अयोध्याकाण्ड · भाग ३
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 26 से 35/पृष्ठ 8
(33)
बोले राज देनको, रजायसु भो काननको,
आनन प्रसन्न, मन मोद, बड़ो काज भो |
मातु-पिता-बन्धु-हित आपनो परम हित,
मोको बीसहूकै ईस अनुकूल आजु भो ||
असन अजीरनको समुझि तिलक तज्यो
बिपिन-गवनु भले भूखेको सुनाजु भो |
धरम-धुरीन धीर बीर रघुबीरजूको,
कोटि राज सरिस भरतजूको राजु भो ||
ऐसी बातैं कहत सुनत मग-लोगनकी,
चले जात बन्धु दोउ मुनिको सो साज भो |
ध्याइबेको, गाइबेको, सेइबे सुमिरिबेको,
तुलसीको सब भाँति सुखद समाज भो ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 26 से 35/पृष्ठ 9
(34)
सिरिस-सुमन-सुकुमारि, सुखमाकी सींव,
सीय राम बड़े ही सकोच सङ्ग लई है |
भाईके प्रान समान, प्रियाके प्रानके प्रान,
जानि बानि प्रीति रीति कृपसील मई है ||
आलबाल-अवध सुकामतरु कामबेलि,
दूरि करि केकी बिपत्ति-बेलि बई है |
आप, पति, पूत, गुरुजन, प्रिय परिजन,
प्रजाहूको कुटिल दुसह दसा दई है ||
पङ्कज-से पगनि पानह्यौं न, परुष पन्थ,
कैसे निबहे हैं, निबहैङ्गे, गति नई है |
येही सोच-सङ्कट-मगन मग-नर-नारि,
सबकी सुमति राम-राग, रँग रई है ||
एक कहैं, बाम बिधि दाहिनो हमको भयो,
उत कीन्हीं पीठि, इतको सुडीठि भई है|
तुलसी सहित बनबासी मुनि हमरिऔ,
अनायास अधिक अघाइ बनि गई है ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 26 से 35/पृष्ठ 10
(35)
नीके कै मैं न बिलोकन पाए |
सखि यहि मग जुग पथिक मनोहर, बधु बिधु-बदनि समेत सिधाए ||
नयन सरोजस किसोर बयस बर, सीस जटा रचि मुकुट बनाए |
कटि मुनिबसन-तून, धनु-सर कर, स्यामल-गौर, सुभाय सोहाए ||
सुन्दर बदन बिसाल बाहु-उर, तनु-छबि कोटि मनोज लजाए |
चितवत मोहि लगी चौन्धी-सी, जानौं न, कौन, कहाँ तें धौं आए ||
मनु गयो सङ्ग, सोचबस लोचन मोचत बारि, कितौ समुझाए |
तुलसिदास लालसा दरसकी सोइ पुरवै, जेहि आनि देखाए ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 1
(36)
पुनि न फिरे दोउ बीर बटाऊ |
स्यामल गौर, सहज सुदंर, सखि बारक बहुरि बिलोकिबे काऊ ||
कर-कमलनि सर, सुभग सरासन, कटि मुनिबसन-निषङ्ग सोहाए |
भुज प्रलम्ब, सब अंग मनोहर, धन्य सो जनक-जननि जेहि जाए ||
सरद-बिमल बिधु बदन, जटा सिर, मञ्जुल अरुन-सरोरुह-लोचन |
तुलसिदास मनमय मारगमें राजत कोटि-मदन-मदमोचन ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 2
(37)
आली काहू तौ बूझौ न, पथिक कहाँ धौं सिधैहैं |
कहाँतें आए हैं, को हैं, कहा नाम स्याम-गोरे,
काज कै कुसल फिरि एहि मग ऐहैं ||
उठति बयस, मसि भीञ्जति, सलोने सुठि,
सोभा-देखवैया बिनु बित्त ही बिकैहैं |
हिये हेरि हरि लेत लोनी ललना समेत,
लोयननि लाहु देत जहाँ जहाँ जैहैं ||
राम-लषन-सिय-पन्थिकी कथा पृथुल,
प्रेम बिथकीं कहति सुमुखि सबै हैं |
तुलसी तिन्ह सरिस तेऊ भूरिभाग जेऊ
सुनि कै सुचित तेहि समै समैहैं ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 3
(38)
बहुत दिन बीते सुधि कछु न लही |
गए जो पथिक गोरे-साँवरे सलोने,
सखि सङ्ग नारि सुकुमारि रही ||
जानि-पहिचानि बिनु आपुतें, आपुने हुतें,
प्रानहुतें प्यारे प्रियतम उपही |
सुधाके, सनेहहूके सार लै सँवारे बिधि,
जैसे भावते हैं भाँति जाति न कही ||
बहुरि बिलोकिबे कबहुक, कहत,
तनु पुलक, नयन जलधार बही |
तुलसी प्रभु सुमिरि ग्रामजुबती सिथिल,
बिनु प्रयास परीं प्रेम सही ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 4
(39)
आली री पथिक जे एहि पथ परौं सिधाए |
ते तौ राम-लषन अवधतें आए ||
सङ्ग सिय सब अंग सहज सोहाए |
रति-काम-ऋतुपति कोटिक लजाए ||
राजा दसरथ, रानी कौसिला जाए |
कैकेयी कुचाल करि कानन पठाए ||
बचन कुभामिनीके भूपहि क्यों भाए
हाय हाय राय बाम बिधि भरमाए ||
कुलगुर सचिव काहू न समुझाए |
काँच-मनि लै अमोल मानिक गवाँए ||
भाग मग-लोगनिके, देखन जे पाए |
तुलसी सहित जिन गुन-गन गाए ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 5
(40)
सखि जबतें सीतासमेत देखे दोउ भाई |
तबतें परै न कल, कछू न सोहाई ||
नखसिख नीके, नीके निरखि निकाई |
तन-सुधि गई, मन अनत न जाई ||
हेरनि-हँसनि हिय लिये हैं चोराई |
पावन-प्रेम-बिबस भई हौं पराई ||
कैसे पितु-मातु प्रिय परिजन-भाई
जीवत जीवके जीवन बनहि पठाई ||
समौ सो चित करि हित अधिकाई |
प्रीति ग्रामबधुनकी तुलसिहु गाई ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 6
(41)
जबतें सिधारे यहि मारग लषन-राम,
जानकी सहित, तबतें न सुधि लही है |
अवध गए धौं फिरि, कैधौं चढ़े बिन्ध्यगिरि,
कैधौं कहुँ रहे, सो कछू, न काहू कही है ||
एक कहै, चित्रकूट निकट नदीके तीर,
परनकुटीर करि बसे, बात सही है |
सुनियत, भरत मनाइबेको आवत हैं,
होइगी पै सोई, जो बिधाता चित्त चही है ||
सत्यसन्ध, धरम-धुरीन रघुनाथजूको,
आपनी निबारिबे, नृपकी निरबही है |
दस-चारि बरिस बिहार बन पदचार,
करिबे पुनीत सैल, सर-सरि, मही है ||
मुनि-सुर-सुजन-समाजके सुधारि काज,
बिगरि बिगरि जहाँ जहाँ जाकी रही है |
पुर पाँव धारिहैं, उधारिहैं तुलसीहू से जन,
जिन जानि कै गरीबी गाढ़ी गही है ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 7
(42)
ये उपही कोउ कुँवर अहेरी |
स्याम गौर, धनु-बान-तूनधर चित्रकूट अब आइ रहे, री ||
इन्हहि बहुत आदरत महामुनि, समाचार मेरे नाह कहे, री |
बनिता-बन्धु समेत बसे बन, पितु हित कठिन कलेस सहे, री ||
बचन परसपर कहति किरातिनि, पुलक गात, जल नयन बहे, री |
तुलसी प्रभुहि बिलेकति एकटक, लोचन जनु बिनु पलक लहें, री ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 8
(43)
चित्रकूट-वर्णन
चित्रकूट अति बिचित्र, सुन्दर बन, महि पबित्र,
पावनि पय-सरित सकल मल-निकन्दिनी |
सानुज जहँ बसत राम, लोक-लोचनाभिराम,
बाम अंग बामाबर बिस्व-बन्दिनी ||
रिषिबर तहँ छन्द बास, गावत कलकण्ठ हास,
कीर्तन उनमाय काय क्रोध-कन्दिनी |
बर बिधान करत गान, वारत धन-मान-प्रान,
झरना झर झिँग झिँग झिङ्ग जलतरङ्गिनी ||
बर बिहारु चरन चारु पाँडर चम्पक चनार
करनहार बार पार पुर-पुरङ्गिनी |
जोबन नव ढरत ढार दुत्त मत्त मृग मराल
मन्द मन्द गुञ्जत हैं अलि अलिङ्गिनी ||
चितवत मुनिगन चकोर, बैठे निज ठौर ठौर,
अच्छय अकलङ्क सरद-चन्द-चन्दिनी |
उदित सदा बन-अकास, मुदित बदत तुलसिदास,
जय जय रघुनन्दन जय जनकनन्दिनी ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 9
(44)
फटिकसिला मृदु बिसाल, सङ्कुल सुरतरु-तमाल
ललित लता-जाल हरति छबि बितानकी |
मन्दाकिनि-तटिनि-तीर, मञ्जुल मृग-बिहग-भीर
धीर मुनिगिरा गभीर सामगानकी ||
मधुकर-पिक-बरहि मुखर, सुन्दर गिरि निरझर झर,
जल-कन घन-छाँह, छन प्रभा न भानकी |
सब ऋतु ऋतुपति प्रभाउ, सन्तत बहै त्रिबिध बाउ,
जनु बिहार-बाटिका नृप पञ्च बानकी ||
बिरचित तहँ परनसाल, अति बिचित्र लषनलाल,
निवसत जहँ नित कृपालु राम-जानकी |
निजकर राजीवनयन पल्लव-दल-रचित सयन,
प्यास परसपर पीयूष प्रेम-पानकी ||
सिय अँग लिखैं धातुराग, सुमननि भूषन-बिभाग,
तिलक-करनि का कहौं कलानिधानकी |
माधुरी-बिलास-हास, गावत जस तुलसिदास,
बसति हृदय जोरी प्रिय परम प्रानकी ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 10
(45)
लोने लाल लषन, सलोने राम, लोनी सिय,
चारु चित्रकूट बैठे सुरतरु-तर हैं |
गोरे-साँवरे सरीर पीत नीलनीरज-से
प्रेम-रुप-सुखमाके मनसिज-सर हैं ||
लोने नख-सिख, निरुपम, निरखन जोग,
बड़े उर कन्धर बिसाल भुज बर हैं |
लोने लोने लोचन, जटनिके मुकुट लोने,
लोने बदननि जीते कोटि सुधाकर हैं ||
लोने लोने धनुष, बिसिष कर-कमलनि,
लोने मुनिपट, कटि लोने सरघर हैं |
प्रिया प्रिय बन्धुको दिखावत बिटप, बेलि,
मञ्जु कुञ्ज, सिलातल, दल, फूल, फर हैं ||
ऋषिनके आश्रम सराहैं, मृग-नाम कहैं,
लागी मधु, सरित झरत निरझर हैं |
नाचत बरहि नीके, गावत मधुप-पिक,
बोलत बिहङ्ग, नभ-जल-थल-चर हैं ||
प्रभुहि बिलोकि मुनिगन पुलके कहत
भूरिभाग भये सब नीच नारि-नर हैं |
तुलसी सो सुख-लाहु लूटत किरात-कोल
जाको सिसकत सुर बिधि-हरि-हर हैं ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 11
(46)
आइ रहे जबतें दोउ भाई |
तबतें चित्रकूट-कानन-छबि दिन दिन अधिक अधिक अधिकाई ||
सीता-राम-लषन-पद-अंकित अवनि सोहावनि बरनि न जाई |
मन्दाकिनि मज्जत अवलोकत त्रिबिध पाप, त्रयताप नसाई ||
उकठेउ हरित भए जल-थलरुह, नित नूतन राजीव सुहाई |
फूलत, फलत, पल्लवत, पलुहत बिटप बेलि अभिमत सुखदाई ||
सरित-सरनि सरसीरुह सङ्कुल, सदन सँवारि रमा जनु छाई |
कूजत बिहँग, मञ्जु गुञ्जत अलि जात पथिक जनु लेत बुलाई ||
त्रिबिध समीर, नीर, झर झरननि, जहँ तहँ रहे ऋषि कुटी बनाई |
सीतल सुभग सिलनिपर तापस करत जोग-जप-तप मन लाई ||
भए सब साधु किरात-किरातिनि, राम-दरस मिटि गै कलुषाई |
खग-मृग मुदित एक सँग बिहरत सहज बिषम बड़ बैर बिहाई ||
कामकेलि-बाटिका बिबुध-बन-लघु उपमा कबि कहत लजाई |
सकल-भुवन-सोभा सकेलि मनो राम बिपिन बिधि आनि बसाई ||
बन मिस मुनि, मुनितिय, मुनि-बालक बरनत रघुबर-बिमल-बड़ाई |
पुलक सिथिल तनु, सजल सुलोचनु, प्रमुदित मन जीवन फलु पाई ||
क्यों कहौं चित्रकूट-गिरि, सम्पति-महिमा-मोद-मनोहरहताई |
तुलसी जहँ बसि लषन-रामसिय आनँद-अवधि अवध बिसराई ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 12
(47) (1)
देखत चित्रकूट-बन मन अति होत हुलास |
सीता-राम-लषन-प्रिय, तापस-बृन्द-निवास ||
सरित सोहावनि पावनि, पापहरनि पय नाम |
सिद्ध-साधु-सुर-सेबित देति सकल मन-काम ||
बिटप-बेलि नव किसलय, कुसुमित सघन सुजाति |
कन्दमूल,जल-थलरुह अगनित अनबन भाँति ||
बञ्जुल मञ्जु, बकुलकुल, सुरतरु, ताल तमाल |
कदलि, कदम्ब, सुचम्पक, पाटल, पनस, रसाल ||
भूरुह भूरि भरे जनु छबि-अनुराग-सभाग |
बन बिलोकि लघु लागहिं बिपुल बिबुध-बन-बाग ||
जाइ न बरनि राम-बन, चितवत चित हरि लेत |
ललित-लता-द्रुम-सङ्कुल मनहु मनोज निकेत ||
सरित-सरनि सरसीरुह फूले नाना रङ्ग |
गुञ्जत मञ्जु मधुपबन, कूजतक बिबिध बिहङ्ग ||
लषन कहेउ रघुनन्दन देखिय बिपिन-समाज |
मानहु चयन मयन-पुर आयौ प्रिय ऋतुराज ||
चित्रकूटपर राउर जानि अधिक अनुरागु |
सखासहित जनु रतिपति आयौ खेलन फागु ||
झिल्लि झाँझ, झरना डफ नव मृदङ्ग निसान |
भेरि उपङ्ग भृङ्ग रव, ताल कीर, कलगान ||
हंस कपोत कबूतर बोलत चक्क चकोर |
गावत मनहु नारिनर मुदित नगर चहुँ ओर ||