श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड · भाग १२

बालकाण्ड · भाग १२ / १२
भाग १२ / १२
॥ दोहा ॥

चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ। कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ॥353॥

भावार्थ:-नगाड़े बजाकर और (परम) सुख प्राप्त कर अपने-अपने लोकों को चले। वे एक-दूसरे से श्री रामजी का यश कहते जाते हैं। हृदय में प्रेम समाता नहीं है॥353॥
॥ चौपाई ॥

सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयेँ भरि पूरि उछाहू॥ जहूँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहुटिन्ह कुअँर निहारे॥ ॥।

भावार्थ:-सब प्रकार से सबका प्रेमपूर्वक भली-भाँति आदर-सत्कार कर लेने पर राजा दशरथजी के ह्ृदय में पूर्ण उत्साह (आनंद) भर गया। जहाँ रनिवास था, वे वहाँ पधारे और बहुओं समेत उन्होंने कुमारों को देखा॥॥

लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयऊउ सुखु जेता॥ बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरघषि दुलारीं॥2॥

भावार्थ:-राजा ने आनंद सहित पुत्रों को गोद में ले लिया। उस समय राजा को जितना सुख हुआ उसे कौन कह सकता है? फिर पुत्रवधुओं को प्रेम सहित गोदी में बैठाकर, बार-बार हृदय में हर्षित होकर उन्होंने उनका दुलार (लाड़-चाव) किया॥2॥

देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब के उर अनंद कियो बासू॥ कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि सुनि हरषु होत सब काहू॥3॥

भावार्थ:-यह समाज (समारोह) देखकर रनिवास प्रसन्न हो गया। सबके हृदय में आनंद ने निवास कर लिया। तब राजा ने जिस तरह विवाह हुआ था, वह सब कहा। उसे सुन-सुनकर सब किसी को हर्ष होता है॥3॥

जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई॥ बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानीं सब प्रमुदित सुनि करनी ॥4॥

भावार्थ:-राजा जनक के गुण, शील, महत्व, प्रीति की रीति और सुहावनी सम्पत्ति का वर्णन राजा ने भाट की तरह बहुत प्रकार से किया। जनकजी की करनी सुनकर सब रानियाँ बहुत प्रसन्न हुईं॥4॥
॥ दोहा ॥

सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बरिप्र गुर ग्याति। भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति॥। 354॥

भावार्थ:-पुत्रों सहित खान करके राजा ने ब्राह्मण, गुरु और कुटुम्बियों को बुलाकर अनेक प्रकार के भोजन किए। (यह सब करते-करते) पाँच घड़ी रात बीत गई॥354॥
॥ चौपाई ॥

मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि॥ अँचइ पान सब काहूँ पाए। ख्रग सुगंध भूषित छवि छाए॥ ॥।

भावार्थ:-सुंदर स्त्रियाँ मंगलगान कर रही हैं। वह रात्रि सुख की मूल और मनोहारिणी हो गई। सबने आचमन करके पान खाए और फूलों की माला, सुगंधित द्रव्य आदि से विभूषित होकर सब शोभा से छा गए॥॥

रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई॥ प्रेम प्रमोदु बिनोदु बड़ाई। समउ समाजु मनोहरताई॥2॥।

भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी को देखकर और आज्ञा पाकर सब सिर नवाकर अपने-अपने घर को चले। वहाँ के प्रेम, आनंद, विनोद, महत्व, समय, समाज और मनोहरता को-॥2॥

कहि न सकहिं सतसारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू॥ सो मैं कहाँ कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी॥3॥

भावार्थ:-सैकड़ों सरस्वती, शेष, वेद, ब्रह्मा, महादेवजी और गणेशजी भी नहीं कह सकते। फिर भला मैं उसे किस प्रकार से बखानकर कहूँ? कहीं केंचुआ भी धरती को सिर पर ले सकता है?॥3॥

नृूप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाईं रानी॥ बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहू नयन पलक की नाई॥4॥।

भावार्थ:-राजा ने सबका सब प्रकार से सम्मान करके, कोमल वचन कहकर रानियों को बुलाया और कहा- बहुएँ अभी बच्ची हैं, पराए घर आई हैं। इनको इस तरह से रखना जैसे नेत्रों को पलकें रखती हैं (जैसे प्लकें नेत्रों की सब प्रकार से रक्षा करती हैं और उन्हें सुख पहुँचा ती हैं, वैसे ही इनको सुख पहुँचाना)॥4॥
॥ दोहा ॥

लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावह्ट जाइ। अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ॥355॥

भावार्थ:-लड़के थके हुए नींद के वश हो रहे हैं, इन्हें ले जाकर शयन कराओ। ऐसा कहकर राजा श्री रामचन्द्रजी के चरणों में मन लगाकर विश्राम भवन में चले गए॥355॥
॥ चौपाई ॥

भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलंग डसाए॥ सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना॥

भावार्थ:-राजा के स्वाभव से ही सुंदर वचन सुनकर (रानियों ने) मणियों से जड़े सुवर्ण के पलैंग बिछवाए। (गद्दों पर) गो के फेन के समान सुंदर एवं कोमल अनेकों सफेद चादरें बिछाईं॥ ॥

उपबरहन बर बरनि न जाहीं। ख्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं॥ रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा॥2॥

भावार्थ:-सुंदर तकियों का वर्णन नहीं किया जा सकता। मणियों के मंदिर में फूलों की मालाएँ और सुगंध द्रव्य सजे हैं। सुंदर रत्नों के दीपकों और सुंदर चैँदोवे की शोभा कहते नहीं बनती। जिसने उन्हें देखा हो, वही जान सकता है॥2॥

सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलंग पौढ़ाए॥ अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्‍्ह कीन्ही॥3॥

भावार्थ:-इस प्रकार सुंदर शय्या सजाकर (माताओं ने) श्री रामचन्द्रजी को उठाया और प्रेम सहित पलैंग पर पौढ़ाया। श्री रामजी ने बार-बार भाइयों को आज्ञा दी। तब वे भी अपनी-अपनी शय्याओं पर सो गए॥3॥

देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहह्ं सप्रेम बचन सब माता॥ मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी॥4॥।

भावार्थ:-श्री रामजी के साँवले सुंदर कोमल अँगों को देखकर सब माताएँ प्रेम सहित वचन कह रही हैं- हे तात! मार्ग में जाते हुए तुमने बड़ी भयावनी ताड़का राक्षसी को किस प्रकार से मारा? ॥4॥
॥ दोहा ॥

घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काह। मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु॥356॥।

भावार्थ:-बड़े भयानक राक्षस, जो विकट योद्धा थे और जो युद्ध में किसी को कुछ नहीं गिनते थे, उन दुष्ट मारीच और सुबाहु को सहायकों सहित तुमने कैसे मारा? ॥356॥
॥ चौपाई ॥

मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी॥ मख रखवारी करि दुहँ भाईं। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाईं॥॥

भावार्थ:-हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, मुनि की कृपा से ही ईश्वर ने तुम्हारी बहुत सी बलाओं को टाल दिया। दोनों भाइयों ने यज्ञ की रखवाली करके गुरुजी के प्रसाद से सब विद्याएँ पाईं॥॥

मुनितिय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी॥ कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृूप समाज महूँ सिव धनु तोरा॥2॥।

भावार्थ:-चरणों की धूलि लगते ही मुनि पत्नी अहल्या तर गई। विश्वभर में यह कीर्ति पूर्ण रीति से व्याप्त हो गई। कच्छप की पीठ, वज्ज और पर्वत से भी कठोर शिवजी के धनुष को राजाओं के समाज में तुमने तोड़ दिया! ॥2॥।

बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई॥ सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे॥3॥।

भावार्थ:-विश्वविजय के यश और जानकी को पाया और सब भाइयों को ब्याहकर घर आए! तुम्हारे सभी कर्म अमानुषी हैं (मनुष्य की शक्ति के बाहर हैं), जिन्हें केवल विश्वामित्रजी की कृपा ने सुधारा है (सम्पन्न किया है)॥3॥

आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा॥ जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें॥4॥।

भावार्थ:-हे तात! तुम्हारा चन्द्रमुख देखकर आज हमारा जगत में जन्म लेना सफल हुआ। तुमको बिना देखे जो दिन बीते हैं, उनको ब्रह्मा गिनती में न लावें (हमारी आयु में शामिल न करें)॥4॥
॥ दोहा ॥

राम प्रतोषीं मातु सब कह बिनीत बर बैन। सुमिरि संभु गुरु बिप्र पद किए नीदबस नैन॥357॥

भावार्थ:-विनय भरे उत्तम वचन कहकर श्री रामचन्द्रजी ने सब माताओं को संतुष्ट किया। फिर शिवजी, गुरु और ब्राह्मणों के चरणों का स्मरण कर नेत्रों को नींद के वश किया। (अर्थात वे सो रहे)॥357॥
॥ चौपाई ॥

नीदऊँ बदन सोह सुठि लोना। मनहूँ साँझ सरसीरुह सोना॥ घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं॥॥

भावार्थ:-नींद में भी उनका अत्यन्त सलोना मुखड़ा ऐसा सोह रहा था, मानो संध्या के समय का लाल कमल सोह रहा हो। स्त्रियाँ घर-घर जागरण कर रही हैं और आपस में (एक-दूसरी को) मंगलमयी गालियाँ दे रही हैं॥॥

पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी॥ सुंदर बधुन्ह सासु लै सोईं। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोईं॥2॥

भावार्थ:-रानियाँ कहती हैं- हे सजनी! देखो, (आज) रात्रि की कैसी शोभा है, जिससे अयोध्यापुरी विशेष शोभित हो रही है! (यों कहती हुई) सासुएँ सुंदर बहुओं को लेकर सो गईं, मानो सर्पों ने अपने सिर की मणियों को हृदय में छिपा लिया है॥2॥

प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे॥ बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए॥3॥

भावार्थ:-प्रातःकाल पवित्र ब्रह्म मुहूर्त में प्रभु जागे। मुर्गे सुंदर बोलने लगे। भाट और मागधों ने गुणों का गान किया तथा नगर के लोग द्वार पर जोहार करने को आए॥3॥।

बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता॥ जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे॥4॥

भावार्थ:-ब्राह्मणों, देवताओं, गुरु, पिता और माताओं की वंदना करके आशीर्वाद पाकर सब भाई प्रसन्न हुए। माताओं ने आदर के साथ उनके मुखों को देखा। फिर वे राजा के साथ दरवाजे (बाहर) पधारे॥4॥।
॥ दोहा ॥

कीन्हि सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ। प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ॥358॥

भावार्थ:-स्वभाव से ही पवित्र चारों भाइयों ने सब शौचादि से निवृत्त होकर पवित्र सरयू नदी में खान किया और प्रातःक्रिया (संध्या वंदनादि) करके वे पिता के पास आए॥358॥।

नवाह्नपारायण, तीसरा विश्राम

॥ चौपाई ॥

भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठे हरषि रजायसु पाई॥ देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी॥॥

भावार्थ:-राजा ने देखते ही उन्हें हृदय से लगा लिया। तदनन्तर वे आज्ञा पाकर हर्षित होकर बैठ गए। श्री रामचन्द्रजी के दर्शन कर और नेत्रों के लाभ की बस यही सीमा है, ऐसा अनुमान कर सारी सभा शीतल हो गई। (अर्थात सबके तीनों प्रकार के ताप सदा के लिए मिट गए) ॥॥

पुनि बसिष्ट मुनि कौसिकु आए। सुभग आसनन्ह्ि मुनि बैठाए॥ सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे॥2॥।

भावार्थ:-फिर मुनि वशिष्ठतजी और विश्वामित्रजी आए। राजा ने उनको सुंदर आसनों पर बैठाया और पुत्रों समेत उनकी पूजा करके उनके चरणों लगे। दोनों गुरु श्री रामजी को देखकर प्रेम में मुग्ध हो गए॥2॥।

कहहिं बसिष्ट धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा॥ मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्त बिपुल बिधि बरनी॥3॥।

भावार्थ:-वशिष्ठजी धर्म के इतिहास कह रहे हैं और राजा रनिवास सहित सुन रहे हैं, जो मुनियों के मन को भी अगम्य है, ऐसी विश्वामित्रजी की करनी को वशिष्ठजी ने आनंदित होकर बहुत प्रकार से वर्णन किया॥3॥।

बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहूँ माची॥ सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू॥4॥

भावार्थ:-वामदेवजी बोले- ये सब बातें सत्य हैं। विश्वामित्रजी की सुंदर कीर्ति तीनों लोकों में छाई हुई है। यह सुनकर सब किसी को आनंद हुआ। श्री राम-लक्ष्मण के हृदय में अधिक उत्साह (आनंद) हुआ॥4॥
॥ दोहा ॥

मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति। उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति॥359॥

भावार्थ:-नित्य ही मंगल, आनंद और उत्सव होते हैं, इस तरह आनंद में दिन बीतते जाते हैं। अयोध्या आनंद से भरकर उमड़ पड़ी, आनंद की अधिकता अधिक-अधिक बढ़ती ही जा रही है॥359॥
॥ चौपाई ॥

सुदिन सोधि कल कंकन छोरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे॥ नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं॥ ॥।

भावार्थ:-अच्छा दिन (शुभ मुहूर्त) शोधकर सुंदर कंकण खोले गए। मंगल, आनंद और विनोद कुछ कम नहीं हुए (अर्थात बहुत हुए)। इस प्रकार नित्य नए सुख को देखकर देवता सिह्ाते हैं और अयोध्या में जन्म पाने के लिए ब्रह्माजी से याचना करते हैं॥

बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं॥ दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ॥2॥।

भावार्थ:-विश्वामित्रजी नित्य ही चलना (अपने आश्रम जाना) चाहते हैं, पर रामचन्द्रजी के सरेह और विनयवश रह जाते हैं। दिनोंदिन राजा का सौ गुना भाव (प्रेम) देखकर महामुनिराज विश्वामित्रजी उनकी सराहना करते हैं॥2॥

मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे॥ नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी॥3॥

भावार्थ:-अंत में जब विश्वामित्रजी ने विदा माँगी, तब राजा प्रेममग्य हो गए और पुत्रों सहित आगे खड़े हो गए। (वे बोले-) हे नाथ! यह सारी सम्पदा आपकी है। मैं तो स्त्री-पुत्रों सहित आपका सेवक हूँ॥3॥

करब सदा लरिकन्ह पर छोह। दरसनु देत रहब मुनि मोहू॥ अस कह्ट राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी॥4॥।

भावार्थ:-हे मुनि! लड़कों पर सदा खरेह करते रहिएगा और मुझे भी दर्शन देते रहिएगा। ऐसा कहकर पुत्रों और रानियों सहित राजा दशरथजी विश्वामित्रजी के चरणों पर गिर पड़े, (प्रेमविहवल हो जाने के कारण) उनके मुँह से बात नहीं निकलती ॥4॥

दीन्हि असीस बिप्र बहु भाँति। चले न प्रीति रीति कहि जाती॥ रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई॥5॥।

भावार्थ:-ब्राह्मण विश्वमित्रजी ने बहुत प्रकार से आशीर्वाद दिए और वे चल पड़े। प्रीति की रीति कही नहीं जीती। सब भाइयों को साथ लेकर श्री रामजी प्रेम के साथ उन्हें पहुँचाकर और आज्ञा पाकर लौटे॥5॥ श्री रामचरित्‌ सुनने-गाने की महिमा
॥ दोहा ॥

राम रूपु भूपति भगति ब्याह उछाहु अनंदु। जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु॥ 360॥

भावार्थ:-गाधिकुल के चन्द्रमा विश्वामित्रजी बड़े हर्ष के साथ श्री रामचन्द्रजी के रूप, राजा दशरथजी की भक्ति, (चारों भाइयों के) विवाह और (सबके) उत्साह और आनंद को मन ही मन सराहते जाते हैं॥360॥
॥ चौपाई ॥

बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी॥ सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ॥॥

भावार्थ:-वामदेवजी और रघुकुल के गुरु ज्ञानी वशिष्ठतजी ने फिर विश्वामित्रजी की कथा बखानकर कही। मुनि का सुंदर यश सुनकर राजा मन ही मन अपने पुण्यों के प्रभाव का बखान करने लगे॥

बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ।॥ जहूँ तहँ राम ब्याह सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहूँ छावा॥2॥।

भावार्थ:-आज्ञा हुई तब सब लोग (अपने-अपने घरों को) लौटे। राजा दशरथजी भी पुत्रों सहित महल में गए। जहाँ-तहाँ सब श्री रामचन्द्रजी के विवाह की गाथाएँ गा रहे हैं। श्री रामचन्द्रजी का पवित्र सुयश तीनों लोकों में छा गया॥2॥

आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें॥ प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाह। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू॥3॥।

भावार्थ:-जब से श्री रामचन्द्रजी विवाह करके घर आए, तब से सब प्रकार का आनंद अयोध्या में आकर बसने लगा। प्रभु के विवाह में आनंद- उत्साह हुआ, उसे सरस्वती और सर्पों के राजा शेषजी भी नहीं कह सकते॥3॥।

कबिकुल जीवनु पावन जानी। राम सीय जसु मंगल खानी॥ तेहि ते मैं कछू कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी॥4॥

भावार्थ:-श्री सीतारामजी के यश को कविकुल के जीवन को पवित्र करने वाला और मंगलों की खान जानकर, इससे मैंने अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए कुछ (थोड़ा सा) बखानकर कहा है॥4॥ छ्न्द :

निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो। रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्मो॥ उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं। बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं॥

भावार्थ:-अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए तुलसी ने राम का यश कहा है। (नहीं तो) श्री रघुनाथजी का चरित्र अपार समुद्र है, किस कवि ने उसका पार पाया है? जो लोग यज्ञोपवीत और विवाह के मंगलमय उत्सव का वर्णन आदर के साथ सुनकर गावेंगे, वे लोग श्री जानकीजी और श्री रामजी की कृपा से सदा सुख पावेंगे।
॥ सोरठा ॥

सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुन हिं। तिन्ह कहूँ सदा उछाह मंगलायतन राम जसु॥364॥

भावार्थ:-श्री सीताजी और श्री रघुनाथजी के विवाह प्रसंग को जो लोग प्रेमपूर्वक गाएँ-सुनेंगे, उनके लिए सदा उत्साह (आनंद) ही उत्साह है, क्योंकि श्री रामचन्द्रजी का यश मंगल का धाम है॥36॥

मासपारायण, बारहवाँ विश्राम

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने प्रथमः सोपानः समाप्त। कलियुग के सम्पूर्ण पापों को विध्वंस करने वाले श्री रामचरित मानस का यह पहला सोपान समास हुआ (बाल-काण्ड समाप्त)

श्री रामचरितमानस

अयोध्याकाण्ड