श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
दोहावली · गोस्वामी तुलसीदास

भाग 12

दोहावली · भाग 12
दोहा ५५१

जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ।

मन क्रम बचन लबार ते बकता कलिकाल महुँ।।

दोहा ५५२

ब्रह्मग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात।

कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात।

दोहा ५५३

बादहिं सूद द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि।

जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि।

दोहा ५५४

साखी सबदी दोहरा कहि कहनी उपखान।

भमति निरूपहिं भगत कलि निंदहिं बेद पुरान।

दोहा ५५५

श्रुति संमत हरि भगति पथ संजुत बिरति बिबेक।

तेहि परिहरहिं बिमोह बस कल्पहिं पंथ अनेक।

दोहा ५५६

सकल धरम बिपरीत कलि कल्पित कोटि कुपंथ।

पुन्य पराय पहार बन दुरे पुरान सुग्रन्थ।

दोहा ५५७

धातुबाद निरूपाधि बर सदगुरू लाभ सुभीत।

देव दरस कलि काल में पोथिन दुरे सभीत।

दोहा ५५८

सुर सदननि तीरथ पुरिन निपट कुचालि कुसाज।

मनहुँ मवा से मारि कलि राजत सहित समाज।

दोहा ५५९

गोंड गंवाँर नृपाल महि जमन महा महिपाल।

साम न दान न भेद कलि केवल दंड कराल।

दोहा ५६०

फोरहिं सिल लोढ़ा सदन लागें अढुक पहार।

कायर कूर कुपूत कलि घर घर सहस डहार।

दोहा ५६१

प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान।

जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान।

दोहा ५६२

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास।

गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास।

दोहा ५६३

श्रवन घटहुँ पुनि दृग घटहुँ घटउ सकल बल देह।

इते घटें घटिहै कहा जौं न घटै हरिनेह।

दोहा ५६४

तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन।

अब तो दादुर बोलिहैं हमें पुछिहै कौन।

दोहा ५६५

कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड।

दहन राम गुन ग्राम जिमि ईधन अनल प्रचंड।

दोहा ५६६

कलि पाषंड प्रचार प्रबल पाप पावँर पतित।

तुलसी उभय अधार राम नाम सुरसरि सलिल।

दोहा ५६७

रामचंद्र मुख चंद्रमा चित चकोर जब होइ।

राम राज सब काज सुभ समय सुहावन सोइ।

दोहा ५६८

बीज राम गुन गन नयन जल अंकुर पुलकालि।

सुकृती सुतन सुखेत बर बिलसत तुलसी सालि।

दोहा ५६९

तुलसी सहित सनेह नित सुमिरहु सीता राम।

सगुन सुमंगल सुभ सदा आदि मध्य परिनाम।

दोहा ५७०

पुरूषारथ स्वारथ सकल परमारथ परिनाम।

सुलथ सिद्धि सब साहिबी सुमिरत सीता राम।

दोहा ५७१

मनिमय दोहा दीप जहँ उर घर प्रगट प्रकास।

तहँ न मोह तम भय तमी कलि कज्जली बिलास।

दोहा ५७२

का भाषा का संसकृत प्रेम चाहिऐ साँच।

काम जु आवै कामरी का लै करिअ कुमाच।

दोहा ५७३

मनि मानिक महँगे किए सहँगे तृन जल नाज।

तुलसी एते जानिऐ राम गरीब नेवाज।

• All 4 Mangalacharan dohas (रेफ आत्मचिन्मय अकल…, बालकेलि दशरथ-अजिर…, अनिल सुवन पदपद्मरज…, बन्दौं श्रीतुलसीचरन नख…) — matched word-for-word (kavitakosh page 1).