बालकाण्ड · भाग १
आज सुदिन सुभ घरी सुहाई
आजु सुदिन सुभ घरी सुहाई |
रूप-सील-गुन-धाम राम नृप-भवन प्रगट भए आई ||
अति पुनीत मधुमास, लगन-ग्रह-बार-जोग-समुदाई |
हरषवन्त चर-अचर, भूमिसुर-तनरुह पुलक जनाई ||
बरषहिं बिबुध-निकर कुसुमावलि, नभ दुन्दुभी बजाई |
कौसल्यादि मातु मन हरषित, यह सुख बरनि न जाई ||
सुनि दसरथ सुत-जनम लिये सब गुरुजन बिप्र बोलाई |
बेद-बिहित करि क्रिया परम सुचि, आनँद उर न समाई ||
सदन बेद-धुनि करत मधुर मुनि, बहु बिधि बाज बधाई |
पुरबासिन्ह प्रिय-नाथ-हेतु निज-निज सम्पदा लुटाई ||
मनि-तोरन, बहु केतुपताकनि, पुरी रुचिर करि छाई |
मागध-सूत द्वार बन्दीजन जहँ तहँ करत बड़ाई ||
सहज सिङ्गार किये बनिता चलीं मङ्गल बिपुल बनाई |
गावहिं देहिं असीस मुदित, चिर जिवौ तनय सुखदाई ||
बीथिन्ह कुङ्कम-कीच, अरगजा अगर अबीर उड़ाई |
नाचहिं पुर-नर-नारि प्रेम भरि देहदसा बिसराई ||
अमित धेनु-गज-तुरग-बसन-मनि, जातरुप अधिकाई |
देत भूप अनुरुप जाहि जोइ, सकल सिद्धि गृह आई ||
सुखी भए सुर-सन्त-भूमिसुर, खलगन-मन मलिनाई |
सबै सुमन बिकसत रबि निकसत, कुमुद-बिपिन बिलखाई ||
जो सुखसिन्धु-सकृत-सीकर तें सिव-बिरञ्चि-प्रभुताई |
सोइ सुख अवध उमँगि रह्यो दस दिसि, कौन जतन कहौं गाई ||
जे रघुबीर-चरन-चिन्तक, तिन्हकी गति प्रगट दिखाई |
अबिरल अमल अनुप भगति दृढ़ तुलसिदास तब पाई ||
सहेली सुनु सोहिलो रे
सहेली सुनु सोहिलो रे |
सोहिलो, सोहिलो, सोहिलो, सोहिलो सब जग आज |
पूत सपूत कौसिला जायो, अचल भयो कुल-राज ||
चैत चारु नौमी तिथि सितपख, मध्य-गगन-गत भानु |
नखत जोग ग्रह लगन भले दिन मङ्गल-मोद-निधान ||
ब्योम, पवन, पावक, जल, थल, दिसि दसहु सुमङ्गल-मूल|
सुर दुन्दुभी बजावहिं, गावहिं, हरषहिं, बरषहिं फूल ||
भूपति-सदन सोहिलो सुनि बाजैं गहगहे निसान |
जहँ-तहँ सजहिं कलस धुज चामर तोरन केतु बितान ||
सीञ्चि सुगन्ध रचैं चौकें गृह-आँगन गली-बजार |
दल फल फूल दूब दधि रोचन, घर-घर मङ्गलचार ||
सुनि सानन्द उठे दसस्यन्दन सकल समाज समेत |
लिये बोलि गुर-सचिव-भूमिसुर, प्रमुदित चले निकेत ||
जातकरम करि, पूजि पितर-सुर, दिये महिदेवन दान |
तेहि औसर सुत तीनि प्रगट भए मङ्गल, मुद, कल्यान ||
आनँद महँ आनन्द अवध, आनन्द बधावन होइ |
उपमा कहौं चारि फलकी, मोहिं भलो न कहै कबि कोइ ||
सजि आरती बिचित्र थारकर जूथ-जूथ बरनारि |
गावत चलीं बधावन लै लै निज-निज कुल अनुहारि ||
असही दुसही मरहु मनहि मन, बैरिन बढ़हु बिषाद |
नृपसुत चारि चारु चिरजीवहु सङ्कर-गौरि-प्रसाद ||
लै लै ढोव प्रजा प्रमुदित चले भाँति-भाँति भरि भार |
करहिं गान करि आन रायकी, नाचहिं राजदुवार ||
गज, रथ, बाजि, बाहिनी, बाहन सबनि सँवारे साज|
जनु रतिपति ऋतुपति कोसलपुर बिहरत सहित समाज ||
घण्टा-घण्टि, पखाउज-आउज, झाँझ, बेनु डफ-तार |
नूपुर धुनि, मञ्जीर मनोहर, कर कङ्कन-झनकार ||
नृत्य करहिं नट-नटी, नारि-नर अपने-अपने रङ्ग |
मनहुँ मदन-रति बिबिध बेष धरि नटत सुदेस सुढङ्ग ||
उघटहिं छन्द-प्रबन्ध, गीत-पद, राग-तान-बन्धान |
सुनि किन्नर गन्धरब सराहत, बिथके हैं, बिबुध-बिमान ||
कुङ्कुम-अगर-अरगजा छिरकहिं, भरहिं गुलाल-अबीर |
नभ प्रसून झरि, पुरी कोलाहल, भै मन भावति भीर ||
बड़ी बयस बिधि भयो दाहिनो सुर-गुर-आसिरबाद |
दसरथ-सुकृत-सुधासागर सब उमगे हैं तजि मरजाद ||
बाह्मण बेद, बन्दि बिरदावलि, जय-धुनि, मङ्गल-गान |
निकसत पैठत लोग परसपर बोलत लगि लगि कान ||
बारहिं मुकुता-रतन राजमहिषि पुर-सुमुखि समान |
बगरे नगर निछावरि मनिगन जनु जुवारि-जव-धान ||
कीन्हि बेदबिधि लोकरीति नृप, मन्दिर परम हुलास |
कौसल्या, कैकयी, सुमित्रा, रहस-बिबस रनिवास ||
रानिन दिए बसन-मनि-भूषन, राजा सहन-भँडार |
मागध-सूत-भाट-नट-जाचक जहँ तहँ करहिं कबार ||
बिप्रबधू सनमानि सुआसिनि, जन-पुरजन पहिराइ |
सनमाने अवनीस, असीसत ईस-रमेस मनाइ ||
अष्टसिद्धि, नवनिद्धि, भूति सब भूपति भवन कमाहिं |
समौ-समाज राज दसरथको लोकप सकल सिहाहिं ||
को कहि सकै अवधबासिनको प्रेम-प्रमोद-उछाह |
सारद सेस-गनेस-गिरीसहिं अगम निगम अवगाह ||
सिव-बिरञ्चि-मुनि-सिद्ध प्रसंसत, बड़े भूप के भाग |
तुलसिदास प्रभु सोहिलो गावत उमगि-उमगि अनुराग ||
आजु महामङ्गल कोसलपुर सुनि नृपके सुत चारि भए
आजु महामङ्गल कोसलपुर सुनि नृपके सुत चारि भए |
सदन-सदन सोहिलो सोहावनो, नभ अरु नगर-निसान हए ||
सजि-सजि जान अमर-किन्नर-मुनि जानि समय-सम गान ठए |
नाचहिं नभ अपसरा मुदित मन, पुनि-पुनि बरषहिं सुमन-चए ||
अति सुख बेगि बोलि गुरु भूसुर भूपति भीतर भवन गए |
जातकरम करि कनक, बसन, मनि भूषित सुरभि-समूह दए ||
दल-फल-फूल, दूब-दधि-रोचन, जुबतिन्ह भरि-भरि थार लए |
गावत चलीं भीर भै बीथिन्ह, बन्दिन्ह बाँकुरे बिरद बए ||
कनक-कलस, चामर-पताक-धुज, जहँ तहँ बन्दनवार नए |
भरहिं अबीर, अरगजा छिरकहिं, सकल लोक एक रङ्ग रए ||
उमगि चल्यौ आनन्द लोक तिहुँ, देत सबनि मन्दिर रितए |
तुलसिदास पुनि भरेइ देखियत, रामकृपा चितवनि चितए ||
गावैं बिबुध बिमल बर बानी
जैतश्री
गावैं बिबुध बिमल बर बानी |
भुवन-कोटि-कल्यान-कन्द जो, जायो पूत कौसिला रानी ||
मास, पाख, तिति, बार, नखत, ग्रह, जोग, लगन सुभ ठानी |
जल-थल-गगन प्रसन्न साधु-मन, दस दिसि हिय हुलसानी ||
बरषत सुमन, बधाव नगर-नभ, हरष न जात बखानी |
ज्यों हुलास रनिवास नरेसहि, त्यों जनपद रजधानी ||
अमर, नाग, मुनि, मनुज सपरिजन बिगतबिषाद-गलानी |
मिलेहि माँझ रावन रजनीचर लङ्क सङ्क अकुलानी ||
देव-पितर, गुरु-बिप्र पूजि नृप दिये दान रुचि जानी |
मुनि-बनिता, पुरनारि, सुआसिनि सहस भाँति सनमानी ||
पाइ अघाइ असीसत निकसत जाचक-जन भए दानी |
"यों प्रसन्न कैकयी सुमित्रहि होउ महेस-भवानी ||
दिन दूसरे भूप-भामिनि दोउ भईं सुमङ्गल-खानी |
भयो सोहिलो सोहिले मो जनु सृष्टि सोहिले-सानी ||
गावत-नाचत, मो मन भावत, सुख सों अवध अधिकानी |
देत-लेत, पहिरत-पहिरावत प्रजा प्रमोद-अघानी ||
गान-निसान-कुलाहल-कौतुक देखत दुनी सिहानी |
हरि बिरञ्चि-हर-पुर सोभा कुलि कोसलपुरी लोभानी ||
आनँद-अवनि, राजरानी सब माँगहु कोखि जुड़ानी |
आसिष दै दै सराहहिं सादर उमा-रमा-ब्रह्मानी ||
बिभव-बिलास-बाढ़ि दसरथकी देखि न जिनहिं सोहानी |
कीरति, कुसल, भूति, जय, ऋधि-सिधि तिन्हपर सबै कोहानी ||
छठी-बारहौं लोक-बेद-बिधि करि सुबिधान बिधानी |
राम-लषन-रिपुदवन-भरत धरे नाम ललित गुर ग्यानी ||
सुकृत-सुमन तिल-मोद बासि बिधि जतन-जन्त्र भरि घानी |
सुख-सनेह सब दिये दसरथहि खरि खलेल थिर-थानी ||
अनुदिन उदय-उछाह, उमग जग, घर-घर अवध कहानी |
तुलसी राम-जनम-जस गावत सो समाज उर आनी ||
घर-घर अवध बधावने मङ्गल-साज-समाज
घर-घर अवध बधावने मङ्गल-साज-समाज |
सगुन सोहावने मुदित-मन कर सब निज-निज काज ||
निज काज सजत सँवारि पुर-नर-नारि रचना अनगनी |
गृह, अजिर, अटनि, बजार, बीथिन्ह चारु चौकैं बिधि घनी ||
चामर, पताक, बितान, तोरन, कलस, दीपावलि बनी |
सुख-सुकृत-सोभामय पुरी बिधि सुमति जननी जनु जनी ||
चैत चतुरदसि चाँदनी, अमल उदित निसिराज |
उडुगन अवलि प्रकासहीं, उमगत आनँद आज ||
आनन्द उमगत आजु, बिबुध बिमान बिपुल बनाइकै |
गावत, बजावत, नटत, हरषत, सुमन बरषत आइकै ||
नर निरखि नभ, सुर पेखि पुरछबि परसपर सचु पाइकै |
रघुराज-साज सराहि लोचन-लाहु लेत अघाइकै ||
जागिय राम छठी सजनि रजनी रुचिर निहारि |
मङ्गल-मोद-मढ़ी मुरति नृपके बालक चारि ||
मूरति मनोहर चारि बिरचि बिरञ्चि परमारथमई |
अनुरुप भूपति जानि पूजन-जोग बिधि सङ्कर दई ||
तिन्हकी छठी मञ्जुलमठी, जग सरस जिन्हकी सरसई |
किए नीन्द-भामिनि जागरन, अभिरामिनी जामिनि भई ||
सेवक सजग भए समय-साधन सचिव सुजान |
मुनिबर सिखये लौकिकौ बैदिक बिबिध बिधान ||
बैदिक बिधान अनेक लौकिक आचरत सुनि जानिकै |
बलिदान-पूजा मूलिकामनि साधि राखी आनिकै ||
जे देव-देवी सेइयत हित लागि चित सनमानिकै |
ते जन्त्र-मन्त्र सिखाइ राखत सबनिसों पहिचानिकै ||
सकल सुआसिनि, गुरजन, पुरजन, पाहुन लोग |
बिबुध-बिलासिनि, सुर-मुनि, जाचक, जो जेहि जोग ||
जेहि जोग जे तेहि भाँति ते पहिराइ परिपूरन किये |
जय कहत, देत असीस, तुलसीदास ज्यों हुलसत हिये ||
ज्यों आजु कालिहु परहुँ जागन होहिङ्गे, नेवते दिये |
ते धन्य पुन्य-पयोधि जे तेहि समै सुख-जीवन जिये ||
भूपति-भाग बली सुर-बर नाग सराहि सिहाहिं |
तिय-बरबेष अली रमा सिधि अनिमादि कमाहिं ||
अनिमादि, सारद, सैलनन्दिनि बाल लालहि पालहीं |
भरि जनम जे पाए न, ते परितोष उमा-रमा लहीं ||
निज लोक बिसरे लोकपति, घरकी न चरचा चालहीं |
तुलसी तपत तिहु ताप जग, जनु प्रभुछठी-छाया लहीं ||
बाजत अवध गहागहे अनन्द-बधाए
बाजत अवध गहागहे अनन्द-बधाए |
नामकरन रघुबरनिके नृप सुदिन सोधाए ||
पाय रजायसु रायको ऋषिराज बोलाए |
सिष्य-सचिव-सेवक-सखा सादर सिर नाए ||
साधु सुमति समरथ सबै सानन्द सिखाए |
जल, दल, फल, मनि-मूलिका, कुलि काज लिखाए ||
गनप-गौरि-हर पूजिकै गोवृन्द दुहाए |
घर-घर मुद मङ्गल महा गुन-गान सुहाए ||
तुरत मुदित जहँ तहँ चले मनके भए भाए |
सुरपति-सासनु घन मनो मारुत मिलि धाए ||
गृह, आँगन, चौहट, गली, बाजार बनाए |
कलस, चँवर, तोरन, धुजा, सुबितान तनाए ||
चित्र चारु चौकैं रचीं, लिखि नाम जनाए |
भरि-भरि सरवर-बापिका अरगजा सनाए ||
नर-नारिन्ह पल चारिमें सब साज सजाए |
दसरथ-पुर छबि आपनी सुरनगर लजाए ||
बिबुध बिमान बनाइकै आनन्दित आए |
हरषि सुमन बरसन लगे, गए धन जनु पाए ||
बरे बिप्र चहुँ बेदके, रबिकुल-गुर ग्यानी |
आपु बसिष्ठ अथरबणी, महिमा जग जानी ||
लोक-रीति बिधि बेदकी करि कह्यो सुबानी-
"सिसु-समेत बेगि बोलिए कौसल्या रानी ||
सुनत सुआसिनि लै चलीं गावत बड़भागीं |
उमा-रमा, सारद-सची लखि सुनि अनुरागीं ||
निज-निज रुचि बेष बिरचिकै हिलि-मिलि सङ्ग लागीं |
तेहि अवसर तिहु लोककी सुदसा जनु जागीं ||
चारु चौक बैठत भई भूप-भामिनी सोहैं |
गोद मोद-मूरति, लिए, सुकृती जन जोहैं ||
सुख-सुखमा, कौतुक कला देखि-सुनि मुनि मोहैं |
सो समाज कहैं बरनिकै, ऐसे कबि को हैं ? ||
लगे पढ़न रच्छा-ऋचा ऋषिराज बिराजे |
गगन सुमन-झरि, जय-जय, बहु बाजन बाजे ||
भए अमङ्गल लङ्कमें, सङ्क-सङ्कट गाजे |
भुवन चारिदसके बड़े दुख-दारिद भाजे ||
बाल बिलोकि अथरबणी हँसि हरहि जनायो |
सुभको सुभ, मोद मोदको, राम नाम सुनायो ||
आलबाल कल कौसिला, दल बरन सोहायो |
कन्द सकल आनन्दको जनु अंकुर आयो ||
जोहि, जानि, जपि जोरिकै करपुट सिर राखे |
"जय जय जय करुनानिधे! सादर सुर भाषे ||
"सत्यसन्ध ! साँचे सदा जे आखर आषे |
प्रनतपाल ! पाए सही, जे फल अभिलाषे ||
भूमिदेव देव देखिकै नरदेव सुखारी |
बोलि सचिव सेवक सखा पटधारि भँडारी ||
देहु जाहि जोइ चाहिए सनमानि सँभारी |
लगे देन हिय हरषिकै हेरि-हेरि हँकारी ||
राम-निछावरि लेनको हठि होत भिखारी |
बहुरि देत तेहि देखिए मानहुँ धनधारी ||
भरत लषन रिपुदवनहूँ धरे नाम बिचारी |
फलदायक फल चारिके दसरथ-सुत चारी ||
भए भूप बालकनिके नाम निरुपम नीके |
सबै सोच-सङ्कट मिटे तबतें पुर-तीके ||
सुफल मनोरथ बिधि किए सब बिधि सबहीके |
अब होइहै गाए सुने सबके तुलसीके ||
सुभग सेज सोभित कौसिल्या रुचिर राम-सिसु गोद लिये
सुभग सेज सोभित कौसिल्या रुचिर राम-सिसु गोद लिये |
बार-बार बिधुबदन बिलोकति लोचन चारु चकोर किये ||
कबहुँ पौढ़ि पयपान करावति, कबहूँ राखति लाइ हिये |
बालकेलि गावति हलरावति, पुलकति प्रेम-पियूष पिये ||
बिधि-महेस, मुनि-सुर सिहात सब, देखत अंबुद ओट दिये |
तुलसिदास ऐसो सुख रघुपति पै काहू तो पायो न बिये ||
ह्वै हौ लाल कबहिं बड़े बलि मैया
ह्वै हौ लाल कबहिं बड़े बलि मैया |
राम लखन भावते भरत-रिपुदवन चारु चार्यो भैया ||
बाल बिभूषन बसन मनोहर अंगनि बिरचि बनैहों |
सोभा निरखि, निछावरि करि, उर लाइ बारने जैहों ||
छगन-मगन अँगना खेलिहौ मिलि, ठुमुकु-ठुमुकु कब धैहौ |
कलबल बचन तोतरे मञ्जुल कहि "माँ मोहिं बुलैहौ ||
पुरजन-सचिव, राउ-रानी सब, सेवक-सखा-सहेली |
लैहैं लोचन लाहु सुफल लखि ललित मनोरथ-बेली ||
जा सुखकी लालसा लटू सिव, सुक-सनकादि उदासी |
तुलसी तेहि सुखसिन्धु कौसिला मगन, पै प्रेम-पियासी ||
पगनि कब चलिहौ चारौ भैया ?
प्रेम-पुलकि, उर लाइ सुवन सब, कहति सुमित्रा मैया ||
सुन्दर तनु सिसु-बसन-बिभुषन नखसिख निरखि निकैया |
दलि तृन, प्रान निछावरि करि करि लैहैं मातु बलैया ||
किलकनि, नटनि, चलनि,चितवनि, भजि मिलनि मनोहर तैया |
मनि-खम्भनि-प्रतिबिम्ब झलक, छबि छलकिहै भरि अँगनैया ||
बालबिनोद, मोद मञ्जुल बिधु, लीला ललित जुन्हैया |
भूपति पुन्य-पयोधि उमँग, घर-घर आनन्द-बधैया ||
ह्वै हैं सकल सुकृत-सुख-भाजन, लोचन-लाहु लुटैया |
अनायास पाइहैं जनमफल तोतरें बचन सुनैया ||
भरत, राम, रिपुदवन, लषनके चरित-सरित अन्हवैया |
तुलसी तबके-से अजहुँ जानिबे रघुबर-नगर-बसैया ||
चुपरि उबटि अनाहवाइकै नयन आँजे
चुपरि उबटि अनाहवाइकै नयन आँजे,
चिर रुचि तिलक गोरोचनको कियो है |
भ्रूपर अनूप मसिबिन्दु, बारे बारे बार
बिलसत सीसपर, हेरि हरै हियो है ||
मोदभरी गोद लिये लालति सुमित्रा देखि
देव कहैं, सबको सुकृत उपवियो है |
मातु, पितु, प्रिय, परिजन, पुरजन धन्य,
पुन्यपुञ्ज पेखि पेखि प्रेमरस पियो है ||
लोहित ललित लघु चरन-कमल चारु,
चाल चाहि सो छबि सुकबि जिय जियो है |
बालकेलि बातबस झलकि झलमलत
सोभाकी दीयटि मानो रुप-दीप दियो है ||
राम-सिसु सानुज चरित चारु गाइ-सुनि
सुजन सादर जनम-लाहु लियो है |
तुलसी बिहाइ दसरथ दसचारिपुर
ऐसे सुख जोग बिधि बिरच्यो न बियो है ||
राम-सिसु गोद महामोद भरे दसरथ,
कौसिलाहु ललकि लषनलाल लये हैं |
भरत सुमित्रा लये, कैकयी सत्रुसमन,
तन प्रेम-पुलक मगन मन भये हैं ||
मेढ़ी लटकन मनि-कनक-रचित, बाल-
भूषन बनाइ आछे अंग अंग ठये हैं |
चाहि चुचुकारि चूमि लालत लावत उर
तैसे फल पावत जैसे सुबीज बये हैं ||
घन-ओट बिबुध बिलोकि बरषत फूल
अनुकूल बचन कहत नेह नये हैं |
ऐसे पितु, मातु, पूत, त्रिय, परिजन बिधि
जानियत आयु भरि येई निरमये हैं ||
"अजर अमर होहु, "करौ हरिहर छोहु
जरठ जठेरिन्ह आसिरबाद दये हैं |
तुलसी सराहैं भाग तिन्हके, जिन्हके हिये
डिम्भ-राम-रुप-अनुराग रङ्ग रये हैं ||
आजु अनरसे हैं भोरके, पय पियत न नीके
"आजु अनरसे हैं भोरके, पय पियत न नीके |
रहत न बैठे, ठाढ़े, पालने झुलावत हू, रोवत राम मेरो
सो सोच सबहीके ||
देव, पितर, ग्रह पूजिये तुला तौलिये घीके |
तदपि कबहुँ कबहुँक सखी ऐसेहि अरत जब
परत दृष्टि दुष्ट तीके ||
बेगि बोलि कुलगुर, छुऔ माथे हाथ अमीके |
सुनत आइ ऋषि कुस हरे नरसिंह मन्त्र पढ़े, जो
सुमिरत भय भीके ||
जासु नाम सरबस सदासिव-पारबतीके |
ताहि झरावति कौसिला, यह रीति प्रीतिकी हिय
हुलसति तुलसीके ||
माथे हाथ ऋषि जब दियो राम किलकन लागे |
महिमा समुझि, लीला बिलोकि गुरु सजल नयन, तनु पुलक,
रोम रोम जागे ||
लिये गोद, धाए गोदतें, मोद मुनि मन अनुरागे |
निरखि मातु हरषी हिये आली-ओट कहति मृदु बचन
प्रेमके-से पागे ||
तुम्ह सुरतरु रघुबंसके, देत अभिमत माँगे |
मेरे बिसेषि गति रावरी, तुलसी प्रसाद जाके सकल
अमङ्गल भागे ||
अमिय-बिलोकनि करि कृपा मुनिबर जब जोए |
तबतें राम अरु भरत, लषन, रिपुदवन, सुमुख सखि, सकल
सुवन सुख सोए ||
सुमित्रा लाय हिये फनि मनि ज्यों गोए |
तुलसी नेवछावरि करति मातु अतिप्रेम-मगन-मन,
सजल सुलोचन कोये ||
मातु सकल, कुल-गुर-बधू, प्रिय सखी सुहाई |
सादर सब मङ्गल किए महि-मनि-महेस पर
सबनि सुधेनु दुहाई ||
बोलि भूपभूसुर लिये अति बिनय बड़ाई |
पूजि पायँ, सनमानि, दान दिये, लहि असीस, सुनि
बरषैं सुमन सुरसाईँ ||
घर-घर पुर बाजन लगीं आनन्द-बधाई |
सुख-सनेह तेहि समयको तुलसी जानै जाको चोर्यो
है चित चहुँ भाई ||
या सिसुके गुन नाम-बड़ाई
या सिसुके गुन नाम-बड़ाई |
को कहि सकै, सुनहु नरपति, श्रीपति समान प्रभुताई ||
जद्यपि बुधि, बय, रुप, सील, गुन समै चारु चार्यो भाई |
तदपि लोक-लोचन-चकोर-ससि राम भगत-सुखदाई ||
सुर, नर, मुनि करि अभय, दनुज हति, हरहि, धरनि गरुआई |
कीरति बिमल बिस्व-अघमोचनि रहिहि सकल जग छाई ||
याके चरन-सरोज कपट तजि जे भजिहै मन लाई |
ते कुल जुगल सहित तरिहैं भव, यह न कछू अधिकाई ||
सुनि गुरबचन पुलक तन दम्पति, हरष न हृदय समाई |
तुलसिदास अवलोकि मातु-मुख प्रभु मनमें मुसुकाई ||
अवध आजु आगमी एकु आयो
अवध आजु आगमी एकु आयो |
करतल निरखि कहत सब गुनगन, बहुतन्ह परिचौ पायो ||
बूढ़ो बड़ो प्रमानिक ब्राह्मन सङ्कर नाम सुहायो |
सँग सिसुसिष्य, सुनत कौसल्या भीतर भवन बुलायो ||
पायँ पखारि, पूजि दियो आसन असन बसन पहिरायो |
मेले चरन चारु चार्यो सुत माथे हाथ दिवायो ||
नखसिख बाल बिलोकि बिप्रतनु पुलक, नयन जल छायो |
लै लै गोद कमल-कर निरखत, उर प्रमोद न अमायो ||
जनम प्रसङ्ग कह्यो कौसिक मिस सीय-स्वयम्बर गायो |
राम, भरत, रिपुदवन, लखनको जय सुख सुजस सुनायो ||
तुलसिदास रनिवास रहसबस, भयो सबको मन भायो |
सनमान्यो महिदेव असीसत सानँद सदन सिधायो ||
पौढ़िये लालन, पालने हौं झुलावौं
पौढ़िये लालन, पालने हौं झुलावौं |
कर पद मुख चखकमल लसत लखि लोचन-भँवर भुलावौं ||
बाल-बिनोद-मोद-मञ्जुलमनि किलकनि-खानि खुलावौं |
तेइ अनुराग ताग गुहिबे कहँ मति मृगनयनि बुलावौं ||
तुलसी भनित भली भामिनि उर सो पहिराइ फुलावौं |
चारु चरित रघुबर तेरे तेहि मिलि गाइ चरन चितु लावौं ||
सोइये लाल लाडिले रघुराई |
मगन मोद लिये गोद सुमित्रा बार बार बलि जाई ||
हँसे हँसत, अनरसे अनरसत प्रतिबिम्बनि ज्यों झाँई |
तुम सबके जीवनके जीवन, सकल सुमङ्गलदाई ||
मूल मूल सुरबीथि-बेलि, तम-तोम सुदल अधिकाई |
नखत-सुमन, नभ-बिटप बौण्डि मानो छपा छिटकि छबि छाई ||
हौ जँभात, अलसात, तात! तेरी बानि जानि मैं पाई |
गाइ गाइ हलराइ बोलिहौं सुख नीन्दरी सुहाई ||
बछरु, छबीलो छगनमगन मेरे, कहति मल्हाइ मल्हाई |
सानुज हिय हुलसति तुलसीके प्रभुकी ललित लरिकाई ||
ललन लोने लेरुआ, बलि मैया |
सुख सोइए नीन्द-बेरिया भई, चारु-चरित चार्यो भैया ||
कहति मल्हाइ लाइ उर छिन-छिन, "छगन छबीले छोटे छैया |
मोद-कन्द कुल कुमुद-चन्द्र मेरे रामचन्द्र रघुरैया||
रघुबर बालकेलि सन्तनकी सुभग सुभद सुरगैया |
तुलसी दुहि पीवत सुख जीवत पय सप्रेम घनी घैया ||
सुखनीन्द कहति आलि आइहौं |
राम, लखन, रिपुदवन, भरत सिसु करि सब सुमुख सोआइहौं ||
रोवनि, धोवनि, अनखानि, अनरसनि, डिठि-मुठि निठुर नसाइहौं |
हँसनि, खेलनि, किलकनि, आनन्दनि भूपति-भवन बसाइहौं ||
गोद बिनोद-मोदमय मूरति हरषि हरषि हलराइहौं |
तनु तिल तिल करि, बारि रामपर, लेहौं रोग बलाइहौं ||
रानी-राउ सहित सुत परिजन निरखि नयन-फल पाइहौं |
चारु चरित रघुबंस-तिलकके तहँ तुलसी मिलि गाइहौं ||
कनक-रतनमय पालनो रच्यो मनहुँ मार-सुतहार
कनक-रतनमय पालनो रच्यो मनहुँ मार-सुतहार |
बिबिध खेलौना, किङ्किनी, लागे मञ्जुल मुकुताहार ||
रघुकुल-मण्डन राम लला ||
जननि उबटि, अन्हवाइकै, मनिभूषन सजि लिये गोद |
पौढ़ाए पटु पालने, सिसु निरखि मगन मन मोद ||
दसरथनन्दन राम लला ||
मदन, मोरकै चन्दकी झलकनि, निदरति तनु जोति |
नील कमल, मनि जलदकी उपमा कहे लघु मति होति ||
मातु-सुकृत-फल राम लला ||
लघु, लघु लोहित ललिक हैं पद, पानि, अधर एक रङ्ग |
को कबि जो छबि कहि सकै नखसिख सुन्दर सब अंग ||
परिजन-रञ्जन राम लला ||
पग नूपुर कटि किङ्किनी, कर-कञ्जनि पहुँची मञ्जु |
हिय हरि नख अदभुत बन्यो मानो मनसिज मनि-गन-गञ्जु ||
पुरजन-सिरमनि राम लला ||
लोयन नील सरोजसे, भ्रूपर मसिबिन्दु बिराज |
जनु बिधु-मुख-छबि-अमियको रच्छक राखै रसराज ||
सोभासागर राम लला ||
गभुआरी अलकावली लसै, लटकन ललित ललाट |
जनु उडुगन बिधु मिलनको चले तम बिदारि करि बाट ||
सहज सोहावनो राम लला ||
देखि खेलौना किलकहीं, पद पानि बिलोचन लोल |
बिचित्र बिहँग अलि-जलज ज्यों सुखमा-सर करत कलोल ||
भगत-कलपतरु राम लला ||
बाल-बोल बिनु अरथके सुनि देत पदारथ चारि |
जनु इन्ह बचनन्हितें भए सुरतरु तापस त्रिपुरारि ||
नाम-कामधुक राम लला ||
सखी सुमित्रा वारहीं मनि भूषन बसन बिभाग |
मधुर झुलाइ मल्हावहीं गावैं उमँगि उमँगि अनुराग ||
हैं जग-मङ्गल राम लला ||
मोती जायो सीपमें अरु अदिति जन्यो जग-भानु |
रघुपति जायो कौसिला गुन-मङ्गल-रूप-निधान ||
भुवन-बिभूषन राम लला ||
राम प्रगट जबतें भए गए सकल अमङ्गल-मूल |
मीत मुदित, हित उदित हैं, नित बैरिनके चित सूल ||
भव-भय-भञ्जन राम लला ||
अनुज-सखा-सिसु सङ्ग लै खेलन जैहैं चौगान |
लङ्का खरभर परैगी, सुरपुर बाजिहैं निसान ||
रिपुगन-गञ्जन राम लला ||
राम अहेरे चलहिङ्गे जब गज रथ बाजि सँवारि |
दसकन्धर उर धुकधुकी अब जनि धावै धनु-धारि ||
अरि-करि-केहरि राम लला ||
गीत सुमित्रा सखिन्हकै सुनि सुनि सुर मुनि अनुकूल |
दै असीस जय जय कहैं हरषैं बरषैं फूल ||
सुर-सुखदायक राम लला ||
बालचरितमय चन्द्रमा यह सोरह-कला-निधान |
चित-चकोर तुलसी कियो कर प्रेम-अमिय-रसपान ||
तुलसीको जीवन राम लला ||
पालने रघुपति झुलावै
पालने रघुपति झुलावै |
लै लै नाम सप्रेम सरस स्वर कौसल्या कल कीरति गावै ||
केकिकण्ठ दुति स्यामबरन बपु, बाल-बिभूषन बिरचि बनाए |
अलकैं कुटिल, ललित लटकनभ्रू, नील नलिन दोउ नयन सुहाए ||
सिसु-सुभाय सोहत जब कर गहि बदन निकट पदपल्लव लाए |
मनहुँ सुभग जुग भुजग जलज भरि लेत सुधा ससि सों सचु पाए ||
उपर अनूप बिलोकि खेलौना किलकत पुनि-पुनि पानि पसारत |
मनहुँ उभय अंभोज अरुन सों बिधु-भय बिनय करत अति आरत ||
तुलसिदास बहु बास बिबस अलि गुञ्जत, सुछबि न जाति बखानी |
मनहुँ सकल श्रुति ऋचा मधुप ह्वै बिसद सुजस बरनत बर बानी ||