उत्तरकाण्ड · भाग ३
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 7
(25) सीता-वनवास
सङ्कट-सुकृतको सोचत जानि जिय रघुराउ |
सहस द्वादस पञ्चसतमें कछुक है अब आउ ||
भोग पुनि पितु-आयुको, सोउ किए बनै बनाउ |
परिहरे बिनु जानकी नहि और अनघ उपाउ ||
पालिबे असिधार-ब्रत, प्रिय प्रेम-पाल सुभाउ |
होइ हित केहि भाँति, नित सुबिचारु, नहि चित चाउ ||
निपट असमञ्जसहु बिलसति मुख मनोहरताउ |
परम धीर-धुरीन हृदय कि हरष-बिसमय काउ ?||
अनुज-सेवक-सचिव हैं सब सुमति, साध सखाउ |
जान कोउ न जानकी बिनु अगम अलख लखाउ ||
राम जोगवत सीय-मनु, प्रिय-मनहि प्रानप्रियाउ |
परम पावन प्रेम-परमिति समुझि तुलसी गाउ ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 8
(26)
राम बिचारि कै राखी ठीक दै मन माहिं |
लोक-बेद-सनेह पालत पल कृपालहि जाहिं ||
प्रियतमा, पति देवता, जिहि उमा रमा सिहाहिं |
गुरुविनी सुकुमारि सिय तियमनि समुझि सकुचाहिं ||
मेरे ही सुख सुखी, सुख अपनो सपनहूँ नाहिं |
गेहिनी-गुन-गेहिनी गुन सुमिरि सोच समाहिं ||
राम-सीय-सनेह बरनत अगम सुकबि सकाहिं |
रामसीय-रहस्य तुलसी कहत राम-कृपाहिं ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 9
(27)
चरचा चरनिसों चरची जानमनि रघुराइ |
दूत-मुख सुनि लोक-धुनि घर घरनि बूझी आइ ||
प्रिया निज अभिलाष रुचि कहि कहति सिय सकुचाइ |
तीय-तनयसमेत तापस पूजिहौं बन जाइ ||
जानि करुनासिन्धु भाबी-बिबस सकल सहाइ |
धीर धरि रघुबीर भोरहि लिए लषन बोलाइ ||
"तात तुरतहि साजि स्यन्दन सीय लेहु चढ़ाइ |
बालमीकि मुनीस आस्रम आइयहु पहुँचाइ||
"भलेहि नाथ, सुहाथ माथे राखि राम-रजाइ |
चले तुलसी पालि सेवक-धरम अवधि अघाइ ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 10
(28)
आइ लषन लै सौम्पी सिय मुनीसहि आनि |
नाइ सिर रहे पाइ आसिष जोरि पङ्कजपानि ||
बालमीकि बिलोकि ब्याकुल लषन गरत गलानि |
सरबिबद बूझत न, बिधिकी बामता पहिचानि ||
जानि जिय अनुमानही सिय सहस बिधि सनमानि |
राम सदगुन-धाम-परमिति भई कछुक मलानि ||
दीनबन्धु दयालु देवर देखि अति अकुलानि |
कहति बचन उदास तुलसीदास त्रिभुवन-रानि ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 11
(29)
तौलों बलि, आपुही कीबी बिनय समुझि सुधारि |
जौलों हौं सिखि लेउँ बन रिषि-रीति बसि दिन चारि ||
तापसी कहि कहा पठवति नृपनिको मनुहारि |
बहुरि तिहि बिधि आइ कहिहै साधु कोउ हितकारि ||
लषनलाल कृपाल! निपटहि डारिबी न बिसारि |
पालबी सब तापसनि ज्यों राजधरम बिचारि ||
सुनत सीता-बचन मोचत सकल लोचन-बारि |
बालमीकि न सके तुलसी सो सनेह सँभारि ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 12
(30)
सुनि ब्याकुल भए, उतरु कछु कह्यो न जाइ |
जानि जिय बिधि बाम दीन्हों मोहि सरुष सजाइ ||
कहत हिय मेरी कठिनई लखि गई प्रीति लजाइ |
आजु अवसर ऐसेहू जौं न चले प्रान बजाइ ||
इतहि सीय-सनेह-सङ्कट उतहि राम-रजाइ |
मौनही गहि चरन, गौने सिख-सुआसिष पाइ ||
प्रेम-निधि पितुको कहे मैं परुष बचन अघाइ |
पाप तेहि परिताप तुलसी उचित सहे सिराइ ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 1
(31)
गौने मौनही बारहि बारि परि परि पाय |
जात जनु रथ चीर कर लछिमन मगन पछिताय ||
असन बिनु बन, बरम बिनु रन, बच्यौ कठिन कुघाय |
दुसह साँसति सहनको हनुमान ज्यायो जाय ||
हेतु हौं सियहरनको तब, अबहु भयो सहाय |
होत हठि मोहि दाहिनो दिन दैव दारुन दाय ||
तज्यो तनु सङ्ग्राम जेहि लगि गीध जसी जटाय |
ताहि हौं पहुँचाइ कानन चल्यों अवध सुभाय ||
घोरहृदय कठोर-करतब सृज्यो हौं बिधि बायँ |
दास तुलसी जानि राख्यो कृपानिधि रघुराय ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 2
(32)
पुत्रि! न सोचिए आई हौं जनक-गृह जिय जानि |
कालिही कल्यान-कौतुक, कुसल तव, कल्यानि ||
राजरिषि पितु-ससुर प्रभु पति, तू सुमङ्गलखानि |
ऐसेहू थल बामता, बड़ि बाम बिधि की बानि ||
बोलि मुनि कन्या सिखाई प्रीति-गति पहिचानि |
आलसिन्हकी देवसरि सिय सेइयहु मन मानि ||
न्हाइ प्रातहि पूजिबो बट बिटप अभिमत-दानि |
सुवन-लाहु, उछाहु दिन दिन, देबि, अनहित-हानि ||
पार-ताप-बिमोचनी कहि कथा सरस पुरानि |
बालमीकि प्रबोधि तुलसी, गई गरुइ गलानि ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 3
(33)
जबतें जानकी रही रुचिर आस्रम आइ |
गगन, जल, थल बिमल तबतें, सकल मङ्गलदाइ ||
निरस भूरुह सरस फूलत, फलत अति अधिकाइ |
कन्द-मूल, अनेक अंकुर स्वाद सुधा लजाइ ||
मलय मरुत, मराल-मधुकर-मोर-पिक-समुदाइ |
मुदित-मन मृग-बिहग बिहरत बिषम बैर बिहाइ ||
रहत रबि अनुकूल दिन, ससि रजनि सजनि सुहाइ |
सीय सुनि सादर सराहति सखिन्ह भलो मनाइ ||
मोद बिपिन बिनोद चितवत लेत चितहि चोराइ |
राम बिनु सिय सुखद बन, तुलसी कहै किमि गाइ ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 4
(34) लव-कुश-जन्म
सुभ दिन, सुभ घरी, नीको नखत, लगन सुहाइ |
पूत जाये जानकी द्वै, मुनिबधू, उठीं गाइ ||
हरषि बरषत सुमन सुर गहगहे बधाए बजाइ |
भुवन, कानन, आस्रमनि रहे मोद-मङ्गल छाइ ||
तेहि मुनिसों बिदा गवनें भोर सो सुख पाइ ||
मातु-मौसी-बहिनिहूतें, सासुतें अधिकाइ |
करहिं तापस-तीय-तनया सीय-हित चित लाइ ||
किए बिधि-ब्यवहार मुनिबर बिप्रबृन्द बोलाइ |
कहत सब, रिषिकृपाको फल भयो आजु अघाइ ||
सुरुष ऋषि, सुख सुतनिको, सिय-सुखद सकल सहाइ |
सूल राम-सनेहको तुलसी न जियतें जाइ ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 5
(35)
मुनिबर करि छठी कीन्हीं बारहेङ्की रीति |
बन-बसन पहिराइ तापस, तोषि पोषे प्रीति ||
नामकरन सुअन्नप्रासन बेद बाँधी नीति |
समय सब रिषिराज करत समाज साज समीति ||
बाल लालहिं, कहहिं करहैं राज सब जग जीति |
राम-सिय-सुत, गुर-अनुग्रह, उचित, अचल प्रतीति ||
निरखि बाल-बिनोद तुलसी जात बासर बीति |
पिय-चरित-चित-चितेरो लिखत नित हित-भीति ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 6
(36)
बालक सीयके बिहरत मुदित-मन दोउ भाइ |
नाम लव-कुस राम-सिय अनुहरति सुन्दरताइ ||
देत मुनि मुनि-सिसु खेलौना, ते लै धरत दुराइ |
खेल खेलत नृप-सिसुन्हके बालबृन्द बोलाइ ||
भूप-भूषन-बसन-बाहन, राज-साज सजाइ |
बरम-चरम, कृपान-सर, धनु-तून लेत बनाइ ||
दुखी सिय पिय-बिरह तुलसी, सुखी सुत-सुख पाइ |
आँच पय उफनात सीञ्चत सलिल ज्यों सकुचाइ ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 7
(37)
कैकेयी जौलों जियति रही |
तौलों बात मातुसों मुँह भरि भरत न भूलि कही ||
मानी राम अधिक जननीतें, जननिहु गँस न गही |
सीय-लषन रिपुदवन राम-रुख लखि सबकी निबही ||
लोक-बेद-मरजाद दोष-गुन-गति चित चख न चही |
तुलसी भरत समुझि सुनि राखी राम-सनेह सही ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 8
(38) रामचरितका उल्लेख
.राग रामकली
रघुनाथ तुम्हारे चरित मनोहर गावहिं सकल अवधबासी |
अति उदार अवतार मनुज-बपु धरे ब्रह्म अज अबिनासी ||
प्रथम ताड़का हति, सुबाहु बधि, मख राख्यो द्विज, हितकारी |
देखि दुखी अति सिला सापबस रघुपति बिप्रनारि तारी ||
सब भूपनको गरब हर्यो, हरि भञ्ज्यो सम्भु-चाप भारी |
जनकसुता समेत आवत गृह परसुराम अति मदहारी ||
तात-बचन तजि राज-काज सुर चित्रकूट मुनिबेष धर्यो |
एक नयन कीन्हों सुरपति-सुत, बधि बिराध रिषि-सोक हर्यो ||
पञ्चबटी पावन राघव करि सूपनखा कुरूप कीन्हीं |
खर-दूषन संहारि कपटमृग-गीधराज कहँ गति दीन्हीं ||
हति कबन्ध, सुग्रीव सखा करि, बेधे ताल, बालि मार्यो |
बानर-रीछ सहाय, अनुज सँग सिन्धु बाँधि जस बिस्तार्यो ||
सकुल पुत्र दल सहित दसानन मारि अखिल सुर-दुख टार्यो |
परमसाधु जिय जानि बिभीषन लङ्कापुरी तिलक सार्यो ||
सीता अरु लछिमन सँग लीन्हें औरहु जिते दास आए |
नगर निकट बिमान आए, सब नर-नारी देखन धाए ||
सिव-बिरञ्चि, सुक-नारिदादि मुनि अस्तुति करत बिमल बानी |
चौदह भुवन चराचर हरषित, आए राम राजधानी ||
मिले भरत, जननी, गुर, परिजन चाहत परम अनन्द भरे |
दुसह-बियोग-जनित दारुन दुख रामचरन देखत बिसरे ||
बेद-पुरान बिचारि लगन सुभ महाराज अभिषेक कियो |
तुलसिदास जिय जानि सुअवसर भगति-दान तब माँगि लियो ||
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श्री सीताराम चन्द्रार्पणमस्तु'''