श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

जन्म का चुनाव

अध्याय 5 / 5 · भाग 4 / 4 · मृत्यु के बाद
अध्याय 5 / 5 · भाग 4 / 4

जन्म का चुनाव — भाग 4

भारत में एक व्यक्ति की दो पत्नियां थीं आप कदाचित् जानते होंगे कि हिंदू लोग बहुपत्नीवाद में विश्वास नहीं करते हैं, लेकिन यह प्रथा मुसलमानों में प्रचलित है । यह आदमी मुसलमान था जिसकी दो बीवियां थीं । एक बीवी मकान की ऊपरी मंजिल में रहती थी और दूसरी नीचे की मंजिल में । यह आदमी धनी, समृद्ध तथा सम्पन्न था । इसलिए एक रात एक चोर ने इस अमीर आदमी के घर में चोरी करने का इरादा किया । फिर वह उस घर का सारा धन और सम्पत्ति चुराने के इरादे से उसके मकान में सेंध लगाकर घुस गया । लेकिन उस घर के लोग जग रहे थे, इसलिए चोर को चोरी करने का मौका नहीं मिल पा रहा था । वह मौके की तलाश में बैठा रहा । पर अब लगभग सवेरा होने वाला था पर चोर, चोरी नहीं कर सका । घर के लोगों ने चोर को देखा और उसे धर दबोचा । फिर उसे पकड़कर पुलिस-मजिस्ट्रेट के सामने उसे पेश किया गया । यद्यपि कोई चोरी तो नहीं हुई थी, फिर भी चोर ने घर में चोरी के इरादे से सेंध तो लगाई ही थी । ऐसा करना भी तो अपराध ही है ।

मजिस्ट्रेट ने इस चोर से कुछ सवाल किए और पूछताछ की । इस चोर ने तुरंत यह स्वीकार कर लिया कि उसने चोरी करने के इरादे से ही मालदार आदमी के घर में सेंध लगाई थी । अब इस अपराध के जुर्म में मजिस्ट्रेट उसे सजा सुनाने ही वाला था कि चोर जोर से बोल पड़ा—''हुजूर ! मजिस्ट्रेट साहब ! आप मुझे जो सजा देना चाहें, वह सजा दें, आप मुझे गंदे नाले में फिंकवा दें, आप मुझे कुत्तों के सामने डलवा दें, आप मेरे हाथ-पैर को जलवा दें, मुझे सब मंजूर है, पर मुझे एक सजा न दें ।'' यह सुनकर मजिस्ट्रेट अचंभे में पड़ गया और उसने पूछा—''वह कौन सी सजा है जो तुम भुगतना नहीं चाहते हो ?'' उस चोर ने जवाब दिया—''मुझे दो बीबियां रखने की सजा मत दीजिए । यह सजा मुझे कभी न दें ।'' मजिस्ट्रेट ने पूछा—''ऐसी क्या बात है ?'' तब उस चोर ने बताया कि वह किस प्रकार पकड़ा गया और किसी चीज की चोरी भी नहीं कर सका ।

उसने आगे बताया कि किस प्रकार घर के मालदार मालिक को घर के अंदर की सीढ़ियों पर रात भर खड़ा रहना पड़ा, क्योंकि एक बीवी उसे खींचकर ऊपर अपने कमरे की ओर खींच रही थी तो दूसरी बीवी नीचे के अपने कमरे में उसे ले जाने के लिए मशक्कत कर रही थी । इस खींचा-तानी में उस आदमी के सिर के बाल खिंच कर गिर गए और पैरों से मौजे भी इस लड़ाई में फट गए । उसके कपड़े भी तार-तार होने लगे । वह बेचारा भयंकर ठंड की इस रात में कांपता रहा । इस कारण उसे भी छिपा रहना पड़ा, क्योंकि लोगों के जागने के कारण उसे पकड़ लिया गया और उसे चोरी करने का मौका नहीं मिल सका । इस प्रकार स्पष्ट है कि जब आपकी इच्छाएं, आपकी आकांक्षाएं विरोधाभासी हैं, जब आपकी अभिलाषाओं में तालमेल नहीं होता है और वे आपस में एक दूसरे से संघर्ष करती हैं, तभी आपको विपदाओं और कष्टों का सामना करना पड़ता है । आप जानते ही हैं कि जो घर स्वयं ही बटा हो, उसका पतन होना अनिवार्य है, उसका नष्ट होना अवश्यंभावी है । इसलिए आप अपने हृदय और मन को खंगालिए, उसका मंथन कीजिए, उसका परीक्षण कीजिए और पता लगाइए कि क्या वहां शांति है, क्या वह दुविधारहित है ? यदि आपका से लक्ष्य निर्धारित है और आप उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पूर्णतः समर्पित और कार्यरत हैं तो आपको कोई कष्ट, कोई दुख नहीं होगा और न ही आप किसी विपदा से ग्रस्त होंगे । लेकिन यदि आपकी इच्छाओं में विरोधाभास है, आपके मन में संघर्ष है, आप मतभेदों से घिरे हैं तो आपको कष्ट और विपदाएं तो सहनी पड़ेंगी और आपका 'घर' अन्ततः नष्ट हो जाएगा, गिर जाएगा ।

यही वस्तुतः आपके दुख-दारुण्य का कारण है और आप ये विपदाएं स्वयं अपने ऊपर थोपते हैं । आप तो अपने भाग्य के विधाता हैं । व्यक्ति में दोनों प्रकार की इच्छाएं होती हैं एक उच्चकोटि की ओर दूसरी निम्नकोटि की । इन दोनों प्रकार की अभिलाषाओं में द्वंद्व चलता रहता है । लेकिन विकास के सार्वभौमिक विधान के अनुसार इस द्वंद्व तथा संघर्ष में सर्वाधिक सक्षम व्यक्ति ही जीवित रहता है । सर्वाधिक योग्यतम तथा समर्थवान व्यक्ति की विजय सुनिश्चित कराना प्रकृति का स्वभाव है । इस पारंपरिक संघर्ष में योग्यतम व्यक्ति के जीवित रहने के सार्वभौमिक नियम के सामंजस्यपूर्ण व्यवहार में केवल वे अभिलाषाएं सफलीभूत होती हैं और विजयी होती हैं जिनमें सर्वाधिक शक्ति होती है, और जो सर्वाधिक प्रबल होती हैं । लेकिन प्रश्न यह उठता है कि यह शक्ति और सामर्थ्य कहां से आता है ? यह बल और शक्ति सत्य से और केवल सत्य से ही प्राप्त होती है ।

केवल मात्र वे ही आकांक्षाएं सफलीभूत होती हैं और विजय पताका फहराती हैं, जो स्वयं सर्वाधिक सत्य से परिपूर्ण हैं, जो सर्वाधिक सदाचार, सर्वाधिक न्यायसंगत, सर्वाधिक पुण्यशील तथा सर्वाधिक शुद्धता से भरपूर हैं । आपके लिए यह अनिवार्य है कि आप स्वयं का उन्नयन करें और प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ते जाएं । भले ही इसके लिए आपके अपने वक्षःस्थल पर बंदूक की नोंक ही क्यों न रखनी पड़े । अन्य विकल्प नहीं है । इसलिए आप सर्वदा भोग-विलास में लिप्त होकर अपने को अवरुद्ध न करें । आपको धीरे-धीरे निश्चयात्मक रूप से ऊपर उठना है, उन्नति करनी है । तब आपके सामने साक्षात आनंद खड़ा होगा । कर्म का विधान प्रत्येक व्यक्ति और सभी के लिए आनंद से भरपूर प्याला लिए उपस्थित है । अब प्रश्न उठता है कि अभिलाषाओं की पूर्ति अवश्यमेव क्यों हों ? वेदांत घोषणा करता है कि आपका वास्तविक स्वभाव, आपकी वास्तविक आत्मा अमर-अजर है । राम अविनाशी ईश्वर है । आपका मन, आपका शरीर और आपकी आकांक्षाएं, सत्य के महासागर और अनन्तता, शाश्वतता के अनुपम जल-सागर में केवल लहरें तथा तरंगें मात्र हैं, इसलिए वे उस मौलिक अधिष्ठान की प्रकृति के अंश हैं जिसके द्वारा उनका उद्भव हुआ है । वास्तविक ईश्वर, वास्तविक दिव्यता या वास्तविक आत्मा इस संसार को अपनी श्वास बनाता है । यह समूचा विश्व 'मेरी' श्वास है । 'मैं' संसार का निर्णय करता हूं और आपकी आंखों के पलक झपकते ही संसार का निर्माण हो जाता है । (मैं आपकी 'आत्मा' हूं ।)

ये सभी इच्छाएं, अभिलाषाएं ही दिव्यता, ईश्वरत्व की प्रकृति तथा साथ ही क्षुद्र आत्मा के अहंकार के थोड़े-बहुत अंश को समाप्त कर देती हैं । इन आकांक्षाओं का वह पक्ष ही, जो दिव्यता पर या आंतरिक अमरत्व पर आश्रित है, इन आकांक्षाओं को सफलीभूत करने के लिए बाध्य करता है, इन आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रकृति बाध्य है । परंतु इच्छाओं के वे तत्त्व जो 'माया' पर आश्रित होते हैं उनकी पूर्ति में विलंब पैदा करते हैं । आपकी इच्छाओं की देरी का कारण उनमें सन्निहित माया-तत्त्व है । इसके विपरीत आपकी इच्छाओं का वह पक्ष निश्चय रूप से फलीभूत होता है जिसमें आपकी आकांक्षाओं में विद्यमान आपकी आंतरिक दिव्य प्रकृति सन्निहित है । आप कहेंगे कि ये इच्छाएं दिव्य कैसे होती हैं ? वास्तविकता यह है कि सभी इच्छाएं प्रेम का उद्गार हैं, प्रेम किसी आधार के बिना नहीं होतीं और प्रेम तो ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । क्या प्रेम ईश्वर नहीं है ? सभी इच्छाएं गुरुत्वाकर्षण की तरह होती हैं । यह गुरुत्वाकर्षण क्या है ? पृथ्वी चंद्रमा को आकर्षित करती है । सूर्य पृथ्वी को आकर्षित करता है । नक्षत्र एक-दूसरे को आकर्षित करते रहते हैं । यह सब 'सार्वभौतिक प्रेम' के कारण हैं । यह सब सादृश्यता या साम्यता के नियम के अनुसार है । एक अणु दूसरे अणु को आकर्षित करता है ।

परिमाणु में संलग्नता की सशक्ति क्या है ? एक परमाणु दूसरे परमाणु को आकर्षित करता है । आपके दृष्टिकोण से आकर्षित करना या यह आकर्षण अभिलाषा करना है । लेकिन यह आकर्षण, यह सशक्ति, यह संलग्नता, यह खिंचाव और यह लगाव, यह रासायिक अवलम्बपन, यह गुरुत्वाकर्षण क्यों हैं ? यह सब अभिलाषाओं की अभिव्यक्ति है । आपकी सभी इच्छाएं दिव्यतापूर्ण होती हैं । आपकी इच्छाओं की दिव्य प्रकृति ही उनकी परिपूर्णता की प्राप्ति सुनिश्चित करती है । लेकिन जब आप उन्हें स्वार्थमय बना देते हैं, उन्हें व्यक्तित्व का चोला पहना कर व्यक्तिगत बना देते हैं, तभी उनका स्वार्थमय चरित्र वास्तव में 'माया' की प्रकृति के अंग, उसके भाग के रूप में प्रकट होता है और उनकी सम्पूर्ति में विलंब होने लगता है ।

इस प्रयोजन से कि आपकी इच्छाएं सहजता, सरलता और मधुरता से संपन्न हों और उनके फलीभूत होने से आपको संतुष्टि मिले, आपको अपनी अभिलाषाओं की 'माया-संपन्न' प्रकृति में कमी करनी होगी और तत्संबंधी उस प्रकृति को न्यूनातिन्यून करना होगा । इसके स्थान पर आपको अपनी आकांक्षाओं की दिव्य तथा स्वार्थहीन प्रकृति को प्रधानता और वरीयता देनी होगी । तभी ये दिव्यमयी आकांक्षाएं सफलीभूत होंगी ।

इस विषय पर कि प्रार्थनाओं का दर्शन क्या है और प्रार्थनाएं किस प्रकार स्वीकार्य होती हैं, राम अन्य किसी दिन इसकी चर्चा करेगा । यहां हम एक कविता-पाठ पढ़ेंगे और वाणी को विश्राम देंगे ।

यदि एक बार भी आप साक्षात्कार करें कि आप अपने भाग्य के स्वामी हैं तो आपके आनंद का कोई पारावार नहीं रहेगा । जब आप 'ॐ' का जाप कर रहे होते हैं, 'ॐ' का गायन कर रहे होते हैं और जब आप इस अनुभूति से ओत-प्रोत होते हैं कि आप स्वयं ही अपने भाग्य के विधाता हैं तो रोने-धोने, चिल्लाने, विलाप करने और दुखी तथा विपदाग्रस्त होने की आपको आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी । उस दशा में आपने अपनी परिस्थितियों की विभिन्न ढंग से रचना कर दी होती है । अपने स्वामित्व का साक्षात्कार कीजिए, अपने आपको अपनी परिस्थितियों का दास मत समझिए । इस सत्य का साक्षात्कार कीजिए, इस सत्य की अनुभूति कीजिए कि आप स्वयं अपने भाग्य-विधाता हैं, जो भी आपकी परिस्थितियां हों, जो भी आपका वातावरण हो, भले ही आपके शरीर को बंदीगृह में फेंक दिया गया हो या उस शरीर को जल की वेगवती धारा में प्रवाहित कर दिया गया हो या उसे किसी के पैरों के तले कुचल दिया गया हो, लेकिन आपको तो सदैव निरंतर इसी सत्य से मदमस्त रहना है कि ''मैं वह हूं, जो सभी परिस्थितियों का स्वामी है, मैं शरीर नहीं हूं, मैं वह हूं जो भाग्य का निर्माता है । ''तत्त्वमसि'' । आप अपने मित्रों को स्वयं बनाते हैं । यह आपकी आकांक्षा है जिसके कारण आप अपने चारों ओर उन परिस्थितियों का सृजन करते हैं, जिनसे वे लोग आकर्षित होते हैं, जिन्हें आप अपने मित्र कहते हैं । यह भी आपकी आकांक्षा है, जिसके कारण आप ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं, जिनसे आपके सामने ऐसे लोग आ जाते हैं, जिन्हें आप शत्रु कहते हैं । ऐ मेरे सभी शत्रुगण ! मैंने ही तुम्हें बनाया है । ऐ मेरे मित्रो ! मैंने ही आपका निर्माण भी किया है । इस सत्य की अनुभूति कीजिए और फिर अनंत आनंद से आप ओत-प्रोत हैं ।

''ओ ! देखो आनंद भरा है मेरे प्याले में लबालब; झलकती हैं उनमें परिपूर्ण अभिलाषाएं; मधुर प्रातःकालीन मंदवायु है मेरी चेरी; मैं ही हूं जो करता हूं उसके पल्लवित चुंबनों के आनंद का अभिनंदन इंद्रधनुषीय रूप-रंग है मेरे अलंकरण, मेरे संदेश वाहक दौड़ते हैं जैसी है बिजली की चमक; गुलाबों की मुस्कान, ओस के मोती, ये सुनहरे धागे ये सुनहरे धागों की तरह हैं, कितनी निर्मल, कितनी नूतन, सूर्य की तेजोमय किरणें, हैं वे सभी माधुर्य और सौंदर्य से भरपूर; श्वेत धवल चंद्र है कितना आकर्षक, कितना स्वच्छ; इठलाती तरंगें, लहलहाते वृक्ष, आलिंगन करतीं लतायें, गुनगुनाते कृष्णमय भौरे; ये सभी हैं मेरी अभिव्यक्ति, मेरी अभिव्यंजना, और हैं शांति प्रदत्त श्वासोच्छ्वास । जीवन और मृत्यु है, मेरे हृदय का स्पंदन करुं मैं क्या ? या कहां हटाऊं उनको मैं ?

व्याप्त हूं मैं सर्वत्र, कुछ भी रिक्त नहीं है मुझसे; 'सर्वखल्विदम् ब्रह्म' हूं मैं, नहीं रह गया कोई स्थल जिसे भरना हो और करनी हो उसकी पूर्ति । क्या कर सकता हूं मैं संदेह या हो या सकता हूं दुखी मैं सभी काल हैं समाहित मुझमें, सभी शक्ति है निहित मेरी प्रज्जवलित आभा में, क्या कभी हो सकता हूं कोई संदेह या संशय ? या क्या कभी हो सकता हूं मैं दुःख-दारुण्य से पीड़ित ? नहीं, कदापि नहीं, मैं हूं सभी कार्य-कारण निस्संदेह, सभी काल है 'अब' और सभी देश हैं यहां सुलझ गई सभी समस्याएं, सामाधान हैं सुस्पष्ट ! सभी भला-बुरा, सभी कटुता, सभी माधुर्य, सभी में व्याप्त है मेरे हृदय का स्पंदन । मैं ही हूं सभी प्रेमी और मैं ही हूं सभी प्रमिकाएं ! मैं ही हूं अभिलाषाएं और हूं भाव तथा आवेग । कोई स्वार्थ-साधन नहीं है, नहीं है बंधन या मोह-ममता । सभी करते हैं मेरे काज, चाहे हों छोटे या महान मित्र-शत्रु में, सभी में है निराकार भगवत् ! प्रत्येक पदार्थ है समर्पित मुझको जो करते रहते हैं मुझे शत्-शत् प्रणाम !!

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!