जन्म का चुनाव — भाग 2
इन दोनों पहलुओं में वेदांत समन्वय स्थापित करता है और स्पष्ट करता है कि जब मनुष्य की मृत्यु होती है तो मृत्यु के समय उसकी अपूर्ण इच्छाएं समाप्त नहीं हो जाती हैं । जब अनजान बालक का जन्म होता है तो उसकी विभिन्न अघोषित इच्छाएं भी होती हैं । ये इच्छाएं, 'शून्य' से नहीं आ सकती हैं । क्या यह संभव नहीं हो सकता है कि जो आदमी कब्र में दफना दिया गया है, उसकी इच्छाएं नए शिशु के रूप में पुनः न प्रकट हों, जिसका जन्म घर में हुआ है ? यदि आप यह मान लेते तो आप उस भयंकर भूल का सामना करने से बच जाते हैं, जिसे आपने पहले यह कहकर स्वीकार किया था, कि कुछ 'शून्य' में खो गया है और वही कुछ अब 'शून्य' से पुनः प्रकट हुआ है । आप इस यक्ष-प्रश्न का समाधान हिंदुओं द्वारा मान्य कर्म के विधान को स्वीकार करने से कर सकते हैं और फिर जन्म और मृत्यु का संपूर्ण परिदृश्य अत्यंत स्वाभाविक हो जाएगा, प्रकृति के साथ उसका पूरा ताल-मेल बैठ जाएगा और वह ब्रह्मांड में सामंजस्य तथा समन्वय के मान्य सिद्धांतों के अनुरूप होगा । आप यह भी देखेंगे कि तर्कशास्त्र के एक अन्य सिद्धांत, जिसे दार्शनिक 'अपव्यय-अवरोधक' नियम कहते हैं, के अनुसार भी 'कर्म के विधान' की पुष्टि होती है । जब हम किसी परिदृश्य को प्राकृतिक और सामान्य नियमों के अनुसार सिद्ध करते हैं, तो फिर उसे सिद्ध करने के लिए हम क्योंकर अप्राकृतिक और परिकल्पनीय नियमों का सहारा लें और उन्हें येन-केन प्रकारेण, खींच-तान तरीके से सत्य घोषित करें । 'कर्म का विधान' आपको सर्वाधिक प्राकृतिक व्याख्या प्रदान करता है, जो अत्यंत सीधा-सादा और वैज्ञानिक है । इस प्राकृतिक विधि को छोड़कर आपको किसी अन्य अनर्गल तथा निरर्थक सिद्धांत का प्रश्रय नहीं लेना चाहिए ।
यहां एक अन्य प्रश्न उपस्थित होता है । वैज्ञानिक कहते हैं—''नहीं, नहीं, यह उचित नहीं है । हम 'कर्म के विधान' के अनुसार नवजात शिशुओं की विभिन्न प्रवृत्तियों और क्षमताओं की व्याख्या नहीं कर सकते हैं, हमें कर्म के विधान का सहारा नहीं लेना चाहिए । इस पूरे परिदृश्य को हम 'वंश परम्परा के सिद्धांत' द्वारा समझ सकते हैं । यह सिद्धांत सभी शंकाओं का समाधान कर देता है और स्थिति सुस्पष्ट हो जाती है । लेकिन वेदांत कहता है कि 'कर्म का विधान' तो वंश-पम्परा के सिद्धांत का विरोध नहीं करता है, बल्कि वह तो 'वंश-परम्परा' के सिद्धांत की और अधिक विस्तृत व्याख्या करता है, साथ यह भी स्पष्ट करता है कि मृत्यु के समय मानसिक ऊर्जा की प्रत्यक्ष क्षति का क्या होता है ? इसकी व्याख्या 'वंश परंपरा' का सिद्धांत नहीं करता है ।
इसलिए 'कर्म का विधान' यह विधान है जिस ओर सभी वैज्ञानिकों और दार्शनिकों को 'वंश-परंपरा' के सिद्धांत की तुलना में अधिक ध्यान देने की अपेक्षा की जाती है । 'कर्म का विधान' किस प्रकार 'वंश परम्परा' के सिद्धांत की व्याख्या करता है ? जब किसी मनुष्य की मृत्यु होती है, तब उसकी सभी इच्छाएं प्रत्यक्ष रूप से समाप्त हो जाती हैं, उनका अंत हो जाता है । परंतु वेदांत का दावा है कि ये इच्छाएं विलीन नहीं होती हैं । उदाहरणार्थ जब कोई मोमबत्ती जलती है तो प्रत्यक्षतः हम उसकी हानि देखते हैं, पर वस्तुस्थिति भिन्न हैं, जैसा कि रासायनिक सजातीयता या सादृश्यता का सिद्धांत हमें बताता है, इस सिद्धांत के अनुसार, 'कार्बन' का मिश्रण 'ऑक्सीजन' से होता है और 'हाइड्रोजन' भी 'ऑक्सीजन' से मिल जाती है । इसी प्रकार मृत्युपर्यन्त मानव की इच्छाएं, उसकी मानसिक ऊर्जा या उसका सूक्ष्म शरीर इसी सजातीयता या सादृश्यता अथवा आध्यात्मिक सादृश्यता के सिद्धांत के अनुरूप या जिसे हम भौतिक सजातीयता भी कह सकते हैं, उस सिद्धांत के अनुसार ये सभी इच्छाएं और मानसिक ऊर्जा आदि आपस में मिलते हैं, एकाकार होते हैं और उस मानसिक ऊर्जा का आकर्षण उसे उस उपजाऊ स्थल तक ले जाता है, जहां का वातावरण, परिस्थितियां उन इच्छाओं और ऊर्जा के प्रतिफलित होने के लिए सहायक सिद्ध हो सकती हैं, उनका पल्लवन किया जा सकता है और उन्हें विकसित रूप में साकार किया जा सकता है । इस प्रकार आप देखेंगे कि मृतक व्यक्ति की संपूर्ण इच्छाओं और ऊर्जाओं के मिश्रण या योग-फल को उस उपजाऊ भूमि तक ले जाया जाता है, जहां उसकी सभी अप्रयुक्त ऊर्जाएं और अपूर्ण अभिलाषाएं पुष्पित और पल्लित हों और उसका सम्वर्द्धन सुनिश्चित कर उनको साकार किया जा सके । तब क्या प्रत्येक मनुष्य अपने माता-पिता को चुनता है ? हम देखते हैं कि जब मनुष्य जीवित रहता है, तो उसमें भरपूर इच्छाएं होती हैं । इनमें से अधिकांश उसके जीवन-काल में ही पूरी हो जाती हैं, लेकिन कुछ अभिलाषाएं अपूर्ण बनी रहती हैं । इन सभी अपूर्ण इच्छाओं का क्या होगा ? क्या उन सबकी उपेक्षा कर दी जाएगी या वे समाप्त हो जाएगी ? नहीं, नहीं । जब किसी बाग में कोई कली दिखती है, तो उसमें यह भावना सन्निहित होती है कि यह पुष्पित और पल्लवित होगी । कली की यह भावना या उसका यह संकल्प कार्यान्वित होता है और पूर्ण भी ।
हम देखते हैं कि चीटियों तथा अन्य निम्न स्तरीय प्राणियों की इच्छाएं भी पूरी होती हैं । तो फिर मनुष्य की अभिलाषाओं पर तुषाराघात क्यों हो ? वे क्योंकर अपूर्ण रहें ? क्योंकर मनुष्य, प्रकृति या विधाता के उपहास का कारण बने ? क्यों विधाता उस पर हंसे ? क्यों मनुष्य का मजाक उड़ाया जाए ? हमारी अधिकांश अभिलाषाएं हमारे अपने जीवन-काल में ही फलीभूत हो जाती हैं । इस प्रकार हम देखते हैं कि ये अभिलाषाएं ही हैं जो अन्ततः कार्य का रूप लेती हैं और ये ही कार्य करने की प्रेरणा-शक्ति बनती हैं । फिर भी अनेक इच्छाएं अपूर्ण बनी रहती हैं । तब इनका क्या होता है ? वेदांत कहता है—''ओ मानव ! ईश्वर आपका उपहास नहीं करेगा । आपकी सभी अपूर्ण अभिलाषाएं और अलृप्त ऊर्जाएं फलीभूत अवश्य होंगी । यदि इस संसार में न हों तो अगले में सही ।''
यहां एक प्रश्न चिह्न यह है कि यदि हमारा अस्तित्व पूर्व जन्म में रहा है और मृत्यु के बाद हमारा पुनर्जन्म हुआ है, तो यह कैसे है कि हमें अपने पूर्वजन्मों का कोई स्मरण ही नहीं है, हम उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं ? वेदांत पूछता है कि ''स्मरण क्या है ? स्मृति क्या है ?'' उदाहरणार्थ राम यहां आपसे अपनी मातृभाषा में नहीं, वरन् वह जो यहां की अंग्रेजी भाषा है, उसमें बातचीत कर रहा है । जब राम आपसे अंग्रेजी भाषा में वार्तालाप करता है, तो उसके मस्तिष्क में अपनी मातृभाषा का कोई शब्द नहीं आता है । तो फिर क्या उसकी वह भारतीय मातृभाषा विलुप्त हो गयी है ? नहीं, नहीं । वह जब विद्यमान अन्य हिंदुस्तानी भाषाओं में बात करना चाहेगा तो ये भाषाएं तुरंत ही राम को याद आ जाएगी और वह उसमें बात करने लगेगा । तब स्मृति क्या है ? यह तो हमारे मन की एक अदृश्य झील है, जहां उसकी तलहटी या पेंदी में राम के लिए व्यक्तिगत रूप से भारतीय भाषाएं, जैसे हिंदी उर्दू, संस्कृत विद्यमान रहती हैं । जब भी हम इस झील में कंपन पैदा करेंगे या उसके जल को हिला-डुला देंगे, तो क्षण-मात्र में ये सभी भाषाएं या अन्य जानकारियां झील की ऊपरी सतह पर आ जाएंगी । इसको स्मरण करना कहते हैं । यही स्मृति है । आपकी बहुत सारी जानकारियां होती हैं, लेकिन आप सभी के बारे में सचेत नहीं होते हैं । पर आप जब चाहें अपनी मानसिकता की झील में कंपन करके और उसके जल को इधर-उधर डुलाकर तत्क्षण अपनी अपेक्षित जानकारी के प्रति सचेत हो जाते हैं और ज्ञानवान बन जाते हैं । इस प्रकार ये सारी बातें आपको स्मरण हो जाती हैं, और उभर कर सामने आ जाती हैं ।
इसी परिप्रेक्ष्य में वेदांत का मत है कि आपके सभी जन्म तथा पूर्वजीवन आपकी चेतनता की आंतरिक झील में या ज्ञान की आंतरिक झील में उपस्थित रहते हैं । वे वहां मौजूद हैं, लेकिन इस समय वे झील की तलहटी या पैंदी में स्थित हैं, वे झील के सतह पर नहीं हैं । यदि आप अपने पूर्वजन्मों का स्मरण करना चाहें तो यह कोई दुरूह कार्य नहीं है । आपको अपने ज्ञान की आंतरिक झील के तलहटी के पानी को हिलाना-डुलाना भर है, फिर वे सब चीजें पानी की सतह पर उभरकर सामने आ जाएंगी, जिन्हें आप चाहते हैं । यदि आपकी इच्छा हो तो आपको अपने पूर्वजन्मों का स्मरण हो सकता है । लेकिन वास्तविकता यह है कि ऐसा प्रयोग अवांछनीय है, अनावश्यक है, क्योंकि एक अन्य विधान के अनुसार, जिसे विकास का विधान कहते हैं, आपको तो आगे बढ़ना है और आगे बढ़ते ही जाना है । इसलिए जो भूत हो गया, उसे भूत रहने दें, जो गया, उसे जाने दें । आपको इससे क्या लेना-देना है । आपको तो उन्नति करते रहना है, विकास-पथ पर अग्रसर होते जाना है ।
'कर्म का विधान' कहता है कि इस संसार में आप अनेकानेक चीजों को देखते हैं, कुछ चीजों में आपकी अत्यधिक रुचि है, कुछ चीजों को आप सर्वाधिक पसंद करते हैं और उनके प्रति आप अत्यंत आकर्षित होते हैं । इस परिवेश के बारे में वेदांत स्पष्ट करता है कि आप इसलिए इन सभी चीजों को पसंद करते हैं, उनमें आपकी रुचि होती है, उन्हें आप प्यार करते हैं, उनका ज्ञान भी आपको होता है, क्योंकि आप पूर्वजन्मों में कभी न कभी ये सब चीजें रहे हैं । आप चट्टान भी थे, आप चट्टानों में सुप्तावस्था में पड़े भी रहे, आप नदियों के प्रवाह में धीरे-धीरे प्रवाहित भी होते रहे, आप पेड़-पौधों के रूप में उगते रहे, आप जानवरों की भांति अपने साथी जानवरों के साथ इधर-उधर भागते भी रहे । आप इन सब परिस्थितियों से परिचित हैं और इन सबको आपने देखा भी है । इस दृश्य को हम एक अन्य तर्क से सिद्ध कर सकते हैं ।
यह तर्क सुकरात या मुख्यतः प्लेटो (अफलातून) के विचारों से लिया गया है । यह स्मरण या स्मृति क्या है ? इस स्मृति में पहले से किसी ज्ञान की उपलब्धि सन्निहित है, जिसका अब हम स्मरण करते हैं । उदाहरणार्थ, मानो दो व्यक्ति राम के इन व्याख्यानों को सुनने आते हैं, ये दोनों हमजोली हैं या मानो एक जान और दो शरीर हैं । इस हाल में दिए गए सात व्याख्यानों को सुनने के लिए दोनों साथ-साथ आते रहे, परंतु आठवें व्याख्यान के श्रवण के लिए केवल एक व्यक्ति ही आया, दूसरा नहीं । तब कुछ लोग स्वाभाविक रूप से अकेले आए साथी से यह पूछेंगे—''अरे ! वह आपका अभिन्न मित्र, आपका प्रियतम साथी आज कहां है ? वह कहां गया है ?''
इस प्रकार के प्रश्न क्यों पूछे जाते हैं ? ऐसे प्रश्न पूछने के पीछे स्मृति का सिद्धांत है जिसे 'समागम' या 'संपर्क का नियम' भी कहा जाता है । हमने देखा है कि ये दोनों व्यक्ति हमेशा साथ-साथ रहते हैं, दोनों हमसे भली-भांति परिचित हो गए हैं, मानो दोनों हमारे मन में बस गए हैं, दोनों को हमने एक दूसरे से निकटतम रूप से संबद्ध देखा है और जब बाद में हम उनमें से केवल एक ही व्यक्ति को देखते हैं तो हमें तुरंत ही दूसरे व्यक्ति का स्मरण हो आता है । इस विधा से मस्तिष्क में सम्बद्धता और सम्पर्क स्थापित होता है और स्मरण का प्रादुर्भाव । इस स्मृति, इस स्मरण में उस वस्तु का पूर्व ज्ञान सन्निहित है जिसकी हम याद करते हैं ।
अब हम आपका ध्यान एक अन्य तार्किक विधा की ओर आकर्षित करना चाहते हैं । तार्किक पद यों हैं—सभी मनुष्य मरणशील हैं, 'जॉन' एक मनुष्य है, इसलिए 'जॉन' मरणशील है । तत्संबंधी आपका तर्क, आपकी युक्तियां, आपकी न्यायपरक उक्तियां आपके दो पदों पर निर्भर हैं—1. सभी मनुष्य मरणशील हैं और 2. 'जॉन' एक मनुष्य है । आप केवल उक्त दो पदों को बोलिए और निष्कर्ष को रोके रखिए । फिर तो आपके मस्तिष्क में स्मृति के कारण यह निष्कर्ष कौंध जाएगा कि 'जॉन' मरणशील है । यह निष्कर्ष आपके दिमाग में किस प्रकार आया ? क्या प्लेटो द्वारा प्रतिपादित 'स्मृति' के नियम के अनुसार आपने इस निष्कर्ष को निकाला है ? हां, ऐसा ही है । तीन पद आपके सामने हैं—सभी मनुष्य मरणशील हैं, 'जॉन' एक मनुष्य हैं और 'जॉन' मरणशील हैं । इनमें से पहले के दो पद आपके सामने रख दिए जाते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील है और 'जॉन' एक मनुष्य है । ये दोनों पद आपके सम्मुख हैं और फिर यकायक 'विचार के सिद्धांत' के अनुसार, जैसा दार्शनिक लोग कहते हैं, तीसरा पद, जो निष्कर्ष-दिग्दर्शक है, आपके मस्तिष्क में आ जाता है । यह निष्कर्ष हर एक के और सभी के मस्तिष्क में आएगा । यह सब कैसे होता है ? इसको इस प्रकार समझा जा सकता है कि जब हमने देखा कि दो मित्र यहां नियम पूर्वक प्रतिदिन आया करते थे, पर आज उन दो अभिन्न मित्रों में से एक नहीं आया तो मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसा क्यों हुआ ? यह 'स्मृति' किस प्रकार आती है और किस प्रकार हर एक के मस्तिष्क में 'विचार का नियम' विद्यमान रहता है ? यह 'विचार का नियम' किस प्रकार का है जिसके कारण हर तरफ का स्मरण हो आता है । तथ्य यह है कि 'स्मृति' में पूर्व ज्ञान सन्निहित है । प्रत्येक बालक से, जिसमें तर्क करने की क्षमता है, हम वाद-विवाद कर सकते हैं । जब वह थोड़ा-सा विचार करने लगता है, तो हम उक्त प्रकार की नई तार्किक विधा से उसे परिचित करा सकते हैं और वह उसे स्वीकार भी करेगा ।
हम यहां 'यूकिलिड' की परिकल्पना को सिद्ध कर रहे हैं । रेखागणित के प्रश्न को हल करने के लिए हम बहुधा तुरंत ही निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं । यह निष्कर्ष केवल 'स्मृति' द्वारा ही निकाला जाता है । 'स्मृति' हर एक मनुष्य के मस्तिष्क में विद्यमान रहती है—इस तथ्य का निश्चयात्मक प्रमाण यह है कि आप जिन वस्तुओं और दृश्यों से पहले से ही परिचित हैं, जिनकी आपको जानकारी है, वे अब आपके मस्तिष्क में 'स्मृति' के माध्यम से पुनर्जीवित हो गईं है । जो चीजें आपके मस्तिष्क में 'स्मृति' द्वारा पुनर्जीवित की गई हैं, आपको उनसे पहले से ही परिचित होना चाहिए, यह सिद्ध करने के लिए आवश्यक है कि आपने कभी न कभी या पहले से या बाद में उन चीजों को सीखा होगा या उनसे आप परिचित हुए होंगे । लेकिन यदि आप इस बात के लिए आश्वस्त हैं कि उन चीजों को आपने अपने इस इस जीवन में नहीं सीखा है और न ही उनकी जानकारी प्राप्त की है, तब फिर आपने इनका ज्ञान कहां से प्राप्त किया, कि वे थी या नहीं थी ? वेदांत का स्पष्ट मत है कि यदि इस जीवन में नहीं तो पूर्वजन्म में आपको इन चीजों का ज्ञान हुआ था, तभी तो आपको उनकी 'स्मृति' है ।
यहां यह भी प्रश्न उठता है कि यदि हम अपने भाग्य के निर्माता हैं तो ऐसा क्यों होता है कि हम गरीब माता-पिता के यहां पैदा होते हैं, यद्यपि हममें से कोई भी निर्धन पैदा नहीं होना चाहता हैं ? हर एक व्यक्ति की संपन्न और धनवान घर में उत्पन्न होने की आकांक्षा रहती है, हममें से कोई भी गरीब के घर में नहीं पैदा होना चाहता है और फिर भी हम निर्धन माता-पिता के घर में पैदा होते हैं । ऐसी स्थिति अधिकांश लोगों की है । यह कैसे है ? वेदांत का उत्तर है कि आप कृपया समुचित परिप्रेक्ष्य में सभी मामलों की विवेचना करें । तथ्यों को आप सभी ओर से, पूरे परिवेश में परखें, उनका निरीक्षण करें । यह सही नहीं है कि हर व्यक्ति करोड़पति बनना चाहता है । जिस व्यक्ति की कमाई चार डॉलर प्रति सप्ताह है, उसकी स्वाभाविक महत्वाकांक्षा यही होती है कि उसकी आमदनी बढ़कर सात डॉलर प्रति सप्ताह हो जाए । उसके मन में लंदन का लॉर्ड मेयर बनने की इच्छा कभी नहीं होती है । क्या यह सही नहीं है ? इसका अनुमान आपको भली प्रकार है ?
इस विषय पर आप दूसरे दृष्टिकोण से विचार करें । लोगों की अधिकांश अभिलाषाएं और आकांक्षाएं असंगत, अनुचित और तर्क-विहीन होती हैं । वे इन इच्छाओं का अपनी वर्तमान परिस्थितियों से सही समायोजन नहीं कर पाते हैं । वे इन इच्छाओं के गुलाम बन जाते हैं । वे अपनी अभिलाषाओं के स्वामी नहीं हैं और अन्ततः इन सब परिस्थितियों और अभिलाषाओं के कारण संकटों और दुर्दशाओं में फंस जाते हैं और कष्ट तथा दारुण दुख सहने के लिए विवश हो जाते हैं ।
अब राम इस भाषण के एक रुचिकर पक्ष पर प्रकाश डालेगा । हो सकता है, सबको यह पसंद आए । एक व्यक्ति है जिसकी सबसे बलवती अभिलाषा यही है कि वह अपनी पशुवत् वासनाओं की किसी प्रकार पूर्ति करे । उसे ज्ञान से कोई लेना- देना नहीं है, वह किसी प्रकार आध्यात्मिकता से नहीं जुड़ना चाहता है, उसके लिए अध्यात्म बेकार है । उसे न तो नैतिकता से और न ही ऊंची ख्याति से और न ही यश से कोई मतलब है । ये सारी बातें उसके लिए निरर्थक हैं । उसका एकमात्र लक्ष्य अपनी पाशुविक वासनाओं को, भोग-विलास की भूख को पूरा करना है । इस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है । (यह एक काल्पनिक उदाहरण हैं, परंतु इससे स्थिति और स्पष्ट होगी) अब सोचिए, इस व्यक्ति को किस प्रकार माता-पिता के यहां जन्म लेने की अपेक्षा होगी ? उसकी इच्छा किसी विद्वान माता-पिता के घर पैदा होने की कभी नहीं होगी ? उसको इसकी जरूरत नहीं है । उसमें जो ऊर्जा है क्या उसके कारण उसे धनवान माता-पिता की भी जरूरत होगी ? जी नहीं । न ही वह किसी शिक्षित और न ही सभ्य माता-पिता को चाहेगा । वेदांत स्पष्ट करता है कि यदि यह मनुष्य पूर्णरूपेण पाशुविक प्रवृत्तियों से ही बना है तो उसे सर्वाधिक उचित और उपयुक्त शरीर ही प्राप्त होगा जो शूकर या कुत्ते का होगा । क्योंकि उसकी यही आकांक्षा रही है कि उसका शरीर ऐसा हो जो खाने-पीने से कभी थके नहीं, जो पशुवत् वासनायुक्त इच्छाओं की पूर्ति से कभी विरत न हो और जो अपने आपको बेवकूफ बनने में बुरा न माने । उसे ऐसी ही योनि चाहिए । इस उद्देश्य से कि उसकी तत्संबंधी इच्छाएं पूरी हों, उसका जन्म सुअर या कुत्ते के रूप में होना चाहिए । इस प्रकार सिद्ध है कि भले ही वह कुत्ता या सुअर हो, पर सच्चाई तो यही है कि उसने अपने भाग्य का अपने इच्छित प्रयोजन के लिए निर्माण किया । जब इस विश्व के लोग किसी वस्तु की आकांक्षा करते हैं तो यह नहीं सोचते हैं कि इसका क्या परिणाम होगा ?