श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

बालकाण्ड · भाग ७

गीतावली · बालकाण्ड · भाग ७
पद ८७

गीतावली पद 91 से 100 तक/पृष्ठ 7

097.

रागकेदारा

लेहु री! लोचननिको लाहु |

कुँवर सुन्दर साँवरो, सखि सुमुखि ! सादर चाहु ||

खण्डि हर-कोदण्ड ठाढ़े, जानु-लम्बित-बाहु |

रुचिर उर जयमाल राजति, देत सुख सब काहु ||

चितै चित-हित-सहित नख-सिख अंग-अंग निबाहु |

सुकृत निज, सियराम-रुप, बिरञ्चि-मतिहि सराहु ||

मुदित मन बरबदन-सोभा उदित अधिक उछाहु |

मनहु दूरि कलङ्क करि ससि समर सूद्यो राहु ||

नयन सुखमा-अयन हरत सरोज-सुन्दरताहु |

बसत तुलसीदास-उरपुर जानकीकौ नाहु ||

पद ८८

गीतावली पद 91 से 100 तक/पृष्ठ 8

098.

रागसारङ्ग

भूपके भागकी अधिकाई |

टूट्यो धनुष, मनोरथ पूज्यौ, बिधि सब बात बनाई ||

तबतें दिन-दिन उदय जनकको जबतें जानकी जाई |

अब यहि ब्याह सफल भयो जीवन, त्रिभुवन बिदित बड़ाई ||

बारहि बार पहुनई ऐहैं राम लषन दोउ भाई |

एहि आनन्द मगन पुरबासिन्ह देहदसा बिसराई ||

सादर सकल बिलोकत रामहि, काम-कोटि छबि छाई |

यह सुख समौ समाज एक मुख क्यों तुलसी कहै गाई ||

पद ८९

गीतावली पद 91 से 100 तक/पृष्ठ 9

99

विवाहकी तैयारी

राग सोरठ

मेरे बावक कैसे धौं मग निबहहिंगे?

भूख, पियास ,सीत, श्रम सकुचनि क्यों कौसिकहि कहहिंगे।1।

को भोर ही उबटि अन्हवैहै, काढ़ि कलेऊ दैहैं?

को भूषन पहिराइ निछावरि करि लोचन-सुख लैहै?।2।

नयन निरेषनि ज्यों जोगवैं नित पितु -परिजन-महतारी।

ते पठए ऋषि साथ निसाचर मारन, मख रखवारी।3।

सुंदर सुठि सुकुमार सुकोमल काकपच्छ-धर दोऊ।

तुलसी निरखि हरषि उर लैहौैं बिधि ह्वैहै दिन सोऊ?।4।

पद ९०

गीतावली पद 91 से 100 तक/पृष्ठ 10

(100)

ऋषि नृप-सीस ठगौरी-सी डारी।

कुलगुर, सचिव, निपुन नेवनि अवरेब न समुझि सुधारी।1।

सिरिस-सुमन-सुकुमार कुँवर दोउ, सूर सरोष सुरारी।

पठए बिनहि सहाय पयादेहि केलि-बान-धनुधारी।2।

अति सनेह-कातरि माता कहै, सुनि सखि! बचन दुखारी।

बादि बीर -जननी-जीवन जग, छत्रि -जाति- गति भारी।3।

जो कहिहै फिरे राम-लखन घर करि मुनिमख-रखवारी।

सो तुलसी प्रिय मोहिं लागिहै ज्यों सुभाय सुत चारी।4।

पद ९१

गीतावली पद 101 से 110 तक/पृष्ठ 1

(101)

जबतें लै मुनि सङ्ग सिधाए |

राम लखनके समाचार, सखि तबतें कछुअ न पाए ||

बिनु पानही गमन, फल भोजन, भूमि सयन तरुछाहीं |

सर-सरिता जलपान, सिसुनके सँग सुसेवक नाहीं ||

कौसिक परम कृपालु परमहित, समरथ, सुखद, सुचाली |

बालक सुठि सुकुमार सकोची, समुझि सोच मोहि आली ||

बचन सप्रेम सुमित्राके सुनि सब सनेह-बस रानी |

तुलसी आइ भरत तेहि औसर कही सुमङ्गल बानी ||

पद ९२

गीतावली पद 101 से 110 तक/पृष्ठ 2

102

सानुज भरत भवन उठि धाए |

पितु-समीप सब समाचार सुनि, मुदित मातु पहँ आए ||

सजल नयन, तनु पुलक, अधर फरकत लखि प्रीति सुहाई |

कौसल्या लिये लाइ हृदय, बलि कहौ, कछु है सुधि पाई ||

सतानन्द उपरोहित अपने तिरहुति-नाथ पठाए |

खेम कुसल रघुबीर-लषनकी ललित पत्रिका ल्याए ||

दलि ताडुका, मारि निसिचर, मख राखि, बिप्र-तिय तारी |

दै बिद्या लै गये जनकपुर, हैं गुरु-सङ्ग सुखारी ||

करि पिनाक-पन, सुता-स्वयम्बर सजि, नृप-कटक बटोर्यो |

राजसभा रघुबर मृनाल ज्यों सम्भु-सरासन तोर्यो ||

यों कहि सिथिल-सनेह बन्धु दोउ, अंब अंक भरि लीन्हें |

बार-बार मुख चूमि, चारु मनि-बसन निछावरि कीन्हें ||

सुनत सुहावनि चाह अवध घर घर आनन्द बधाई |

तुलसिदास रनिवास रहस-बस, सखी सुमङ्गल गाई ||

पद ९३

गीतावली पद 101 से 110 तक/पृष्ठ 3

103

रागकान्हरा

राम-लषन सुधि आई बाजै अवध बधाई |

ललित लगन लिखि पत्रिका,

उपरोहितके कर जनक-जनेस पठाई ||

कन्या भूप बिदेहकी रुपकी अधिकाई,

तासु स्वयम्बर सुनि सब आए

देस देसके नृप चतुरङ्ग बनाई ||

पन पिनाक, पबि मेरु तें गुरुता कठिनाई |

लोकपाल, महिपाल, बान बानैत,

दसानन सके न चाप चढ़ाई ||

तेहि समाज रघुराजके मृगराज जगाई |

भञ्जि सरासन सम्भुको जग जय,

कल कीरति, तिय तियमनि सिय पाई ||

पुर घर घर आनन्द महा सुनि चाह सुहाई |

मातु मुदित मङ्गल सजैं,

कहैं मुनि प्रसाद भये सकल सुमङ्गल, माई ||

गुरु-आयसु मण्डप रच्यो, सब साज सजाई |

तुलसिदास दसरथ बरात सजि,

पूजि गनेसहि चले निसान बजाई ||

पद ९४

गीतावली पद 101 से 110 तक/पृष्ठ 4

104

राग केदारा

मनमें मञ्जु मनोरथ हो, री !

सो हर-गौरि-प्रसाद एकतें, कौसिक, कृपा चौगुनो भो, री !||

पन-परिताप, चाप-चिन्ता निसि, सोच-सकोच-तिमिर नहिं थोरी |

रबिकुल-रबि अवलोकि सभा-सर हितचित-बारिज-बन बिकसोरी ||

कुँवर-कुँवरि सब मङ्गल मूरति, नृप दोउ धरमधुरधर धोरी |

राजसमाज भूरि-भागी, जिन लोचन लाहु लह्यो एक ठौरी ||

ब्याह-उछाह राम-सीताको सुकृत सकेलि बिरञ्चि रच्यो, री |

तुलसिदास जानै सोइ यह सुख जेहि उर बसति मनोहर जोरी ||

पद ९५

गीतावली पद 101 से 110 तक/पृष्ठ 5

105

राजति राम-जानकी-जोरी |

स्याम-सरोज जलद सुन्दर बर, दुलहिनि तड़ित-बरन तनु गोरी ||

ब्याह समय सोहति बितानतर, उपमा कहुँ न लहति मति मोरी |

मनहुँ मदन मञ्जुल मण्डपमहँ छबि-सिँगार-सोभा इक ठौरी

मङ्गलमय दोउ, अंग मनोहर, ग्रथित चूनरी पीत पिछोरी |

कनककलस कहँदेत भाँवरी, निरखि रुप सारद भै भोरी ||

इत बसिष्ठ मुनि, उतहि सतानँद, बंस बखान करैं दोउ ओरी |

इत अवधेस, उतहि मिथिलापति, भरत अंक सुखसिन्धु हिलोरी ||

मुदित जनक, रनिवास रहसबस, चतुर नारि चितवहिं तृन तोरी |

गान-निसान-बेद-धुनि सुनि सुर बरसत सुमन, हरष कहै कोरी?||

नयननको फल पाइ प्रेमबस सकल असीसत ईस निहोरी |

तुलसी जेहि आनन्दमगन मन, क्यों रसना बरनै सुख सो री ||

पद ९६

गीतावली पद 101 से 110 तक/पृष्ठ 6

106

दूलह राम, सीय दुलही री

घन-दामिनि बर बरन, हरन-मन सुन्दरता नखसिख निबही, री ||

ब्याह-बिभूषन-बसन-बिभूषित, सखि अवली लखि ठगि सी रही, री|

जीवन-जनम-लाहु, लोचन-फल है इतनोइ, लह्यो आजु सही, री ||

सुखमा सुरभि सिँगार-छीर दुहि मयन अमियमय कियो है दही, री|

मथि माखन सिय-राम सँवारे, सकल भुवन छबि मनहु मही, री ||

तुलसिदास जोरी देखत सुख सोभा अतुल, न जाति कही, री |

रुप-रासि बिरची बिरञ्चि मनो, सिला लवनि रति-काम लही, री ||

पद ९७

गीतावली पद 101 से 110 तक/पृष्ठ 7

107

जैसे ललित लषन लाल लोने |

तैसिये ललित उरमिला, परसपर लषत सुलोचन कोने ||

सुखमासार सिगाँरसार करि कनक रचे हैं तिहि सोने |

रुपप्रेम-परमिति न परत कहि, बिथकि रही मति मौने ||

सोभा सील-सनेह सोहावनो, समौ केलिगृह गौने |

देखि तियनिके नयन सफल भये, तुलसीदासहूके होने ||

पद ९८

गीतावली पद 101 से 110 तक/पृष्ठ 8

108

राग बिलावल

जानकी-बर सुन्दर, माई |

इन्द्रनील-मनि-स्याम सुभग, अँग-अंग मनोजनि बहु छबि छाई ||

अरुन चरन, अंगुली मनोहर, नख दुतिवन्त, कछुक अरुनाई |

कञ्जदलनिपर मनहु भौम दस बैठे अचल सुसदसि बनाई ||

पीन जानु, उर चारु, जटित मनि नूपुर पद कल मुखर सोहाई |

पीत पराग भरे अलिगन जनु जुगल जलज लखि रहे लोभाई ||

किङ्किनि कनक कञ्ज अवली मृदु मरकत सिखर मध्य जनु जाई|

गई न उपर, सभीत नमित मुख, बिकसि चहूँ दिसि रही लोनाई ||

नाभि गँभीर, उदर रेखा बर, उर भृगु-चरन-चिन्ह सुखदाई |

भुज प्रलम्ब भूषन अनेक जुत, बसन पीत सोभा अधिकाई ||

जग्योपबीत बिचित्र हेममय, मुक्तामाल उरसि मोहि भाई |

कन्द-तड़ित बिच जनु सुरपति धनु रुचिर बलाक पाँति चलि आई||

कम्बु कण्ठ चिबुकाधर सुन्दर, क्यों कहौं दसनन की रुचिराई |

पदुमकोस महँ बसे बज्र मनो निज सँग तड़ित-अरुन-रुचि लाई ||

नासिक चारु, ललित लोचन, भ्रकुटिल, कचनि अनुपम छबि पाई |

रहे घेरि राजीव उभय मनो चञ्चरीक कछु हृदय डेराई ||

भाल तिलक, कञ्चन किरीट सिर, कुण्डल लोल कपोलनि झाँई |

निरखहिं नारि-निकर बिदेहपुर निमि नृपकी मरजाद मिटाई ||

सारद-सेस-सम्भु निसि-बासर चिन्तत रुप, न हृदय समाई |

तुलसिदास सठ क्यों करि बरनै यह छबि निगम नेति कह गाई ||

पद ९९

गीतावली पद 101 से 110 तक/पृष्ठ 9

109

अयोध्या-आगमन

राग कान्हरा

भुजनिपर जननी वारि-फेरि डारी |

क्यों तोर्यो कोमल कर-कमलनि सम्भु-सरासन भारी? ||

क्यों मारीच सुबाहु महाबल प्रबल ताडका मारी ?

मुनि-प्रसाद मेरे राम-लषनकी बिधि बड़ि करवर टारी ||

चरनरेनु लै नयननि लावति, क्यों मुनिबधू उधारी |

कहौधौं तात! क्यों जीति सकल नृप बरी है बिदेहकुमारी ||

दुसह-रोष-मूरति भृगुपति अति नृपति-निकर खयकारी |

क्यों सौम्प्यो सारङ्ग हारि हिय, करी है बहुत मनुहारी ||

उमगि-उमगि आनन्द बिलोकति बधुन सहित सुत चारी |

तुलसिदास आरती उतारति प्रेम-मगन महतारी ||

पद १००

गीतावली पद 101 से 110 तक/पृष्ठ 10

110

मुदित-मन आरती करैं माता |

कनक-बसन-मनि वारि-वारि करि पुलक प्रफुल्लित गाता ||

पालागनि दुलहियन सिखावति सरिस सासु सत-साता |

देहिं असीस ते बरिस कोटि लगि अचल होउ अहिबाता ||

राम सीय-छबि देखि जुबतिजन करहिं परसपर बाता |

अब जान्यो साँचहू सुनहु, सखि! कोबिद बड़ो बिधाता ||

मङ्गल-गान निसान नगर-नभ आनँद कह्यो न जाता |

चिरजीवहु अवधेस-सुवन सब तुलसिदास-सुखदाता ||