मनुष्य अपने भाग्य का विधाता — भाग 3
अब राम इस भाषण के एक रुचिकर पक्ष पर प्रकाश डालेगा । हो सकता है, सबको यह पसंद आए । एक व्यक्ति है जिसकी सबसे बलवती अभिलाषा यही है कि वह अपनी पशुवत् वासनाओं की किसी प्रकार पूर्ति करे । उसे ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है, वह किसी प्रकार आध्यात्मिकता से नहीं जुड़ना चाहता है, उसके लिए अध्यात्म बेकार है । उसे न तो नैतिकता से और न ही ऊंची ख्याति से और न ही यश से कोई मतलब है । ये सारी बातें उसके लिए निरर्थक हैं । उसका एकमात्र लक्ष्य अपनी पाशुविक वासनाओं को, भोग-विलास की भूख को पूरा करना है । इस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है । (यह एक काल्पनिक उदाहरण हैं, परंतु इससे स्थिति और स्पष्ट होगी) अब सोचिए, इस व्यक्ति को किस प्रकार माता-पिता के यहां जन्म लेने की अपेक्षा होगी ? उसकी इच्छा किसी विद्वान माता-पिता के घर पैदा होने की कभी नहीं होगी ? उसको इसकी जरूरत नहीं है । उसमें जो ऊर्जा है क्या उसके कारण उसे धनवान माता-पिता की भी जरूरत होगी ? जी नहीं । न ही वह किसी शिक्षित और न ही सभ्य माता-पिता को चाहेगा । वेदांत स्पष्ट करता है कि यदि यह मनुष्य पूर्णरूपेण पाशुविक प्रवृत्तियों से ही बना है तो उसे सर्वाधिक उचित और उपयुक्त शरीर ही प्राप्त होगा जो शूकर या कुत्ते का होगा । क्योंकि उसकी यही आकांक्षा रही है कि उसका शरीर ऐसा हो जो खाने-पीने से कभी थके नहीं, जो पशुवत् वासनायुक्त इच्छाओं की पूर्ति से कभी विरत न हो और जो अपने आपको बेवकूफ बनने में बुरा न माने । उसे ऐसी ही योनि चाहिए । इस उद्देश्य से कि उसकी तत्संबंधी इच्छाएं पूरी हों, उसका जन्म सुअर या कुत्ते के रूप में होना चाहिए । इस प्रकार सिद्ध है कि भले ही वह कुत्ता या सुअर हो, पर सच्चाई तो यही है कि उसने अपने भाग्य का अपने इच्छित प्रयोजन के लिए निर्माण किया ।
जब इस विश्व के लोग किसी वस्तु की आकांक्षा करते हैं तो यह नहीं सोचते हैं कि इसका क्या परिणाम होगा ? वे इस बात का समुचित निरीक्षण नहीं करते हैं कि उनकी इच्छाओं का अंत क्या होगा ? अब जब बाद में उनको अपनी इच्छाओं का प्रतिफल मिलता है, तो वे रोने-चिल्लाने लगते हैं, विलाप करते हैं, अपने भाग्य को कोसते हैं, अपने सितारों को भला-बुरा कहते हैं, वे दहाड़-दहाड़कर रोते हैं, दांत किटकिटाते हैं, ओंठों को काटते हैं और अत्यंत दुखी होते हैं । इसलिए जब कभी भी आप कोई इच्छा करें तो उसके परिणामों पर भी विचार करें । ये स्वयं आप ही हैं जो इस दुख-दारुण्य, कष्ट-विपदा से अपने आपको घेर लेते हैं ।
राम अब आपको भारत के एक शायर की कहानी बतलाएगा । वह मुसलमान था, बहुत अच्छा आदमी था और काफी चतुर भी । आप उसे बहुत होशियार और हाजिर-जवाब कह सकते हैं । वह भारत में ब्रिटिश काल के एक देशी नवाब के दरबार में रहता था, जो उससे अत्यंत प्रभावित और प्रसन्न था । एक रात इस नवाब ने उस शायर को अपने पास बुलाया काफी देर तक इस शायर ने नवाब साहब को अपनी शेरो-शायरी रुचिकर कहानियों, और हाजिर जवाबी से काफी खुश कर लिया । वे इस शायर की रचनाओं, उसके वर्णन करने की शैली, उसके मनो-विनोद, उसकी हाजिर जवाबी से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें नींद की सुधि भी नहीं आई । वे बहुत देरी से अपने बिस्तर पर सोने जा सके । उनकी बेगम ने नवाब साहब से पूछा कि ''उनके इतनी देरी से आने का क्या कारण था ? वे सोने के लिए अपने कमरे में इतनी देरी से क्यों आए ?'' नवाब साहब ने जवाब दिया, ''अरे बेगम साहिबा ! आज शाम हमारे पास एक बहुत अद्भुत आदमी आया, वह बहुत अधिक अच्छा था, बहुत चतुर था, बड़ा हाजिर-जवाब था और बहुत अधिक मनोरंजन करता था । उससे हम बहुत अधिक प्रसन्न और प्रभावित हुए ।'' इस पर बेगम साहिबा ने उसके बारे में और ज्यादा जानकारी हासिल करने के लिए नवाब से बहुत तरह के सवाल पूछे । बेगम की उत्सुकता देखकर नवाब ने काफी विस्तार से उस शायर की योग्यता, क्षमता और उपलब्धियों के बारे में बताया और वह चर्चा काफी देर तक चलती रही, यहां तक कि सवेरा होने को आ गया । तभी वे लेट सके । नवाब साहब से इतनी प्रशंसा सुनकर बेगम की उस शायर में दिलचस्पी इतनी अधिक बढ़ चुकी थी कि उन्होंने नवाब साहब से निवेदन किया कि वे किसी दिन इस शायर को उनके सामने हाजिर होने का हुकुम दें । फिर तो अगले दिन ही उस शायर को बेगम साहिबा के सामने हाजिर किया गया ।
आप जानते हैं कि भारत के रीति-रिवाज पश्चिमी देशों और अमरीका से बिल्कुल भिन्न हैं । भारत में महिलाएं अलग कक्षों में रहती हैं, और पुरुषों से, भले ही वे कितने भद्र और सभ्य हों, अधिक मिलती-जुलती नहीं हैं । अलग रहने के अलावा विशेषकर मुसलमान महिलाएं बुर्का पहनती हैं, हिंदू महिलाओं में भी पर्दा होता है और पति के अतिरिक्त या उन निकटतम संबंधियों और उन लोगों को छोड़कर, जो अत्यधिक पवित्र और पुण्यात्मा होते हैं, किसी दूसरे को, अपने को नहीं देखने देती हैं । जो भी हो, इस शायर को नवाब साहब 'हरम' में या महिलाओं के निजी कक्ष में ले आए । वहां उसने बेगमों के सामने अपने गीत गए, शेरो-शायरी सुनायी और मनोरंजक किस्से-कहानियों का बखान किया । इससे महिलाएं अत्यंत प्रसन्न हुईं । तभी इस शायर ने दुखी होकर बताया कि वह आंखों के भयंकर रोग से पीड़ित है और उसे देखने में भारी तकलीफ है, यहां कि तक वह अंधा ही है जबकि वास्तविकता यह थी कि वह अंधा नहीं था । इस दुष्ट शायर की बुरी नीयत थी । वह चाहता था कि उसे किसी प्रकार महिलाओं के निजी कमरों या 'हरम' में रहने की इजाजत मिल जाए । अंधा होने कारण उस शायर के सामने भी वे वैसा ही करती रहेंगी—उन्हें कोई संकोच नहीं होगा । नवाब साहब ने सोचा कि यह बेचारा शायर अंधा है, इसलिए उसके 'हरम' में रहने में कोई नुकसान नहीं । लेकिन आप तो जानते हैं कि—
''सच्चाई को मिला दो मिट्टी में, तो भी कुचली नहीं जा सकती है सच्चाई । अनन्त हाथ हैं, भगवान के अनन्त कान हैं, भगवान के''
अर्थात् सत्य को दबाया नहीं जा सकता है, वह एक न एक दिन अवश्य प्रकट होता है ।
एक दिन इस शायर ने एक नौकरानी से कहा कि वह उसके लिए अमुक-अमुक चीज ला दे । आप जानते हैं कि भारत में यदि कोई व्यक्ति थोड़ा भी धनाद्य हो जाता है तो वह बहुत आलसी बन जाता है । धनवान होने का प्रमाण यह है कि आप कितने सुस्त और आलसी हैं । आप तभी अत्यंत उत्कृष्ट और संपन्न माने जाते हैं, जब आप स्वयं कुछ भी न करें, यहां तक कि आपको गाड़ी में बैठाने के लिए कोई न कोई नौकर हो या किसी अन्य व्यक्ति का आपकी सहायतार्थ उपस्थित होना जरूरी होता है । यदि कोई नौकर या अन्य व्यक्ति आपके टहलने में मदद करे, आपको कपड़े पहनाए, आपके छोटे-छोटे काम भी करे और आपकी सेवा में अनेक चक्कर बराबर लगाता रहे, जिससे आपने अपको शरीर से कोई काम न करना पड़े, तो आप भारत में निस्संदेह संपन्न, समृद्ध तथा धनवान तथा महान व्यक्ति माने जाते हैं । इस प्रकार दूसरों पर आश्रित होना या परावलंबी होना आदर का परिचायक है । स्वतंत्रता और स्वालंबन एक तरह से पराधीनता और दासता का सूचक है, उसमें बड़प्पन नहीं है ।
इस प्रकार जब इस शायर को नवाब के यहां सम्मानजनक पद मिल ही गया तो स्वाभाविक रूप से उसने अपने आसन से उतरने को अपनी शान के खिलाफ समझा । फिर उसकी इच्छा एक अच्छी कुर्सी पर बैठने की हुई । इसलिए उसने एक नौकरानी से अपने लिए अच्छी कुर्सी लाने का हुक्म दिया । लेकिन नौकरानी ने इस शायर को बड़े ढीठ होकर और कर्कश आवाज में जवाब दिया कि उसके पास समय नहीं है, उसे फुरसत नहीं है और उसे और भी अनेक आवश्यक काम करने हैं । पहले वह उन कामों को करेगी । कुछ समय बाद एक दूसरी नौकरानी वहां से गुजरी । शायर ने उसे इशारे से अपने पास बुलाया और उससे एक नई कुर्सी लाने के लिए कहा । इस नौकरानी ने जवाब दिया कि कमरे में तो कोई कुर्सी ही नहीं है । शायर ने फिर हुक्म दिया कि वह उसके लिए पानी से भरा बर्तन ले आए, क्योंकि उसे जल्दी से जल्दी गुसल जाना है । इस पर नौकरानी ने जवाब दिया कि कमरे में तो कोई बर्तन है ही नहीं । मैं दूसरे कमरे में जब जाऊंगी तब वहां से पानी भरा बर्तन ले आऊंगी ।'' इस पर गुस्से में आकर शायर ने कहा—''कमरे में वहां एक बर्तन रखा है, उसे उठा लाओ । क्या तुझे इतना भी नहीं दिखता है ?'' पानी की अत्यधिक जरूरत होने के कारण हड़बड़ाहट और घबराहट में वह यह भूल गया कि वहां वह अंधे के रूप में रह रहा है । ऐसा ही होता है । किस विचित्र तरीके से सचाई झूठ बोलने वालों के साथ मजाक करती है ।
आपने सुना है कि शेक्सपियर की 'मेकबेथ' रचना में मैकबेथ की पत्नी ने किस प्रकार वह कुकृत्य किया, लेकिन आखिरकार वह उसे छिपा नहीं सकी । सच्चाई के कारण वह पागल-सी हो गई और उसने स्वेच्छा से अपने डॉक्टर के सामने अपने कुकृत्य को कबूला, उसे स्वीकार किया ।
सच्चाई अपना खेल अपने ढंग से खेलती है । प्रकृति का विधान भी यही है ।
जब उस शायर उस नौकरानी से कहा—''अरे बर्तन तो वहां रखा है, क्या तुझे यह भी नहीं दिखता है ?'' तो वह नौकरानी शायर के लिए बर्तन उठाने के बजाए तुरंत ही सीधे बेगम साहिबा के पास दौड़ती हुई पहुंची और उनसे बड़े अदब से कहा—''बेगम साहिबा ! यह मुआ (शायर) अंधा नहीं है, यह तो बड़ा शैतान है, यह बिल्कुल अंधा नहीं है, इसे तुरंत ही महल से निकाल बाहर कर देना चाहिए ।''
और आखिर उसे महल से बाहर फेंक दिया गया । और तीन दिन बाद वह शायर असली में अंधा ही हो गया । यह सब क्या है ? ऐसा क्यों हुआ ? यह सब कर्म के विधान के अनुसार हुआ । कर्म का विधान आपको बतलाता है कि यह आदमी अपनी स्वयं की इच्छा से अंधा बना । वह अपने भाग्य का विधाता है । अंधापन उसने स्वयं ही अपने ऊपर लादा । किसी दूसरे ने उसे अंधा नहीं बनाया है । उसकी स्वयं की इच्छाओं ने, उसकी स्वयं की लालसाओं ने उसे अंधा बनाया । इसके बाद वास्तव में वह अंधा ही बन गया । वह रोने और चिल्लाने लगा, दहाड़ मारने लगा, अपने दांत किटकिटाने लगा, ओंठ काटने लगेगा । पर अब होता क्या ?
एक व्यक्ति वृद्ध था, कमजोर था और बीमार रहता था । एक बार वह अपने कंधों पर भारी बोझ लेकर जा रहा था । वह भारत के गर्म देश का निवासी था । थकान के कारण एक वृक्ष की छाया में बैठ गया और किसी तरह अपने कंधों से बोझ उतार दिया, जिससे वह कुछ देर के लिए विश्राम कर सके और थकान मिटा सके । चूंकि वह अपने जीवन से अत्यधिक परेशान था, इसलिए उसने चिल्लाकर कहा, ''हे मृत्यु देवता ! हे यमराज जी ! आओ और मुझे छुटकारा दिलाओ । मैं परेशान हूं । मैं इस जीवन से दुखी हूं, इससे छुटकारा चाहता हूं ।'' यमदेवता उसकी प्रार्थना पर उसके सामने प्रकट हो गए । लेकिन फिर क्या हुआ ? जब उस व्यक्ति ने मृत्यु के देवता यमराज को अपने सामने देखा तो वह कांपने लगा, उसके होश-फाख्ता हो गए, वह अचंभे से आंख फाड़-फाड़ कर देखता रहा और डरता रहा । कितनी भयंकर शक्ल थी यमराज की, क्या वे किसी भयंकर दानव से कम थे ? उसने कांपते हुए, सहमे हुए यमराज से पूछा—''आप कौन हैं ?'' यमराज के उत्तर दिया—''मैं वही हूं जिसको बुलाने के लिए तुमने प्रार्थना की थी, अर्चना की थी । तुम्हारी इच्छा को पूरा करने के लिए ही मैं आया हूं ।'' तब उस बूढ़े ने हाथ जोड़कर अत्यंत दयनीय दशा में, भयभीत होकर यमराज से कहा, ''भगवन् ! मैंने अपनी मृत्यु नहीं मांगी थी । मैंने आपको अपनी मृत्यु के लिए नहीं पुकारा था । मैं तो बहुत थका था, इसलिए केवल इस भारी बोझ उठाने में सहायता करने के लिए प्रार्थना की थी । जिससे मैं उसे दुबारा अपने कंधों पर उठा सकूं और उसे ले जा सकूं ।''
बस, ऐसा ही आप बहुधा करते रहते हैं । वास्तविकता यही है कि आप स्वयं ही अपनी कठिनाइयों, अपने कष्टों, अपने दुख-दारुण्य, अपनी विपदाओं का आह्वान करते हैं, स्वयं ही उनको पैदा करते हैं । आप ही स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हैं । और जब आपकी इच्छाएं आपके सामने प्रकट होती हैं तो आप डर के मारे, उन इच्छाओं का असली रूप देखकर चिल्लाने लगते हैं, रोने लगते हैं । जब आपने यमराज को आमंत्रित किया और साक्षात मृत्यु आपके सामने प्रकट हुई तो आप चिल्लाने लगे, विलाप करने लगे । पर इससे काम चलने वाला नहीं है । जब आपने किसी नीलामी में अपनी इच्छित वस्तु के लिए सबसे अधिक बोली लगाई है तो फिर आपको दाम भी देने होंगे और वह चीज भी लेनी होगी । जब आप बग्गी में जुते घोड़े को कोड़ा मारेंगे तो घोड़ा दौड़ेगा और गाड़ी उसके पीछे चलती जाएगी । इसलिए यदि आपने एक बार भी अपनी इच्छा प्रकट की तो आपको उसका परिणाम भुगतना ही पड़ेगा ।
यह कैसे होता है कि लोग सामान्यतः अपनी वृद्धावस्था में मरते हैं, जबकि बहुत कम लोग अपनी युवावस्था में ? वेदांत का मत है कि जब लोग बूढ़े हो जाते हैं तो उनके शरीर विभिन्न रोगों से पीड़ित हो जाते हैं । वे अपनी बीमारियों से अत्यंत दुखी होते हैं, उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं, इसलिए वे मरने की इच्छा करने लगते हैं । वे बीमारी से मुक्ति पाने के लिए विनती करते हैं, और अन्ततः उन्हें मृत्यु के रूप में छुटकारा मिलता है । इस प्रकार, आपकी मृत्यु भी आपकी कारण, आपके इच्छा की वजह से आती है । वेदांत के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति आत्महत्या करता है, मृत्यु को स्वयं बुलाता है और मृत्यु का वरण करता है, क्योंकि मृत्यु उसी क्षण होती है जब आप उसकी उत्कट और सच्ची इच्छा करते हैं, उसका आह्वान करते हैं ।
फिर ऐसा क्यों होता है कि लोग अपनी युवावस्था में ही मर जाते हैं ? क्या वे मरने की इच्छा करते हैं ? संभवतः आप इस समय राम की बातों का विश्वास नहीं करेंगे, लेकिन यदि आप सूक्ष्म तथा सतर्क निरीक्षण करें तो आप राम के विचारों से सहमत होंगे, जो राम ने अभी व्यक्त किए हैं । राम ने अनेक युवकों को अपनी भरपूर युवावस्था में मरते हुए देखा है । और उनका ध्यानपूर्वक निरीक्षण भी किया है । राम ने इन युवकों के आंतरिक जीवन का सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन किया कि उनकी मृत्यु क्यों हुई ? सारे मामले की जांच-पड़ताल करने के बाद राम ने देखा कि इन नवयुवकों की आंतरिक हार्दिक इच्छा थी कि उनकी मृत्यु हो जाए, क्योंकि वे अपनी वर्तमान परिस्थितियों से परेशान थे और उनसे छुटकारा पाना चाहते थे । ऐसा ही होता है और यही तथ्य है ।
भारत में एक संप्रदाय विशेष के महाविद्यालय में एक तेजस्वी अध्यापक विद्यार्थियों को पढ़ाते थे । यह अध्यापक भी उसी संप्रदाय विशेष के थे । उन्होंने एक सार्वजनिक सभा में भाषण करते हुए घोषणा की कि ''मैं अपने संप्रदाय की भलाई के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करता हूं ।'' फिर उस लक्ष्य के प्रति समर्पित होने के बाद वह तदनुकूल कार्य करने लगे । उन्होंने कुछ समय तक अत्यंत उत्साहपूर्वक और लगन से काम किया, लेकिन धीरे-धीरे उनके विचारों में परिवर्तन आने लगा, उनका दृष्टिकोण अधिक व्यापक हो गया, उनका मस्तिष्क अधिक विचारशील हो गया और विचारों का क्षेत्र व्यापक तथा विस्तृत हो गया । इसलिए उस जाति के पुराधाओं तथा नेताओं के साथ उनका कार्य करना दूभर हो गया और ये नेता भी मन ही मन उनसे सहानुभूति करने से कतराने लगे । लेकिन उन्हें किसी न किसी तरह उनके साथ काम करना ही पड़ता था, क्योंकि वह वचनबद्ध थे और वह अपनी जाति के अभ्युदय के लिए अपना जीवन पहले ही अर्पित कर चुके थे । वह अपने वचनों से हट नहीं सकते थे ।
इस नवयुवक के लिए अन्य कोई विकल्प नहीं था कि वह उस काम से बच सके । उसका हृदय एक जगह था लेकिन उसका शरीर उससे दूर किसी दूसरी जगह पर था । उसके हृदय और शरीर में कोई सामंजस्य या ताल-मेल नहीं था, दोनों विलग थे । यह स्थिति अधिक समय तक बनी नहीं रह सकती थी और न ही वह नवयुवक अपनी परिस्थितियों से और अधिक समझौता कर सकता था । इसलिए उसकी मृत्यु हो गई । वह मृत्यु के अतिरिक्त किसी अन्य विधि से अपनी परिस्थितियों को नहीं बदल सकता था । मृत्यु ही एकमात्र उपाय था । इसलिए मृत्यु का वरण कर उसने उन परिस्थितियों से छुटकारा पाया । इस प्रकार मृत्यु भी कोई 'हौव्वा' नहीं है, डरने या भयभीत होने की चीज नहीं है, जैसी कि आम धारणा है ।