँचा दे। 01– धन-धन बाबा जी सुखचैन तेरा गढ़ी दे विच सी स्थान। बण गया पाकिस्तान रह गया तेरा स्थान, हिन्द बना दे। सानूँ गढ़ी कपूर 02– तेरी गढ़ी कपूर दी गादी सानूँ हर वेले याद पई आँदी साडी सुण ले पुकार सानूँ ले जा इक बार अपणे द्वारे।सानूँ गढ़ी कपूर 03– उत्थे मेला सी लागदा इतवार, संगत आँदी से बड़ी बेशुमार नाल सी भैरों स्थान, वीर बलवान, राम दे प्यारे। सानूँ गढ़ी कपूर 04– साडे मन विच आशा है भारी, करिये दर्शन गादी दा इक वारी हैं अनाथां दा नाथ साडी लाज तेरे हाथ, आके बचा दे। सानूँ गढ़ी कपूर 05– गखड़ सतगुरू दे गुण गावे, आके चरणां ते शीश नवावें सानूँ चरणां दी धूड़, सतगुरू बख्शो जरूर, आस पुजा देसानूँ गढ़ी कपूर
स्रोत: नमन, पृष्ठ 93-94

छन्द–12

मैं शरणी आंवई, धन तुलसीदास गादियों वाले, मैं शरणी आंवई.............. तुआडी मैं शरणी आवां बाबा हमेश जी, थान ते मैं टैल कमांवई नित आंवई पेश जी, करना मैं बैन्ती सतगुरू, काठो कलेश जी, धुखदे नी धूपं, ब्रहमे दा रूप, भैरो तेरे नाले, बाबा भैरो तेरे नाले। भैरो बलवान बाबा, नित आंवई द्वारे, सिख सेवक माई भाई बोलन जैकारे, देग तुम्हारी बरकत वाली भरे नी भण्डारे, करले स्नान, लगाके ध्यान, बने दुध शाले पन्जां नूँ मार के बाबा, लितिया तू गादी, तेरे गल अम्बुआ सोहे, सुन्दर है नादी। तेरा मैं यश पिया गावाँ, बणिया आबादी, तेरा यश गावाँ शीश निवावाँ हो कृपालु, बाबा जी हो कृपालु। होवें कृपालु बाबा मेरे पर आप जी, चरणां ते शीश निवांवई, दूर करो पाप जी, उठके ते प्रातः काल, जपनै तू जाप जी, भिशन गुलाम, रमई इक राम, तेरा इकबाले, बाबा तेरा इकबाले।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 94-95

छन्द–13

धन बाबा सफाचन्द मैं हर वेले कर्ई याद रामटन्ड तेरी समाधि। 01– सब खान भी तुरके आँदे तू ता पूरण फकीर, लोकाई तैनूँ ध्यावे। तू ता है जगत दाता तारे हिन्दू मुसलमान-सब आके शीश नवाँदे। तू ता है पूर्ण फकीर सबदे कर देयो इमदाद। रामटन्ड तेरी समाधि। 02– धन बाबा सफाचन्द जी समाधि तेरी है भारी मेला लागदा है इतवार। माई भाई रल के घरों तुर दे सारे, सब पूजदे बारों बार ए। सब रल के संगत आँदी है अगाध। रामटन्ड तेरी समाधि। 03– सेवक तेरे आके ते परशाद नाल लियावन-रूमाल भी नाल लियां दें। कोई रत्ते ते कोई पीले ते कोई सावे ते कोई चिट्टे होवन समाधि पौवदे। फिर बोलन सब जयकारे तेरे होवे पूरन साधु। रामटन्ड तेरी समाधि। 04– परशाद नूँ इकट्ठा करके फिर भेंट तेरी करदे अरदासां रखदे रोक। माई पाई रल के फिर बेन्ती सारे करदे जितने आये हैं नी लोग। भेंटा तेरी हो गई फिर वरतांदे च परशाद। रामटन्ड तेरी समाधि। 05– बरता के ते परशाद सारे हो जान्दे तैयार मुखतों बोलन जैकार। माई भाई रल के फिर बेन्ती सार करदे मुँह मंगयाँ सो फल पौदे। फिर वापिस घर नूँ जान्दे पाके सब मन दी मुराद रामटन्ड तेरी समाधि।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 95

छन्द–14

दर तेरे मैं आया हूँ, मुझको विश्वास है तू उसकी नैया पार करे जो तेरा दास है, जो तेरा दास है। 01– रहमत सभी को मिलती, तुम्हारे दरबार से। झोली है खाली भरदा, जो आ जाये द्वार पे। ओ झोली भरने वाला, बाबा तुलसीदास है। 02– कोई नहीं है अपना झूठे जहान में। तेरे सिवा कोई मेरा नहीं है ध्यान में। तू मेरी बिगड़ी बना जा मुझको तेरी आस है, 03– तू है मेरा सतगुरु बाबा शक्ति महान है। तू सबके दुखः है हरता ऊँचा तेरा नाम है। तूने किया है जग में पापों का नास है। 04– है आपने भी पूजा भगवान राम को। जिस तरह हुए खुद पार, करना भी श्याम को। करना तू उसका ख्याल रखना जो तेरे पास है।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 95

छन्द–15

तुलसी दास गुरु की बड़ी शान है, जान उनमें हमारी कुरवान है। जिसने लिखी श्री राम की लीला, मेरे सतगुरु की यही पहचान है। 01– सुन्दर नैना तिलक विशाला, मुख पर सुन्दर है लाली। चाँद-सितारे हैं सब तुझपे रोशन, और सब पे तेरा एहसान है। 02– निर्धन को धनवान, निर्बल को बलवान। दुखियों के दुःख दूर करे तूँ सबका है भगवान। तेरे हाथों में मेरी अब लाज है हर मुश्किल को किया आसान है। 03– तुझ बिन कौन हमारे दिल का दर्द यहाँ पर बाँटे। जीवन के हर मोड़ पे बिखरे लाख दुखों के काँटे। हमको दे दो ये भिक्षा दया की, हम बालक तेरे अन्जान हैं।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 95-96

छन्द–16

मेरे बाबा तुलसी दास गुरु, तेरी शान जहीं तो निराली है। 01– तेरे दर ते जो नित आंवदा है हाथ बनके शीश निवाँदा है तेरा रूप निहारा मैं हरदम, तेरे मुख ते सुन्दर लाली है। 02– ए दुनियाँ है सब मतलब दी, इत्थे किसे दे कम कोई आंवदा ना। इक तेरा सहारा है सबनूँ, तेरे दर जो आया सवाली 03– मँझधार दे विच मेरी नैया है दाता जिस दा तू ही खिवैयाँ है डूबदे नूँ सहारा तिनके दा, मेरे गुरीं दी शक्ती निराली है 04– कोई माल खजाना माँगदा है, कोई तेरे रंग विच रंगदा है तेरी कृपा जिसते हो जावे, ओंदे घर विच रोज दिवाली है।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 96

विनय पत्रिका के पद

नमन ग्रन्थ में संकलित 7 पद एवं आह्वान — पृष्ठ 69-71
नमन ग्रन्थ में विनय पत्रिका के 7 चुनिन्दा पद संकलित हैं, जो नीचे मूल रूप में दिये गये हैं। सम्पूर्ण विनय पत्रिका (279 पद, गीता प्रेस संस्करण) के विषय में देखें "ग्रन्थ" पृष्ठ।

पद–1

जाके प्रिये न राम वैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही।। तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषन बंधु, भरत महतारी। बलि गुरू तज्यो कन्त ब्रज बनितन्हि, भये मुद मंगलकारी।। नाते नेह राम के मनियत सुह्रद सुसेव्य जहाँ लौं। अंजन कहाँ आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहाँ कहाँ लौं।। तुलसी सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रानते प्यारो। जासों होय सनेह राम पद, एतो मंतो हमारो।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 69 (मीराबाई को भेजा गया पद — देखें "तुलसी चरित")

पद–2

राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे। घोर भव–नीर–निधि नाम निज नाव रे।।।।। एक ही साधन सब रिद्धि सिद्धि साधि रे। ग्रसे कलि–रोग–जोग–संजम–समाधि रे।।2।। भलों जो है, पोच जो है, दाहिनो जो, बाम रे। राम–नाम ही सों अंत सब ही को काम रे।। जग नभ बाटिका रही है फलि फूलि रे। धुवाँ कैसे धौरहर देखि तू न भूलि रे।। राम–नाम छाड़ि जो भरोसौ करै और रे। तुलसी परोसो त्यागि माँगै कूर कौर रे।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 69

पद–3

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे काको नाम पतित–पावन जग, केहि अति दीन पियारे।। कौने देव बराई बिरद–हित, हठि हठि अधम उधारे। खग, मृग, व्याध, पवान, बिटप जड़, जवन कवन सुर तारे।। देव, दनुज मुनि, नाग मनुज सब, माया–बिबस बिचारे। तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 69

पद–4

तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी। हौं प्रसिद्धि पातकी, तू पाप–पुंज–हारी।। नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसो। मो समान आरत नहिं, आरति हर तोसो।।12।। ब्रह्म तू, हौं जीव, तू है ठाकुर, हौं चेरो। तात–मात, गुरू–सखा, तू सब बिधि हितु मेरो।।13।। तोहिं मोहिं नाते अनेक, मानियें जो भावे। ज्यों त्यों तुलसी कृपालु! चरन–सरन पावे।।14।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 69-70

पद–5

"अबलौं नसानी, अब न नसैहों।" राम–कृपा भव–निसा सिरानी, जागे फिर न डसैहों।। पायेउँ नाम चारू चिन्तामनि, उर कर ते न खसैहों। स्यामरूप सुचि रूचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहों।। परबस जानि हँस्यो इन इन्द्रिन निज बस हवै न हसैहों। मन मधुकर पनकैं तुलसी, रघुपति कमल बसैहों।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 70

पद–6

ऐसो को उदार जग माहीं। बिनु सेवा जो द्रवै दीनपर राम सरिस कोउ नाहीं।। जो गति जोग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनि ग्यानी। सो गति देत गीध सबरी कहँ प्रभु न बहुत जिय जानी।। जो संपति दस सीस अरप करि रावन सिव पहँ लीन्हीं। सो संपदा विभीषन कहँ अति सकुच–सहित हरि दीन्हीं।। तुलसिदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो। तौ भजु राम, काम सब पूरन करैं कृपानिधि तेरो।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 70

पद–7

सुतु मन मूढ़ सिखावन मेरो। हरि–पद–बिमुख लह्यो न काहू सुख, सठ! यह समुझ सबेरो।।1।। बिछुरे ससि–रबि मन–नैनिनतें, पावत दुख बहुतेरो। भ्रमत भ्रमित निसि–दिवस गगन महें, तहँ रिपु राहु बड़ेरो।।2।। जद्यपि अति पुनीत सुरसरिता, तिहुँ पुर सुजस घनेरो। तजे चरन अजहूँ न मिटत नित, बहिबो ताहु केरो।।3।। छुटे न बिपति भजे बिन रघुपति, श्रुति संदेहु निबेरो। तुलसिदास सब आस छाँड़ि करि, होहु रामको चेरो।।4।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 71
आह्वान — प्रभु प्राण बनकर आना

प्रभु प्राण बनकर आना

प्रभु प्राण बनकर आना। शरण तुम्हारी हूँ, प्रभु, मुझको न ठुकराना।। (1) दृष्टि जब समतल हो जाये, स्वभाव जब निर्मल हो जाये शब्द न फूटे जिहवा से, कंठ जब विह्वल हो जाये। नवगीत बन कर आना, प्रभु प्राण बनकर आना।। (2) देखता रहूँ तुम्हें अपलक, मिटे न मेरी यह ललक। श्वांस गति तब जाये चाहे रुक, तुम्हारे लिये हों जब प्राण उत्सुक, स्वीकार करने आना, नव–प्राण बन कर आना।। (3) वासनाओं की हो रही अति, शून्य हैं कर्म, शून्य ही गति। कामना अशेष हो जाये, वासना निस्तेज हो जाये, इन विकारों की आहुति, अग्नि बन ले जाना। प्रभु प्राण बन कर आना।। (4) नाम तुम्हारा न बिसारूँ, स्वप्न शयन में तुम्हें पुकारूँ। भूल न पाऊँ मैं क्षण भर, बंकिम छवि मैं सदा निहारूँ।। चित्त मेरा जब तीर्थ बन जाये, बसने उसमें आना। प्रभु प्राण बन कर आना।। (5) मिला उसे तेरा सहारा, आर्त स्वर में जिसने पुकारा। है मुझे विश्वास अब यह, दूर नहीं मुझसे किनारा।। भव सागर से नैया मेरी, पार करने आना। प्रभु प्राण बन कर आना।। (6) जीवन नौका हो चुकी हो जर्जर, डूबती हो हर लहर पर, मृत्यु दूत हों खड़े द्वार पर, विकराला अपना मुख पसार कर मुझ अधम को न ठुकराना, नव तेज बनकर आना। प्रभु प्राण बन कर आना।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 71

पाठ

हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, राम रक्षा स्तोत्र, हनुमानाष्टक एवं हनुमान बाहुक
अब प्रत्येक पाठ का अपना पृष्ठ भी उपलब्ध है — सीधा लिंक साझा करने हेतु यहाँ पाठ सूची देखें →
स्रोत-सूचना: ये पाँचों पाठ शताब्दियों पुराने सार्वजनिक (public domain) ग्रन्थ हैं। हनुमान चालीसा, बजरंग बाण एवं हनुमान बाहुक — तीनों की रचना स्वयं गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज द्वारा की गई है। श्री राम रक्षा स्तोत्र के रचयिता बुधकौशिक ऋषि हैं तथा संकट मोचन हनुमानाष्टक की रचना परम्परा में विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होती है। यहाँ प्रत्येक पाठ का सम्पूर्ण मूल पाठ बिना किसी संक्षेप के प्रस्तुत है, इंटरनेट पर उपलब्ध प्रामाणिक स्रोतों से मिलान कर।

श्री हनुमान चालीसा

॥ दोहा॥ श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥ बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार॥ ॥ चौपाई ॥ जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥ महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥ कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुण्डल कुँचित केसा॥4॥ हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेउ साजै॥ शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जगवंदन॥ बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥8॥ सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥ भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे॥ लाय सजीवन लखन जियाए। श्री रघुबीर हरषि उर लाये॥ रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥12॥ सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं॥ सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥ जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥ तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना। राम मिलाय राज पद दीह्ना॥16॥ तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना॥ जुग सहस्त्र जोजन पर भानु। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥ प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥ दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥ राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥ सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना॥ आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तै काँपै॥ भूत पिशाच निकट नहिं आवै। महावीर जब नाम सुनावै॥24॥ नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥ संकट तै हनुमान छुडावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥ सब पर राम तपस्वी राजा। तिनके काज सकल तुम साजा॥ और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥ चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥ साधु सन्त के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥ अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥ राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥ तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥ अंतकाल रघुवरपुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥ और देवता चित्त ना धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥ संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥ जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥ जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥ जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥ तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥40॥ ॥ दोहा ॥ पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
रचयिता: गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज — स्रोत: BhaktiBharat.com (सार्वजनिक पाठ, गीता प्रेस-सम्मत पाठान्तर से मिलान)

श्री बजरंग बाण

॥ दोहा ॥ निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥ ॥ चौपाई ॥ जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥ जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥ जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥ आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥ जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥ बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥ अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥ लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥ अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अन्तर्यामी॥ जय जय लखन प्राण के दाता। आतुर ह्वै दुःख करहु निपाता॥ जै गिरिधर जै जै सुख सागर। सुर-समूह-समरथ भटनागर॥ ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥ गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। महाराज प्रभु दास उबारो॥ ॐ कार हुंकार महाप्रभु धावो। बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो॥ ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीशा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा॥ सत्य होहु हरि शपथ पायके। राम दूत धरु मारु जाय के॥ जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा॥ पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत हौं दास तुम्हारा॥ वन उपवन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं॥ पांय परौं कर जोरि मनावौं। येहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥ जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकर सुवन वीर हनुमंता॥ बदन कराल काल कुल घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥ भूत, प्रेत, पिशाच निशाचर। अग्नि बेताल काल मारी मर॥ इन्हें मारु, तोहि शपथ राम की। राखउ नाथ मरजाद नाम की॥ जनकसुता हरि दास कहावो। ताकी शपथ बिलंब न लावो॥ जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुःख नाशा॥ चरण शरण कर जोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥ उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पाँय परौं, कर जोरि मनाई॥ ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥ ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल॥ अपने जन को तुरत उबारो। सुमिरत होय आनंद हमरो॥ यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहो फिरि कौन उबारै॥ पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥ यह बजरंग बाण जो जापै। ताते भूत-प्रेत सब कापैं॥ धूप देय जो जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेशा॥ ॥ दोहा ॥ प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
रचयिता: गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज — स्रोत: BhaktiBharat.com (सार्वजनिक पाठ)

श्री राम रक्षा स्तोत्र

अथ श्रीरामरक्षास्तोत्रम् ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य। बुधकौशिक ऋषिः। श्रीसीतारामचन्द्रो देवता। अनुष्टुभ् छन्दः। सीता शक्तिः। श्रीमद्धनुमान् कीलकम्। श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः॥ ॥ अथ ध्यानम् ॥ ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्। वामाङ्कारूढ सीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचन्द्रम्॥ ॥ इति ध्यानम् ॥ चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम्। एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥1॥ ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्। जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्॥2॥ सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम्। स्वलीलया जगत्रातुं आविर्भूतं अजं विभुम्॥3॥ रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्। शिरोमे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः॥4॥ कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियश्रुती। घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः॥5॥ जिव्हां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः। स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः॥6॥ करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्। मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः॥7॥ सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः। ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्॥8॥ जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः। पादौ बिभीषणश्रीदः पातु रामोखिलं वपुः॥9॥ एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्। स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्॥10॥ पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः। न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः॥11॥ रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्। नरो न लिप्यते पापैः भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥12॥ जगज्जैत्रेक मन्त्रेण रामनाम्नाऽभिरक्षितम्। यः कण्ठे धारयेतस्य करस्थाः सर्वसिद्धुयः॥13॥ वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्। अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्॥14॥ आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षाम्मिमां हरः। तथा लिखितवान् प्रातः प्रभुद्धो बुधकौशिकः॥15॥ आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्। अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान् स नः प्रभुः॥16॥ तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ। पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥17॥ फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ। पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥18॥ शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्। रक्षः कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ॥19॥ आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ। रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्॥20॥ सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा। गच्छन्मनोरथोस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः॥21॥ रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली। काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः॥22॥ वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः। जानकीवल्लभः श्रीमान् अप्रमेय पराक्रमः॥23॥ इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः। अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः॥24॥ रामं दुर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्। स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैः न ते संसारिणो नरः॥25॥ रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्। राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्॥26॥ रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥27॥ श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम। श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥28॥ श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि। श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥29॥ माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः। स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः। सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुः। नान्यं जाने नैव जाने न जाने॥30॥ दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा। पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्॥31॥ लोकाभिरामं रणरङ्गधीरम्। राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। कारुण्यरूपं करुणाकरं तम्। श्रीरामचन्द्रम् शरणं प्रपद्ये॥32॥ मनोजवं मारुततुल्यवेगम्। जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यम्। श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥33॥ कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम्। आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्॥34॥ आपदां अपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्। लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥35॥ भर्जनं भवबीजानां अर्जनं सुखसम्पदाम्। तर्जनं यमदूतानां राम रामेति गर्जनम्॥36॥ रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः। रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर॥37॥ राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥38॥ इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम्। ॥ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु ॥
रचयिता: बुधकौशिक ऋषि — स्रोत: RamCharit.in एवं अन्य पारम्परिक स्रोत (सार्वजनिक पाठ, संस्कृत मूल)

श्री संकट मोचन हनुमानाष्टक

बाल समय रवि भक्षि लियो तब, तीनहूं लोक भयो अंधियारो। ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो। देवन आनि करी विनती तब, छांडि दियो रवि कष्ट निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥1॥ बालि की त्रास कपीस बसै गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो। चौंकि महामुनि शाप दियो तब, चाहिये कौन विचार विचारो। कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के शोक निवारो। अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो॥2॥ जीवत ना बचिहौं हम सों जु, बिना सुधि लाए इहां पगु धारो। हेरि थके तट सिंधु सबै तब, लाय सिया सुधि प्राण उबारो। रावण त्रास दई सिय को तब, राक्षस सों कहि सोक निवारो। ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो॥3॥ चाहत सीय असोक सों आगिसु, दे प्रभु मुद्रिका सोक निवारो। बान लग्यो उर लछिमन के तब, प्राण तजे सुत रावण मारो। लै गृह वैद्य सुखेन समेत, तबै गिरि द्रोन सुबीर उपारो। आनि संजीवनि हाथ दई तब, लछिमन के तुम प्राण उबारो॥4॥ रावन युद्ध अजान कियो तब, नाग कि फांस सबै सिर डारो। श्री रघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो। आनि खगेश तब हनुमान जु, बन्धन काटि के त्रास निवारो। बंधु समेत जबे अहिरावण, लै रघुनाथ पाताल सिधारो॥5॥ देविहिं पूजि भली विधि सों बलि, देऊ सबै मिलि मंत्र बिचारो। जाय सहाय भयो तबही, अहिरावण सैन्य समेत संहारो॥6॥ काज किए बड़ देवन के तुम, वीर महाप्रभु देखि बिचारो। कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसे नहिं जात है टारो॥7॥ बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछ संकट होय हमारो॥8॥ लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लंगूर। बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥
स्रोत: HinduNidhi.com (सार्वजनिक पाठ)

श्री हनुमान बाहुक

छ्प्पय सिंधु तरन, सिय-सोच हरन, रबि बाल बरन तनु। भुज बिसाल, मूरति कराल कालहु को काल जनु॥ गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव। जातुधान-बलवान मान-मद-दवन पवनसुव॥1॥ स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रवि तरुन तेज घन। उर विसाल भुज दण्ड चण्ड नख-वज्रतन॥ पिंग नयन, भूकुटी कराल रसना दसनानन। कपिस केस करकस लंगूर, खल-दल-बल-भानन॥ कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति विकट। संताप पाप तेहि पुरुष पहि सपनेहूँ नहिं आवत निकट॥2॥ झूलना पंचमुख-छःमुख भगु मुख्य भट असुर सुर, सर्व सरि समर समरत्य सूरो। बाँकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो॥ जासु गुनगाथ रघुनाथ कह जासुबल, बिपुल जल भरित जग जलधि झूरो। दुवन दल दमन को कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो॥3॥ घनाक्षरी भानुसों पढ़न हनुमान गए भानु मन- अनुमानि सिसु केलि कियो फेर फारसो। पाछिले पगनि गम गगन मगन मन, क्रम को न भ्रम कपि बालक बिहार सो॥ कौतुक बिलोकि लोकपाल हरिहर विधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो। बल कैंधो बीर रस, धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनिको सार सो॥4॥ भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो। कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो॥ बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलँग फलँगहूँतें घाटि नभ तल भो। नाई-नाई-माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जो हैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो॥5॥ गो-पद पयोधि करि, होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निःसंक पर पुर गल बल भो। द्रोन सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो॥ संकट समाज असमंजस भो राम राज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो। साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बाँह, लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो॥6॥ कमठ की पीठि जाके गोड़नि की गाड़ैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो। जातुधान दावन परावन को दुर्ग भयो, महा मीन बास तिमि तोमनि को थल भो॥ कुम्भकरन रावन पयोद नाद ईंधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो। भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो॥7॥ दूत राम राय को, सपूत पूत पौनको तू, अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो। सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन लखन प्रिय प्राण सो॥ दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो। ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो॥8॥ दवन दुवन दल भुवन बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदी छोर को। पाप ताप तिमिर तुहिन निघटन पटु, सेवक सरोरुह सुखद भानु भोर को॥ लोक परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को। राम को दुलारो दास बामदेव को निवास, नाम कलि कामतरु केसरी किसोर को॥9॥ महाबल सीम महा भीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को। कुलिस कठोर तनु जोर परै रोर रन, करुना कलित मन धारमिक धीर को॥ दुर्जज को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरन हार तुलसी की पीर को। सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को॥10॥ रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि हर, मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो। धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को, सोखिबे कृसानु पोषिबे को हिम भानु भो॥ खल दु:ख दोषिबे को, जन परितोषिबे को, माँगिबो मलीनता को मोदक दुदान भो। आरत की आरति निवारिबे को तिहूँ पुर, तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो॥11॥ सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँक को। देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राँक को॥ जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आँक को। सब दिन रुरो परै पूरो जहाँ तहाँ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँक को॥12॥ सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी। लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी॥ केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधान की। बालक ज्यों पालि हैं कृपालु मुनि सिद्धता को, जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की॥13॥ करुनानिधान बलबुद्धि के निधान हौ, महिमा निधान गुनज्ञान के निधान हौ। बाम देव रुप भूप राम के सनेही, नाम, लेत देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ॥ आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक बेद बिधि के बिदूष हनुमान हौ। मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ॥14॥ मन को अगम तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैं। देवबंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं॥ बीर बरजोर घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु, खलगन गाजे हैं। बिगरी सँवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं॥15॥ सवैया जान सिरोमनि हो हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो। ढ़ारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हीं तो तिहारो॥ साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहां तुलसी को न चारो। दोष सुनाये तें आगेहूँ को होशियार ह्वै हों मन तो हिय हारो॥16॥ तेरे थपै उथपै न महेस, थपै थिर को कपि जे उर घाले। तेरे निबाजे गरीब निबाज बिराजत बैरिन के उर साले॥ संकट सोच सबे तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले। बूढ भये बलि मेरिहिं बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले॥17॥ सिंधु तरे बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवा से। तैं रनि केहरि केहरि के बिदले अरि कुंजर छैल छवासे॥ तोसों समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से। बानर बाज बढ़े खल खेचर, लीजत क्‍यों न लपेटि लवासे॥18॥ अच्छ विमर्दन कानन भानि दसानन आनन भा न निहारो। बारिदनाद अकंपन कुंभकरन से कुंजर केहरि बारो॥ राम प्रताप हुतासन, कच्छ, विपच्छ, समीर समीर दुलारो। पाप तें साप तें ताप तिहूँ तें सदा तुलसी कह सो रखवारो॥19॥ घनाक्षरी जानत जहान हनुमान को निवाज्यो जन, मन अनुमानि बलि बोल न बिसारिये। सेवा जोग तुलसी कबहूँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी सँभारिये॥ अपराधी जानि कीजै सासति सहस भाँति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये। साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये॥20॥ बालक बिलोकि, बलि बारें तें आपनो कियो, दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये। रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल, आस रावरीयै दास रावरो बिचारिये॥ बड़ो बिकराल कलि काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलि को निहारि सो निबारिये। केसरी किसोर रनरोर बरजोर बीर, बाँह पीर राहु मातु ज्यौं पछारि मारिये॥21॥ उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो संबारिये। राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये॥ साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये। पोखरी बिसाल बाँहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यों पकरि के बदन बिदारिये॥22॥ राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये। मुद मरकट रोग बारिनिधि हेरि हारे, जीव जामवंत को भरोसो तेरो भारिये॥ कृदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम पब्बयतें, सुधल सुबेल भालू बैठि कै विचारिये। महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह पीर क्‍यों न, लंकिनी ज्यों लात घात ही मरोरि मारिये॥23॥ लोक परलोकहूँ तिलोक न विलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये। कर्म, काल, लोकपाल, अग जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये॥ खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो, देव दुखी देखिअत भारिये। बात तरुमूल बाँहसूल कपिकच्छू बेलि, उपजी सकेलि कपि केलि ही उखारिये॥24॥ करम कराल कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बक भगिनी काहू तें कहा डरैगी। बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाँह बल बालक छबीले छोटे छरैगी॥ आई है बनाई बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सब को गुनी के पाले परैगी। पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपि कान्ह तुलसीकी, बाँहपीर महाबीर तेरे मारे मरैगी॥25॥ भाल की कि काल की कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाँह की। करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँह की॥ पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाँह की। आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाँह की॥26॥ सिंहिका सँहारि बल सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है। लंक परजारि मकरी बिदारि बार बार, जातुधान धारि धूरि धानी करि डारी है॥ तोरि जमकातरि मंदोदरी कठोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महतारी है। भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है॥27॥ तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र रवि राहु की। तेरी बाँह बसत बिसोक लोक पाल सब, तेरो नाम लेत रहैं आरति न काहु की॥ साम दाम भेद विधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की। आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की॥28॥ टूकनि को घर घर डोलत कँगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नत पाल पालि पोसो है। कीन्ही है सँभार सार अँजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेह्न भरोसो है॥ इतनो परेखो सब भान्ति समरथ आजु, कपिराज सांची कहां को तिलोक तोसो है। सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनिको सो है॥29॥ आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढ़ी है बाँह बेदन कही न स॒हि जाति है। औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अथीकाति है॥ करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है। चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है॥30॥ दूत राम राय को, सपूत पूत वाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को। बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के धाय को॥ एते बडे साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को। थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को॥31॥ देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं। पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाग, राम दूत की रजाई माथे मानि लेत हैं॥ घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं। क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं॥32॥ तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर घर के। तेरे बल राम राज किये सब सुर काज, सकल समाज साज साजे रघुबर के॥ तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरिहर के। तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीस नाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के॥33॥ पालो तेरे ट्रक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूको हों आपनी ओर हेरिये। भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थीरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनो न अव डेरिये॥ अँबुतू हों अँबु चूर, अँबु तू हों डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये। बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाँह पर लामी लूम फेरिये॥34॥ घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है। बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम मूल मलिनाई है॥ करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हँसि हाँकि फूंकि फौंजै ते उड़ाई है। खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है॥35॥ सवैया राम गुलाम तु ही हनुमान, गोसाँई सुसाँई सदा अनुकूलो। पाल्यो हों बाल ज्यों आखर दू, पितु मातु सों मंगल मोद समूलो॥ बाँह की बेदन बाँह पगार, पुकारत आरत आनॉँद भूलो। श्री रघुबीर निवारिये पीर, रहौं दरबार परो लटि लूलो॥36॥ घनाक्षरी काल की करालता करम कठिनाई कीधी, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे। बेदन कुरभाँति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाँह गही जो गही समीर डाबरे॥ लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहँ तावरे। भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे॥37॥ पाँय पीर पेट पीर बाँह पीर मुंह पीर, जर जर सकल पीर मई है। देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है॥ हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारे हीतें, ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है। कुँभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूँ भई है॥38॥ बाहुक सुबाहु नीच लीचर मरीच मिलि, मुँह पीर केतुजा कुरोग जातुधान है। राम नाम जप जाग कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान है॥ सुमिरे सहाय राम लखन आखर दौऊ, जिनके समूह साके जागत जहान है। तुलसी सँभारि ताडका सँहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाई बानवान है॥39॥ बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माँगि खात टूक टाक हीं। परयो लोक रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हाँ॥ खोटे खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हाँ। तुलसी गुर्साँई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हीं॥40॥ असन बसन हीन बिषम बिषाद लीन, देखि दीन टूबरो करे न हाय हाय को। तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को॥ नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को। ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को॥41॥ जीओ जग जानकी जीवन को कहाइ जन, मरिबे को बारानसी बारि सुर सरि को। तुलसी के नल मोदक हैं ऐसे ठाँऊ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को॥ मो को झूँटो साँचो लोग राम कौ कहत सब, मेरे मन मान है न हर को न हरि को। भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सके टूर करि को॥42॥ सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै। मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै॥ ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की, समाधि की जै तुलसी को जानि जन फुर कै। कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै॥43॥ कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों, कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये। हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई, बिरची बिरज्जी सब देखियत दुनिये॥ माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहें साँची मन गुनिये। तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहिं, हों हूँ रहों मौनही वयो सो जानि लुनिये॥44॥
रचयिता: गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज — स्रोत: HindiPath.com, हिन्दी टीका श्री महावीरप्रसाद मालवीय वैद्य "वीर" द्वारा (सार्वजनिक पाठ, 44 छन्द सम्पूर्ण)। रचना-प्रसंग नमन ग्रन्थ के "तुलसी चरित" अंश में भी वर्णित है।

नित्य कर्म

पूजा प्रकाश एवं दैनिक प्रार्थनायें — नमन, पृष्ठ 108-113
प्रातः जागरण के पश्चात स्नान से पूर्व के नित्य कर्म

ब्रह्म मुहूर्त में जागरण — सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घंटे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र में निषिद्ध है।

करावलोकन — आँखों के खुलते ही दोनों हाथों की हथेलियों को देखते हुये निम्नलिखित श्लोक का पाठ करें —

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते कर दर्शनम्।।

भूमि वन्दना — शैय्या से उठकर पृथ्वी पर पैर रखने के पूर्व पृथ्वी माता का अभिवादन करें —

समुद्र वसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व में।।

मानसिक शुद्धि का मन्त्र —

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाकां स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।

श्रीगोविन्ददामोदर स्तोत्रम्

श्रीगोविन्ददामोदर स्तोत्रम् (10 श्लोक)

करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्। वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्द मनसा स्मरामि।।1।। श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव। जिह्वे पिबस्वामृतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति।।2।। विक्रेतु–कामाखिलगोपकन्या मुरारिपादार्पित चित्तवृत्तिः। दध्यादिकं मोहवशादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति।।3।। गृहे गृहे गोपवधूकदम्बाः सर्वे मिलित्वा समवाप्ययोगम्। पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं, गोविन्द दामोदर माधवेति।।4।। सुखं शयाना निलये निजेऽपि नामानि विष्णोः प्रवदन्तिमर्त्याः। ते निश्चतं तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति।।5।। जिह्वैसदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य मनोहराणि। समस्त भक्तार्तिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति।।6।। सुखावसाने इदमेवसारं दुःखावसाने इदमेव ज्ञेयम।। देहावसाने इदमेव जाप्यं गोविन्द दामोदर माधवेति।।7।। जिह्वैरसज्ञे मधुरप्रिया त्वं सत्यं हितं त्वां परमं वदामि। आवर्णय त्वं मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति।।8।। त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे समागते दण्डधरे कृतान्ते। वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या गोविन्द दामोदर माधवेति।।9।। श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश गोपाल गोवर्धन नाथ विष्णो। जिह्वे पिवस्मामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति।।10।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 111

गुरू वन्दना

गुरू ब्रहमा गुरू विष्णु गुरू देवो महेश्वरः। गुरू साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः। बंदउ चरण सरोज गुरू, मुद मंगल आगार। जेहि सेवत नर होत है, भव सागर से पार।। गुरू के सुमिरण मात्र से नाशत विघ्न अनन्त। तातें सर्वारम्भ में, ध्यावत हैं सब संत।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 111

गणेश वन्दना

ऊँ गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारूभक्षणम। उमासुतं, शोकविनाशकारकम् नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 112

महामृत्युंजय मन्त्र

ऊँ हौं जूं सः। ऊँ भूः भुवः स्वः। ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारूकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् स्वः भुवः भूः ऊँ। सः जूं हौं ऊँ।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 112

मन्त्र वन्दना एवं स्नान मन्त्र

क. करागे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते कर दर्शनम्।। ख. समुदवसने देवी पर्वत स्तन मण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्षमस्व में।। स्नान के पूर्व जल स्पर्श कर मन्त्र बोलिए :– गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं करू।। पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्याः सरितस्तथा। अगच्छन्तु मया प्रोक्ताः स्नान काले सदा मम।। प्रदक्षिणा मन्त्र यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि च। तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिणा पदे पदे।। सूर्य को अर्घ्य देने का मंत्र ऊँ एहि सूर्य सहस्रांशो तेजो राशे जगतपते। अनुकम्पय मां भक्तया गृहाणार्घ्य दिवाकरः।। तुलसीं वन्दन तुलसि! श्री सखि शिवे पापहारिणी पुण्यदे। नमस्ते नारदनुते नमो नारायण प्रियें।। ऊँ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धार्य मां देवि पवित्रं कुरू चासनम्।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 112
क्षमा प्रार्थना

क्षमा प्रार्थना

नमन ग्रन्थ के इस पृष्ठ (116) का निचला भाग मूल स्कैन में प्रकाश की स्थिति व अंगुली की छाया के कारण आंशिक रूप से अपठनीय है। सामान्यतः पूजन के अन्त में क्षमा प्रार्थना पढ़ने की परम्परा है। पूर्ण, स्पष्ट पाठ हेतु मूल पुस्तक की पुनः जाँच आवश्यक होगी।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 116 — आंशिक रूप से अपठनीय

स्तुति

नमन ग्रन्थ के स्तुति प्रखण्ड से
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श्रीराम स्तुति (श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन)

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं। नव कंज लोचन कंज मुख, करकंज, पदकंजारुणं।। कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनील–नीरद सुन्दरं। पटपीत मानहु तड़ित रुचि शुचिनौमि जनकसुतावरं।। भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्यवंश–निकन्दनं। रघुनन्द आनन्दकंद कौशलचन्द दशरथ–नन्दनं।। सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारू उदारू अंग विभूषणं। आजानु–भुज–शर–चाप–धर, संग्रामजित–खरदूषणं।। इति वदति तुलसीदास शंकर–शेष मुनि–मन–रंजनं। मम हृदय कंज निवास कुरु, कामादि खल दल गंजनं।। मनुजाहिं राचेउ मिलिहि सोबरु सहज सुन्दर सांवरो। करुणा निधान सुजान सील सनेह जानत रावरो।। एहि भाँति गौरि असीम सुनि सिय सहित हिय हरषी अली। तुलसी भवानिहि पूजि–पुनि–पुनि मुदित मन मंदिर चली।। सो.–जानि गौरि अनुकूल, सियहिय हरषुन जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल, वाम अंग फरकन लगे।। मो सम दीन न दीन हित तुम समान रघुवीर। अस विचारि रघुवंश मणि हरउ विषम भवभीर।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 57, 113

श्री कृष्ण जी की स्तुति (शयन आरती)

नैनों में नींद भर आई, बिहारी जी के................... कौन बिहारी जी को दूध पिवावे, कौन खवावें मलाई; बिहारी जी के................... सखियां बिहारी जी को दूध पिवावें, श्री राधा जू खवावें गलाई; बिहारी जी के................... कौन बिहारी जी की सेज सजावें, कौन करे तैयारी; बिहारी जी के................... मैया बिहारी जी की सेज सजावें, बाबा करे तैयारी; बिहारी जी के................... चन्द्र सखी भज बाल कृष्ण छवि, चरन कमल शिर नाई।।; बिहारी जी के...................
स्रोत: नमन, पृष्ठ 113

गुरु वन्दना

बंदउँ गुरू पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।। अमिअ मूरिमय चून चारू। समन सकल भव रूज परिवारू।। सुकृति संभुतन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती।। जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी।। श्री गुरू पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती।। दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू।। उघरिहिं विमल विलोचन ही के। मिटहिं दोष दुःख भव रजनी के।। सूझहिं राम चरित मनि मानिका। गुपुत प्रकट जहं जो जेहि खानिका।। दोहा — जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान। कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 57

श्री संकट मोचन हनुमत् वन्दना

जय जय कपिनायक जन सुखदायक, महावीर बलवाना। जय संकट मोचन भव भय मोचन, मंगल भवन सुजाना।। जय जय दुखहारक जन उपकारक, परमानन्द निधाना। जय जय अविनाशी आनन्दराशी, पवनतनय हनुमाना।।1।। जय परम कृपाला नयन विशाला, सुर नर मुनि हितकारी। जय सब गुणसागर दीन दयाकर, पापिन के अघहारी।। जय अधम उद्धारक, दीनन तारक, समर धीर असुरारी। जय खलदल गंजन, विपति विभंजन, हरहु कुसंकट भारी।।2।। जय मारूतनन्दं जनमन रंजन, जय प्रभु प्रेम स्वरूपा। जय गर्व प्रहारी महिमा भारी, द्रवउ नाथ कपि भूपा।। जय इन्द्रिय जीता परम पुनीता, ज्ञानी गुणन अनूपा। जय भक्ति प्रचारक, रस विस्तारक, प्रभुप्रिय शंकर रूपा।।3।। जय सुन्दर सूरत, सेवा मूरति, अति सियाराम उपासी। जय अभिमतदाता, दिव्य विधाता, शरणागत भयनासी।। जय जय बजरंगी सन्तन संगी, सिय पिय चरित प्रकाशी। जय "प्रेमलता" के स्वामि सदाशिव, देहु दरस छबिरासी।।4।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 60

हनुमान स्तुति

मंगल-मूरति मारूत नंदनं। सकल-अमंगल-मूल-निकंदनं।।1।। पवनतनय संतन-हितकारी। हृदय विराजत अवध बिहारी।।2।। मातु-पिता, गुरू, गनपति, सारद। सिवा-समेत संभु, सुक, नारद।।3।। चरन बंदि बिनवों सब काहू। देहु रामपद-नेह-निबाहू।।4।। बंदौं राम-लखन-वैदेही। जो तुलसी के परम सनेही।।5।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 60

श्री गणेश-स्तुति

गाइये गनपति जगवंदना। संकर-सुवन भवानी-नंदना।।1।। सिद्धि-सदन गज-वदन, विनायक। कृपा-सिंधु, सुन्दर, सब-लायक।।2।। मोदक-प्रिय, मुद-मंगल-दाता। विद्या-वारिधि, बुद्धि विधाता।।3।। माँगत तुलसिदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे।।4।।
स्रोत: नमन, पृष्ठ 57
शेष स्तुतियाँ (रुद्राष्टकम्, द्वादश ज्योतिर्लिंग, शिव पंचाक्षर स्तोत्र, महालक्ष्म्यष्टकम्, मधुराष्टकम्, चतुःश्लोकी भागवतम्, एकश्लोकी रामायण, सप्तश्लोकी गीता, सप्तश्लोकी दुर्गा) अगले चरण में जोड़ी जायेंगी।

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दोनों मन्दिरों की जानकारी

श्री रामायण मन्दिर, माधवबाड़ी, बरेली

पता: माधवबाड़ी, बरेली, उत्तर प्रदेश (द्वितीय द्वार: पंजाबी कालोनी)

वार्षिक उत्सव: 15-दिवसीय तुलसी जयन्ती महोत्सव

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