नमन के इतिहास-अंश के अनुसार, गढ़ी कपूरा (अब पाकिस्तान) स्थित पीपल वृक्ष के नीचे अलमस्त फकीर रूप में भजन करते थे। एक बार जब क्षेत्र में पलायन होने लगा और मुरीदों ने बाबा को साथ चलने का आग्रह कर पश्तो में "बाबा चूड्ड़ा" कहा, तो बाबा ने जिस दीवार पर बैठे थे उसी को घोड़े की भाँति ऐड़ लगाई और वह दीवार दौड़ पड़ी — यह देख पलायन रुक गया। कई भजन-छन्दों (छन्द 5, 6, 7, 9, 13) में भी बाबा सफाचन्द जी का बारम्बार स्मरण किया गया है। (स्पष्टीकरण: बजरंग बाण के मूल रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ही हैं — बाबा सफाचन्द जी का इस पाठ से केवल भक्ति-परम्परा में गहरा जुड़ाव रहा है, रचना का श्रेय नहीं।)