श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
भजन · गीतावली

घर-घर अवध बधावने मङ्गल-साज-समाज

घर-घर अवध बधावने मङ्गल-साज-समाज

राग केदारा

घर-घर अवध बधावने मङ्गल-साज-समाज |

सगुन सोहावने मुदित-मन कर सब निज-निज काज ||

निज काज सजत सँवारि पुर-नर-नारि रचना अनगनी |

गृह, अजिर, अटनि, बजार, बीथिन्ह चारु चौकैं बिधि घनी ||

चामर, पताक, बितान, तोरन, कलस, दीपावलि बनी |

सुख-सुकृत-सोभामय पुरी बिधि सुमति जननी जनु जनी ||

चैत चतुरदसि चाँदनी, अमल उदित निसिराज |

उडुगन अवलि प्रकासहीं, उमगत आनँद आज ||

आनन्द उमगत आजु, बिबुध बिमान बिपुल बनाइकै |

गावत, बजावत, नटत, हरषत, सुमन बरषत आइकै ||

नर निरखि नभ, सुर पेखि पुरछबि परसपर सचु पाइकै |

रघुराज-साज सराहि लोचन-लाहु लेत अघाइकै ||

जागिय राम छठी सजनि रजनी रुचिर निहारि |

मङ्गल-मोद-मढ़ी मुरति नृपके बालक चारि ||

मूरति मनोहर चारि बिरचि बिरञ्चि परमारथमई |

अनुरुप भूपति जानि पूजन-जोग बिधि सङ्कर दई ||

तिन्हकी छठी मञ्जुलमठी, जग सरस जिन्हकी सरसई |

किए नीन्द-भामिनि जागरन, अभिरामिनी जामिनि भई ||

सेवक सजग भए समय-साधन सचिव सुजान |

मुनिबर सिखये लौकिकौ बैदिक बिबिध बिधान ||

बैदिक बिधान अनेक लौकिक आचरत सुनि जानिकै |

बलिदान-पूजा मूलिकामनि साधि राखी आनिकै ||

जे देव-देवी सेइयत हित लागि चित सनमानिकै |

ते जन्त्र-मन्त्र सिखाइ राखत सबनिसों पहिचानिकै ||

सकल सुआसिनि, गुरजन, पुरजन, पाहुन लोग |

बिबुध-बिलासिनि, सुर-मुनि, जाचक, जो जेहि जोग ||

जेहि जोग जे तेहि भाँति ते पहिराइ परिपूरन किये |

जय कहत, देत असीस, तुलसीदास ज्यों हुलसत हिये ||

ज्यों आजु कालिहु परहुँ जागन होहिङ्गे, नेवते दिये |

ते धन्य पुन्य-पयोधि जे तेहि समै सुख-जीवन जिये ||

भूपति-भाग बली सुर-बर नाग सराहि सिहाहिं |

तिय-बरबेष अली रमा सिधि अनिमादि कमाहिं ||

अनिमादि, सारद, सैलनन्दिनि बाल लालहि पालहीं |

भरि जनम जे पाए न, ते परितोष उमा-रमा लहीं ||

निज लोक बिसरे लोकपति, घरकी न चरचा चालहीं |

तुलसी तपत तिहु ताप जग, जनु प्रभुछठी-छाया लहीं ||

स्रोत: गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास · सार्वजनिक सम्पदा  ·  सम्पूर्ण गीतावली में पढ़ें →