श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

बालकाण्ड · भाग १

गीतावली · बालकाण्ड · भाग १
पद १

आज सुदिन सुभ घरी सुहाई

राग आसावरी

आजु सुदिन सुभ घरी सुहाई |

रूप-सील-गुन-धाम राम नृप-भवन प्रगट भए आई ||

अति पुनीत मधुमास, लगन-ग्रह-बार-जोग-समुदाई |

हरषवन्त चर-अचर, भूमिसुर-तनरुह पुलक जनाई ||

बरषहिं बिबुध-निकर कुसुमावलि, नभ दुन्दुभी बजाई |

कौसल्यादि मातु मन हरषित, यह सुख बरनि न जाई ||

सुनि दसरथ सुत-जनम लिये सब गुरुजन बिप्र बोलाई |

बेद-बिहित करि क्रिया परम सुचि, आनँद उर न समाई ||

सदन बेद-धुनि करत मधुर मुनि, बहु बिधि बाज बधाई |

पुरबासिन्ह प्रिय-नाथ-हेतु निज-निज सम्पदा लुटाई ||

मनि-तोरन, बहु केतुपताकनि, पुरी रुचिर करि छाई |

मागध-सूत द्वार बन्दीजन जहँ तहँ करत बड़ाई ||

सहज सिङ्गार किये बनिता चलीं मङ्गल बिपुल बनाई |

गावहिं देहिं असीस मुदित, चिर जिवौ तनय सुखदाई ||

बीथिन्ह कुङ्कम-कीच, अरगजा अगर अबीर उड़ाई |

नाचहिं पुर-नर-नारि प्रेम भरि देहदसा बिसराई ||

अमित धेनु-गज-तुरग-बसन-मनि, जातरुप अधिकाई |

देत भूप अनुरुप जाहि जोइ, सकल सिद्धि गृह आई ||

सुखी भए सुर-सन्त-भूमिसुर, खलगन-मन मलिनाई |

सबै सुमन बिकसत रबि निकसत, कुमुद-बिपिन बिलखाई ||

जो सुखसिन्धु-सकृत-सीकर तें सिव-बिरञ्चि-प्रभुताई |

सोइ सुख अवध उमँगि रह्यो दस दिसि, कौन जतन कहौं गाई ||

जे रघुबीर-चरन-चिन्तक, तिन्हकी गति प्रगट दिखाई |

अबिरल अमल अनुप भगति दृढ़ तुलसिदास तब पाई ||

पद २

सहेली सुनु सोहिलो रे

राग जैतश्री

सहेली सुनु सोहिलो रे |

सोहिलो, सोहिलो, सोहिलो, सोहिलो सब जग आज |

पूत सपूत कौसिला जायो, अचल भयो कुल-राज ||

चैत चारु नौमी तिथि सितपख, मध्य-गगन-गत भानु |

नखत जोग ग्रह लगन भले दिन मङ्गल-मोद-निधान ||

ब्योम, पवन, पावक, जल, थल, दिसि दसहु सुमङ्गल-मूल|

सुर दुन्दुभी बजावहिं, गावहिं, हरषहिं, बरषहिं फूल ||

भूपति-सदन सोहिलो सुनि बाजैं गहगहे निसान |

जहँ-तहँ सजहिं कलस धुज चामर तोरन केतु बितान ||

सीञ्चि सुगन्ध रचैं चौकें गृह-आँगन गली-बजार |

दल फल फूल दूब दधि रोचन, घर-घर मङ्गलचार ||

सुनि सानन्द उठे दसस्यन्दन सकल समाज समेत |

लिये बोलि गुर-सचिव-भूमिसुर, प्रमुदित चले निकेत ||

जातकरम करि, पूजि पितर-सुर, दिये महिदेवन दान |

तेहि औसर सुत तीनि प्रगट भए मङ्गल, मुद, कल्यान ||

आनँद महँ आनन्द अवध, आनन्द बधावन होइ |

उपमा कहौं चारि फलकी, मोहिं भलो न कहै कबि कोइ ||

सजि आरती बिचित्र थारकर जूथ-जूथ बरनारि |

गावत चलीं बधावन लै लै निज-निज कुल अनुहारि ||

असही दुसही मरहु मनहि मन, बैरिन बढ़हु बिषाद |

नृपसुत चारि चारु चिरजीवहु सङ्कर-गौरि-प्रसाद ||

लै लै ढोव प्रजा प्रमुदित चले भाँति-भाँति भरि भार |

करहिं गान करि आन रायकी, नाचहिं राजदुवार ||

गज, रथ, बाजि, बाहिनी, बाहन सबनि सँवारे साज|

जनु रतिपति ऋतुपति कोसलपुर बिहरत सहित समाज ||

घण्टा-घण्टि, पखाउज-आउज, झाँझ, बेनु डफ-तार |

नूपुर धुनि, मञ्जीर मनोहर, कर कङ्कन-झनकार ||

नृत्य करहिं नट-नटी, नारि-नर अपने-अपने रङ्ग |

मनहुँ मदन-रति बिबिध बेष धरि नटत सुदेस सुढङ्ग ||

उघटहिं छन्द-प्रबन्ध, गीत-पद, राग-तान-बन्धान |

सुनि किन्नर गन्धरब सराहत, बिथके हैं, बिबुध-बिमान ||

कुङ्कुम-अगर-अरगजा छिरकहिं, भरहिं गुलाल-अबीर |

नभ प्रसून झरि, पुरी कोलाहल, भै मन भावति भीर ||

बड़ी बयस बिधि भयो दाहिनो सुर-गुर-आसिरबाद |

दसरथ-सुकृत-सुधासागर सब उमगे हैं तजि मरजाद ||

बाह्मण बेद, बन्दि बिरदावलि, जय-धुनि, मङ्गल-गान |

निकसत पैठत लोग परसपर बोलत लगि लगि कान ||

बारहिं मुकुता-रतन राजमहिषि पुर-सुमुखि समान |

बगरे नगर निछावरि मनिगन जनु जुवारि-जव-धान ||

कीन्हि बेदबिधि लोकरीति नृप, मन्दिर परम हुलास |

कौसल्या, कैकयी, सुमित्रा, रहस-बिबस रनिवास ||

रानिन दिए बसन-मनि-भूषन, राजा सहन-भँडार |

मागध-सूत-भाट-नट-जाचक जहँ तहँ करहिं कबार ||

बिप्रबधू सनमानि सुआसिनि, जन-पुरजन पहिराइ |

सनमाने अवनीस, असीसत ईस-रमेस मनाइ ||

अष्टसिद्धि, नवनिद्धि, भूति सब भूपति भवन कमाहिं |

समौ-समाज राज दसरथको लोकप सकल सिहाहिं ||

को कहि सकै अवधबासिनको प्रेम-प्रमोद-उछाह |

सारद सेस-गनेस-गिरीसहिं अगम निगम अवगाह ||

सिव-बिरञ्चि-मुनि-सिद्ध प्रसंसत, बड़े भूप के भाग |

तुलसिदास प्रभु सोहिलो गावत उमगि-उमगि अनुराग ||

पद ३

आजु महामङ्गल कोसलपुर सुनि नृपके सुत चारि भए

राग बिलावल

आजु महामङ्गल कोसलपुर सुनि नृपके सुत चारि भए |

सदन-सदन सोहिलो सोहावनो, नभ अरु नगर-निसान हए ||

सजि-सजि जान अमर-किन्नर-मुनि जानि समय-सम गान ठए |

नाचहिं नभ अपसरा मुदित मन, पुनि-पुनि बरषहिं सुमन-चए ||

अति सुख बेगि बोलि गुरु भूसुर भूपति भीतर भवन गए |

जातकरम करि कनक, बसन, मनि भूषित सुरभि-समूह दए ||

दल-फल-फूल, दूब-दधि-रोचन, जुबतिन्ह भरि-भरि थार लए |

गावत चलीं भीर भै बीथिन्ह, बन्दिन्ह बाँकुरे बिरद बए ||

कनक-कलस, चामर-पताक-धुज, जहँ तहँ बन्दनवार नए |

भरहिं अबीर, अरगजा छिरकहिं, सकल लोक एक रङ्ग रए ||

उमगि चल्यौ आनन्द लोक तिहुँ, देत सबनि मन्दिर रितए |

तुलसिदास पुनि भरेइ देखियत, रामकृपा चितवनि चितए ||

पद ४

गावैं बिबुध बिमल बर बानी

जैतश्री

गावैं बिबुध बिमल बर बानी |

भुवन-कोटि-कल्यान-कन्द जो, जायो पूत कौसिला रानी ||

मास, पाख, तिति, बार, नखत, ग्रह, जोग, लगन सुभ ठानी |

जल-थल-गगन प्रसन्न साधु-मन, दस दिसि हिय हुलसानी ||

बरषत सुमन, बधाव नगर-नभ, हरष न जात बखानी |

ज्यों हुलास रनिवास नरेसहि, त्यों जनपद रजधानी ||

अमर, नाग, मुनि, मनुज सपरिजन बिगतबिषाद-गलानी |

मिलेहि माँझ रावन रजनीचर लङ्क सङ्क अकुलानी ||

देव-पितर, गुरु-बिप्र पूजि नृप दिये दान रुचि जानी |

मुनि-बनिता, पुरनारि, सुआसिनि सहस भाँति सनमानी ||

पाइ अघाइ असीसत निकसत जाचक-जन भए दानी |

"यों प्रसन्न कैकयी सुमित्रहि होउ महेस-भवानी ||

दिन दूसरे भूप-भामिनि दोउ भईं सुमङ्गल-खानी |

भयो सोहिलो सोहिले मो जनु सृष्टि सोहिले-सानी ||

गावत-नाचत, मो मन भावत, सुख सों अवध अधिकानी |

देत-लेत, पहिरत-पहिरावत प्रजा प्रमोद-अघानी ||

गान-निसान-कुलाहल-कौतुक देखत दुनी सिहानी |

हरि बिरञ्चि-हर-पुर सोभा कुलि कोसलपुरी लोभानी ||

आनँद-अवनि, राजरानी सब माँगहु कोखि जुड़ानी |

आसिष दै दै सराहहिं सादर उमा-रमा-ब्रह्मानी ||

बिभव-बिलास-बाढ़ि दसरथकी देखि न जिनहिं सोहानी |

कीरति, कुसल, भूति, जय, ऋधि-सिधि तिन्हपर सबै कोहानी ||

छठी-बारहौं लोक-बेद-बिधि करि सुबिधान बिधानी |

राम-लषन-रिपुदवन-भरत धरे नाम ललित गुर ग्यानी ||

सुकृत-सुमन तिल-मोद बासि बिधि जतन-जन्त्र भरि घानी |

सुख-सनेह सब दिये दसरथहि खरि खलेल थिर-थानी ||

अनुदिन उदय-उछाह, उमग जग, घर-घर अवध कहानी |

तुलसी राम-जनम-जस गावत सो समाज उर आनी ||

पद ५

घर-घर अवध बधावने मङ्गल-साज-समाज

राग केदारा

घर-घर अवध बधावने मङ्गल-साज-समाज |

सगुन सोहावने मुदित-मन कर सब निज-निज काज ||

निज काज सजत सँवारि पुर-नर-नारि रचना अनगनी |

गृह, अजिर, अटनि, बजार, बीथिन्ह चारु चौकैं बिधि घनी ||

चामर, पताक, बितान, तोरन, कलस, दीपावलि बनी |

सुख-सुकृत-सोभामय पुरी बिधि सुमति जननी जनु जनी ||

चैत चतुरदसि चाँदनी, अमल उदित निसिराज |

उडुगन अवलि प्रकासहीं, उमगत आनँद आज ||

आनन्द उमगत आजु, बिबुध बिमान बिपुल बनाइकै |

गावत, बजावत, नटत, हरषत, सुमन बरषत आइकै ||

नर निरखि नभ, सुर पेखि पुरछबि परसपर सचु पाइकै |

रघुराज-साज सराहि लोचन-लाहु लेत अघाइकै ||

जागिय राम छठी सजनि रजनी रुचिर निहारि |

मङ्गल-मोद-मढ़ी मुरति नृपके बालक चारि ||

मूरति मनोहर चारि बिरचि बिरञ्चि परमारथमई |

अनुरुप भूपति जानि पूजन-जोग बिधि सङ्कर दई ||

तिन्हकी छठी मञ्जुलमठी, जग सरस जिन्हकी सरसई |

किए नीन्द-भामिनि जागरन, अभिरामिनी जामिनि भई ||

सेवक सजग भए समय-साधन सचिव सुजान |

मुनिबर सिखये लौकिकौ बैदिक बिबिध बिधान ||

बैदिक बिधान अनेक लौकिक आचरत सुनि जानिकै |

बलिदान-पूजा मूलिकामनि साधि राखी आनिकै ||

जे देव-देवी सेइयत हित लागि चित सनमानिकै |

ते जन्त्र-मन्त्र सिखाइ राखत सबनिसों पहिचानिकै ||

सकल सुआसिनि, गुरजन, पुरजन, पाहुन लोग |

बिबुध-बिलासिनि, सुर-मुनि, जाचक, जो जेहि जोग ||

जेहि जोग जे तेहि भाँति ते पहिराइ परिपूरन किये |

जय कहत, देत असीस, तुलसीदास ज्यों हुलसत हिये ||

ज्यों आजु कालिहु परहुँ जागन होहिङ्गे, नेवते दिये |

ते धन्य पुन्य-पयोधि जे तेहि समै सुख-जीवन जिये ||

भूपति-भाग बली सुर-बर नाग सराहि सिहाहिं |

तिय-बरबेष अली रमा सिधि अनिमादि कमाहिं ||

अनिमादि, सारद, सैलनन्दिनि बाल लालहि पालहीं |

भरि जनम जे पाए न, ते परितोष उमा-रमा लहीं ||

निज लोक बिसरे लोकपति, घरकी न चरचा चालहीं |

तुलसी तपत तिहु ताप जग, जनु प्रभुछठी-छाया लहीं ||

पद ६

बाजत अवध गहागहे अनन्द-बधाए

राग जैतश्री

बाजत अवध गहागहे अनन्द-बधाए |

नामकरन रघुबरनिके नृप सुदिन सोधाए ||

पाय रजायसु रायको ऋषिराज बोलाए |

सिष्य-सचिव-सेवक-सखा सादर सिर नाए ||

साधु सुमति समरथ सबै सानन्द सिखाए |

जल, दल, फल, मनि-मूलिका, कुलि काज लिखाए ||

गनप-गौरि-हर पूजिकै गोवृन्द दुहाए |

घर-घर मुद मङ्गल महा गुन-गान सुहाए ||

तुरत मुदित जहँ तहँ चले मनके भए भाए |

सुरपति-सासनु घन मनो मारुत मिलि धाए ||

गृह, आँगन, चौहट, गली, बाजार बनाए |

कलस, चँवर, तोरन, धुजा, सुबितान तनाए ||

चित्र चारु चौकैं रचीं, लिखि नाम जनाए |

भरि-भरि सरवर-बापिका अरगजा सनाए ||

नर-नारिन्ह पल चारिमें सब साज सजाए |

दसरथ-पुर छबि आपनी सुरनगर लजाए ||

बिबुध बिमान बनाइकै आनन्दित आए |

हरषि सुमन बरसन लगे, गए धन जनु पाए ||

बरे बिप्र चहुँ बेदके, रबिकुल-गुर ग्यानी |

आपु बसिष्ठ अथरबणी, महिमा जग जानी ||

लोक-रीति बिधि बेदकी करि कह्यो सुबानी-

"सिसु-समेत बेगि बोलिए कौसल्या रानी ||

सुनत सुआसिनि लै चलीं गावत बड़भागीं |

उमा-रमा, सारद-सची लखि सुनि अनुरागीं ||

निज-निज रुचि बेष बिरचिकै हिलि-मिलि सङ्ग लागीं |

तेहि अवसर तिहु लोककी सुदसा जनु जागीं ||

चारु चौक बैठत भई भूप-भामिनी सोहैं |

गोद मोद-मूरति, लिए, सुकृती जन जोहैं ||

सुख-सुखमा, कौतुक कला देखि-सुनि मुनि मोहैं |

सो समाज कहैं बरनिकै, ऐसे कबि को हैं ? ||

लगे पढ़न रच्छा-ऋचा ऋषिराज बिराजे |

गगन सुमन-झरि, जय-जय, बहु बाजन बाजे ||

भए अमङ्गल लङ्कमें, सङ्क-सङ्कट गाजे |

भुवन चारिदसके बड़े दुख-दारिद भाजे ||

बाल बिलोकि अथरबणी हँसि हरहि जनायो |

सुभको सुभ, मोद मोदको, राम नाम सुनायो ||

आलबाल कल कौसिला, दल बरन सोहायो |

कन्द सकल आनन्दको जनु अंकुर आयो ||

जोहि, जानि, जपि जोरिकै करपुट सिर राखे |

"जय जय जय करुनानिधे! सादर सुर भाषे ||

"सत्यसन्ध ! साँचे सदा जे आखर आषे |

प्रनतपाल ! पाए सही, जे फल अभिलाषे ||

भूमिदेव देव देखिकै नरदेव सुखारी |

बोलि सचिव सेवक सखा पटधारि भँडारी ||

देहु जाहि जोइ चाहिए सनमानि सँभारी |

लगे देन हिय हरषिकै हेरि-हेरि हँकारी ||

राम-निछावरि लेनको हठि होत भिखारी |

बहुरि देत तेहि देखिए मानहुँ धनधारी ||

भरत लषन रिपुदवनहूँ धरे नाम बिचारी |

फलदायक फल चारिके दसरथ-सुत चारी ||

भए भूप बालकनिके नाम निरुपम नीके |

सबै सोच-सङ्कट मिटे तबतें पुर-तीके ||

सुफल मनोरथ बिधि किए सब बिधि सबहीके |

अब होइहै गाए सुने सबके तुलसीके ||

पद ७

सुभग सेज सोभित कौसिल्या रुचिर राम-सिसु गोद लिये

राग बिलावल

सुभग सेज सोभित कौसिल्या रुचिर राम-सिसु गोद लिये |

बार-बार बिधुबदन बिलोकति लोचन चारु चकोर किये ||

कबहुँ पौढ़ि पयपान करावति, कबहूँ राखति लाइ हिये |

बालकेलि गावति हलरावति, पुलकति प्रेम-पियूष पिये ||

बिधि-महेस, मुनि-सुर सिहात सब, देखत अंबुद ओट दिये |

तुलसिदास ऐसो सुख रघुपति पै काहू तो पायो न बिये ||

पद ८

ह्वै हौ लाल कबहिं बड़े बलि मैया

राग सोरठा

ह्वै हौ लाल कबहिं बड़े बलि मैया |

राम लखन भावते भरत-रिपुदवन चारु चार्यो भैया ||

बाल बिभूषन बसन मनोहर अंगनि बिरचि बनैहों |

सोभा निरखि, निछावरि करि, उर लाइ बारने जैहों ||

छगन-मगन अँगना खेलिहौ मिलि, ठुमुकु-ठुमुकु कब धैहौ |

कलबल बचन तोतरे मञ्जुल कहि "माँ मोहिं बुलैहौ ||

पुरजन-सचिव, राउ-रानी सब, सेवक-सखा-सहेली |

लैहैं लोचन लाहु सुफल लखि ललित मनोरथ-बेली ||

जा सुखकी लालसा लटू सिव, सुक-सनकादि उदासी |

तुलसी तेहि सुखसिन्धु कौसिला मगन, पै प्रेम-पियासी ||

पगनि कब चलिहौ चारौ भैया ?

प्रेम-पुलकि, उर लाइ सुवन सब, कहति सुमित्रा मैया ||

सुन्दर तनु सिसु-बसन-बिभुषन नखसिख निरखि निकैया |

दलि तृन, प्रान निछावरि करि करि लैहैं मातु बलैया ||

किलकनि, नटनि, चलनि,चितवनि, भजि मिलनि मनोहर तैया |

मनि-खम्भनि-प्रतिबिम्ब झलक, छबि छलकिहै भरि अँगनैया ||

बालबिनोद, मोद मञ्जुल बिधु, लीला ललित जुन्हैया |

भूपति पुन्य-पयोधि उमँग, घर-घर आनन्द-बधैया ||

ह्वै हैं सकल सुकृत-सुख-भाजन, लोचन-लाहु लुटैया |

अनायास पाइहैं जनमफल तोतरें बचन सुनैया ||

भरत, राम, रिपुदवन, लषनके चरित-सरित अन्हवैया |

तुलसी तबके-से अजहुँ जानिबे रघुबर-नगर-बसैया ||

पद ९

चुपरि उबटि अनाहवाइकै नयन आँजे

राग केदारा

चुपरि उबटि अनाहवाइकै नयन आँजे,

चिर रुचि तिलक गोरोचनको कियो है |

भ्रूपर अनूप मसिबिन्दु, बारे बारे बार

बिलसत सीसपर, हेरि हरै हियो है ||

मोदभरी गोद लिये लालति सुमित्रा देखि

देव कहैं, सबको सुकृत उपवियो है |

मातु, पितु, प्रिय, परिजन, पुरजन धन्य,

पुन्यपुञ्ज पेखि पेखि प्रेमरस पियो है ||

लोहित ललित लघु चरन-कमल चारु,

चाल चाहि सो छबि सुकबि जिय जियो है |

बालकेलि बातबस झलकि झलमलत

सोभाकी दीयटि मानो रुप-दीप दियो है ||

राम-सिसु सानुज चरित चारु गाइ-सुनि

सुजन सादर जनम-लाहु लियो है |

तुलसी बिहाइ दसरथ दसचारिपुर

ऐसे सुख जोग बिधि बिरच्यो न बियो है ||

राम-सिसु गोद महामोद भरे दसरथ,

कौसिलाहु ललकि लषनलाल लये हैं |

भरत सुमित्रा लये, कैकयी सत्रुसमन,

तन प्रेम-पुलक मगन मन भये हैं ||

मेढ़ी लटकन मनि-कनक-रचित, बाल-

भूषन बनाइ आछे अंग अंग ठये हैं |

चाहि चुचुकारि चूमि लालत लावत उर

तैसे फल पावत जैसे सुबीज बये हैं ||

घन-ओट बिबुध बिलोकि बरषत फूल

अनुकूल बचन कहत नेह नये हैं |

ऐसे पितु, मातु, पूत, त्रिय, परिजन बिधि

जानियत आयु भरि येई निरमये हैं ||

"अजर अमर होहु, "करौ हरिहर छोहु

जरठ जठेरिन्ह आसिरबाद दये हैं |

तुलसी सराहैं भाग तिन्हके, जिन्हके हिये

डिम्भ-राम-रुप-अनुराग रङ्ग रये हैं ||

पद १०

आजु अनरसे हैं भोरके, पय पियत न नीके

राग आसावरी

"आजु अनरसे हैं भोरके, पय पियत न नीके |

रहत न बैठे, ठाढ़े, पालने झुलावत हू, रोवत राम मेरो

सो सोच सबहीके ||

देव, पितर, ग्रह पूजिये तुला तौलिये घीके |

तदपि कबहुँ कबहुँक सखी ऐसेहि अरत जब

परत दृष्टि दुष्ट तीके ||

बेगि बोलि कुलगुर, छुऔ माथे हाथ अमीके |

सुनत आइ ऋषि कुस हरे नरसिंह मन्त्र पढ़े, जो

सुमिरत भय भीके ||

जासु नाम सरबस सदासिव-पारबतीके |

ताहि झरावति कौसिला, यह रीति प्रीतिकी हिय

हुलसति तुलसीके ||

माथे हाथ ऋषि जब दियो राम किलकन लागे |

महिमा समुझि, लीला बिलोकि गुरु सजल नयन, तनु पुलक,

रोम रोम जागे ||

लिये गोद, धाए गोदतें, मोद मुनि मन अनुरागे |

निरखि मातु हरषी हिये आली-ओट कहति मृदु बचन

प्रेमके-से पागे ||

तुम्ह सुरतरु रघुबंसके, देत अभिमत माँगे |

मेरे बिसेषि गति रावरी, तुलसी प्रसाद जाके सकल

अमङ्गल भागे ||

अमिय-बिलोकनि करि कृपा मुनिबर जब जोए |

तबतें राम अरु भरत, लषन, रिपुदवन, सुमुख सखि, सकल

सुवन सुख सोए ||

सुमित्रा लाय हिये फनि मनि ज्यों गोए |

तुलसी नेवछावरि करति मातु अतिप्रेम-मगन-मन,

सजल सुलोचन कोये ||

मातु सकल, कुल-गुर-बधू, प्रिय सखी सुहाई |

सादर सब मङ्गल किए महि-मनि-महेस पर

सबनि सुधेनु दुहाई ||

बोलि भूपभूसुर लिये अति बिनय बड़ाई |

पूजि पायँ, सनमानि, दान दिये, लहि असीस, सुनि

बरषैं सुमन सुरसाईँ ||

घर-घर पुर बाजन लगीं आनन्द-बधाई |

सुख-सनेह तेहि समयको तुलसी जानै जाको चोर्यो

है चित चहुँ भाई ||

पद ११

या सिसुके गुन नाम-बड़ाई

राग धनाश्री

या सिसुके गुन नाम-बड़ाई |

को कहि सकै, सुनहु नरपति, श्रीपति समान प्रभुताई ||

जद्यपि बुधि, बय, रुप, सील, गुन समै चारु चार्यो भाई |

तदपि लोक-लोचन-चकोर-ससि राम भगत-सुखदाई ||

सुर, नर, मुनि करि अभय, दनुज हति, हरहि, धरनि गरुआई |

कीरति बिमल बिस्व-अघमोचनि रहिहि सकल जग छाई ||

याके चरन-सरोज कपट तजि जे भजिहै मन लाई |

ते कुल जुगल सहित तरिहैं भव, यह न कछू अधिकाई ||

सुनि गुरबचन पुलक तन दम्पति, हरष न हृदय समाई |

तुलसिदास अवलोकि मातु-मुख प्रभु मनमें मुसुकाई ||

पद १२

अवध आजु आगमी एकु आयो

राग बिलावल

अवध आजु आगमी एकु आयो |

करतल निरखि कहत सब गुनगन, बहुतन्ह परिचौ पायो ||

बूढ़ो बड़ो प्रमानिक ब्राह्मन सङ्कर नाम सुहायो |

सँग सिसुसिष्य, सुनत कौसल्या भीतर भवन बुलायो ||

पायँ पखारि, पूजि दियो आसन असन बसन पहिरायो |

मेले चरन चारु चार्यो सुत माथे हाथ दिवायो ||

नखसिख बाल बिलोकि बिप्रतनु पुलक, नयन जल छायो |

लै लै गोद कमल-कर निरखत, उर प्रमोद न अमायो ||

जनम प्रसङ्ग कह्यो कौसिक मिस सीय-स्वयम्बर गायो |

राम, भरत, रिपुदवन, लखनको जय सुख सुजस सुनायो ||

तुलसिदास रनिवास रहसबस, भयो सबको मन भायो |

सनमान्यो महिदेव असीसत सानँद सदन सिधायो ||

पद १३

पौढ़िये लालन, पालने हौं झुलावौं

राग केदारा

पौढ़िये लालन, पालने हौं झुलावौं |

कर पद मुख चखकमल लसत लखि लोचन-भँवर भुलावौं ||

बाल-बिनोद-मोद-मञ्जुलमनि किलकनि-खानि खुलावौं |

तेइ अनुराग ताग गुहिबे कहँ मति मृगनयनि बुलावौं ||

तुलसी भनित भली भामिनि उर सो पहिराइ फुलावौं |

चारु चरित रघुबर तेरे तेहि मिलि गाइ चरन चितु लावौं ||

सोइये लाल लाडिले रघुराई |

मगन मोद लिये गोद सुमित्रा बार बार बलि जाई ||

हँसे हँसत, अनरसे अनरसत प्रतिबिम्बनि ज्यों झाँई |

तुम सबके जीवनके जीवन, सकल सुमङ्गलदाई ||

मूल मूल सुरबीथि-बेलि, तम-तोम सुदल अधिकाई |

नखत-सुमन, नभ-बिटप बौण्डि मानो छपा छिटकि छबि छाई ||

हौ जँभात, अलसात, तात! तेरी बानि जानि मैं पाई |

गाइ गाइ हलराइ बोलिहौं सुख नीन्दरी सुहाई ||

बछरु, छबीलो छगनमगन मेरे, कहति मल्हाइ मल्हाई |

सानुज हिय हुलसति तुलसीके प्रभुकी ललित लरिकाई ||

ललन लोने लेरुआ, बलि मैया |

सुख सोइए नीन्द-बेरिया भई, चारु-चरित चार्यो भैया ||

कहति मल्हाइ लाइ उर छिन-छिन, "छगन छबीले छोटे छैया |

मोद-कन्द कुल कुमुद-चन्द्र मेरे रामचन्द्र रघुरैया||

रघुबर बालकेलि सन्तनकी सुभग सुभद सुरगैया |

तुलसी दुहि पीवत सुख जीवत पय सप्रेम घनी घैया ||

सुखनीन्द कहति आलि आइहौं |

राम, लखन, रिपुदवन, भरत सिसु करि सब सुमुख सोआइहौं ||

रोवनि, धोवनि, अनखानि, अनरसनि, डिठि-मुठि निठुर नसाइहौं |

हँसनि, खेलनि, किलकनि, आनन्दनि भूपति-भवन बसाइहौं ||

गोद बिनोद-मोदमय मूरति हरषि हरषि हलराइहौं |

तनु तिल तिल करि, बारि रामपर, लेहौं रोग बलाइहौं ||

रानी-राउ सहित सुत परिजन निरखि नयन-फल पाइहौं |

चारु चरित रघुबंस-तिलकके तहँ तुलसी मिलि गाइहौं ||

पद १४

कनक-रतनमय पालनो रच्यो मनहुँ मार-सुतहार

राग आसावरी

कनक-रतनमय पालनो रच्यो मनहुँ मार-सुतहार |

बिबिध खेलौना, किङ्किनी, लागे मञ्जुल मुकुताहार ||

रघुकुल-मण्डन राम लला ||

जननि उबटि, अन्हवाइकै, मनिभूषन सजि लिये गोद |

पौढ़ाए पटु पालने, सिसु निरखि मगन मन मोद ||

दसरथनन्दन राम लला ||

मदन, मोरकै चन्दकी झलकनि, निदरति तनु जोति |

नील कमल, मनि जलदकी उपमा कहे लघु मति होति ||

मातु-सुकृत-फल राम लला ||

लघु, लघु लोहित ललिक हैं पद, पानि, अधर एक रङ्ग |

को कबि जो छबि कहि सकै नखसिख सुन्दर सब अंग ||

परिजन-रञ्जन राम लला ||

पग नूपुर कटि किङ्किनी, कर-कञ्जनि पहुँची मञ्जु |

हिय हरि नख अदभुत बन्यो मानो मनसिज मनि-गन-गञ्जु ||

पुरजन-सिरमनि राम लला ||

लोयन नील सरोजसे, भ्रूपर मसिबिन्दु बिराज |

जनु बिधु-मुख-छबि-अमियको रच्छक राखै रसराज ||

सोभासागर राम लला ||

गभुआरी अलकावली लसै, लटकन ललित ललाट |

जनु उडुगन बिधु मिलनको चले तम बिदारि करि बाट ||

सहज सोहावनो राम लला ||

देखि खेलौना किलकहीं, पद पानि बिलोचन लोल |

बिचित्र बिहँग अलि-जलज ज्यों सुखमा-सर करत कलोल ||

भगत-कलपतरु राम लला ||

बाल-बोल बिनु अरथके सुनि देत पदारथ चारि |

जनु इन्ह बचनन्हितें भए सुरतरु तापस त्रिपुरारि ||

नाम-कामधुक राम लला ||

सखी सुमित्रा वारहीं मनि भूषन बसन बिभाग |

मधुर झुलाइ मल्हावहीं गावैं उमँगि उमँगि अनुराग ||

हैं जग-मङ्गल राम लला ||

मोती जायो सीपमें अरु अदिति जन्यो जग-भानु |

रघुपति जायो कौसिला गुन-मङ्गल-रूप-निधान ||

भुवन-बिभूषन राम लला ||

राम प्रगट जबतें भए गए सकल अमङ्गल-मूल |

मीत मुदित, हित उदित हैं, नित बैरिनके चित सूल ||

भव-भय-भञ्जन राम लला ||

अनुज-सखा-सिसु सङ्ग लै खेलन जैहैं चौगान |

लङ्का खरभर परैगी, सुरपुर बाजिहैं निसान ||

रिपुगन-गञ्जन राम लला ||

राम अहेरे चलहिङ्गे जब गज रथ बाजि सँवारि |

दसकन्धर उर धुकधुकी अब जनि धावै धनु-धारि ||

अरि-करि-केहरि राम लला ||

गीत सुमित्रा सखिन्हकै सुनि सुनि सुर मुनि अनुकूल |

दै असीस जय जय कहैं हरषैं बरषैं फूल ||

सुर-सुखदायक राम लला ||

बालचरितमय चन्द्रमा यह सोरह-कला-निधान |

चित-चकोर तुलसी कियो कर प्रेम-अमिय-रसपान ||

तुलसीको जीवन राम लला ||

पद १५

पालने रघुपति झुलावै

राग कान्हरा

पालने रघुपति झुलावै |

लै लै नाम सप्रेम सरस स्वर कौसल्या कल कीरति गावै ||

केकिकण्ठ दुति स्यामबरन बपु, बाल-बिभूषन बिरचि बनाए |

अलकैं कुटिल, ललित लटकनभ्रू, नील नलिन दोउ नयन सुहाए ||

सिसु-सुभाय सोहत जब कर गहि बदन निकट पदपल्लव लाए |

मनहुँ सुभग जुग भुजग जलज भरि लेत सुधा ससि सों सचु पाए ||

उपर अनूप बिलोकि खेलौना किलकत पुनि-पुनि पानि पसारत |

मनहुँ उभय अंभोज अरुन सों बिधु-भय बिनय करत अति आरत ||

तुलसिदास बहु बास बिबस अलि गुञ्जत, सुछबि न जाति बखानी |

मनहुँ सकल श्रुति ऋचा मधुप ह्वै बिसद सुजस बरनत बर बानी ||