पद 59
देव–
दीन-उद्धरण रघुवर्य करुणाभवन शमन-संताप पापौघहारी।
विमल विज्ञान-विग्रह,अनुग्रहरूप,भूपवर, विबुध,नर्मद,खरारी ॥ 1 ॥
संसार-कांतार अति घोर,गंभीर,घन,गहन तरुकर्मसंकुल,मुरारी।
वासना वल्लि खर-कंटकाकुल विपुल, निबिड़ विटपाटवी कठिन भारी ॥ 2 ॥
विविध चितवृति-खग निकर श्येनोलूक,काक वक गृध्र आमिष-अहारी।
अखिल खल,निपुण छल,छिद्र निरखत सदा, जीवजनपथिकमन-खेदकारी ॥ 3 ॥
क्रोध करिमत्त,मृगराज,कंदर्प,मद-दर्प वृक-भालु अति उग्रकर्मा।
महिष मत्सर क्रूर,लोभ शूकररूप,फेरु छल,दंभ मार्जारधर्मा ॥ 4 ॥
कपट मर्कट विकट,व्याघ्र पाखण्डमुख,दुखद मृगव्रात,उत्पातकर्ता।
ह्रदय अवलोकि यह शोक शरणागतं,पाहि मां पाहि भो विश्वभर्ता ॥ 5 ॥
प्रबल अहँकार दुरघट महीधर,महामोह गिरि-गुहा निबिड़ांधकारं।
चित्त वेताल,मनुजाद मन,प्रेतगनरोग,भोगौघ वृश्चिक-विकारं ॥ 6 ॥
विषय-सुख-लालसा दंश-मशकादि,खल झिल्लि रूपादि सब सर्प,स्वामी।
तत्र आक्षिप्त तव विषम माया नाथ,अंध मैं मंद,व्यालादगामी ॥ 7 ॥
घोर अवगाह भव आपगा पापजलपूर,दुष्प्रेक्ष्य,दुस्तर,अपारा।
मकर षड्वर्ग,गो नक्र चक्राकुला,कूल शुभ-अशुभ,दुख तीव्र धारा ॥ 8 ॥
सकल संघट पोच शोचवश सर्वदा दासतुलसी विषम गहनग्रस्तं।
त्राहि रघुवंशभूषण कृपा कर,कठिन काल विकराल-कलित्रास-त्रस्तं ॥ 9 ॥