श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

आनन्द।

भाग 1 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 1 · अध्याय 1 / 4

आनन्द।

ता० 17 दिसम्बर 1902 को सन फ्रांसिस्को की विज्ञान सभा में दिया हुआ व्याख्यान।

महिलाओं और भद्रपुरुषों के रूप में मेरे ही आत्मन्!

राम यूरोपीय और ईसाई राष्ट्रों को उनकी विजयिनी सेनाओं और सैन्यदलों के लिये दोष नहीं देता। किसी राष्ट्र की आध्यात्मिक उन्नति में यह भी एक आवश्यक अवस्था है। भारत को यह अवस्था व्यतीत करना पड़ी थी। किन्तु बहुत प्राचीन जाति होने के कारण उसने सांसारिक सुखों को तराजू में तौला और निस्सार पाया। जो राष्ट्र आज कल सांसारिक ऐश्वर्य

और सम्पत्तियों के संग्रह में लिप्त हैं, उन्हें भी यही अनुभव होगा। ये सब राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों को अधीन करने के लिये अपनी सेनाओं के चढ़ाने का प्रयत्न क्यों कर रहे हैं? इन बातों में वे क्या ढूंढ रहे हैं? केवल सुख, आनन्द और उल्लास ढूंढा जा रहा है। कुछ लोग कहते हैं कि हम, सुख की नहीं, ज्ञान की खोज में हैं। दूसरे कहते हैं कि हम, सुख की नहीं, कार्य की तलाश में हैं। ये सब बातें बहुत ठीक हैं। किन्तु सामान्यतः मनुष्यों और साधारण प्राणियों के मन में और हृदयों को टटोलिये, आप को पता लगेगा कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रीति से, जान कर या अनजाने, जिस अन्तिम उद्देश्य को उन्हों ने अपने सामने रक्खा है, जिस अन्तिम लक्ष्य के लिये वे सब प्रयत्न कर रहे हैं, वह आनन्द है, एक मात्र आनन्द है।

आइये, आज यह विचार करें कि आनन्द कहां रहता है: वह महल में रहता है या झोपड़े में, वह कामिनियों की कांति में है अथवा सोने और चांदी से मोल ली जा सकने वाली वस्तुओं में; आनन्द का जन्म स्थान कहां है? आनन्द का भी अपना एक स्वतंत्र इतिहास है। यह लम्बे भ्रमणों का युग है। वाष्प और विद्युत् ने समय और स्थान का उच्छेद कर दिया है। ये बड़ी यात्राओं के दिन हैं, और हरेक अपनी यात्रा का वृत्त लिख डालता है। आनन्द भी परिभ्रमण करता है। उस के भ्रमण का कुछ हाल हमें जानना चाहिये।

हम आनन्द की प्रथम झलक से आरम्भ करते हैं, जो आनन्द का बच्चे में उसकी बाल्यावस्था में होती है। माता के आंचल में या प्यारी माता की गोद में स्थित शिशु अपने को पूर्ण मसनद समझता है। उसके लिये सम्पूर्ण

आनन्द उसी स्थल पर स्थित है। जिस बड़े मार्ग पर आनन्द को यात्रा करना है, उसका पहला पड़ाव माता का आंचल या माता की गोद है। गोदी के बच्चे के लिये माता की गोद से अधिक आनन्ददायक और कोई वस्तु नहीं है। वहां बच्चा अपना चेहरा माता के आंचलों से छिपा कर कहता है "मां-देख! देख! मेरा पता लगा! बता तो मैं कहां हूं?" और प्रसन्नता से हँसता है। वह जी खोलकर अन्तःकरण से हँसता है। पुस्तकें बच्चे के लिये निरर्थक हैं। खज़ाने उसके लिये व्यर्थ हैं। जिस बच्चे का दूध नहीं छोड़ा दिया गया है, उसके लिये फलों और मिठाइयों में कोई स्वाद नहीं है। बच्चे के लिये सारे संसार का आनन्द माता की गोद में एकत्रित है।

एक वर्ष बीतने पर बच्चे के आनन्द का केन्द्र बदल जाता है। वह हट कर किसी दूसरी जगह चला जाता है। आनन्द अब खिलौनों, सुन्दर खिलौनों, गुड़ियों और बहुओं में निवास ग्रहण करता है। दूसरी अवस्था में बच्चा माता को उतना नहीं चाहता जितना अपने खिलौनों को। कभी २ बच्चा प्यारी माता से खिलौनों और बहुओं के लिये झगड़ा ठानता है।

कुछ महीने या वर्ष और बीतने पर, गुड़ियों और बहुओं में भी उसे आनन्द नहीं मिलता। फिर आनन्द ने अपना केन्द्र बदल दिया। अब इन वस्तुओं में भी उसकी स्थिति नहीं रह गयी। तीसरी अवस्था में, जब शिशु बढ़ कर लड़का हो जाता है आनन्द उसके लिये पुस्तकों में, विशेषतः कहानियों की किताबों में जा ठहरता है। यह सामान्य बुद्धि के बालक की बात है। कभी २ आनन्द दूसरे पदार्थों में होता है। किन्तु हम सामान्य घटना की चर्चा कर रहे हैं। अब बालक का सम्पूर्ण प्रेम और स्नेह कहानी की किताबों में

सिमट जाता है। अब खिलौनों, बहुओं और गुड़ियों की सुन्दरता जाती रही। कहानी की किताबों ने उनका स्थान ग्रहण कर लिया, और वह पुस्तकों को सुन्दर तथा मनोहर पाता है। किन्तु आनन्द आगे यात्रा करता है।

विद्यालय त्याग कर लड़का महाविद्यालय में प्रवेश करता है। महाविद्यालय के जीवन में उसे किसी दूसरी ही वस्तु में आनन्द मिलता है, वैज्ञानिक पुस्तकें और तात्त्विक ग्रन्थ मान लीजिये। वह उन्हें कुछ समय तक पढ़ता है, परन्तु उसका आनन्द पुस्तकों से चल कर विश्वविद्यालय की उपाधियां और सन्मान पाने के विचारों में जा पहुंचता है। अब उसकी आकांक्षा उसके आनन्द का निवासस्थान, उसकी प्रफुल्लता का मुख्य अड्डा है। विद्यार्थी विश्वविद्यालय से कीर्तिपूर्वक निकलता है। वह अच्छी आय का पद प्राप्त करता है। और अब इस युवा पुरुष का सब आनन्द धन में, ऐश्वर्य में केन्द्रीभूत हो गया। अब उसके जीवन का एक मात्र स्वप्न सम्पत्ति संचय करना, सम्पत्तिशाली होना हो गया। वह बड़ा आदमी बनना, विपुल वसुधा बटोरना चाहता है। कार्यालय में कुछ महीने काम करने के बाद जब वह कुछ दौलत पा जाता है तब उसका आनन्द किसी दूसरी वस्तु पर जा टिकता है। वह कौनसी वस्तु है? क्या बताने की आवश्यकता है? वह है रमणी। अब, युवा पुरुष को स्त्री की आवश्यकता है और उसकी प्राप्ति के लिये अपनी सारी सम्पदा खर्च डालने को वह प्रस्तुत है। माता के आंचल से अब उसे कोई आनन्द नहीं मिलता है, खिलौनों में अब उसके लिये कोई मोहनी नहीं है, कहानी की किताबें किनारे फेंक दी गईं; और केवल उन्हीं अवसरों पर वे पढ़ी

जाती हैं, जब उनसे उसके जीवन के स्वप्न कामिनी के सहज स्वभाव के सूक्ष्म दर्शन में कुछ सहायता मिलने की आशा होती है। स्त्री के लिये वह सर्वस्व त्याग करने को तैयार है।

उसके आनन्द के इस नये केन्द्र की छोटी २ सी मौजों के लिये कठिन परिश्रम से उपार्जित धन लुटाया जाता है। युवा कुछ काल तक स्त्री के साथ रहता है, और देखिये तो सही! आनन्द अब कुछ आगे दिखाई पड़ने लगा। अपनी स्त्री के ध्यान से प्रारम्भ में उसे जो आनन्द मिलता था, अब नहीं प्राप्त होता। साधारण युवक के मामले में, पूर्वीय भारत (ईस्ट इण्डिया) के युवक का जहां तक सम्बन्ध है, आनन्द अब स्त्री से चल कर पैदा होने वाले बच्चे में पहुंच गया। अब बच्चा उसके जीवन का स्वप्न बन जाता है। वह एक बच्चा, देवदूत, ईश्वरप्रदत्त, दिव्य पदार्थ अपने घर में चाहता है। राम इस*देश की दशा से अधिक परिचित नहीं है। किन्तु भारत में विवाह करने के उपरांत लोग सन्तान के लिये तरसने लगते हैं और तदर्थ ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। यथाशक्ति वे कोई बात उठा नहीं रखते। वैद्यों की सहायता लेते हैं और सिद्ध-साधकों के आशीर्वाद का आवाहन करते हैं। सारांश यह कि शिशु पाकर धन्य होने के लिये वे सब कुछ करते हैं।

युवक का अब सब आनन्द बच्चा पैदा होने की आशा में जमा हो जाता है। आनन्द की यात्रा में, उल्लास के कूँच में शिशु छठे पड़ाव पर है। अब युवक बच्चा पाकर धन्य हुआ। उसके आनन्द की कोई सीमा नहीं है। उसका हृदय गद्गद है, वह उछल पड़ता है, वह फूल कर कुप्पा हो गया

*यहां तात्पर्य अमेरिका से है।

है, मानो वह भूमि से कई हाथ ऊँचा उठ गया, वह चलता नहीं है, मानो हवा में उड़ता है। बच्चे का जन्म उसके अन्तःकरण को आनन्द से परिपूर्ण कर देता है। छठी अवस्था में, चन्द्रमुख बच्चे में, परिवृद्ध बच्चे का आनन्द एक प्रकार से पराकाष्ठा की पहुंच जाता है। जिस क्षण वह अपने बच्चे का मुख देखता है, वह अत्यन्त आनन्द की घड़ी है। साधारण मनुष्य का आनन्द अपनी चरम सीमा को पहुंच गया। इस के बाद युवक का उत्साह कम होने लगता है। बच्चा किशोरावस्था को प्राप्त होता है और सुन्दरता चल बसती है। इस मनुष्य का आनन्द यों ही यात्रा करता रहेगा, कभी यहां ठहरा, कभी वहां।

अब हमें विचारना चाहिये कि क्या सचमुच आनन्द (आनन्द का उद्गमस्थान) ऐसी वस्तुओं में—माता का आंचल, वधू और गुड़ियां, पुस्तकें, विभव, स्त्री, बच्चा—अथवा किसी भी सांसारिक वस्तु या पदार्थ में है। आगे बढ़ने के पूर्व, आओ, अमरणशील आनन्द की भ्रमणशील सूर्यप्रकाश से तुलना करें। प्रभाकर की प्रभा भी यहां से वहां विचरती रहती है। एक समय वह भारत को प्रकाशित करती है तो दूसरे क्षण यूरोप को। वह आगे ही बढ़ती है। जब सायंकाल की छाया पड़ती है, तब देखो कितनी शीघ्रता से सूर्यप्रभा स्थान बदलती है। वह पूर्वीय अमेरिका में चमकती है और वहां से पश्चिम की ओर बढ़ती है। देखिये, सूर्यप्रकाश कैसा अंगूठों के बल फुदकता फिरता है, इस देश से उस देश में विचलता हुआ वह जापान में अपनी जगमगाहट फैलाता है, इसी तरह आगे भी। सूर्यप्रभा एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करती रहती है। किन्तु ये

विभिन्न स्थान, जहां सूर्यज्योति दिखाई पड़ती है, उसके उद्गम या निवासस्थान नहीं हैं। सूर्यज्योति का निवासस्थान कहीं अन्यत्र ही है, सूर्य में है। सूर्यप्रभा की भांति इधर से उधर निरन्तर गमनशील आनन्द की परीक्षा हमें इसी तरह करनी चाहिये। वह कहां से आता है? उसका वास्तविक घर कहां है। आनन्द के सूर्य की ओर हमें देखना चाहिये।

बच्चे से धन्य होने वाले भद्रपुरुष की बात ले लीजिये। वह अपने कार्यालय में बैठा हुआ है। अपने कार्य में व्यस्त है। एकाएक उसे घंटी की टनटन सुनाई देती है। कौनसी घंटी? टेलीफोन की घंटी। वह झपट कर टेलीफोन के पास पहुंचता है, परन्तु संदेश सुनने के समय उसका कलेजा धड़कने लगता है। कहावत है कि आने वाले संकटों की छाया पहले ही से पड़ने लगती है। उसका हृदय धकड़ रहा है, पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ था। वह टेलीफोन के पास पहुंच कर संदेश सुनता है। राम 2! बड़ा ही दुखदायी समाचार रहा होगा। बेचारा भद्रपुरुष सिसकियां ले २ कर कराह रहा है, उसकी सुध-बुध जाती रही, चेहरे का रंग उड़ गया। पीला, मुर्दनी छाया हुआ मुख लेकर वह अपने आसन पर आया, कोट पहना तथा टोपी ली, और कार्यालय से चल दिया, मानो उसके बन्दूक की सी गोली लग गई हो। उसने अपने प्रधान से, विभाग के मुखिया से अनुमति भी नहीं ली। कमरे में उपस्थित चाकरों से उसने कोई बात भी नहीं कही। अपनी चौकी (टेविल) पर फैले हुए कागज़ पत्रों को भी समेट कर उसने बन्द नहीं किया। उसका ज्ञान-ध्यान सब जाता रहा और सीधा कार्यालय से चल दिया। उसके साथी चकित रह गये। सड़क पर पहुंच कर अपने सामने उसने एक

गाड़ी गुज़रती देखी। वह दौड़कर गाड़ी के पास पहुंचता है और वहां डाकिया उसे एक पत्र देता है। इस पत्र में उसके लिये यह सुसमाचार था कि वह एक बड़ी सम्पत्ति का स्वामी हुआ है। सांसारिक दृष्टि से यह संवाद कदाचित् सुखकर हो सकता है। इस मनुष्य ने एक चिट्ठी छोड़ी थी और डेढ़लाख रुपया उसके नाम में निकला। इस समाचार से उसे प्रसन्न हो जाना चाहिये था, आनन्द से नाच उठना चाहिये था। किन्तु ऐसा नहीं हुआ, ऐसा नहीं हुआ। टेलीफोन से मिला हुआ संदेश उसके हृदय को मसोस रहा था। इस नये समाचार से वह सुखी नहीं हुआ। ट्राम गाड़ी में उसने राज्य के एक बहुत बड़े पदाधिकारी को ठीक अपने सामने बैठा पाया। यह वही अधिकारी था, जिससे भेंट करना उसके जीवन का एक स्वप्न हो रहा था। किन्तु देखो तो! इस भद्रपुरुष ने उस राज्यकर्मचारी से नज़र भी नहीं मिलाई, अपना मुँह फेर लिया। एक महिलामित्र का मधुर मुख भी उसे दिखाई पड़ा। हमारे भद्रपुरुष की इस महिला से मिलकर वातचीत करने की लालसा रहा करती थी, किन्तु इस समय उसकी मधुर मुसक्यान के प्रति वह उदासीन रहा। अस्तु! अब हमें उसे अधिक काल तक संदिग्धावस्था में रखना उचित नहीं है, और न आप ही को देर तक प्रत्याशा में रखना चाहिये। जिस सड़क पर उसका घर था वहां वह पहुंच गया। बड़ा हल्ला गुल्ला हो रहा था। उसने देखा कि धुँए के मेघ आकाश में चढ़ २ कर सूर्यदेव को ढक रहे हैं। उसने देखा कि अग्नि-शिखायें आकाश का चुम्बन कर रही हैं। उसने अपनी स्त्री, दादी, माता तथा अन्य मित्रों को अग्निकाण्ड के लिये, जिससे उनका घर स्वाहा हो रहा था, रोते और हाय २ करते देखा। उसने

अपने और स्नेहपात्रों को तो वहां देखा किन्तु एक को न पाया। उसके आनन्द का उन दिनों का केन्द्र केवल गायब था; प्रिय बच्चा, मधुर छोटा शिशु लुप्त था। वह वहां नहीं था। उसने बच्चे के सम्बन्ध में पूछा किंतु स्त्री कोई उत्तर न दे सकी। रोना और सिसकना ही उसका प्रत्युत्तर था, जो अवोध्य था। सत्य का उसे पता लग गया। उसे मालूम हुआ कि बच्चा घर ही में छूट गया। आग लगने के समय बच्चा अपनी धाय के पास था, धाय बच्चे को पालने में सुला कर कमरे से चली आई थी। आग से घर जलता देख कर घरवाले घबड़ाकर जल्दी से निकल भागे। सब ने यही समझा कि बच्चा किसी न किसी घरवाले के पास होगा। सब के सब निकल भागे, और अब उन्हें मालूम हुआ कि बच्चा उसी कमरे में रह गया, जिसे अब अग्नि आवृत्त कर रही थीं। लोग रो रहे थे, दांत कटकटा रहे थे, ओठ काट रहे थे, छाती पीट रहे थे, किंतु कोई वश नहीं था। हमारा भद्रपुरुष, उसकी स्त्री, उसकी माता, एवम् मित्र, और धाय चिल्ला २ कर एकत्रित जनसमूह से, पुलिसमैनों से, लोगों से अपने प्रिय छोटे बच्चे को बचाने की प्रार्थना कर रहे थे। "किसी तरह से हमारे छोटे बच्चे को निकालो। हम अपनी सब सम्पत्ति दे देंगे, आज से दस वर्ष तक जितना धन सञ्चय करेंगे दे देंगे, हम सब कुछ भेट कर देंगे, हमारे बच्चे को बचाओ, हमारे बच्चे को बचाओ"। (आप को याद होगा कि यह दुर्घटना ऐसे देश में हुई थी, जहां फायर इनश्योरेंस कम्पनियां उसी प्रमाण में नहीं मौजूद हैं जिस प्रमाण में इस देश में हैं)। वे बच्चे के लिये सब कुछ दे डालने को तैयार हैं। सचमुच, बच्चा ऐसी ही मधुर वस्तु है, छोटा बच्चा बड़ी ही प्रिय वस्तु है, और वह इसी योग्य

है कि सम्पूर्ण सम्पत्ति और वसुधा उसके लिये निछावर कर दी जायँ। किंतु राम एक प्रश्न करता है। "क्या बच्चा आनन्द का मूल साधन है, संसार में सब से अधिक प्रिय वस्तु है, अथवा आनन्द की जड़ कहीं और ही है?" ध्यान दीजिये। प्रत्येक वस्तु बच्चे के लिये अर्पण की जा रही है, किंतु क्या किसी प्रियतर, किसी अन्य वस्तु के लिये स्वयं बच्चे का बलिदान नहीं किया जा रहा है? बच्चे के लिये दौलत दी जा रही है, माल दिया जा रहा है, सम्पत्ति दी जा रही है, किंतु बच्चा किसी दूसरी ही वस्तु के लिये दिया जा रहा है। आग में फांदने का जो लोग साहस करें, उनके प्राण चाहे चले जाँय। किंतु वह प्यारा छोटा बच्चा किसी दूसरी ही वस्तु के, किसी उच्चतर वस्तु के लिये नष्ट किया जा रहा है। यह अन्य वस्तु अवश्य ही बच्चे से भी बढ़ कर प्रिय होगी, यही अन्य वस्तु वास्तविक केंद्र होगी, आनन्द का वास्तविक उद्गमस्थान होगी। यह अन्य वस्तु क्या है? विचारिये तो सही! वे स्वयं आग में नहीं कूद पड़े। यह अन्य वस्तु स्वयं (Self=कूटस्थ आत्मा) है। यदि वे आग में कूदते हैं तो अपने को भेंट चढ़ाते हैं और यह करने को वे तैय्यार नहीं हैं। अन्य सब चीज़ें तो बच्चे पर निछावर हैं, और बच्चा उस स्वयं (Self) पर निछावर है।

अब हमें पता लग गया कि आनन्द की सर्वोपरि अवस्था (आनन्द का उद्गमस्थान आत्मा है) अर्थात् बच्चे, में आनन्द नहीं है। बच्चा सुंदर प्रिय, और आनन्द का मूल इस लिये है कि वह उस ज्योति से धन्य है, जो स्वयं (Self) से निर्गत होती है। ज्योति बच्चे में नहीं है। यदि आनन्दरूपी ज्योति बच्चे में अन्तर्निहित होती तो बच्चे के शरीर में वह सदा बनी रहती। समझ लीजिये कि बच्चे के मुख को उज्ज्वलित

करने वाली ज्योति अंतर्गत उद्गम-स्थान से निकल रही थी। आनन्द का वास्तविक उद्गम-स्थान अपना आत्मा है।*

अब हम आनन्द के घर, आनन्द के मूल स्थान के कुछ निकट पहुंच गये हैं। बच्चा इस लिये प्रिय नहीं है कि वह बच्चा है, बच्चा आत्मा (Self) के लिये प्यारा है। स्त्री स्त्री के लिये प्यारी नहीं है, पति पति के लिये प्यारा नहीं है, स्त्री आत्मा के लिये प्यारी है, पति आत्मा के लिये प्यारा है। यथार्थ बात यह है। लोग कहते हैं कि वे किसी वस्तु को उसी के लिये प्यार करते हैं। किन्तु ऐसा नहीं हो सकता, नहीं हो सकता। दौलत दौलत के लिये प्यारी नहीं है, दौलत प्यारी है आत्मा के लिये। पहले की प्यारी स्त्री से जब काम नहीं चलता तब उसे पति तलाक दे देता है। इसी तरह किसी काल के प्यारे पति से जब काम नहीं चलता तब स्त्री उसे त्याग देती है। जब दौलत से काम नहीं निकलता, वह छोड़ दी जाती है। आप नीरो का हाल जानते हैं। उसे सुंदर रोम, अपनी राजधानी अधिक काम की अथवा अधिक रोचक नहीं जान पड़ी। उसकी तो अग्नि काण्ड, प्रकाण्ड उत्सव-दहन देखने की अधिक इच्छा थी। देखिये! वह एक निकटवर्ती पहाड़ की चोटी पर चढ़ता गया और विराट अग्निकाण्ड के दृश्य का सुख लूटने की इच्छा से अपने मित्रों से सारे नगर में जाकर आग लगा देने को कहा। रोम भस्म हो रहा था और नीरो चिकारा बजा रहा था। इस प्रकार हमें पता लगता है कि ऐश्वर्य भी त्याग दिया जाता है जब उससे हमारा काम नहीं चलता। राम ने

* आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति। बृहदारण्यकोपनिषद्। बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी का संवाद।

एक अति विचित्र घटना अपनी आंखों से देखी है। एक समय गंगा नदी में बड़ी बाढ़ आगई थी, नदी चढ़ती ही चली जाती थी। एक वृक्ष की शाखा पर अनेक बंदर बैठे हुए थे। इनमें, एक बंदरिया थी और उसके कई बच्चे थे। ये सब बच्चे अपनी मां के पास चले गये। बंदरिया जहां बैठी थी वहां तक पानी पहुंच गया। वह उचक कर और भी ऊंची डाल पर चली गई। वहां भी पानी पहुंच गया। वह सबसे ऊंची टहनी पर चढ़ गई, किन्तु जल वहां भी पहुंच गया। सब बच्चे अपनी मां के अंग में चिपटे हुए थे। जब पानी उसके पैरों तक चढ़ गया उसने एक बच्चे को पकड़ कर अपने पैरों तले रख लिया। पानी और भी चढ़ा। बंदरिया ने दूसरे बच्चे को पकड़कर अपने पैरों के नीचे रख लिया। पानी और भी ऊंचा उठा, और अपनी रक्षा के लिये उसने तीसरे बच्चे को भी निर्दयता से पैरों के नीचे दबाया। ठीक यही दशा है। लोग और चीज़ें हमें उसी समय तक प्यारी हैं जब तक उनसे हमारा स्वार्थ सिद्ध होता है, हमारी इच्छा पूर्ण होती है। उधर हमारे स्वार्थ को धक्का लगने की आशंका हुई, इधर हमने सब चीज़ों को भेंट चढ़ाया।

इस प्रकार हम इस परिणाम पर पहूँचते हैं कि आनन्द का आसन, मूलस्थान कहीं आत्मा में है। (प्रीति का तारतम्य भाव।) सुख का घर कहीं अपने में तो है, परन्तु कहां है? पैरों में है? चरण सकल शरीर के अवलम्ब हैं, उनमें हो सकता है; किन्तु नहीं, चरणों में वह नहीं है। यदि पैरों में आनन्द का घर होता तो पैर संसार की सब वस्तुओं से अधिक प्रिय होते। यह ठीक है कि पैर सब बाहरी वस्तुओं से अधिक प्रिय हैं, परन्तु वे हाथों के तुल्य प्रिय नहीं हैं।

तो आनन्द का निवासस्थान क्या हाथों में है? हाथ पैरों की अपेक्षा प्यारे तो हैं, किन्तु वे भी आनन्द का घर नहीं हैं। तो क्या आनन्द नाक या नेत्र में टिका हुआ है? नेत्र हाथों या नाक से अधिक प्रिय अवश्य हैं, परन्तु आनन्द का अवस्थान उन में भी नहीं है। किसी ऐसी वस्तु की कल्पना कीजिये जो नेत्रों से भी अधिक प्रिय हो। आप कह सकते हैं, जीवन। मैं कहता हूं पहले समग्र शरीर को लीजिये। समग्र शरीर आनन्द का घर नहीं है। हम देखते हैं कि यह समग्र शरीर भी हम त्यागते रहते हैं, हम हर क्षण बदल रहे हैं। कुछ वर्षों में शरीर के प्रत्येक सूक्ष्माणु का स्थान नये सूक्ष्माणु ग्रहण कर लेते हैं। आनन्द का स्थान कदाचित बुद्धि, मस्तिष्क या मन में हो। सम्भव है। अब यह विचारना है कि बुद्धि से भी प्रियतर कोई वस्तु है या नहीं। आओ, विवेचन करें। यदि बुद्धि से बढ़कर मधुर और प्रिय कोई वस्तु ठहरे तो वही आनन्द का स्थान होगी। हम कहते हैं कि जीवन या हिन्दू शब्दावली में प्राण आनन्द का मूल हो सकता है, क्योंकि मेधाशक्ति खोकर भी प्रायः लोग जीना चाहते हैं। दो विकल्पों में वरण करना है, मृत्यु का आलिंगन कीजिये, अथवा विक्षिप्त या वैरहे होकर जीते रहिये। प्रत्येक मनुष्य पागलपन की दशा में भी जीना ही पसन्द करेगा। इससे विदित हुआ कि जीवन की वेदी पर बुद्धि या धारणाशक्ति का बलिदान होता है। तो प्राण, व्यक्तिगत प्राण आनन्द का स्थान, सम्पूर्ण आनन्द का जन्मदाता स्वयं, होगा। अब विचार कीजिये कि जीवन आनन्द का वास्तविक स्थान है या नहीं। वेदांत कहता है नहीं! नहीं! जीवन भी आनन्द का स्थान नहीं है। आनन्द का आश्रम, अंतर्निहित स्वर्ग और भी ऊंचे पर है, "व्यक्तिगत, एकव्यापी जीवन से भी पर है"। तो फिर वह कहां है?

राम ने एक बार एक मरणासन्न युवक को देखा। वह एक प्रचण्ड रोग से पीड़ित था। उसके शरीर में तीव्र वेदना हो रही थी। पीड़ा का प्रारम्भ पैर की उंगलियों से हुआ था। पहले वह तीव्र नहीं थी, ज्यों २ वह ऊपर चढ़ती गई त्यों २ उसका शरीर ऐंठने लगा। धीरे २ पीड़ा घुटनों तक आ गई, और भी चढ़ती २ पेट तक पहुँची, तथा जब हृदयस्थल में पहुँची तब मनुष्य मर गया। इस मनुष्य के अंतिम शब्द ये थे, "ओह! इस जीवन का अंत कब होगा, प्राण कब पीछा छोड़ेंगे"? ये उस युवक के शब्द थे। आप जानते हैं, इस देश में आप लोग कहते हैं, उसने प्रेत को छोड़ (ghost) दिया। भारत में हम लोग कहते हैं, उसने शरीर को छोड़ दिया। इससे भेद प्रकट होता है। यहां शरीर को आत्मा मानते हैं और प्रेत (जीवात्मा) को उसमें बद्ध हुई किसी वस्तु के तुल्य समझते हैं। भारत में शरीर को आत्मा से भिन्न एक द्रव्य समझते हैं और वास्तविक आत्मा को मुख्य वस्तु मानते हैं। वहां शरीर के मरने पर कोई अपने को मृत नहीं मानता, वह मरता नहीं है, केवल चोला बदल डालता है। और इस लिये, उस युवक के मुख से ये शब्द निकले थे, "ओह! यह शरीर मैं कब छोड़ूंगा, ये प्राण मुझे कब छोड़ेंगे?" अब हमें जीवन से भी बढ़कर, प्राणों से भी श्रेष्ठ किसी वस्तु का पता लग गया, जो कहती है "मेरा जीवन", "मेरे प्राण"; यह वस्तु प्राणों की अधिकारिणी है और प्राण तथा जीवन से ऊपर है। यह कोई वस्तु व्यक्तिगत, एकव्यापी जीवन या प्राण से कहीं अधिक मधुर है। अब हम देखते हैं कि उस शरीर विशेष से, प्राण या जीवन से उच्चतर आत्मा का, प्राण से अधिक आत्मा का हित नहीं साधित हुआ, और प्राण या जीवन का बलिदान कर दिया गया,

प्राण या जीवन त्याग दिया गया। इस स्थल में हमें ऐसी कोई वस्तु दिखाई पड़ी, जो प्राण या जीवन से श्रेष्ठ है, जिस के लिये जीवन का उत्सर्ग कर दिया गया। अवश्य जीवन की अपेक्षा यह कहीं मधुर होगी, आनन्द का वासस्थान होगी, हमारे आनन्द का मूल या उत्पत्ति-स्थान होगी। अब हमारी समझ में आगया कि प्राण या जीवन बुद्धि से मधुरतर क्यों है, कारण यही है कि प्राण वास्तविक आत्मा के, आपके अंतर्गत आत्मा के निकटतर है। बुद्धि नेत्रों से प्यारी क्यों है? क्योंकि बुद्धि नेत्रों की अपेक्षा वास्तविक आत्मा के अधिक निकट है। और नेत्र पैरों की अपेक्षा प्रियतर क्यों हैं? क्योंकि आपके वास्तविक आत्मा से पैरों की अपेक्षा नेत्रों की अधिक घनिष्ठता है। प्रत्येक मनुष्य अपने बच्चे को किसी दूसरे के, पड़ोसी के बच्चे की अपेक्षा कहीं अधिक रूपवान क्यों समझता है? वेदांत के मत से "कारण यही है कि इस विशिष्ट शिशु को, जिसे आप 'मेरा' कहते हैं, आपने अपने वास्तविक आत्मा के कुछ सोने से मढ़ा है"। कोई भी पुस्तक, जिसमें आप की लिखी हुई एक पंक्ति है; कोई भी रचना, जिसमें आप की लेखनी से निर्गत कुछ सन्निविष्ट है, आपको किसी भी पुस्तक से, वह प्लेटो की ही रची क्यों न हो, कहीं उत्तम मालूम होती है। ऐसा क्यों है? क्योंकि इस पुस्तक में, जिसे आप अपनी कहते हैं, आप के वास्तविक आत्मा की कुछ जगमगाहट है। यह आपके अंतर्निहित स्वर्ग की प्रभा से धन्य हुई है। इसी लिये हिंदू का कथन है कि परमसुख का नाम और आनन्द की प्रकृत राजधानी आपके अंतर्गत है। सम्पूर्ण स्वर्ग आपके भीतर है, समस्त आनन्द का मूलस्थान आप में है। इस दशा में किसी दूसरी जगह आनन्द ढूढ़ना कितना अयुक्त है!

मोहकता के बीज।

भारत में एक प्रेमी के सम्बन्ध में यह कहानी प्रचलित है। वह अपनी प्रेयसी के लिये छटपटा था, सूख कर कांटा होगया था; मांस रही नहीं गया था। जिस देश में यह युवक रहता था उसके राजा एक दिन उसे दरबार में लाये, और उसकी प्राणेश्वरी को भी बुलवाया। राजा ने देखा कि नारी बड़ी ही कुरूपा है। राजा ने अपने दरबार को अलंकृत करनेवाली सब सुन्दरियों को युवक के सामने बुलवाया, और उस प्रेमी से कहा कि इनमें से किसी को पसन्द करलो। युवक ने कहा, "अरे महाराजा! ऐ सम्राट! हे नृपति! अपनी मूर्खता क्यों प्रकट करते हो। राजन्! आप जानते हैं, प्रेम मनुष्य को निपट अंधा कर देता है। महाराज! आप के नेत्र नहीं हैं कि देख सकें। मेरी आंखों से उसे (मेरी प्यारी को) देखिये, तब बताइये कि वह सुन्दरी है या कुरूपा। मेरे नेत्रों से उसे देखिये"। संसार के समस्त सौन्दर्य का रहस्य यही है। यही सब कुछ है। संसार के चित्ताकर्षक पदार्थों के सारे जादू का यही भेद है। ऐ मनुष्यों! तुम आप ही अपनी दृष्टियों से सब वस्तुओं को मनोहर बनाते हो। प्रेम के नेत्रों से देखते हुए तुम आपही अपनी प्रभा किसी वस्तु पर डालते हो, और फिर उस पर आसक्त हो जाते हो। यूनानी पुराण शास्त्र में "इको*" की कथा हमें पढ़ने को मिलती है। वह अपनी ही प्रतिच्छाया पर मोहित हो गई थी। सब सुन्दरताओं का यही हाल है, वे केवल आपके अन्तर्गत आत्मा की स्वर्ग की

* इको का अर्थ प्रतिध्वनि है। यूनानी लोकों की दंतकथा में यह एक देवता मानी जाती है। ज्यूपिटर की स्त्री ज्यूनो के शाप से उसकी वाचाशक्ति दुर्बल हो गई थी, ऐसी मान्यता है, और इस शाप के कारण उस समय से उसको प्रतिध्वनि का रूप प्राप्त हुआ है।

प्रतिमा हैं। वे केवल आपकी प्रतिच्छाया हैं, और कुछ भी नहीं। जब यह बात है, तो अपनी ही छाया के पीछे दौड़ना, हैरान होना कितनी मूर्खता है।

राम एक ऐसे बच्चे की घटना जानता है, जिसने घुटनों के बल घिसलना, वय्यां २ चलना प्रारम्भ ही किया था। लड़के ने अपनी ही छाया देख कर समझा कि यह तो कोई विचित्र वस्तु है, महत्त्वपूर्ण कुछ है। बच्चे ने छाया का शिर पकड़ना चाहा। वह उसकी ओर घिसलने लगा। छाया भी टरकने लगी। इधर बच्चा खिसका, उधर छाया टरकी। छाया का शिर पकड़ने में असमर्थ होकर बच्चा रोने लगा। बच्चा गिर पड़ता है, छाया भी उसके साथ है। बच्चा फिर उठता है और छाया का पीछा करता है। यह दशा देख कर माता को दया आई और उसने बच्चे के हाथ में उसका शिर पकड़ा दिया, अब देखिये, छाया का शिर भी हाथ में आगया। अपना ही शिर पकड़िये और छाया भी पकड़ में आजाती है। स्वर्ग और नरक आपही के भीतर हैं। शक्ति आनन्द, और जीवन का मूल आपके भीतर है। मनुष्यों, प्रकृति और राष्ट्रों का ईश्वर आपके भीतर है। ऐ संसार के मनुष्यों! सुनो, सुनो, यह पाठ मकानों की सर्वोच्च छतों से, बड़े नगरों के सब चौराहों से, सब राजमार्गों से घोषित होने के योग्य है। यह पाठ उच्च स्वर से घोषित होने के योग्य है। यदि तुम किसी वस्तु को प्राप्त करना चाहते हो, किसी पदार्थ की अभिलाषा करते हो, तो छाया के पीछे न पड़ो। अपना ही शिर छुओ। अपने ही भीतर प्रवेश करो। यह अनुभव होते ही, आपको ज्ञान पड़ेगा कि तारे आपही का हस्तकौशल हैं, आप देखेंगे कि प्रेमकी सभी वस्तुयें, समस्त मनोहर और लुभाने

वाले पदार्थ आपका ही प्रतिबिम्ब या छाया मात्र हैं। यह कितना अनुचित है कि "एक टोपी और घंटियों के लिये हम अपने प्राण देते हैं, सर्वान्तःकरण के परिश्रम से हम जल-बुद्बुद कमाते हैं"।

भारत में एक नारी की एक मनोरंजक कथा है। घर में उसकी सुई खोगई। वह गरीबी के कारण अपने घर में दिया नहीं जला सकती थी, इस लिये वह बाहर निकल गई और गलियों में ढूढ़ने लगी। किसी ने पूछा, "क्या खोज रही है?"। उसने उत्तर दिया, "अपनी सुई"। भलेमानुस ने पूछा, "सुई कहां खोई थी?" औरत ने कहा, "घर में"। उसने कहा, "जो वस्तु घर में खोई थी उसकी खोज गलियों में करना कोरी मूर्खता है"। औरत ने कहा, "मैं घर में चिराग नहीं जला सकती और सड़क पर लालटैन है"। वह घर में नहीं ढूढ़ सकती थी, किन्तु कुछ न कुछ तो करना ही चाहिये, इस लिये सड़क ही की खाक क्यों न छानी जाय। लोगों की ठीक यही दशा है। स्वर्ग, दिव्यलोक, आनन्दराशि सब कुछ आप के भीतर ही है, फिर भी राजपथों के पदार्थों में आप आनन्द ढूढ़ते फिरते हैं, उस वस्तु की खोज बाहर, बाहर, इन्द्रियों के विषयों में करते रहते हैं। यह कैसा आश्चर्य है!

एक और दूसरी अति मनोहर कथा एक पागल मनुष्य की भारत में प्रचलित है। वह गली के दीन लड़कों के पास आया और कहा कि नगर-नायक (मेयर) एक बड़ा भोज देने की तैयारी कर रहा है, और सब लड़कों को आमंत्रित किया है। आप जानते हैं कि लड़के मिसरी और मिठाई पसन्द करते हैं। इस पागल आदमी से नगर-नायक के भोज के सम्बन्ध में भरोसा पाकर उसके घर लड़के दौड़े गये। किन्तु वहां भोज कहाँ, कुछ

भी नहीं था। लड़के चकों खा गये, कुछ देर के लिये उनका चेहरा उतर गया, और हंसी होने लगी। लड़कों ने उससे पूछा, "कहिये महाशय! आप तो जानते ही थे कि यह बात अलीक है, फिर आप क्यों आये?" उसने कहा, "इस आशंका से कि कहीं सत्य ही सत्य भोज न हो, बात सच निकले और मैं रह जाऊँ"। वह चूकना नहीं चाहता था, इसी कारण से उसने बालकों का अनुसरण किया। ठीक यही दशा उन लोगों की है, जो अपनी कल्पना से, अपने ही आशीर्वाद से फूलों को सुन्दरता प्रदान करते हैं, इस संसार की प्रत्येक वस्तु को चित्ताकर्षक बनाते हैं, अपनी ही कल्पना से पागल मनुष्य की भांति, प्रत्येक वस्तु को वांछनीय करते हैं, और फिर उसके पीछे इस लिये दौड़ते हैं कि कहीं वे उससे वञ्चित न रह जाँय।

उपसंहार। अपने आन्तरिक स्वर्ग को प्राप्त करो, और एक साथही सब आकांक्षायें पूर्ण हो जाँयगी, सब कष्टों और यातनाओं का अन्त हो जायगा।

"देखो! वन के वृक्ष मेरे कुटुम्बी हैं। और मुझ में जो फुर (धड़क) रहा है उससे पहाड़ सजीव हैं। मिट्टी मेरा मांस है, और लोमड़ी मेरा चर्म है। मैं हंस से भी पाण्डु और मधुमक्खी से मधुर हूँ। फूल मेरे प्रेम के विकास के सिवाय और कुछ नहीं है। और मेरे स्वप्न के स्वर में जल बह रहा है। ऊपर लटका हुआ सूर्य मेरा फूल है। मैं मर नहीं सकता, मृत्यु चाहे सदा मेरे विस्तार में ऊपर नीचे भटकती रहे। मैं अजन्मा हूँ तथापि मेरे जन्मश्वास उतने ही हैं, जितनी निद्रारहित समुद्र पर लहरें"।

अरे! स्वर्ग तुम्हारे भीतर है, इन्द्रियों के विषयों में आनन्द का अन्वेषण न करो, अनुभव करो कि आनन्द स्वयं तुम में है।

ॐ! ॐ!! ॐ!!!