श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

वेदांत का एक साधन (प्रसन्नता)

भाग 11 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 11 · अध्याय 6 / 6

वेदांत का एक साधन (प्रसन्नता)

परित्यजेयं त्रैलोक्यं राज्यं देवेषु वा पुनः। यद्वाऽप्यधिकमेताभ्या न तु सत्यं कथंचन ॥ त्यजेच्च पृथिवीं गंधमापश्चरणं मात्मनः। ज्योतिस्तथा त्यजेद्रूपं वायुः स्पर्शगुणं त्यजेत् ॥ प्रभां समुत्सृजेदर्कों धूमकेतुस्तथोष्मतां। त्यजेच्छब्दं तथाकाशं प्रोमः शीतांशुतां त्यजेत् ॥ विक्रमं वृत्रहा जह्यात् धर्मं जह्याच्च धर्मराट। न त्वहं सत्यमुत्सृष्टं व्यवसेयं कथंचन ॥

अर्थ—"तीनों लोकों का त्याग करना, स्वर्ग का राज्य छोड़ देना, वरन् उससे भी यदि कुछ बढ़कर हो तो उसे न लेना स्वीकार है, किंतु सच्चाई से अलग होना स्वीकार नहीं कर सकूंगा।"

"चाहे पृथ्वी अपना गुण वा धर्म (गंध) छोड़ दे, जल अपना गुण (रस) छोड़ दे, तेज अपना गुण (रूप) छोड़

दे, वायु अपना स्पर्श-गुण छोड़ दे, सूर्य अपना प्रकाश छोड़ दे, अग्नि अपनी उष्णता छोड़ दे, आकाश अपने धर्म (शब्द) को छोड़ दे, चंद्र अपनी शीतलता को छोड़ दे, वृत्र का हंता (इंद्र) अपने वैभव को त्याग दे, धर्मराज (यमराज) धर्म (न्याय) को छोड़ दें, किंतु मैं सत्यता को कदापि नहीं छोडूंगा।"

ये वचन भीष्म पितामह जी के हैं। भीष्म पितामह इन पर चलते हैं। मैं भी इन्हीं को अपना आदर्श (motto) बनाऊँगा। जो एक बेर मेरी समझ में आ जाय कि यह सत्य है, उस पर अवश्य चलूँगा, चाहे सारी सृष्टि विरुद्ध हो। अब एक बेर जान लिया है कि क्रोध नहीं करना चाहिए, बस अंतिम निर्णय होगया। कुछ भी हो, क्रोधासक्त (मगलूबुल ग़ज़ब) नहीं बनूंगा।

महात्माओं के मुख से प्रायः यह भी सुना गया है कि "जो कुछ होता है, भले ही के लिये होता है," क्या यह सच है? मेरा तुच्छ अनुभव इस बारे में अभी सम्मति देने के योग्य नहीं, लेकिन उनकी बात पर क्यों विश्वास न करूँ? सब भले ही के लिये होता है। प्रकृति ने सेवा करने पर कमर बाँधी है। देवताओं ने शपथ खा ली है कि सदैव मेरी भलाई के लिये यत्नशील रहेंगे। यदि यह दशा है तो किसी बात के संबंध में मेरा कुढ़ना और ग़म खाना ऐसा नासमझी का काम है जैसा एक अनजान बच्चे का पुलिस के सिपाही को देखकर डरना। पुलिस का सिपाही तो नगर के लोगों की रक्षा और सेवा करने की ड्यूटी पर फिर रहा है, चोरों बदमाशों को हटाने पर कटिबद्ध है, इससे भय काहे का? संसार के दुःख भी और

सुख भी मुझे उन्नति की निसैनी पर चढ़ाते हैं. मैं घबराऊँ किस लिये ? जिसको मैं बुरा समझता हूँ, वह भला ही है, तो क्रोध किस बात का ?

सर-निविश्ते मा बदस्ते-खुद्-निविश्न । खुश निवीश़ऽस्तो न ख्वाहद बद निविश्त ॥

अर्थात्-हमारी निविश्त भाग्य ) उस (ईश्वर) ने अपने हाथ से लिखी है; वह खुश-निवीस (सुष्ठु-लेखक) है, बुरा नहीं लिखेगा ।

संसार लीला मात्र है, स्वप्न-विचार है, नाट्यशाला है, आतिशबाज़ी के खेल की तरह है; आतिशबाज़ी के हाथी घोड़े सब के सब जल जाने के लिये बहार दिखाते हैं, यदि ऐसे हाथी की सूँड़ सुंदर होगई तो क्या, और ज़रा खराब हो गई तो क्या; उसे तो देखते ही देखते मिट जाना है । ऐसी कृत्रिम वस्तु के लिये क्रुद्ध चित्त और कठोर वचनी होना काहे को ?

Imperious Caesar, died and turned to clay, Might stop a hole to keep the wind away; Oh! that the Earth that kept the world in awe Should patch a hole to expel the winters' flaw! (Shakespeare)

अर्थात् तेज और प्रभाव वाला रूम का सम्राट् जो मर चुका और मिट्टी हो चुका है, संभव है कि वायु को दूर रखने के लिये (या वायु से बचने के लिये) एक छिद्र बंद करदे, या वह मिट्टी जो सारे संसार को भयभीत बनाए रखती थी, आज उस सर्दी के वेग को रोकने (या सर्दी के भकोरे से बचने) के लिये छिद्र बंद करने की नौबत पड़े।

अभिप्राय यहः—कि वह रूम का सम्राट् जो सारे संसार को अपने प्रभाव और तेज से हिलाया करता था, आज क़ब्र में राख होने के कारण हवा के भकोरों से या और बुरे प्रभावों से नहीं बच सकता ।

आँ कसर कि बर चर्ख़ हमी ज़द पहलू। वर दरगहे-ओ शहाँ निहादंदे रू ॥ दीदेम कि बर कंगुरा-अश फाख़्ता ए। बिनिशस्ता हमी गुफ्त कि कू कू कू कू ॥

अर्थात्—वह महल जो आकाश से बातें करता था और जिसकी समाधि की ओर महाराज आकर्षित होते थे, हमने देखा कि उसकी मुँडेर पर पेदुकी बैठी हुई कू कू कू कू कहती थी (अर्थात् यह आवाज देती थी कि यह महलों में रहने वाले अब कहाँ हैं ? कहाँ हैं ? कहां है ? कहां हैं ?) ।

चिस्त दुनिया सर ब सर पुरसीदम अज फ़रज़ानए । गुफ्त या ख्वाब अस्त या बादअस्त या अफ़सानए ॥ कीस्त आँ कस को बरो शैदा शवद जाँ मी दहद । गुफ्त या देव अस्त या गोलअस्त या दीवानए ॥

अर्थात्—एक बुद्धिमान् से मैंने पूछा कि संसार क्या है । उसने उत्तर दिया कि यह या तो स्वप्न है या हवा है या कहानी मात्र है । फिर मैंने पूछा कि वह व्यक्ति कौन है जो ऐसे संसार पर आसक्त होता है और प्राण दे डालता है । उसने उत्तर दिया कि या तो वह देव है या शैतान है या पागल मात्र है ।

वाए नादानी कि वक्ते-मर्ग यह साबित हुआ । ख्वाब था जो कुछ कि देखा जो सुना अफ़साना था ॥

†मृत्युकाल ‡कहानी मात्र।

यदि सब कुछ स्वप्न ही है तो फिर चिंताएँ कैसी ?

गर यों हुआ तो फिर क्या । और वों हुआ तो फिर क्या ॥

चे हासिल जाँ कि दर दुनिया हमाँ जादन हमाँ मुर्दन । दरीं संगम शरर आसा, हमाँ जादन हमाँ मुर्दन ॥ 1 ॥ अजल बर हस्ती-ए-मा खन्दा ॐ दंदाँनुमा दारद। दरीं अबरेम बर्क आसा, हमाँ जादब हमाँ मुर्दन ॥ 2 ॥ निगह ता वाकुनी बादे-अजल कइती बगरदानद । हिजाबे-मौज हैं दरया, हमाँ जादन हमाँ मुर्दन ॥ 3 ॥

अर्थात्—इस संसार में बेर-बेर जीना और बेर-बेर मरना, इससे क्या लाभ ? इस पत्थर (शरीर) में मैं चिन- गारी के समान हूँ जो बेर-बेर उत्पन्न होती और बेर-बेर विलीन होती है ॥ 1 ॥

मृत्यु हमारे जीवन पर खिलखिला कर हँसता है; इस शरीर रूपी बादल में हम बिजली के समान हैं, जो बेर-बेर चमकती है या बेर-बेर अदृश्य हो जाती है ॥ 2 ॥

जब तक कि तू दृष्टि खोलेगा, उतने समय में मृत्यु की वायु तेरी नौका को लौटा देगी । इस नदी की तरंग का बुलबुला बेर-बेर उत्पन्न होता और बेर-बेर मिटता है ॥ 3 ॥

मैं सत्यता को सदैव सन्मुख रक्खूंगा । इस नाशमान् घर की वस्तुओं को स्वप्नावस्था के सुमन और कंटक (पुष्प और कांटा) समझूंगा ।

"Not for life— Which is but blade, and ear, and husk and grain To the self-living, changeless sesamum!—

Not for this fleeting world—should holy men Speak one word vainly."

अर्थात्—जीवन स्वरूप और अपरिवर्तन शील (आत्म देव रूपी) सुमन की अपेक्षा जो जीवन केवल छिलका, तिन्का, सिट्टा और अन्न के दाने के समान तुच्छ (अपदार्थ) है, उस ऐसे निस्सार जीवन के लिये तथा इस कृत्रिम संसार के लिये पवित्र व्यक्ति (शुद्ध पुरुष) एक शब्द भी व्यर्थ नहीं बोलते हैं । अर्थात् जो कुछ उन्हों ने इस संसार के विषय में निर्णय करके प्रकट किया है, वह ठीक और उचित है ।

सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः । (कठोपनिषद् 1, 1, 6)

अर्थात्—यह मनुष्य (नश्वर शरीर) अन्न की भांति पकता है, (पककर गिरता है अर्थात् पैदा होकर मर जाता है), और फिर अन्न की भांति ही उत्पन्न होता है । अर्थात् मनुष्य वनस्पतियों की भांति उत्पन्न होता, मरता और फिर पैदा होता रहता है, अतः नाशमान् है ।

किसकी शादी किस का गम । हू अल्लाह हू दम पर दम ॥

इस प्रकार के सोच विचार करते करते युधिष्ठर ने समस्त अवसरों को स्मरण किया, जहां उस के शांति के पैर फिसला करते थे, और अपने आप को खूब समझाया कि "ऐ अनजान मन ! सावधान ! इससे पहले जो हुआ सो हुआ । भविष्य में ऐसे कोमल समयों पर सम्हल कर चलना । जब कोई कुछ कटु वाक्य कहे, गाली दे, काम

विगाड़ दे, हमारे विरुद्ध कुचक्र (साज़िश) रच रहा हो, अथवा जब चित्त अस्वस्थ हो, इत्यादि, ऐसे ही अवसरों के लिये धैर्य और शांति की आवश्यकता होती है। जब सब काम इच्छा के अनुकूल चल रहे हों, प्रसन्न रहना बड़ी बात नहीं है ।

मजन चीं बरजबीं वक्ते-नज़ूले-दर्दो-गम ऐ दिल। कि ऐब अस्त अज करीमां दर बरुए मेहमां बस्तन ॥

अर्थात्—हे मन ! दुःख और शोक के आने पर मत्थे पर बल मत डाल; क्योंकि पाहुन (अतिथि) के लिये द्वार बंद करना दाता लोगों के लिये दोष गिना जाता है ।

निहंगो अजदहा-ओ-शेरे-नर मारा तो क्या मारा । बड मूजी को मारा नफ़्स-अम्मारा को गर मारा ॥ न मारा आप को जो खाक हो अक्सीर बन जाता । अगर पारे को ऐ अक्सीर गर ! मारा तो क्या मारा ॥

और भी लीजिए—

सहल शेरे दां कि सफ़हा बशिकन्द । शेर आनस्त आँ कि खुदरा बशिकन्द ॥

अर्थात् उसको दुर्बल सिंह समझ जो कि (पशुओं की) पंक्तियों को चीर डाले । सिंह वह है कि जो अपने (परि- च्छिन्न अहंकार) को तोड़ डाले ।

इसके पश्चात् युधिष्ठर ने बहुत बेर जान बूझ कर अपने आपको ऐसे स्थानों पर पहुँचाया, जहाँ दुर्योधनादि ने उसे छेड़ा और दुःख देना चाहा, किंतु युधिष्ठर ने हर बेर "क्रोध मत करो" के पाठ का व्यावहारिक अनुभव सफलता के साथ किया । जब क्रोध नितान्त त्यागा गया, तो चित्त में चैन रहने लगा, आनंद और प्रसन्नता ने

रंग जमाया, मानों मुफ्त में खज़ाने हाथ आ गए । सब काम भी अपने आप सुधरने लगे । अनुभव ने युधिष्ठिर को यह सिद्ध कर दिखाया कि सब लोगों का यह ख्याल कि "क्रोध के बिना काम नहीं चल सकते" नितान्त मिथ्या है ।

दर खुश्क साली आबे-गुहर कम नमी शवद । बुख्ल फ़लक ब अहले-कनाअत चे मी कुनद ॥

अर्थात्—सूखे के साल (दुर्भिक्ष) में मोती की चमक कम नहीं होती है, दैवी कृपणता धीर पुरुषों का क्या विगाड़ती है ।

प्रिय पाठको ! युधिष्ठिर विचारे ने पढ़ने के यह अर्थ समझ रक्खे थे जो ऊपर वर्णन हुए, अर्थात् रात-दिन लगातार चिंता और विचार का यहां तक जारी रखना कि गुरू का सुना हुआ पाठ व्यवहार में आ जाय । जब परीक्षक महाशय ने पीटना आरंभ किया, तो वह अपने विचार में "क्रोध मत करो" इस वाक्य की व्यावहारिक परीक्षा दे रहा था, और मस्त खड़ा था । उसका प्रत्येक रोम सुना रहा था कि "क्रोध मत करो", शांति ! शांति !! किंतु परीक्षक महाशय के कान सांसारिक चिंताओं के कोलाहल से ऐसे बहरे (बोले) हो रहे थे कि वह कुछ देर तक यह पाठ न सुन सके । अंततः सुनते क्यों कर न, जिह्ना बड़ी बलवान् है । परीक्षक महाशय जब कोसते 2 थक गए, तो युधिष्ठिर के मुख की ओर देखा; तब उन्हें होश आया, युधिष्ठिर की शांति उनके चित्त में तत्काल प्रवेश कर गई, और वे समझ गए कि ओहो ! यह लड़का तो हमारा भी गुरू है हमको सिखला रहा है कि पढ़ना किसको कहते हैं । हाय हाय ! इसको इतना वाक्य तो

सचमुच याद है कि "क्रोध मत करो." किंतु हमें तो यह वस्तुतः याद नहीं । इस विचार के साथ गुरूजी की आंखों में आँसू डबडबा आए । बच्चे को गोद में लिया, फूट- फूट कर रोने लगे ।

ऐ वर्तमान युग के नवयुवको ! यह देख तुम्हें अपनी गेहूँ जैसी जौ बेचने वाली शिक्षा पर रोना नहीं आता ।

पशोः पशुः को न करोति धर्मं, प्राधीत शास्त्रोऽपि न चात्मबोधः । (प्रश्नोत्तरी)

अर्थात्-संसार में पशुओं में पशु कौन है ?—उत्तर, जो शास्त्रपढ़कर धर्म नहीं करता और आत्मज्ञान को नहीं प्राप्त होता । -

यथा खरश्चंदन भारवाही भारस्य वेत्ता ननु चंदनस्य ॥

अर्थात्-"वह गधा जिस पर चंदन लदा हुआ हो, बोझ को तो जानता है, लेकिन खुशबूदार चंदन को नहीं" वैसे ही कर्महीन विद्वान् वेद का पशु है, वेदपाठी कहलाने का अधिकारी नहीं । यदि मस्तष्क में पोथे भर लेने पर श्रेष्ठता निर्भर हो, तो पुस्तकालय (लायब्ररियाँ) ऋषियों में गिने जाने चाहिये ।

वाग्वैखरी शब्दकरी शास्त्र व्याख्यान कौशलं वैदुष्यं विदुषां तद्वत् मुक्तये न तु मुक्तये ।

अर्थात्—शब्दों की चुस्ती और वाक्यों की दुरुस्ती, शाखों की व्याख्या करने का कौशल आदि ये सब विद्वानों के विनोद के लिये है, न कि मुक्ति के लिये ।

इल्म चंदां कि बेशतर ख्वानी; चूँ अमल दर तो नेस्त नादानी।

अर्थात्—चाहे तू विद्या बहुत पढ़ जाय, यदि अमल नहीं है, तो केवल नादानी है ।

वेदांत का सहायक ।

आत्मज्ञान के जिज्ञासु के लिये सबसे अधिक आवश्यक सतोगुण का प्राबल्य है, अर्थात् चित्त का हर समय आनंद और शांति की ज्योति से परिपूर्ण रहना । शोक, क्रोध और पक्षपात से भरा हुआ चित्त आत्म-साक्षात्कार का आनन्द कदापि कदापि नहीं उठा सकता ।

औरा ब चश्मे-पाक तवाँ दीद चूँ हलाल । हर दीदा जल्वा गाहे-आँ माह पारा नेस्त ॥

अर्थात्—उस (तत्त्व स्वरूप) को निर्मल दृष्टि से हलाल (द्वितीया के चांद) की तरह देख सकते हैं, प्रत्येक नेत्र उस तत्वरूप चांद के टुकड़े को दर्शाने वाला नहीं है; अर्थात् हर एक आँख नहीं, बल्कि निर्मल और पवित्र आँखें ही उस सत्य स्वरूप को देख सकती हैं ।

यह बिलकुल सच है कि क्रोध मोह आदि का मूलोच्छेद कभी नहीं हो सकता जब तक कि अज्ञान दूर न होले । सतीत्व, पवित्रता और सत्यता ज्ञान का परिणाम है-ज्ञान के पदचिह हैं, और यों कहना कि "शांति के आने पर ज्ञान की प्राप्ति निर्भर है" मानो घोड़े को गाड़ी के आगे जोतने के स्थान पर गाड़ी घोड़े के आगे लगाना है । फिर भी विद्यार्थी के लिये वासनाओं को जीतने और इन्द्रियों को वश में लाने का प्रयत्न व्यर्थ भी नहीं जाता । जैसे एक पेड़ के पत्ते और टहनियाँ काट देने से उस पेड़ की जड़ नहीं उखड़ती (अलबत्त वृक्ष की जड़ उखड़ जाने के बाद पत्ते आदि सूखकर झड़ जाते हैं) किंतु वृक्ष की टहनियाँ आदि छाँटकर उसे हलका कर देने में इतना अवश्य होगा कि उसकी जड़ पर आरी सहज में फिर सकेगा, मूलोच्छेद में

एक प्रकारकी सहायता मिल जायगी:वैसे ही यह आवश्यक नहीं है कि काम, क्रोध, शोक, लोभ पर शक्तिमान् होते ही अज्ञान की जड़ कट जाय । अलबत्त अज्ञान की जड़ उखड़ जाने का फल यह अवश्य होता है कि मोह और दुःख नितान्त दूर हो जाते हैं]—

नत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः । (ईशा॰)

अर्थात् - जान्यो अपना आप जब, शोक मोह भयनाश । धुंध अँधेरा नस गए, कीनो रवी प्रकाश ॥

किंतु जो व्यक्ति रजोगुण और तमोगुण (काम क्रोध) रूपी पत्तियों, टहनियों को काट झाड़ कर अज्ञान के वृत्त को हलका कर देगा, उस के लिये अज्ञान की जड़ पर महावाक्य "सर्वहोतद् ब्रह्म" (अथर्ववेद्-माडूक्य)-यह सब कुछ ब्रह्म है —का अरा चलना सहज हो जायगा ।

ना विरतो दुश्चरितान्ना शांतो ना समाहितः । नाशांतमानसो वाऽपि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ (कठोपनिषद्)

अर्थ—जैसे मैले कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता, या जैसे गीली लकड़ी को लाख यत्न करने से भी आग नहीं लगती, वैसे ही जो व्यक्ति विवेक वैराग्य, शम, दम आदि साधन- संपन्न न हो, उसको आत्मज्ञान का रंग चढ़ना कठिन है, आत्मानंद की अग्नि प्रज्वलित होना मुश्किल है ।

"None compasseth, Its joy who is not wholly ceased from sin, Who dwells not self—controlled, self—centred calm, Lord of himself! It is not gotten else. (Sir Edwin Arnold.)

अर्थ - उस शांत-चित्त महात्मा के आनन्द की सीमा कोई ऐसा मनुष्य कदापि नहीं लगा सकता जो स्वयं पाप- रहित न हो, या जो अपने आप पर अधिकार पाये हुए न हो, अपने आत्मा में विराजमान न हो, और अपने आप का स्वामी न हो । अर्थात् जो मनुष्य अशांत-चित्त, बुरे मार्ग से न हटनेवाले, बदमाश, आकुल-चित्त वाले और चंचलमन वाले हैं, वे कदापि उस अनंत आनंद को (जो मस्त और मुक्त ज्ञानवान् को प्राप्त होता है) भीतरी दृष्टि से नहीं पा सकते ।

रफ्तम् ब तबीबो-गुफ्तम अज दर्दे-निहाँ । गुफ्ता, कि ज गरे-दोस्त बर बंद जुबां ॥ गुफ्तम् कि गिजा ? गुफ्त हमीं खूने-जिगर । गुफ्तम परहेज़ ? गुफ्त अज हर दो जहां ॥

भाव—मैं एक हकीम (वैद्य) के निकट गया और भीतरी (मानसिक) पीड़ा की चिकित्सा पूछी । हकीम ने उत्तर दिया कि अपने प्यारे (स्वरूप) के अतिरिक्त जिह्ना बंद कर रख (अर्थात् अपने परम मित्र आत्मदेव की चर्चा के सिवाय और किसी प्रकार की बातचीत मत कर) । फिर मैंने पूछा कि इस चिकित्सा में पथ्य क्या ? हकीम ने उत्तर दिया कि यही अपने जिगर (यकृत) का रक्त । फिर मैंने पूछा कि इस चिकित्सा में परहेज़ (संयम) किसका ? तो उसने उत्तर दिया कि हर दो जहान (अर्थात् लोक और परलोक के भोगों की इच्छा का)

खूने-खालिस खुद खुर कि शराबे बह अज़ी नेस्त । दंदाँ ब जिगर जन कि कबाबे बेह अज़ी नेस्त ॥ दर कंज व हिदाया न तवां याफ्त खुदा रा । दर मुसहफे-दिल बीं कि किताबे बह अज़ी नेस्त ॥

अर्थात् —अपना खालिस खून पी क्योंकि इससे उत्तम कोई शराब नहीं है और अपने ही जिगर यकृत को दाँतों से काट क्योंकि इससे उत्तम कोई कबाब नहीं है ।

पवित्र पुस्तकों और उपदेशों अर्थात् वेदों और शास्त्रों में ईश्वर नहीं पाया जा सकता है, अपने शुद्ध हृदय रूपी कुरानमें उसे देख, क्योंकि इससे उत्तम पुस्तक और नहीं है ।

ऐ बुलहवम मसोज कि आँ इश्क आतिश अस्त । मा आँ समंदरेम कि आतिश हयाते-मास्त ॥

अर्थ -ऐ लालची ! तू मत जल, क्योंकि इश्क (प्रेम) आग है, लेकिन हम आग के वह कीड़े हैं कि जिनकी ज़िन्दगी ही आग पर निर्भर है ।

निम्न-लिखित अवतरण में शोपनहवर Schopenhauer ने दिखाया है कि सतोगुण की अनुपस्थिति में ज्ञान का प्रकाश होना दुस्तर है —

"When the individual is distraught by cares or pleasantry, or tortured by the violence of his wishes and desires, the genius in him is exchained and can not move. It is only when cares and desires are silent that the air is free enough for genius to live in it. It is then that the bonds of matter are cast aside and pure spirit, the pure, knowing subject, remains.

अर्थात्—जब किसी पुरुष का मन चिंताओं या हँसी- मखौल से विकीर्ण हो जाता है, या अपनी इच्छाओं और कामनाओं की ज़बर्दस्ती से सताया होता है, तब उसके भीतर की मेधा (बा चित्त वृत्ति) आसक्त हो जाती है और

नहीं कर सकती. केवल उसी समय जब कि चिंता और इच्छा शांत होती हैं (या दबी हुई होती हैं), तब वह मेधा जीने के लिये वायुमंडल में घूमने को स्वतंत्र होती है, उसी समय प्रकृति या माया के बंधन सब काट दिये जाते हैं और शुद्ध पवित्रात्मा (ज्ञाता, साक्षी) मात्र रह जाता है।

खो हुस्ने-तर्बियत गर्दंद करीं वा पाकेये गौहर। जे रब्हे-आब खेजद दुर जे मुश्ते-खाक जायद जर॥1॥ सरिश्त खाके काँ या आबे नेसां गर्चे पाक आमद। वले अज फैजे खुर्शेद अस्त काँ जर गर्दंद ईं गौहर॥2॥ बसे जहमत बुरद दहकाँ कि दर जेरे-जमीं तुख्मे। बरेजद बेखो याबद शाखो गीरद बर्गो आरद बर॥3॥ सरापा साफ शौ ता रूबरूए यार जा याबी। कि पेशे-खूबरोयाँ आइना मंजूर मी गर्दद॥4॥

अर्थ—जब तर्बियत (शिक्षा) का सौंदर्य मोती की सफ़ाई के निकट होता है तो पानी के टपकने से मोती उत्पन्न होता है और धूलि की मिट्टी से सोना उत्पन्न होता है (अर्थात् पवित्रात्मा ज्ञानी के सत्संग से जब सत्य का जिज्ञासु शिक्षा पाता है तो पूर्ण ज्ञानी का एक वाक्य भी जिज्ञासु के हृदय में मोती बन जाता है और केवल शारीरिक दर्शन से उसका हृदय सोने की भांति शुद्ध और पवित्र होजाता है)

कान की मिट्टी की (सरिश्त) खासीयत या कन्यावानी बादल [अर्थात् भाद्रपद या कार्तिक मास में बरसने वाले बादल] का पानी यद्यपि स्वच्छ होता है किंतु सूर्य के प्रसाद से वह (कान) सोना हो जाती है और यह मोती; अर्थात् यद्यपि बादल का पानी और कान की मिट्टी (सत्य के

जिज्ञासु की भांति) स्वच्छ और पवित्र होते हैं, किंतु जैसे पूर्ण ज्ञानी के सत्संग बिना सत्य का जिज्ञासु तत्त्व वस्तु को नहीं पाता, वैसे ही ये दोनों पवित्र वस्तुएँ भी बिना सूर्य के प्रसाद के सोना और मोती नहीं हो सकतीं॥2॥

किसान भूमि के भीतर बीज गिराने में यद्यपि बहुत कष्ट उठाता है, जिससे बीज जड़, शाखा, पत्ते और फल को प्राप्त करे. परंतु बिना सूर्य के प्रसाद के यह सब परिश्रम निष्फल अर्थात् व्यर्थ हो जाता है, ऐसे ही सत्य के जिज्ञासु का प्रयत्न बिना पूर्ण गुरु की सहायता के व्यर्थ और निष्प्र- योजन होता है॥3॥

शिर से पैर तक स्वच्छ बन, जिस में तू प्यारे स्वरूप के प्रकाश के सम्मुख स्थान प्राप्त करे (अर्थात् वास्तव स्वरूप का दर्शन कर सके), क्योंकि जो सुंदर हैं उनके सामने दर्पण शोभा पाता है (अर्थात् शुद्ध स्वरूप के निकट शुद्ध और पवित्र हृदय ही ठहर सकता है, अथवा सत्यस्वरूप का दर्शन निर्मल हृदय-दर्पण ही करा सकता है)।

सतोगुण का उलट (जिद) क्या है?-क्रोध और शोक। क्रोध और शोक का वास्तविक स्वरूप क्या है?-इच्छाएँ। किस प्रकार?-जैसे जब कोई नदी या नाला अत्यंत वेग से चल रहा हो और मार्ग में किसी बहुत बड़े पत्थर के साथ टक्कर खा ले तो नदी या नाले का पानी अत्यंत कोलाहल के साथ भट भाग-भाग हो जाता है, वैसे ही जब किसी हृदय में कामना का प्रवाह वेगोवेग के साथ बह रहा हो और एक दम कोई रुकावट सामने आ जाय तो वह काम- नाएँ एकाएक शोक और क्रोध में परिवर्तित हो जाती हैं। ध्यान से देखो, इच्छानुसार किसी काम का न होना ही

शोक या क्रोध लाता है। कामना ही शोक या क्रोध का मूल है। जिस पुरुष की कामनाएँ सब दूर हो गई हैं, जिसके संकल्प सब मिट गए हैं (अर्थात् जो ज्ञानवान है), उसने शोक और क्रोध की जड़ उखाड़ दी है।

आप्नोति ह्वै सर्वान्कामानादिश्च भवति य एवं वेद। (अथर्व वेद माण्डूक्योपनिषद्।)

अर्थ—जो व्यक्ति इस (रहस्य) को समझता है, वह निस्संदेह सब मनोरथों को पा लेता है और सब से प्रथम हो जाता है।

ज्ञात्वादेवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैः क्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः। (कृष्णयजुर्वेद श्वेताश्वतरोपनिषद्।)

अर्थ—जब तेजों के तेज को जान लिया, तो सब जंजीरें टूट गईं, दुःख दूर हो गए और मरने-जीने से छुट्टी मिली।

आपूर्यमाणमचल प्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशंति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशंति सर्वे स शांतिमाप्नोति न कामकामी॥ (गीता २।70।)

अर्थ—जिस महात्मा ने अपनी कामनाओं को यों समेट लिया है जैसे समुद्र नदियों को अपने बीच में प्रविष्ट कर लेता है, वही शांति (आनंद) को प्राप्त करता है। दूसरा नहीं।

क्रोध और शोक को विजय करना उसी का काम है जिस की यह दृष्टि है।

चीस्त दुनियाँ ताबे आँ आलूदा कर्दन दस्ते-ख्वेश; बर सरे-ख्वाने-सुलेमाँ कासा लेसीदन चरास्त।

अर्थ—यह संसार क्या है जिस से अपना हाथ लिप्त किया जाय? सुलेमान के दस्तरख्वान (भोजन करने के

स्थान) पर पियाला चाटना (संसारी इच्छाओं को पूरा करना) किस काम का?

वह ज्ञानी जो सारे संसार को अपना आप देखता है, प्रत्येक व्यक्ति को अपना स्वरूप समझता है, वह किससे अप्रसन्न हो? उसके लिये विद्वेष कहाँ? जब अपनी जीभ अपने दांतों में दब जाती है, तो दाँतों को निकाल डालने का किसको ख्याल आता है।

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वे भूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥ (यजुर्वेद ईशावास्योपनिषद् मंत्र 6)।

अर्थ—जो सज्जन समस्त प्राणियों को आत्मा में देखता है और सब में (सब कुछ) आत्मा को जानता है, वह फिर किस से नफ़रत करे।

अजीमतहा हमी कर्दम कि शैताँ बरतरफ गर्दद। ज यकबीनी व यकदानी हिसारे कर्दाम पदा॥

अर्थ—मैं बहुत से संकल्प करता था कि जिनसे शैतान अलग हो जाय, किंतु ऐक्य-दर्शन और अद्वैत-ज्ञान से मैंने एक व्यूह उत्पन्न कर लिया है (जिसके भीतर अब शैतान प्रविष्ट नहीं हो सकता)।

बा बुते-जिंदाँ कसे कि गइत य र। मुर्दा राँ के दर कशेद अंदर किनार॥

अर्थ—जो व्यक्ति कि जीवित प्रिया के साथ मित्र हो गया वह मृत प्रिया को भला कब पाश्र्व (बगल) में लेगा (अर्थात् कब चाहेगा)।

पर हाँ वह भला पुरुष जिसको ज्ञान का अविनाशी प्रसाद अभी प्राप्त नहीं हुआ किंतु शोक और क्रोध के दूर

करने में यत्नवान् है, उसको भी निराश नहीं होना चाहिए। उसके प्रयत्न क्रोध और शोक के विजय करने में तो सदैव असमर्थ ही रहेंगी? हाँ यह अवश्य है कि यदि प्रयत्न सच्चे हैं तो उस व्यक्ति को ज्ञान का अधिकारी बना देंगे। प्रयत्नों की शक्ति (energy) नष्ट तो हो नहीं सकती, विवेक में परि- वर्तित होती जायगी और फिर ज्ञान के आने पर शोक और क्रोध कहाँ ठहर सकते हैं? यदि न्याय दृष्टि से देखा जाय तो विदित होगा कि शोक और क्रोध के कारण स्वभाव स्वस्थ दशा से वैसे ही फिर जाता है जैसे ज्वर, चेचक या और किसी रोग के कारण से।

प्यारे जिज्ञासु! जब ज्वर या कोई स्पर्शजन्य मारी घेर लेती है तो तुम लिहाफ़ में मुँह-शिर लपेट कर कमरे के भीतर पड़े रहा करते हो, वैसे ही जब शोक और क्रोध (जो उच्च श्रेणी के स्पर्श जन्य रोग हैं) घेर लें तो आपको उचित है कि तत्काल चेहरे को ढाँक लो और किसी को मुँह न दिखाओ जब तक कि तबीयत दुरुस्त न हो ले और स्वाभाविक प्रसन्नता (जिसके बिना मनुष्य मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं) आँखों में स्पष्ट प्रकट न हो ले। प्लेग- ग्रस्त रोगी को ऐसे स्थान पर रहने का कोई अधिकार नहीं है जहाँ से उसका रोग औरों को लग सके, वैसे ही तुम्हें तनिक भी अधिकार नहीं कि तुम्हारी आध्यात्मिक बीमारी औरों को जा लगे—"को वा ज्वरः प्राणिभृतां हि चिंता"— प्राणियों के लिये ज्वर क्या है?—चिंता और शोक।

रूए कि जो दिद न कुशायद न दीदनी अस्त। हरफे कि नेस्त मग्ज़ दरो ना शुनीदनी अस्त॥

अर्थ—वह मुखड़ा कि जिसके देखने से किसी का

चित्त प्रसन्न न हो, देखने योग्य नहीं है; वह हर्फ़ (बात) कि जिसमें तात्पर्य कुछ नहीं है (अर्थात् जिसके अर्थ-प्रयो- जन कुछ न हों) सुनने के योग्य नहीं।

Do any hearts beat faster, Do any faces brighten, To hear your footsteps on the stair, To meet you, greet you, anywhere? Are any happier to-day Through words they have heard you say? Life were not worth the living If no one were the better For having met you on the way, And known the sun-shine of your stay.

अर्थ—जीने में तुम्हारे पगों का शब्द सुनकर या किसी स्थान पर तुमको मिलने और सलाम करने से किसी का चित्त आप के प्रेम में लिप्त हुआ या किसी व्यक्ति का मुख- मंडल प्रफुल्लित हुआ? तुम्हारे मुख से निकले हुए शब्दों को सुनकर कोई मनुष्य आज पहले की अपेक्षा अधिक प्रसन्न हुआ? निस्संदेह यह जीवन जीवित रहने योग्य कदापि नहीं, यदि कोई पुरुष मार्ग में तुमको मिलकर या तुम्हारे निवास का प्रसाद जान कर उत्तम न हो (अर्थात् यदि किसी को तुम से कुछ लाभ न पहुँच सके तो तुम्हारा संसार में जिना व्यर्थ और निष्प्रयोजन है)।

He needs no other rosary Whose thread of life is strung With the beads of love and thought.

अर्थ—उस व्यक्ति के लिये कोई और माला की आवश्य- कता नहीं जिसके जीवन का तार प्रेम और विचार के मनिकों से पिरोया हुआ है।

यमुना नदी के किनारे पर छाया वाले वृक्षों के बीच में अत्यंत स्वच्छ और सुथरी एक साधु की कुटिया थी, जिस में कहीं सिंह और हरिन के सुंदर चर्म बिछे थे, कहीं वृक्षों और खूँटियों पर जोगिया रंग के कपड़े लटके हुए स्थान की शोभा बढ़ा रहे थे। संयोग से एक यात्री जाति का शूद्र उसकी ओर आ निकला। कुटिया के साथ नदी पर एक उत्तम पक्का घाट देख कर उसके जी में आई कि यहाँ स्नान करें। स्नान करने के बाद शामत के मारे को यह सूझी कि अपने कपड़े भी यहीं धो लूँ। घाट पर कपड़ों को मार मार कर धोने लगा। दोपहर का समय था। साधु जी कुटिया के भीतर आराम कर रहे थे। छुआ छू के शब्द से चौंक पड़े। क्या देखते हैं कि मैले कुचैले कपड़ों की छींटों से उनके पवित्र आसन और गेरुए वस्त्र खराब हो रहे हैं और अपवित्र बूँदों से चौका बिगड़ रहा है। भटपट बाहर निकले, तो शूद्र कपड़े धोता दिखाई पड़ा। फिर जो कुछ उस गरीब पर बीती, क्या बताएँ। साधु जी ने आव न ताव, मारे क्रोध के लाल होकर ढाक की एक मज़बूत लाठी उठाई और चुपके से उस विचारे के पीछे आकर खड़े हुए। इधर वह बेखबर पत्थर पर कपड़ा मारते समय झुका, उधर उसकी पीठ पर बिजली की तरह डंडा कड़का। बिलबिला कर चिल्लाने लगा, सोंटे की एक और चोट पड़ी। बेहोश होकर गिर पड़ा। साधु जी ने लातों से गति बनानी आरंभ कर दी। फिर गालियों की बौछार से खूब ख़बर ली। जब सब तरह थक चुके तो अंत में हारकर

बैठ गए। थोड़ी देर सुस्ता कर नदी में स्नान करने लगे। इतने में उस शूद्र ने भी होश सँभाला, कुटिया से कुछ दूर नीचे हटकर वह भी नहाने के लिये यमुना में कूद पड़ा। अब तक साधु जी का क्रोध कुछ कम हो चुका था, बोले— "अरे चांडाल! गरम-गरम शरीर को पानी में क्यों डाल दिया? क्या तुझको बीमारी का भय नहीं? ऐसे अवसर पर नहाने की क्या पड़ी थी? हम समझते हैं, तुम तो पहले भी एक बेर नहा चुके हो, दुबारा नहाने की क्या आवश्य- कता थी?"

शूद्र—तुम भी तो सवेरे अवश्य स्नान कर चुके होगे, दुबारा क्यों नहाने लगे हो?

साधुजी—अरे! तू हमारी रीस करने लगा है? हम तो तुझ चांडाल से स्पर्श कर चुके, इस लिये स्नान करते हैं।

शूद्र—बस, मैं भी इसी से नहाता हूँ कि चांडालों के चांडाल के साथ छू चुका, नहाकर अपने को शुद्ध करूँगा।

साधुजी—(आँखें दिखाकर) ऐं! हमें गाली बकता है? चांडालों का चांडाल किसको कहा?

शूद्र—(हाथ जोड़ कर) नहीं महाराज, क्रोध चांडालों का चांडाल है। आप के पवित्र शरीर पर उसका आवेश हो गया था और फिर आप के हाथों और लातों की राह मुझको इस चांडाल ने छुआ। क्रोध चांडाल है। मैंने आप को कुछ नहीं कहा। क्षमा कीजिए।

यह सुन साधुजी मन में लज्जित हुए और विचार करने लगे कि कहता तो सच है। इस अवसर पर गीता का वह श्लोक स्मरण आगया जिस में लिखा है कि "जो व्यक्ति किसी प्राणी से भी शत्रुता नहीं रखता, प्रत्येक से प्रेम ही

रखता है और दीनों पर दया करता है, जिस में 'मैं मेरा' का नाश हो चुका है, जिसको सुख-दुख समान है, जिसको यदि हानि भी पहुँचाई जाय तो भी क्षमा कर देता है, ऐसा व्यक्ति मेरा प्यारा है।" यथा—

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी॥ 12—13

Who hateth naught Of all which lives, living himself benign, Compassionate, for arrogance except, Exempt from love of self, unchangeable By good or ill, patient, contented, firm In faith, mastering himself, true to his word, Seeking Me heart and soul; vowed unto Me, That man I love! who troubleth not his kind, And is not troubled by them; clear of wrath, Living too high for gladness, grief, or fear, That man I love!

श्रीकृष्ण भगवान् कहते हैं, मैं उस पुरुष से प्रेम करता हूँ (या वह व्यक्ति मुझे प्यारा है) जो समस्त प्राणियों में किसी से द्वेष नहीं करता, जो स्वयं प्रेमस्वरूप है, दयालु है, अभिमान से रहित है, स्वार्थ से रहित है, जिस में बुराई-भलाई से चलायमानता नहीं होती, जो सदैव एक रस रहता है, जो धीर और सहनशील है, संतोषी है, दृढ़ विश्वास वाला है, जो अपने को वश किये हुए है, जो अपनी वाणी व प्रतिज्ञा का पक्का है, मन और प्राण से मुझे ढूँढता है, और जो अपने जीवन को मुझ पर न्योछावर कर

चुका है, ऐसा मनुष्य मुझे निस्संदेह बहुत प्यारा है। जो मनुष्य मात्र को दुःख, क्लेश नहीं देता और न जिसे वह दुःख देते हैं, जो क्रोध से रहित है और जो प्रसन्नता, शोक या भय के प्रभाव से रहित है। (भगवद्गीता का अनुवाद अ० 12 श्लो० 13-15)

चांडाल को छूना बाहरी शरीर को बिगाड़ता है, किंतु क्रोध से छू जाना भीतर (हृदय) का सत्यानाश कर देता है और सूक्ष्म शरीर पर नित्य दाग लगा देता है। परन्तु विस्मय इस बात पर है कि जितना ही परहेज़ हम लोग इस बाह्य चांडाल से करते हैं, उससे बहुत अधिक तपाक के साथ क्रोध का अपना तन मन अर्पण करते हैं, उसे अपनी गर्दन पर सवार कर लेते हैं। गीता में लिखा है।

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। (9-4)

अर्थ—मुझ अव्यक्त मूर्ति (अर्थात् स्वरूप निराकार से) यह सब जगत् व्याप्त है (अर्थात् मैंने यह सारा जगत् घेरा हुआ है)।

इदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमो लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि, भूतानीदं सर्वं यदयमात्मा (बृहदारण्यकोपनिषद्)

अर्थ—ये ब्राह्मण, क्षत्री, समस्त लोक, देवता, वेद, समस्त प्राणी और तत्त्व, सभी कुछ एक आत्मा ही आत्मा है

महदेवानामसुरत्वमेकं (ऋग्वेद मंडल 3)

अर्थ—देवताओं की शक्ति का कारण स्थान एक ही है। अर्थात् समस्त संसार के कारोबार मुझ (ईश्वर) ही से प्रत्यक्ष हो रहे हैं।

अज़ीं मुसायबे-दौराँ मनालो-शादाँ बाश; कि तीरे-दोस्त ब पहलूए-दोस्त मी आयद।

अर्थ—इस समय की विपत्तियों से मत रो और प्रसन्न हो क्योंकि मित्र का तीर मित्र के पहलू से आता है, अर्थात् समय का दुःख ईश्वर की ओर से भलाई के लिये वितरित होता है।

और पुराणों में स्थान-स्थान पर इस प्रकार के आख्यान और वृत्तान्त आये हैं कि "अमुक राजा को पत्नी के रूप में भगवान् ने दर्शन दिए", "अमुक व्यक्ति को नारायण कुत्ते के स्वरूप में दिखाई दिया", "अमुक ब्राह्मण को (भगवान्) भेखारी के रूप में मिला" इत्यादि।

इन आख्यानों से भी यही शिक्षा मिलती है कि हमें छोटे बड़े में सर्वत्र परमात्मा ही को देखना चाहिए।

आरामो-खबाबे-खल्क़ जहाँ रा सबब तूई। जाँ शुद कनारे-दीदओ दिल तकियागाहे तो॥

अर्थ—संसार की सृष्टि की नींद और आराम का कारण केवल तू ही है, इस कारण दिल और आँख तुझ पर भरोसा करने वाले हो गए हैं।

बहरजा बिनगरम बाला ओ गर पस्त। न बीनम बर दो आलम जुज़ यके हस्त॥ मन अज़ बेगानगाँ हरगिज़ नआलम्। कि बामन हर चे कर्द आँ आइना कर्द॥

अर्थ—नीचे-ऊपर जिस जगह कि मैं देखता हूँ, दोनों संसार (लोक परलोक) के भीतर मैं केवल अद्वैत तत्त्व के और कुछ नहीं देखता हूँ। मैं दूसरों से कदापि नहीं रोता हूँ, क्योंकि मेरे साथ जो कुछ किया उस परम प्रियतम ने किया।

यदि वहीं कह है, या वेदांत की शैली के अनुसार "मैं ही मैं हूँ", तो क्रोध किस पर? रुष्टता कैसी?

फरीदा-खालिक खल्क में, खल्क वसे रब माँहि। मंदा किस नूँ आखिए, जाँ तुझ बिन कोई नाँहि॥ गुफ्तम कि गमज़ाए तो बखूनम निशान्द गुफ्त। आरा गुनाह नेस्त कि फर्मूदाएम मा॥

अर्थ—मैंने कहा कि तेरे ग़मज़े (नेत्र के कटाच्च) ने मुझे खून में बिठाया (रुधिर से लिप्त किया)। उसने उत्तर दिया कि उस (ग़मज़े) का अपराध नहीं, बरन् हमने उसको ऐसी आज्ञा दी है।

कुड़कुड़ाना—भगवत् के इस पवित्र वाक्य को आचरणतः मिथ्या करना है और नास्तिकता का दम भरना है।

हर चे अज दोस्त मी रसद नेकोस्त। वफा कुनेम मलामत कशेम व खुश बाशेम॥ कि दर तरीकते मा काफरीस्त रंजीदन।

अर्थ—जो कुछ कि प्यारे से आता है वह सदैव लाभदायक और अच्छा ही है। हम वफादारी करते हैं और लांछन सहते हैं और आनंद रहते हैं, क्योंकि हमारे मत में शोक परायण होना पाप है।

इंद्रप्रस्थ में जब राजसूय-यज्ञ हो चुका और सब अतिथि (पाहुने) बिदा हो रहे थे, पांडवों ने बड़े प्रेम से दुर्योधन को कुछ दिन और अपने पास ठहरा लिया और उसका खूब मान सत्कार किया। एक दिन मयदानव का बनाया हुआ विचित्र प्रासाद उसे दिखाने लगे। इस महल के फर्श में एक स्थान पर बहुमूल्य स्वच्छ पत्थर और शीशे इस उत्तमता से जड़े थे कि पानी बहता मालूम होता था, हिलोरे खाती हुई नदी मालूम होती थी। इस झूठमूठ के लहरें मारते हुए पानी को देख दुर्योधन धोका खागया।

उसे तरंगायित जल समझ तैर कर पार जाने के लिये कपड़े उतारने लगा। यह देख भीमसेन और द्रौपदी आदि ने ज़ोर से ठट्ठा लगाया।

प्यारे जिज्ञासु! यह संसार माया का रचा हुआ घर है। आपके चित्त की प्रसन्नता के लिये रंग-रंग के पटों से सज्जित और सँवारित है। इसमें मृगतृष्णा के जल समान धोके वाले विशेष अवसर भी हैं जिनको देख तू घबरा उठता है कि "हाय! मैं डूबा, मैं डूबा!" और मारे व्याकुलता के हाथ-पैर मारने लगता है, धीरज और थिरता की लगाम डोर हाथ से छोड़ देता है, संशय और भ्रम के वश में आ जाता है, चेहरे पर हवाइयाँ छूटने लगती हैं, मानो सचमुच बला के चक्र में फँसा है। किंतु—

बहुत शोर सुनते थे पहले में दिल का। जो चीरा तो इक कतरा-ए-खून न निकला॥

जब अज्ञान का पर्दा दूर होता है, तो पता लगता है कि कुछ बात ही न थी। पानी तो था ही नहीं, कपड़े व्यर्थ ही उतारे, बेकार ही फ़ज़ीहत सहेड़ी।

मेरे प्यारे! खूब याद रक्खो कि संसार में जितनी वस्तुएँ प्रत्यक्ष में घबरानेवाली मालूम होती हैं, वास्तव में तेरी प्रफुल्लता और आनंद के लिये प्रकृति के हाथ ने तैयार की है। उलटा डरने से क्या लाभ? तेरी ही मूर्खता तुझे चक्कर में डालती है, नहीं तो तुझे कोई नीचा दिखानेवाला नहीं। यह पक्का निश्चय रख कि संसार तेरे किसी शत्रु का बनाया हुआ नहीं है; बरन् तेरे प्यारों के प्यारे, तेरे ही आत्मदेव का साफ विकाश है। संसार का कोई पदार्थ तुझे वास्तव में दुःख नहीं दे सकता, बरन् प्रत्येक

पदार्थ तेरी चित्त प्रफुल्लता का कारण है। हृदय को प्रेम से भरो, मनको शुद्ध करो और देखो।

दिलबरे-दिलरुबाए-मन मे कुनद अज बराए-मन। नक्शो-निगारो-रंगो-बू ताज़ा बताज़ा नौ बनौ॥ संदाँ रू बूदन बिह अज गंजो-गुहर बखुशीदन अस्त। ता तवानी वर्ते बूदन अब्रे-नेसानी मबाश॥

अर्थ—मेरा दिलरुबा [प्रियात्मा] मेरे लिये नक्शो-निगार और बनाव-श्रृंगार नित नई रीतियों से नित्य-प्रति करता है॥ हँसमुख रहना मोतियों का कोष दान करने से उत्तम है, जब तक कि तू बिजली [अर्थात् हंसमुख] बन सकता है, तो भादों कुँवार का बादल मत बन।

आपत्ति—कहावत प्रसिद्ध है "सीधी लकड़ी सब कोई काट लेता है", बस तो आप यह चाहते हैं कि हम अत्यन्त सीधे हो जायँ। यदि ऐसा करें और पालिसी [पेच व कूटनीति] को बिलकुल छोड़ दें, तो हमें संसार में रहने ही कौन देगा? हमारा गुज़ारा ही क्योंकर होगा? बलवान् लोग हमें खा न जायँगे।

अति सीधे मत होइए, कछुक व्यंग मन मांहि। सीधी लकड़ी काटहैं, टेढी काटें नाहिं॥

उत्तर—हम यह पूछते हैं कि क्या यह सच है "टेढ़ी काटे नाहिं? टेढ़ी लकड़ी ज्यों की त्यों रहने दी जाती है? उसका कोई व्यवहार नहीं किया जाता है?

बिलकुल मिथ्या है। समय पर सब कट जाती हैं। क्या सीधी और क्या टेढ़ी। केवल आगे-पीछे का भेद है, कटने में सब बराबर हैं।

हाँ अगर सचमुच अंतर है तो यह है कि टेढ़ी लकड़ी काटी जाकर प्रायः जलाई जाती है, ईंधन के काम में आती है, और सीधी लकड़ी कटकर जलाई नहीं जाती, बरन रंग रोगन से सजकर अमीरों, वृद्धों, महापुरुषों, शौकीनों, सुंदरियों के पवित्र कर कमलों का दंड [डंडा] बनती हैं, या यदि मोटी और भारी भी हो तो मंदिरों, मकानों में शहतीर का काम देती है, स्तम्भ [खुतून] का पद पाती हैं, इत्यादि हर प्रकार से अपनी पहिली अवस्था की अपेक्षा उन्नति पाती और विकास-समन्वित होती है, यद्यपि टेढ़ी को अवनति और विनाश प्राप्त होता है। यही दशा शुद्ध चित्त पुरुषों की है। यदि उनको प्रत्यक्ष में कोई व्यक्ति कुल्हाड़े की भाँति काटने और हानि पहुँचाने भी आएगा तो भली भाँति स्मरण रहे कि कारणों के कारण चैतन्यदेव अंतर्यामी उनको पहली अवस्था से कटवाकर भी किसी अति उत्तम और उच्च पद तक पहुँचाएगा। वह कुल्हाड़ा रूप बलवान् शत्रु मुँह तकता ही रह जायगा और यह पवित्र हृदय और शुद्धात्मा महाशय प्रत्यक्ष में कटकर उन्नति के परम शिखर पर चढ़ जायगा।

ऐ संसारी लोगो! संसार के भमेलों और जगत् के धंधों में फँसकर इस सर्वगत सिद्धांत को मत भूल जाओ कि वास्तविक शक्ति यदि है तो केवल सत्यता, पवित्रता और ईमानदारी में है।

बा साफ दिल मजादिला बा ख्वेश दुश्मनीस्त। संगे-जनी बर आइना बर खुद हमी जनी॥

अर्थ—शुद्ध हृदय वाले मनुष्य के साथ लड़ना अपने साथ शत्रुता करना है। शीशे पर पत्थर मारना अपने ऊपर पत्थर मारना है।

शांति और स्वच्छता में केवल वे लोग भय और डर का अनुमान करते हैं जिन्होंने कभी इस बारे में अनुभव नहीं किया। प्यारो! आत्मनिष्ठ पुरुषों से पूछो, शुद्ध हृदयों से पूछो, तो विदित होगा कि उनके चित्र-विचित्र अनुभवों ने नीचे लिखी बात को प्रमाणित कर दिया है। "यदि हमारा मन ईष्र्या-द्वेष से बिलकुल रहित और शुद्ध हो, तो संसार की कोई वस्तु हमें हानि नहीं पहुँचा सकती। शांति और आनन्द से भरे हुए सच्चे महात्माओं के निकट क्रोध-मूर्ति मनुष्य भी पानी-पानी हो जाते हैं, जंगल के भेड़िए सिंह आदि उन्हें देख प्रेम-विह्वल हो जाते हैं. सांप बिच्छू आदि अपने दुष्ट-स्वभाव को भूल जाते हैं।

बरमन अज रोगन दिली बजए-जहाँ हमवार शुद। खार दर पैराहने-आतिश गुलिस्तां मी शवद॥

अर्थ—स्वच्छ हृदयता के कारण संसार का रंग-ढंग मेरे आगे ऐसा एकसाँ होगया जैसे आग की स्फुलिंग में काँटा पुष्पवाटिका हो जाता है।

यदि कोई व्यक्ति वास्तव में भलाई से भरपूर न हो और गुमान कर बैठा हो कि मैं नख-शिख अच्छा हूँ दूसरे शब्दों में, असली माल न हो बरन् मुलम्मा हो, तो उसको परीक्षा की आग से अवश्य हानि पहुँचेगी, किंतु शुद्ध सुवर्ण तो आग में और भी चमकेगा।

सिंह जब आखेट (शिकार) को निकलता है तो जंगल में खड़े होकर ज़ोर से गर्जन करता है। गर्जन सुनते ही आस-पास के गीदड़ हरिन आदि चौंक पड़ते हैं और मारे भय के घबराकर अपने आप अपने सुरक्षित स्थानों को

छोड़ इधर-उधर दौड़ने लगते हैं। ऐसी दशा में सिंह की दृष्टि बहुत सरलता से उन पर पड़ जाती है और वे शिकार हो जाते हैं। ग़रीब पशुओं के अपनी-अपनी भाड़ियों या भठों को छोड़ने का कारण यह वर्णन किया गया है कि गर्जन सुनते ही उन को भ्रम (अनुमान) हो जाता है कि "आह! हम सिंह से पकड़े गए! सिंह हमारे भठ में आ पहुंचा" और अपनी ओर से बचाव के लिये वे बाहर दौड़ जाते हैं। किंतु—

खुद ग़लत बूद आँ चि मा पिंदाइस्तेम।

अर्थ—जो कुछ कि हम ने सोचा था, वह स्वयं ग़लत था। वह बचाव का उपाय ही विनाश हो जाने का कारण बनता है। ठीक यही हाल घबरानेवाले मनुष्यों का होता है। भ्रम की बला के पंजे से बचने के लिये भाँति-भाँति के उपायों में समय पड़े खोते हैं और अपनी-अपनी सम्मति पर मोहित होते है किंतु—

अजल को जो तबीब और मर्ग को अपना दवा समझे। पड़े पत्थर समझ पर ऐसी, तुम समझे तो क्या समझे॥ ये तजबीज़ें ही विनाश के मुख में डालती हैं।— तर्के-कोशिश दामने-मंज़िल बदस्त आवुर्दन अस्त। राहे-खुद रा दूर मे साज़ी बकोशिदन चुरा॥

दूरवीनी कोर दर्द मई रा। हम-चु खुफ्ता दर सरा कोर अज सरा॥

अर्थ—प्रयत्न का त्याग करना मंज़िल का पहला प्राप्त करना है [अर्थात् मित्र-लाभ की इच्छा ही बेचैनी रखती है, जब यह इच्छा (मिलाप की कामना) दूर होती है, तब ही साक्षात्कार की प्राप्ति होती है]। तू उस प्रयत्न [या ढूँढ़ने की कामना] से अपने मार्ग को उल्टा दूर क्यों करता है।

दूर-दर्शिता मनुष्य को अंधा बना देती है, जैसे कि घर में सोया हुआ घर से अंधा (बेखबर) होता है।

The wordling seeks pleasures fattening himself like a caged fowl, But the real saint flies upto the sun like the wild crane. The fowl in the coop has food but will soon be boiled in the pot. No provisions are given to the wild crane, but the heavens and earth are his.

अर्थ—संसारी (अर्थात् संसार में मन लगाने वाला मनुष्य) संसारी प्रमोद और आनंद ढूँढ़ता है और पिंजड़े में बंद कुक्कुट की भाँति अपने आपको मोटा-ताज़ा करता रहता है, किंतु सच्चा संत-महात्मा जंगली सारस या कुलंग की भाँति सूर्य की ओर ऊंचा उड़ता है। उस पिंजड़े [खाँचे में बंद] के पक्षी को यद्यपि भोजन तो खूब मिलता रहता है, किंतु वह जल्द हांडी में उबाला जायगा। (विरुद्ध इसके) जंगली सारस को भोजन आदि तो (निस्संदेह लोगों से) नहीं मिलता, किंतु आकाश और धरती दोनों का वह मालिक है, जहाँ चाहता है, स्वतंत्रता से घूमता फिरता है।

हरचे: दर दुनिया स्त बर आज़ादगाँ आमद हराम। खातिरे-जमा अस्त दर ज़ेरे-फ़लक सामाने-मा॥

अर्थ—जो कुछ कि संसार में है, वह स्वतंत्र मनुष्यों के लिये निषिद्ध है। आकाश के नीचे हमारा सामान चित्तकी शांति है।

एक रँगीले महात्मा को गंगा के किनारे बैठा हुआ

देखा। साथ में पाँच मनुष्य और थे। अचानक गंगा की लहरों ने ठंढे-ठंढे जल से सब के कपड़े तर बतर कर दिये और पानी की थपेड़ों ने शेष सब को वहां से उठा दिया। वह लोग कपड़ों के भीग जाने और जाड़ा लगने के कारण बुड़बुड़ाने लगे। आह-ओह आरम्भ किया, किंतु वह महात्मा वैसा का वैसा अपने पत्थर पर डटा रहा। आनंद से मुस्करा रहा था और गा रहा था—'मेरी प्यारी गंगा, मेरी जान गंगा।" इत्यादि।

प्यारे पाठको! ज़रा ग़ौर तो करो जिनको आप भयानक घटनाएँ और भयंकर चोटें अनुमान किये बैठे हो, वह वास्तव में "प्यारी गंगा, तुम्हारी जान गंगा" ही की रस-भरी लहरें हैं। यदि हैं, तो तुम्हारे प्रियतम आत्मदेव ही की करतूतें हैं, परमात्मा ही की द्योतक हैं। शिकायत कैसी? सब की सब डरावनी बातें और प्राणनाशक घटनायें रूप और आकार तो विष का रखते हैं, मगर बने हुए मिसरी के हैं।—

मिसरी की तूंबी रची, रंग रूपता मांहिं; खान लग्यो जब भरम तज, सो तब कड़वी नांहिं।

स्वप्नावस्था में पुरुष वस्तुतः आप ही आप तो होता है, किंतु तमाशा यह है कि इधर तो अपने व्यष्टि रूप से अपने आपको एक फ़कीर या अमीर विद्यार्थी या मंत्री आदि देखता है, उधर अपने ही समष्टि रूप से सिंह, व्याघ्र, नगर, नदी उत्पन्न कर लेता है जिनको उस समय के काल्पनिक अपने-आप से पृथक समझता है। जागी हुई दृष्टि से देखें तो स्वप्न में यह जिसको अपना स्वीकार करता है, वह भी इसका ख्याल है, और जिनको अपने से पृथक मानकर

उनसे भय करता है, भयभीत हो जाता है, वह भी उसकी सृष्टि है; आप ही भेड़ है और आप ही भेड़िया; आप ही पैर है और आपही कांटा। ठीक यही दशा जागृत अवस्था में है

मेरे ही अपना आप जिज्ञासु! जिसको तू जागृत अवस्था समझे बैठा है, है वास्तव में वह भी स्वप्न, यद्यपि ज़रा बड़ी नाप (scale) का स्वप्न है। वास्तविक दृष्टि से व्यक्तित्व (जीव) तेरी माया का व्यष्टि रूप है, और "सारा संसार" तेरी ही माया का समष्टि रूप है। तेरी दशा निम्न-लिखित पंक्तियों के तहत् है—

बागे-जहाँ के गुल हैं, या ख़ार हैं तो हम हैं। गर यार हैं तो हम हैं, अग़यार हैं तो हम हैं॥1॥ दरियाए-माफ़त के देखा तो हम हैं साहिल। गर वार हैं तो हम हैं, वर पार हैं तो हम हैं॥2॥ वाबस्ता है हमीं से गर जब है वगर कढ़। मजबूर हैं तो हम हैं, मुख्तार हैं तो हम हैं॥3॥ मेरा ही हुस्न जग में हरचंद मौजज़न है। तिसपर भी तेरे तिश्नाए-दीदार हैं तो हम हैं॥4॥

और जब यही मामला है कि जिनसे सामना पड़े वह तेरे ही स्वरूप हैं, तेरा ही प्रकाश हैं।

फैला के दामे-उलफ़त घिरते घिराते हम हैं। गर सैद हैं तो हम हैं, सैयाद हैं तो हम हैं॥5॥ अपना ही देखते हैं हम बंदोबस्त यारा। गर दाद हैं तो हम हैं, फयाद हैं तो हम हैं॥6॥

फिर अप्रसन्न मुख और चिड़चिड़ेपन (क्रोध) से प्रयोजन

कुछ लाए न थे कि खो गए हम। थे आप ही एक सो गए हम॥ जूँ आइना जिसपे याँ नज़र की। साथ अपने दो चार हो गए हम॥

राम के पास इस समय एक तस्वीर पड़ी है। इसमें एक शिकारी तीर-कमान हाथ में लिये ताक लगाए खड़ा है। छायादार वृक्ष के नीचे हरे हरे लम्बे घास में हरी-हरी पत्तियों और पीले रंग के नरम-नरम जंगली फूलों के बीच हरिन की चमकती हुई आँख देखकर उसका निशाना कर रहा है। हाय निर्दयी! आन की आन में बिचारे हिरन को मार लेगा। ऐ अस्थिर (क्षणभंगुर) जीवन वाले मृग! मत घबरा, मत डर, परवाह न कर। जाग तो सही; तू है कौन? क्या तू हरिन है?—नहीं, हरिन तो "तुझे हरिन कहने वाले" की बुद्धि में होगा; तू तो कागज़ है, कागज़; और अपने स्वरूप (कागज़) की दृष्टि से तू ही शिकारी है, तू ही तीर है, तू ही प्राण नाशक सूफार (तीर का मुँह) है तुझे किसका भय? कैसी भीति? कहाँ का खटका? काहे का शोक?

बिगडे तब जब होय कुछ बिगडन वाली शय। अकाळ अछेद अभंग को कौन शख्स का भय॥ कौन शख्स का भय बुद्धि यह जिसने पाई। तिसके ढिग दिलगीरी नहीं कदाचित आई॥

हे महराज मनुष्य! व्याकुल होना आपके गौरव के विपरीत है। तू अपने शरीर और नाम के तल पर तो दृष्टि डाल। अपने सच्चे अपने-आपको तो जान। जिससे तू डरता है वह तू ही है। जिससे भयभीत होता है वह तू ही है। यदि वाह्य दृष्टि से तू अत्याचार किये जाने योग्य और तुच्छ है, तो अंतर्दृष्टि से तेजोमय प्रतापवान् महाराजाधिराज भी तू ही है। अपने ही तेज और प्रताप से भयभीत मत हो। अग्नि अपने ताप से स्वतः नहीं घबराया करती। सब तेरे ही प्रकाश हैं, उनसे मत डर, निधड़क हो जा।

हंता चेन्मन्यते हंतुं हतश्चेन्मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हंति न हन्यते॥ कठोपनिषद 1-2-19।

If he that slayeth thinks I slay, if he Whom he doth slay, thinks 'I am slain', then both Know not aright! That which was life in each Can not be slain, nor slay.

अर्थ—यदि हंता अनुमान करता है कि "मैं मारता हूँ", यदि हन्य यह भ्रांति करता है कि "मैं मारा गया हूँ", वे दोनों ठीक नहीं जानते, क्योंकि इन दोनों में जो वास्तविक जीवन (सत्य स्वरूप) है, वह न किसी को मारता है और न कभी मारा जा सकता है।

नैनं छिंदंति शस्त्राणि नैनं दहति पावक। न चैनं क्लेदयंत्यापो न शोषयति मारुत॥ भगवद्गीता २, 32।

I say to thee, weapons reach not the life; Flame burns it not, waters cannot o'erwhelm, Nor dry winds wither it.

अर्थ—मैं तुभसे कहता हूँ कि इस आत्मदेव (सत्यस्वरूप) को न ये शस्त्र काट सकते हैं, न उसे आग जला सकती है, न पानी भिगो सकता है, और न उसे हवा सुखा ही सकती है।

इस चित्र में हंता [शिकारी] ने जिसे हिरन समझा है वह तो स्वयं त्रिलोकीनाथ श्यामसुंदर भगवान् कृष्णचंद्र हैं। यह चमकने वाली हरिन की आँख नहीं, यह तो कृष्ण परमात्मा के चरण का पद्म है। यह हन्य [शिकार] नहीं,

यह तो प्रत्येक हृदय-कुक्कुट का हनन करने वाला हंता, अजल [मृत्यु-देवता] की खबर लेने वाला ठीक अपने आप स्वयं पीतांबर ओढ़े आराम में है। प्यारे! लोग तुझे शिकार समझते हैं तो क्या, कोई तुझे हरिन कहता है तो क्या, तुझे ब्राह्मण क्षत्रिय अमीर या फ़कीर अनुमान करते हैं तो क्या, तू तो अपने यथार्थ स्वरूप में स्वयं कृष्ण परमात्मा, दोनों लोकों का उपास्यदेव, प्रत्येक रंग में ज्योतिर्मय प्रकाशमान है।

यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति। तं देवः सर्वेऽर्पितास्तदु नात्येति कश्चन ॥ एतद्वैतत्।

अर्थ—जिस में से सूर्य उदय होता है और जिसमें अस्त होता है, जिसमें समस्त प्राणी प्रविष्ट हुए, जिससे कोई पृथक् नहीं, यह आत्मा वही है।

He is the unseen spirit which informs. All subtle essences! He flames in fire. He shines in sun and moon, Planets and stars! He bloweth with the winds, rolls with the waves, He is Prajapati, that fills the worlds!

अर्थ—वह (वस्तु) अदृश्य-आत्मा है (अर्थात् वह चर्म चक्षु से न देखा जाने वाला है), जो समस्त सूक्ष्म तत्त्वों में प्रवेश करता है (या रम रहा है); वह अग्नि के भीतर प्रज्वलित है; सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र और तारों में वह चमकता है; पवनों के साथ वह चलता है; लहरों के साथ लहराता है; वही प्रजापति का स्वरूप है, जिससे यह समस्त संसार व्याप्त है।

राम तूहीं तूहीं कृष्ण है, तूही देवन को देव।

तूही ब्रह्म शिव शक्ति तू, तूही सेवक तूही सेव ॥ तूही सेवक तूही सेव, तूही इंद्र तूही शेष। तूही होय सब रूप कियो सब में प्रवेश ॥ कहि गिरधर कविराय पुरुष तूही तूही राम। तूही लक्ष्मण तूही भरत शत्रुघ्न सीताराम ॥

खुदाई कहता है जिसको आलम, सो वह भी है इक खयाल मेरा। बदलना सूरत हजार ढब से, हर एक दम में है हाल मेरा॥ कहीं हूँ सूरज, कहीं हूँ जरा, कहीं हूँ दरिया, कहीं हूँ कतरा। वफूरे-कसरत से अपनी मुझको हुआ है मिलना मुहाल मेरा॥ तिलस्मे-इसरारे-गंजे मखफी कहूँ न सीने को अपने क्योंकर। अयाँ हुआ हाले-हर दो आलम, हुआ जो जाहिर कमाल मेरा॥ "हिजाबे-खुरशीदे-जाते-मानी" हुआ जहूरे-नमूदे-सूरत। मिटा जो दुनिया से नामे-आदिम हुआ है मुझको विसाल मेरा॥

शुनीदा-अम ब सनम खाना अज जुबाने-सनम। सनम परस्तो-सनम हम, सनम शिकन हमा ओस्त॥ ईमाने-आलम अज रुख्ने नूरानिये-वेस्त। कुफ्रे-जहाँ जे तुर्रए जुल्फे-दूताई-ओस्त॥

अर्थ—मैं ने मंदिर में मूर्ति के मुख से यह सुना है कि मूर्ति पूजक, मूर्ति और मूर्ति विध्वंसक सब वही है। उस के तेजोमय रूप के कारण संसार का ईमान [धर्म वा आस्तिकता] है और उस के जुल्फे-दोताके तुर्रे से संसार की नास्तिकता है।

पूर्व पक्षी (1)—तुम कहते हो कि मनुष्य मृतक की भांति हो जाय, "नितान्त जड़, मूक, आलसी", कोई कुछ कह दे, आगे शिर ही न हिलाए। ऐसी सदाचार-विद्या सीखने से तो संखिया खा लेना ही उत्तम है।

(2) प्रायः हमको duty (कर्तव्य) विवश करता है

कि हम अवश्य रोष (क्रोध) प्रकट करें। यदि तुम्हारा उपदेश माना जाय तो कर्तव्य (duty) के ख़याल sense को ताक़ पर रखना चाहिए और निर्लज्ज होकर दिन काटने चाहिये।

(3) डारविन (Darwin) आदि ऐसे विज्ञान के प्रसिद्ध तत्त्वज्ञों की विवेचना ने यह बात आपत्ति की सीमा से बाहर पहुँचा दी है कि सांसारिक उन्नति struggle for existence (अस्तित्व के लिये युद्ध) और survival of the fittest (योग्यतम के लिये जीवित बचना) पर निर्भर है जिसके यह अर्थ हैं कि Evolution [विकास] के लिये न केवल घोर प्रयत्न ही करना बल्कि संग्राम भी करना उचित है। लेकिन तुम्हारा कथन विज्ञान के इस तीव्र गति के भी विरुद्ध चलना चाहता है, उल्टी गंगा बहाता है।

(इस प्रश्न का उत्तर 'सुलाह कि जंग, गंगा तरंग" नामक अध्याय में विस्तार पूर्वक आयगा)

राम—(1) हम तो कहते हैं कि वेदांत संखिया ही खिलाता है, किंतु यह वह संखिया है जो पाप-रूपी कुष्ठ को दूर करदे। यह वह विष है जिसको खानेवाला शव नहीं बल्कि शिव-शंकर [नीलकंठ] बन जाता है। यह वह सुस्ती है जिसपर संसार-भर की चुस्ती न्योछावर कर दी जाय। यदि किसी को वेदांत जड़ता और आलस्य लानेवाला मालूम होता है तो इसके यह अर्थ हैं कि चेतनघन रूपी वेदांत को उसकी आंख के साथ वही संबंध है जो विश्व-प्रकाशक सूर्य को विचरनेवाले निशाचरों की आँखें के साथ हुआ करती है, अर्थात् उन पशुओं की दृष्टि के साथ कि जो अंधेरे के अभ्यासी हैं।—

वफूरे-जल्वा हम यकसर हिजाबे-जल्वा हस्त हैं जां; नकाबे-नेस्त दरिया रा मगर तूफाने-उरयानी।

अर्थ—सरासर तेज के प्रकाश की अधिकता ही यहाँ तेज का आवरण है। सिवाय तूफान की उरयानी (नंगा पान) के नदी को कोई पर्दा नहीं, अर्थात् नदी की तरंगों क उठना ही उसको ढक देता है, जैसे सूर्य का तेज दोपहर के समय सूर्य को छुपा देता है।

माना कि वेदांत के ग्रंथों में इस प्रकार के श्लोक हैं—

व्यापारे खिद्यते यस्तु निमेषोन्मेषयोरपि। तस्यालस्य धुरीणस्य सुखं नान्यस्य कस्यचित्॥ अष्टावक्रगीता 16-4

अर्थ—जिसका मन व्यापार से इतना उठा हुआ है कि उसके लिये आँख मीचने और खोलने की क्रिया भी बुरी लगती है, उस (प्रत्यक्ष में सुस्त) ज्ञानवान् को सच्चा आनंद प्राप्त है और किसी को भी नहीं।

'व्यापार से मन उठने' से प्रयोजन नीचे लिखे पद की तरह मृत्यु के नहीं है।—

बकदरे-हर सकूँ राहत बुवद विंगर तफावत रा, दवीदन, रफ्तन, उस्तादन, निशिस्तन, खुफ्तनो-मुर्दन।

अर्थ—प्रत्येक ठहराव के अनुसार आराम होता है, तू इस अंतर को देख, दौड़ना, चलना, खड़ा होना, बैठना, सोना और मरना अर्थात् इन समस्त अवस्थाओं के बीच जो थिरता प्राप्त होती है, उसके अंतर को तू देख।

जिस पुस्तक में यह उपर्युक्त श्लोक दिया गया है, उस में एक और श्लोक भी दिया है। उसमें एक और श्लोक व्यापार से उपरति का तात्पर्य स्पष्ट कर देता है। यथा—

निर्ममो निरहंकारो न किंचिदिति निश्चितः। अंतर्गलित सर्वाशः कुर्वन्नपि करोति न॥ —अष्टावक्रगीता 17-16।

अर्थ—जिस पुरुष ने मैं, मेरा, अर्थात् अहं मम-भाव को दूर कर दिया है, जिसके चित्त में यह निश्चय जम गया है कि जो कुछ देखने सुनने में आता है, केवल ख्याल ही ख्याल है। जिसके भीतर समस्त इच्छाएँ दूर और नष्ट हो चुकी हैं, वह वीर है; वह वास्तव में कुछ भी नहीं करता, चाहे प्रत्यक्ष में वह काम करता भी दिखाई दे।

मज़दूर (कुल्ली) बेचारा दिनभर बाज़ारों में पत्थर कूटता है या और किसी प्रकार की कड़ी मिहनत करता है, और मारे मिहनत के शरीर को पसीना-पसीना करके अपना बसर [गुजरान] करता है, बड़ा काम करने वाला है। ऊँचा हाकिम न सड़क पर रोड़ी कूटता है, न यात्रियों का असबाब उठाता है, न खेत में जाकर हल चलाता है, न कोई और दैवी कष्ट सहन करता है, केवल जुबान हिला छोड़ता है, यह बिलकुल निकम्मा और सुस्त है।

पाठक! जैसे यह तर्क निस्सार है, वैसे ही वेदान्त-निष्ठ ज्ञानवान् को औरों की भाँति बात-बात पर निराश और व्याकुल होते न देखकर या शरीर की दृष्टि से चुप और बेकार रहते देखकर यह कहना कि वेदांत निकम्मा और सुस्त कर देता है, सरासर निरर्थक है। ज्यों-ज्यों पद उच्च होता जाता है, स्थूल इंद्रियों से काम लेना कम होता जाता है। ऊँचा हाकिम मज़दूरों की तरह हाथ पैर नहीं हिलाता; केवल जुबान (अर्थात् सूक्ष्म इंद्रिय) हिलाता है; किंतु उसकी आज्ञाएँ सहस्रों मज़दूरों को दौड़ धूप में डाल देती

हैं। इसी प्रकार सच्चा महात्मा सत्संकल्प (मेस्मेरीजम की जान, मैग्निटिज्म के प्राण, और लाडों का लाड) जिसके "ख्याल ही" में संसार स्थिर है, सांसारिक चिन्ताओं का बोझ उठाना तो कुजा, चाहे जुबान भी न हिलाए, उपदेश भी न करे, किंतु उसका सत्संकल्प (भीतरी आशा) ही सैकड़ों, सहस्रों उच्च हाकिमों के चित्तों, जुबानों और शरीरों को दौड़ धूप में डाल देता है। अब चाहे उसे "जड़, मूक, आलसी" कहो, चाहे "चेतनघन, इनर्जी (Energy) का भंडार और शक्ति का जौहर" कहो। प्यारे पूर्वपक्षी! जाकर एक बेर अद्वैतनिष्ठ महात्मा के दर्शन तो करो, फिर देखते हैं तुम्हारे आक्षेप कहां जाते हैं? यह वह व्यक्ति है जिसके तेजोमय मस्तक पर चंद्रमा की तरह प्रकाशमान अक्षरों में यह लिखा है—"हां, इसका पूजन करो?" वही तद्ब्रह्नं (विश्व का उपास्य) है? (केनोपनिषद)।

मनअम कुनी ज इश्के-वे ऐ मुफ्ती-ए-जमां! माजूर दारमत कि तू ओ रा न दीदाई॥

अर्थ—ऐ संसार के काज़ी (न्याय चुकाने वाले), उस (परमेश्वर) के प्रेम से तू मुझको मना करता है। जा, मैं तुझको क्षमा करता हूँ, क्योंकि तू ने उस (परमात्मा) को देखा नहीं है।

दिल ढेर बुखारों के लगाता है कफा में। उड़ जाते हैं खुरशेद सा जब मुँह नजर आया॥

(2) क्या सचमुच ड्यूटी (कर्तव्य) इस बात की इच्छुक हुआ करती है कि हमारा चित्त विक्षिप्त वा दौड़ धूप में हो?

जहां तक राम का ख्याल है, कदापि नहीं। हाँ यह

प्रायः देखा गया है कि जब स्त्रियाँ या मर्द लड़ भगड़ रहे हों, और चाहे किसी पक्ष से, भगड़े वा क्रोध का कारण पूछा जाय, तो यही उत्तर मिलेगा कि "विरोधी पक्ष ने ऐसा क्यों किया"? या "वैसा क्यों न किया?" जिससे स्पष्ट पाया जाता है कि क्रोध और शोक का कारण "अपने मन से दोष का उत्पन्न हो जाना" तो बहुत कम ही होता है, हाँ यदि दूसरों की ओर कर्तव्य के पूरा करने में कोताही (कमी) हो जाय, तो झटपट क्रोध की ज्वाला भड़क उठती है। अतः कैसी हँसी की बात है कि अपना कर्तव्य तो नहीं, औरों का कर्तव्य तुनुक-मिज़ाज लोगों को शोक और चिंता के कूप में डाले।

बरौ बकारे-खुद ऐ वाइज! ईं चिह फर्यादस्तं। मरा फ़ताद दिल अज कफ, तुरा चिह उफ्तादस्त॥

अर्थ—जा, ऐ उपदेशक! अपना काम कर। यह क्या कोलाहल है? मेरा हृदय (अपने प्यारे के प्रेम में) हाथ से निकल गया है। भला तेरा इस में क्या गया है?

गर हमने दिल सनम का दिया फिर किसी को क्या? इसलाम छोड कुफ्र लिया फिर किसी को क्या? हमने तो अपना आप गिरेबाँ किया है चाक। आप ही सिया सिया न सिया फिर किसी को क्या?

"नहीं महाशय! कुछ अवसरों पर अपनी ड्यूटी भी विवश करती है कि हम भवें चढ़ाएँ, आँखें दिखाएँ और धमकी से डराएँ।" राम का इसमें यह कहना है कि "शांति से काम लेना और चित्त पर सवार रहना" क्या यह स्वयं तुम्हारा उत्तम कर्तव्य नहीं है? यदि लड़ाई (परीक्षा) के अवसर पर हथियार से काम न लिया तो उसका लाभ ही

क्या? यदि क्रोध और भड़कन उत्पन्न करने वाले समयों पर शांति को न बर्ता, तो इस श्रेष्ठ धर्म (शांति) को वर्तना ही किस अवसर पर है? आगे-पीछे तो प्रत्येक मनुष्य शांत रहता है, किंतु धर्मात्मा वही है जो हृदय को हिला देनेवाले अवसरों पर चित्त को वश में रक्खें, शोक और क्रोध को प्रवेश न पाने दे।—

जफर आदमी उसको न जानिएगा, वह हो कैसा ही साहबे-फैज़ो-जका। जिसे ऐशा में यादे-खुदा न रही, जिसे तैश में खौफे-खुदा न रहा॥

जब कोई सामाजिक, पारिवारिक, राजनैतिक, या धार्मिक कर्तव्य इस प्रकार का उपस्थित हो जाय जो आपको तंग और तीक्ष्ण होने पर विवश करता हो, तो निश्चयतः जान लो कि उसे ड्यूटी (कर्तव्य) समझना तुम्हारी भूल है। और तुम्हारे समाज, परिवार, रियासत या धर्म का वह अंश जो ऐसी ड्यूटी से संबध रखता है, अवश्य सुधार के योग्य है। [वह रस्में जो तुम्हारे कुढ़ने और शोकातुर होने का कारण होती हैं, वह रस्में तुम्हारे लिये अयुक्त हैं। उनका अनुसरण करना तुम्हारा धर्म नहीं है। सिंह बनो, और ऐसे जुए को बेखटके शिर से उतार दो। इस बात की ज़रा परवा न करो कि वर्षों से यह रीति चली आती है]।

शिक्षक (उस्ताद) लोगों का यूरप और एशिया में कई शताब्दियों तक यह ख्याल रहा कि कर्तव्य की दृष्टि से बच्चों के भीतर शिक्षा घुसेड़ने के लिये बिना रोक टोक उनकी खाल उधेड़ना आवश्यक है। "बेंत का बचाकर रखना बच्चे को बिगाड़ना है। If you spare the rod, you spoil the child," किंतु आज पूर्ण रूप से यह सिद्ध

हो चुका है कि ऐसा ख्याल बिलकुल नीच था। बच्चों को, चाहे बूढ़ों को, यदि हम लाभ पहुंचा सकते हैं, तो क्रोध से नहीं, प्रेम ही से पहुंचा सकते हैं। शिक्षा और शिक्षा की सीमा में Sacrament of the rod (कोड़ों के शासन) के स्थान पर Sacrament of love (प्रेम-शासन) लाने की तजवीजें हो रही हैं। बच्चों के लिये Kindergarten (बाल-बाटिका) कई स्थानों पर प्रचलित हो गया है और शेष स्थानों पर धीरे-धीरे चल जायगा।

इतिहास साक्षी देता है कि तरह-तरह की रस्में और रिवाज पृथ्वीतल पर जलबुद्बुद की भाँति आते रहते हैं और फिर मिट जाते हैं। एक दिन था जब कीत-दासों का रहना सर्वत्र आवश्यक समझा जाता था; अब उसको सब से बड़ी घृणित प्रथा ही नहीं वरन् पाप मानकर बंद किया गया है। इसी प्रकार सती होना, ठग्गी आदि एक समय प्रचलित थे, अब निषिद्ध हैं। अतः:—

Our little systems have their day. Have their day and pass away. All are broken lights of Thee. And Thou, O Lord, art more than they. —Tennyson.

अर्थ—हमारे छोटे-छोटे प्रबंध अपने अपने दिन गुज़ार कर (या अपना उदय-काल बिताकर) बीत जाते हैं। ये सब (ऐ सत्यस्वरूप!) तेरे ही टूटे फूटे (तेज व मंद) प्रकाश हैं और ऐ ईश्वर! तू उन सब से महान् है।

परिवर्तनशील और नाशमान सांसारिक रस्मों के वश में होकर सच्ची उन्नति को रोक देना, आत्मा को धब्बा

लगाना, अपनी शक्तियों (energies) को क्षीण करना है, असली ब्रह्मचर्य को खोना है, और मनुष्य-देह रूपी चिंतामणि से कौवे उड़ाने का काम लेना है।

पशुओं के प्रायः व्यापारियों के यहाँ यह प्रथा है कि एक बहुत मोटा और लंबा रस्सा फैलाकर उसके थोड़े-थोड़े अंतर पर छोटी-छोटी रस्सियाँ फंदों के रूप गाँठ देते हैं, और छोटी रस्सी का एक फंदा एक पशु के गले में, दूसरा दूसरे पशु के गले में डालते चले जाते हैं। इसी प्रकार इसी तरह कई पशु एक ही लंबे रस्से के साथ वश में रक्खे जाते हैं। ऋग्वेद के ऐतरेय आरण्यका में लिखा है—

तस्य वाक्तन्तुर्नामानि दामानि तइस्येदं वाचातन्त्या। नामाभिदामभिः सर्वे सितं सर्वे हीदं नामनीति॥ (2-1-6-1)

अर्थ—(प्राण के हाथ में) वाचा का लंबा रस्सा है और नाम फंदे हैं, अतः वाचा के रस्से और नाम के फंदों के साथ यह सब कुछ बाँधा हुआ है, क्योंकि सब वस्तुएँ नाम ही नाम तो हैं।

जब कोई व्यक्ति अपना नाम पुकारा जाता सुनता है, तो झटपट उधर को खींचा जाता है, मानो गले के फंदे के द्वारा घसीटा जा रहा है।

रिश्तए दर गर्दनम अंदाख्त दोस्त। मीकशद हरजा कि खातिरख्वाहे ओस्त॥

अर्थ—मेरे कंठ में मित्र ने संबंध की रस्सी डाल दी है। अब जो स्थान उसके मन-प्रिय है, मुझे वहाँ ले जाता है। एक और श्रुति में आया है—

अन्योऽसाबन्योऽहमस्मीति न स वेद। यथा पशुरेव तं स देवानाम्। (बृहृ. अ. 1 ब्रा. 4 मं० 10)

अर्थ—अब जो देवताओं की इस समझ से उपासना करता है कि वह देवता (उपास्य) और है और मैं (उपासक) और हूँ, वह बिलकुल कुछ नहीं जानता; वरन् वह (उपासक) उपास्य (देवताओं के पशु की भाँति है। उसी के अनुसार भगवान् शंकर ने लिखा है।

अन्योऽसावहमन्योऽस्मीत्युपास्ते योऽन्य देवताम्। न स वेद नरो ब्रह्म स देवानां यथा पशुः॥

अर्थ—"मैं और हूँ और यह और है" यह ख्याल करके जो और (अपने से भिन्न) देवता का उपासना करता है, वह व्यक्ति ब्रह्म को नहीं जानता है, वह देवताओं के लिये बिलकुल पशु के समान है।

जब तक मनुष्यजात बहुत छोटा होता है, स्वतंत्र रहता है, मस्त फिरता है, दूध की दो नदियाँ उसके लिये जारी हैं, स्वर्ग में नित्य निवास करता है। इधर गेहूँ का दाना खाना आरंभ किया, शरीर को ढाँकना सीखा, समझ के पेड़ का फल चक्खा, 'यह और है मैं और हूँ' की पट्टी पढ़ी; उधर झट नाम, जाति आदि का फंदा गले में पड़ा, दासता की हँसली में बंदी हुआ, पशुओं की भाँति क़ैद में फँसा, बंधन पड़ गए, और संसारी ड्यूटी गर्दन पर सवार हुई, जो ज़रा दम नहीं लेने देगी, दे चाबुक पर चाबुक जड़ती जायगी।

सन्ध्या-पूजा के लिये समय नहीं बचा, कशा करें, धंधे नहीं छोड़ते, ड्यूटी बड़ी ज़बर्दस्त है! आज नहाने के लिये टायम [समय] नहीं मिला, ड्यूटी, (कर्तव्य! दफ्तरों में पिसनहारी की तरह चक्की रगड़ते आए। घर में वही दफ्तर का काम मौजूद है, सत्संग की फुरसत

कहाँ ? ड्यूटी (फ़र्ज़) ! लड़की या लड़के का विवाह है, खर्चे पूरे करने को घर गिरवी (बंधक) रखने की चिंता रात-दिन घेरे है, (ड्यूटी)।

ऐ चाटुकारिता (खुशामद), वंचकता (फरेब), धोका और उत्कोच (रिश्वत) ! तुम ही मुझे अपनी शरण में लो और निर्धनता की अवमानता (disrespect) से बचाओ ! ड्यूटी ! धन और मान की अभिलाषा की चोटें सहता रात-दिन गेंद की तरह लड़खड़ाता चला जाता है, और इसका नाम ड्यूटी (कर्तव्य) रक्खा हुआ है।

हाय सच्ची ड्यूटी (कर्तव्य) ! आ ! तेरा नाम ले लेकर तरह-तरह की बुराइयाँ मेरे प्यारों का खून पी रही हैं।

गंगा उठो कि नींद में सदियाँ गुजर गईं। बच्चों के शिर पै टेम्ज सी नदियाँ गुजर गईं॥ क्या खौफनाक ख्वाब है पुर दर्द हाल है। नकी की रूह-ए-जान पर बदिया गुजर गईं॥

मेरे प्यारो ! यह संसारी ड्यूटी (कर्त्तव्य) तुम पर ऐसे पड़ी है जैसे सवेरे के समय बच्चों पर गरम लिहाफ़। पहले तो गरम लिहाफ़ बच्चों की आँख खुलने नहीं देता; अगर वे जाग भी पड़ें, तो बोझल होने के कारण उनको उठने नहीं देता और उनकी आवाज़ को भी बंद (muffled) कर रखता है, मां के कान तक पहुँचने से रोकता है। प्यारे ! यह मीठी नींद कड़वे स्वप्ने ला रही है। लिहाफ़ को अगर अपने आप उठा नहीं सकते, तो ज़ोर से चिल्लाओ, किसी न किसी तरह से अपना रुदन जगदंबा (उमा) व्रह्मविद्या तक पहुँचाओ। तुम्हारी प्यारी माँ श्रुति भगवती)

उठाकर तुम्हें छाती से लगायगी और अमृत-रूपी शक्तिदाता दूध (ज्ञान) पिलायगी।

उस देश के निवासियो ! जहाँ की कन्याएँ (सावित्री) अपनी पवित्रता की शक्ति से यमराज के चंगुल से पुरुष को छुड़ाकर लाती थीं और जहाँ के लड़के नचिकेता साक्षात् मृत्यु के मुख से अमृत निकालकर लाते थे, प्यारे भारत निवासी ! ज़रा गौर करके बता कि तू अपने को अमर (मृत्यु पर विजयी) पाता है कि मर जानेवाला ? तेरे भीतर आनंद ही आनंद हर समय प्रकाश रहता है कि शोक और क्रोध का अंधकार छाया रहता है ? तेरे भीतर अनंत शक्ति नज़र आती है कि सड़ती हुई दुर्बलता की दुर्गंध आती है ? यदि तू नाशवान्, दुखिया और कमज़ोर है, तो यह पाप का फल है कि तू ब्रह्महत्या कर रहा है, बुद्धि (सोच विचार) रूपी गौ को सांसारिक इच्छाओं [कसाइयों] के हाथ बेच रहा है, अचिरस्थायी इच्छाओं की दासता को ड्यूटी (कर्तव्य) मानकर रक्त-मांस के बंदीगृहों में टोकरी ढो रहा है।

ड्यूटी के शाब्दिक अर्थ क्या हैं ?—"जो हमें करना चाहिए, कर्त्तव्य"। क्या अमुक व्यक्ति जो कहता है वह बनाना चाहिए ? या अमुक शैली या प्रथा जो आज्ञा दे वह पूरा करना चाहिए ? अंततः क्या करना चाहिए ? यदि धन की चाह है तो नौकरी करना चाहिए; यदि लोगों की हवाई वाह वाह की कामना है तो विवाह और मृत्यु के अवसर पर कर्ज लेना चाहिए; अगर शारीरिक सुबिधा की चाह है तो स्त्री पुत्र की अधीनता चाहिए। मेरे प्राणप्रिय ! "चाहिए"

का पालन (जुआ) पीठ पर तब तक पड़ सकता है, जब तक टट्टू बनानेवाली चाह भीतर रहती है। इस चाह को मिटाना चाहिए।

सब का दुनिया को हवस ख्वार किये फिरती है। कौन फिरता है यह मुर्दार लिए फिरती है॥ चाह चमारी चूड़ी, अति नीचन की नीच। तू तो पूर्ण ब्रह्म है, जे चाह न होवे बीच॥

समस्त बाहरी कर्तव्य तेरी ही चाह पर ठहरे हुए हैं। यह चाह वह पुंश्चली महिला (फाहिशा) है कि नर देह को अपना भोगांग बनाकर कभी कहीं कुकर्म कराती है, कभी कहीं। यह चाह ही बोझों के कूप में गिराती है।

ऐ प्यारे ! यदि तेरी कोई ड्यूटी है, यदि तुझको कुछ करना चाहिए तो वह यह है कि इस "चाहिए" से पीछा छुड़ा इस चाह के धब्बे को मिटा, तुझे कुछ नहीं चाहिए। तेरी कसम, तू तो नित्य तृप्त है। भ्रांति में पड़कर दीन और दरिद्र क्यों बन रहा है ? यदि तेरा कोई कर्तव्य है तो यह है कि अपने दबे हुए कोष को निकाल और अपनी शाहंशाही को सँभाल। शेष सब कर्तव्य तेरे माने हुए कर्तव्य हैं।

चाह घटी, चिंता गई, मनवा बे परवाह। जिनको कछू न चाहिए, सो शाहनपति शाह॥

संसार की आँख में चाहे राजा या सितारे-हिंद कहावो, किंतु जब तक इच्छाओं के मैले कुचैले फटे-पुराने कपड़े तुम्हारे नहीं उतरे, और चिंताओं के सूखे टुकड़े तुम्हारे पेट में पेचिश डाल रहे हैं; जब तक तुमने स्वराज्य (आत्मराज्य) को नहीं सँभाला, और कामनाओं के दास बने हुए हो; तब

तक तुम प्रतिष्ठासंपन्न काहे के ? कामनाओं को छोड़ने से यह अभिप्राय नहीं है कि मुर्दे की भाँति निश्चेष्ट और गतिशून्य हो जाओ; वरन् इसके यह अर्थ है कि विश्व-वाटिका में एक सामान्य मज़दूर बन कर जीवन किरकिरा करने के स्थान पर अपने सच्चे प्रताप और गौरव के साथ सैर करो। इस प्रकार जो काम तुम्हारे शरीर से हो जायगा, आनंद से भरा हुआ (Graceful) होगा। सुलतान भौं [पलक] के संकेत से कुछ का कुछ कर सकता है, पर भय-भीत दीन दास से तो क्या बन पड़ता है।

संसार के और सब विषय तुम्हारे ऐच्छिक (Optional) हैं, यदि कोई अनिवार्य (Compulsary) विषय है तो सब इच्छाओं को मिटाने वाली ब्रह्म-विद्या का प्राप्त करना है। अय त्रिगुणानंदित (Thrice blessed) ! तेरी ही लिये वेद ने लिखा है।

पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि। (ऋग्वेद मं॰ 10 सूक्त 90)

अर्थ—"तीन भाग इसके आनन्दमय अविनाशी स्वर्ग में हैं और केवल एक भाग संसार में"। फिर संसार की चिंता में क्यों पच रहा है ?—

I searched through strange pathways and winding For truths that should lead me to God; But further away seemed the finding With every new by-road I trod. I searched after wisdom and knowledge— They fled me, the fiercer I sought; For teachers, text books and College

Gave only confusion of the thought. I sat while the silence was speeking, And chanced to look into my soul; I found there all things I was seeking— My spirit encompassed the whole.

अर्थ—मैंने विचित्र और पेचीले मार्गों से उन तत्वों की खोज की जो मुझे ईश्वर तक पहुँचा सकें, किन्तु प्रत्येक नई सड़क से जिस पर कि मैं चला तत्व को दूर ही पाया। फिर मैंने बुद्धिमता और विद्या की खोज की, परन्तु जितनी ही अधिक खोज की उतने ही वे मुझसे दूर भागे, और गुरुओं, किताबों और विद्यालयों ने मेरे विचारों को उल्टा गड़बड़ कर दिया। मैं (थककर) बैठ गया इस तरह से जब निस्तब्धता की दशा विद्यमान थी और संयोगतः अपने भीतर ध्यान किया, तो इस अंतर्दृष्टि से मुझे वह सब कुछ मिल गया जिसकी मैं खोज में था और मेरी आत्मा ने सब को व्याप्त कर लिया।

यल्लाभान्नापरो लाभः यत्सुखान्नापरं सुखं; यज्ज्ञानान्नापरं ज्ञानं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् । (उपनिषद)

तात्पर्य—एक ब्रह्म से बढ़कर कोई वस्तु प्राप्त करने के योग्य नहीं है, और सिवाय इसके कोई वस्तु आनंद देने योग्य नहीं है, कोई वस्तु जानने योग्य नहीं, क्योंकि जो ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्म ही होता है।

मुंडकोपनिषद के आरंभ में है:—

ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता। स ब्रह्मविद्यां सर्व विद्यां प्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ 1 ॥

अर्थ—ब्रह्मा देवताओं में सब से प्रथम था। संसार को

उत्पन्न करने वाला और लोक को बचाने वाला। इसने अपने सब से बड़े पुत्र अथर्व को ब्रह्म विद्या दी जिस विद्या पर समस्त लोक स्थिर हैं।

राजाओं के यहाँ यह परिपाटी चली आई है कि सब से बड़े पुत्र को राज-तिलक देते हैं, भूमि देते हैं, धन और रत्नादि देते हैं। ब्रह्मा को अथर्व ऋषि को पौत्रिक स्वत्व देने में क्या सूभी ? इससे मालूम होता है कि ब्रह्मा दरिद्र होगा। हाय ! ब्रह्मा को तो समस्त पृथ्वी का रचनहार और स्वामी लिखा है, इंद्र आदि समस्त देवतों से वृद्धतम बतलाया है। वह दरिद्र किस प्रकार था ? न तो ब्रह्मा निर्धन ही था और न ब्रह्मा को किसी का भय ही था और न ब्रह्मा अनजान ही था। जिसने समस्त प्राणियों को उत्पन्न किया, वह प्रत्येक वस्तु के गुण और मूल्य से अवश्य जानकार था, प्रत्येक वस्तु के तत्व से अवश्य परिचित था। उसने समझ बूझ कर समस्त वस्तुओं में सब से अधिक मूल्यवान् अर्थात् अमूल्य रत्न अपने हृदय-खंड को दिया। नहीं-नहीं, उसने अपनी समस्त संपत्ति (स्थावर जंगम) की कुंजी या कागज (ब्रह्मविद्या) अपने सच्चे उत्तराधिकारी को सौंप कर उसे अपना मुकुट-सिंहासन सौंपा। उसे अपनी पदवी देकर इंद्र आदि अधीन महाराजों का शासक बनाया।

तां यो वेद। स वेद ब्रह्म। सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहंति। (कृष्ण यजुर्वेद)

अर्थ—जो कोई उनको जानता है, सब देवता उस व्यक्ति को बलि देते हैं।

ये वसिष्ठ, अत्रेय, भग्राज जैसे ऋषियों से अपना

गोत्र मिलाने वालो ! ऐ राम, कृष्ण, बुद्ध और शंकर के देश में रहने वालो ! तुम कल के नातजुर्बेकार बच्चों का अनुकरण करते हो जिन्होंने आत्मिक उन्नति का अभी मुँह नहीं देखा ! उतारो पैरों से बूट और सर से टोपी, और बीच बज़ार ईंधन का गट्ठा उठाकर, आँसुओं की ओस से भरी हुई आँखों के दो कमल भेंट लो, और किसी वेदवित् पूर्ण ज्ञानी के चरणों में डंड की भांति जा गिरो। केवल इसी में तुम्हारा कल्याण है; केवल इसी भांति तुम्हारा जाड़ा (पाला) उतरेगा; केवल इसी तरह तुम्हारे दुःखों की रात कटेगी; केवल इसी तरह तुम्हारी धुँध दूर होगी; केवल इसी तरह तुम्हारे पाप जलेंगे; केवल इसी में तुम्हारी प्रतिष्ठा (सम्मान) और गौरव है।

आफ़ताब अज़ औजे-इज़्ज़त रुख़ निहद बर ख़ाके-पाश। हर कि बर रूयश नशीनद गिर्द अज़ दर्गाहे-मा ॥

अर्थ—सूर्य प्रतिष्ठा (सम्मान) की उच्चता पर होते हुए भी उस पूर्ण ज्ञानी के चरणों पर अपना मस्तक रखता है, अर्थात् सब का शिरोमणि होने पर भी सूर्य उस पूर्ण ज्ञानी के चरण चूमता है। और जो तुच्छ होते हुए उस ज्ञानी के समक्ष [अभिमान से] बैठता है, उससे कहो कि हमारे आश्रम से वापिस लौट जाय, अर्थात् जो पूर्ण ज्ञानी के समक्ष तुच्छ होकर दीनता पूर्वक नहीं झुकता, वह ईश्वर के पवित्र देश में स्थान पाने योग्य नहीं।

चोले जिन्हाँ दे रतड़े कंत तिन्हाँ न दे पास। धूक तिन्हाँ दी जे मिळे नानक दी अरदास॥

यह भी सच है कि कभी-कभी वेदांत जब किसी जिगर में घर कर बैठता है, तो संसार के काम का नहीं छोड़ता,

अर्थ—जिन लोगों का स्थान तेरे प्रेम तले है (अर्थात् जो तेरी छत्रछाया में हैं), वे अपने मन में हुमा नामक पक्षी के परों का अर्थात् (उत्तम पशुओं की छाया का) ख्याल कब करते हैं। प्रियतम के तेज और ज्योति की सुंदरता के इच्छुक लोग दोनों लोकों के स्वामित्व से भी कब मन को शांति दे सकते हैं। उसकी प्रीति (भक्ति) में जंगल के नापनेवाले पागल (अर्थात् जंगल में फिरनेवाले प्रेमी लोग) सातों स्वर्गों को आँख की एक झपक से पददलित कर देते हैं।

ब गदाईये-दरत शाहिये आलम चिं कुनम। ताज बख्शाने-जहाँ नंद गदायाने-चंद ॥

अर्थ—तेरे द्वार की भिच्चुकता (फकीरी) पर संसार के राज्य को मैं क्या करूँ, क्योंकि संसार को मुकुट दान करनेवाले ऐसे (तेरे द्वार के) भिचुक हैं।

बर दरे-मैकदह रिंदाने-कलंदर बाशंद। कि सतानंदो-दिहंद अफसरे-शाहंशाही ॥

अर्थ—पानगृह (शराब खाना) के द्वार पर कलंदर रिंद होते हैं (अर्थात् सच्चे प्रेम का आनंद लेने वाले परमहंस मस्त साधु होते हैं), जो कि साम्राज्य (मुकुट और सिंहासन) का लेन देन करते हैं।

यस्त्वात्मरतिरेवस्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ भगवद्गीता 3-17

अर्थ—जिनका आत्मा ही से प्रेम है, आत्मा ही से जिनकी तृष्णा दूर होती है, आत्मा ही में जिनको संतोष है, उनके लिये कहाँ का काम और कैसे धंधे ?

जिस नीती इश्क़ नमाज़, वह क़ीह पढ़े पढ़ावेगा।

"अर्थात् प्रेम ही जिस की सन्ध्या है, वह क्या पढ़े और पढ़ावेगा।"

हर कि सायब शवद अज बाद-ए-इरफाँ सर मस्त। हमचू खुरशेद दरीं, दायरा तनहा गर्दद ॥

अर्थ—ऐ महाशय ! जो कोई ज्ञान के मद से उन्मत्त हो जाता है, वह सूर्य की तरह इस परिधि [वृत] में अकेला मस्त हुआ फिरता है।

इक मन था सँग गया श्याम के, कौन भजे जगदीश। ऊधो जी मन न भये दस बीस॥

बहरेस्त बहरे-इश्क कि पेचिश किनारा नेस्त। इंजा जुज़ ईं कि सर बसपारन्द चारा नेस्त ॥

अर्थ—प्रेम का समुद्र ऐसा है कि उसका कोई किनारा (सीमा) नहीं, यहां (प्रेम के स्थान पर) सिवाय इसके कि शिर दे दें और कोई उपाय नहीं।

गर तबीबे-रा रसद जीं सां जुनूँ। दफ्तरे-तिब रा फरोशोयद ब खूँ ॥

अर्थ—यदि वैद्य की इस सच्चे पागलपन तक पहुँच हो जाय, तो वह वैद्यक के कार्यालय को रक्त से धो दे।

रह रह वे इश्का मारयाई। कहो किसनूँ पार उतारयाई॥

वेदांत नवयुवकों के श्वेत वस्त्र उतार कर लाल कफनी पहनाता है, उनकी स्त्रियों की आँखों के सुरमे को गरम २ आँसुओं में बहाता है, उनके बूढ़े माता-पिताओं को आठ-आठ आँसू रुलाता है।

नी सईयों ! मैं कतदी कतदी छुटी। पड़ी पच्छी पिछवाड़े रह गई, हत्थ मेरियों तंद टुटी॥ सयाँ वराहियाँ पिच्छों छळडी लाही, काग मरेंदा फुटी।

साळू सळारी सड गच्चु सारे बांही रही न जुटी॥ भला होया मेरा चरखा टुटड़ा, जिंद अजाबों छुटी। गहने गवाए, हुई बे फिकरी, नक्कों कन्नों बुटी॥

किंतु ऐ क्षणिक सुख वाले पोलो के गेंद ! सत्य स्वरूप सूर्य के आकर्षण की दशा तुझे क्या मालूम। यहाँ बुरे-भले का विधान मत कर।

ऐ तुरा ख़ारे-बपा नशकस्ता कै दानां कि चीस्त ? हाले-शेराने कि शमशीरे-बला बर सर खुरंद।

अर्थ—ऐ प्यारे ! जब तेरे पग में एक काँटा नहीं टूटा है (नहीं चुभा है), तो तू उन नरसिंहों की अवस्था, जो विपत्तियों की कृपाएं अपने शिर पर खाते हैं, कब जान सकता है कि क्या है ?

तरसम कि सर्फ़ए-न बुरद रोज़े-बाज़ पुर्स। नाने-हलाले-शेख़ जे आबे-हरामे-मा ॥

अर्थ—मैं डरता हूँ कि प्रलय के दिन शेख की हलाल (विहित) रोटी हमारे हराम (निषिद्ध) जल (मध) से आगे न बढ़ जाय।

(कविवर हाफ़िज़ की इस शेर का तात्पर्य यह है कि धर्म शास्त्र के अनुकूल आचरण करने वाले कर्म काण्डी लोग सच्चे पुरुषों अर्थात् सच्चे प्रेमियों से कहीं आगे न बढ़ जायँ)।

उनको कौन बुरा कह सकता है जिनके लिये—

सूझे नहीं दिन-रात तेरे ध्यान में प्यारे। अपनी नो सहर है यही और शाम यही है॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव॥ त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव। त्वमेव सर्वं मम देव देव॥

अर्थ—हे ईश्वर ! आप ही मेरे माता, पिता, संबंधी

और मित्र हो; और हे देवों के देव ! आप ही विद्या, धन और मेरे सब कुछ हो।

किश्वरे-दिल बतो दादम कि तूई-हाकिमे-ओ। हाकिमे-जुज़ तो अगर दरीं किश्वर हस्त बिगो॥

अर्थ—हृदय आकाश मैंने तुझको सौंप दिया, क्योंकि तू ही उसका शासक है, इस में तेरे सिवा यदि कोई और शासक हो, तो बतला।

क्या उन पर कर्तव्य-पालन में कमी का लांछन लग सकता है कि जो संसार की ओर से एक प्रकार "ऐ ज्वानी की मृत्यु, वाह वा तुझे स्वागत हो" कहते हुए युवा-मृत्यु का शरबत पी गए। वह स्त्री और माता-पिता अपने भाग्य (बख्तो रोज़गार) से और क्या चाहते हैं जिनका प्यारा ज्ञान अग्नि में स्वाहा हो गया।

यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनंते स्वर्गे लोके। ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति। (उपनिषद)

अर्थ—जिसने ब्रह्म को पूरा पूरा जान लिया उसके समस्त लांछन और पाप झड़ गए; वह अनंत आनंदघन और परम स्वरूप में जमकर बैठता है, जमकर बैठता है।

स्वाहद चो दर पाए-रेज़ी जरश। चे शमशीरे-हिंदी नहीं बर सिरश ॥ उमेदो-हिरासश न बाशद ज कस। बर्ईनस्त बुनियादे-ताहीदो-बस ॥

अर्थ—पूर्ण ज्ञानी के पैरों में चाहे तू सोना गिरादे और चाहे हिंदी तलवार तू उसके शिर पर रख दे. उसके निकट दोनों समान हैं। उसको किसी से आशा और भय नहीं है। अद्वैत की नींव केवल इसी पर अंत करती है।

वेदांत यदि किसी को ड्यूटी ( कर्तव्य ) की ओर से लापरवाह करता है तो अहोभाग्य, और क्या चाहिए ? प्रियतम स्वतः आकर मारे प्रेम के यदि स्त्री के कपड़े उतारता है, तो भाग्य उदय हुआ. सोये हुए भाग्य जग पड़ें, जन्म लिया ही और किस लिये था ? वह आँखें जो प्रियतम के स्वरूप की ज्योति पर पतंग नहीं बनीं, कव्वे [ काग ] उड़नेवाली खुबानी का गोला क्यों न हुईं ? वह कान जो प्रियतम की चर्चा में नहीं लगे, ढाक के दोना क्यों न बने ?

सो संगत जल जाय कथा नाहिं राम की । बिन लाडे के ब्रात भला किस काम की ॥

वह आँख कि वे नम हो, वह हो कोर तो बेहतर । वह दिल कि है बेदर्दै वह जल जाय तो अच्छा ॥

जिस इश्क पर सिर न दिया, जुग जुग जिया तो क्या हुआ । जिस प्रेम-रस चाख्या नहीं, अमृत पिया तो क्या हुआ ॥

भारत की हितैषता का दम भरने वालो ! देश का भार नहीं उतरेगा जब तक अपने नेत्रों की ज्योति तथा हृदय के खंडरूप नवयुवकों का ज्ञान ज्ञानाग्नि ( के कुंड में नरमेध [ मनुष्य-यज्ञ ] न देखोगे ।

तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा । स मा भग प्रविश स्वाहा । तस्मिन् सहस्र शाखे । निभगाऽहं त्वयि सृजे स्वाहा ॥

अर्थ—हे भोम् ! मुझे अपने स्वरूप में लयता दे—स्वाहा । तू मेरे भीतर घर कर ले—स्वाहा ।

तेरी माया में सहस्रों उलझन हैं, मैं तेरे स्वरूप में स्नान करता हूँ—स्वाहा

वेदांत के यहां तो यह बात है नहीं, कि संसार मेरा बना रहे, मैं बराबर गुलछर्रे उड़ाता जाऊँ और जब कभी गड़बड़ी

हो तो प्रार्थनाएँ (Prayers) करके ईश्वर से झाड़ने बुहारने या कमरे सजाने का काम ले लूँ । वेदांत का ईश्वर तो बड़ा विशाल मेधावाला ईश्वर है, दास या सेवक का काम भी नहीं करने का । तुम्हारी इच्छाओं को पूरा करने के लिये दलाल नहीं बनने का । यहां तो जब तक समस्त इच्छाएँ उठ न जायं, महाराज दर्शन नहीं देने के, या यों कहो कि जब ईश्वर की पहचान हुई, इच्छाओं की एकदम सफ़ाई होगई ।

हर जा कि सुल्ताँ खेमा जद, गौगा नमानद आम रा । अर्थ—जिस जगह बादशाह खेमा लगाता है, लोगों का कोलाहल नहीं रहता ।

सत्यस्वरूप सूर्य के आगे संसार तो कण के समान भी नहीं रह सकता । वेदांत का विस्तार ज़रा सी भूमि नहीं है, अद्वैत का क्षेत्रफल शारीरिक कामनाओं तक परिमित नहीं ।

हम खुदा ख्वाहा व हम दुनियाये-दूँ । इं खयाल अस्तो-मुहाल अस्तो-जनूँ ॥

अर्थ—यदि तू ईश्वर और तुच्छ संसार दोनों को एक साथ चाहता है, तो यह तेरी भ्रांति है और पागलपन है ।

एवात्मैवाऽधस्तादात्मा परिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदं सर्वामेति स वा एष एवं पश्यन्नेव एवं विजानन्नात्मरतिरात्म क्रोड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराट् भवति । —सामवेद छांदोग्योपनिषद् ।

अर्थ—निःसन्देह आत्मा ही नीचे है आत्मा ही ऊपर है, आत्मा ही पीछे है, आत्मा ही आगे है, आत्मा ही दक्षिण में है, आत्मा ही उत्तर में है, आत्मा ही यह सब कुछ है । वह जो यही देखता

है, यही जानता है, यही सोचता है, उसका प्यार है तो आत्मा से, उसका खेल है तो आत्मा से, उसका घुट कर मिलना ( हम वगल होना ) है तो आत्मा से, उसकी प्राण-विश्रांति है तो आत्मा से, वही उस तेज स्वरूप को पाता है ।

बैठत रामहि, उठत रामहि, बोलत रामहि, राम रह्यो है । खावत रामहि, पीवत रामहि, धामहि रामहि, राम रह्यो है ॥

जागत रामहि, सोवत रामहि, जोवत रामहि, राम लह्यो है । देतहु रामहि, लेतहु रामहि, सुंदर रामहि राम रह्यो है ॥

करें हम किसकी पूजा और लगाऐं किसको चंदन हम । सनम हम, दैर हम, बुतखाना हम, बुत हम, ब्राह्मण हम ॥

गाह अज जुल्फत परेशानम्, गाह अज रूए-तो हैरानम् । हमीं कुफ़रस्तो-ईमानम्-हमीं छैलो निहारे-मन ॥

अर्थ—कभी मैं तेरी जुल्फ़ माया से व्याकुल होता हूँ, कभी तेरा [ स्वरूप ] देखकर आश्चर्य होता हूँ. यही मेरा कुफ़र और ईमान है, और यहा मेरी रात और दिन है ।

तेरा जन राम रसायन माता । प्रेम रसायन जाको उपज्यो, छोड़ न कितहूँ जाता । उठत हर हर, बैठत हर हर, हर हर भोजन खाता ॥

अठ सठ तीरथ मज्जन कीने, साधू धूरी नहाता । सफल जन्म हरजन का उपज्यो, जिन कीनो सौत बिधाता ॥

तुरा गोयम, तुरा जोयम, तुरा दानम, तुरा ख्वानम । अर्थ—तुझको कहता हूँ तुझको ढूँढता हूँ, तुझको जानता हूँ और तुझही को पढ़ता हूँ ।

पुस्संद दोस्ताँ कि कुजा मेरवी ? बगो । मुश्ताक रा चेः पुरसी बरे-यार मे रवम ॥

अर्थ—मित्र पूछते हैं कि तू कहाँ जाता है, कहो ? मैं उत्तर देता हूँ कि प्रेमात्मा [जिज्ञासु] से पूछते हो, हम मित्र ( आत्मस्वरूप ) के पास जाते हैं ।

यार गुफा कस्ती ? गुफ्तम सनागोए-गुमा । अज मे-कुजा दारी, बिगो ? गुफ्तम सरे-कूए-गुमा ।

अर्थ—यार ने पूछा कि तू कौन है, मैंने उत्तर दिया कि आपका प्रशंसक ( स्तुति कर्ता ) । फिर पूछा कि तू कहां का संकल्प रखता है, मैंने उत्तर दिया कि आपकी गली के द्वार का ।

सबाहे-ईद कि मर्दुम बकारो-बार खंद । बलाकशाने-मुहब्बत ब कूए-यार खंद ॥

अर्थ—ईद के सवेरे जबकि और मनुष्य कार-धंधे में लगते हैं, तो प्रेम की पीड़ा सहने वाले अपने प्यारे की गली में जाते हैं ।

अपनी तो सहर है यही और शाम यही है ।

महादेव ने वामदेव को कहा है—

अंतर्योगं बहिर्योगं यो विजानाति तत्वतः । त्वया मयाऽप्यसौ वंद्यः शेषैर्वंद्यस्तु किं पुनः ॥

अर्थ—जिसने भीतर-बाहर एक आत्मदेव को जाना, वह तो इस योग्य है कि मैं ( शिव ) और तू ( वामदेव ) भी उस को बंदना करें, औरों का उपास्यदेव होने में तो सन्देह ही क्या रहा ?

अवतारों के विषय में पुराणों में कहा है कि जिन्होंने भगवान् से शत्रुता प्रकट की, झगड़ा और संग्राम को बर्ता, उनका बहुत शीघ्र कल्याण हुआ, उनको महाराज ने बहुत शीघ्र मुक्ति प्रदान की ।

अय प्यारो ! वह नारायण रूप महात्मा भगवान का अवतार ही हैं जो अपने अस्तित्व से शत्रुता, डाह, ईर्षा-द्वेष रखनेवालों का मन-प्राण से भला चाहता है ; उनकी

सेवा में अपना प्यारा से प्यारा धन उपस्थित करने को प्रस्तुत रहता है । जिसके राम रोम से प्रेम टपक रहा है, जिसकी आँखों से आनंद बरस रहा है, जिसके मस्तक पर शांतिका चाँद चमक रहा है, ऐसे महापुरुष की ओर से वेदांत पहाड़ जितने क्रोध और आंधी की सी शत्रुता को चैलेंज करता है । उसके दर्शनों ही से क्रोध का पहाड़ और शोक की अंधेरी का नाम शेष रह जाय तो सही, पता मिल जाय तो कहना । —

आशिकाने-आफ़ताब अज दिलबरे-मा गाफ़िलंद । अय नसीहत-गो, खुदारा रौ बबीनों-रौ बबीं ॥

अर्थ—सूर्योपासक हमारे प्यारे ( सच्चे मित्र ) से अचेत (बे खबर) हैं, ऐ उपदेश करने वाले ! ईश्वर के लिये जा और देख, जा और देख ।

ब्रह्मविद्या वह जादू मंत्र है कि काली रंगत, ठिंगने कद और टेढ़ी टाँग में इस आश्चर्य का रूप-लावण्य भर देती है जिससे संसार भरके ऊंचे कद वाले अत्यन्द सुन्दर स्वरूप हज़ार-हज़ार बर्ष तक बाँसुरी पर साँपों की तरह खिंचे हुए जान दे देने को एक गड़रिए (Divine Shephered) के देश में दौड़े जाते हैं । हाय गड़रिया ।

ता दीदा बख्वाब दीदा रूयत । पैवस्ता दर आर्जूए ख्वाब अस्त ॥

अर्थ—जब से आँखने तेरा रूप स्वप्न में देखा है, वह सदैव उस स्वप्न की लालसा में हैं ।

सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरित वेणुना सुष्ठुचुंवितम् । इतर राग विस्मारणं नृणा वितर वीरणः तेघरामृतम् ॥

अर्थ—आनंद और प्रसन्नता का बढ़ाने वाला, शोक को

दूर करने वाला, धीमी स्वर वाली बाँसुरी से सुशोभित और अन्य सांसारिक भोगों को भुला देनेवाला (प्यारे श्रीकृष्ण का) ज्ञानोपदेश रूपी अमृत सत्य के जिज्ञासुओं को मुक्ति रूपी दान देने की शक्ति रखता है ।

हाय गोलचंद ! मेरे लाल ! तू गोबर मिट्टी ( सांसारिक इच्छाओं ) में क्यों हाथ बर रहा है ? यह खेल अच्छा नहीं, मक्खन जैसा शरीर तुमने मैला क्यों कर लिया ? गोबर मिट्टी में तो बिच्छू ( दुःख ) होते हैं, कहीं काट खायँगे, फिर होंठ बिसूर कर रोना आरंभ करोगे । तुम्हारा रोना तुम्हारा गाम नहीं सह सकता । मेरे नन्हें ! आओ तुम्हें नहलाऊँ, धुलाऊँ, दूध पिलाऊं, तुम गड़रिए तो नहीं, तुम तो द्वारकाधीश ( जल थल के स्वामी ) हो, छत्र-सिंहासन के अधिकारी हो, छोड़ो गँवारपन ।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!

नोट—"लोगों को वेदान्त क्यों नहीं भाता" इस शीर्षक के अन्तर्गत स्वामीजी के तीन लेख (1 खलूसे-बातन अर्थात् आंतरिक शुद्धि। 2 अमली तालीम अर्थात् व्यवहारिक ज्ञान। और 3 वेदान्त का एक साधन बशाशत अर्थात् प्रसन्नता। हैं जो उर्दू रिसाला अलिफ के 4, 5. 6 भागों में प्रकाशित हैं ।