जीवन परिचय
बृजलाल गोस्वामी स्वामी रामतीर्थ के भतीजे, शिष्य, सेवक और निकट साथी थे। इन चार संबंधों में उनका पूरा जीवन समाया हुआ था। वे परिवार से रामतीर्थ के अपने थे, साधना में उनके विद्यार्थी थे, दिनचर्या में उनकी सेवा करते थे और यात्राओं तथा घरेलू जीवन के अनेक प्रसंगों के साक्षी थे।
उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में बृजलाल लाहौर में रामतीर्थ के साथ रहे। यह वह समय था जब तीर्थ राम गणित के अध्यापक, गृहस्थ और तेजी से बदलते आध्यात्मिक साधक के रूप में जीवन जी रहे थे। बृजलाल ने उनके व्यक्तित्व को दूर से नहीं देखा; वे घर, पत्रों, आगन्तुकों, शिक्षण और भीतर चल रहे परिवर्तन के बहुत निकट थे।
रामतीर्थ के भाई का पुत्र होने के कारण बृजलाल का संबंध रक्त और साधना दोनों से था। यही निकटता उन्हें दूसरे भक्तों से अलग बनाती है। वे गुरु के सार्वजनिक व्यक्तित्व के साथ-साथ उस मनुष्य को भी जानते थे जो परिवार, आर्थिक कठिनाइयों, अध्यापन और वैराग्य के बीच अपना मार्ग बना रहा था।
बृजलाल ने आगे जम्मू-कश्मीर रियासत की प्रशासनिक सेवा में काम किया और तहसीलदार बने। इस जिम्मेदारी से उनका शिक्षित और व्यावहारिक व्यक्तित्व सामने आता है। प्रशासनिक जीवन के साथ उन्होंने अपने गुरु और चाचा की स्मृतियों को भी सँभाले रखा।
लाहौर के उस बौद्धिक वातावरण में धर्म, कविता, आधुनिक शिक्षा और वेदान्त पर गंभीर बातचीत होती थी। रामतीर्थ और अल्लामा इकबाल के संपर्क की स्मृतियों के आसपास भी बृजलाल का नाम आता है। वे परिवार की निजी दुनिया और सार्वजनिक बौद्धिक इतिहास के बीच एक जीवंत पुल बन गए।
बाद में उन्होंने उर्दू में स्वामी रामतीर्थ का जीवन लिखा। उनकी लेखनी की शक्ति प्रत्यक्ष निकटता से आई थी। उन्होंने अपने गुरु को केवल महिमामंडित संत की तरह नहीं, बल्कि जीवित अनुभवों, संबंधों और संघर्षों के बीच देखा। इसीलिए गुरु परम्परा में बृजलाल स्मृति-रक्षक, जीवनीकार और प्रथम पंक्ति के साक्षी के रूप में विशेष स्थान रखते हैं।