श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
दोहावली · गोस्वामी तुलसीदास

भाग 11

दोहावली · भाग 11
दोहा ५०१

प्रभु तें प्रभु गन दुखद लखि प्रजहिं सँभारै राउ।

कर तें होत कृपानको कठिन घोर घन घाउ।

दोहा ५०२

व्यालहु ते बिकराल बड़ ब्यालफेन जियँ जानु।

वहि के खाये मरत हैं वहि खाए बिनु प्रानु।

दोहा ५०३

कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर।

कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर।

दोहा ५०४

काल बिलोकत ईस रूख भानु काल अनुहारि।

रबिहिं राउ राजहिं प्रजा बुध ब्यवहरहिं बिचारि।

दोहा ५०५

जथ अमल पावन पवन पाइ कुसंग सुसंग।

कहिअ कुबास सुबास तिमि काल महीस प्रसंग।

दोहा ५०६

भलेहु चलत पथ पोच भय नृप नियोग नय नेम।

सुतिय सुभूपति भूषिअत लोह सँवारित हेम।

दोहा ५०७

माली भानु किसान सम नीति निपुन नरपाल।

प्रजा भाग बस होहिंगे कबहुँ कबहुँ कलिकाल।

दोहा ५०८

बरसत हरषत लोग सब करषत लखै न कोइ।

तुलसी प्रजा सुभाग ते भूप भानु सो होइ।

दोहा ५०९

सुधा सुनाज कुनाज फल आम असन सम जानि।

सुप्रभु प्रजा हित लेहिं कर सामादिक अनुमानि।

दोहा ५१०

पाके पकए बिटप दल उत्तम मध्यम नीच।

फल नर लहैं नरेस त्यों करि बिचारि मन बीच।

दोहा ५११

रीझि खीझि गुरू देत सिख सखा सुसाहिब साधु।

तोरि खाइ फल होइ भलु तरू काटें अपराधु।

दोहा ५१२

धरनि धेनु चारितु चरन प्रजा सुबच्छ पेन्हाइ।

हाथ कछू नहिं लागिहै किएँ गोड़ की गाइ।।

दोहा ५१३

चढें बधूरें चंग ज्यों ग्यान ज्यों सोक समाज।

करम धरम सुख संपदा त्यों जानिबे कुराज।

दोहा ५१४

कंटक करि करि परत गिरि साखा सहस खजूरिं ।

मरहिं कुनृप करि कुनय सों कुचालि भव भूरि।

दोहा ५१५

काल तोपची तुपक महि दारू अनय कराल।

पाप पलीता कठिन गुरू गोला पुहुमी पाल।

दोहा ५१६

भूमि रूचिर रावन सभा अंगद पद महिपाल।

धरम रामनय सीय बल अचल होत सुभ काल।

दोहा ५१७

प्रीति राम पद नीति रति धरम प्रतीति सुभायँ।

प्रभुहिं न प्रभुता परिहरै कबहुँ बचन मन कायँं।

दोहा ५१८

कर के कर मन के मनहिं बचन बचन गुन जानि।

भूपहि भूलि न परिहरै बिजय बिभूति सयानि।

दोहा ५१९

गोली बान सुमंत्र सर समुझि उलटि मन देखु।

उत्तम मध्यम नीच प्रभु बचन बिचारि बिसेषु।

दोहा ५२०

सत्रु सयानो सलिल ज्यों राख सीस रिपु नाव।

बूड़त लखि पग डरत लखि चपरि चहूँ दिसि धाव।

दोहा ५२१

रैयत राज समाज घर तन धन धरम सुबाहु।

सांत सुसचिवन सौंपि सुख बिलसइ नित नरनाहु।

दोहा ५२२

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।

पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक।

दोहा ५२३

सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।

तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।

दोहा ५२४

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।

राज धर्म तन तीनि कर होहि बेगिहीं नास।

दोहा ५२५

रसना मन्त्री दसन जन तोष पोष निज काज।

प्रभु कर सेन पदादिका बालक राज समाज।

दोहा ५२६

लकडी डौआ करछुली सरस काज अनुहारि।

सुप्रभु संग्रहहिं परिहरहिं सेवक सखा बिचारि।।

दोहा ५२७

प्रभु समीप छोटे बड़े रहत निबल बलवान।

तुलसी प्रगट बिलोकिऐ कर अँगुली अनुमान।

दोहा ५२८

साहब तें सेवक बड़ो जो निज धरम सुजान।

राम बाँधि उतरे उदधि लाँधि गए हनुमान।

दोहा ५२९

तुलसी भल बरतरू बढ़त निज मूलहिं अनुकूल।

सबहि भाँति सब कहँ सुखद दलनि फलनि बिनु फूल।

दोहा ५३०

सधन सगुन सधरम सगन सबल सुसाइँ महीप।

तुलसी जे अभिमान बिनु ते तिभुवन के दीप।

दोहा ५३१

तुलसी निज करतूति बिनु मुकुत जात जब कोइ।

गयो अजामिल लोक हरि नाम सक्यो नहिं धोइ।

दोहा ५३२

बड़ो गहे ते होत बड़ ज्यों बावन कर दंड।

श्रीप्रभु के सँग सों बढ़ो गयो अखिल ब्रह्मांड।

दोहा ५३३

तुलसी दान जो देत हैं जल में हाथ उठाइ।

प्रतिग्राही जीवै नहीं दात नरकै जाइ।

दोहा ५३४

आपन छोड़ो साथ जब ता दिन हितू न कोइ।

तुलसी अंबुज अंबु बिनु तरनि तासु रिपु होइ।

दोहा ५३५

उरबी परि कलहीन होइ ऊपर कलाप्रधान।

तुलसी देखु कलाप गति साधन घन पहिचान।

दोहा ५३६

तुलसी संगति पोच की सुजनहि होति म-दानि।

ज्यो हरि रूप सुताहि तें कीनि गोहारी आनि।

दोहा ५३७

कलि कुचालि सुभ मति हरनि सरलै दंडै चक्र।

तुलसी यह निहचय भइ। बाढ़ि लेति नव बक्र।

दोहा ५३८

गो खग खे खग बारि खग तीनों महिं बिसेक।

तुलसी पीवैं फिरि चलैं रहैं फिरि चलैं रहैं फिरैं सँग एक।

दोहा ५३९

साधन समय सुसिद्धि लहि उभय मूल अनुकूल।

तुलसी तीनिउ समय सम ते महि मंगल मूल।

दोहा ५४०

मातु पिता गुरू स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ।

लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरू जनमु जग जायँ।

दोहा ५४१

अनुचित उचित बिचारू तजि जे पालहिं पितु बैन।

ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।

दोहा ५४२

सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।

जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय।

दोहा ५४३

सरनागत कहूँ जे तअहिं निज अनहित अनुमानि।

ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।

दोहा ५४४

तुलसी तृन जलकूल को निरबल निपट निकाज।

कै राखै कै सँग चलै बाँह गहे की लाज।

दोहा ५४५

रामायन अनुहरत सिख जग भयो भारत रीति।

तुलसी सठ की को सुनै कलि कुचालि पर प्रीति।

दोहा ५४६

पात पात केै सींचिबो बरी बरी कै लोन।

तुलसी खोटें चतुरपन कलि डहके कहु को न।

दोहा ५४७

प्रीति सगाई सकल बिधि बनिज उपायँ अनेक।

कल बल छल कलि मल मलिन डहकत एकहि एक।

दोहा ५४८

दंभ सहित कलि धरम सब छल समेत ब्यवहार।

स्वारथ सहित सनेह सब रूचि अनुहरत अचार।

दोहा ५४९

चोर चतुर बटमार नट प्रभु भैंडुआ भंड।

सब भच्छक परमारथी कलि सुपंथ पाषंड।

दोहा ५५०

असुभ भेष सभूसन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं।

तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं।

भाग-12 (दोहा संख्या 551 से 573)