श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

उत्तरकाण्ड · भाग २

गीतावली · उत्तरकाण्ड · भाग २
पद १६

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 6

(16)

राग बिलावल

रघुबर-रूप बिलोकु, नेकु मन |

सकल लोक-लोचन-सुखदायक, नखसिख सुभग स्यामसुन्दर तन ||

चारु चरन-तल-चिन्ह चारि फल चारि देत परचारि जानि जन |

राजत नख जनु कमल-दलनिपर अरुन-प्रभा-रञ्जित तुषार-कन ||

जङ्घा-जानु आनु कदली उर, कटि किङ्किनि, पटपीत सुहावन |

रुचिर निषङ्ग, नाभि, रोमावलि, त्रिबलि, बलित उपमा कछु आव न ||

भृगुपद-चिन्ह, पदिक, उर सोभित, मुकुतमाल, कुङ्कुम-अनुलेपन |

मनहुँ परसपर मिलि पङ्कज-रबि प्रगट्यो निज अनुराग, सुजस घन ||

बाहु बिसाल ललित सायक-धनु, कर कङ्कन केयूर महाधन |

बिमल दुकूल-दलन दामिनि-दुति, यज्ञोपवीत लसत अति पावन ||

कम्बुग्रीव, छबि सींव, चिबुक, द्विज, अधर, कपोल, बोल, भय-मोचन |

नासिक सुभग, कृपापरिपूरन तरुन अरुन राजीव बिलोचन ||

कुटिल भ्रुकुटिबर, भाल तिलक रुचि, सुचि सुन्दरता स्रवन-बिभूषन |

मनहुँ मारि मनसिज पुरारि दिय ससिहि चाप सर-मकर अदूषन ||

कुञ्चित कच, कञ्चन-किरीट सिर, जटित ज्योतिमय बहुबिधि मनिगन |

तुलसिदास रबिकुल रबि-छबि कबि कहि न सकत सुक-सम्भु-सहसफन ||

पद १७

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 7

(17)

राग कान्हरा

देखो रघुपति-छबि अतुलित अति |

जनु तिलोक-सुषमा सकेलि बिधि राखी रुचिर अंग-अंगनि प्रति ||

पदुमराग रुचि मृदु पदतल धुज-अंकुस-कुलिस-कमल यहि सूरति |

रही आनि चहुँ बिधि भगतिनिकी जनु अनुरागभरी अंतरगति ||

सकल-सुचिन्ह-सुजन-सुखदायक, ऊरधरेख बिसेष बिराजति |

मनहुँ भानु-मण्डलहि सँवारत धर्यो सूत बिधि-सुत बिचित्रमति ||

सुभग अँगुष्ठ, अंगुली अबिरल, कछुक अरुन नख-ज्योति जगमगति |

चरन-पीठ उन्नत नत पालक, गूढ़ गुलुफ, जङ्घा कदलीजति ||

काम तून-तल-सरिस जानु जुग, उरु करिकर करभहि बिलखावति |

रसना रचित रतन चामीकर, पीत बसन कटि कसे सरसावति ||

नाभी सर, त्रिवली निसेनिका, रोमराजिस सैवल-छबि पावति |

उर मुकुतामनि-माल मनोहर मनहु हंस-अवली उड़ि आवति ||

हृदय पदिक, भृग-चरन चिन्हबर-बाहु बिसाल जानुलगि पहुँचति |

कल केयूर पूर कञ्चन-मनि, पहुँची मञ्जु कञ्जकर सोहति ||

सुजव सुरेख सुनख अंगुलिजुत सुन्दर पानि मुद्रिका राजति |

अंगुलित्रान-कमान-बानछबि सुरनि सुखद, असुरनि उर सालति ||

स्याम सरीर सुचन्दन-चरचित पीत दुकूल अधिक छबि छाजति |

नील जलदपर निरखि चन्द्रिका दुरनि त्यागि दामिनि जनु दमकति ||

यज्ञोपबीत पुनीत बिराजत गूढ़ जत्रु बनि पीन अंस तति |

सुगढ़ पुष्ट उन्नत कृकाटिका, कम्बु-कण्ठ-सोभा मन मानति ||

सरद-समय-सरसीरुह-निन्दक मुख सुषमा कछु कहत न बानति |

निरखतही नयननि निरुपम सुख, रबिसुत-मदन-सोम-दुति निदरित ||

अरुन अधर, द्विजपाँति अनूपम, ललित हँसनि जनु मन आकरषति |

बिद्रुम-रचित बिमानमध्य जनु सुरमण्डली सुमन-चय-बरसति ||

मञ्जुल चिबुक, मनोरम हनुथल, कल कपोल, नासा मन मोहति |

पङ्कज-मान-बिमोचन लोचन, चितवनि चारु अमृत-जल सीञ्चति ||

केस सुदेस, गँभीर बचन बर स्रुतिकुण्डल-डोलनि जिय जागति |

लखि नवनील पयोद, रवित सुनि, रुचिर मोर जोरी जनु नाचति ||

भौंहै बङ्क मयङ्क-अंक-रुचि, कुङ्कुमरेख भाल भलि भ्राजति |

सिरसि, हेम-हीरक-मानिकमय मुकुट-प्रभा सब भुवन प्रकासति ||

बरनत रूप पार नहिं पावत निगम-सेष-सुक-सङ्कर-भारति |

तुलसिदास केहि बिधि बखानि कहै यह मन-बचन अगोचर मूरति ||

पद १८

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 8

(18)

राम-हिण्डोला

राग मलार

आली री! राघोके रुचिर हिण्डोलना झूलन जैए ||

फटिक-भीति सुचारु चहुँ दिसि, मञ्जु मनिमय पौरि |

गच काँच लखि मन नाच सिखि जनु, पाँचसर-सुफँसौरि ||

तोरन-बितान-पताक-चामर-धुज सुमन-फल घौरि |

प्रतिछाँह-छबि कबि-साखि दै प्रति सों कहै गुरु हौं रि ||

मदन-जयके खम्भ-से रचे खम्भ सरल बिसाल |

पाटीर-पाटि बिचित्र भँवरा बलित, बेलन लाल ||

डाँड़ो कनक कुङ्कुम-तिलक-रेख-सी मनसिज-भाल |

पटुली पदिक रति-हृदय जनु कलधौत कोमल माल ||

उनये सघन घनघोर, मृदु झरि सुखद सावन लाग |

बगपाँति, सुरधनु, दमक दामिनि हरित भूमि-बिभाग ||

दादुर मुदित, भरे सरित-सर, महि उमग जनु अनुराग |

पिक-मोर-मधुप-चकोर-चातक-सोर उपबन बाग ||

सो समौ देखि सुहावनो नवसत सँवारि-सँवारि |

गुन-रूप-जोबन-सींव सुन्दरि चलीं झुण्डनि झारि ||

हिण्डोल-साल बिलोकि सब अंचल पसारि-पसारि |

लागीं असीसन राम-सीतहि सुख-समाजु निहारि ||

झूलहिं, झुलावहिं, ओसरिन्ह गावैं सुहो, गौण्डमलार |

मञ्जीर-नूपुर-बलय-धुनि जनु काम-करतल-तार ||

अति मुचत स्रमकन मुखनि, बिथुरे चिकुर, बिलुलित हार |

तम तड़ित उडुगन अरुन बिधु जनु करत ब्योम- बिहार ||

हिय हरषि, बरषि प्रसून निरखति बिबुध-तिय तृन तूरि |

आनन्द-जल-लोचन, मुदित मन, पुलक तनु भरि पूरि ||

सब कहहिं, अबिचल राज नित, कल्यान-मङ्गल भूरि |

चिर जियौ जानकिनाथ जग तुलसी-सजीवनि-मूरि ||

पद १९

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 9

(19)

अयोध्याकी रमणीयता

(वर्षा-वर्णन 1)

राग सूहो

कोसलपुरी सुहावनी लरि सरजूके तीर |

भूपावली-मुकुटमनि नृपति जहाँ रघुबीर ||

पुर-नर-नारि चतुर अति, धरमनिपुन, रत-नीति |

सहज सुभाय सकल उर श्रीरघुबर-पद-प्रीति ||

श्रीरामपद-जलजात सबके प्रीति अबिरल पावनी |

जो चहत सुक-सनकादि, सम्भु-बिरञ्चि, मुनि-मन-भावनी ||

सबहीके सुन्दर मन्दिराजिर, राउ-रङ्क न लखि परै |

नाकेस-दुरलभ भोग लोग करहिं, न मन बिषयनि हरै ||

पद २०

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 10

(19)

(वर्षा-वर्णन 2)

सब रितु सुखप्रद सो पुरी, पावस अति कमनीय |

निरखत मनहिं हरत हठि हरित अवनि रमनीय ||

बीरबहूटि बिराजहीं, दादुर-धुनि चहु ओर |

मधुर गरजि घन बरषहिं, सुनि सुनि बोलत मोर ||

बोलत जो चातक-मोर, कोकिल-कीर, पारावत घने |

खग बिपुल पाले बालकनि कूजत उड़ात सुहावने ||

बकराजि राजति गगन, हरिधनु, तड़ित दस दिसि सोहहीं |

नभ-नगरकी सोभा अतुल अवलोकि मुनि-मन मोहहीं ||

पद २१

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 11

(19)

(वर्षा-वर्णन 3)

गृह-गृह रचे हिडोलना, महि गच काँच सुढार |

चित्र बिचित्र चहू दिसि परदा फकि-पगार ||

सरल बिसाल बिराजहीं बिद्रुम-खम्भ सुजोर |

चारु पाटि पटि पुरटकी झरकत मरकत भौंर ||

मरकत भवँर डाँड़ी कनक मनि-जटित दुति जगमगि रही |

पटुली मनहु बिधि निपुनता निज प्रगट करि राखी सही ||

बहुरङ्ग लसत बितान मुकुतादाम-सहित मनोहरा |

नव-सुमन-माल-सुगन्ध लोभे मञ्जु गुञ्जत मधुकरा ||

पद २२

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 12

(19)

(वर्षा-वर्णन 4)

झुण्ड-झुण्ड झूलन चलीं गजगामिनि बर नारि |

कुसुँभि चीर तनु सोहहीं, भूषन बिबिध सँवारि ||

पिकबयनी मृगलोचनी सारद ससि सम तुण्ड |

रामसुजस सब गावहीं सुसुर सुसारँग गुण्ड ||

सारङ्ग गुण्ड-मलार, सोरठ, सुहव सुघरनि बाजहीं |

बहु भाँति तान-तरङ्ग सुनि गन्धरब किन्नर लाजहीं ||

अति मचत, छूटत कुटिल कच, छबि अधिक सुन्दरि पावहीं |

पट उड़त, भूषन खसत, हँसि-हँसि अपर सखी झुलावहीं ||

पद २३

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 13

(19)

(वर्षा-वर्णन 5)

फिरि फिरि झूलहिं भामिनी अपनी अपनी बार |

बिबुध-बिमान थकित भए देखत चरित अपार ||

बरषि सुमन हरषहिं उर, बरनहिं हरगुन-गाथ |

पुनि पुनि प्रभुहि प्रसंसहीं जय जय जानकिनाथ ||

जय जानकीपति बिसद कीरति सकल-लोक-मलापहा |

सुरबधू देहिं असीस, चिरजिव राम, सुख-सम्पति महा ||

पावस समय कछु अवध बरनत सुनि अघौघ नसावहीं |

रघुबीरके गुनगन नवल नित दास तुलसी गावहीं ||

पद २४

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 14

(20)

दीपमालिका

राग आसावरी

साँझ समय रघुबीर-पुरीकी सोभा आजु बनी |

ललित दीपमालिका बिलोकहिं हित करि अवधधनी ||

फटिक-भीत-सिखरन-पर राजति कञ्चन-दीप-अनी |

जनु अहिनाथ मिलन आयो मनि-सोभित सहसफनी ||

प्रति मन्दिर कलसनिपर भ्राजहिं मनिगन दुति अपनी |

मानहुँ प्रगटि बिपुल लोहितपुर पठै दिये अवनी ||

घर घर मङ्गलचार एकरस हरषित रङ्क-गनी |

तुलसिदास कल कीरति गावहिं, जो कलिमल-समनी ||

पद २५

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 1

(21) (वसन्त-विहार 1)

राग गौरी

अवध नगर अति सुन्दर बर सरिताके तीर |

नीति-निपुन नर-दिय सबहिं धरम-धुरन्धर, धीर ||

सकल रितुन्ह सुखदायक, तामहँ अधिक बसन्त |

भूप-मौलि-मनिजहँ बस नृपति जानकीकन्त ||

बन उपबन नव किसलय, कुसुमित नाना रङ्ग |

बोलत मधुर मुखर खग पिकबर, गुञ्जत भृङ्ग ||

समय बिचारि कृपानिधि, देखि द्वार अति भीर |

खेलहु मुदित नारि-नर, बिहँसि कहेउ रघुबीर ||

नगर-नारि-नर हरषित सब चले खेलन फागु |

देखि राम छबि अतुलित उमगत उर अनुराग ||

स्याम-तमाल-जलदतनु निरमल पीत दुकूल |

अरुन-कञ्ज-दल-लोचन सदा दास अनुकूल ||

सिर किरीट स्रुति कुण्डल, तिलक मनोहर भाल|

कुञ्चित केस, कुटिल भ्रू, चितवनि भगत-कृपाल ||

कल कपोल, सुक नासिक, ललित अधर द्विज जोति |

अरुन कञ्ज महँ जनु जुग पाँति रुचिर गज-मोति ||

बर दर-ग्रीव, अमितबल बाहु सुपीन बिसाल |

कङ्कन-हार मनोहर, उरसि लसति बनमाल ||

उर भृगु-चरन बिराजत, द्विज-प्रिय चरित पुनीत |

भगत हेतु नर बिग्रह सुरबर गुन-गोतीत ||

उदर त्रिरेख मनोहर, सुन्दर नाभि गँभीर |

हाटक-घटित, जटित मनि कटितट रट मञ्जीर ||

उरु अरु जानु पीन, मृदु, मरकत खम्भ समान |

नूपुर मुनि-मन मोहत, करत सुकोमन गान ||

पद २६

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 2

(वसन्त-विहार 2)

अरुनबरन पदपङ्कज, नखदुति इंदु-प्रकास |

जनक-सुता-करपल्लव-लालित बिपुल बिलास ||

कञ्जकुलिस-धुज-अंकुस-रेख रचन सुभ चारि |

जन-मन-मीन हरन कहँ बंसी रची सँवारि ||

अंग अंग प्रति अतुलित सुषमा बरनि न जाइ |

एहि सुख मगन होइ मन फिरि नहि अनत लोभाइ ||

खेलत फागु, अवधपति, अनुज-सखा सब सङ्ग |

बरषि सुमन सुर निरखहिं सोभा अमित अनङ्ग ||

ताल, मृदङ्ग, झाँझ, डफ बाजहिं पनव-निसान |

सुघर सरस सहनाइन्ह गावहिं समय समान ||

बीना-बेनु-मधुर-धुनि सुनि किन्नर-गन्धर्ब |

निज-गुन गरुअ हरुअ अति मानहिं मन तजि गर्ब ||

निज-निज अटनि मनोहर गान करहिं पिकबैनि |

मनहुँ हिमालय-सिखरनि लसहिं अमर-मृगनैनि ||

धवल धामतें निकसहिं जहँ तहँ नारि-बरूथ |

मानहुँ मथत पयोनिधि बिपुल अपसरा-जूथ ||

किंसुकबरन सुअंसुक सुषमा सुखनि समेत |

जनु बिधु-निबह रहे करि दामिनि-निकर निकेत ||

कुङ्कुम सुरस अबीरनि भरहिं चतुर बर नारि |

रितु सुभाय सुठि सोभित देहिं बिबिध बिधि गारि ||

जो सुख जोग, जाग, जप, अरु तीरथतें दूरि |

राम-कृपातें सोइ सुख अवध गलिन्ह रह्यो पूरि ||

खेलि बसन्त कियो प्रभु मज्जन सरजूनीर |

बिबिध भाँति जाचक जन पाए भूषन चीर ||

तुलसिदास तेहि अवसर माँगी भगति अनूप |

मृदु मुसुकाइ दीन्हि तब कृपादृष्टि रघुभूप ||

पद २७

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 3

(22).राग बसन्त

खेलत बसन्त राजाधिराज | देखत नभ कौतुक सुर-समाज ||

सोहैं सखा-अनुज रघुनाथ साथ | झोलिन्ह अबीर, पिचकारि हाथ ||

बाजहिं मृदङ्ग, डफ, ताल, बेनु | छिरकैं सुगन्ध भरे मलय-रेनु ||

उत जुबति-जूथ जानकी सङ्ग |पहिरे पट भूषन सरस रङ्ग ||

लिये छरी बेन्त सोन्धैं बिभाग | चाँचरि झूमक कहैं सरसराग ||

नूपुर-किङ्किनि-धुनि अति सोहाइ | ललना-गन जब जेहि धरैँ धाइ ||

लोचन आँजहिं फगुआ मनाइ | छाड़हिं नचाइ, हाहा कराइ ||

चढ़े खरनि बिदूषक स्वाँग साजि | करैं कूटि, निपट गई लाज भाजि ||

नर-नारि परसपर गारि देत | सुनि हँसत राम भाइन समेत ||

बरषत प्रसून बर-बिबुध-बृन्द | जय-जय दिनकर-कुल-कुमुदचन्द ||

ब्रह्मादि प्रसंसत अवध बास | गावत कलकीरति तुलसिदास ||

पद २८

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 4

(23).अयोध्याका आनन्द

राग केदारा

नगर-रचना सिखनको बिधि तकत बहु बिधिबृन्द |

निपट लागत अगम, ज्यों जलचरहि गमन सुछन्द ||

मुदित पुरलोगनि सराहत निरखि सुखमाकन्द |

जिन्हके सुअलि-चख पियत राम-मुखारबिन्द-मरन्द ||

मध्य ब्योम बिलम्बि चलत दिनेस-उडुगन-चन्द |

रामपुरी बिलोकि तुलसी मिटत सब दुख-द्वन्द ||

पद २९

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 5

'''

(24) रामराज्य'''

राग सोरठ

पालत राज यों राजा राम धरमधुरीन |

सावधान, सुजान, सब दिन रहत नय-लयलीन ||

स्वान-खग-जति-न्याउ देख्यो आपु बैठि प्रबीन |

नीचु हति महिदेव-बालक कियो मीचुबिहीन ||

भरत ज्यों अनुकूल जग निरुपाधि नेह नवीन |

सकल चाहत रामही, ज्यों जल अगाधहि मीन ||

गाइ राज-समाज जाँचत दास तुलसी दीन |

लेहु निज करि, देहु निज-पद-प्रेमपावन पीन ||

पद ३०

गीतावली उत्तरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 6

'''

(25) सीता-वनवास

सङ्कट-सुकृतको सोचत जानि जिय रघुराउ |

सहस द्वादस पञ्चसतमें कछुक है अब आउ ||

भोग पुनि पितु-आयुको, सोउ किए बनै बनाउ |

परिहरे बिनु जानकी नहि और अनघ उपाउ ||

पालिबे असिधार-ब्रत, प्रिय प्रेम-पाल सुभाउ |

होइ हित केहि भाँति, नित सुबिचारु, नहि चित चाउ ||

निपट असमञ्जसहु बिलसति मुख मनोहरताउ |

परम धीर-धुरीन हृदय कि हरष-बिसमय काउ ?||

अनुज-सेवक-सचिव हैं सब सुमति, साध सखाउ |

जान कोउ न जानकी बिनु अगम अलख लखाउ ||

राम जोगवत सीय-मनु, प्रिय-मनहि प्रानप्रियाउ |

परम पावन प्रेम-परमिति समुझि तुलसी गाउ ||