श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

व्यावहारिक ज्ञान।

भाग 11 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 11 · अध्याय 5 / 6

व्यावहारिक ज्ञान।

बाल्यावस्था में जब पांडव और कौरव एक साथ पढ़ते थे। एक दिन उन सब की परीक्षा ली गई। किसी विद्यार्थी ने तो आधी किताब सुनाई, किसी ने पूरी किताब, किसी ने दो किताबों में परीक्षा दी, किसी ने चार में, किन्तु युधिष्ठिर से जब पूछा गया कि तुमने क्या कुछ याद किया है, तो उसने वालोपदेश के अक्षर-परिचय के अतिरिक्त केवल दो वाक्यों की ओर संकेत किया कि 'केवल ये दो वाक्य मैंने याद किये हैं"। यह सुनकर परीक्षक महाशय को अत्यंत क्रोध आ आया और बोले "अरे दुष्ट! तू सब से तो बड़ा है और अभी तक याद केवल दो ही वाक्य किये हैं, यह कैसी सुस्ती है? तुझे लज्जा नहीं आती? चुल्लू भर पानी में डूब मर," इत्यादि। परीक्षक महाशयने इतने ही पर बस न की, दे चपत पर चपत लगे मारने। बेचारे युवराज राजकुमार के कपोल मारे थप्पड़ों के लाल हो गए, पर वाह रे राजकुमार! उफ़ तक नहीं की शांत खड़ा रहा। यह दशा देखकर परीक्षक महाशय को अत्यंत विस्मय हुआ; जी में आया कि आज दुर्योधन को किसी अपराध पर धमकाना चाहा था तो वह पगड़ी उतारने को तैयार हो गया था। भगवान्! यह कैसा राजकुमार है कि इसे कोसते कोसते वा पीटते २ अधमरा कर दिया और इसने चूँ तक नहीं की, प्रसन्न वदन खड़ा है।

अब युधिष्ठिर का हाल सुनिए। अक्षर-परिचय होने

के बाद पहला ही वाक्य जो गुरूजी ने प्राइमर (बालोपदेश) में बतलाया, यह था कि "क्रोध मत करो"। सुशील बालक ने गुरुजी की जिह्वा से यह वाक्य सुना और अलग हुआ। एकांत में जाकर गुरुजी के उपदेश को याद करने लगा, उस पर विचार करने लगा। कानों से सुने हुए पाठ को रोम-रोम में उतारने लगा, अपने व्यावहारिक जीवन में लाने लगा। विचारे भोले-भाले युधिष्ठिर को उस शिक्षा-कला की ख़बर तक न थी, जिसकी बदौलत साधारण बाबू और पंडित लोग विद्या रूपी गंगा की नहर अपने मस्तिष्क पर इस सफ़ाई के साथ बहा देते हैं कि रुड़कीवाली नहर की भांति एक बूंद भी पुल से नीचे गिरने नहीं पाती। ऊपर-ऊपर तो गंगा बहती हैं और निचला हिस्सा सूखा का सूखा पड़ा रहता है। देखने में तो सैकड़ों पुस्तकें पढ़ डालीं, परीक्षाओं में पूरे-पूरे अंक प्राप्त किए, विश्व-विद्यालय से पारितोषिक और पदक प्राप्त किए किंतु भीतर एक बूँद भी न पड़ने दी, आचरण में कुछ न प्रवेश होने दिया। बेचारा युधिष्ठिर इस कला से बिलकुल अपरिचित था। उसने जो कुछ पढ़ा, झट उसके हृदय में उतरने लगा। उसके विचार-क्रम का रूप यह था: —

"क्रोध मत करो" भला क्योंकर? हमें तो क्रोध आ जाता है। फिर आता क्यों है? क्या उचित है या अनुचित? क्रोध के बिना काम चल सकेगा या नहीं? यदि क्रोध न किया तो नौकर लोग ढीठ हो जाँयगे, काम अच्छा न करेंगे, रोब (प्रभाव) उठ जायगा, प्रबंध बिगड़ जायगा; रसोई समय पर न तैयार होगी, इत्यादि। क्रोध को छोड़ने में कठिनाइयें तो होंगी, पर क्या क्रोध को छोड़ना असंभव

है? यदि असंभव होता, तो गुरुजी ऐसा उपदेश ही क्यों करते? सच्छास्त्र ऐसा अनुशासन ही क्यों देते? अब क्या करें, क्रोध तो आ ही जाता है। क्या यह उचित न होगा कि यों तो मान लिया जाय कि क्रोध करना अनुचित है, पर समय पर क्रोध आ जाय तो आ जाने दें? नहीं यह तो छल है, गुरु और शास्त्र के साथ धोकेबाज़ी है। मुँह से हाँ करलेना और अमल में न लाना।—अब से दृढ़ संकल्प करते हैं "कि क्रोध को पास फटकने न देंगे"। क्रोध क्यों उत्पन्न होता है? प्रायः जब कोई काम बिगड़ता है, या कोई वस्तु ख़राब हो जाती है, तो क्रोध आता है। अरे मन, काम तो एक बार बिगड़ चुका, तू उस पर चित्त को क्यों बिगाड़ता है? वस्तु तो ख़राब होगई, बला से, रुपया-दो रुपया या सौ रुपया की होगी, तिस पर चित्त-जैसी अनमोल वस्तु को क्यों ख़राब कर बैठता है? आनंद मेरा जन्मजात स्वत्व है। यादि कोई सांसारिक वस्तु खोई जाय, तो उसपर मैं अपने जन्मजात स्वत्व को व्यर्थ में क्यों नष्ट कर दूँ? एक बार दुर्योधन ने अपने पिता से तलवार माँगी थी। पिता ने अस्वीकार किया था, तो दुर्योधन झट बिगड़ कर बोल उठा था -' मैं तुम्हारे घर में रहने का ही नहीं, तुम्हारा बेटा ही नहीं बनता, कहीं चला जाऊंगा, विष पान करलूंगा। इत्यादि"। अब तलवार अधिक से अधिक कहीं दस बीस रुपए की होगी। खो दी तो खो ही दी सही। तलवार को खोकर अपने जन्मजात स्वत्व (साम्राज्य-राजगद्दी) को भी खो देने पर तत्पर हो जाना कैसी व्यर्थ किया है। ठीक इसी भाँति सतोगुण मेरा जन्म-जात स्वत्व है। दुर्योधन का अनुकरण में कभी नहीं करूंगा। किसी तरह की हानि हो जाने पर भी मैं अपने जन्मजात

स्वत्व (शांति) का कभी त्याग नहीं करूंगा। राजकुमारों के यहाँ रिवाज तो अवश्य यही है कि बात-बात पर बिगड़ जाना, उरद के आटे की तरह ऐंठना; किंतु गुरुजी का उपदेश है "शांत रहो, मन को हिलने ही न दो।" अब किस को आचरण में लाऊं? गुरुजी तो एक ही हैं, किंतु उनके विरुद्ध बर्ताव से शिक्षा देने वाले असंख्य हैं। किसकी मानूं? उचित तो यही है कि गुरुजी का आज्ञा-वर्ती बनूँ। मैं चलन-व्यवहार की तानिक परवा न करूंगा। जो कुछ मुझे गुरुजी के द्वारा सत्य मालूम होगा, उसीपर चलूंगा, चाहे सारा संसार विरुद्ध हो। मैं संसार को अपना गुरु नहीं बनाऊंगा। सत्यता को अपना साथी रक्खूंगा।