बालकाण्ड · भाग २
झूलत राम पालने सोहैं
झूलत राम पालने सोहैं | भूरि-भाग जननीजन जोहैं ||
तन मृदु मञ्जुल मेचकताई | झलकति बाल बिभूषन झाँई ||
अधर-पानि-पद लोहित लोने | सर-सिङ्गार-भव सारस सोने ||
किलकत निरखि बिलोल खेलौना | मनहुँ बिनोद लरत छबि छौना ||
रञ्जित-अंजन कञ्ज-बिलोचन | भ्राजत भाल तिलक गोरोचन ||
लस मसिबिन्दु बदन-बिधु नीको | चितवत चितचकोर तुलसीको ||
राजत सिसुरूप राम सकल गुन-निकाय-धाम
राजत सिसुरूप राम सकल गुन-निकाय-धाम,
कौतुकी कृपालु ब्रह्म जानु-पानि-चारी |
नीलकञ्ज-जलदपुञ्ज-मरकतमनि-सरिस स्याम,
काम कोटि सोभा अंग अंग उपर बारी ||
हाटक-मनि-रत्न-खचित रचित इंद्र-मन्दिराभ,
इंदिरानिवास सदन बिधि रच्यो सँवारी |
बिहरत नृप-अजिर अनुज सहित बालकेलि-कुसल,
नील-जलज-लोचन हरि मोचन भय भारी ||
अरुन चरन अंकुस-धुज-कञ्ज-कुलिस-चिन्ह रुचिर,
भ्राजत अति नूपुर बर मधुर मुखरकारी |
किङ्किनी बिचित्र जाल, कम्बुकण्ठ ललित माल,
उर बिसाल केहरि-नख, कङ्कन करधारी ||
चारु चिबुक नासिका कपोल, भाल तिलक, भ्रुकुटि,
श्रवन अधर सुन्दर, द्विज-छबि अनूप न्यारी |
मनहुँ अरुन कञ्ज-कोस मञ्जुल जुगपाँति प्रसव,
कुन्दकली जुगल जुगल परम सुभ्रवारी ||
चिक्कन चिकुरावली मनो षडङ्घ्रि-मण्डली,
बनी, बिसेषि गुञ्जत जनु बालक किलकारी |
इकटक प्रतिबिम्ब निरखि पुलकत हरि हरषि हरषि,
लै उछङ्ग जननी रसभङ्ग जिय बिचारी ||
जाकहँ सनकादि सम्भु नारदादि सुक मुनीन्द्र,
करत बिबिध जोग काम क्रोध लोभ जारी |
दसरथ गृह सोइ उदार, भञ्जन संसार-भार,
लीला अवतार तुलसिदास-त्रासहारी ||
आँगन फिरत घुटुरुवनि धाए
आँगन फिरत घुटुरुवनि धाए |
नील-जलद तनु-स्याम राम-सिसु जननि निरखि मुख निकट बोलाए ||
बन्धुक सुमन अरुन पद-पङ्कज अंकुस प्रमुख चिन्ह बनि आए |
नूपुर जनु मुनिबर-कलहंसनि रचे नीड़ दै बाँह बसाए ||
कटिमेखल, बर हार ग्रीव-दर, रुचिर बाँह भूषन पहिराए |
उर श्रीवत्स मनोहर हरिनख हेम मध्य मनिगन बहु लाए ||
सुभग चिबुक, द्विज, अधर, नासिका, श्रवन, कपोल मोहि अति भाए |
भ्रू सुन्दर करुनारस-पूरन, लोचन मनहु जुगल जलजाए ||
भाल बिसाल ललित लटकन बर, बालदसाके चिकुर सोहाए |
मनु दोउ गुर सनि कुज आगे करि ससिहि मिलन तमके गन आए ||
उपमा एक अभूत भई तब जब जननी पट पीत ओढ़ाए |
नील जलदपर उडुगन निरखत तजि सुभाव मनो तड़ित छपाए ||
अंग-अंगपर मार-निकर मिलि छबि समूह लै-लै जनु छाए |
तुलसिदास रघुनाथ रूप-गुन तौ कहौं जो बिधि होहिं बनाए ||
रघुबर बाल छबि कहौं बरनि
रघुबर बाल छबि कहौं बरनि |
सकल सुखकी सींव, कोटि-मनोज-सोभाहरनि ||
बसी मानहु चरन-कमलनि अरुनता तजि तरनि |
रुचिर नूपुर किङ्किनी मन हरति रुनझुनु करनि ||
मञ्जु मेचक मृदुल तनु अनुहरति भूषन भरनि |
जनु सुभग सिङ्गार सिसु तरु फर्यो है अदभुत फरनि ||
भुजनि भुजग, सरोज नयननि, बदन बिधु जित्यो लरनि |
रहे कुहरनि सलिल, नभ, उपमा अपर दुरि डरनि ||
लसत कर-प्रतिबिम्ब मनि-आँगन घुटुरुवनि चरनि |
जनु जलज-सम्पुट सुछबि भरि-भरि धरति उर धरनि ||
पुन्यफल अनुभवति सुतहि बिलोकि दसरथ-घरनि |
बसति तुलसी-हृदय प्रभु-किलकनि ललित लरखरनि ||
नेकु बिलोकि धौं रघुबरनि |
चारु फल त्रिपुरारि तोको दिये कर नृप-घरनि ||
बाल भूषन बसन, तन सुन्दर रुचिर रजभरनि |
परसपर खेलनि अजिर, उठि चलनि, गिरि गिरि परनि ||
झुकनि, झाँकनि, छाँह सों किलकनि, नटनि हठि लरनि |
तोतरी बोलनि, बिलोकनि, मोहनी मनहरनि ||
सखि-बचन सुनि कौसिला लखि सुढर पासे ढरनि |
लेति भरि भरि अंक सैन्तति पैन्त जनु दुहु करनि ||
चरित निरखत बिबुध तुलसी ओट दै जलधरनि |
चहत सुर सुरपति भयो सुरपति भये चहै तरनि ||
भूमितल भूपके बड़े भाग
भूमितल भूपके बड़े भाग |
राम लखन रिपुदमन भरत सिसु निरखत अति अनुराग ||
बालबिभूषन लसत पायँ मृदु मञ्जुल अंग-बिभाग |
दसरथ-सुकृत मनोहर बिरवनि रूप-करह जनु लाग ||
राजमराल बिराजत बिहरत जे हर-हृदय-तड़ाग |
ते नृप-अजिर जानु कर धावत धरन चटक चल काग ||
सिद्ध सिहात, सराहत मुनिगन, कहैं सुर किन्नर नाग |
"ह्वै बरु बिहँग बिलोकिय बालक बसि पुर उपबन बाग||
परिजन सहित राय रानिन्ह कियो मज्जन प्रेम-प्रयाग |
तुलसी फल ताके चार्यो मनि मरकत पङ्कजराग ||
छँगन मँगन अँगना खेलत चारु चार्यो भाई
छँगन मँगन अँगना खेलत चारु चार्यो भाई |
सानुज भरत लाल लषन राम लोने लोने
लरिका लखि मुदित मातु समुदाई ||
बाल बसन भूषन धरे, नख-सिख छबि छाई |
नील पीत मनसिज-सरसिज मञ्जुल
मालनि मानो है देहनितें दुति पाई ||
ठुमुकु ठुमुकु पग धरनि, नटनि, लरखरनि सुहाई |
भजनि, मिलनि, रुठनि, तूठनि, किलकनि,
अवलोकनि, बोलनि बरनि न जाई ||
जननि सकल चहुँ ओर आलबाल मनि-अँगनाई |
दसरथ-सुकृत बिबुध-बिरवा बिलसत
बिलोकि जनु बिधि बर बारि बनाई ||
हरि बिरञ्चि हर हेरि राम प्रेम-परबसताई |
सुख-समाज रघुराजके बरनत
बिसुद्ध मन सुरनि सुमन झरि लाई ||
सुमिरत श्रीरघुबरनिकी लीला लरिकाई |
तुलसिदास अनुराग अवध आनँद
अनुभवत तब को सो अजहुँ अघाई ||
आँगन खेलत आनँदकन्द
आँगन खेलत आनँदकन्द | रघुकुल-कुमुद-सुखद चारु चन्द ||
सानुज भरत लषन सँग सोहैं | सिसु-भूषन भूषित मन मोहैं |
तन दुति मोरचन्द जिमि झलकैं | मनहुँ उमगि अँग-अँग छबि छलकैं ||
कटि किङ्किनि पग पैजनि बाजैं | पङ्कज पानि पहुँचिआँ राजैं |
कठुला कण्ठ बघनहा नीके | नयन-सरोज-मयन-सरसीके ||
लटकन लसत ललाट लटूरीं | दमकति द्वै द्वै दँतुरियाँ रुरीं |
मुनि-मन हरत मञ्जु मसि बुन्दा | ललित बदन बलि बाल मुकुन्दा ||
कुलही चित्र बिचित्र झँगूलीं | निरखत मातु मुदित मन फूलीं |
गहि मनिखम्भ डिम्भ डगि डोलत | कल बल बचन तोतरे बोलत ||
किलकत, झुकि झाँकत प्रतिबिम्बनि | देत परम सुख पितु अरु अंबनि |
सुमिरत सुखमा हिय हुलसी है | गावत प्रेम पुलकि तुलसी है ||
ललित सुतहि लालति सचु पाये
ललित सुतहि लालति सचु पाये |
कौसल्या कल कनक अजिर महँ सिखवति चलन अँगुरियाँ लाये ||
कटि किङ्किनी, पैजनी पायनि बाजति रुनझुन मधुर रेङ्गाये |
पहुँची करनि, कण्ठ कठुला बन्यो केहरि नख मनि-जरित जराये ||
पीत पुनीत बिचित्र झँगुलिया सोहति स्याम सरीर सोहाये |
दँतियाँ द्वै-द्वै मनोहर मुख छबि, अरुन अधर चित लेत चोराये ||
चिबुक कपोल नासिका सुन्दर, भाल तिलक मसिबिन्दु बनाये |
राजत नयन मञ्जु अंजनजुत खञ्जन कञ्ज मीन मद नाये ||
लटकन चारु भ्रुकुटिया टेढ़ी, मेढ़ी सुभग सुदेस सुभाये |
किलकि किलकि नाचत चुटकी सुनि, डरपति जननि पानि छुटकाये ||
गिरि घुटुरुवनि टेकि उठि अनुजनि तोतरि बोलत पूप देखाये |
बाल-केलि अवलोकि मातु सब मुदित मगन आनँद न अमाये ||
देखत नभ घन-ओट चरित मुनि जोग समाधि बिरति बिसराये |
तुलसिदास जे रसिक न यहि रस ते नर जड जीवत जग जाये ||
छोटी छोटी गोड़ियाँ अँगुरियाँ छबीलीं छोटी
छोटी छोटी गोड़ियाँ अँगुरियाँ छबीलीं छोटी,
नख-जोति मोती मानो कमल-दलनिपर |
ललित आँगन खेलैं, ठुमुकु ठुमुकु चलैं,
झुँझुनु झुँझुनु पाँय पैजनी मृदु मुखर ||
किङ्किनी कलित कटि हाटक जटित मनि,
मञ्जु कर-कञ्जनि पहुँचियाँ रुचिरतर |
पियरी झीनी झँगुली साँवरे सरीर खुली,
बालक दामिनि ओढ़ी मानो बारे बारिधर ||
उर बघनहा, कण्ठ कठुला, झँडूले केश,
मेढ़ी लटकन मसिबिन्दु मुनि-मन-हर |
अंजन-रञ्जित नैन, चित चोरै चितवनि,
मुख-सोभापर वारौं अमित असमसर ||
चुटकी बजावती नचावती कौसल्या माता,
बालकेलि गावती मल्हावती सुप्रेम-भर |
किलकि किलकि हँसैं, द्वै-द्वै दँतुरियाँ लसैं,
तुलसीके मन बसैं तोतरे बचन बर ||
सादर सुमुखि बिलोकि राम-सिसुरूप, अनूप भूप लिये कनियाँ |
सुदंर स्याम सरोज बरन तनु, नखसिख सुभग सकल सुखदनियाँ ||
अरुन चरन नखजोति जगमगति, रुनझुनु करति पाँय पैञ्जनियाँ |
कनक-रतन-मनि जटित रटति कटि किङ्किनि
कलित पीतपट-तनियाँ ||
पहुँची करनि, पदिक हरिनख उर, कठुला कण्ठ, मञ्जु गजमनियाँ |
रुचिर चिबुक, रद, अधर मनोहर, ललित
नासिका लसति नथुनियाँ ||
बिकट भ्रुकुटि, सुखमानिधि आनन, कल
कपोल, काननि नगफनियाँ |
भाल तिलक मसिबिन्दु बिराजत, सोहति सीस लाल चौतनियाँ ||
मनमोहनी तोतरी बोलनि, मुनि-मन-हरनि हँसनि किलकनियाँ |
बाल सुभाय बिलोल बिलोचन, चोरति चितहि चारु चितवनियाँ ||
सुनि कुलबधू झरोखनि झाँकति रामचन्द्र-छबि चन्दबदनियाँ |
तुलसीदास प्रभु देखि मगन भईं प्रेमबिबस कछु सुधि न अपनियाँ ||
सोहत सहज सुहाये नैन
सोहत सहज सुहाये नैन |
खञ्जन मीन कमल सकुचत तब जब उपमा चाहत कबि दैन ||
सुन्दर सब अंगनि सिसु-भूषन राजत जनु सोभा आये लैन |
बड़ो लाभ, लालची लोभबस रहि गयो लखि सुखमा बहु मैन ||
भोर भूप लिये गोद मोद भरे, निरखत बदन, सुनत कल बैन |
बालक-रूप अनूप राम-छबि निवसति तुलसिदास-उर-ऐन ||
भोर भयो जागहु, रघुनन्दन
भोर भयो जागहु, रघुनन्दन | गत-व्यलीक भगतनि उर-चन्दन ||
ससि करहीन, छीन दुति तारे | तमचुर मुखर, सुनहु मेरे प्यारे ||
बिकसित कञ्ज, कुमुद बिलखाने | लै पराग रस मधुप उड़ाने ||
अनुज सखा सब बोलनि आये | बन्दिन्ह अति पुनीत गुन गाये ||
मनभावतो कलेऊ कीजै | तुलसिदास कहँ जूठनि दीजै ||
प्रात भयो तात, बलि मातु बिधु-बदनपर
प्रात भयो तात, बलि मातु बिधु-बदनपर
मदन वारौं कोटि, उठो प्रान-प्यारे !
सूत-मागध-बन्दि बदत बिरुदावली,
द्वार सिसु अनुज प्रियतम तिहारे ||
कोक गतसोक अवलोकि ससि छीनछबि,
अरुनमय गगन राजत रुचि तारे |
मनहुँ रबि बाल मृगराज तमनिकर-करि
दलित, अति ललित मनिगन बिथारे ||
सुनहु तमचुर मुखर,कीर कलहंस पिक
केकि रव कलित, बोलत बिहँग बारे |
मनहुँ मुनिबृन्द रघुबंसमनि! रावरे
गुनत गुन आश्रमनि सपरिवारे ||
सरनि बिकसित कञ्जपुञ्ज मकरन्दवर,
मञ्जुतर मधुर मधुकर गुँजारे |
मनहुँ प्रभुजनम सुनि चैन अमरावती,
इन्दिरानन्द-मन्दिर सँवारे ||
प्रेम-सम्मिलित बर बचन-रचना अकनि
राम राजीव-लोचन उघारे |
दास तुलसी मुदित, जननि करै आरती,
सहज सुन्दर अजिर पाँव धारे ||
जागिये कृपानिधान जानराय रामचन्द्र
जागिये कृपानिधान जानराय रामचन्द्र
जननी कहै बार-बार भोर भयो प्यारे |
राजिवलोचन बिसाल, प्रीति-बापिका मराल,
ललित कमल-बदन ऊपर मदन कोटि बारे ||
अरुन उदित, बिगत सरबरी, ससाङ्क किरनहीन,
दीन दीपजोति, मलिन, दुति समूह तारे |
मनहुँ ग्यानघन-प्रकास, बीते सब भव-बिलास
आस-त्रास तिमिर तोष तरनि-तेज जारे ||
बोलत खगनिकर मुखर मधुर करि प्रतीति सुनहु
श्रवन, प्रानजीवन धन, मेरे तुम बारे |
मनहुँ बेद-बन्दी-मुनिबृन्द-सूत-मागधादि
बिरुद बदत "जय जय जय जयति कैटभारे||
बिकसित कमलावली, चले प्रपुञ्ज चञ्चरीक,
गुञ्जत कल कोमल धुनि त्यागि कञ्ज न्यारे |
जनु बिराग पाइ सकल सोक-कूप-गृह बिहाइ
भृत्य प्रेममत्त फिरत गुनत गुन तिहारे ||
सुनत बचन प्रिय रसाल जागे अतिसय दयाल
भागे जञ्जाल बिपुल, दुख-कदम्ब दारे |
तुलसिदास अति अनन्द देखिकै मुखारबिन्द,
छूटे भ्रमफन्द परम मन्द द्वन्द भारे ||
बोलत अवनिप-कुमार ठाढ़े नृपभवन-द्वार,
रुप-सील-गुन उदार जागहु मेरे प्यारे |
बिलखित कुमुदनि, चकोर, चक्रवाक हरष भोर
बिलखित कुमुदनि, चकोर, चक्रवाक हरष भोर,
करत सोर तमचुर खग, गुञ्जत अलि न्यारे ||
रुचिर मधुर भोजन करि, भूषन सजि सकल अंग,
सङ्ग अनुज बालक सब बिबिध बिधि सँवारे |
करतल गहि ललित चाप भञ्जन रिपु-निकर-दाप,
कटितट पटपीत, तून सायक अनियारे ||
उपबन मृगया-बिहार-कारन गवने कृपाल,
जननी मुख निरखि पुन्यपुञ्ज निज बिचारे |
तुलसिदास सङ्ग लीजै, जानि दीन अभय कीजै
दीजै मति बिमल गावै चरित बर तिहारे ||
खेलन चलिये आनँदकन्द
खेलन चलिये आनँदकन्द |
सखा प्रिय नृपद्वार ठाढ़े बिपुल बालक-बृन्द ||
तृषित तुम्हरे दरस कारन चतुर चातक-दास |
बपुष-बारिद बरषि छबि-जल हरहु लोचन-प्यास ||
बन्धु-बचन बिनीत सुनि उठे मनहुँ केहरि-बाल |
ललित लघु सर-चाप कर, उर-नयन-बाहु बिसाल ||
चलत पद प्रतिबिम्ब राजत अजिर सुखमा-पुञ्ज |
प्रेमबस प्रति चरन महि मानो देति आसन कञ्ज ||
निरखि परम बिचित्र सोभा चकित चितवहिं मात |
हरष-बिबस न जात कहि, "निज भवन बिहरहु, तात ||
देखि तुलसीदास प्रभु-छबि रहे सब पल रोकि |
थकित निकर चकोर मानहुँ सरद इंदु बिलोकि ||