संस्थापक, श्री रामायण मन्दिर, बरेली
जीवन परिचय
गोस्वामी रामेश्वर दास जी महाराज की कहानी विस्थापन से निर्माण तक की कहानी है। वे गोस्वामी मूलराज जी महाराज के पुत्र थे और 1947 के विभाजन के बाद पिता के साथ मर्दान से बरेली आए। पीछे छूटा संसार केवल घर और संपत्ति का नहीं था; उसमें पड़ोस, मंदिर, उत्सव और पीढ़ियों की धार्मिक पहचान भी थी।
नए शहर में जीविका बसाना आवश्यक था, लेकिन रामेश्वर दास जी महाराज ने समुदाय के लिए एक साझा आध्यात्मिक घर बनाना भी अपना दायित्व माना। माधोबाड़ी में धार्मिक केंद्र की कल्पना धीरे-धीरे आकार लेने लगी।
27 मई 1964 को उन्होंने मंदिर की नींव रखी। उन्होंने अपनी पूँजी लगाई और निर्माण का नेतृत्व किया। यह किसी स्थापित संस्था को संभालने का काम नहीं था; विस्थापित समाज के बीच लगभग शून्य से नई जगह खड़ी करने का संकल्प था।
निर्माण के वर्षों में मंदिर ईंट-पत्थर से अधिक बन रहा था। मर्दान से आए परिवारों के लिए वह पुराने जीवन को नए भूगोल में पहचानने का स्थान था। बच्चे वहाँ अपनी परम्परा के नाम सुन सकते थे और बुजुर्ग बिखरी हुई स्मृतियों को एक साझा केंद्र में फिर से जीवित देख सकते थे।
1969 में विग्रहों की स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा ने इस प्रयास को पूर्ण रूप दिया। विश्व शांति यज्ञ और सामुदायिक आयोजन के साथ नया मंदिर सार्वजनिक धार्मिक जीवन में प्रवेश कर गया। पाँच वर्ष पहले रखी गई नींव अब पूजा, उत्सव और संगति का जीवंत केंद्र बन चुकी थी।
रामेश्वर दास जी महाराज ने संस्थापक और निर्माणकर्ता की भूमिका निभाई, जबकि आध्यात्मिक गद्दी के लिए समुदाय ने हरिद्वार से उनके चचेरे भाई गोस्वामी तोताराम जी महाराज को आमंत्रित किया। एक ने समुदाय के लिए घर बनाया और दूसरे ने उस घर को गुरु परम्परा की दिशा दी।
रामेश्वर दास जी महाराज के पुत्र गोस्वामी देवेंद्र जी महाराज आगे गुरु गद्दी पर विराजमान हुए। फिर भी रामेश्वर दास जी महाराज की सबसे बड़ी पहचान उस संस्थापक की रही जिसने विस्थापन को स्थायी निराशा नहीं बनने दिया और समुदाय की स्मृति को भविष्य के लिए एक स्थायी स्थान दिया।