श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
दोहावली · गोस्वामी तुलसीदास

भाग 2

दोहावली · भाग 2
दोहा ५१

रे मन सब सों निरस ह्वै सरस राम सों होहि।

भलो सिखावन देत है निस दिन तुलसी तोहि।

दोहा ५२

हरे चरहिं तापहिं बरे फरें पसाहिं हाथ।

तुलसी स्वारथ ीमत सब परमारथ रघुनाथ।

दोहा ५३

स्वारथ सीता राम सों परमारथ सिय राम।

तुलसी तेरों दूसरे द्वार कहा कहु काम।

दोहा ५४

स्वारथ परमारथ सकल सुलभ एक ही ओर।

द्वार दूसरे दीनता उचित न तुलसी तोर।

दोहा ५५

तुलसी स्वारथ राम हित परमारथ रघुबीर।

सेवक जाके लखन से पवनपूत रनधीर।

दोहा ५६

ज्यों जग बैरी मीन को आपु सहित बिनु बारि ।

त्यों तुलसी रघुबीर बिनु गति आपनी बिचारि।

दोहा ५७

राम प्रेम बिनु दूबरो राम प्रेमहीं पीन।

रघुबर कबहुँक करहुगे तुलसिहि ज्यों जल मीन।

दोहा ५८

राम सनेही राम गति राम चरन रति जाहि।

तुलसी फल जग जनम को दियो बिधाता ताहि।

दोहा ५९

आपु आपने तें अधिक जेहि प्रिय सीताराम।

तेहि के पग की पानहीं तुलसी तनु को चाम।

दोहा ६०

स्वारथ परमारथ रहित सीता राम सनेहँ ।

तुलसी सो फल चारि को फल हमार मत एहँ।

दोहा ६१

श्री जे जन रूखे बिषय रस चिकने राम सनेहँ।

तुलसी ते प्रिय राम को कानन बसहिं कि गेहँ।

दोहा ६२

जथा लाभ संतोष सुख रघुबर चरन सनेह।

तुलसी जो मन खूँद सम कानन बसहुँ कि गेह।

दोहा ६३

तुलसी जौं पै राम सों नाहिन सहज सनेह ।

मूँड़ मुड़ायो बादिहीं भाँड़ भयो तजि गेह।

दोहा ६४

तुलसी श्रीरघुबीर तजि करै भरोसो और ।

सुख संपति की का चली नरकहुँ नाहीं ठौर।

दोहा ६५

तुलसी परिहरि हरि हरहि पाँवर पूजहिं भूत।

अंत फजीहत होहिंगे गनिका के से पूत।

दोहा ६६

सेये सीता राम नहिं भजे न संकर गौरि।

जनम गँवायो बादिहीं परत पराई पौरि।

दोहा ६७

तुलसी हरि अपमान तें होइ अकाज समाज।

राज करत रज मिलि गए सदल सकुल कुरूराज।

दोहा ६८

तुलसी रामहिं परिहरें निपट हानि सुन ओझ।

सुरसरि गत सोई सलिल सुरा सरिस गंगोझ।

दोहा ६९

राम दुरि माया बढ़ति घटति जानि मन माँह।

भूरि होति रबि दूरि लखि सिर पर पगतर छाँह।

दोहा ७०

साहिब दीनानाथ सों जब घटिहैं अनुराग।

तुलसी तबहीं भालतें भभरि भागिहैं भाग।

दोहा ७१

करिहौं कोसलनाथ तजि जबहिं दूसरी आस।

जहाँ तहाँ दुख पाइहौं तबहीं तुलसीदास।।

दोहा ७२

बिंधि न ईंधन पाइऐ सागर जुरै न नीर।

परै उपास कुबेर घर जो बिपच्छ रघुबीर।

दोहा ७३

बरसा को गोबर भयों को चहै को करै प्रीति।

तुलसी तू अनुभवहि अब राम बिमुख की रीति।

दोहा ७४

सबहि समरथहि सुखद प्रिय अच्छम प्रिय हितकारिं।

कबहुँ न काहुहि राम प्रिय तुलसी कहा बिचारि।।

दोहा ७५

तुलसी उद्यम करम जुग जब जेहि राम सुडीठि।

होइ सुफल सोइ ताहि सब सनमुख प्रभु तन पीठि।

दोहा ७६

राम कामतरू परिहरत सेवत कलि तरू ठूँठ।

स्वारथ परमारथ चहत सकल मनोरथ झूँठ।

दोहा ७७

निज दूषन गुन राम के समुझें तुलसीदास।

होइ भलो कलिकाल हूँ उभय लोक अनयास।

दोहा ७८

कै तोहि लागहिं राम प्रिय कै तू प्रभु प्रिय होहि।

दुइ में रूचै जो सुगम सो कीबे तुलसी तोहि।

दोहा ७९

तुलसी दुइ महँ एक ही खेल छाँडि छल खेलु।

कै करू ममता राम सों कै ममता परहेलु।

दोहा ८०

निगम अगम साहेब सुगम राम साँचिली चाह।

अंबु असन अवलोकिअत सुलभ सबै जग माँह।

दोहा ८१

सनमुख आवत पथिक ज्यों दिएँ दाहिनो बाम।

तैसोइ होत सु आप को त्यों ही तुलसी राम।

दोहा ८२

राम प्रेम पथ पेखिऐ दिएँ बिषय तन पीठि।

तुलसी केंचुरि परिहरें होत साँपेहू दीठि।

दोहा ८३

तुलसी जौ लौं बिषय की मुधा माधुरी मीठि।

तौ लौं सुधा सहस्त्र सम राम भगति सुठि सीठि।

दोहा ८४

जैसो मेरो रावरो केवल कोसलपाल ।

तौ तुलसी को है भलो तिहूँ लोक तिहुँ काल।

दोहा ८५

है तुलसी कें एक गुन अवगुन निधि कहैं लोग।

भलो भरोसो रावरो राम रीझिबे जोग।

दोहा ८६

प्रीति राम सों नीति पथ चलिय राग रिस जीति।

तुलसी संतन के मते इहै भगति की रीति।

दोहा ८७

सत्य बचन मानस बिमल कपट रहित करतूति।

तुलसी रघुबर सेवकहि सकै न कलिजुग धूति।

दोहा ८८

तुलसी सुखी जो राम सों दुखी सो निज करतूति।

करम बचन मन ठीक जेहि तेहि न सकै कलि धूति।

दोहा ८९

नातो नाते राम के राम सनेहुँ सनेहु।

तुलसी माँगत जोरि कर जनम जनम सिव देहु।

दोहा ९०

सब साधन को एक फल जेहिं जान्यो सो जान।

ज्यों त्यों मन मंदिर बसहिं राम धरें धनु बान।

दोहा ९१

जौं जगदीस तौ अति भलो जौं महीस तौ भाग।

तुलसी चाहत जनम भरि राम चरन अनुराग।

दोहा ९२

परौं नरक फल चारि सिसु मीच डाकिनी खाउ।

तुलसी राम सनेह को जो फल सो जरि जाउ।

दोहा ९३

हित सों हित, रति राम सों, रिपु सों बैर बिहाउ।

उदासीन सब सों सरल तुलसी सहज सुभाउ।

दोहा ९४

तुलसी ममता राम सों समता सब संसार।

राग न रोष न दोष दुख दास भए भव पार।
दोहा ९५

रामहि डरू करू राम सों ममता प्रीति प्रतिति।

तुलसी रिरूपधि राम को भएँ हारेहूँ जीति।

दोहा ९६

तुलसी राम कृपालु सों कहि सुनाउ गुन दोष।

होय दूबरी दीनता परम पीन संतोष।

दोहा ९७

सुमिरन सेवा राम सों साहब सों पहिचानि।

ऐसेहु लाभ न ललक जो तुलसी नित हित हानि।

दोहा ९८

जानें जानन जोइऐ बिनु जाने को जान।

तुलसी यह सुति समुझि हियँ आनु धरें धनु बान।

दोहा ९९

करमठ कठमलिया कहैं ग्यानी ग्यान बिहीन।

तुलसी त्रिपथ बिहाइ गो राम दुआरे दीन।

दोहा १००

बाधक सब सब के भए साधक भये न कोइ।

तुलसी राम कृपालु तें भलो होइ सो होइ।

भाग-3 (दोहा संख्या 101 से 150)