अयोध्याकाण्ड · भाग १
भाग-2 अयोध्या काण्ड प्रारंभ
भाग-2 अयोध्या काण्ड प्रारंभ
1(राज्याभिषेक की तैयारी)
नृपकर जोरि कह्यो गुर पाही।
तुम्हरी कृपा असीस, नाथ! मेरी सबै महेस निबाहीं।1।
राम होहिं जुबराज जियत मेरे, यह लालच मन माहीं।
बहुरि मोहिं जियबे-मरिबेकी चित चिंता कहु नाहीं। 2।
महाराज, भलो काज बिचार्यो बेगि बिलंब न कीजै।
बिधि दाहिनो होइ तौ सब मिलि जनम-लाहु लुटि लीजै।3।
सुनत नगर आनंद बधावन, कैकेयी बिलखानी।
तुलसिदास देवमायाबस कठिन कुटिलता ठानी।4।
2(वन के लिये बिदाई)
2(वन के लिये बिदाई)
स्नहु राम मेरे प्रानपियारे!
बारौं सत्य बचन श्रुति-सम्मत, जाते हौं बिछुरत चरन तिहारे।1।
बिनु प्रयास सब साधनको फल प्रभु पायो, सो तो नाहिं सँभारे।
हरि तजि धरमसील भयो चाहत ,नृपति नारिबस सरबस हारे।2।
रूचिर काँचमनि देखि मूढ ज्यों करतलते चिंता मनि डारे।
मुनि लोचन चकोर ससि राघव , सिव जीवनधन ,सोउ न बिचारे।3।
जद्यपि नाथ तात! मायाबस सुखनिधान सुत तुम्हहिं बिसारे।
तदपि हमहि त्यागहु जनि रघुपति ,दीवबंधु ,दयालु, मेरे बारे।4।
अतिसय प्रीति बिनीत बचन सुनि, प्रभु कोमल चित चलत न पारे।
तुलसिदास जौ रहौं मातु-हित, को सुर बिप्र भूमि भय टारे?।5।
रहि चलिये सुंदर रघुनायक।
3(वन के लिये बिदाई-1)
रहि चलिये सुंदर रघुनायक।
जो सुत! तात बचन पालन रत, जननिउ तात! मानिबे लायक।।
बेद बिदित यह बानि तुम्हारी रघुपति सदा संत सुखदायक।
राखहु निज तरजाद निगमकी, हौं बलि जाउँ धरहु धनुसायक।
सोक कूप पुर परिहि मरिहिं नृप सुनि संदेस रघुनाथ सिधायक।
यह दूसन बिधि तोहि होत अब रामचरन बियोग अपजायक।।
मातु बचन सुनि स्त्रवत नयत जल कछु सुभाउ जनु नरतनु पायक।
तुलसिदास सुर काज न साध्यौ तौ तो दोष होय मोहि महि आयक।।
राम!हौं कौन जतन घर रहिहौं?
4(वन के लिये बिदाई-2)
राम!हौं कौन जतन घर रहिहौं?
बार बार भरि अंक गोद लै ललन कौनसों कहिहौं।1।
इहि आँगन बिहरत मेरे बारे!तुम जो संग सिसु लीन्हें।
कैसे प्रान रहत सुमिरत सुत, बहु बिनोद तुम कीन्हें।2।
जिन्ह श्रवननि कल बचन तिहारे सुनि सुनि हौं अनुरागी।
तिन्ह श्रवननि बनगवन सुनिति हौं मोंतें कौन अभागी?।3।
जुग तसम निमिष जाहिं रघुनंदन , बदनकमल बिनु देखे।
जो तनु रहै बरष बीते , बलि कहा प्रीति इहि लेखे? ।4।
तुलसिदास प्रेमबस श्रीहरि देखि बिकल महतारी।
गदगद कंठ , नयन जल ,फिरि फिरि आवन कह्यो मुरारी।5।
रहहु भवन हमरे कहे, कामिनि!
(5)
रहहु भवन हमरे कहे, कामिनि!
सादर सासु-चरन सेवहु नित, जो तुम्हरे अति हित गृह-स्वामिनि ||
राजकुमारि! कठिन कण्टक मग, क्यों चलिहौ मृदु पद गजगामिनि |
दुसह बात, बरषा, हिम, आतप कैसे सहिहौ अगनित दिन जामिनि ||
हौं पुनि पितु-आग्या प्रमान करि ऐहौं बेगि सुनहु दुति-दामिनि |
तुलसिदास प्रभु बिरह-बचन सुनि सहि न सकी, मुरछित भै भामिनि ||
कृपानिधान सुजान प्रानपति,
(6)
कृपानिधान सुजान प्रानपति, सङ्ग बिपिन ह्वै आवोङ्गी |
गृहतें कोटि-गुनित सुख मारग चलत, साथ सचु पावोङ्गी ||
थाके चरनकमल चापौङ्गी, श्रम भए बाउ डोलावोङ्गी |
नयन-चकोरनि मुखमयङ्क-छबि सादर पान करावोङ्गी ||
जौ हठि नाथ राखिहौ मो कहँ, तौ सँग प्रान पठावोङ्गी |
तुलसिदास प्रभु बिनु जीवत रहि क्यों फिरि बदन देखावोङ्गी?||
कहौ तुम्ह बिनु गृह मेरो कौन काजु?
(7)
कहौ तुम्ह बिनु गृह मेरो कौन काजु ?
बिपिन कोटि सुरपुर समान मोको, जो पै पिय परिहर्यो राजु ||
बलकल बिमल दुकूल मनोहर, कन्द-मूल-फल आमिय नाजु |
प्रभुपद-कमल बिलोकिहैं छिन-छिन, इहि तें अधिक कहा सुख-समाजु ||
हौं रहौं भवन भोग-लोलुप ह्वै, पति कानन कियो मुनिको साजु |
तुलसिदास ऐसे बिरह-बचन सुनि कठिन हियो बिदरो न आजु ||
प्रिय निठुर बचन कहे कारन कवन?
(8)
प्रिय निठुर बचन कहे कारन कवन ?
जानत हौ सबके मनकी गति, मृदुचित परम कृपालु, रवन !||
प्राननाथ सुन्दर सुजानमनि, दीनबन्धु, जग-आरति-दवन |
तुलसिदास प्रभु-पदसरोज तजि रहि हौं कहा करौङ्गी भवन ?||
मैं तुमसों सतिभाव कही है
(9)
मैं तुमसों सतिभाव कही है |
बूझति और भाँति भामिनि कत, कानन कठिन कलेस सही है ||
जौ चलिहौ तौ चलो चलि कै बन, सुनि सिय मन अवलम्ब लही है |
बूड़त बिरह-बारिनिधि मानहु नाह बचनमिस बाँह गही है ||
प्राननाथके साथ चलीं उठि, अवध सोकसरि उमगि बही है |
तुलसी सुनी न कबहुँ काहु कहुँ, तनु परिहरि परिछाँहि रही है ||
जबहि रघुपति सँग सीय चली।
(10)
जबहि रघुपति-सँग सीय चली |
बिकल-बियोग लोग-पुरतिय कहैं ,अति अन्याउ, अली ||
कोउ कहै, मनिगन तजत काँच लगि, करत न भूप भली |
कोउ कहै, कुल-कुबेलि कैकेयी दुख-बिष-फलनि फली ||
एक कहैं, बन जोग जानकी बिधि बड़ बिषम बली |
तुलसी कुलिसहुकी कठोरता तेहि दिन दलकि दली ||
ठाढ़े हैं लषन कमलकर जोरे।
(11)
ठाढ़े हैं लषन कमलकर जोरे |
उर धकधकी, न कहत कछु सकुचनि, प्रभु परिहरत सबनि तृन तोरे ||
कृपासिन्धु अवलोकि बन्धु तन, प्रान-कृपान बीर-सी छोरे |
तात बिदा माँगिए मातुसों, बनिहै बात उपाइ न औरे ||
जाइ चरन गहि आयसु जाँची, जननि कहत बहुभाँति निहोरे |
सिय-रघुबर-सेवा सुचि ह्वैहौ तौ जानिहौं, सही सुत मोरे ||
कीजहु इहै बिचार निरन्तर, राम समीप सुकृत नहिं थोरे |
तुलसी सुनि सिष चले चकित-चित उड्यो मानो बिहग बधिक भए भोरे ||
मोकोबिधु बदन बिलोकन दीजै।
(12)
मोको बिधुबदन बिलोकन दीजै |
राम लषन मेरी यहैं भेण्ट, बलि, जाउ, जहाँ मोहि मिलि लीजै ||
सुनि पितु-बचन चरन गहे रघुपति, भूप अंक भरि लीन्हें |
अजहुँ अवनि बिदरत दरार मिस सो अवसर सुधि कीन्हें ||
पुनि सिर नाइ गवन कियो प्रभु, मुरछित भयो भूप न जाग्यो |
करम-चोर नृप-पथिक मारि मानो राम-रतन लै भाग्यो ||
तुलसी रबिकुल-रबि रथ चढ़ि चले तकि दिसि दखिन सुहाई |
लोग नलिन भए मलिन अवध-सर, बिरह बिषम हिम पाई ||
कहौ सो बिपिन हैं धौं केतिक दूरि।
(13)'''
कहौ सो बिपिन है धौं केतिक दूरि |
जहाँ गवन कियो, कुँवर कोसलपति, बूझति सिय पिय पतिहि बिसूरि ||
प्राननाथ परदेस पयादेहि चले सुख सकल तजे तृन तूरि |
करौं बयारि, बिलम्बिय बिटपतर, झारौं हौं चरन-सरोरुह-धूरि ||
तुलसिदास प्रभु प्रियाबचन सुनि नीरजनयन नीर आए पूरि |
कानन कहाँ अबहिं सुनु सुन्दरि, रघुपति फिरि चितए हित भूरि ||
फिरि फिरि राम सीय तनु हेरत।
(14)
फिरि-फिरि राम सीय तनु हेरत |
तृषित जानि जल लेन लषन गए, भुज उठाइ ऊँचे चढ़ि टेरत ||
अवनि कुरङ्ग, बिहँग द्रुम-डारन रुप निहारत पलक न प्रेरत |
मगन न डरत निरखि कर-कमलनि सुभग सरासन सायक फेरत ||
अवलोकत मग-लोग चहूँ दिसि, मनहु चकोर चन्द्रमहि घेरत |
ते जन भूरिभाग भूतलपर तुलसी राम-पथिक-पद जे रत ||
नृपहिं कुँवर राजत मग जात।
(15)
नृपति-कुँवर राजत मग जात |
सुन्दर बदन, सरोरुह-लोचन, मरकत कनकबरन मृदु गात ||
अंसनि चाप, तून कटि मुनि पट, जटामुकुट बिच नूतन पात |
फेरत पानि सरोजनि सायक, चोरत चितहि सहज मुसुकात ||
सङ्ग नारि सुकुमारि सुभग सुठि, राजति बिन भूषन नव-सात |
सुखमा निरखि ग्राम-बनितनिके नलिन-नयन बिकसित मनो प्रात ||
अंग-अंग अगनित अनङ्ग-छबि, उपमा कहत सुकबि सकुचात |
सियसमेत नित तुलसिदास चित, बसत किसोर पथिक दोउ भ्रात ||