श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

बालकाण्ड · भाग २

गीतावली · बालकाण्ड · भाग २
पद १६

झूलत राम पालने सोहैं

राग बिलावल

झूलत राम पालने सोहैं | भूरि-भाग जननीजन जोहैं ||

तन मृदु मञ्जुल मेचकताई | झलकति बाल बिभूषन झाँई ||

अधर-पानि-पद लोहित लोने | सर-सिङ्गार-भव सारस सोने ||

किलकत निरखि बिलोल खेलौना | मनहुँ बिनोद लरत छबि छौना ||

रञ्जित-अंजन कञ्ज-बिलोचन | भ्राजत भाल तिलक गोरोचन ||

लस मसिबिन्दु बदन-बिधु नीको | चितवत चितचकोर तुलसीको ||

पद १७

राजत सिसुरूप राम सकल गुन-निकाय-धाम

राग कल्याण

राजत सिसुरूप राम सकल गुन-निकाय-धाम,

कौतुकी कृपालु ब्रह्म जानु-पानि-चारी |

नीलकञ्ज-जलदपुञ्ज-मरकतमनि-सरिस स्याम,

काम कोटि सोभा अंग अंग उपर बारी ||

हाटक-मनि-रत्न-खचित रचित इंद्र-मन्दिराभ,

इंदिरानिवास सदन बिधि रच्यो सँवारी |

बिहरत नृप-अजिर अनुज सहित बालकेलि-कुसल,

नील-जलज-लोचन हरि मोचन भय भारी ||

अरुन चरन अंकुस-धुज-कञ्ज-कुलिस-चिन्ह रुचिर,

भ्राजत अति नूपुर बर मधुर मुखरकारी |

किङ्किनी बिचित्र जाल, कम्बुकण्ठ ललित माल,

उर बिसाल केहरि-नख, कङ्कन करधारी ||

चारु चिबुक नासिका कपोल, भाल तिलक, भ्रुकुटि,

श्रवन अधर सुन्दर, द्विज-छबि अनूप न्यारी |

मनहुँ अरुन कञ्ज-कोस मञ्जुल जुगपाँति प्रसव,

कुन्दकली जुगल जुगल परम सुभ्रवारी ||

चिक्कन चिकुरावली मनो षडङ्घ्रि-मण्डली,

बनी, बिसेषि गुञ्जत जनु बालक किलकारी |

इकटक प्रतिबिम्ब निरखि पुलकत हरि हरषि हरषि,

लै उछङ्ग जननी रसभङ्ग जिय बिचारी ||

जाकहँ सनकादि सम्भु नारदादि सुक मुनीन्द्र,

करत बिबिध जोग काम क्रोध लोभ जारी |

दसरथ गृह सोइ उदार, भञ्जन संसार-भार,

लीला अवतार तुलसिदास-त्रासहारी ||

पद १८

आँगन फिरत घुटुरुवनि धाए

राग कान्हरा

आँगन फिरत घुटुरुवनि धाए |

नील-जलद तनु-स्याम राम-सिसु जननि निरखि मुख निकट बोलाए ||

बन्धुक सुमन अरुन पद-पङ्कज अंकुस प्रमुख चिन्ह बनि आए |

नूपुर जनु मुनिबर-कलहंसनि रचे नीड़ दै बाँह बसाए ||

कटिमेखल, बर हार ग्रीव-दर, रुचिर बाँह भूषन पहिराए |

उर श्रीवत्स मनोहर हरिनख हेम मध्य मनिगन बहु लाए ||

सुभग चिबुक, द्विज, अधर, नासिका, श्रवन, कपोल मोहि अति भाए |

भ्रू सुन्दर करुनारस-पूरन, लोचन मनहु जुगल जलजाए ||

भाल बिसाल ललित लटकन बर, बालदसाके चिकुर सोहाए |

मनु दोउ गुर सनि कुज आगे करि ससिहि मिलन तमके गन आए ||

उपमा एक अभूत भई तब जब जननी पट पीत ओढ़ाए |

नील जलदपर उडुगन निरखत तजि सुभाव मनो तड़ित छपाए ||

अंग-अंगपर मार-निकर मिलि छबि समूह लै-लै जनु छाए |

तुलसिदास रघुनाथ रूप-गुन तौ कहौं जो बिधि होहिं बनाए ||

पद १९

रघुबर बाल छबि कहौं बरनि

राग केदारा

रघुबर बाल छबि कहौं बरनि |

सकल सुखकी सींव, कोटि-मनोज-सोभाहरनि ||

बसी मानहु चरन-कमलनि अरुनता तजि तरनि |

रुचिर नूपुर किङ्किनी मन हरति रुनझुनु करनि ||

मञ्जु मेचक मृदुल तनु अनुहरति भूषन भरनि |

जनु सुभग सिङ्गार सिसु तरु फर्यो है अदभुत फरनि ||

भुजनि भुजग, सरोज नयननि, बदन बिधु जित्यो लरनि |

रहे कुहरनि सलिल, नभ, उपमा अपर दुरि डरनि ||

लसत कर-प्रतिबिम्ब मनि-आँगन घुटुरुवनि चरनि |

जनु जलज-सम्पुट सुछबि भरि-भरि धरति उर धरनि ||

पुन्यफल अनुभवति सुतहि बिलोकि दसरथ-घरनि |

बसति तुलसी-हृदय प्रभु-किलकनि ललित लरखरनि ||

नेकु बिलोकि धौं रघुबरनि |

चारु फल त्रिपुरारि तोको दिये कर नृप-घरनि ||

बाल भूषन बसन, तन सुन्दर रुचिर रजभरनि |

परसपर खेलनि अजिर, उठि चलनि, गिरि गिरि परनि ||

झुकनि, झाँकनि, छाँह सों किलकनि, नटनि हठि लरनि |

तोतरी बोलनि, बिलोकनि, मोहनी मनहरनि ||

सखि-बचन सुनि कौसिला लखि सुढर पासे ढरनि |

लेति भरि भरि अंक सैन्तति पैन्त जनु दुहु करनि ||

चरित निरखत बिबुध तुलसी ओट दै जलधरनि |

चहत सुर सुरपति भयो सुरपति भये चहै तरनि ||

पद २०

भूमितल भूपके बड़े भाग

राग जैतश्री

भूमितल भूपके बड़े भाग |

राम लखन रिपुदमन भरत सिसु निरखत अति अनुराग ||

बालबिभूषन लसत पायँ मृदु मञ्जुल अंग-बिभाग |

दसरथ-सुकृत मनोहर बिरवनि रूप-करह जनु लाग ||

राजमराल बिराजत बिहरत जे हर-हृदय-तड़ाग |

ते नृप-अजिर जानु कर धावत धरन चटक चल काग ||

सिद्ध सिहात, सराहत मुनिगन, कहैं सुर किन्नर नाग |

"ह्वै बरु बिहँग बिलोकिय बालक बसि पुर उपबन बाग||

परिजन सहित राय रानिन्ह कियो मज्जन प्रेम-प्रयाग |

तुलसी फल ताके चार्यो मनि मरकत पङ्कजराग ||

पद २१

छँगन मँगन अँगना खेलत चारु चार्यो भाई

राग आसावरी

छँगन मँगन अँगना खेलत चारु चार्यो भाई |

सानुज भरत लाल लषन राम लोने लोने

लरिका लखि मुदित मातु समुदाई ||

बाल बसन भूषन धरे, नख-सिख छबि छाई |

नील पीत मनसिज-सरसिज मञ्जुल

मालनि मानो है देहनितें दुति पाई ||

ठुमुकु ठुमुकु पग धरनि, नटनि, लरखरनि सुहाई |

भजनि, मिलनि, रुठनि, तूठनि, किलकनि,

अवलोकनि, बोलनि बरनि न जाई ||

जननि सकल चहुँ ओर आलबाल मनि-अँगनाई |

दसरथ-सुकृत बिबुध-बिरवा बिलसत

बिलोकि जनु बिधि बर बारि बनाई ||

हरि बिरञ्चि हर हेरि राम प्रेम-परबसताई |

सुख-समाज रघुराजके बरनत

बिसुद्ध मन सुरनि सुमन झरि लाई ||

सुमिरत श्रीरघुबरनिकी लीला लरिकाई |

तुलसिदास अनुराग अवध आनँद

अनुभवत तब को सो अजहुँ अघाई ||

पद २२

आँगन खेलत आनँदकन्द

राग बिलावल

आँगन खेलत आनँदकन्द | रघुकुल-कुमुद-सुखद चारु चन्द ||

सानुज भरत लषन सँग सोहैं | सिसु-भूषन भूषित मन मोहैं |

तन दुति मोरचन्द जिमि झलकैं | मनहुँ उमगि अँग-अँग छबि छलकैं ||

कटि किङ्किनि पग पैजनि बाजैं | पङ्कज पानि पहुँचिआँ राजैं |

कठुला कण्ठ बघनहा नीके | नयन-सरोज-मयन-सरसीके ||

लटकन लसत ललाट लटूरीं | दमकति द्वै द्वै दँतुरियाँ रुरीं |

मुनि-मन हरत मञ्जु मसि बुन्दा | ललित बदन बलि बाल मुकुन्दा ||

कुलही चित्र बिचित्र झँगूलीं | निरखत मातु मुदित मन फूलीं |

गहि मनिखम्भ डिम्भ डगि डोलत | कल बल बचन तोतरे बोलत ||

किलकत, झुकि झाँकत प्रतिबिम्बनि | देत परम सुख पितु अरु अंबनि |

सुमिरत सुखमा हिय हुलसी है | गावत प्रेम पुलकि तुलसी है ||

पद २३

ललित सुतहि लालति सचु पाये

राग कान्हरा

ललित सुतहि लालति सचु पाये |

कौसल्या कल कनक अजिर महँ सिखवति चलन अँगुरियाँ लाये ||

कटि किङ्किनी, पैजनी पायनि बाजति रुनझुन मधुर रेङ्गाये |

पहुँची करनि, कण्ठ कठुला बन्यो केहरि नख मनि-जरित जराये ||

पीत पुनीत बिचित्र झँगुलिया सोहति स्याम सरीर सोहाये |

दँतियाँ द्वै-द्वै मनोहर मुख छबि, अरुन अधर चित लेत चोराये ||

चिबुक कपोल नासिका सुन्दर, भाल तिलक मसिबिन्दु बनाये |

राजत नयन मञ्जु अंजनजुत खञ्जन कञ्ज मीन मद नाये ||

लटकन चारु भ्रुकुटिया टेढ़ी, मेढ़ी सुभग सुदेस सुभाये |

किलकि किलकि नाचत चुटकी सुनि, डरपति जननि पानि छुटकाये ||

गिरि घुटुरुवनि टेकि उठि अनुजनि तोतरि बोलत पूप देखाये |

बाल-केलि अवलोकि मातु सब मुदित मगन आनँद न अमाये ||

देखत नभ घन-ओट चरित मुनि जोग समाधि बिरति बिसराये |

तुलसिदास जे रसिक न यहि रस ते नर जड जीवत जग जाये ||

पद २४

छोटी छोटी गोड़ियाँ अँगुरियाँ छबीलीं छोटी

राग ललित

छोटी छोटी गोड़ियाँ अँगुरियाँ छबीलीं छोटी,

नख-जोति मोती मानो कमल-दलनिपर |

ललित आँगन खेलैं, ठुमुकु ठुमुकु चलैं,

झुँझुनु झुँझुनु पाँय पैजनी मृदु मुखर ||

किङ्किनी कलित कटि हाटक जटित मनि,

मञ्जु कर-कञ्जनि पहुँचियाँ रुचिरतर |

पियरी झीनी झँगुली साँवरे सरीर खुली,

बालक दामिनि ओढ़ी मानो बारे बारिधर ||

उर बघनहा, कण्ठ कठुला, झँडूले केश,

मेढ़ी लटकन मसिबिन्दु मुनि-मन-हर |

अंजन-रञ्जित नैन, चित चोरै चितवनि,

मुख-सोभापर वारौं अमित असमसर ||

चुटकी बजावती नचावती कौसल्या माता,

बालकेलि गावती मल्हावती सुप्रेम-भर |

किलकि किलकि हँसैं, द्वै-द्वै दँतुरियाँ लसैं,

तुलसीके मन बसैं तोतरे बचन बर ||

सादर सुमुखि बिलोकि राम-सिसुरूप, अनूप भूप लिये कनियाँ |

सुदंर स्याम सरोज बरन तनु, नखसिख सुभग सकल सुखदनियाँ ||

अरुन चरन नखजोति जगमगति, रुनझुनु करति पाँय पैञ्जनियाँ |

कनक-रतन-मनि जटित रटति कटि किङ्किनि

कलित पीतपट-तनियाँ ||

पहुँची करनि, पदिक हरिनख उर, कठुला कण्ठ, मञ्जु गजमनियाँ |

रुचिर चिबुक, रद, अधर मनोहर, ललित

नासिका लसति नथुनियाँ ||

बिकट भ्रुकुटि, सुखमानिधि आनन, कल

कपोल, काननि नगफनियाँ |

भाल तिलक मसिबिन्दु बिराजत, सोहति सीस लाल चौतनियाँ ||

मनमोहनी तोतरी बोलनि, मुनि-मन-हरनि हँसनि किलकनियाँ |

बाल सुभाय बिलोल बिलोचन, चोरति चितहि चारु चितवनियाँ ||

सुनि कुलबधू झरोखनि झाँकति रामचन्द्र-छबि चन्दबदनियाँ |

तुलसीदास प्रभु देखि मगन भईं प्रेमबिबस कछु सुधि न अपनियाँ ||

पद २५

सोहत सहज सुहाये नैन

राग बिलावल

सोहत सहज सुहाये नैन |

खञ्जन मीन कमल सकुचत तब जब उपमा चाहत कबि दैन ||

सुन्दर सब अंगनि सिसु-भूषन राजत जनु सोभा आये लैन |

बड़ो लाभ, लालची लोभबस रहि गयो लखि सुखमा बहु मैन ||

भोर भूप लिये गोद मोद भरे, निरखत बदन, सुनत कल बैन |

बालक-रूप अनूप राम-छबि निवसति तुलसिदास-उर-ऐन ||

पद २६

भोर भयो जागहु, रघुनन्दन

राग बिभास

भोर भयो जागहु, रघुनन्दन | गत-व्यलीक भगतनि उर-चन्दन ||

ससि करहीन, छीन दुति तारे | तमचुर मुखर, सुनहु मेरे प्यारे ||

बिकसित कञ्ज, कुमुद बिलखाने | लै पराग रस मधुप उड़ाने ||

अनुज सखा सब बोलनि आये | बन्दिन्ह अति पुनीत गुन गाये ||

मनभावतो कलेऊ कीजै | तुलसिदास कहँ जूठनि दीजै ||

पद २७

प्रात भयो तात, बलि मातु बिधु-बदनपर

राग बिभास

प्रात भयो तात, बलि मातु बिधु-बदनपर

मदन वारौं कोटि, उठो प्रान-प्यारे !

सूत-मागध-बन्दि बदत बिरुदावली,

द्वार सिसु अनुज प्रियतम तिहारे ||

कोक गतसोक अवलोकि ससि छीनछबि,

अरुनमय गगन राजत रुचि तारे |

मनहुँ रबि बाल मृगराज तमनिकर-करि

दलित, अति ललित मनिगन बिथारे ||

सुनहु तमचुर मुखर,कीर कलहंस पिक

केकि रव कलित, बोलत बिहँग बारे |

मनहुँ मुनिबृन्द रघुबंसमनि! रावरे

गुनत गुन आश्रमनि सपरिवारे ||

सरनि बिकसित कञ्जपुञ्ज मकरन्दवर,

मञ्जुतर मधुर मधुकर गुँजारे |

मनहुँ प्रभुजनम सुनि चैन अमरावती,

इन्दिरानन्द-मन्दिर सँवारे ||

प्रेम-सम्मिलित बर बचन-रचना अकनि

राम राजीव-लोचन उघारे |

दास तुलसी मुदित, जननि करै आरती,

सहज सुन्दर अजिर पाँव धारे ||

पद २८

जागिये कृपानिधान जानराय रामचन्द्र

राग बिभास

जागिये कृपानिधान जानराय रामचन्द्र

जननी कहै बार-बार भोर भयो प्यारे |

राजिवलोचन बिसाल, प्रीति-बापिका मराल,

ललित कमल-बदन ऊपर मदन कोटि बारे ||

अरुन उदित, बिगत सरबरी, ससाङ्क किरनहीन,

दीन दीपजोति, मलिन, दुति समूह तारे |

मनहुँ ग्यानघन-प्रकास, बीते सब भव-बिलास

आस-त्रास तिमिर तोष तरनि-तेज जारे ||

बोलत खगनिकर मुखर मधुर करि प्रतीति सुनहु

श्रवन, प्रानजीवन धन, मेरे तुम बारे |

मनहुँ बेद-बन्दी-मुनिबृन्द-सूत-मागधादि

बिरुद बदत "जय जय जय जयति कैटभारे||

बिकसित कमलावली, चले प्रपुञ्ज चञ्चरीक,

गुञ्जत कल कोमल धुनि त्यागि कञ्ज न्यारे |

जनु बिराग पाइ सकल सोक-कूप-गृह बिहाइ

भृत्य प्रेममत्त फिरत गुनत गुन तिहारे ||

सुनत बचन प्रिय रसाल जागे अतिसय दयाल

भागे जञ्जाल बिपुल, दुख-कदम्ब दारे |

तुलसिदास अति अनन्द देखिकै मुखारबिन्द,

छूटे भ्रमफन्द परम मन्द द्वन्द भारे ||

बोलत अवनिप-कुमार ठाढ़े नृपभवन-द्वार,

रुप-सील-गुन उदार जागहु मेरे प्यारे |

पद २९

बिलखित कुमुदनि, चकोर, चक्रवाक हरष भोर

राग बिभास

बिलखित कुमुदनि, चकोर, चक्रवाक हरष भोर,

करत सोर तमचुर खग, गुञ्जत अलि न्यारे ||

रुचिर मधुर भोजन करि, भूषन सजि सकल अंग,

सङ्ग अनुज बालक सब बिबिध बिधि सँवारे |

करतल गहि ललित चाप भञ्जन रिपु-निकर-दाप,

कटितट पटपीत, तून सायक अनियारे ||

उपबन मृगया-बिहार-कारन गवने कृपाल,

जननी मुख निरखि पुन्यपुञ्ज निज बिचारे |

तुलसिदास सङ्ग लीजै, जानि दीन अभय कीजै

दीजै मति बिमल गावै चरित बर तिहारे ||

पद ३०

खेलन चलिये आनँदकन्द

राग नट

खेलन चलिये आनँदकन्द |

सखा प्रिय नृपद्वार ठाढ़े बिपुल बालक-बृन्द ||

तृषित तुम्हरे दरस कारन चतुर चातक-दास |

बपुष-बारिद बरषि छबि-जल हरहु लोचन-प्यास ||

बन्धु-बचन बिनीत सुनि उठे मनहुँ केहरि-बाल |

ललित लघु सर-चाप कर, उर-नयन-बाहु बिसाल ||

चलत पद प्रतिबिम्ब राजत अजिर सुखमा-पुञ्ज |

प्रेमबस प्रति चरन महि मानो देति आसन कञ्ज ||

निरखि परम बिचित्र सोभा चकित चितवहिं मात |

हरष-बिबस न जात कहि, "निज भवन बिहरहु, तात ||

देखि तुलसीदास प्रभु-छबि रहे सब पल रोकि |

थकित निकर चकोर मानहुँ सरद इंदु बिलोकि ||