श्री रामायण मन्दिर
माधवबाड़ी, बरेली — गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की गुरु-शिष्य परम्परा में स्थापित आध्यात्मिक केन्द्र। भजन, आरती, स्तुति, गुरु परम्परा एवं मन्दिर के इतिहास का संग्रह।
34 पीठाधीश्वर तुलसी चरित (कथा) मन्दिर का इतिहास भजन (24) आरती छन्द (16) स्तुति पाठ विनय पत्रिका नित्य कर्म संपर्क करें
श्री रामायण मन्दिर गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की गुरु-शिष्य परम्परा (गद्दी) में स्थापित एक आध्यात्मिक संस्था है, जिसके वर्तमान में दो प्रमुख केन्द्र हैं।
श्री रामायण मन्दिर, माधवबाड़ी, बरेली मुख्य केन्द्र
स्थापना: 27 मई 1964 — गोस्वामी रामेश्वर दास जी द्वारा। मन्दिर के दो द्वार हैं — एक माधवबाड़ी की ओर, दूसरा पंजाबी कालोनी की ओर। गर्भ गृह में श्री रामचरितमानस, जगतारिणी माँ दुर्गा, भगवान शंकर-पार्वती, श्री गणेश, नन्दी, श्री राघवेन्द्र सरकार (राम दरबार), गोस्वामी तुलसीदास जी, हनुमान जी एवं श्री राधाकृष्ण के विग्रह स्थापित हैं। 6500 वर्गफुट का वातानुकूलित सत्संग भवन है। प्रतिवर्ष 15-दिवसीय तुलसी जयन्ती महोत्सव आयोजित होता है।
श्री रामायण मन्दिर, विकासनगर विवरण शीघ्र
विकासनगर, उत्तराखण्ड स्थित यह मन्दिर की दूसरी शाखा है। इसका पूर्ण विवरण (स्थापना तिथि, पता, न्यासी संस्था) गोस्वामी योगेश जी महाराज से प्राप्त जानकारी के आधार पर शीघ्र जोड़ा जायेगा।
यह वेबसाइट पूर्णतः हिन्दी में है और नमन ग्रन्थ (2018, द्वितीय संस्करण) में संकलित सामग्री को उसके मूल रूप में — बिना किसी परिवर्तन, संक्षिप्तीकरण अथवा प्रतिस्थापन के — प्रस्तुत करने के सिद्धान्त पर आधारित है।
अखण्ड भारत में फैली हैं रामायण मन्दिर की जड़ें
माधोबाड़ी स्थित श्री रामायण मन्दिर का इतिहास वैसे तो 54 वर्ष पुराना है। लेकिन वास्तव में इसकी ऐतिहासिकता की जड़ें पाकिस्तान तक जाती हैं। इन अर्थों में यह मन्दिर बहुत पुराना है, बेशक बरेली के कुछ नये मन्दिरों में इसे काफी खूबसूरत माना जाता है। इस मंदिर में पन्द्रह दिन तक चलने वाले तुलसी जयन्ती महोत्सव में श्रद्धालुओं को प्रवचनों, भजन सत्संग आदि के माध्यम से जो असीम शान्ति मिलती है, वही अब इसकी विशेषता बन गया है।
तत्कालीन अखण्ड भारत और अब पाकिस्तान में होती मरदान जिला स्थित है जिसमें गढ़ी कपूरा नामक स्थान पर गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की गदी स्थित है। यह एक सिद्ध स्थान है और उस समय में बाला गढ़ी ग्राम के निवासी सेवक प्रतिदिन पैदल चलकर तथा मार्ग में पड़ने वाली 'दरिया-ए-लुण्डा' को पार करके इस सिद्ध स्थान के दर्शनार्थ जाया करते थे। गोस्वामी तुलसीदास जी की अपनी कोई सन्तान नहीं थी। उनके महाप्राण के बाद उनके शिष्यों ने अनेक स्थानों पर गोस्वामी तुलसीदासजी की गुरू गद्दी स्थापित की तथा गुसाईयों की वंश परम्परा में आज भी इन गद्दियों से भारत वर्ष का बहुत बड़ा हिन्दू समाज जुड़ा हुआ है। गढ़ी कपूरा के अतिरिक्त राम तख्त (तत्कालीन मियाँ गुल की रियासत) तथा ढण्डेरी भी ऐसे ही प्रसिद्ध स्थान रहे हैं। ढण्डेरी में पवित्र जल का एक चश्मा था, जिसमें स्नान करने से लोग रोग मुक्त हो जाते थे।
गढ़ी कपूरा स्थित स्थान पर पीपल का एक विशाल वृक्ष था जो अपने आकार और प्राचीनता के कारण विश्व प्रसिद्ध था। इसी विशाल वृक्ष के नीचे अलमस्त फकीर के रूप में बैठकर बाबा सफाचन्द जी महाराज अपने प्रभु की याद में भजन गाते रहते थे। एक बार बाबा सफाचन्द जी दीवार पर बैठकर भजन गा रहे थे और उन पर पीपल के सूखे पत्ते फूलों की तरह गिर रहे थे। तभी किसी प्राकृतिक कारण से उस क्षेत्र में पलायन शुरू हो गया। प्रत्येक व्यक्ति किसी भी प्रकार से गढ़ी कपूरा को छोड़ देना चाहता था। बाबा के जो मुरीद अपने घोड़ों पर बैठकर उस सिद्ध स्थान के आगे से निकले तो उन्होंने बाबा सफाचन्द जी को भी अपने साथ चलने का आग्रह किया और कहा "बाबा चूड्ड़ा" (पश्तो भाषा)। यह सुनकर बाबा सफाचन्द जी जिस दीवार पर बैठे थे उसी को घोड़े की तरह ऐड़ लगाई और वह दीवार दौड़ पड़ी। बाबा की यह कला देखकर लोग बाबा के चरणों में गिर पड़े। बाबा के समझाने पर पलायन रूक गया और गढ़ी कपूरा तथा बाबा सफाचन्द जी लोगों की शुभ मनोकामना पूर्ति का माध्यम बन गये।
बाबा सफाचन्द जी से गदी प्राप्त करके बाबा नत्थूराम जी अपने सेवकों को समाज कल्याण के लिये प्रेरित करते रहे। आताताईयों की बुरी दृष्टि से बचाने के लिए बाबा नत्थूराम जी ने अपने शिष्यों को कांस्य पात्र में शुद्धता पूर्वक शुद्ध आवरण में ढककर गणेश पूजा का निर्देश दिया। यही गणेश पूजा जाम साहब की पूजा के नाम से प्रसिद्ध हुई। भारत विभाजन के समय बाबा नत्थूराम जी अपने सेवक समाज के साथ भारतवर्ष में महाराष्ट्र प्रान्त के जिला अहमदनगर के कोपरगाँव स्थित स्थान पर आ गये तथा बाबा भजन लाल जी कुछ सेवकों को लेकर पंजाब पहुँच गये।
गुसाईं बाबा नन्द लाल जी के तीन पुत्र हुए। गुसाईं दशबन्दी राम जी, गुसाईं मेहर दास जी एवं गुसाईं मूलराज जी। गुसाईं मूलराज जी अपने पुत्र गुसाईं रामेश्वर दास जी के साथ बरेली आ गए तथा दूसरी ओर गुसाईं दशबन्दी राम जी के पुत्र गुसाईं बाबा तोताराम जी स्वतन्त्रता से 20 वर्ष पूर्व ही हरिद्वार में आकर जप तप में लग गये थे। इधर विभाजन के बाद जो परिवार बरेली आये थे, उन्हें शाहजहाँपुर मार्ग पर शरणार्थियों के शिविरों में स्थान दिया गया तथा उन्होंने वहाँ सनातन धर्म मन्दिर स्थापित करके बाबा नत्थूराम जी से प्राप्त जाम साहब की स्थापना उस मन्दिर में की।
बाद में शरणार्थी कालोनी (मॉडल टाउन) स्थापित होने के समय गुसाईं बाबा रामेश्वरदासजी ने अपने मन में संकल्प किया कि भारतवर्ष में गुसाईं तुलसीदास जी के विचारों को प्रचारित-प्रसारित करने हेतु एक मन्दिर की स्थापना की जाये जिसका नाम रामायण मन्दिर हो तथा जिसमें गुसाईयों द्वारा प्राप्त जाम साहब की स्थापना एवं पूजा अर्चना की जा सके। ये परिवार अपनी जान पर खेल कर जाम साहब की चौकियाँ अपने साथ यहाँ लेकर आये थे।
वर्तमान गुरूदेव गोस्वामी देवेन्द्र जी महाराज के पिता गोस्वामी रामेश्वरदास जी ने अपना यह संकल्प पूरा करने के लिए अपनी समस्त पूँजी लगाकर 27 मई 1964 को इस मन्दिर की नींव रखी। उस समय एक छोटी सी झोपड़ी में यह मन्दिर आरम्भ हुआ था जो सेवक समाज के छोटे-छोटे प्रयासों से आज एक विशाल वट वृक्ष के रूप में समाज को अपनी शीतल छाया प्रदान कर रहा है। सेवक समाज के हरिद्वार जाकर बार-बार आग्रह करने पर हरिद्वारवासी बाबा तोताराम जी ने रामायण मन्दिर की इस गुरू गद्दी को पुनः संभाल लिया तथा वर्तमान में उनके महाप्रयाण के बाद स्वर्गीय गोस्वामी रामेश्वर दास जी के पुत्र गोस्वामी देवेन्द्र जी गद्दी पर विराजमान हैं।
मार्गशीर्ष द्वितीय सम्वत् 2026 (सन् 1969) को श्री रामायण मन्दिर में भगवान के विग्रह की स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा की गयी। विग्रह स्थापना के समय कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद से त्यागपत्र देकर सन्यासी बने स्वामी प्रकाशानन्द जी की अध्यक्षता में श्री रामायण मन्दिर द्वारा विश्व शान्ति यज्ञ का आयोजन किया गया था जो आज भी अद्वितीय है। इस विश्व शान्ति यज्ञ में हिमालय पर्वत की गुफाओं से निकलकर सैकड़ों साधु सन्यासियों ने भाग लिया तथा फिर उन्हीं गुफाओं में लौट गये।
वर्तमान में श्री रामायण मन्दिर में जाम साहब की तीन चौकियाँ स्थापित हैं। जो क्रमशः बाबू जई जिला मरदान (पाकिस्तान), सुन्दर नगर हिमाचल प्रदेश एवं तत्कालीन स्वान्त रियासत जो अब पाकिस्तान में है, से प्राप्त हुईं। इस प्रकार श्री रामायण मन्दिर एवं इसकी गुरू गद्दी का इतिहास अखण्ड भारत के गढ़ी कपूरा (जो अब पाकिस्तान में है) तक जाता है।
श्री रामायण मन्दिर का जो स्वरूप वर्तमान में है वह अपने प्रारम्भिक स्वरूप से काफी भिन्न है। इस मन्दिर का एक द्वार माधोबाड़ी में तथा दूसरा द्वार पंजाबी कालोनी में स्थित है। गर्भ गृह में क्रमशः श्री रामचरितमानस, जगतारिणी माँ दुर्गा, भवभीतिहर भगवान शंकर-पार्वती, प्रथम पूज्य गणेश, वृषभ, श्री राघवेन्द्र सरकार, गोस्वामी तुलसीदास जी, हनुमान जी एवं श्री राधाकृष्ण के विग्रह स्थापित हैं।
6500 स्क्वायर फिट का विस्तृत सत्संग भवन, भव्य स्वरूप में निर्माण कार्य किया गया है। सभी सेवक समाज तन, मन, धन से सेवा में संलग्न है। यह भवन पूर्णतः वातानुकूलित है एवं इसमें निरन्तर सत्संग भजन आदि के कार्यक्रम चलते रहते हैं। मन्दिर में ठाकुर दरबारों के दर्शन कर दर्शनार्थी मन्त्र मुग्ध हो जाते हैं।
भूतल में एक सामुदायिक केन्द्र का निर्माण किया गया है। प्रथम तल पर ठाकुर जी की रसोई एवं एक बालकनी है। ऊपरी तल पर शिखर के साथ एक बड़ा ध्यान कक्ष पिरामिड के वैज्ञानिक आधार पर बनाया जा रहा है जिसमें लोग ध्यान एवं योग कर पायेंगे। मन्दिर के उत्तरी द्वार पर सन्त निवास के कमरे बनाये गये हैं।
यह सूची नमन ग्रन्थ (पृष्ठ 50) में मुद्रित गुरु वंशावली पर आधारित है। पुस्तक में #33 गोस्वामी देवेन्द्र जी को "वर्तमान पीठाधीश्वर" लिखा गया है (2018 के अनुसार); वर्तमान में #34 गोस्वामी योगेश जी महाराज पीठाधीश्वर हैं। जिन गुरुओं के नाम रेखांकित (underlined) हैं, उनके विषय में विस्तृत जानकारी उपलब्ध है — नाम पर क्लिक करें।
(एक)
प्रयाग के निकटवर्ती जिले बाँदा के राजापुर ग्राम में पंडित आत्माराम दुबे घर के बाहरी भाग में अपने कुछ परिचितों के साथ बैठे हैं। भीतर वाले कमरे में उनकी पत्नी हुलसी के प्रसव के लिए एक दाई, दासी चुनिया तथा दो-तीन स्त्रियाँ उपस्थित हैं।
तभी भीतर कांसे की थाली बज उठती है जिसका अर्थ है कि बालक का जन्म हुआ है। पंडित आत्माराम ज्योतिष के अच्छे ज्ञाता हैं। आस-पास के गाँवों में उनकी काफी प्रसिद्धि है। पंचांग, पत्रिकायें उठा पंडित जी ग्रह नक्षत्र की गणना करने लगते हैं।
थोड़ी देर तक गणना करते-करते माथे की त्योरियों को बल देते; ढीला छोड़ते जैसे उन्हें स्वयं पर विश्वास नहीं हो पा रहा था। पुनः गणना करने लगे। बार-बार की गणना से भी एक ही निर्णय पर पहुँचने के पश्चात उनका मुख विवर्ण हो उठा। बालक अभुक्तमूल नक्षत्र में जन्मा था, जिसका अर्थ था कि बालक माता-पिता ही नहीं ग्राम के लिए भी घोर विपत्ति का कारण सिद्ध होगा।
पंडित आत्माराम निर्णय नहीं ले पा रहे थे कि क्या किया जाये। ज्योतिष पर उन्हें दृढ़ विश्वास था। उन्होंने बालक का मुख भी न देखने का निश्चय किया। उधर बालक के जन्म के पश्चात उसकी माता के स्वास्थ्य में अत्यंत गिरावट आती जा रही थी। गिरते हुए स्वास्थ्य के बीच ही जब उन्हें बालक के भविष्य तथा पंडित जी के निश्चय के विषय में ज्ञात हुआ तो उनकी दशा और बिगड़ने लगी। वे जानती थीं कि पंडित जी को अपने ज्योतिष पर अत्यन्त विश्वास है। वे बालक को कदापि स्वीकार नहीं करेंगे।
जब हुलसी को लगा कि उसके प्राण अब नहीं बचेंगे तो अपनी विश्वस्त दासी चुनिया को बुला बालक को उसे सौंपते हुए कहा कि वह बालक को लेकर अपनी ससुराल हरिहरपुर चली जाये। हुलसी को अब अपने जीवन का कोई विश्वास नहीं रहा। बालक के पोषण और देखभाल के लिए हुलसी ने चुनिया को अपने गहने और कुछ धन भी दिया। चुनिया से बालक का दायित्व संभालने का वचन ले कर हुलसी ने श्वांस छोड़ दिया।
जहाँ जन्म के समय बधाइयाँ बजने जा रही थी वहाँ शोक ने अपना साम्राज्य फैला दिया।
बालक को गोद में लेते ही चुनिया ने गहरी निःश्वांस भरकर देखा तो उसके मुख पर एक विचित्र सी मुस्कराहट दिखायी दी। मानो कोई सुन्दर स्वप्न देख रहा हो। चुनिया सोचने लगी — 'इसके आने से कितने भरे हृदय सूख गये, कितनी सूखी आँखों में बाढ़ आ गयी। यह अभागा अपने सम्बन्ध में क्या जानता है? यह कैसे जान पायेगा कि इसके आगमन ने जब इसकी माता का जीवन छीन लिया तो पिता के मन में भी कोई उत्साह नहीं बचा। इसके स्वागत में न मेवे बंटे न ही किसी ने बधाई गायी।' चुनिया ने स्वार्थ, मोह और रूढ़िग्रस्त समाज से बच्चे को बचाने का निश्चय किया और रात ही रात में अपनी ससुराल हरिहरपुर आ गयी।
साढ़े पाँच वर्ष तक बालक का यथा संभव पालन पोषण करने के बाद एक दिन चुनिया भी चल बसी। पहले से ही अनाथ बालक का अन्तिम आश्रय भी शेष न रहा। बालक द्वार-द्वार भटकने लगा। इधर-उधर भिक्षा माँगकर पेट भर कर खुले आकाश के नीचे सो जाता।
(दो)
साढ़े पाँच वर्ष का नन्हा बालक कन्धे पर झोला लटकाये भिक्षा माँगते द्वार-द्वार भटकता फिर रहा है। बालक पर छायी अमंगल की छाया से भी बचने के लिए लोग उससे दूर भागते हैं, उसे भरपेट भिक्षा मिलने में भी अत्यन्त कठिनाई आती है। ऐसे ही माँगते-माँगते बालक आज एक द्वार पर खड़ा हुआ है —
"कुछ खाने को दे दो न माँ!" बालक ने बड़ी दीनता से कहा। "चल-चल अभागा कहीं का! अपनी माँ को खा गया, चुनिया को खा गया, अब यहाँ क्या खाने आया है? चल भाग यहाँ से।" वह कर्कशा स्त्री बालक को फटकारते हुए बोली। "कुछ दे दो न माता! बहुत भूख लगी है।" बालक ने करुण स्वर में कहा। "अब जाता है या लगाऊँ दो हाथ?" कर्कशा क्रूरता पर उतर आयी।
अपमानित बालक चुपचाप अपनी राह हो लिया। कुछ दूर जा कर एक स्थान पर बैठ जाता है। परन्तु भूख से व्याकुल प्राण उसके नन्हें पाँवों को फिर एक घर की ओर मोड़ देते हैं। "दया करो माता! कुछ खाने को दे दो।" "कौन? रामबोला! अभी रसोई नहीं बनी है। जा आगे बढ़ जा।" "तीन दिन हो गये माँ। कुछ भी नहीं खाया है।" करूण कंठ से बालक ने याचना की। "कह दिया न रसोई नहीं बनी।" गृह स्वामिनी ने भीतर से ही कठोर स्वर में बालक को फटकार दिया।
भूख, पीड़ा और अपमान से क्षुब्ध बालक आगे बढ़ जाता है। बालक मार्ग में ही एक स्थान पर बैठ जाता है। बालक का कोमल, निर्मल मन राम से आश्रय माँगने लगा — "प्रभु! और किसके आगे हाथ फैलाऊँ? ऐसा दूसरा कौन है जो सदा के लिए मेरा माँगना मिटा दे?"
श्री राम से प्रार्थना करते-करते बालक खाली पेट एक वृक्ष के नीचे लेट गया। भूख के कारण नेत्रों में नींद नहीं उतरती। रह-रह कर आँतों में मरोड़ उठता है तो बालक पानी पीकर फिर लेट जाता है। इस प्रकार जैसे-तैसे दिन बीतने लगे।
(तीन)
इस जीवन से बालक रामबोला इतना ऊब चुका था कि उसने अब आगे भीख न माँगने और वह स्थान छोड़ देने का निश्चय कर लिया। कई दिनों तक इधर-उधर भटकते हुए बालक सूकर खेत वाराह क्षेत्र (वर्तमान में सोरों जी जिला एटा) जा पहुँचा। वहाँ सरयू के किनारे एक हनुमान मंदिर बना था। वहीं एक चबूतरे पर बालक रामबोला पड़ा रहता। मन्दिर में आने वाले हनुमान जी के भक्त वानरों को जो गुड़ चना खिलाते वही वह भी उठाकर खा लेता। परन्तु भिक्षा किसी से नहीं माँगता। प्रातः उठकर हनुमान जी का स्थान साफ कर स्नानादि कर वहीं बैठ भजन करना उसका नित्य कर्म बन गया।
इस प्रकार कई माह बीत गये। कुछ समय बाद भगवान शिव की प्रेरणा से बालक रामबोला को बाबा नरहरि दास का सान्निध्य मिल गया। एक दिन बाबा नरहरि दास घूमते हुए उस मन्दिर की ओर आ निकले जहाँ बालक रामबोला रहता था। बाबा को देख बालक ने चरण छूकर प्रणाम किया। दैव योग से बाबा का चित्त बालक की ओर खिंचा। बाबा जान गये कि कालवश अनाथ सा फिरने वाला यह बालक किसी संस्कारी कुल का है।
बाबा ने बालक के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा — "कहाँ रहते हो बेटा? तुम्हारा नाम क्या है?" बालक ने सकुचाते हुए कहा — "बाबा! मैं श्रीराम का एक तुच्छ सेवक हूँ। मेरा नाम रामबोला है। मेरा काम यही है कि दिन में दो-चार बार राम नाम ले लेता हूँ जिससे प्रसन्न होकर रामजी मेरी देख-भाल करते हैं।" बालक की सरलतापूर्वक कही गयी बात सुनकर बाबा मुस्करा दिये। उन्हें बालक के कुलीन होने में सन्देह न रहा। बाबा ने बालक को साथ चलने को कहा। रामबोला तो वैसे ही आश्रय चाहता ही था सो बाबा के साथ चल दिया।
(चार)
देते समय बाबा का चित्त बालक की ओर खिंचा। बाबा जान गये कि कालवश अनाथ सा फिरने वाला यह बालक किसी संस्कारी कुल का है। उसकी दशा देख बाबा स्वतः ही उसके विषय में बहुत कुछ जान गये। बालक के सिर पर हाथ फेरते हुए बाबा नरहरि ने उसे अपने पास रख लिया। जीवन के चतुर्थ सोपान 'सन्यास आश्रम' में पहुँच चुके बाबा। बाबा समय पाकर उसे शिक्षा भी देने लगे।
धीरे-धीरे बाबा की सेवा और हनुमान जी की पूजा, कृपा से बालक के संस्कार जाग्रत होने लगे। बालक की श्रीराम में गहरी आस्था देख बाबा नरहरि ने उसे अयोध्या ले जाकर वहीं दीक्षित करने का निश्चय किया।
(पाँच)
उन दिनों उत्तर भारत में अत्यन्त उत्पात मचा हुआ था। मुगलों और पठानों के दमन से हिन्दू समाज अत्यन्त पीड़ित था। अनेक छोटे-बड़े मन्दिर तोड़ कर मस्जिदें बना दी गयी थीं। अयोध्या में पावन रामजन्म भूमि मन्दिर को तोड़कर बाबर ने मस्जिद बना दी थी।
इन्हीं दिनों बाबा नरहरि बालक को ले कर अयोध्या पहुँचे। बाबा नरहरि के परिचित सन्तों और एक मठ के महन्त के सम्मुख बालक की वैष्णवी दीक्षा की व्यवस्था हुयी। संवत 1561, माघ शुक्ल पंचमी दिन शुक्रवार को बालक के सभी संस्कार सम्पन्न हुए। बालक रामबोला के मुण्डन, यज्ञोपवीत, उपनयन आदि संस्कार सम्पन्न कराते हुए बाबा नरहरि ने बालक को अर्थ पंचक, पंच संस्कार और 'अ' कार त्रय के विषय में विस्तार से समझाया।
बाबा बोले — "रामबोला! ध्यानपूर्वक सुन! अर्थ पंचक में पाँच बातों का ज्ञान दिया जाता है। प्रथम — समस्त जगत के स्वामी, चराचर के उपास्य उस परमात्मा का स्वरूप क्या है? द्वितीय — उसके अंश स्वरूप उपासक जीवात्मा का क्या स्वरूप है? तृतीय — उस परम पिता की प्राप्ति कैसे हो? चतुर्थ — प्रभु की प्राप्ति के पश्चात उनसे क्या माँगना चाहिए? पंचम — प्रभु की प्राप्ति के मार्ग में कौन-कौन सी बाधायें आती हैं? इन सब बातों का ज्ञान होना ही 'अर्थ पंचक' ज्ञान कहलाता है।"
गंभीर हो कर सुन रहे रामबोला ने बाबा से कहा — "बाबा! अब 'पंच संस्कार' के विषय में बताने की कृपा करें।" नरहरि बाबा बोले — "पंच संस्कारों में सर्वप्रथम है गुरू देव के हाथों कण्ठी अर्थात् तुलसी की माला धारण करना। द्वितीय संस्कार है — ललाट पर श्री सहित भगवद चरणारविन्द की आकृति का उर्ध्वपुण्ड तिलक धारण करना। तृतीय संस्कार है — भुजाओं के मूल में शंख, चक्र अथवा धनुर्वाण आदि भगवद आयुधों का चिन्ह धारण करना। चतुर्थ संस्कार है — कान में सद्गुरू से परंपरा प्राप्त ईष्ट मन्त्र का श्रवण मनन और जप करना। पंचम संस्कार है — उस उपासक जीवात्मा का दास्य परक नामकरण। इस प्रकार तुम्हारे चार संस्कार पूर्ण हो चुके हैं। इस क्रम में केवल तुम्हारा नाम रखना शेष है।"
रामबोला ने पूछा — "गुरूदेव! कृपया अब 'अ' कार त्रय का भाव भी स्पष्ट करने की कृपा करें।" बाबा बोले — 'अ' कार त्रय का सम्बन्ध हृदय के भावों से है। इन तीन भावों की हृदय में पुष्टि होनी चाहिए। प्रथम — यह समझना कि मैं प्रभु का ही एक अंश हूँ। द्वितीय — यह जानना कि मैं प्रभु सेवा का ही एक उपकरण मात्र हूँ। तृतीय — मैं प्रभु के द्वारा संचालित एवं व्यवस्थित हूँ।
सारे संस्कार पूर्ण होने के पश्चात नरहरि बाबा ने बालक रामबोला को नया नाम दिया — तुलसी दास।
संस्कार तथा नाम पाकर तुलसी के जीवन में अत्यन्त महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखायी देने लगे। तुलसी अत्यन्त परिश्रम से पढ़ता। जो भी उसे पढ़ाया जाता उसे वह शीघ्र ही कंठस्थ कर लेता। दस माह तक अयोध्या में रहने के पश्चात बाबा नरहरि तुलसी को लेकर पुनः सूकर खेत आ गये। वहाँ पाँच वर्ष तक तुलसी की शिक्षा हुई। इस अवधि में बाबा ने वाल्मीकि रामायण सहित विभिन्न रामायणों की कथायें तुलसी को सुनायीं। रामायण की कथाओं में आने वाले मार्मिक प्रसंगों को सुनकर भावुक तुलसी के नेत्रों से अश्रु बहने लगते।
बाबा ने तुलसी को साहित्य, संस्कृत, पुराण, शास्त्र और वेदों के अध्ययन के लिए काशी ले जाने का निश्चय किया।
(पाँच — काशी में शिक्षा)
काशी के पंच गंगा घाट पर बाबा नरहरि के परममित्र एवं वयोवृद्ध सन्त आचार्य श्री शेष सनातन रहते हैं। आचार्य की गणना काशी के प्रमुख विद्वानों में होती है। बाबा नरहरि तुलसी दास को लेकर आचार्य शेष सनातन के पास पहुँचे। बाबा नरहरि के निवेदन और तुलसी दास के गुणों से प्रभावित हो आचार्य शेष सनातन ने उन्हें अपने पास रख लिया।
तुलसी दास को योग्य जान आचार्य शेष सनातन ने अपने दायित्व सौंपना प्रारम्भ कर दिया। तुलसी ने भी आचार्य को निराश नहीं किया। वेद पुराण, शास्त्र, नीति ही नहीं ज्योतिष में भी आचार्य ने तुलसी को पारंगत कर दिया।
लगभग पन्द्रह वर्ष का समय बीत गया। आचार्य शेष सनातन के परम शिष्य तुलसी अब तेईस-चौबीस वर्ष के हो चुके हैं। पाठशाला में सबसे तेजस्वी दिखने वाला छात्र तुलसी अध्ययन पूर्ण कर अब 'तुलसी दास शास्त्री' बन गया है। उसी पाठशाला में छात्रों को पढ़ाने के साथ-साथ पंडित तुलसीदास शास्त्री काशी के अनेक स्थानों पर प्रायः कथा भी बाँचते हैं। हनुमान जी के प्रति तुलसी की बचपन से ही अगाध श्रद्धा है। इसी अवधि में तुलसी दास ने अपने जीवन की प्रथम महत्वपूर्ण काव्य रचना 'हनुमान चालीसा' की रचना की।
कुछ समय पश्चात आचार्य शेष सनातन के भौतिक लीलाओं को समाप्त कर प्रभु में लीन हो जाने से तुलसी ने काशी को प्रणाम कर बाबा नरहरि के दर्शनों के लिए चित्रकूट जाने का निश्चय किया। मार्ग में ही सूचना मिली कि बाबा नरहरि भी ऐहिक लीला समाप्त कर चुके हैं। सो चित्रकूट को प्रणाम कर तुलसी दास ने एक बार पुनः अपनी जन्मभूमि राजापुर जाने का निश्चय किया।
(छः)
राजापुर पहुँच कर तुलसी को ज्ञात हुआ कि उनके जन्म के समय उनकी माता के निधन के कारण पिता आत्माराम संसार से उदासीन से हो गये। कुछ समय पश्चात वे भी नहीं रहे। ईश्वरीय विधान जान तुलसी ने गहरी निःश्वास भरी। माता-पिता के श्राद्ध-कर्म के पश्चात तुलसी ने उनके निमित्त भण्डारे-भोज आदि की व्यवस्था की।
तुलसीदास के स्वभाव, गुणों को देखते हुए गाँव वालों ने उन्हें वहीं रोक लिया। युवा तुलसी का मधुर कंठ स्वर और काशी नगरी से आगमन तुलसी की लोकप्रियता में अत्यन्त सहायक सिद्ध हुआ। कथा सम्पन्न होते ही उन्होंने अन्य श्रद्धालुओं से तुलसी के विषय में जानकारी प्राप्त कर उनसे अपनी पुत्री के परिणय हेतु तुलसी से बात करने को कहा।
काशी से पधारे पंडित तुलसीदास शास्त्री व्यास आसन पर विराजमान हैं। राजापुर तथा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक श्रद्धालु कथा श्रवण कर रहे हैं। राम के प्रति अगाध निष्ठा और समर्पण का प्रभाव तुलसी की कथा बाँचने की शैली में इतने स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ता है कि मानो वे स्वयं कथा प्रसंगों में उपस्थित रहे हों।
कथा श्रवण के लिए आये श्रद्धालुओं में आज यमुना पार के किसी गाँव से आये एक ब्राह्मण भी उपस्थित हैं। वे मुग्ध भाव से कथा श्रवण कर रहे हैं। परन्तु बार-बार उनका ध्यान कथा प्रसंगों से हटकर तुलसीदास की ओर चला जाता है। तुलसी में उन्हें अपनी पुत्री के योग्य वर होने के सभी गुण दिखायी पड़ते हैं।
कुछ लोगों को साथ लेकर वे तुलसीदास से मिले और उन्हें अपनी पुत्री से परिणय का अनुरोध किया। परन्तु तुलसी ने अस्वीकार कर दिया। वे सांसारिक प्रलोभनों में फँसना नहीं चाहते थे। परन्तु होनी अत्यन्त प्रबल थी।
स्वयं ज्योतिष का ज्ञान होने के कारण तुलसीदास कई बार अपने विषय में अध्ययन कर चुके थे। जिनमें उन्हें हर बार कुछ समय तक गृहस्थ जीवन व्यतीत करने और तत्पश्चात उच्च कोटि का वैराग्य सिद्ध होने के पूर्व संकेत मिलते रहे थे।
तुलसी के सहमति देते ही ज्येष्ठ शुक्ल 13 संवत 1583, गुरूवार को शुभ मुहूर्त में उनका विवाह रत्नावली नाम की अतीव सुन्दर, सुशील, धर्मपरायण एवं विदुषी कन्या से हो गया।
(सात)
पंडित तुलसीदास शास्त्री का रत्नावली से विवाह हुए लगभग चार वर्ष हो गये। गृहस्थी के निर्वाह के लिए वे कथा बाँचते और ज्योतिष का कार्य करते हैं। समय बीतने के साथ-साथ तुलसीदास का रत्नावली के प्रति प्रेम शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की भाँति बढ़ता ही जा रहा था। रत्नावली के सौंदर्य और गुणों पर अत्यधिक आसक्ति के कारण तुलसीदास विवाह से पूर्व जितना समय ध्यान, योग और राम चरणों में लगाते थे सब छूट गया है।
तुलसी के सहमति देते ही ज्येष्ठ शुक्ल 13 संवत 1583, गुरूवार को शुभ मुहूर्त में उनका विवाह हो गया। रत्नावली जब भी जाना चाहती तो तुलसीदास स्वयं उसे रोक लेते थे। परन्तु होनी को कुछ और ही मंजूर था। जब तुलसी दोबारा कथा करने के लिए बाहर गये, रत्नावली अपने पीहर चली गयी।
(आठ)
राजापुर पहुँचते-पहुँचते रात्रि हो गयी। आकाश में घिरे श्याम वर्णी मेघों के मध्य रह-रह कर दामिनी चमक रही थी। तीव्र स्वर के साथ एक दूसरे से टकराते मेघों के मध्य चमकने वाली विद्युत एक विचित्र सा कम्पन उत्पन्न कर रही थी। गाँव पहुँच कर तुलसी विचलित हो गये। इतने दिनों के प्रवास के बाद आज यदि वह घर लौटे भी तो रत्ना उनकी अनुमति के बिना ही मायके चली गयी।
अनन्यमनस्क तुलसी इधर उधर टहलने लगे। बार-बार मन को समझाते परन्तु मन का विचलन जाता न था। कई बार सोने का उपक्रम करते परन्तु फिर-फिर उठ कर बैठ जाते।
इसी प्रकार व्यग्रता में रात्रि बीतने लगी। तुलसी ने विचारा कि ससुराल कौन सी दूर है? यमुना पार करते ही अगले गाँव में रत्ना का घर है। कुछ ही समय में पहुँच जायेंगे।
तीव्र वर्षा और हवा के झोंकों से तुलसी के पग रह-रह कर इधर-उधर पड़ने लगते हैं। वस्त्र गीले हो कर शरीर से चिपक गये हैं। ऐसे भयावह मौसम की अर्धरात्रि में तुलसी यमुना की ओर बढ़ते जा रहे हैं। घाट पर पहुँच एक डोंगी वाले को बड़ी कठिनाई से यमुना पार कराने को तैयार किया। वर्षा तीव्र होती जा रही थी। कई बार डोंगी उलटते-उलटते बची।
डोंगी पार लगते ही नाविक को यथोचित धन देकर तुलसी ससुराल की ओर चल दिये। द्वार पर पहुँच काफी देर तक खटखटाने के पश्चात द्वार खुला। इतनी रात गये ऐसे मौसम में भीगे वस्त्रों में लिपटे पति को सामने देख रत्ना हतप्रभ रह गयी।
"स्वामी! इस अर्द्धरात्रि में आप यहाँ?" "पहले वस्त्र बदल लूँ फिर बताता हूँ।" भीगे वस्त्र बदलते हुए तुलसी बोले — "तुम जानती हो रत्ना! मैं तुम्हें देखे बिना क्षण भर भी नहीं रह सकता।"
रत्नावली विदुषी महिला थीं। प्रिय के प्रेम को पहचान गयीं। बोली — "इतनी रात्रि में उफनती हुयी यमुना को पार कर अपने जीवन को दाँव पर लगाने का कारण मुझसे प्रेम है या कुछ और?" रत्नावली उलाहना देते हुए बोली — "सत्य तो यह है कि आपकी आसक्ति मुझ में नहीं। जीव में बसे राम में नहीं वरन् मेरी अस्थि, चर्म, रक्त और माँस से निर्मित इस देह में है —
अस्थि चर्म मय देह यह, ता पर जितनी प्रीति।
तिसु आधी जो राम प्रति, अवशि मिटे भव भीति।।
रत्ना की बातें बाण की भाँति तुलसी के हृदय में लगीं। तुलसी गहरे विचार में डूब गये। काफी देर तक तुलसी शान्त बैठे रहे।
"नहीं रत्ना! रूठा नहीं!" तुलसी के गंभीर स्वर जैसे किसी गहरे कुएँ से निकल रहा था — "सोच रहा हूँ तुम्हारे माध्यम से मुझे स्वयं सरस्वती ने जो ज्ञान दिया है वह वेद और शास्त्र सम्मत ही है। मैं इसी क्षण तुम्हें अपना गुरू मानता हूँ।" "मेरा अपमान न कीजिए।" रत्नावली का कंठ भर आया। "नहीं रत्ना! यह तुम्हारा अपमान नहीं। तुम्हारे भीतर बैठे राम ने मुझे पतन से बचा लिया। मैं तुम्हारा यह उपकार जीवन भर नहीं भूलूँगा। मैं तुम्हें अपना गुरू मानता हूँ।" तुलसी गंभीर थे।
(नौ)
रात्रि काफी बीत चली है। तुलसीदास विचारमग्न हैं। मन में दूर-दूर तक शान्ति नहीं है। तुलसी जान गये कि सांसारिक विषयों और राम में से किसी एक को चुनने का समय आ गया है। अब तक इतनी आयु व्यर्थ ही नष्ट हो गयी। परन्तु अब शेष नहीं होने दूँगा। श्रीराम की कृपा से संसार रूपी रात्रि बीत गयी है। अब जागने पर माया का बिछौना नहीं बिछाऊँगा —
"अब लौं नसानी, अब न नसैहों।"
राम कृपा भव निसा सिरानी, जागे फिर न डसैहों।।
पायों नाम चारू चिन्ता मनि, उर कर ते न खसैहों।
स्याम रूप सुचि रूचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहों।।
परबस जानि हँस्यो इन इन्द्रिन निज बस हवै न हसैहों।
मन मधुकर पनकैं तुलसी, रघुपति कमल बसैहों।।
तुलसी के मन में उठ रहा बवन्डर समय बीतने के साथ-साथ प्रचण्ड होता जा रहा था। तुलसी ने ठान लिया — जब तक मैं इन इन्द्रियों के वश में रहा उन्होंने मनमाना नाच नचाया मेरी बड़ी हँसी उड़वायी परन्तु अब मैं ऐसा नहीं होने दूँगा। मन के जहाज को अब गंतव्य तक पहुँचा कर ही रहूँगा।
मन के भावों को किनारे लगा तुलसी सो रही पत्नी के समीप पहुँचे। तुलसी उसका मुख निहारने लगे, परन्तु अब उनकी दृष्टि में आसक्ति नहीं केवल श्रद्धा थी। दबे पाँव तुलसी ने पत्नी के चरणों के पास पहुँच शिष्यवत् प्रणाम किया। रत्नावली के मुख पर अन्तिम बार दृष्टि डाल तुलसी बाहर निकल आये।
चलते-चलते रात्रि बीत गयी। रह-रहकर भटकाव भरे विचार एक के बाद एक आ कर मन को मथते जा रहे हैं। बाल्यावस्था से अब तक के जीवन को एक क्रम में जोड़कर देखते हैं। तो दुःखों के अतिरिक्त कुछ नहीं दीखता।
(दस)
भूख लगने पर किसी से कुछ माँग कर खा लिया और प्यास लगने पर किसी बावड़ी, तालाब से पानी पीकर तुलसी इधर-उधर सो जाते। इस प्रकार चलते-चलते तुलसी तीर्थराज प्रयाग आ पहुँचे। प्रयाग पहुँच तुलसी ने गृहस्थ वेष त्याग विरक्त वेष अपना लिया।
करे एक रघुनाथ संग, बाँध जटा सिर केश।
हम तो चाखा प्रेम रस, पत्नी के उपदेश।।
कुछ समय तक प्रयाग में रहकर तुलसी तीर्थाटन का निश्चय कर निकल पड़े। तीर्थों में घूमते-घूमते 'मानसरोवर' जा पहुँचे। वहाँ काकभुशुण्डि जी के दर्शन कर लौटते हुये तीर्थों में होते हुए तुलसी शिव नगर-काशी-आ पहुँचे।
तुलसी का काफी समय अब राम के ध्यान में बीतता है। जब अधिक विचलित हो जाते तो हाथ जोड़ हनुमान जी से विनती करने लगते — "हे संकट मोचक! हे हनुमान जी! मैं आपकी शरण में हूँ। राम भक्ति में बाधक बनने वाले इन विकारों को मुझसे दूर रखें प्रभु!" समय बीतता रहा। तुलसी की भक्ति दृढ़ होती रही। वैराग्य पुष्ट होता रहा। पवनपुत्र की निष्काम सेवा ने उन्हें दिशा दिखायी। कुछ समय पश्चात हनुमान जी ने उन्हें साक्षात् दर्शन दिये।
हनुमान जी के दर्शनों से कृतकृत्य तुलसी ने उनसे श्रीराम दर्शन कराने की प्रार्थना की। हनुमान जी ने उन्हें चित्रकूट चलने के लिए कहा। राम-राम जपते तुलसी चित्रकूट पहुँचे। चित्रकूट की पर्वत मालायें, सघन वन प्रदेश और मन्दाकिनी की पवित्र धारा और शान्त वातावरण में तुलसी को राम भक्ति दृढ़ करने का पर्याप्त अवसर मिला।
(ग्यारह)
तुलसी अब अपने मन की सीमा-रेखा खींच चुके थे। हनुमान जी के दर्शनों के पश्चात रही सही कामनायें भी निस्तेज हो चली थीं। राम को पाने की चाह दृढ़ होती रही। एक दिन तुलसीदास परिक्रमा के लिए जा रहे थे तभी उन्हें मार्ग में दो राजकुमार दिखायी दिये। अति सुन्दर लग रहे दोनों राजकुमार घोड़ों पर सवार होकर वन में आखेट के लिए जा रहे थे। उनकी सुन्दरता ने तुलसी का मन मोह लिया। परन्तु तुलसीदास सोचने लगे कि वन प्रदेश में ऐसे राजकुमार तो प्रायः घूमते ही रहते हैं।
सोचते हुए तुलसी आगे बढ़ते जा रहे हैं कि तभी उनके सम्मुख हनुमान जी प्रकट हुए — "क्यों तुलसीदास जी हो गये राम दर्शन? अब तो आप सन्तुष्ट हैं ना?" तुलसीदास ने हनुमान जी को प्रणाम कर विस्मयपूर्वक पूछा — "कब गुरुदेव?" "दो घोड़ों पर सवार राजकुमार जो अभी आपके सामने से निकले वही तो प्रभु थे। लखनलाल के साथ।" हनुमान जी बोले।
"क्या? वे प्रभु थे?" तुलसी घबरा कर बोले — "मैंने तो उन्हें साधारण राजकुमार समझा था। मैं उन्हें पहचान ही नहीं पाया।" हनुमान जी हँसकर बोले — "यह कलिकाल है तुलसी जी! प्रभु साक्षात् दर्शन किसी को नहीं देते।" तुलसीदास बाबा घबरा उठे — "नहीं गुरूदेव! एक बार। केवल एक बार पुनः कृपा करें।" तुलसीदास की विनय को दयानिधान हनुमान जी टाल न सके — "ठीक है, अब आप रामघाट पर पधारें और वहाँ प्रतीक्षा करें। वहीं पर किसी समय प्रभु अवश्य कृपा करेंगे।"
हनुमान जी को प्रणाम कर तुलसीदास मन्दाकिनी तट पर बने रामघाट पर आ गये। समय बीतने के साथ-साथ तुलसी बाबा के मन में राम दरश की चाह भी बढ़ती जा रही है। व्यग्रता बढ़ जाती है तो गाने लगते हैं —
लोचन रहे बैरी होय!
कर्म हीनहि पाई हीरा दियो पल में खोय।
तुलसीदास जु, राम बिछुरे, कहो कैसी होय।।
(ग्यारह — मौनी अमावस्या — रामघाट पर राम दर्शन)
मन्दाकिनी तट पर बने रामघाट पर एक वृक्ष के नीचे राम-राम जपते हुये तुलसीदास चन्दन घिस रहे हैं। मौनी अमावस होने के कारण घाट पर बहुत भीड़ है। जब से साँवले राजकुमारों के दर्शन हुए हैं, तभी से तुलसी की राम जी के दर्शन पाने की अभिलाषा निरन्तर बढ़ती चली जा रही है।
जिस वृक्ष के नीचे तुलसीदास बैठे हैं उनके ऊपर हनुमान जी शुक (तोते) के रूप में आ पहुँचे हैं। वे चाहते हैं कम से कम आज तो तुलसीदास जी को धोखा न हो, इसीलिए वे सुअवसर देख प्रभु का भेद बताने आ पहुँचे।
"बाबा! थोड़ा सा चन्दन हमें भी देंगे?" किसी बालक का मधु से भी मीठा स्वर सुन तुलसी बाबा ने शीश उठाकर देखा तो किशोर वय के दो बालक दिखायी दिये। "क्यों नहीं मेरे नन्हें प्रभुओं! अवश्य लीजिए।" तुलसी बाबा की दृष्टि उन राजकुमारों के रूप से हटती न थी। आयु में बड़े दिखायी देने वाले किशोर ने बाबा के हाथ से चन्दन की कटोरी ले ली। दोनों किशोर अपने मस्तक पर तिलक लगाते हैं।
"बाबा! आप सबको तिलक लगाते हैं, हम आपको तिलक लगा दें?" बड़े दिखायी देने वाले उस किशोर ने मधुर स्वर में पूँछा। "हाँ-हाँ, क्यों नहीं।" तुलसी बोल उठे। बालक तुलसी दास को तब तक चन्दन लगा देता है।
तुलसीदास कहीं पुनः अवसर न चूक जायें, इसीलिए वृक्ष पर शुक रूप में विराजमान हनुमान जी बोल उठे —
'चित्रकूट के घाट पर भई सन्तन की भीर।
तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुवीर।।'
तुलसीदास अवाक!! "तिलक देत रघुवीर??" तुलसी बाबा चौंक कर जब तक वृक्ष की ओर देखते तब तक हैं, दोनों किशोर अन्तर्ध्यान हो जाते हैं। हनुमान जी प्रकट हो कर पूछते हैं — "अब तो सन्तुष्ट हैं बाबा? हो गये दर्शन?" तुलसीदास नतमस्तक थे — "यह केवल आपकी कृपा से ही संभव हुआ है, गुरूदेव! परन्तु मुझे छद्म नहीं साक्षात् दर्शन चाहिए।" "वह भी हो जायेंगे। धैर्य रखिये और प्रभु को स्मरण कीजिए।" कह कर हनुमान जी अन्तर्ध्यान हो गये।
संवत् 1628 — तुलसी बाबा अपनी कुटिया में बैठे भजन कर रहे हैं। तभी हनुमान जी उन्हें दर्शन देते हैं। प्रणाम करने के बाद बाबा ने उनसे सेवा पूँछी तो हनुमान जी बोले — "जब श्रीराम अपनी लीला का संवरण कर अपने धाम जा रहे थे तो अवध की सारी प्रजा को अपने साथ ले गये। यहाँ तक कि सीता जी की निन्दा करने वाले धोबी को भी। अपने भक्त की कलियुग में रक्षा करने और अयोध्या की देखभाल के लिए मुझे छोड़ गये। जब मैंने उनके बिना धरती पर रहने का आधार माँगा तो अपनी कथा को श्रवण, चिन्तन और मनन करने को ही प्रभु ने मुझे आधार बनाने का आदेश दिया। अब तक तो मैं रामकथाओं के माध्यम से पृथ्वी पर टिका हुआ हूँ परन्तु अब कलिकाल के बढ़ते प्रभाव से देव भाषा संस्कृत को जानने वाले कम हो गये हैं, जिसके कारण कथा के आयोजनों में भी जनरूचि घटती जा रही है। और मैं रामकथा के बिना नहीं रह सकता।"
"गुरूदेव मैं इसमें आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?" तुलसीदास ने पूछा। "आप केवल इतना करें कि संस्कृत भाषा में छपी हुयी रामकथा को लोक व्यवहार में बोली जाने वाली भाषा में रच दें।" हनुमान जी बोले — "ताकि सभी लोग सरलता से रामचरित्र को जान सकें और उन चरित्रों को अपने व्यवहार में लाकर अपना यह लोक तथा परलोक सुधार सकें। इन कथाओं के माध्यम से मुझे भी पृथ्वी पर टिके रहने का आधार मिला रहेगा।"
"किन्तु गुरूदेव! आपकी सहायता और कृपा के बिना यह गुरुतर कार्य संभव नहीं हो सकेगा।" तुलसी बाबा ने निवेदन किया। "उसके लिए मैं सदैव प्रस्तुत रहूँगा। आप अभी से सभी रामायणों और ग्रन्थों का अध्ययन प्रारम्भ कर दें जिससे कि समय आने पर रामायण की लोक भाषा में रचना कर सकें।" हनुमान जी बोले। "आपकी आज्ञा शिरोधार्य है गुरूदेव!" हनुमान जी को दण्डवत करते हुये तुलसी बाबा बोले।
समय बीतता रहा। तुलसी बाबा अध्ययनरत हैं। एक दिन रत्नावली भेंट करने आयी। पहले तो उन्होंने भेंट करने से ही मना कर दिया। परन्तु रत्नावली के बार-बार केवल दर्शन करने के आग्रह को टाल न सके। कभी सुन्दरता की परिभाषा को सार्थक करने वाली रत्नावली का मुख अब निस्तेज हो चुका है। पति को देखते ही वर्षों से बँधा धैर्य का बाँध नेत्रों की दीवार तोड़ कर बह निकला। अश्रु थमने का नाम ही नहीं लेते। कंठ भी भर आने से अवरूद्ध हो गया।
तुलसीदास पत्नी की स्थिति से अपरिचित न थे। कोई भी स्त्री पति के बिना कैसे रहती होगी, इसका अनुमान लगाना कठिन न था। रत्ना को सहानुभूति बँधाते हुए तुलसी गंभीर स्वर में बोले — "रत्ना!" रत्नावली ने धीरे से सिर ऊपर उठाया। पति के नेत्रों पर दृष्टि पड़ते ही मन अपनी विकलता को सह न सका। रत्ना की व्यथा सिसकियों में पिघलने लगी। "क्यों आयी हो?" तुलसी ने पूछा। "आश्रय चाहती थी।" रत्ना ने सिसकते हुये उत्तर दिया।
महीनों के परिश्रम से जमाया हुआ तप कहीं रत्ना की स्थिति देख द्रवित न हो जाये, इसलिए तुलसी न चाहते हुये भी कठोर हो गये — "आश्रय राम से माँगो रत्ना। मैं अब गृहस्थ नहीं विरक्त हूँ।" "आप अब भी मुझसे रूष्ट हैं।" रत्ना बोली। "अब इन बातों का कोई अर्थ नहीं रह गया है रत्ना।" तुलसी ने स्वर को भरसक संभालने का प्रयास किया — "मैं तुम्हारा ऋणी हूँ जो तुमने मुझे राम की शरण में भेज दिया। मैं तुम्हारा उपकार आजीवन नहीं भूल सकता।" "ऐसा न कहें और घर चलें।" रत्ना ने प्रार्थना की। "मेरा अब कोई घर नहीं। कोई पत्नी या परिवार नहीं।" तुलसी दृढ़ थे। "तो मुझे आप अपने साथ रख लें।" रत्ना ने निवेदन किया — "मैं आपके जप-तप, वैराग्य में बाधा नहीं बनूँगी।" "यह संभव नहीं रत्ना।" तुलसी अटल थे — "वैरागी के समीप नारी किसी भी रूप में रहे उसका वैराग्य सध नहीं पायेगा।"
काफी देर की मान-मनौवल के बाद भी तुलसी तनिक न पिघले। यद्यपि उनका वैराग्य अभी तक पूर्ण-रूपेण नहीं सधा था परन्तु राम के प्रति निष्ठा उन्हें रत्ना के प्रत्येक अनुरोध को टालने पर विवश कर रही थी। पति को मनाने के सारे प्रयास निष्फल होते देख रत्ना पति को झोली में रखी (सफेद गोपी चन्दन) कपूर आदि वस्तुयें रखते हैं तब स्त्री का त्याग उचित नहीं या मुझको भी इस झोली में डाल दीजिए अथवा विशुद्ध ज्ञान और वैराग्य को धारण कीजिए —
खरिया खरी कपूर सब उचित न पिय तिय त्याग।
कै खरिया मोहि मेलि कै, विमल विवेक विराग।।
"तुमने सही कहा रत्ना!" तुलसी के मुख पर निश्चय भारी चमक उभर आयी। "वैरागी जितना एकाकी रहे उतना ही श्रेष्ठ है। जब वैराग्य ही लक्ष्य है तो इन वस्तुओं के प्रति मोह भी उचित नहीं। लो इसी क्षण यह झोली झण्डा, कपूर, चन्दन सब त्यागता हूँ।" कहते हुये तुलसी ने तत्क्षण सब वहीं फेंक दिया। पति के हठ योग और वैराग्य के प्रति दृढ़ निश्चय को पहचान रत्नावली पति को प्रणाम कर अन्तः लौट गई।
(तेरह — जारी)
हनुमान जी की आज्ञा का पालन करने तुलसी बाबा अयोध्या की ओर चल पड़े। उन दिनों प्रयाग में माघ मेला लगा हुआ था। तुलसीदास जी ने कुछ समय वहीं रुकने का निश्चय किया। माघ पर्व के छह दिन पश्चात एक वट वृक्ष के नीचे उन्हें भारद्वाज और याज्ञवल्कय मुनि के दर्शन हुए। वहाँ उस समय वही रामकथा हो रही थे जो उन्होंने वाराह क्षेत्र में अपने गुरू नरहरि दास से सुनी थी। तुलसीदास जी ने अति श्रद्धापूर्वक कथा श्रवण की।
माघ मेले के समापन के पश्चात तुलसी अयोध्या पहुँचे। अयोध्या में रमललाहे के दर्शनों की इच्छा ले जब वे जन्मभूमि मन्दिर पहुँचे तो वहाँ बनी मस्जिद को देखकर उनकी आत्मा चीत्कार कर उठी। दासता का यह कैसा युग था? जन्मभूमि मन्दिर को तोड़ मुगल आक्रान्ता बाबर ने मस्जिद बना दी थी। सम्पूर्ण आर्यवर्त मुगलों का दास बना हुआ था।
मस्जिद बनने के बाद से ही राम भक्तों को अपने आराध्य की जन्मभूमि के पास भी नहीं जाने दिया जाता था। पूरे भारतवर्ष में रामनवमी श्रद्धा और आनन्दपूर्वक मनायी जाती परन्तु अयोध्या में तो जैसे यह दिन तलवार की धार पर चलकर आता। रामलला को बन्दी देख जन आक्रोश बढ़ने लगता। गाँव-गाँव से रामभक्त एकत्रित हो योजनायें बनाते और मस्जिद पर आक्रमण करते। कितने शत्रु मरते और कितने रामभक्त बलिदान देते इसकी कोई निश्चित गिनती न थी।
तुलसी बाबा की आत्मा चीत्कार कर उठी। उनके मन में यह स्थिति अत्यन्त क्षोभ उत्पन्न कर रही थी। परन्तु विवश थे। जन्मभूमि तक जाते और सिपाहियों द्वारा फटकारने पर चुपचाप लौट आते। प्रभु की जन्मभूमि की यह स्थिति देख बाबा रोने लगते। कुछ समय तक बाबा अयोध्या में कथा बाँचते रहे। कथा में जो अन्न, द्रव्य आ जाता वही जीविका का आधार बनता।
(चौदह — मीराबाई का पत्र)
तुलसी बाबा अपने निवास में भजन कर रहे हैं। एक राजस्थानी ब्राह्मण ने कुटिया में प्रवेश कर उन्हें प्रणाम किया और बताया — "मुझे मेवाड़ से मीराबाई ने आपके पास भेजा है। उन्होंने आपके लिए एक पत्र भेजा है जिसमें सभी बातें लिखी हुयी हैं। मीराबाई राणा साँगा के ज्येष्ठ युवराज भोजराज की राजरानी हैं। बाल्यावस्था से ही श्रीकृष्ण से प्रेम करने के कारण उन्हें अपना पति मान चुकी हैं। इधर कुछ समय से उनके पति तथा परिवार वाले उनकी भक्ति में बाधक बनने लगे हैं। इन बाधाओं से त्रस्त होकर मीराबाई ने आपकी बहुत चर्चा सुन आपको पितृ तुल्य जान आपसे परामर्श माँगा है कि ऐसी स्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए?"
मीराबाई के विषय में तुलसी बाबा जानते थे। मीरा का पत्र पढ़कर बाबा व्यग्र हो उठे। ऐसे भक्त हृदय की प्रभु ऐसी कठिन परीक्षा ले सकते हैं? धन्य हैं मीराबाई कि राज परिवार में जन्म लेकर भी उन्होंने सांसारिक विषयों में मन नहीं लगाया। श्रीकृष्ण की अनन्य भक्तिन मीराबाई पूर्व में अवश्य ही कृष्ण की सखा रहीं होंगी।
संदेश वाहक ब्राह्मण के भोजन और विश्राम की व्यवस्था कर तुलसी बाबा मीराबाई को संदेश लिखने बैठ गये। उन्होंने विनय पत्रिका के पद लिखकर भेजे — "जाके प्रिये न राम वैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही।।" (देखें: विनय पत्रिका पृष्ठ, पद-1) कविता में लिखे संदेश से संतुष्ट हो बाबा ने मीराबाई के भेजे संदेश वाहक को उत्तर ससम्मान विदा किया।
(पन्द्रह — रामनवमी और रामचरितमानस का श्रीगणेश)
होली बीते-बीते तुलसी बाबा ने 'जानकी मंगल' के रूप में एक प्रबन्ध काव्य की रचना पूर्ण कर ली। 'जानकी मंगल' में सीता-राम विवाह का अत्यन्त मधुर, सरस और सजीव वर्णन हुआ।
इधर ज्यों-ज्यों रामनवमी निकट आती जा रही है। त्यों-त्यों अयोध्या में उत्पात की आशंका बढ़ती ही जा रही है। रामभक्तों के दल के दल जन्मभूमि मुक्त कराने के लिए आपनी आहुति देने को तत्पर हैं किसी भी क्षण कुछ भी हो सकता है।
नवरात्रि आते-आते अयोध्या में मेघ तेजी से घुमड़ने लगे। शासन और रामभक्तों के मध्य टकराव की आशंका से इस बार ऐसा लग रहा था कि अवध में या तो बाबरी मस्जिद रहेगी या राम भक्त प्रजा। तुलसी बाबा भगवान से प्रार्थना करने लगे — "प्रभु कब अपने भक्तों की प्रार्थना सुनेंगे? अपने भक्तों को अपने स्वरूप के दर्शन करा दीजिए।"
श्रीराम ने जैसे अपने दास की प्रार्थना को सुन लिया। मुगल शासकों और हिन्दू प्रजा के मध्य टकराव की बातों के मध्य ही नगर में ढिंढ़ोरा पीटा गया कि — "दिल्ली से अकबर का आदेश आया है कि हिन्दू बाबरी मस्जिद में खाली स्थान पर चबूतरा बना कर वहाँ रामनवमी मना सकते हैं।"
सरकारी घोषणा सुनते ही जैसे अवध की प्रजा बावली हो गयी। तुलसी राम के प्रति नत-मस्तक हो गये। उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु गिरने लगे। चारों ओर श्रीराम की जय-जयकार होने लगी।
रामनवमी का दिन आते-आते तुलसी बाबा की व्यग्रता बढ़ने लगी। प्रातः बेला से ही मन में काव्यांकुर फूटने लगे। सब कुछ हनुमान जी के कहे अनुसार हो रहा था। वही रामजन्म का दिन, वही तिथि, नक्षत्र, ग्रह योग। श्री राम प्राकट्य वाले सभी संयोग उस दिन अयोध्या में उपस्थित थे। राम जन्म का समय आते ही श्री गणेश जी, माँ सरस्वती, भगवान शिव-पार्वती और हनुमान जी को स्मरण कर बाबा तुलसी ने श्रीराम चरित मानस का श्रीगणेश किया —
वर्णनामर्थ संघानां, रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्त्तारौ, वन्दे वाणी विनायकौ।।
भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।
याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्ध, स्वान्तः स्थामीश्वरम्।।
जो सुमिरत सिधि होय, गणनायक करिवर वदन।
करउ अनुग्रह सोई, बुद्धि राशि शुभ गुण सदन।।
मूक होइ वाचाल, पंगु चढ़इ गिरिवर गहन।
जासु कृपा सो दयाल, द्रवउ सकल कलिमल दहन।।
मैं पुनि निज गुरू सन सुनी, कथा सो सूकर खेत।
समुझि नहिं तसि बालपन, तब अति रहेऊँ अचेत।।
तदपि कहिं गुरू बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा।
भाषा बद्ध करिबि मैं सोइ। मोरे मन प्रबोध जेहि होई।।
श्रीराम चरितमानस का रचना कार्य तीव्रता से आगे बढ़ रहा है। भोर होते ही दैनन्दिन कार्यों से निवृत्त हो तुलसी बाबा लिखने बैठ जाते। छन्द चौपाइयों, दोहों और श्लोकों की रचना प्रभु कृपा से इतनी सुन्दर होती कि कब भोर से दोपहर और दोपहर से सांझ हो जाती बाबा जान ही नहीं पाते। इधर रामघाट पर कथा वाचन भी चल रहा है। बाबा जो भी रचते राम कथा में सरस कंठ से रामचरण अनुरागी श्रोताओं को बड़ी तन्मयता से सुनाते। बाल काण्ड, अयोध्या काण्ड के पूर्ण होने के पश्चात इस समय तुलसी अरण्यकाण्ड लिख रहे हैं। लिखते समय बाबा के नेत्रों के सम्मुख वन के दृश्य चलायमान हो रहे हैं।
प्रभु राम जनक नन्दनी सीता तथा अनुज लक्ष्मण सहित वन में विचरण कर रहे हैं। यमुना किनारे के गाँवों के निवासी उन्हें देख-देख कर जीवन सार्थक कर रहे हैं। श्रीराम उनसे ऐसे मिल रहे हैं जैसे वे उनके जन्म से परिचित या सम्बन्धी हों। लिखते-लिखते तुलसी अपनी कल्पना में ऐसे डूब जाते हैं कि जैसे वे स्वयं उस स्थान पर उपस्थित हों। अपनी कल्पना में डूबे तुलसी एक छोटे तपस्वी के रूप में, जो मन वचन और कर्म से श्री राम चरण अनुरागी है, प्रभु के सम्मुख पहुँच जाते हैं। आराध्य के दर्शन पाते ही तुलसी भीगे नेत्रों से प्रभु के सम्मुख दण्ड के समान गिर जाते हैं। श्रीराम उन्हें उठाकर अपने हृदय से लगा लेते।
(सोलह — मार्ग शीर्ष शुक्ल पक्ष — सम्वत् 1633)
दो वर्ष सात माह छब्बीस दिन पश्चात आज राम विवाह के दिन श्रीराम चरित मानस के सातों काण्ड पूर्ण हो गये हैं। तुलसी बाबा अत्यन्त प्रसन्न हैं। भक्ति, निष्ठा, वैराग्य और समर्पण का चतुष्टय संगम एक अनुपम काव्य-कृति के रूप में सामने है। किन्तु तुलसीदास जानते हैं कि यह महाकाव्य उनको माध्यम बना स्वयं हनुमान जी ने रचा है। उनकी भूमिका केवल इतनी है कि वे राम जी के दास हैं और हनुमान जी के शिष्य। कुछ समय तक अयोध्या में स्वरचित रामायण की कथाओं के प्रसंग और चौपाइयों दोहों से उन्होंने जन-जन को राममय कर दिया। अपने धन्धों को चोट पहुँचती देख पण्डे उन्हें बार-बार कष्ट देते रहे। कुछ समय बाद त्रस्त तुलसी काशी चले आये।
(सत्रह — काशी में)
काशी में तुलसी बाबा अपने अभिन्न सखा गंगाराम के निवास पर ठहरे। वहीं उनका परिचय टोडरमल से हुआ। टोडरमल गंगापार के कई गाँवों के सम्पन्न, धर्मनिष्ठ जमींदार थे। तुलसी के व्यक्तित्व और काव्य कला से प्रभावित टोडर ने उन्हें अत्यन्त सम्मान दिया। गंगाराम और टोडरमल की सहायता से तुलसी ने काशी में अखाड़ों की स्थापना की। उनका मानना था कि यदि युवा सबल होंगे तो हमारे धर्म की ओर कोई आँख उठाकर देखने का दुस्साहस नहीं कर सकेगा। इन अखाड़ों में हनुमान जी की मूर्तियों की स्थापना की परम्परा भी तुलसी बाबा ने ही प्रचलित की। अनेक स्थान पर श्री रामलीलाओं का आयोजन, मंचन और प्रचलन भी बाबा जी के द्वारा ही हुआ।
इन सब सामाजिक कार्यों के साथ-साथ रामकथा वाचन भी चलता रहा। रामचरित मानस की चौपाईयों, दोहों पर आधारित रामकथा का मधुर, मार्मिक वर्णन तुलसी बाबा को काशी की गली-गली और जन-जन में लोकप्रिय करता चला गया। जन-जन के मानस पटल पर 'मंगल भवन अमंगल हारी' राम की छवि को तुलसी की मधुर, ओजपूर्ण वाणी ने ऐसा अंकित किया कि काशी में चारों ओर रामचरित मानस की गूँज ही सुनायी देने लगी।
'शैवनगरी काशी' में वैष्णव 'राम' की चर्चा पोंगा पंथियों को नहीं सुहायी। उधर तुलसी अपनी रामकथाओं से पंडों के पाखंड को खंडित करते जा रहे थे। शैव, वैष्णव, सगुण, निर्गुण सभी विचार धाराओं और पंथों के खलों ने मिलकर एक स्वर से तुलसी की निंदा करनी प्रारम्भ कर दी। देव भाषा संस्कृत के स्थान पर जन-भाषा हिंदी में रामायण की रचना और उसकी लोकप्रियता से पण्डों के धंधे पर चोट पहुँची थी। सो सब मिलकर प्रयास करने लगे कि कैसे तुलसी और रामायण की प्रतिष्ठा मिटायी जाये? इधर तुलसी की रामकथाओं में जन-जन को राम से जोड़ने का कार्य चल रहा था उधर षड़यन्त्रकारियों के मस्तिष्क में नित नूतन कुचक्र और योजनायें आकार ले रही थीं।
ऐसे ही एक दिन सब षड़यन्त्रकारियों ने मिलकर काशी नरेश के दरबार में एक स्वर से उन्हें तुलसी के विरूद्ध षड़यन्त्र बताया। काशी नरेश ने तुलसीकृत रामायण की प्रति मंगाकर स्वयं देखी परन्तु उसमें धर्म के विरूद्ध कोई बात नहीं दिखायी दी। पण्डों के बार-बार उकसाने पर काशी नरेश ने निर्णय दिया कि उनकी उपस्थिति में भगवान विश्वनाथ के मंदिर में शयन आरती के पश्चात सब वेद, पुराण और शास्त्रों के साथ रामचरित मानस को रख दिया जाये। तत्पश्चात मन्दिर में कोई नहीं रहेगा। दोनों पक्ष मन्दिर के बाहर अपने-अपने लोगों के साथ पहरा देंगे तथा मन्दिर के कपाट बन्द कर चाबी स्वयं नरेश अपने पास रखेंगे। भगवान विश्वनाथ का जो भी निर्णय होगा वह सर्वमान्य होगा।
बाबा विश्वनाथ के मन्दिर में शयन आरती के पश्चात सब ग्रन्थों के साथ रामचरित मानस रख, भगवान शिव से निर्णय देने की प्रार्थना कर ताला बन्द कर दिया गया। चाबी काशी नरेश ने स्वयं अपने पास रखी।
प्रातः होते ही मन्दिर के कपाट खुलने से पूर्व ही तुलसीदास जी तथा विरोधी पक्ष के लोगों सहित अनेक श्रद्धालु भी भगवान शिव के निर्णय को जानने की उत्सुकता के चलते मन्दिर के बाहर एकत्र हो गये। काशी नरेश की उपस्थिति में मन्दिर का द्वारा खोला गया। काशी नरेश आगे बढ़ कर देखा तो हतप्रभ रह गये। रात्रि में जिस रामचरित मानस को सब ग्रन्थों से अलग दूसरे स्थान पर रखा था उसे भोले बाबा ने स्वयं उठाकर सबसे ऊपर विराजमान कर दिया था। काशी नरेश ने भगवान शिव और रामचरित मानस को प्रणाम किया। दो पग आगे बढ़ कर नरेश ने जब रामचरित मानस को उठा कर देखा तो उसके ऊपर तीन शब्दों में भगवान शिव ने जैसे स्वयं हस्ताक्षर कर दिये थे — सत्यं-शिवं-सुन्दरं।
भगवान आशुतोष का निर्णय देख दुष्ट पण्डों के मुख ऐसे विवर्ण हो गये जैसे किसी ने सारा रक्त निचोड़ लिया हो। काशी नरेश, तुलसी बाबा और सभी श्रद्धालु 'हर हर महादेव!' की जय घोष करने लगे। पण्डों को झिड़कते हुये काशी नरेश ने आदेश दिया कि — "जिसके मन में भी शंका हो वह स्वयं देख ले। प्रत्यक्षं किं प्रमाणं! अब तुलसी बाबा अथवा श्री रामचरित मानस के विरोध में कोई स्वर नहीं उठना चाहिए।" सभी श्रद्धालु रामायण तथा तुलसी बाबा की जय-जयकार करने लगे।
(अट्ठारह — मधुसूदन सरस्वती और चोर प्रसंग)
इस घटना के पश्चात भी दुष्टों की कुचालें समाप्त नहीं हुयीं। वे तुलसी और उनकी रामायण को नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहते थे। तभी किसी ने सुझाव दिया कि स्वामी मधुसूदन जी सरस्वती इस समय काशी में सर्वमान्य तथा सबसे प्रतिष्ठित, अद्वैतवाद का समर्थन करने वाले, निर्गुण भक्ति शाखा के विद्वान तथा प्रतिपादक हैं। उनके पास चलकर प्रार्थना की जाये कि तुलसी ने उनके अद्वैतवाद को चुनौती दी है। सगुणराम की उपासना और प्रतिष्ठा से निर्गुण ब्रह्म के विरूद्ध तुलसी जन मानस में भ्रम फैला रहे हैं।
सारा कार्य योजनानुरूप हुआ। स्वामी मधुसूदन सरस्वती को ग्रन्थ और तुलसी के विषय में भड़काने के लिए इस प्रकार के तर्क-वितर्क और कुतर्कों का आश्रय लिया गया कि स्वामी जी ने अन्ततः कह दिया कि वे स्वयं ग्रन्थ का अध्ययन करने के पश्चात ही कोई निर्णय देंगे।
रामचरित मानस की प्रति मंगा स्वामी जी ने अध्ययन प्रारम्भ किया। स्वामी जी जैसे-जैसे रामायण पढ़ते जा रहे हैं वैसे-वैसे पण्डों का झूठ उजागर होता जा रहा है। रामायण में तुलसी ने कहीं भी अद्वैतवाद का विरोध नहीं किया था अपितु वे तो कह रहे थे कि सगुणहिं अगुणहि नहिं कछु भेदा — "अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम वश सगुण सो होई।"
सम्पूर्ण रामायण पढ़ने के पश्चात भी स्वामी जी को शिवत्व से विरोध करते तुलसी कहीं नहीं दिखायी दिये — 'बिनु छल विश्वनाथ पद नेहू। रामभगत कर लच्छन ऐहू।' 'प्रभु समरथ सर्वज्ञ शिव, सकल कला गुण धाम।' केवल इतना ही नहीं वरन् तुलसी तो अपने आराध्य राम से ही कहलवा रहे हैं कि — "संकर भजन बिना नर गति न पावइ मोरि।" "शिवद्रोही मम दास कहावा। सो नर मोहिं सपनेहूँ नहिं भावा।।"
श्रीराम चरितमानस का अध्ययन सम्पन्न करते ही मधुसूदन सरस्वती जी जान गये कि इस दिव्य ग्रन्थ के प्रति काशी के विद्वान कहलाने वाले पण्डों का द्वेषपूर्ण आचरण केवल उनके मोह, मद में अंधे होने के कारण ही है। विद्वान कहलाने वाले इन प्रपंचियों का मिलन अन्तःकरण शुद्ध करने के लिए इस पवित्र ग्रन्थ का अनुमोदन करना उनके लिए नितांत आवश्यक है। अतएव उन्होंने मानस की प्रति पर यह श्लोक लिख दिया —
"आनन्द कानने हयास्मिन् जंगमस्तुलसी तरूः।
कविता मंजरी यस्क, राम भ्रमर भूषिता।।"
इस काशी रूपी आनन्द वन में तुलसीदास तुलसी का चलता फिरता पौधा है। उसकी कविता रूपी मंजरी अत्यन्त सुन्दर है, जिस पर श्रीराम रूपी भँवरा मंडराया करता है।
मधुसूदन सरस्वती जी के मत को भी तुलसी के पक्ष में जाता देख दुष्ट पण्डे बौखला गये। अबकी बार उन लोगों ने रामायण को ही चुरा लेने का निश्चय किया। निधुवा-सिधुवा नाम के दो चोरों को रामायण चुराने भेजा गया। रात्रि होते ही जैसे ही दोनों चोर कुटिया के पास पहुँचे, उन्हें दो किशोर वय राजकुमार कुटिया की पहरेदारी करते दिखायी दिये। पीताम्बर पहने धनुष-बाण हाथ में लिए दोनों किशोर अत्यन्त सुन्दर थे। रात भर उनके कुटिया की चौकीदारी करने के कारण दोनों चोर कुटिया के पास भी न फटक सके। रात भर उचक-उचक कर दोनों चोर किशोर पहरेदारों की सुन्दरता देखते रहे परन्तु चोरी का साहस न जुटा सके। प्रातः होते ही दोनों पहरेदार दिखायी नहीं दिये। चोर उनके दर्शन के लिए बावले हुए जा रहे थे। वे तुलसी बाबा की कुटिया में पहुँचे और उनसे दोनों राजकुमार जैसे दिखने वाले पहरेदारों को दिखाने का आग्रह करने लगे।
बाबा विस्मित होकर बोले — "मैं निर्धन साधु हूँ। मेरे पास ऐसा क्या है जो कोई चुरा लेगा और उसके लिये मुझे पहरेदार रखने पड़े।" उन चोरों ने बाबा से क्षमा माँगते हुए बताया कि वे धन नहीं चुराने आये थे। उन्हें काशी के कुछ पण्डों ने उनकी रामायण चुराने भेजा था। परन्तु उन दोनों पहरेदारों की रात भर कुटिया की रखवाली के कारण वे कुटिया में प्रवेश नहीं कर सके। उन किशोरों के दर्शन से उनकी बुद्धि शुद्ध हो गयी है। अब वे केवल उन पहरेदारों के दर्शन करना चाहते हैं। जैसे भी बन सके बाबा उनके दर्शन करा दें।
तुलसी बाबा जान गये कि अनुज लक्ष्मण के साथ स्वयं प्रभु राम रात भर उनकी कुटिया की पहरेदारी करते रहे। रात भर प्रभु को कितना कष्ट हुआ होगा। उनका अनुमान लगा, बाबा के नेत्र भर आये। बाबा तुलसी चोरों से बोले — "अरे पागलों! जिनके पीछे हमारे जैसे साधु घर-द्वार छोड़कर जगत भर की धूल फाँकते फिरते हैं और फिर भी जिनके दर्शन नहीं हो जाते, वे ही दोनों भाई राम और लक्ष्मण तुम्हें इतनी सरलता से दर्शन दे गये। स्वयं प्रभु रात भर अपने ग्रन्थ की रक्षा करते रहे। उनके दर्शनों के पश्चात कोई भी व्यक्ति पापी नहीं रहता। तभी तो तुम भी बार-बार प्रभु के दर्शन करना चाहते हो। जाओ अब सम्पूर्ण जीवन प्रभु की सेवा में लगाओ।"
दोनों चोर बाबा के चरणों में गिर पड़े। बोले — "बाबा! ऐसा आशीर्वाद दें कि उन युगल किशारे पहरेदारों के अतिरिक्त कोई हमारे मन प्राण में न बस सके।" दोनों चोरों को आशीर्वाद दे बाबा ने विदा किया। प्रभु की कृपा को स्मरण कर बार-बार बाबा के नेत्र सजल हो उठते। "उनके लिए प्रभु को रात भर कितना कष्ट उठाना पड़ा। रात भर प्रभु उनकी पहरेदारी करते रहे और वे आनन्दपूर्वक सोते रहे।"
तुलसी बाबा मानस की रक्षा के लिए चिन्तित हो उठे। अन्ततः उन्होंने अपना सारा सामान लुटा कर मानस को किसी सुरक्षित स्थान पर रखवाने का निश्चय किया। मानस सुरक्षित रहेगी तो प्रभु को भी उनकी पहरेदारी नहीं करनी पड़ेगी। एक भण्डारे का आयोजन कर बाबा ने सब साधु ब्राह्मणों, भिक्षुकों में वितरित कर दिया। अन्न, वस्त्र, द्रव्य और ग्रन्थ सब कुछ बाँट दिया।
(उन्नीस — श्वपच और गौ हत्या प्रसंग)
सामान वितरित करते समय ही बाबा को एक व्यक्ति ने आकर बताया कि एक व्यक्ति बहुत देर से पुकार रहा है। आप उससे एक बार मिल कर उसकी प्रार्थना सुन लें। उस व्यक्ति ने बाबा को प्रणाम कर बताया कि वह अयोध्या का रहने वाला एक श्वपच (डोम — जो दाह संस्कार करते हैं) है। तुलसी बाबा राम के बहुत बड़े भक्त हैं इसलिए वह उनके दर्शन करने चला आया।
तुलसी बाबा ने जैसे ही सुना कि वह व्यक्ति राम भक्त है और उनकी नगरी अयोध्या से आया है बाबा ने उसे भुजाओं में भरकर हृदय से लगा लिया। वह व्यक्ति घबरा कर बोला — "बाबा! आप यह क्या कर रहे हैं? मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि मैं डोम हूँ अस्पृश्य हूँ। मुझे छूकर आप अपवित्र हो जायेंगे।" वहाँ उपस्थित लोग हतप्रभ होकर एक दूसरे का मुख देखने लगे। तुलसी बाबा का व्यवहार उनकी समझ से बाहर था।
"आप अस्पृश्य नहीं, परम पवित्र हैं।" बाबा ने कहा — "भगवान राम की नगरी में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति तो उनका पार्षद होता है फिर आप अपवित्र कैसे हो सकते हैं। प्रभु ने स्वयं शबरी से झूठे बेर खाये, निषाद राज से मित्रता की, गीध का उद्धार किया। उनकी दृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति सम है। आप अस्पृश्य नहीं हैं। आइये इस दुराग्रह को दूर करने के लिए आप मेरे यहाँ भोजन कीजिए फिर वार्ता होगी।"
बाबा ने उसे आसन पर बिठा भोजन कराया। उपस्थिति समुदाय में से कुछ एक लोगों ने विरोध किया तो बाबा बोले —
तुलसी भक्त श्वपच भलो, जपै रैन दिन राम।
ऊँचौ कुल केहि काम को, जहाँ न हरि का नाम।।
उस श्वपच को भोजन करा ससम्मान विदा किया गया। तुलसी के इस कार्य के प्रशंसक कम और आलोचक अधिक निकले। विरोधियों के अत्यन्त निन्दात्मक प्रचार का बाबा लक्ष्य बने। विरोध के स्वर अभी ठण्डे भी न हुए थे कि एक घटना और घट गयी। एक दिन तुलसी दास अपनी कुटिया में कुछ व्यक्तियों के साथ बैठे भजन चर्चा कर रहे थे तभी एक कृशकाय सा व्यक्ति लड़खड़ाता हुआ द्वार के पास आ पहुँचा। काँपते हाथ, सूखे अधर, विवर्ण मुख, निस्तेज आँखें। कोई भी लक्षण उसमें ऐसा नहीं था जो उसे दीनता की प्रतिमा न बनाता हो। संभल कर खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। काँपते स्वर में बोला — "है कोई राम का प्यारा! जो तीन दिन से भूखे इस गौ हत्यारे को राम के नाम पर भोजन करा सके?" क्षीण स्वर में उसने यही गुहार पुनः लगायी।
तुलसी बाबा उठ कर द्वार की ओर भागे। उसकी स्थिति देख बाबा सब जान गये। उनसे रहा न गया। भीतर लाकर उस व्यक्ति के हाथ पैर धुलाकर उसे भोजन कराने के लिए अपने पास बैठा लिया। उपस्थित लोगों में से कुछ न विरोध किया तो बाबा बोले — "पहले इसे भोजन करें, फिर इस महाअपराध का कारण पूछेंगे।"
भोजन कराकर बाबा ने उससे इस अपराध का कारण पूछा तो वह बोला कि अनजाने में उसके हाथों से चोट लगने से एक गाय की मृत्यु हो गयी जिसके कारण समाज तथा ब्राह्मणों ने उसे गाँव और समाज से बहिष्कृत कर दिया। तीन दिन से वह भूखा फिर रहा है। किसी ने रोटी का एक टुकड़ा तक नहीं दिया। बाबा ने अब भोजन कराकर उसकी प्राण रक्षा की।
उपस्थित लोगों ने तुलसी की इस बात के लिए अत्यन्त निंदा की कि ब्राह्मणों द्वारा समाज से बहिष्कृत व्यक्ति को अपने यहाँ भोजन कराकर उन्होंने न केवल अपराध किया है वरन् उसके चरण धोकर वर्ण व्यवस्था का अपमान किया है। तुलसी बाबा बोले — "संसार में जहाँ पाप संभव है वहाँ उसका प्रायश्चित भी उपलब्ध है। भूल हो जाना एक स्वाभाविक बात है परन्तु उसे स्वीकार कर पुनः भूल से बचना ही मनुष्य में उच्च गुणों के होने का लक्षण है। इस व्यक्ति से अपराध हुआ, यह स्वीकारता है; पुनः ऐसा न करने का संकल्प भी लेता है तो फिर यह पापी कहाँ रह जाता है।" नारद पाँचरात्रग्रन्थ के सनत्कुमार संहिता में लिखा है —
श्री रामेति परं जाप्यं तारकं ब्रह्म संज्ञकम्।
ब्रह्म हत्यादि पापध्निमति वेद विदो विदुः।
इसके अतिरिक्त श्रीमद् भगवत महापुराण, जो सब वेदों शास्त्रों और पुराणों का सार मानी जाती है, उसके अजामिलोपाख्यान प्रसंग में लिखा है कि समस्त प्रकार के पापों का आचरण करने वाला प्राणी भी यदि भगवन्नाम का आश्रय ले तो उसके समस्त पापों का प्रायश्चित हो जाता है। बाबा के प्रमाणित तर्कों से उपस्थित समुदाय शान्त हो गया। परन्तु बाबा के विरोधियों को इस घटना से बहुत बल मिला। बाबा के विरूद्ध उनके षड़यन्त्रों की भूमिका में यह घटनायें होम में घृत का कार्य करने लगीं।
(उन्नीस — जारी — वैष्णव मठ और गोस्वामी पद)
तुलसी बाबा के पुराने मित्र गंगाराम ज्योतिषी एक दिन टोडरमल के साथ बाबा के पास पहुँचे और निवेदन किया कि काशी में ही एक वैष्णव मठ है जिसके गोंसाईं जी स्वर्गवासी हो गये हैं। अब उनके लोभी शिष्यों में गोस्वामी पद के लिए झगड़ा होता रहता है। अब या तो वहाँ कोई योग्य व्यक्ति पद संभाले अथवा मठ को बन्द कर दिया जाये। गंगाराम और टोडर का विचार है कि आप वहाँ के गोस्वामी का पद संभालें। वहाँ के निवासी भी ऐसा ही चाहते हैं।
विरक्त तुलसी पुनः सांसारिक प्रलोभनों में नहीं फंसना चाहते थे। धन, यश, मान और वैभव की प्राप्ति के लिए काशी के मठों में होने वाली वर्चस्व की लड़ाई के समाचारों से बाबा अनभिज्ञ न थे। उन्होंने अस्वीकार कर दिया। गंगाराम और टोडर ने अनेक बार अनुनय-विनय की। तुलसी दोनों का अत्यधिक सम्मान करते थे। उनका कहना टाल न सके। अंततः एक शुभ मुहूर्त में तुलसी दास दाढ़ी, मूँछ, केश मुंडा कर उस मठ के गोस्वामी बन गये। गोस्वामी तुलसीदास।
गोस्वामी जी के आने के पश्चात उस मठ की न केवल आय बढ़ गयी अपितु व्यवस्था भी सुधर गयी। यद्यपि उस वैष्णव मठ में भगवान कृष्ण के विग्रह की पूजा होती थी। परन्तु गोस्वामी जी जानते थे कि श्रीकृष्ण राम का ही अवतार हैं उनमें कोई भेद नहीं। जिस प्रकार उनके लिए शिव और राम वस्तुतः एक ही थे ऐसा ही वे राम और कृष्ण को मानते थे। समय बीता रहा, गोस्वामी जी के सिर और गालों पर उस्तरा फिरता रहा परन्तु उनका मन इन बाहरी क्रियाओं और आडम्बरों से निरासक्त रह राम को साधने में ही सधता रहा। कथा कीर्तन आयोजन चलते रहे।
(बीस — सती विधवा और अकबर प्रसंग)
एक दिन रत्नावली उनसे मिलने मठ में आयीं। गोस्वामी जी ने उनके कुछ दिन तक मठ में ठहरने की व्यवस्था करा दी। रत्नावली काशी में ही रुकना चाहती थीं, परन्तु गोस्वामी जी ने स्वीकृति नहीं दी। रत्नावली बोली — "मैं आपके भजन में बाधा नहीं बनूँगी। काशी में ही कहीं अलग घर में रह लूँगी।" गोस्वामी जी बोले — "देवी यह समय अब पूर्ववत नहीं रहा। लोक धर्म निभाना अत्यन्त कठिन हो गया है। उचित यही होगा कि तुम घर लौट जाओ।" रत्नावली ने गिड़गिड़ाते हुए पुनः आग्रह किया — "मैं आपके ईष्ट साधन में बाधा नहीं बनूँगी। आपकी इच्छा के बिना इस मठ में भी नहीं आऊँगी।" गोस्वामी जी ने दृढ़तापूर्वक शान्त स्वर में कहा — "नहीं! व्यर्थ निंदा से बचने के लिए तुम्हारा यहाँ से जाना अवश्यसंभावी है। अब इस जीवन में हमारा मिलना या साथ रह पाना असंभव है।"
गोस्वामी जी के निर्णय से रत्नावली का कंठ अवरुद्ध हो गया। भीगे नेत्रों से अश्रुकण गिरने लगे। रुंधे कंठ से बोली — "जैसी आपकी आज्ञा! परन्तु एक बात अवश्य जानना चाहती हूँ।" "पूछो!" गोस्वामी जी ने अनुमति दी। "मैंने रामचरितमानस पढ़ी है। अत्यन्त सुन्दर रचना है। परन्तु इस पावन ग्रन्थ के उत्तरकाण्ड में आपने धोबी के निंदा करने पर श्रीराम द्वारा सीता जी के त्याग का प्रसंग क्यों नहीं लिखा?" रत्ना ने पूछा।
गोस्वामी जी चुप रह गये। रत्नावली के प्रति किये अपने व्यवहार से उनके मन में एक अपराध बोध सा उत्पन्न हो उठा। कुछ क्षण चुप रहने के पश्चात तुलसी भावुक स्वर में बोले — "सत्य कहूँ रत्ना! जो अपराध मैंने तुम्हारे प्रति किया है और उससे तुम्हें जो अहित हुआ है वह स्वयं में अक्षम्य है। अनन्त करुणा सिन्धु मेरे राम जगदजननी सीता के प्रति ऐसा अन्याय नहीं कर सकते थे।"
पति की इस बात पर रत्नावली सिसक उठी। उनके मन में आज तक अपने व्यवहार पर इतनी ग्लानि भरी हुयी है। यह जानकर रत्नावली पति के प्रति नतमस्तक हो उठी। चलते समय पति के चरणों में प्रणाम करती हुयी बोली — "एक भिक्षा मुझे देंगे स्वामी!" "कहो देवी!" गोस्वामी जी बोले। "मेरी मृत्यु से पूर्व एक बार दर्शन देने अवश्य आयेंगे।" रत्ना ने प्रार्थना के स्वर में कहा। "वचन देता हूँ! अवश्य आऊँगा।" तुलसी बोले।
प्रणाम कर रत्नावली चली गयी। रत्नावली का कुछ दिन के लिए आना ही नहीं उनका जाना भी गोस्वामी जी के विरोधियों को पचा पाना कठिन हो गया। वे मानने लगे कि पत्नी का त्याग करके गोस्वामी जी ने अन्य गृहस्थ गोस्वामियों की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचाया है।
गोस्वामी जी अब पूर्णतया स्वतन्त्र थे। कथा-कीर्तन करना, स्थान-स्थान पर अखाड़ों का निर्माण और व्यवस्था, अखाड़ों में हनुमान जी की मूर्तियों की प्रतिष्ठा के साथ-साथ गोस्वामी जी ने ध्रुव और प्रहलाद लीला का भी मंचन आरम्भ करवाया। उन्होंने रामलीलाओं के प्रचलन और मंचन से शिवनगरी काशी को राममय कर दिया।
एक दिन गोस्वामी जी कहीं जा रहे थे। उसी मार्ग पर सामने से एक शवयात्रा आ रही थी। शवयात्रा में चल रहे लोगों के पीछे-पीछे शृंगार किये, हाथ में नारियल लिए एक स्त्री चल रही थी। वह मृतक की पत्नी थी जो उसके साथ ही सती होने जा रही थी। मार्ग में गोस्वामी जी को देखकर उसने सोचा दुर्भाग्य में भी कैसा सौभाग्य है। समाप्त होने जा रहे जीवन को सन्त शिरोमणि तुलसी बाबा के दर्शन हुये। कुछ ऐसा ही सोचकर वह श्रद्धापूर्वक गोस्वामी जी के चरणों में प्रणाम करने बढ़ी।
"अखण्ड सौभाग्यवती होओ पुत्री।" — बाबा ने आशीर्वाद दिया। सती होने जा रही उस विधवा ने आश्चर्य चकित होकर तुलसी बाबा को देखा। बाबा से बोली — "यह जो शव यात्रा जा रही है, मेरे पति की है। मैं इसके साथ सती होने जा रही हूँ और आप मुझे अखण्ड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे रहे हैं बाबा?" "क्या?" बाबा चकित रह गये। प्रभु की यह कैसी लीला थी जो ऐसा आशीर्वाद उनके मुख से निकल गया। कौतुहल वश शव यात्रा रोक दी गयी।
विधवा बोली — "बाबा! आप तो 'कहिह सत्य प्रिय वचन विचारी' के उद्घोषक रहे हैं। फिर यह आपने कैसा आशीर्वाद मुझे दिया?" तुलसी बाबा बोले — "राम पर विश्वास रखो बेटी! मेरे मुख से असत्य वचन कभी नहीं निकला है। मेरे राम कभी मेरे लिए झूठे नहीं सिद्ध हुये हैं। आज इस आशीर्वाद के पीछे अवश्य ही प्रभु की कोई लीला छिपी हुयी है। आओ! सब मिलकर राम नाम जपें।"
सब लोगों ने शव के पास बैठ राम-नाम जपना आरम्भ कर दिया। तुलसी बाबा ने प्रभु से अपने सेवक के वचन की मर्यादा निभाने का निवेदन किया। बाबा मृतक के सिर पर हाथ फेरने लगे। कुछ क्षण बाद मृतक उठ बैठा। लोग आश्चर्य में डूब गये। श्रीराम के साथ-साथ तुलसी की भी जय जयकार होने लगी। राम-नाम का महत्व और महिमा समझाकर बाबा ने उस स्त्री और उसके पति को शेष जीवन राम चरणों में अर्पित करने की प्रेरणा दी।
इस घटना से गोस्वामी जी की लोकप्रियता अत्यन्त बढ़ गयी। उनका यश दिल्ली में बादशाह अकबर तक पहुँच गया। अकबर ने ऐसे चमत्कारी सन्त को देखने की इच्छा व्यक्त की। गोस्वामी जी को दिल्ली बुलवाया गया। गोस्वामी जी काशी से वृन्दावन धाम में बाँके बिहारी के दर्शन कर दिल्ली पहुँचे। अकबर ने उन्हें कोई चमत्कार दिखाने को कहा। गोस्वामी जी ने बताया कि वे एक साधारण सन्त हैं कोई चमत्कारी व्यक्ति नहीं हैं। वे तो राम के एक दास मात्र हैं और चमत्कार तो केवल राम ही दिखा सकते हैं।
अकबर को विश्वास न हुआ। वह चमत्कार दिखाने का हठ करने लगा। गोस्वामी जी चमत्कारी व्यक्ति तो वे नहीं, सो सविनय मना कर दिया। क्रुद्ध होकर अकबर ने उन्हें बन्दी बना लिया। गोस्वामी जी को बन्दी बनाने का समाचार जंगल की आग की तरह फैल गया। चारों ओर हाहाकार मच गया। अकबर के इस कृत्य की निंदा होने लगी। काशी में तो गोस्वामी जी के द्वारा स्थापित अखाड़ों के युवकों ने विद्रोह भी कर दिया।
इधर बन्दीगृह में पड़े तुलसी ने संकट मोचक हनुमान जी को स्मरण किया। हनुमान जी तुलसी बाबा को सदैव सिद्ध थे। आज भी प्रकट होकर उन्हें निश्चन्त किया और अकबर को ऐसा चमत्कार दिखाने का वचन दिया कि उसके बाद अकबर जीवन भर चमत्कार का नाम भी नहीं लेगा।
रात्रि होते ही असंख्य वानरों ने सारे नगर को घेर लिया। जहाँ दृष्टि जाती उधर वानर दिखायी पड़ते। अकबर के महल में तो वानर किसी को कहीं आने जाने ही नहीं दे रहे थे। अकबर के शयन कक्ष और स्त्रियों के कक्षों में वानरों ने ऐसा उत्पात मचाया कि अकबर त्राहिमाम कर उठा। सारी बात समझ में आने पर अकबर दौड़ा-दौड़ा कारागार में गया और गोस्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा। उन्हें स्वतन्त्र कर बारबार क्षमा माँगी। गोस्वामी जी ने उसे पुनः किसी सन्त को कष्ट न देने को कहा। अकबर ने गोस्वामी जी को अपने दरबार में ही रूकने और प्रतिवर्ष दो लाख रूपये का पट्टा (आय) लिखने का प्रलोभन दिया। परन्तु अध्यात्म पथ के पथिक, अवध-काशी जैसे स्थानों पर रहने वाले वीतरागी तुलसी रामभक्ति के सम्मुख बड़े से बड़ा प्रलोभन भी कैसे स्वीकार कर सकते थे। सो अकबर से बोले —
'हम चाकर रघुवीर के, पट्टो लिख्यो दरबार।
तुलसी अब क्या होंयेंगे, नर के मनसबदार।।'
(इक्कीस — विनय पत्रिका और हनुमान बाहुक)
तुलसी बाबा की बढ़ती प्रतिष्ठा काशी के अनेक विद्वानों को सहन नहीं हुयी। बार-बार भाँति-भाँति के षड़यन्त्रों से वे तुलसी बाबा को दुखी किये रहते। गोस्वामी जी त्रस्त होकर महादेव से प्रार्थना करने लगे — "हे महादेव जी! मैं आपकी पुरी में रहकर श्रीगंगा जी का सेवन करता हूँ। राम-नाम पर माँग पर पेट भरता हूँ। न किसी से कुछ लेता हूँ और न ही किसी को कुछ देने योग्य हूँ। यदि किसी की भलाई न हो सके तो किसी की बुराई भी नहीं करता। यदि कोई मुझसे दुर्व्यवहार करता है तो उसका बल-प्रयोग मैं आपसी दीन होकर कह देता हूँ। दिन में मुझे ठगों के धक्के खाने पड़ते हैं और रात्रि चोर सताते हैं। अतएव हे शंकर जी! अपनी कृपा दृष्टि की ओर से मेरी ओर देख कर अपनी काशीपुरी में इनसे मेरी रक्षा कीजिए —
"बासर ठासनि के ढका रजनी चहुँ दिसि चोर।
संकर निज पुर राखिये, चिताई सुलोचन कोर।"
गोस्वामी जी की प्रार्थना सुन भगवान शिव की प्रेरणा पा हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिये। तुलसी बाबा की दीनता देख गुरुदेव हनुमान जी ने उन्हें ऐसी विनय पत्रिका लिखने का सुझाव दिया जिसमें वे अपने मनोगत भावों एवं समस्याओं को लिखें, जिससे हनुमान जी उसे राम दरबार तक पहुँचा कर श्रीराम से हस्ताक्षर करवा कर उन्हें कलिकाल के प्रभाव और दुष्टों से मुक्ति दिला सकें।
हनुमान जी के आदेश पर गोस्वामी जी ने विनय पत्रिका लिखनी प्रारम्भ की। श्री गणेश, शिव-पार्वती, सूर्य, गंगा, सरस्वती, इत्यादि सभी देवताओं के साथ-साथ चारों भाईयों सहित श्रीराम और जगदजननी सीता को समर्पित सुन्दर पद रचे गये। श्रीराम के सम्मुख अपनी दासता और दीनता को गोस्वामी जी ने अत्यन्त मार्मिक एवं सुन्दर ढंग से रखा। विनय पत्रिका के पद इतने सुन्दर, करूण, मधुर और मर्मपूर्ण बने कि देखते ही बनता था। अभी विनय पत्रिका का रचना कार्य चल ही रहा था कि एक दिन गोस्वामी जी की भुजा में अत्यन्त तीव्र पीड़ा होने लगी। हाथ में लेखनी पकड़ना भी दूभर हो गया। बाबा जान नहीं पाये कि बिना किसी कारण ऐसा क्या हो गया कि उनकी भुजा में पीड़ा होने लगी। बाबा सदैव की तरह पुनः संकट मोचक हनुमान जी की शरण में थे —
'बाहु बिटप सुख विहंग थलु लगी कुपीर कुआगि।
राम कृपा जल सींचिए वेगि दीन हित लागि।।'
जैसे-जैसे भुजा की पीड़ा बढ़ती जा रही थी वैसे-वैसी कवि-हृदय से स्वतः छन्द फूटने लगे। 'हनुमान-बाहुक' की रचना होती चली गयी।
हनुमान जी की कृपा से बाबा की भुजा में पीड़ा कुछ कम हुई। बाबा सो रहे हैं। निद्रित अवस्था में ही भगवान शिव दर्शन देते हैं। तुलसी प्रणाम करते हैं। आशुतोष शिव बोले — "आपको यह पीड़ा मेरे पार्षद भैरव नाथ के प्रसाद स्वरूप प्राप्त हुयी है। उन्हें आपसे रूष्टता का कारण यह है कि आपने विनय पत्रिका में सभी देवी देवताओं की स्तुति की है परन्तु काशी में रहकर काशी के कोतवाल भैरव जी को आप भूल गये। तुलसी बाबा ने निवेदन किया — "परन्तु मैं तो उन्हें आपका ही स्वरूप मानता हूँ। इसीलिए ऐसी भूल हुयी।" महादेव हँसते हुये बोले — "चलो अच्छा ही हुआ। इस कारण 'हनुमान बाहुक' की रचना हो गयी। अब आप इस त्रुटि को सुधार कर भैरव जी की स्तुति में पद लिख कर उसे विनय पत्रिका में सम्मिलित कर लें।" "जैसी काशी पति की आज्ञा" बाबा ने प्रणाम करते हुए कहा।
(बाईस — विनय पत्रिका पूर्ण — राम हस्ताक्षर)
तभी निद्रा टूट गयी। बाबा चौंक कर उठे। स्वप्न स्मरण था सो तुरन्त उठकर भैरव रूपी शिव की स्तुति रचने लगे। पद पूर्ण होने पर उसे विनय-पत्रिका में सम्मिलित कर लिया।
विनय पत्रिका पूर्ण हो गयी है। तुलसी दास जी अपने अवचेतन में देख रहे हैं कि वे अपने हाथ में विनय पत्रिका के रूप में प्रार्थना का लम्बा कागज लिए रामजी के दरबार की ओर जा रहे हैं। मार्ग में उन्हें श्रीगणेश, माँ सरस्वती, सूर्य, शिव-पार्वती के साथ साथ गंगा, यमुना, काशी-चित्रकूट आदि पावन नदियों एवं स्थलों के भी दर्शन होते हैं। सबको प्रणाम करते हुये वे श्री राम दरबार तक जा पहुँचते हैं। राम दरबार की ड्योढ़ी पर श्री हनुमान जी खड़े हैं। श्रीराम जी के वाम भाग में जगजननी सीता जी सिंहासन पर विराजमान हैं। भैया भरत, शत्रुघ्न और लखन लाल जी प्रभु की सेवा में रमे हुये हैं। तुलसी बाबा हनुमान जी को अपनी विनय पत्रिका देते हुए उन्हें संकेत करके कहते हैं कि पहले भरत जी, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और माँ सीता को प्रणाम कर उनकी स्तुति करो। इनकी कृपा से ही आपकी प्रार्थना रूपी विनय पत्रिका प्रभु तक पहुँच सकती है।
तुलसी दास जी तीनों भाईयों की वन्दना करते हैं। माँ जगजननी को प्रणाम करते हैं। हनुमान जी प्रभु से निवेदन करते हैं और भरत जी का अनुमोदन देख लक्ष्मण जी तुलसीदास के हाथों से विनय पत्रिका ले कर प्रभु के सम्मुख आकर कहते हैं — "हे प्रभु! इस कलिकाल में भी आपके अकिंचन सेवक तुलसी ने आपके नाम के प्रति अपनी प्रीति और प्रतीति को जिस प्रकार निभाया है, वैसी निष्ठा अनन्य है। करूणा सिन्धु कृपया इस अकिंचन तुलसी पर कृपा करें।"
नेत्रों में प्रेमाश्रु भरे खड़े तुलसी के हाथ स्वतः जुड़ते चले गये। प्रभु अपनी चिर मुस्कान बिखेरते हुए बोले — "मुझे सब विदित है तुलसी दास जी! अब आप निश्चन्त रहें। कलियुग आपका कुछ नहीं विगाड़ सकेगा।' श्री लक्ष्मण जी ने लेखनी बढ़ा दी। प्रभु ने विनय पत्रिका पर सही के हस्ताक्षर कर दिये। तुलसी गदगद हो भगवान के चरणों में गिर जाते हैं —
मारुति मन, रूचिं भरत की लिखत लषन कही है।
कलिकालहु नाथ! नाम सों परतीति-प्रीति, एक किंकर की निबही है।
सकल सभा सुन लै उठी, जानि रीति रही है।
कृपा गरीब निवाज की, देखत गरीब को साहब बाँह गही है।
बिहँसि राम कह्यो 'सत्य है, सुधि में हूँ लही है।'
मुदित नाथ नावत, बनी तुलसी अनाथ की, परी रघुनाथ हाथ सही है।।
विनय पत्रिका पर प्रभु के हस्ताक्षर करते ही तुलसी बाबा अवचेतन अवस्था से चौंक कर उठ जाते हैं। प्रभु की अनन्त करूणा और कृपा से उनके मन-नयन भीग उठते हैं। कुछ समय पश्चात गोस्वामी जी योगेश्वर श्रीकृष्ण के दर्शनों का निश्चय कर वृन्दावन आ गये।
(वृन्दावन — नाभादास और पुजारी प्रसंग)
उस समय वृन्दावन में भारत के प्रसिद्ध संत स्वामी नारायण दास जो कि नाभा स्वामी के नाम से जाने जाते थे, भक्तमाल साहित्य की कथायें सुना रहे थे। नाभा स्वामी जी ने चारों युगों के भक्तों की कथा को 'भक्तमाला साहित्य' में अत्यन्त सुन्दर ढंग से लिखा था। वृन्दावन में वे उसी का प्रवचन कर रहे थे। उनकी कथा में राजस्थान के एक राजा रामरैन अपनी रानी सहित उपस्थित थे। नाभा दास जी के मुख से भक्त माल के अनेक प्रसंगों को सुन राजा-रानी द्रवित हो गये। जाते समय वे बहुत सी धनराशि स्वामी जी को अर्पित कर गये। निष्काम हृदय स्वामी जी ने उस राशि से ठाकुर जी के भण्डारे के आयोजन का निर्णय लिया। भण्डारे के आयोजन में सभी छोटे-बड़े सन्तों को आमन्त्रित किया गया था।
उस अवधि में गोस्वामी जी भी वृन्दावन में थे। किसी ने उनसे भण्डारे में चलने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया। कुछ समय पश्चात प्रभु प्रेरणा से सन्त दर्शन की इच्छा ले गोस्वामी जी भण्डारे में चल दिये।
बाबा जब भण्डारे में पहुँचे भोजन प्रसाद पाने के लिए पंक्ति बैठ चुकी थी। गोस्वामी जी पंक्ति के एक कोने में बैठ गये। एक व्यक्ति पत्तल दे गया, दूसरे ने आकर पूड़ी परोस दी। तीसरा व्यक्ति खीर लेकर आया तो उसने बाबा से पूछा कि उनके पास खीर के लिए पात्र (दोना) तो है नहीं, फिर वे खीर किसमें लेंगे? तुलसी बाबा इधर-उधर देखने लगे। पात्र तो दिखायी नहीं दिया परन्तु पास ही में एक सन्त की पनही (जूती) पड़ी थी, उसे उठाकर बाबा बोले — "भैया इसी में दे दो।" खीर बाँटने वाला व्यक्ति भौंचक्का रह गया। बोला "बाबा जूती में खीर लोगे? इस अपवित्र पात्र में?" तुलसी बोले —
"तुलसी जिनके मुखनते, धोखेहु निकसे राम।
तिनके पग की पानही, मेरे मन को चाम।।"
"भैया! संत चरण का आश्रय लेकर तो बड़े-बड़े पत्थर भी पावन हो जाते हैं। फिर यह पनही तो संत चरण से सम्पृक्त रही है यह अपवित्र कैसे हो सकती है? आप खीर इसी में परोस दें।" परन्तु खीर बाँटने वाले उस व्यक्ति ने उन्हें खीर नहीं दी। उसने स्वामी नाभा दास जी के पास जाकर सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। स्वामी जी चकित रह गये। "भावुकता की इस सीमा तक पहुँचा हुआ ऐसा भी कोई व्यक्ति है जो संत की पनही में भी प्रसाद ग्रहण करने को तत्पर है। श्रद्धा की ऐसी पराकाष्ठा?"
स्वामी जी खीर बाँटने वाले व्यक्ति को लेकर तुलसी बाबा के पास आये। गोस्वामी जी को पहचान कर नाभा दास जी उनके चरणों में झुक गये। गोस्वामी जी ने उन्हें रोकते हुये अपने हृदय से लगा लिया। उपस्थित संत तथा भक्त समुदाय को नाभा दास जी ने जब तुलसी बाबा का परिचय दिया तो सारा समाज आश्चर्यचकित रह गया। इतने बड़े संत और ऐसा निराभिमानी व्यवहार?
नाभा दास जी बोले — "भक्त माल साहित्य में मेरे द्वारा संकलित एक सौ आठ भक्तों की माला आज तुलसी नाम के सुमेरू पर पहुँच कर पूर्ण हुई। (108 मनकों में सबसे ऊपर का वह मनका जिस पर पहुँच कर माला पूर्ण होती है, सुमेरू कहलाता है) चारों युगों के इन एक सौ आठ भक्तों की माला में तुलसीदास सुमेरू के समान हैं। बोलिए संत शिरोमणि तुलसीदास की जय!" उपस्थित समुदाय के संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास की जय जयकार से गगन गूँज उठा। संतों और श्रद्धालुओं के आग्रह पर नाभादास जी ने रामचरित मानस तथा तुलसीदास से सम्बन्धित अनेक प्रसंग सुनाये।
(वृन्दावन — राम-कृष्ण अभेद और पुजारी प्रसंग)
वृन्दावन धाम में नाभादास सहित अनेक संतों का दर्शन पाने के पश्चात गोस्वामी जी योगेश्वर कृष्ण के अनेक मन्दिरों तथा लीला स्थलों का दर्शन करने का निश्चय कर घूमते हुए एक मन्दिर में पहुँचे। उस मन्दिर का पुजारी परशुराम नामक ब्राह्मण था। जब तुलसी बाबा ने श्रीकृष्ण विग्रह में भी अपने आराध्य राम को पहचान दण्डवत किया तो उस पुजारी ने बाबा को राम भक्त जान कर कहा — "आप तो श्रीराम के उपासक जान पड़ते हैं। और यह श्रीकृष्ण का मंदिर है। क्या आप जानते नहीं कि किसे नमन कर रहे हैं?"
तुलसी बाबा उसकी भेद बुद्धि को भाँप गये। बोले — "मेरे मन में तो कभी श्रीराम-कृष्ण में भेद नहीं रहा। यदि ऐसी कोई भेदवाली बात होती तो मैं वृन्दावन आता ही क्यों?" परन्तु पुजारी न माना। राम-कृष्ण में भेद के अपने हठ पर अड़ा रहा। बोला — "मैंने सुना है कि श्रीराम मात्र बारह कला के अवतार हैं जबकि श्रीकृष्ण सोलह कला परिपूर्ण अवतार हैं। फिर आप श्रीकृष्ण को ही क्यों नहीं पूजते?"
तुलसी बाबा बोले — "भैया आपने भगवान को बारह कला ही सही, कम से कम ईश्वर तो माना। मेरी आस्था को इससे ही दृढ़ता प्रदान हुयी। रहा प्रश्न दोनों में भेद का तो उसे मैं नहीं मानता, फिर भी मुझे प्रभु का मर्यादा पुरूषोत्तम रूप ही अधिक भाता है।" बाबा के समझाने पर भी पुजारी अपने कुतर्कों पर अड़ा रहा। तुलसी बाबा जान गये कि प्रभु कोई लीला दिखाने चाहते हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण विग्रह (मूर्ति) की ओर देखकर प्रभु से निवेदन किया — "प्रभु आप जानते ही हैं कि मेरे मन में ऐसा कोई दुर्भाव नहीं है। परन्तु आपके दोनों रूपों को एक सिद्ध करने के लिए मैं अब तभी आपके चरणों में शीश झुकाऊँगा जब आप अपने अनन्य स्वरूप श्रीराम रूप में दर्शन देंगे।"
'कहा कहीं छवि आज की भले बने हो नाथ।
तुलसी मरतक तब नवै जब धनुप बाण लो हाथ।।'
निर्मल चित्त, अभेद बुद्धि वाले भक्त की प्रार्थना को प्रभु अस्वीकार कैसे कर सकते थे। सो प्रभु तुरन्त ही —
'मुरली लकुटि दुराय के, धनुप बाण लिए हाथ।
अपने जन के कारणे, श्रीकृष्ण भये रघुनाथ।।'
श्रीकृष्ण के हाथों में मुरली के स्थान पर धनुष-बाण देख गोस्वामी जी भक्त का मान रखने वाले प्रभु के चरणों में गिर पड़े। प्रभु कृपा को पहचान बाबा पुजारी से बोले — "देख लीजिए। अब सिंहासन पर कौन विराजमान है आपके कृष्ण या मेरे राम? अब भी यदि उनकी अनन्यता में कोई भेद दिख रहा हो तो बताईये कि —
'कित मुरली कित चन्द्रिका, कित गोपिन को साथ।
तुलसी निज जन कारणे, श्रीकृष्ण भये रघुनाथ।।'
हतप्रभ पुजारी विस्फारित नेत्रों से कभी सिंहासन की ओर देखता तो कभी गोस्वामी जी को। अन्तः लज्जित होकर ग्लानि भरे स्वर में गोस्वामी जी से अपने अपराध और तुच्छ बुद्धि के लिये क्षमा माँगने लगा। सहृदय गोस्वामी जी बोले — "किसी भी व्यक्ति पर अज्ञान का प्रभाव पड़ना एक स्वाभाविक बात है परन्तु पुजारी होने के नाते आपकी इस भेद-बुद्धि का जन-साधारण पर अनुचित प्रभाव पड़ता है और अन्तः धर्म को ही हानि पहुँचती हैं उत्तम भक्त वही है जो — 'निज प्रभुमय देखिहिं जगत, का सन करिहिं विरोध।'" लज्जित पुजारी बाबा की महानता के प्रति नतमस्तक हो उठा।
(काशी वापसी और महामारी)
तुलसी बाबा काशी लौट आये। कुछ समय पश्चात काशी में पहले अकाल फिर भयंकर महामारी फैली। चारों ओर लोग भागते, कूदते और हाय-हाय कर मर जाते। हजारों व्यक्ति अकाल ही काल कवलित हो गये। काशी पति महादेव की नगरी की दुर्दशा गोस्वामी जी से देखी नहीं गयी। अपने अखाड़ों के सभी युवकों को बाबा ने रोगियों की सेवा और नगर से बीमारी दूर रखने के लिये साफ-सफाई में लगा दिया। नीम की पत्तियाँ उबाल कर काढ़ा बना-बना कर रोगियों को पिलाना उनकी सेवा करना बाबाजी का दैनन्दिन कार्य हो गया।
महामारी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। बाबा ने काशीपति शिव से प्रार्थना की —
'अपनी बीसीं आपुही पुरिहि लगाए हाथ।
केहि विधि बिनती बिस्व की, करौं बिसव के नाथ।।'
बीसीं बिस्व नाथ की विषाद बडों बारानसी।
बूझिए न ऐसी गति संकर सहर की।।
कैसे कहे तुलसी वृषासुर के बरिदानि।
बानि जानि सुधा तजि पीविन जहर की।।
महादेव के चरणों में छन्दों के अनेक पुष्प चढ़ा गोस्वामी जी ने उनसे अपनी बीसीं (एक ग्रह दशा; रूद्र की बीसीं में संहार अधिक हुआ करता है) से काशी की रक्षा करने की प्रार्थना की। काशी नगरी की सभी दिशाओं में संकट मोचक हनुमान जी के मन्दिरों की स्थापना करवा कर त्राहिमाम करती दैहिक, मानसिक यन्त्रणाओं से घिरी प्रजा में पूजा पाठ द्वारा गोस्वामी जी ने आस्था की ज्योति को प्रज्ज्वलित रखा।
कुछ समय पश्चात राम-राम कर महामारी शान्त हो गयी। समय बीतता रहा। बाबा की आयु बढ़ती रही। बाबा काशी से वाराह क्षेत्र गये। वहाँ से जन्म भूमि राजापुर। रत्नावली को दिये वचन को निभाने का समय आ गया था। रत्नावली को दर्शन दे उनका अन्तिम समय सौभाग्यपूर्ण बना बाबा काशी लौट आये।
(अन्तिम काल — महाप्रयाण)
गोस्वामी तुलसी दास शय्या पर पड़े हैं। कई दिन से उनके शरीर में फुँसियाँ निकल आयी हैं। विश्राम कर रहे गोस्वामी जी के मानस पटल पर सम्पूर्ण जीवन वृत्त घूम जाता है। बाबा प्रभु की कृपा को स्मरण कर उठते हैं कि उनके दीन हीन जीवन को प्रभु ने किस प्रकार अपनी शरण में लेकर पतित से पावन कर दिया। सन्त हृदय को विपत्ति में भी प्रभु की कृपा दिखायी दे रही है। वे मान रहे हैं कि इन फुँसियों के रूप में उनके प्रभु का उनके स्वामी का नमक बह रहा है —
"आसन बसन हीन, विषम-विषाद-लीन,
देखि दीन दूबरौ, करैं न हाय-हाय को?
तुलसी अनाथ सों सनाथ रघुनाथ कियो,
दिया फल सील सिंधु अपने सुभाय को।।
नीच यहि बीच पति पाई भरूहाइगो,
बिहाय प्रभु भजन वचन मन काय को।
ताते तनु पेखियत घोर बरतोर मिस,
फूटि फूटि निकसत है लोन राम राय को।।"
आज श्रावण तीज का दिन है। बाबा का स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है। अनेक सेवक सन्त उन्हें घेरे खड़े हुये हैं। बाबा राम मिलन के क्षण को पहचान रहे हैं। बाबा जान गये कि उनके स्वामी, उनके प्रभु को उनकी आवश्यकता है। बाबा के महाप्राण का क्षण पहचान कर शिष्यों ने धरती को गाय के गोबर से लीप दिया है।
बाबा का कंठ अवरूद्ध होने लगा है। शरीर में बल नहीं रहा। स्वर टूट रहा है। बाबा बोले —
"राम नाम जस बरनि के, मयो चहत अब मीन।
तुलसी के मुख दीजिये, अबहीं तुलसी सोन।।"
बाबा की इच्छा पहचान उन्हें धरती पर लिटा दिया गया। तुलसीदल, सोना और गंगाजल उनके कंठ में डाला गया। बाबा के निस्तेज हो रहे नेत्रों में श्री रामदरबार में विराजमान श्रीराम, माँ सीता, अनुज भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न सहित हनुमान जी के चित्र उभर आये।
शून्य में टिकी दृष्टि में उभरे राम दरबार को प्रणाम करने के लिये बाबा के हाथ स्वतः जुड़ते चले गये। श्वांस गति का क्रम बिगड़ने से छाती फूल-पिचक रही है। जीवन के प्रति अब कोई आशा नहीं दीखती। टूटती श्वांसों ने अन्तिम बार सम्पूर्ण साहस बटोर कर 'राम' कहा। इसी के साथ एक अज्ञात से उद्गम से निकली एक लघु सरिता रामभक्ति और कृपा पाकर पावन होते-होते गंगा बन अतल महासागर में विलीन हो गयी।
प्रकृति ने भी मानो उन्हें अन्तिम प्रणाम करने के लिए ही मेघाच्छादित गगन में तीव्र चमक बिखेरती ऐसी दामिनी उत्पन्न की कि उसकी कौंध भीतर कमरे तक आ पहुँची। बाहर तेजी से मेघ बरस रहे थे और भीतर सबके नेत्र.........
।। इति ।।
काण्ड-सूची
मंगलाचरण (बालकाण्ड, प्रथम श्लोक)
भजन-1 — दर तेरे आवों गुण गावों
भजन-2 — करे सबदी जो परवा, मेरा बाबा बेपरवाह
भजन-3 — सीताराम, सीताराम, सीताराम
भजन-4 — जादूगर श्याम मेरा दिल लुट ले गया
भजन-5 — बाबा तुलसी के गुण गावे सारी दुनिया
भजन-6 — प्रभु बंधे हुये खिंचे हुए चले आयेंगे
भजन-7 — लिखन वालेया तू होके दयाल लिख दे
भजन-8 — जहाँ ले चलोगे वहीं मैं चलूँगा
भजन-9 — माँ अंजनी के लाल थोड़ा ध्यान दीजिए
भजन-10 — मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है
भजन-11 (मंगल गीत) — मैली चादर ओढ़ के कैसे
भजन-12 — सतगुरू दीन दयाल तों, वारी जा बलिहारी जा
भजन-13 — मेरी लगी श्याम संग प्रीत, दुनिया क्या जाने
भजन-14 — मेरा छोटा सा संसार हरि आ जाओ एक बार
भजन-15 — बाबा जी मैं तेरी पतंग
भजन-16 — पायो जी मैंने राम रतन धन पायो
भजन-17 — तेरेयीं चरणां विच मेरी अरदास दाता
भजन-18 — राम नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली-गली
भजन-19 — यह दुनिया मुसाफिर खाना
भजन-20 — आये तेरे द्वार नमस्कार-नमस्कार
भजन-21 — आओ तुम्हें भगवान का दरबार दिखायें
भजन-22 — पिला दे ओ साकी, हरि नाम की मस्ती
भजन-23 — रामा रामा रामा मेरे प्यारे रामा
भजन-24 — आसरा इस जहाँ का मिले न मिले
ये भजन नमन ग्रन्थ का भाग नहीं हैं — शताब्दियों पुरानी लोक/भक्ति परम्परा से लिये गये हैं, अतः पृथक चिह्नित हैं।
रघुपति राघव राजा राम
अन्य शीर्षक (पाठ शीघ्र जोड़ा जायेगा)
पूजन के अन्त में इष्टदेव की प्रसन्नता हेतु आरती की जाती है। नमन ग्रन्थ के अनुसार पाँच महामन्त्र हैं — ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, गायत्री मन्त्र, हरे राम-हरे कृष्ण महामन्त्र, महामृत्युंजय मन्त्र, तथा ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे।
आरती श्री गणेश जी
आरती श्री शिवजी
आरती श्री जगदम्बे जी
आरती श्री कृष्ण जी (कुंज बिहारी की)
आरती श्री हनुमान जी
आरती बालकृष्ण की कीजै
आरती श्री जगदीश जी
राम जी की आरती
सर्व देव आरती (20 छन्द)
आरती श्री रामायण जी की
भागवत भगवान की आरती
धार्मिक परम्पराओं के अनुसार कार्तिक मास को वर्ष का सबसे पुण्यमय मास माना जाता है। इस मास में की गई प्रत्येक पूजा, अर्चना का अक्षय फल मिलता है।
आरती-1 (कार्तिक प्रभाती)
आरती-2
आरती-3 (तुलसी स्तुति)
आरती-4
आरती-5 (प्रभाती)
आरती-6
आरती-7
आरती-8 (आरती श्री रामचन्द्र जी की — 15 छन्द)
गोविन्द मेरी यह प्रार्थना है
आरती — बाबा जी की
करां मैं आरती सत गुरू दी
छन्द–1
छन्द–2
छन्द–3
छन्द–4
छन्द–5
छन्द–6
छन्द–7
छन्द–8
छन्द–9
छन्द–10
छन्द–11
छन्द–12
छन्द–13
छन्द–14
छन्द–15
छन्द–16
पद–1
पद–2
पद–3
पद–4
पद–5
पद–6
पद–7
प्रभु प्राण बनकर आना
श्री हनुमान चालीसा
श्री बजरंग बाण
श्री राम रक्षा स्तोत्र
श्री संकट मोचन हनुमानाष्टक
श्री हनुमान बाहुक
ब्रह्म मुहूर्त में जागरण — सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घंटे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र में निषिद्ध है।
करावलोकन — आँखों के खुलते ही दोनों हाथों की हथेलियों को देखते हुये निम्नलिखित श्लोक का पाठ करें —
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते कर दर्शनम्।।
भूमि वन्दना — शैय्या से उठकर पृथ्वी पर पैर रखने के पूर्व पृथ्वी माता का अभिवादन करें —
समुद्र वसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व में।।
मानसिक शुद्धि का मन्त्र —
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाकां स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।
श्रीगोविन्ददामोदर स्तोत्रम् (10 श्लोक)
गुरू वन्दना
गणेश वन्दना
महामृत्युंजय मन्त्र
मन्त्र वन्दना एवं स्नान मन्त्र
क्षमा प्रार्थना
श्रीराम स्तुति (श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन)
श्री कृष्ण जी की स्तुति (शयन आरती)
गुरु वन्दना
श्री संकट मोचन हनुमत् वन्दना
हनुमान स्तुति
श्री गणेश-स्तुति
श्री रामायण मन्दिर, माधवबाड़ी, बरेली
पता: माधवबाड़ी, बरेली, उत्तर प्रदेश (द्वितीय द्वार: पंजाबी कालोनी)
वार्षिक उत्सव: 15-दिवसीय तुलसी जयन्ती महोत्सव
फोन/ईमेल विवरण शीघ्र जोड़ा जायेगा
श्री रामायण मन्दिर, विकासनगर, उत्तराखण्ड
पता, संपर्क सूत्र एवं न्यासी विवरण शीघ्र जोड़ा जायेगा
श्री रामायण मन्दिर, विकासनगर
UPI ID: 9411139188.eazypay@icici
BHIM / किसी भी UPI ऐप से स्कैन कर दान करें
श्री रामायण मन्दिर, बरेली
दान हेतु QR कोड शीघ्र उपलब्ध होगा