श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

अयोध्याकाण्ड · भाग ४

गीतावली · अयोध्याकाण्ड · भाग ४
पद ४६

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 13

(47) (2)

चित्र-बिचित्र बिबिध मृग डोलत डोङ्गर डाँग |

जनु पुरबीथिन बिहरत छैल सँवारे स्वाँग ||

नाचहिं मोर, पिक गावहिंस सुर बर राग बँधान |

निलज तरुन-तरुनी जनु खेलहिं समय समान ||

भरि भरि सुण्ड करिनि-करि जहँ तहँ डारहिं बारि |

भरत परसपर पिचकनि मनहु मुदित नर-नारि ||

पीठि चढ़ाइ सिसुन्ह कपि कूदत डारहि डार |

जनु मुँह लाइ गेरु-मसि भए खरनि असवार ||

लिये पराग सुमनरस डोलत मलय-समीर |

मनहु अरगजा छिरकत, भरत गुलाल-अबीर ||

काम कौतुकी यहि बिधि प्रभुहित कौतुक कीन्ह |

रीझि राम रतिनाथहि जग-बिजयी बर दीन्ह ||

दुखवहु मोरे दास जनि, मानेहु मोरि रजाइ |

भलेहि नाथ माथे धरि आयसु चलेउ बजाइ ||

मुदित किरात-किरातिनि रघुबर-रुप निहारि |

प्रभुगुन गावत नाचत चले जोहारि जोहारि ||

देहिं सीस, प्रसंसहिं मुनि सुर बरषहिं फूल |

गवने भवन राखि उर मूरति मङ्गलमूल ||

चित्रकूट-कानन-छबि को बरनै पार |

जहँ सिय-लषनसहित नित रघुबर करहिं बिहार ||

तुलसिदास चाँचरि मिस कहे राम-गुनग्राम |

गावहिं, सुनहिं नारि-नर, पावहिं सब अभिराम ||

पद ४७

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 14

(48)

रागबसन्त

आजु बन्यो है बिपिन देखो, राम धीर | मानो खेलत फागु मुद मदनबीर ||

बट, बकुल, कदम्ब, पनस, रसाल | कुसुमित तरु-निकर कुरव-तमाल |

मानो बिबिध बेष धरे छैल-जूथ | बिच बीच लता ललना-बरुथ ||

पनवानक निरझर, अलि उपङ्ग | बोलत पारावत मानो डफ-मृदङ्ग |

गायक शुक-कोकिल, झिल्लि ताल | नाचत बहु भाँति बरहि मराल ||

मलयानिल सीतल, सुरभि, मन्द | बह सहित सुमन-रस रेनु बृन्द |

मनु छिरकत फिरत सबनि सुरङ्ग | भ्राजत उदार लीला अनङ्ग ||

क्रीडत जीते सुर-असुर-नाग | हठि सिद्ध-मुनिनके पन्थ लाग |

कह तुलसिदास, तेहि छाड़ु मैन | जेहि राख राम राजीव नैन ||

पद ४८

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 15

(49)

ऋतु-पति आए भलो बन्यो बन समाज | मानो भए हैं मदन महाराज आज ||

मनो प्रथम फागु मिस करि अनीति | होरीमिस अरि पुर जारि जीति |

मारुत मिस पत्र-प्रजा उजारि | नयनगर बसाए बिपिन झारि ||

सिंहासन सैल-सिला सुरङ्ग | कानन-छबि रति, परिजन कुरङ्ग |

सित छत्र सुमन, बल्ली बितान | चामर समीर, निरझर निसान ||

मनो मधु-माधव दोउ अनिप धीर | बर बिपुल बिटप बानैत बीर |

मधुकर-सुक-कोकिलबन्दि-बृन्द | बरनहिं बिसुद्ध जस बिबिध छन्द ||

महि परत सुमन-रस फल पराग | जनु देत इतर नृप कर-बिभाग |

कलि सचिव सहित नय-निपुन मार | कियो बिस्व बिबस चारिहु प्रकार ||

बिरहिनपर नित नै परै मारि | डाँड़ियत सिद्ध-साधक प्रचारि |

तिनकी न काम सकै चापि छाँह | तुलसी जे बसहिं रघुबीर-बाँह ||

पद ४९

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 1

(50)

रागमलार

सब दिन चित्रकूट नीको लागत |

बरषाऋतु प्रबेस बिसेष गिरि देखन मन अनुरागत ||

चहुँदिसि बन सम्पन्न, बिहँग-मृग बोलत सोभा पावत |

जनु सुनरेस देस-पुर प्रमुदित प्रजा सकल सुख छावत ||

सोहत स्याम जलद मृदु घोरत धातु रँगमगे सृङ्गनि |

मनहु आदि अंभोज बिराजत सेवित सुर-मुनि-भृङ्गनि ||

सिखर परस घन-घटहि, मिलति बग-पाँति सो छबि कबि बरनी |

आदि बराह बिहरि बारिधि मनो उठ्यो है दसन धरि धरनी ||

जल जुत बिमल सिलनि झलकत नभ बन-प्रतिबिम्ब तरङ्ग |

मानहु जग-रचना बिचित्र बिलसति बिराट अँग अंग ||

मन्दाकिनिहि मिलत झरना झरि झरि भरि भरि जल आछे |

तुलसी सकल सुकृत-सुख लागे मानो राम-भगतिके पाछे ||

पद ५०

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 2

(51)

कौसल्याकी विरह-वेदना

रागसोरठ

आजुको भोर, और सो, माई |

सुनौं न द्वार बेद-बन्दी-धुनि गुनिगन-गिरा सोहाई ||

निज निज सुन्दर पति-सदननितें रुप-सील-छबिछाईं |

लेन असीस सीय आगे करि मोपै सुतबधू न आईं ||

बूझी हौं न बिहँसि मेरे रघुबर कहाँ री! सुमित्रा माता?|

तुलसी मनहु महासुख मेरो देखि न सकेउ बिधाता ||

पद ५१

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 3

(52)

जननी निरखति बान-धनुहियाँ |

बार-बार उर नैननि लावति प्रभुजूकी ललित पनहियाँ ||

कबहूँ प्रथम ज्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सँवारे |

उठहु तात! बलि मातु बदनपर, अनुज-सखा सब द्वारे ||

कबहूँ कहति यों, बड़ी बार भै, जाहु भूप पहँ, भैया |

बन्धु बोलि जेंइय जो भावै, गई निछावरि मैया ||

कबहूँ समुझि बन-गवन रामको रहि चकि चित्र लिखी-सी |

तुलसिदास वह समय कहेतें लागति प्रीति सिखी-सी ||

पद ५२

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 4

(53)

माई री! मोहि कोउ न समुझावै |

राम-गवन साँचो किधौं सपनो, मन परतीति न आवै ||

लगेइ रहत मेरे नैननि आगे राम-लखन अरु सीता |

तदपि न मिटत दाह या उरको, बिधि जो भयो बिपरीता ||

दुख न रहै रघुपतिहि बिलोकत, तनु न रहै बिनु देखे |

करत न प्रान पयान, सुनहु, सखि! अरुझि परी यहि लेखे ||

कौसल्याके बिरह-बचन सुनि रोइ उठीं सब रानी |

तुलसिदास रघुबीर-बिरहकी पीर न जाति बखानी ||

पद ५३

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 5

(54)

जब जब भवन बिलोकति सूनो |

तब तब बिकल होति कौसल्या, दिन दिन प्रति दुख दूनो ||

सुमिरत बाल-बिनोद रामके सुन्दर मुनि-मन-हारी |

होत हृदय अति सूल समुझि पदपङ्कज अजिर-बिहारी ||

को अब प्रात कलेऊ माँगत रुठि चलैगो, माई !|

स्याम-तामरस-नैन स्रवत जल काहि लेउँ उर लाई ||

जीवौं तौ बिपति सहौं निसि-बासर, मरौं तौ मन पछितायो |

चलत बिपिन भरि नयन रामको बदन न देखन पायो ||

तुलसिदास यह दुसह दसा अति, दारुन बिरह घनेरो |

दूरि करै को भूरि कृपा बिनु सोकजनित रुज मेरो ?||

पद ५४

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 6

(55)

मेरो यह अभिलाषु बिधाता |

कब पुरवै सखि सानुकूल ह्वै हरि सेवक-सुखदाता ||

सीता-सहित कुसल कोसलपुर आवत हैं सुत दोऊ |

श्रवन-सुधा-सम बचन सखी कब आइ कहैगो कोऊ ||

सुनि सन्देस प्रेम-परिपूरन सम्भ्रम उठि धावोङ्गी |

बदन बिलोकि रोकि लोचन-जल हरषि हिये लावोङ्गी ||

जनकसुता कब सासु कहैं मोहि, राम लषन कहैं मैया |

बाहु जोरि कब अजिर चलहिङ्गे स्याम-गौर दोउ भैया ||

तुलसिदास यहि भाँति मनोरथ करत प्रीति अति बाढ़ी |

थकित भई उर आनि राम-छबि मनहु चित्र लिख काढ़ी ||

पद ५५

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 7

(56)

महाराज दशरथका देहत्याग

सुन्यौ जब फिरि सुमन्त पुर आयो |

कहिहै कहा, प्रानपतिकी गति, नृपति बिकल उठि धायो ||

पाँय परत मन्त्री अति ब्याकुल, नृप उठाय उर लायो |

दसरथ-दसा देखि न कह्यो कछु, हरि जो सँदेस पठायो ||

बूझि न सकत कुसल प्रीतमकी, हृदय यहै पछितायो |

साँचेहु सुत-बियोग सुनिबे कहँ धिग बिधि मोहि जिआयो ||

तुलसिदास प्रभु जानि निठुर हौं न्याय नाथ बिसरायो |

हा रघुपति कहि पर्यो अवनि, जनु जलतें मीन बिलगायो ||

पद ५६

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 8

(57)

मुएहु न मिटैगो मेरो मानसिक पछिताउ |

नारिबस न बिचारि कीन्हौं काज, सोचत राउ ||

तिलकको बोल्यौ, दिये बन, चौगुनो चित चाउ |

हृदय दाड़िम ज्यौं न बिदर्यो समुझि सील-सुभाउ ||

सीय-रघुबर-लषन बिनु भय भभरि भगी न आउ |

मोहि बूझि न परत, यातें कौन कठिन कुघाउ ||

सुनि सुमन्त! कि आनि सुन्दर सुवन सहित जिआउ |

दास तुलसी नतरु मोको मरन अमिय पिआउ ||

पद ५७

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 9

(58)'''

अवध बिलोकि हौं जीवत रामभद्र-बिहीन!

कहा करिहैं आइ सानुज भरत धरमधुरीन ||

राम-सोक-सनेह-सङ्कुल, तनु बिकल,मनु लीन |

टुटि तारो गगन-मग ज्यों होत छिन-छिन छीन ||

हृदय समुझि सनेह सादर प्रेम पावन मीन |

करी तुलसीदास दसरथ प्रीति-परमिति पीन ||

पद ५८

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 10

(59)

रागगौरी

करत राउ मनमों अनुमान |

सोक-बिकल, मुख बचन न आवै, बिछुरै कृपानिधान ||

राज देन कहि बोलि नारि-बस मैं जो कह्यो बन जान |

आयसु सिर धरि चले हरषि हिय कानन भवन समान ||

ऐसे सुतके बिरह-अवधि लौं जौ राखौं यह प्रान |

तौ मिटि जाइ प्रीतिकी परमिति, अजस सुनौं निज कान ||

राम गए अजहूँ हौं जीवत, समुझत हिय अकुलान |

तुलसिदास तनु तजि रघुपति हित कियो प्रेम परवान ||

पद ५९

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 11

(60)

भरतजी अयोध्यामें

ऐसे तैं क्यों कटु बचन कह्यो री ?

राम जाहु कानन, कठोर तेरो कैसे धौं हृदय रह्यो, री ||

दिनकर-बंस, पिता दसरथ-से, राम-लषन-से भाई |

जननी !तू जननी ?तौ कहा कहौं, बिधि केहि खोरि न लाई ||

हौं लहिहौं सुख राजमातु ह्वै, सुत सिर छत्र धरैगो |

कुल-कलङ्क मल-मूल मनोरथ तव बिनु कौन करैगो ?||

ऐहैं राम, सुखी सब ह्वैहैं, ईस अजस मेरो हरिहैं |

तुलसिदास मोको बड़ो सोच है, तू जनम कौनि बिधि भरिहै ||

पद ६०

गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 61 से 70/पृष्ठ 1

(61)

ताते हौं देत न दूषन तोहू |

रामबिरोधी उर कठोरतें प्रगट कियो है बिधि मोहू ||

सुन्दर सुखद सुसील सुधानिधि, जरनि जाइ जिहि जोए |

बिष-बारुनी-बन्धु कहियत बिधु! नातो मिटत न धोए ||

होते जौ न सुजान-सिरोमनि राम सवके मन माहीं |

तौ तोरी करतूति, मातु! सुनि प्रीति-प्रतीति कहा हीं ?||

मृदु मञ्जुल सीञ्ची-सनेह सुचि सुनत भरत-बर-बानी |

तुलसी साधु-साधु ,सुर-नर-मुनि कहत प्रेम पहिचानी ||