श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
दोहावली · गोस्वामी तुलसीदास

भाग 3

दोहावली · भाग 3
दोहा १०१

श्री संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।

ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास।

दोहा १०२

बिलग बिलग सुख संग दुख जनम मरन सोइ रीति।

रहिअत राखे राम कें गए ते उचित अनीति।

दोहा १०३

जायँ कहब करतूति बिनु जायँ जोग बिन छेम।

तुलसी जाँय उपाय सब बिना राम पद प्रेम।

दोहा १०४

लोग मगन सब जोगहीं जोग जायँ बिनु छेम

।त्यों तुलसी के भावगत राम प्रेम बिनु नेम।

दोहा १०५

राम निकाई रावरी हैं सबही को नीक।

जौ यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक।

दोहा १०६

तुलसी राम जो आदर्यो खोटो खरो खरोइ।

दीपक काजर सिर धर्यो धर्यो सुधर्यो धरोइ।

दोहा १०७

तनु बिचित्र कायर बचन अहि अहार मन घोर।

तुलसी हरि भए पच्छधर ताते कह सब मोर।

दोहा १०८

लहइ न फूटी कौड़िहू को चाहै केहि काज।

सो तुलसी महँगो कियो राम गरीब निवाज।

दोहा १०९

घर घर माँगे टूक पुनि भूपति पूजे पाय।

जे तुलसी तब राम बिनु ते अब राम सहाय।

दोहा ११०

तुलसी राम सुदीठि तें निबल होत बलवान।

बैर बालि सुग्रीव के कहा कियो हनुमान।

दोहा १११

तुलसी रामहु तें अधिक राम भगत जियँ जान।

रिनिया राजा राम भे धनिक भए हनुमान।

दोहा ११२

कियो सुसेवक धरम कपि कृतग्य जियँ जानि ।

जोरि हाथ ठाढ़े भए बरदायक बरदानि।

दोहा ११३

भगत हेतु भगवान प्रभु रा धरेउ तनु भूप।

किये चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप।

दोहा ११४

ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार।

सोइ सच्चिदानंदघन कर नर चरित उदार।

दोहा ११५

हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।

जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान।

दोहा ११६

सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।

चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु।

दोहा ११७

बाल बिभूषन बसन बर धूरि धूसरित अंग।

बालकेति रघुबर करत बाल बंधु सब संग।

दोहा ११८

अनुदित अवध बधावने नित नव मंगल मोद।

मुदित मातु पितु लोग लखि रघुबर बाल बिनोद।

दोहा ११९

राज अजिर राजत रूचिर कोसलपालक बाल।

जानु पानि चर चरित बर सगुन सुमंगल माल।

दोहा १२०

नाम ललित लीला ललित ललित रूप रघुनाथ।

ललित बसन भूषन ललित ललित अनुज सिसु साथ।

दोहा १२१

श्री राम भरत लछिमन ललित सत्रु समन सुभ नाम।

सुमिरत दसरथ सुवन सब पूजहिं सब मन काम।

दोहा १२२

बालक कोसलपाल के सेवकपाल कृपाल।

तुलसी मन मानस बसत मंगल मंजु मराल।

दोहा १२३

भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।

करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जगजाल।

दोहा १२४

निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।

सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि।

दोहा १२५

परमानंद कृपायतनम न परिपूरन काम।

प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्री राम।

दोहा १२६

बारि मथें घृत होइ बरू सिकता ते बरू तेल।

बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल।

दोहा १२७

हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं ।

भजिअ राम सब काम तजि अस बिचारि मन माहिं।

दोहा १२८

जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य।

अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य।

दोहा १२९

श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।

ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन।

दोहा १३०

लव निमेष परमानु जुग बरस कलप सर चंड।

भजसि न मम तेहि राम कहँ कालु जासु कोदंड।

दोहा १३१

तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन विश्राम।

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।

दोहा १३२

बिनु सतसंग न हरिकथा तेहि बिनु मोह न भाग।

मोह गएँ बिनु रामपद होइ न दृढ़ अनुराग।

दोहा १३३

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु ।

राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु।

दोहा १३४

अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।

भजहु राम रघुबीर करूनाकर सुंदर सुखद।

दोहा १३५

भाव बस्य भगवान सुख निधान करूना भवन।

तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन।

दोहा १३६

कहहिं बिमलमति संत बेद पुरान बिचारि अस।

द्रवहिं जानकी कंत तब छूटै संसार दुख।

दोहा १३७

बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।

गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु।

दोहा १३८

रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान।

ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान।

दोहा १३९

जरउ सो संपति सदन सुखु सुह्दय मातु पितु भाइ।

सनमुख होत जो रामपद करइ न सहस सहाइ।

दोहा १४०

सोइ साधु गुरू समुझि सिखि राम भगति थिरताई ।

लरिकाई को पैरिबो तुलसी बिसरि न जाई।

दोहा १४१

श्री सबहि कहावत राम के सबहि राम की आस।

राम कहहिं जेहि आपनो तेहि भजु तुलसीदास।

दोहा १४२

जेहि सरीर रति राम सों सोइ आदरहिं सुजान।

रूद्रदेह तजि नेहबस बान भे हनुमान।

दोहा १४३

जानि राम सेवा सरस समुझि करब अनुमान।

पुरूषा ते सेवक भए हर ते भे हनुमान।

दोहा १४४

तुलसी रघुबर सेवकहि खल डाटत मन माखि।

बाजराज के बालकहि लवा दिखावत आँखि।

दोहा १४५

रावन रिपुके दास तें कायर करहिं कुचालि।

रवर दूषन मारीच ज्यों नीच जाहिंगे कालि।

दोहा १४६

पुन्य पाप जस अजस के भावी भाजन भूरि।

संकट तुलसीदास को राम करहिंगे दूरि।

दोहा १४७

खेलत बालक ब्याल सँग मेलत पावक हाथ।

तुलसी सिसु पितु मातु ज्यों राखत सिय रघुनाथ।

दोहा १४८

तुलसी दिन भल साहु कहँ भली चोर कहँ राति।

निसि बासन ता कहँ भलो मानै राम इतानि।

दोहा १४९

तुलसी जाने सुति समुझि कृपासिंधु रघुराज।

महँगे मनि कंचन किए सौंधें जग जल नाज।

दोहा १५०

सेवा सील सनेह बस करि परिहरि प्रिय लोग ।

तुलसी ते सब राम सों सुखद सँजोग बियोग।

भाग-4 (दोहा संख्या 151 से 200)