अयोध्याकाण्ड · भाग ४
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 13
(47) (2)
चित्र-बिचित्र बिबिध मृग डोलत डोङ्गर डाँग |
जनु पुरबीथिन बिहरत छैल सँवारे स्वाँग ||
नाचहिं मोर, पिक गावहिंस सुर बर राग बँधान |
निलज तरुन-तरुनी जनु खेलहिं समय समान ||
भरि भरि सुण्ड करिनि-करि जहँ तहँ डारहिं बारि |
भरत परसपर पिचकनि मनहु मुदित नर-नारि ||
पीठि चढ़ाइ सिसुन्ह कपि कूदत डारहि डार |
जनु मुँह लाइ गेरु-मसि भए खरनि असवार ||
लिये पराग सुमनरस डोलत मलय-समीर |
मनहु अरगजा छिरकत, भरत गुलाल-अबीर ||
काम कौतुकी यहि बिधि प्रभुहित कौतुक कीन्ह |
रीझि राम रतिनाथहि जग-बिजयी बर दीन्ह ||
दुखवहु मोरे दास जनि, मानेहु मोरि रजाइ |
भलेहि नाथ माथे धरि आयसु चलेउ बजाइ ||
मुदित किरात-किरातिनि रघुबर-रुप निहारि |
प्रभुगुन गावत नाचत चले जोहारि जोहारि ||
देहिं सीस, प्रसंसहिं मुनि सुर बरषहिं फूल |
गवने भवन राखि उर मूरति मङ्गलमूल ||
चित्रकूट-कानन-छबि को बरनै पार |
जहँ सिय-लषनसहित नित रघुबर करहिं बिहार ||
तुलसिदास चाँचरि मिस कहे राम-गुनग्राम |
गावहिं, सुनहिं नारि-नर, पावहिं सब अभिराम ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 14
(48)
आजु बन्यो है बिपिन देखो, राम धीर | मानो खेलत फागु मुद मदनबीर ||
बट, बकुल, कदम्ब, पनस, रसाल | कुसुमित तरु-निकर कुरव-तमाल |
मानो बिबिध बेष धरे छैल-जूथ | बिच बीच लता ललना-बरुथ ||
पनवानक निरझर, अलि उपङ्ग | बोलत पारावत मानो डफ-मृदङ्ग |
गायक शुक-कोकिल, झिल्लि ताल | नाचत बहु भाँति बरहि मराल ||
मलयानिल सीतल, सुरभि, मन्द | बह सहित सुमन-रस रेनु बृन्द |
मनु छिरकत फिरत सबनि सुरङ्ग | भ्राजत उदार लीला अनङ्ग ||
क्रीडत जीते सुर-असुर-नाग | हठि सिद्ध-मुनिनके पन्थ लाग |
कह तुलसिदास, तेहि छाड़ु मैन | जेहि राख राम राजीव नैन ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 36 से 50/पृष्ठ 15
(49)
ऋतु-पति आए भलो बन्यो बन समाज | मानो भए हैं मदन महाराज आज ||
मनो प्रथम फागु मिस करि अनीति | होरीमिस अरि पुर जारि जीति |
मारुत मिस पत्र-प्रजा उजारि | नयनगर बसाए बिपिन झारि ||
सिंहासन सैल-सिला सुरङ्ग | कानन-छबि रति, परिजन कुरङ्ग |
सित छत्र सुमन, बल्ली बितान | चामर समीर, निरझर निसान ||
मनो मधु-माधव दोउ अनिप धीर | बर बिपुल बिटप बानैत बीर |
मधुकर-सुक-कोकिलबन्दि-बृन्द | बरनहिं बिसुद्ध जस बिबिध छन्द ||
महि परत सुमन-रस फल पराग | जनु देत इतर नृप कर-बिभाग |
कलि सचिव सहित नय-निपुन मार | कियो बिस्व बिबस चारिहु प्रकार ||
बिरहिनपर नित नै परै मारि | डाँड़ियत सिद्ध-साधक प्रचारि |
तिनकी न काम सकै चापि छाँह | तुलसी जे बसहिं रघुबीर-बाँह ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 1
(50)
सब दिन चित्रकूट नीको लागत |
बरषाऋतु प्रबेस बिसेष गिरि देखन मन अनुरागत ||
चहुँदिसि बन सम्पन्न, बिहँग-मृग बोलत सोभा पावत |
जनु सुनरेस देस-पुर प्रमुदित प्रजा सकल सुख छावत ||
सोहत स्याम जलद मृदु घोरत धातु रँगमगे सृङ्गनि |
मनहु आदि अंभोज बिराजत सेवित सुर-मुनि-भृङ्गनि ||
सिखर परस घन-घटहि, मिलति बग-पाँति सो छबि कबि बरनी |
आदि बराह बिहरि बारिधि मनो उठ्यो है दसन धरि धरनी ||
जल जुत बिमल सिलनि झलकत नभ बन-प्रतिबिम्ब तरङ्ग |
मानहु जग-रचना बिचित्र बिलसति बिराट अँग अंग ||
मन्दाकिनिहि मिलत झरना झरि झरि भरि भरि जल आछे |
तुलसी सकल सुकृत-सुख लागे मानो राम-भगतिके पाछे ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 2
(51)
कौसल्याकी विरह-वेदना
आजुको भोर, और सो, माई |
सुनौं न द्वार बेद-बन्दी-धुनि गुनिगन-गिरा सोहाई ||
निज निज सुन्दर पति-सदननितें रुप-सील-छबिछाईं |
लेन असीस सीय आगे करि मोपै सुतबधू न आईं ||
बूझी हौं न बिहँसि मेरे रघुबर कहाँ री! सुमित्रा माता?|
तुलसी मनहु महासुख मेरो देखि न सकेउ बिधाता ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 3
(52)
जननी निरखति बान-धनुहियाँ |
बार-बार उर नैननि लावति प्रभुजूकी ललित पनहियाँ ||
कबहूँ प्रथम ज्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सँवारे |
उठहु तात! बलि मातु बदनपर, अनुज-सखा सब द्वारे ||
कबहूँ कहति यों, बड़ी बार भै, जाहु भूप पहँ, भैया |
बन्धु बोलि जेंइय जो भावै, गई निछावरि मैया ||
कबहूँ समुझि बन-गवन रामको रहि चकि चित्र लिखी-सी |
तुलसिदास वह समय कहेतें लागति प्रीति सिखी-सी ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 4
(53)
माई री! मोहि कोउ न समुझावै |
राम-गवन साँचो किधौं सपनो, मन परतीति न आवै ||
लगेइ रहत मेरे नैननि आगे राम-लखन अरु सीता |
तदपि न मिटत दाह या उरको, बिधि जो भयो बिपरीता ||
दुख न रहै रघुपतिहि बिलोकत, तनु न रहै बिनु देखे |
करत न प्रान पयान, सुनहु, सखि! अरुझि परी यहि लेखे ||
कौसल्याके बिरह-बचन सुनि रोइ उठीं सब रानी |
तुलसिदास रघुबीर-बिरहकी पीर न जाति बखानी ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 5
(54)
जब जब भवन बिलोकति सूनो |
तब तब बिकल होति कौसल्या, दिन दिन प्रति दुख दूनो ||
सुमिरत बाल-बिनोद रामके सुन्दर मुनि-मन-हारी |
होत हृदय अति सूल समुझि पदपङ्कज अजिर-बिहारी ||
को अब प्रात कलेऊ माँगत रुठि चलैगो, माई !|
स्याम-तामरस-नैन स्रवत जल काहि लेउँ उर लाई ||
जीवौं तौ बिपति सहौं निसि-बासर, मरौं तौ मन पछितायो |
चलत बिपिन भरि नयन रामको बदन न देखन पायो ||
तुलसिदास यह दुसह दसा अति, दारुन बिरह घनेरो |
दूरि करै को भूरि कृपा बिनु सोकजनित रुज मेरो ?||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 6
(55)
मेरो यह अभिलाषु बिधाता |
कब पुरवै सखि सानुकूल ह्वै हरि सेवक-सुखदाता ||
सीता-सहित कुसल कोसलपुर आवत हैं सुत दोऊ |
श्रवन-सुधा-सम बचन सखी कब आइ कहैगो कोऊ ||
सुनि सन्देस प्रेम-परिपूरन सम्भ्रम उठि धावोङ्गी |
बदन बिलोकि रोकि लोचन-जल हरषि हिये लावोङ्गी ||
जनकसुता कब सासु कहैं मोहि, राम लषन कहैं मैया |
बाहु जोरि कब अजिर चलहिङ्गे स्याम-गौर दोउ भैया ||
तुलसिदास यहि भाँति मनोरथ करत प्रीति अति बाढ़ी |
थकित भई उर आनि राम-छबि मनहु चित्र लिख काढ़ी ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 7
(56)
महाराज दशरथका देहत्याग
सुन्यौ जब फिरि सुमन्त पुर आयो |
कहिहै कहा, प्रानपतिकी गति, नृपति बिकल उठि धायो ||
पाँय परत मन्त्री अति ब्याकुल, नृप उठाय उर लायो |
दसरथ-दसा देखि न कह्यो कछु, हरि जो सँदेस पठायो ||
बूझि न सकत कुसल प्रीतमकी, हृदय यहै पछितायो |
साँचेहु सुत-बियोग सुनिबे कहँ धिग बिधि मोहि जिआयो ||
तुलसिदास प्रभु जानि निठुर हौं न्याय नाथ बिसरायो |
हा रघुपति कहि पर्यो अवनि, जनु जलतें मीन बिलगायो ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 8
(57)
मुएहु न मिटैगो मेरो मानसिक पछिताउ |
नारिबस न बिचारि कीन्हौं काज, सोचत राउ ||
तिलकको बोल्यौ, दिये बन, चौगुनो चित चाउ |
हृदय दाड़िम ज्यौं न बिदर्यो समुझि सील-सुभाउ ||
सीय-रघुबर-लषन बिनु भय भभरि भगी न आउ |
मोहि बूझि न परत, यातें कौन कठिन कुघाउ ||
सुनि सुमन्त! कि आनि सुन्दर सुवन सहित जिआउ |
दास तुलसी नतरु मोको मरन अमिय पिआउ ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 9
(58)'''
अवध बिलोकि हौं जीवत रामभद्र-बिहीन!
कहा करिहैं आइ सानुज भरत धरमधुरीन ||
राम-सोक-सनेह-सङ्कुल, तनु बिकल,मनु लीन |
टुटि तारो गगन-मग ज्यों होत छिन-छिन छीन ||
हृदय समुझि सनेह सादर प्रेम पावन मीन |
करी तुलसीदास दसरथ प्रीति-परमिति पीन ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 10
(59)
करत राउ मनमों अनुमान |
सोक-बिकल, मुख बचन न आवै, बिछुरै कृपानिधान ||
राज देन कहि बोलि नारि-बस मैं जो कह्यो बन जान |
आयसु सिर धरि चले हरषि हिय कानन भवन समान ||
ऐसे सुतके बिरह-अवधि लौं जौ राखौं यह प्रान |
तौ मिटि जाइ प्रीतिकी परमिति, अजस सुनौं निज कान ||
राम गए अजहूँ हौं जीवत, समुझत हिय अकुलान |
तुलसिदास तनु तजि रघुपति हित कियो प्रेम परवान ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 50 से 60/पृष्ठ 11
(60)
भरतजी अयोध्यामें
ऐसे तैं क्यों कटु बचन कह्यो री ?
राम जाहु कानन, कठोर तेरो कैसे धौं हृदय रह्यो, री ||
दिनकर-बंस, पिता दसरथ-से, राम-लषन-से भाई |
जननी !तू जननी ?तौ कहा कहौं, बिधि केहि खोरि न लाई ||
हौं लहिहौं सुख राजमातु ह्वै, सुत सिर छत्र धरैगो |
कुल-कलङ्क मल-मूल मनोरथ तव बिनु कौन करैगो ?||
ऐहैं राम, सुखी सब ह्वैहैं, ईस अजस मेरो हरिहैं |
तुलसिदास मोको बड़ो सोच है, तू जनम कौनि बिधि भरिहै ||
गीतावली अयोध्याकाण्ड पद 61 से 70/पृष्ठ 1
(61)
ताते हौं देत न दूषन तोहू |
रामबिरोधी उर कठोरतें प्रगट कियो है बिधि मोहू ||
सुन्दर सुखद सुसील सुधानिधि, जरनि जाइ जिहि जोए |
बिष-बारुनी-बन्धु कहियत बिधु! नातो मिटत न धोए ||
होते जौ न सुजान-सिरोमनि राम सवके मन माहीं |
तौ तोरी करतूति, मातु! सुनि प्रीति-प्रतीति कहा हीं ?||
मृदु मञ्जुल सीञ्ची-सनेह सुचि सुनत भरत-बर-बानी |
तुलसी साधु-साधु ,सुर-नर-मुनि कहत प्रेम पहिचानी ||