श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

आत्म-विकास।

भाग 1 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 1 · अध्याय 2 / 4

आत्म-विकास।

(विज्ञान-सभा के भवन में स्वामी राम का व्याख्यान।)

महिलाओं और सज्जनों के रूप में मेरे ही आत्मन्!

विषय। आज रात्रि को आत्मविकास के विषय में हम लोग कुछ सुनने वाले हैं: दूसरे शब्दों में, जीवन के अंशों पर, आध्यात्मिक उन्नति की श्रेणियों पर, अथवा स्वार्थपरता की विशुद्धता के अंशों पर आप कह सकते हैं। कदाचित जिस सिद्धान्त पर हम पहुँचेंगे वह चौंका कर देगा।

मण्डल। अपने सामने, आप जो चक्र देख रहे हैं वह एक सीधी रेखा और मंडलों का बना हुआ है। आप पूछेंगे कि इनका क्या उपयोग है? मंडलों का आत्मा के विकास से क्या सम्बन्ध है? कुछ लोग अपने मनों में कह रहे हैं—ये मंडल नहीं हैं, ये दड़े ही वक्र हैं, ये तो अंडाकार वृत्त हैं। किन्तु इन मंडलों से जीवन की उन कोटियों को प्रकट करना है जो ठीक गोल नहीं हैं, जो टेढ़ी और अंडाकार कही जा सकती हैं, और इस व्याख्या से मंडलों की अपूर्णता का समर्थन हो जाता है।

वे अपनी अपूर्णता और पथविमुखता से ठीक उसी को सूचित कर रहे हैं, जिसे उन्हें प्रकट करना है।

जीवन और उसके अंश क्या हैं, इस सम्बन्ध में कुछ कहने के पूर्व हमें इन मंडलों के सम्बन्ध में कुछ शब्द कहना पड़ेंगे।

यह सब से छोटा मंडल है, बहुत ही छोटा चिन्ह। यह इससे और भी छोटा बनाया जाना चाहिये था, किन्तु इस आशंका से नहीं बनाया गया कि उस अवस्था में दिखाई न पड़ेगा, और इस लिये इतना बड़ा बनाया गया है कि दिखाई पड़े। इसके बाद एक दूसरा मंडल है, जो छोटे शिशुमंडल से बड़ा है; और उसके बाहर तीसरा है और उसके भी बाहर चौथा है। इनकी एक विशेषता यह है कि मंडल जितना २ फैलता, बढ़ता जाता है, मंडल का केन्द्र उतनाही सीधी रेखा पर के प्रारम्भिक बिन्दु (क) से हटता जाता है। यह सीधी रेखा सब मंडलों की सामान्य स्पर्शरेखा है। केन्द्र पीछे हटता जाता है, व्यासार्ध और मंडल बढ़ता जाता है। यदि मंडल का केन्द्र प्रारम्भिक बिन्दु (क) के बहुत नगीच है, और नगीच करते २ उसे यहां तक सन्निकट कर दिया जाय कि वह प्रारम्भिक बिन्दु (क) से मिल जाय तो मंडल भी एक बिन्दु बन जाता है। इस प्रकार एक बिन्दु एक ऐसे मंडल की हदबन्दी का स्थान है, जिसका केन्द्र प्रारम्भिक बिन्दु के बहुत ही निकट आगया है। और जब केन्द्र प्रारम्भिक स्थान से दूर हटता जाता है, तब व्यासार्ध बढ़ता २ अनन्त हो जाता है; अथवा जब केन्द्र अनन्तता तक सरक जाता है, तब मंडल सीधी रेखा होजाता है। इस प्रकार से सीधी रेखा उस मंडल की हदबन्दी का स्थान है, जिसका केन्द्र अन-

न्तता तक हट जाता है अथवा जिसका व्यासार्ध अनन्त है।

दूसरी विशेषता हम यह देखते हैं कि मंडल जितनाही बड़ा है, उतनाही वह सीधी स्पर्शरेखा के सन्निकट होता जाता है, और मंडल ज्यों २ बढ़ता जाता है त्यों त्यों उसका वांकपन घटता जाता है। इस प्रकार हमारे ध्यान में यह आता है कि बड़का मंडल, जिसका केन्द्र (घ) है, (ग) केन्द्र वाले भीतरी मंडल की अपेक्षा (क) बिन्दु पर कहीं अधिक सीधी रेखा के तुल्य है। और यह भीतरी मंडल (ख) केन्द्र वाले अपने भीतरी मंडल की अपेक्षा कहीं अधिक उसी (क) बिन्दु पर सीधी रेखा के समान है। इसी कारण से वास्तव में गोल होने पर भी पृथिवी जब आप उसके किसी हिस्से पर दृष्टि डालते हैं, चिपटी दिखाई पड़ती है। पृथिवी के विभागीय मंडल यंत्रसहायहीन नेत्रों के लिये अनन्त बड़े हैं। मंडलों के सम्बन्ध में इतना ही यथेष्ट होगा।

जीवन। जीवन! जीवन का मुख्य लक्षण क्या है? जीवन के अभाव अथवा निर्जीवता से जीवन का भेद किस बात से किया जा सकता है? गति, उद्योगशक्ति, अथवा कर्मण्यता से। साधारण उत्तर प्रश्न का यही है। जीवन की वैज्ञानिक परिभाषायें भी इसी परिभाषा में समा सकती हैं। जीवित मनुष्य हिलडुल सकता है, चलता फिरता है, सब तरह के काम कर सकता है। निर्जीव मोमिया, शक्ति के ये प्रकार अथवा गति, जीवित मनुष्य की ये हरकतें नहीं प्रकट कर सकता। मृतक पशु इधर उधर नहीं जाता, जीवित पशु चलता, दौड़ता, सब प्रकार के काम करता है। निर्जीव पौधा बढ़ नहीं सकता। वह गति से शून्य है, कर्मण्यता से बिलकुल रहित है। जानदार पौधा बढ़ता है, हर-

कत प्रकट करता है।

जीवन की चार कोटियां और उनकी तुलना। फिर हम देखते हैं कि साधारणतः जीवन के चार भेद किये जाते हैं अथवा यह संसार चार मुख्य वर्गों किंवा कोटियों में विभक्त है, खनिज उद्भिज्ज पशु और मनुष्य। मानव कोटि पशुओं की अपेक्षा अधिक उद्योगशक्ति, अधिक प्रगति, उच्च कोटि का व्यापार प्रकट करती है। पशु केवल चल फिर सकते हैं, दौड़ या पहाड़ों पर चढ़ सकते हैं। किन्तु मनुष्य इन सब कामों के सिवाय और बहुत कुछ करता है। वह और अनेक बातें करता है। वह उच्चतर कोटि की उद्योगशक्ति अथवा गति प्रकट करता है। दूरबीनों के द्वारा वह नक्षत्रों तक पहुँच सकता है। पशु ऐसा नहीं कर सकते। मनुष्य पशुओं पर शासन कर सकता है। वह वाष्प और विद्युत् के द्वारा समय और स्थान का उच्छेद करता है। वह पशुओं के लिये अज्ञात शीघ्रता प्राप्त करता है। वह संसार के किसी भी भाग में तुरन्त सन्देश भेज सकता है। वह हवा में उड़ सकता है। यह मनुष्य की गति, मनुष्य का उद्योग, संसार में शक्ति का प्रादुर्भाव है। उद्योग को प्रादुर्भूत या प्रकट करने में पशु मनुष्य से कम पड़ते हैं, और हम देखते हैं कि जीवन की कोटि में मनुष्य की अपेक्षा पशु नीचे पर हैं।

अब उद्भिज्ज कोटि की तुलना पशु कोटि से कीजिये। शाक भी बढ़ते हैं। उन में गति है, किन्तु एकमुखी। वे केवल रेखा में बढ़ सकते हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान को नहीं जा सकते, वे एक स्थल पर जमे हुए हैं। सब दिशाओं में उनकी शाखायें जाती हैं और जड़ें बहुत गहराई तक प्रवेश

करती हैं। किन्तु पशु कोटि में क्रिया का जितना आविर्भाव या प्रकाश होता है उसकी अपेक्षा वृक्षों में बहुत कम है। और इस प्रकार हम देखते हैं कि जीवन की कोटि में उद्भिज्ज पशुओं की तुलना में बहुत नीचे पर हैं। खनिज पदार्थों में कोई जीवन नहीं है। यदि हम जीवन की वही व्याख्या करें जो प्राणिविद्याविशारद करते हैं, तो उनमें कोई जीवन नहीं है। किन्तु यदि क्रिया के आविर्भाव और प्रकाश से हम जीवन की कोटियों पर ध्यान दें, तो हम कह सकते हैं कि खनिज कोटि भी एक प्रकार की प्रगति प्रकट करती है। उनमें भी परिवर्तन होता है, उनके लिये भी परिवर्तन अनिवार्य है।

इस प्रकार उनमें भी जीवन के अत्यन्त छोटे लक्षण हैं। परन्तु उनका जीवन बहुत ही तुच्छ है, कोटियों के सब से नीचे प्रान्त में है क्योंकि उनके द्वारा प्रकट होने वाली कर्मण्यता, गति, उद्योगशक्ति तुच्छ है, अति सूक्ष्म है। इससे यह स्पष्ट है कि स्फूर्ति से संलक्षित जीवन को गति या उद्योगशक्ति के अंशों के अनुसार कोटि प्राप्त होती है।

प्रकृति की कृपणता। प्रकृति का प्रबन्ध यह है कि संसार में कुछ भी नवीन नहीं होना चाहिये। हम देखते हैं कि, देखने की इस अनेकता और वाह्य बहुरूपता के होते हुए भी प्रकृति या विश्व बहुत कृपण है। प्रेमी के लोचनों से एक आंसू का बहाव जिस कानून के अधीन है, वही कानून सूर्यों और तारों की क्रान्तियों का भी शासनकर्ता है। छोटे से छोटे अणु से लगाकर अत्यन्त दूरस्थ नक्षत्र तक को उन्हीं साधारण कानूनों द्वारा हम नियंत्रित और शासित होते देखते हैं, जो पोरों पर गिने जा सकते हैं। प्रकृति पुनः २ अपने को दोहराती है। इस विश्व

की तुलना पंच या ढिबरी से की जा सकती है, जिसका प्रत्येक खंधाना या सूत एक ही ढंग का है। अथवा प्याज की झांड़ी से इसकी तुलना कर सकते हैं। एक पत्ते उतार डालिये वैसा ही दूसरा पत्ता उपस्थित है, अब इसको भी उतार डालिये फिर वैसाही और हमारे सामने है। इसको भी निकाल डालिये और ठीक ऐसा ही एक और पत्ता आप देखेंगे। ठीक इसी प्रकार से, पूरे साल भर में जो कुछ होता है वही छोटे परिणाम में हर दिन में घटित होता रहता है। सवेरे के समय का मिलान वसन्त ऋतु से किया जा सकता है। दोपहर की तुलना ग्रीष्म से हो सकती है। तीसरे पहर और सायंकाल की तुलना शरद से हो सकती है, और निशा की जाड़े से। इस प्रकार चौबीस घंटों में छोटे परिमाण में सम्पूर्ण वर्ष का नया जन्म हो जाता है। गर्भस्थित मनुष्य आश्चर्यजनक शीघ्रता से मानवस्वरूप धारण करने से पहले की सब योनियों के, जिनमें उसने वास किया है, अतीत अनुभवों की पुनरावृत्ति करता है। पिंड मानव-शिशु के रूप में आने के पूर्व क्रम से मछली, कुत्ता, बन्दर इत्यादि के रूपों को, अपने में धारण करता है। इस प्रकार विकासवाद के साधारण नियम के अनुसार, सारे संसार का शासन करने वाले साधारण कानून के अनुसार हम पता लगाना चाहते हैं कि शरीर अथवा मनुष्य की आकृति में भी क्या कार्यतः खनिज उद्भिज्ज और पशु कोटियों की पुनरुत्पत्ति है। क्या मनुष्य के रूप में ऐसे लोग भी नहीं हैं, जो मानों खनिज ही हैं। मनुष्य के रूप में क्या ऐसी व्यक्तियां नहीं हैं जो उद्भिज्ज कोटि की अवस्था में हैं, और क्या ऐसे लोग भी मनुष्यरूप में नहीं हैं जो पशु कोटि की दशा में हैं। हम उन मनुष्यों को भी देखना चाहते हैं, जो वास्तव में मनुष्य हैं, और जो मानव रूप में देवता हैं।

खनिज मनुष्य। पहले हम नैतिक और आध्यात्मिक खनिजों को लेते हैं। खनिज कोटि देखने में किसी प्रकार की गति नहीं प्रकट करती है, बाहर से किसी प्रकार की उद्योगशक्ति नहीं दिखाती। किन्तु तथापि उसमें किसी प्रकार की उद्योगशक्ति, कर्मण्यता और गति है ही। क्योंकि, हम खनिजों को बदलते देखते हैं, खनिजों में भी वृद्धि और विश्लेषण की क्रिया पायी जाती है। वे घन होते और बढ़ते हैं। समुद्र की तुलना में हमें अचल दिखायी पड़ने वाली यह पृथिवी, यह सुदृढ़ प्रतीत होनेवाली पृथिवी गिरती है, बदलती है, लहरों की तरह नीची ऊँची होती रहती है। इस प्रकार खनिजों में एक प्रकार की गति है, यद्यपि बहुत करके अलक्षनीय।

अब, मनुष्य के रूप में वे कौन हैं जिनमें खनिजों की सी ही गति है, दूसरे शब्दों में, जिनमें उसी प्रकार की गति है जैसी बच्चों की फिरकी या लट्टू में। फिरकी या लट्टू घूमता है, बार २ चक्कर काटता है, वह डोलता है, और जिस समय वह बड़े वेग से नाचता रहता है, लड़के आकर जोर से ताड़ियां बजा २ कर प्रसन्नता से कहते हैं, यह अचल है, यह डोलता नहीं है। यह आत्म-केन्द्रित गति है, चक्रराती हुई गति है, किन्तु चक्कर का केन्द्र शरीर के अन्तर्गत है, और गति की अत्यन्त उग्रता के समय भी, देखने में कोई गति नहीं प्रतीत होती है।

आप जानते हैं कि, इस संसार में सब गतियां मंडलाकार हैं, सीधी रेखा में कोई गति नहीं होती। सम्पूर्ण विज्ञान इसे सिद्ध करता है। इस कारण से गति के आविर्भाव के प्रतिनिधित्व के लिये हम मंडलों का उपयोग करेंगे। गणितः

विद्या में गति का प्रतिनिधित्व रेखायें करती हैं। प्रस्तुत मामले में गोलाकार रेखाओं से खूब काम निकलेगा।

इस खनिज जगत को हम जिस गति का अधिकारी पाते हैं, वह फिरकी की गति के तुल्य है। आपके सामने जो आकृति (चक्र) है उसको यह लघुतम मण्डल, जो बिन्दु कहा जा सकता है, उसे भली भांति प्रकट कर सकता है। मनुष्यों में वे कौन हैं, जिनकी गति लट्टू की गति के तुल्य है, जिनका चक्कर या प्रगति का मार्ग एक बिन्दु मात्र है, जिनका जीवन खनिजों का जीवन है? ज़रा विचार कीजिये। स्पष्टतः ये वही मनुष्य हैं, जिनके सब कामकाज एक छोटे से बिन्दु, झूठी आत्मा, साढ़े तीन हाथ लम्बे शरीर के छोटे से दायरे में एकत्रित हैं। वे अत्यन्त संकुचित कोटि के स्वार्थी हैं। ये वे लोग हैं, जिनके सब कार्य इन्द्रिय-तृप्ति के लिये हुआ करते हैं। ये लोग विभिन्न प्रकार के कार्य करते हैं, सब तरह के परिश्रम करते हैं, किन्तु एक मात्र उद्देश्य है केवल अधःपतनकारी सुखों की तलाश। इन्हें स्त्री और बच्चों के भूखों मरने की परवाह नहीं होती, पड़ोसी मरें या जियें इन्हें क्या, कुछ भी हो वे मद्यपान करेंगे, मौज उड़ावेंगे, हीन प्रकृति की आज्ञाओं का पालन अवश्य करेंगे। उनकी दुर्वृत्त आवश्यकतायें पूरी होना ही चाहिये, उनके कुटुम्ब और समाज के स्वार्थों की हानि हो जाय तो बलाय से। विषय-वासना की तृप्ति के सामने उन्हें अपनी स्त्री और बच्चों के भूखों मरने की कोई फिक्र नहीं होती। उनकी सब प्रगतियों का केन्द्र, जिस किरण-विन्दु (वह विन्दु या केन्द्र जहां तेज की किरणें एकट्ठा मिलती हैं) के इर्दगिर्द वे घूमते हैं, जिस सूर्य का वे चक्कर

काटा करते हैं, उनकी कक्षा का केन्द्र केवल तुच्छ शरीर है। उनकी कर्मशीलता या गति निर्जीव गति है। यही मनुष्य में खनिज जीवन है। संसार के इतिहास में अनेक अति सुहावने और मूल्यवान मनुष्यरूपी खनिज हुए हैं। आप जानते हैं हीरे भी खनिज जगत की वस्तु हैं। लाल, मोती, रत्न और सब तरह के कीमती पत्थर भी उसी कोटि की चीज़ें हैं।

रोम के इतिहास का एक वह समय था, जब नीरो, टाइबेरियस तथा अन्य सीज़र नाम के राजा थे, जिनके नाम लेना भी आप के कान अपवित्र करना है। बड़े २ शक्तिशाली शासक, सम्राट हो गये हैं, किन्तु वे अति मूल्यवान खनिजों के सिवाय और कुछ भी नहीं थे, मनुष्य नहीं थे। इन सम्राटों को आप क्या समझेंगे, जो अपने आने हुए समस्त संसार के राजा तो थे, परन्तु अपने राज्य के स्वार्थों की तिनका भर भी परवाह नहीं करते थे। जो अपने मित्रों और परिजनों का कुछ भी विचार नहीं करते थे। और अपनी रानियों, प्रजाजन तथा मित्रों के सुख-दुख को भूल कर अपनी पाशविक वासनाओं की तृप्ति में लगे रहते थे। आप उनसे और उनके किये हुए पातकों से अवगत हैं, इनमें से एक को समस्त दिन सुस्वादु व्यञ्जन खाते रहने का दुर्व्यसन हो गया था। जब कोई अत्यन्त सुस्वादु पदार्थ उसके सामने आ जाता था, तो उस समय तक वह अपना मुँह नहीं फेरता था, जब तक कि पेट बिलकुल जवाब नहीं दे देता था। तदुपरान्त औषधियों की सहायता से सब कुछ उगल दिया जाता था। पेट खाली होने पर फिर वह खाने में लगा लगा देता था। एक ही दिन में इस प्रणाली की अनेक आवृत्तियां होती थीं। अग्निकाण्ड देखने की आकांक्षा पूरी करने के लिये एक ने संसार की राजधानी

जला दी थी। इसको आप क्या समझते हैं? निस्सन्देह ये मूल्यवान हीरे थे, रत्न थे, किन्तु मनुष्य नहीं थे। ये मानव जगत में खनिज हैं।

अब हम मनुष्य रूप में उद्भिज्जों की अवस्था पर आते हैं। खनिज मनुष्य के क्षुद्र स्वार्थपूर्ण छोटे मण्डल से उनका मण्डल बड़ा है। इनका मण्डल बड़ा है और ये लोग खनिज मनुष्य से बहुत ऊँचे हैं। [उद्भिज्ज मनुष्य।] इनकी कर्मशीलता की तुलना घुड़दौड़ी घोड़े की गति से की जा सकती है। घुड़दौड़ी घोड़े का मण्डल फिरकी या लट्टू से बड़ा है। चक्र में उनका मण्डल दूसरे मण्डल से, जिसका केन्द्र (ख) है, व्यक्त किया गया है। ये लोग कौन हैं? प्रत्येक अन्य मनुष्य के स्वार्थ को भेंट चढ़ा कर ये लोग केवल अपनी इन्द्रियासक्ति को संतुष्ट करने के लिये अपने काम में नहीं लगते हैं। वे कुछ और साथियों के हित का भी ध्यान रखते हैं। ये वे लोग हैं, जो अपनी स्त्री और बच्चों के पारिवारिक मण्डल के इर्दगिर्द घूमते हैं। स्वार्थी खनिज मनुष्यों से ये कहीं श्रेष्ठ हैं, क्योंकि ये केवल अपने ही शरीर का हित नहीं साधते, किन्तु अपनी स्त्री और बच्चों के पद को भी पुष्ट करते हैं। अनेक छोटे मण्डल दूसरे मण्डल में सम्मिलित हैं। इसी तरह से ये लोग भी अपनी छोटी आत्मा के सिवाय अनेक छोटी आत्माओं की भलाई करते हैं। किन्तु क्या इन्हें निःस्वार्थपर कहना चाहिये? कदापि नहीं। इन लोगों के मामले में आत्मा का केवल कुछ विस्तार हो गया है। खनिज मनुष्य के मामले में, आत्मा इस छोटे से शरीर तक परिमित थी। और इन लोगों के मामले में, आत्मा की कौटुम्बिक मण्डल से, उनके स्त्री और बच्चों से प्रायः एकता

हो गई है। यह भी स्वार्थपरता है, किन्तु कुछ संशोधित है। ये लोग अपनी पहुँचभर बड़े भले आदमी हैं। किन्तु इनके प्रतिनिधिस्वरूप दूसरे मण्डल की ओर देखिये। यह अपने भीतर की सब वस्तुओं के लिये अनुकूल है। यह अनुकूलता क्या चीज़ है? प्रेम के हाथों का लिपटाना चिपटाना अनुकूलता है। अपने हाथ फैलाकर एक मण्डल बनाइये। यही अनुकूलता है। यह मण्डल कुटुम्बियों के लिये अनुकूल है, उन सब बिन्दुओं की ओर मुख किये है जिनका आलिंगन करता है, किन्तु अपने से बाहर के सारे संसार की ओर पीठ फेरे है।

ये लोग अपनी दौड़ तक के लिये, जहां तक इनकी अनुकूलता या फैले हुए हाथों की पहुँच है, बहुत अच्छे हैं। किन्तु सारे संसार की ओर ये अपनी पीठ फेरे हैं। उद्भिज्ज मनुष्य के दूसरे मण्डल में फिरनेवाले इन मनुष्यों की स्वार्थ-परता उस समय खुल जाती है, जब एक कुटुम्ब के स्वार्थ दूसरे कुटुम्ब के स्वार्थों से टकराते हैं। और तब एक कुटुम्ब के सब मनुष्यों से दूसरे कुटुम्ब के सब मनुष्यों का खूब विवाद और फिसाद होता है।

अब हम तीसरे मण्डल पर आते हैं। ये पशु-मनुष्य हैं, मनुष्यों के रूपों में पशु। [पशु मनुष्य।] यह तीसरा मण्डल, जो चक्र में (ग) केन्द्र करके दिखाया गया है, पूर्वगामी दोनों से बड़ा है। इसकी तुलना मौसमी हवाओं (अयन वायुओं—दक्षिणायन और उत्तरायण) से (बने हुए मण्डलों से) की जा सकती है। यह उन लोगों का स्थानापन्न है, जिन्होंने अपनी एकता ऐसी वस्तु से कर ली है, जो इस तुच्छ शरीर अथवा कौटुम्बिक मण्डल से ऊँची (या विशाल) है। ये लोग अपने वर्ग या दल या राज्य से अपनी एकता मान

लेते हैं। वे लोग साम्प्रदायिक हैं, जो अपनी किसी उपजाति या कला-कौशलीय बिरादरी को अपनी अनन्यता की हद बना लेते हैं। वे बड़े अच्छे हैं, सचमुच बड़े उपयोगी हैं, उद्भिज्ज मनुष्यों से कहीं अधिक काम के हैं। उनके चक्कर के व्यासार्ध की लम्बाई ज़्यादा है। ये लोग अभिनन्दनीय हैं। आप जानते हैं कि इनकी उपयोगिता का फैलाव अनेक कुटुम्बों और व्यक्तियों तक होता है। इनकी भुजायें जिन लोगों का प्रेमालिंगन करती हैं उनके लिये ये उपयोगी हैं। जिन लोगों के प्रति इनका भाव अनुकूलता का है, उनके लिये ये काम की चीज़ें हैं। ये लोग केवल अपने नन्हे से शरीर अथवा एक परिवार या घर का ही हित नहीं साधते, किन्तु उस समस्त वर्ग या दल का पद पुष्ट करते हैं, जिससे अपने स्वयं की इन्हों ने अभिन्नता मान ली है। ये बड़े ही उपयोगी हैं। क्या ये भी स्वार्थी हैं? क्यों नहीं, अवश्य हैं। ये भी स्वार्थपरायण हैं। ये अन्य दलों या उपजातियों की हानि करके उस दल की भलाई का प्रयत्न करते हैं, जिससे उन्होंने अपनी एकता मान रक्खी है। यदि आप इन लोगों की कमियां जानना चाहते हैं, तो इनके मण्डल से बहिर्गत सब बिन्दुओं के प्रति इनके भाव पर दृष्टि डालिये। इनके मण्डल से बाहर जो कुछ है उसकी ओर पीठ फेर देते हैं। जब इनकी साम्प्रदायिकता (दलबन्दी का भाव) घनीभूत (दृढ़) और अचल हो जाती है, तो भिन्न मतावलम्बियों को बुरा भला कहते नहीं चूकते। यह एक वर्ग है, और वहां दूसरा वर्ग है। इसी प्रकार का दूसरा मण्डल। इन दोनों के एक दूसरे के विरुद्ध फिर जाने पर एक मण्डल के सब व्यक्तियों से दूसरे मण्डल के सब व्यक्तियों का लड़ना-मरना शुरु हो जाता है। समझ रखिये, यदि वे कुछ की भलाई करते हैं, तो दूसरे समाजों

और प्रतिस्पर्धी सम्प्रदायों से युद्ध छेड़ कर उतनी ही हानि भी करते हैं, यदि अधिक नहीं। एक समग्र दल दूसरी ओर स्थित समग्र दल से लड़-भगड़ रहा है। इससे कितने असंतोष की उपज होती है! फिर भी ये लोग उद्भिज्ज कोटि के लोगों से कहीं अधिक वांछनीय हैं।

प्रकृति का नियम है कि तुम एक स्थान पर गतिशून्य होकर नहीं रह सकते, तुमको चलना चाहिये, आगे और आगे बढ़ते जाओ। परिवर्तन और प्रगति के विरोधी या जड़ता के अधीन न हो। जब लोग खनिज-मनुष्य की अवस्था में हैं, वो दूसरी उच्चतर अवस्था उद्भिज्ज-मनुष्य की होगी और इसके बाद की उच्चतर अवस्था पशु-मानव की होगी। यदि ऊपर की ओर चढ़ता और आगे बढ़ता हुआ मनुष्य पशु-मानव की अवस्था से होकर निकलता है, तो यह अच्छा ही है। पशु-जगत में होकर किसी मनुष्य के गुज़रने में कोई भी हानि या अनौचित्य नहीं है, यह सर्वथा ठीक है। उसी समय सब बातें बिगड़ती हैं, हरेक चीज़ अस्तव्यस्त हो जाती और हानि पैदा करती है, जब किसी मत या सम्प्रदाय के हाथ अपनी स्वाधीनता बेच कर, हम एक स्थान पर रुक कर अचल हो जाने की इच्छा करते, तथा और आगे बढ़ना अस्वीकार करते हैं। किसी न किसी समय उस दशा में होकर गुज़रना सब के लिये स्वाभाविक है। किन्तु उसमें चिपक रहना और उसे चिरस्थायी बनाने की चेष्टा करना मनुष्य के लिये अनुचित है। उसका उस विशेष नाम का दास बन जाना अथवा अपनी स्थिति को स्थिरता महान करना ही अनुचित और हानिका कारण है। जब सोडोम और गोमोरा नगर नष्ट किये जा रहे थे, लौट की

स्त्री लौट पड़ी थी। वह नगर छोड़ रही थी, परन्तु उसने फिर मुँह मोड़ा। वह नगर में रहना चाहती थी, उसका चित्त वहां लगा हुआ था और उसने फिर लौटना चाहा। फल यह हुआ कि वह जहां की, तहां लवण का स्तम्भ हो गई। ठीक यही दशा उन लोगों की है जो ऊपर की ओर चढ़ते रहते हैं और जो अपनी पूर्वीय स्थिति से हटते रहते हैं, तथा जो आगे बढ़ना अस्वीकार करते हैं। पहली दशा उनके लिये अच्छी है, किन्तु ज्योंही वे पीछे लौटना चाहते हैं, एवं आगे बढ़ना अस्वीकार करते हैं, और अपने को नामों तथा रूपों के हाथ बेच डालते हैं, उसी क्षण वे अपने को लवण के स्तम्भ में बदल लेते हैं। ऐसी स्थिरता या धर्मान्धता क्लेश का कारण होती है। ये पशु-मनुष्य अच्छे मनुष्य भले ही हों, परन्तु उन्नति करना आवश्यक है, आप आगे बढ़े चलिये।

अब हम चौथे मण्डल पर आते हैं, पटरे पर जो केन्द्र (घ) के साथ खचित हुआ है। [देश भक्त मनुष्य।] यह मनुष्य रूप में मनुष्य है। यह साधारण मनुष्य है। उसके मण्डल का मिलान चन्द्र-मण्डल से किया जा सकता है। चन्द्रमा पृथिवी के गिर्द एक मण्डल खींचता है। इसकी आकृति गोल की अपेक्षा अण्डाकार अधिक है। यह चन्द्र-मनुष्य कौन है? चन्द्रमा का मार्ग बहुत बड़ा है। चन्द्र-मनुष्य कदाचित् सुखी है। यह मनुष्य सम्पूर्ण राष्ट्र या जाति से अपनी एकता स्थापित करता है। आप उसे देशभक्त कह सकते हैं। उसका मण्डल बहुत बड़ा है। जिनकी सेवा में वह लगता है वे किस सम्प्रदाय-युक्त हैं, इसकी उसे परवाह नहीं होती। जाति-पांति, रंग, और पद का ध्यान छोड़कर वह अपने देश के समस्त निवासियों का पद पुष्ट करना ही अपना कर्तव्य समझता है। वह हार्दिक स्वा-

गत के योग्य है, बड़ा ही भला है। वह मनुष्य है, किन्तु इससे अधिक नहीं। आप जानते हैं कि चन्द्रमा समुद्र में सन्तोभ का कारण होता है, ज्वार और भाटा पैदा करता है। इसके सिवाय, आप जानते हैं कि पागल भी चन्द्रोपहत कहे जाते हैं। निस्सन्देह, चन्द्रमण्डल अच्छा मण्डल है। किन्तु उस अवस्था का विचार कीजिये जब चन्द्र-नर अपनी स्थिति अचल बनाते हैं, जब ये लोग स्वार्थपरायण हो जाते हैं और इनकी स्वार्थपरता में घनता आती है। इनकी स्वार्थपरता का अर्थ है देशभक्ति, जब वह कठोर बनादी जाती है, जब उस में घनता आ जाती है। इसका क्या फल होता है? वह क्रान्तियां और पागलपन पैदा करती है। वह एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र का विरोधी बनाती है, और तब संग्राम तथा खूनखराबा होता है। हज़ारों और कभी २ लाखों प्राणी रक्त बहाते, गिराते और पान करते हुए इस सुन्दर पृथिवी का सुमुख नरमेध से लज्जित तथा रक्त से लाल कर देते हैं। जिन्हें वे अंक में भरते हैं, जिनके प्रति वे अनुकूल हैं उनके लिये वे बहुत अच्छे हैं। किन्तु जिनके विरुद्ध वे उलटे या प्रतिकुल हैं उनके प्रति उनके भाव पर ध्यान दीजिये। वाशिंगटन अमेरिकनों के लिये बहुत अच्छा है, किन्तु ज़रा अंग्रेज़ों के मन से तो पूछिये। अंग्रेज देशभक्त, जहां तक उस देश का सम्बन्ध है जिसे वे अपना कहते हैं, बहुत अच्छे हैं, किन्तु जिन जातियों का जीवन रक्त उनकी देशभक्ति चूस रही है, उनके सम्बन्ध में उनका विचार कीजिये।

सब के अन्त में हम पांचवें मण्डल पर आते हैं। इसका [देवमनुष्य।] केन्द्र अनन्तता तक पहुँचता है, अथवा यों कहिये कि व्यासार्ध अनन्त हो जाता है। और मण्डल का क्या होता है? जब व्यासार्ध अनन्तता की खबर लेता है तब

मण्डल सीधी रेखा हो ही जायगा। सब टेढ़ापन जाता रहा। सीधी रेखा सर्वत्र ही समता और बिना पक्षपात के गुज़रती है। न तो यह किसी के लिये अनुकूल है, न प्रतिकुल। मण्डल ठीक रेखा, सीधी रेखा हो जाता है। सारा टेढ़ापन मिट गया। सारी वक्रता लुप्त हो गई। ये देवमनुष्य हैं। इनके मण्डल की तुलना सूर्यकृत मण्डल से की जा सकती है। आप जानते हैं कि सूर्य की गति सीधी रेखा में होती है। उसके मण्डल का व्यासार्ध असीम है। सूर्य प्रभा का पुंज है। यह एक ऐसा मण्डल है जिसका केन्द्र सर्वत्र है, और घेरा या परिघ कहीं नहीं। यह देव-मण्डल है। ये मुक्त पुरुष हैं। सब कष्ट, भय, शारीरिक आकांक्षाओं और स्वार्थपरता से मुक्त, ये स्वाधीन मनुष्य हैं। क्या सीधी रेखा में हम कोई स्वार्थपरायणता नहीं पाते हैं? सीधी रेखा सीधी रेखा है, उसमें कहीं पर भी कोई अटकाने वाला विषयबिन्दु हम नहीं देखते हैं। यह स्थान से होकर गुज़रती है, कोई स्वार्थी छोटा केन्द्र ऐसा नहीं है जिसका यह चक्कर काटे। कोई भी चीज़ इसे घुमानेवाली नहीं है। यहां स्वार्थपरता का विनाश हो जाता है, अथवा आप कह सकते हैं कि, यहां वास्तविक आत्मा की उपलब्धि होती है। आप देखते हैं कि हमने बिन्दु-मण्डल, स्थूल स्वार्थपरता से प्रारम्भ किया था और अब उस छोटे से बिन्दु ने बढ़, फैल और विकासित होकर सीधी रेखा का रूप धारण किया है। ये देवमनुष्य हैं। ये वे लोग हैं जिनका घर यह विशाल विश्व है, जाति, पांति, समाज, सम्प्रदाय, देश, रंग जिनके लिये एकसमान है। अब आप अंग्रेज हों या अमेरिकन, बौद्ध हों या मुसलमान, अथवा हिन्दू हों, या कोई भी हों, आप राम की आत्मा हैं। आप उसके लिये आत्मा की आत्मा हैं। यहां स्वार्थपरता की

अद्भुत वृद्धि हो गई है, यह एक अनूठे प्रकार की स्वार्थपरायणता है। विस्तृत संसार में स्वयं हूँ। विश्व ऐसे मनुष्य की आत्मा है। विशाल जगत, छोटे से छोटा प्राणी, खनिज, उद्भिज्ज, इन सब की आत्मा इस मनुष्य की आत्मा हो जाती है।

इस पूर्ण मुक्तावस्था को पहुँचे हुए महात्मा के पास एक शिष्य आया और लगभग एक वर्ष तक उसकी सेवा में रहा। शिष्य जब गुरू से विदा होने लगा तो भारतीय रीति के अनुसार वह चरण छूने तथा साष्टांग दण्डवत करने लगा। गुरू ने मुसक्याते हुए उसे उठाया और कहा, "प्यारे, तुम्हारी शिक्षा अभी पूर्ण नहीं हुई। अभी तुम में बड़ी कमी है। कुछ काल तक और ठहरो"। कुछ दिन गुरुदेव के पवित्र आश्रम में वह और रहा, तथा अधिकाधिक अनुप्राणित होता रहा (उपदेश पाये)। उसे आत्मानुभव हो गया। वह विशुद्ध आत्मा से परिपूर्ण था। वह गुरू के आश्रम से चला गया, यह भी ध्यान उसे नहीं रह गया था कि वह चेला है या स्वयं गुरू। समग्र संसार, विशाल विश्व को अपनी वास्तविक आत्मा समझता हुआ वह चल दिया। और समग्र संसार जब उसकी वास्तविक आत्मा हो गया, तो वह आत्मा कहां जा सकता था? जब आत्मा प्रत्येक अणु और परमाणु में व्याप्त है, प्रत्येक अणु और परमाणु को परिपूर्ण किये है, तो वह कहां जा सकती है? ऐसे पुरुष के लिये जाने और आने की बात निरर्थक हो जाती है। आप एक स्थान से दूसरे स्थान को तभी जा सकते हैं, जब जिस स्थान को आप जाना चाहते हैं वहां पहले ही से न हों। अब वह अपने को, प्रकृत स्वयं को, अन्तर्गत परमात्मा को, सर्वव्यापी परमात्मा को खोज चुका था, और जाने या आने का विचार उसे कैसे हो सकता था? जाने और आने के विचार उसके लिये लोप

हो गये। वह आत्मानुभव की अवस्था में था। शरीर का जाना एक प्रकार का प्रतिबिम्ब-क्रिया थी। वह अपने में था, उसके लिये जाना या आना कैसा। तब गुरू जी सन्तुष्ट हुए। इस प्रकार गुरु ने परीक्षा ली और उसकी निर्मल योग्यता प्रमाणित की। शिष्य ने गुरू को धन्यवाद नहीं दिया और न प्रणाम किया। इस दर्जे तक एकता में वह लीन हो गया था कि धन्यवाद की भावना बहुत पीछे छूट गई थी। तब गुरू ने जाना कि उसने मेरे उपदेशों का ठीक २ मर्म समझा है। यह पूर्णावस्था है, जिसमें यदि आप उस मनुष्य का आदर करते हैं, तो वह कहता है कि तुम मेरा निरादर कर रहे हो। "मैं इस शरीर में अवरुद्ध नहीं हूँ, मैं यह छोटा सा शरीर मात्र नहीं हूँ, मैं विशाल विश्व हूँ, मैं तुम हूँ और अपने ही में मेरा सन्मान करो"। यह उस मनुष्य की दशा है जो कोई वस्तु तुम्हारे हाथ बेचता नहीं है। यह उस मनुष्य की दशा है, जिसके लिये शरीर का मान और अपमान निरर्थक है, यश और अपयश कुछ भी नहीं हैं।

भारत में एक साधु के पास एक मनुष्य, जो राजा था, आया और साष्टांग दण्डवत की। साधु ने राजा से इस विनय का कारण पूछा। राजा ने कहा, "महाराज! पूज्य महात्मा जी! आप साधु हैं और आपने इस राज्य को त्याग कर, जिसके आप पहले शासक थे, यह आश्रम ग्रहण किया है। आप बड़े त्यागी महानुभाव हैं, इस लिये मैं आपको ईश्वरवत् समझता हूँ और आपकी उपासना करता हूँ"। आप जानते हैं, भारत में धनवानों का अधिक आदर नहीं होता है। भारत में लोगों का आदर उनकी त्याग की मात्रा के अनुसार होता है और वहां मान का मुख्य सिद्धान्त यहां से भिन्न है। सर्वशक्तिमान धनदेव की अपेक्षा परमात्मा पर

अधिक भरोसा किया जाता है। राजा त्यागी पुरुष का सत्कार कर रहा था। साधु ने राजा को उत्तर दिया, "यदि इस कारण से तुम मुझे प्रणाम कर रहे हो, तो मुझे तुम्हारे चरण धोना चाहिये, मुख कर प्रणाम करना चाहिये। क्योंकि, ऐ राजा! इस संसार के सब साधुओं के त्याग से तुम्हारा त्याग अधिक है"। यह बड़ी ही विचित्र बात है। यह कैसे हो सकता है? तब साधु ने समझाना शुरू किया। "कल्पना करो कि, एक मनुष्य एक भव्य भवन का अधिकारी है और उसका कूड़ा करकट उसने बाहर फेंक दिया है। वह घर का केवल गर्द-गुबार त्यागता है या बाहर फेंकता है। क्या वह त्यागी है?" राजा ने कहा, "कदापि नहीं, वह त्यागी नहीं है"। इसके बाद साधु ने कहा, 'दूसरा आदमी घर का कूड़ा करकट तो जमा करता है और सारा मकान, विशाल भवन त्याग देता है। इस मनुष्य को तुम क्या समझोगे?" राजा ने कहा, "यह मनुष्य जो केवल कूड़ा करकट संचय करता है और प्रासाद त्यागता है, त्यागी मनुष्य है"। इस पर साधु ने कहा, "भाई! राजन्, तब तो तुम्हीं त्यागी हो, क्योंकि वास्तविक आत्मा परमेश्वर को, जो भव्य भवन है, वास्तविक घर, स्वर्ग स्वर्गों का स्वर्ग है, तुमने त्याग दिया है, और केवल उसका कूड़ा करकट, यह शरीर, यह तुच्छ स्वार्थपरता तुमने रख छोड़ी है। मैंने कुछ भी नहीं त्यागा है। मैं स्वयं ईश्वरों का ईश्वर हूँ! संसार का स्वामी हूँ"।

कभी २ इन लोगों को इन सिद्ध महात्माओं को जो उन्नति की चरम अवस्था में पहुँच गये हैं, कुछ लोग तुच्छ समझते और सनकी कहते हैं। किन्तु ज़रा इनसे पूछिये तो सही कि भला एक क्षण के लिये भी ये अपना दैवी आनन्द, परम सुख जो इन्हें ईश्वरमद में प्राप्त होता है, संसार की समस्त.

सम्पत्ति और वैभव से बदलने को तैयार हैं? कदापि नहीं, कदापि नहीं। इन्द्रियगत सुखों के द्वार पर, रक्तमांस की देह के द्वार पर जा २ कर हाथ फैलाने के अभ्यासी, सम्पत्तिशाली कहलानेवालों का भिखारीपन का भाव इन्हें तुच्छ और तरस के योग्य दिखाई पड़ता है। आनन्द आपके अन्तर्गत है। तो फिर शोचनीय और पीड़ित अवस्था में इधर उधर भटक कर भिखारी का स्वांग, क्षुद्र कण का सा बर्ताव, क्यों करते हो? आओ, अपनी अन्तरात्मा, सर्वशक्तिमान् परमेश्वर का अनुभव करो, और पूर्णानन्द में डूब कर यह गीत गाओ।

'मैं कण हूँ रवि की किरणों में, भानु प्रज्वलित भी मैं हूँ, 'यां विश्राम करो,' यह आज्ञा अणुगण को देता मैं हूँ। पृथिवीमण्डल, नभ के ग्रह सब मंगल, बुध, गुरु, शनि, राकेश, 'बढ़े चलो' शुभ कर्म तुम्हारा और यही मेरा आदेश॥ मैं ऊषा की लाली हूँ, फिर सांझ समय की मन्द समीर, मन्द ध्वनी हूँ पक्षी की, त्यों सागर का कलरव गम्भीर। प्रेमिकी सांवेश विनय, कोमल युवती की भयवानी, योद्धा, असि जो करती हत, मृदु मातृहृदय की दुःखखानी॥ पुष्प मनोहर, अमर मही हूँ, गलों से उठने वाली तान, चकमक पत्थर, चिनगारी, लौ, और पतिंग जो देता जान। नशा और अंगूर सभी कुछ, मद्य, मुश्क, भभका ताली, सत्कारी, पुनि अतिथि, यात्री, सुन्दर रत्नों की थाली॥

मन मारि रहैं लाखे तेरि प्रभा, सब साज सजावट राजन की। स्वर्गे तुही जगज्योति औ ज्ञान है आनन्द राशि आराधन की॥

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!