श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 206

नाहिन और कोउ सरन लायक दूजो श्रीरघुपति-सम बिपति-निवारन।

काको सहज सुभाउ सेवकबस, काहि प्रनत परप्रीति अकारन ॥ 1 ॥

जन-गुन अलप गनत सुमेरु करि, अवगुन कोटि बिलोकि बिसारन।

परम कृपालु, भगत-चिंतामनि,बिरद पुनीत, पतितजन-तारन ॥ 2 ॥

सुमिरत सुलभ,दास-दुख हरि चलत तुरत, पटपीत सँभार न।

साखि पुरान-निगम-अगम सब, जानत द्रुपद-सुता अरु बारन ॥ 3 ॥

जाको जस गावत कबि-कोबिद, जिन्हके लोभ-मोह,मद-मार न।

तुलसिदास तजि आस सकल भजु, कोसलपति मुनिबधू-उधारन ॥ 4 ॥