सुलह कि जंग ? गंगा-तरंग
( पूर्व अंक के पृष्ठ 81 से आगे )
बहुत भारी शंका—टेनिसन ( Tennyson ) ने एक स्थान पर लिखा है—
I am a part of all that I have met. अर्थात् "जो कुछ मैंने देखा या सुना मैं स्वयं उसका एक उत्तमांग था।" निस्संशय यह वाक्य तो स्वीकार-योग्य है, क्योंकि कोई वस्तु अनुभव नहीं हो सकती जब तक कि हम उसके अस्तित्व में एक वृहत् अंश ( अर्थात् ज्ञाता ) न बनें। किंतु तुम्हारा यह कहना कि जो दिखाई देता है, सब "मैं ही मैं हूँ" विश्वास का पहला तोड़ता है। देखिए ! वस्तुओं के दृष्टिगोचर होने में न केवल तुम्हारा देखना आवश्यक है, वरन् तुम्हारे शरीर से बाहर किसी अस्तित्व का विद्यमान होना भी अत्यन्त आवश्यक है। यदि सम्मुख कुछ न होगा, तो तुम्हें पत्थर, नदी, मकान आदि कभी दृष्टिगोचर न होंगे। यदि तुम्हारी श्रवणशक्ति पर कोई बाहर से
प्रभाव डालनेवाली शक्ति विद्यमान न होगी, तो लाख कान खोल खोलकर पड़े ध्यान धरो, कुछ सुनाई नहीं देने का; यदि तुम्हारा ही ख़याल सब कुछ है, तो पानी का ध्यान जमाने से प्यास क्यों नहीं बुझा लिया करते ? प्रकृति का नियम है कि जब कहीं किसी प्रकार की क्रिया (action) होती है, तो साथ उसकी प्रति-क्रिया (re-action) भी अवश्य होती है। जब तुम पत्थर को दबाते हो, तो उधर आपकी अँगुली भी उतनी ही दबती है। घोड़ा गाड़ी को चलाता है, गाड़ी घोड़े के अंगों और नसों को हिलाती और शिथिल कर देती है, झट थका देती है। रगड़ से जब आग निकलती है, तो दियासलाई डिबिया की रगड़ पर काम करती है, डिबिया की रगड़ दियासलाई पर वैसी ही प्रतिक्रिया करती है। एक हाथ से ताली भी तो नहीं बजा करती। कुर्सी तुम्हारे शरीर पर काम कर रही है, गिरने से रोक रही है, दबाव के कारण तुम कुर्सी पर प्रतिक्रिया कर रहे हो, उसे कमज़ोर और ढीला कर रहे हो।
गर हुस्न नहीं, इश्क़ भी पैदा नहीं होता। बुलबुल गुले-तस्वीर पै शैदा नहीं होता ॥
रंगा-रंग के चित्र-विचित्र पदार्थ दिखाई देने में भी (action) क्रिया और (re-action) प्रतिक्रिया दोनों का होना आवश्यक है। यदि कान, आँख, नाक आदि पर बाहर से कुछ प्रभाव न पड़े, तो भी कुछ अनुभव न होगा। और यदि भीतरी शक्ति काम न करे, तो भी भाँति2 की वस्तुएँ महांधकार में रहेंगी। जैसे इधर दियासलाई की रगड़ और उधर दियासलाई के मसाले की रगड़ से आग प्रकट हो आई, वैसे ही यह सब का बूटा सब के रूप में बाहर और भीतर से क्रिया और प्रतिक्रिया की बदौलत मौजूद हो आता है।
राम—आपके मुख में गुलाब देकर बात काटता है—नहीं, आपकी बात को पूरा करता है। सुनिये, शक्ति की खान, या ऊर्जा (चेतनता) के स्रोत को "चेतन" नाम दिया गया है।
इसका चाँद चांद के रूप में तब प्रत्यक्ष होता है, जब मेरा ख़याल वहाँ लड़ता है, किंतु ख़याल लड़ने से पहले चांद के स्थान पर कुछ न कुछ अवश्य था, जिसने दृष्टि पर प्रभाव डाला।
क्या यह चांद था ? कदापि नहीं; चांद तो ख़याल लड़ने के पीछे प्रकट हो आया, ख़याल लड़ने से पहले इसके अस्तित्व के विषय केवल इतना ही कहा जा सकता है कि यह प्रभाव (तासीर या संस्कार) का स्रोत है, अतः इसको चेतन कहना ठीक है ( इसका कारण तो चेतन ही है ) ।
इस तरह मन्दिर मन्दिर के रूप में तब विद्यमान होता है, जब तुम्हारी ओर से प्रतिक्रिया ( re-action ) ध्यान के रूप में होती है, नहीं तो वस्तुतः पहले चेतन ही चेतन है।
कीर्तन कीर्तन के रूप में कब पैदा हुआ ? जब तुमने ख़याल का ख़याल फूँका। क्या पहले यह नहीं था ! नहीं; फ़र्मफ़र्ता चेतन ही चेतन था।
सुमन और सुगन्ध सुमन और सुगन्ध के रूप में कब प्रत्यक्ष हुए ? जब तुमने सूँघा, अन्यथा वास्तव में चेतन ही चेतन था।
सेव और अंगूर सुस्वादु कब थे ? जब तुमने ध्यान किया, अन्यथा चेतन ही चेतन है।
रेशम इतना नर्म और साफ़ कैसे हुआ ? तुम्हारे स्पर्श के कारण, अन्यथा चेतन ही चेतन है।
प्रश्न—माना कि हमारे ध्यान देने के बाद चांद या गंगा दृष्टिगोचर हुई, किंतु हम क्योंकर कह सकते हैं कि चांद और गंगा पहले से ही विद्यमान न थे ?
उत्तर—पदार्थ पदार्थ के रूप में तब उपस्थित हुआ जब बाहर से चेतन की क्रिया का तुम्हारे भीतर से ( ध्यान और वृत्ति के रूप में ) उत्तर मिला। जैसे शीशे में छाया केवल तब प्रत्यक्ष हुई जब शीशे में मुँह देखा गया। शीशे में मुँह न देखने से पहले तुम्हें कोई अधिकार नहीं कि दर्पण में कपोलों के अस्तित्व की कल्पना कर लो।
पंजाब के एक गाँव के बाहर रात के समय देहाती लड़कों ने खेलते खेलते बाजी बदी कि जौनसा लड़का इस समय मरघट में जाकर एक खूँटी गाड़ आए, उसकी बहादुरी मानेंगे। एक बनिए का लड़का शेखी के मारे तैयार हो गया और मरघट की ओर चला। चला तो सही, पर मारे भय के जान मुट्ठी में आ रही थी। हृदय धड़क रहा था। पहले तो समाधियों ( क़वरों ) के कुत्तों को अँधेरे में देखकर डरा, जंगल की सनसनाहट से भयभीत हुआ। फिर जब लकड़ी (खूँटी) को पत्थर से ठोंकने लगा, तो भय और गड़गड़ाहट ने व्याकुल कर दिया था, उसकी धोती का पल्ला खूँटी की नोक में फँस गया। खूँटी को ठोंकते ठोंकते धोती भी भूमि में धँसती गई। जब अत्यंत शीघ्रता से लौट जाने को उठा, तो कपड़ा बड़ी कड़ाई से खिंचा। भ्रम से भयानक रूप तो पहले ही आँखों के सामने नाच रहे थे कपड़ा, पकड़ा गया देखकर विवश हुआ चिल्लाने लगा, ज़ोर से चीखें मारने लगा, पर मुँह से केवल भू……भू……ही निकला था कि मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। यह भूत बाहर से आया कि भीतर से ?
ऐ सतीय ! भूत का स्वामी ( शिवशंकर ) तू ही है। चित्र तेरी आँख से उत्पन्न हुआ, तेरे संकेत से विद्यमान हुआ है, कपड़ा भी किसी अन्य ने नहीं पकड़ा, तू ने स्वयं भूमि में गाड़ा है, अपनी की हुई करतूत पर हल्ला मचाना क्या अर्थ रखता है ? यह हाल उन लोगों का है जो अज्ञान की अँधेरी रात में विषयों की समाधियों पर शेख़ी ( vanity ) के मारे खूँटी गाड़ना चाहते हैं, भीतर से चित्त विस्मित हुआ जाता है, इन्द्रियाँ शिथिल हुई जाती हैं, तथा उपेड़ चुन में हैं, पर बाहर से चोट पर चोट लगाए जाते हैं, मोह और काम की खूँटी गाड़े जाते हैं, यह देखते ही नहीं कि ऐसा करने से अपनी सभी प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला रहे हैं और अपने आप को स्वयं बन्धायमान कर रहे हैं। पत्तों की खड़खड़ाहट से, हवा की सरसराहट से दम में दम नहीं रहने पाता। कभी कभी चौंक पड़ते हैं "हाय राम ! हे भगवान् ! मारे गए ! लूटे गए !" और विषयों के समाधिस्थान ( क़ब्रस्तान ) से लौटते समय तो मानों भारी घसीट और रगड़ से दुःख पाते हैं।
ऐ अज्ञान के उत्तराधिकारियो ! तुम अपने ही भ्रम को कील से मत जकड़े जाओ। तुम्हें कोई खींचनेवाला नहीं। यह पंचभूत (पंचतत्व) तुम्हारे बनाए हुए हैं। झिझक और भय को दूर कर दो, तुम्हारे खूँटी गाड़ते गाड़ते भूत प्रत्यक्ष होता गया, पहले कोई भूत न था।
प्रश्न—जब हमने देखा, तो चाँद या गंगा दिखाई दिये, अब क्या हम अनुमान से नहीं कह सकते कि वहाँ पहले भी चाँद और गंगा ही मौजूद थे ?
उत्तर—अनुमान यहाँ क्योंकर चल सकता है, व्याप्ति
( middle term ) कहाँ से लाओगे ? उदाहरण कैसे जमाओगे ? जो वस्तु है, वही चेतन है, तुम्हारे देखने से वस्तु बनी है।
प्रश्न—आप क्योंकर कह सकते हैं कि यह दीवार मेरे ख़याल (प्रतिक्रिया) के कारण बनी है, और केवल दृष्टि-सृष्टि ही है ? "दृष्टिरेव सृष्टिः" । मैं इसको हाथ से अनुभव कर सकता हूँ, इसे थपकार कर आवाज़ सुन सकता हूँ, जीभ से चाट सकता हूँ, नाक से सूँघ सकता हूँ।
उत्तर—आँख की राह तुम्हारी वृत्ति दीवार का रूप बनती है, त्वच् के रूप में तुम्हारी वृत्ति कोमल या कठोरपन हो आती है। श्रोत्र के रूप में तुम्हारी वृत्ति दीवार की आवाज़ बन निकलती है, घ्राण की अवस्था में तुम्हारी वृत्ति ही गन्ध अनुभूत होती है, इसी प्रकार रस रस के रूप में बाहर से नहीं आता।
प्रश्न—यदि हमारे ख़याल से सब प्रकट हो आता है, तो हम जहाँ चांद देख रहे हैं, हमारे कहने से वहाँ सूर्य क्यों नहीं दिखाई दे देता ? जिसको आज हमने कालिज देखा है वह कल गंगा क्यों नहीं नज़र आता ?
उत्तर—( 1 ) यही तो आप कहते हैं न, कि "जिस स्थान पर चाँद नज़र आता है, उस स्थान पर सूर्य क्यों नहीं दिखाई देता ?" इस वाक्य ( proposition ) का तनिक व्यवच्छेद ( analyze ) कीजिये। आपके इस वाक्य से स्पष्ट पाया जाता है कि "स्थान" ( देश ) हमारे विचार से बाहर कोई वस्तु है, स्थान को आपने पृथक् काग़ज़ समान स्वीकार किया है, जिसपर ख़याल के चित्र हमारी वृत्ति ( समस्त ) से निकल सकते हैं।
इसी प्रकार "जो आज कालिज है, वह कल गंगा क्यों नहीं हो जाता ?" इससे स्पष्ट है कि आपने काल ( आज या कल आदि ) को हमारे अधिकार से बाहर स्वीकार किया है और केवल संक्षिप्त पदार्थों का हमारे ख़याल में होना माना है।
अतः यह प्रश्न आपका स्पष्ट कर रहा है कि आपने वेदान्त के सिद्धान्त को समझा ही नहीं। वेदान्त तो यह बताता है कि न केवल चाँद व सूर्य और कालिज व गंगा मेरे अन्तःकरण से निकलते हैं; वरन् स्वयं देश और काल भी मेरी दृष्टि-सृष्टि प्रत्यक्ष हैं।
अपनी ओर से तो आपने वेदान्त का सिद्धान्त (मन्तव्य) अतीव असंगत (preposterous) समझकर प्रश्न किया था, किन्तु इस प्रश्न से आपकी भ्रांति टपकती है। यह भ्रांति नहीं कि आपने जो वेदान्त के मत (सिद्धान्त) का अटकल (तख़मीना) लगाया, वह असली सिद्धान्त से अधिक है; वरन् भूल यह है कि आपका अटकल सच्चे सिद्धान्त से बहुत ही कम है, और इसी भ्रांति पर निर्भर आपका प्रश्न है। यदि वेदान्त का सिद्धान्त वास्तव में वैसा ही परिच्छिन्न ( देश-काल के बन्दीघर के भीतर स्वाधीन होने का ) हो, जैसा कि आपके ध्यान में आया है, तब तो आपका प्रश्न चल सकता है; किन्तु इस तत्त्व के साम्राज्य में तो चूँ, चरा (क्यों, कब) की गति नहीं।
वेदान्त यह उपद्रव नहीं करता कि सर्वशक्तिमान् का अर्थ करे वह देश-काल से परिच्छिन्न जीव जो अन्य ( देशकालानवच्छिन्न ) सजातियों पर मेट ( Mate ) का अधिकार रखता हो। मैं तो वह सर्वशक्तिमान्, अपरिच्छिन्न,
पवित्र परमात्मा हूँ कि न केवल चाँद सूर्य गंगा कालिज आँख की पुतली में उत्पन्न करता हूँ, वरन् इनका आदि अंत, अन्य शरीर और उनके पारस्परिक संबंध, तथा ये सब प्रश्न और उत्तर, समस्त देश-काल, क्यों और कब, मैं ही मैं हूँ। आश्चर्य और विस्मय-स्वरूप यह सब संसार मेरा चमत्कार है।
इस रहस्य को न समझने का कारण प्रायः यह होता है कि शब्द "मैं" का लक्ष्यार्थ सर्व साधारण की समझ में झटपट नहीं आता; बेर बेर इस शब्द "मैं" के अर्थों में गड़बड़ कर जाते हैं। "मैं" का अर्थ जूती और पगड़ी के बीच में विद्यमान नहीं है। "मैं" की सीमा साढ़े तीन हाथ नहीं, "मैं" की चौहद्दी निस्सीम है। जैसे स्वप्न में इस "मैं" के भीतर इधर एक व्यक्ति भिक्षुक या सम्राट बन जाता है ( व्यष्टि ), उधर देश, मैदान, पर्वत और नदी उपस्थित हो जाती है ( समष्टि ); वैसे जाग्रत् में इस एक "मैं" के भीतर इधर ( subject ) एक व्यक्तिपन ( individual ) प्रकट हो आता है, उधर सारा संसार प्रकट हो आता है (object) । इधर देश काल वस्तु ( Forms of thought ) एक व्यक्ति मात्र ( subject ) के भीतर ( मस्तिष्क में ) उग पड़ते हैं, उधर संसार-भर में मौजूद हो आते हैं।
स्वप्न में यदि आप सिंह से दब जाते हो, तो क्या सिंह आपका स्वप्न-विचार नहीं था ? इधर अधीन ( दबा हुआ ) शरीर आपका ख़याल था, उधर आक्रमणकारी सिंह आपका स्वप्न था। वस्तुतः आपके अपने आप में सब कौतुक कल्पित है। जागो अपने आप में तुम्हीं सर्वशक्तिमान्, शुद्ध, चेतन, देश काल के कर्ता-हर्ता हो।
प्रश्न—बात-बात में आप तो एक स्वप्न का उदाहरण हूँ न देते हैं। योरपियन फ़िलॉसफ़र तो इसको पसंद नहीं करते ।
उत्तर—अच्छा ! हम स्वप्न की चर्चा न किया करेंगे। आप और आपके गुरु योरपियन पण्डित स्वप्नावस्था में प्रतिदिन निरन्तर मारे-मारे फिरना ही बन्द कर दें।
बड़े आश्चर्य की बात है। आठ नौ बजे तक तो प्रति- दिन स्वप्न में झूँठ को सच मानकर कहीं के कहीं व्याकुल और फुटबाल के गेंद की तरह ढुढ़कते फिरते हैं, और दस बजे जागकर फिर दूसरे स्वप्न ( संसार ) के चक्कर में ऐसे फँसते हैं कि बाह्य विषयों (empirical phenomena) की भूलभुलैयाँ में ग्रस्त होकर एक वास्तविक बात ( stern reality, solid fact ) का नाम लेना भी अंगीकार नहीं कर सकते। स्वप्न में यदि ऐसा मालूम हो जाय कि यह स्वप्न है, तो वह स्वप्न नहीं रहता, जाग आ जाती है। सर्व-साधारण योरपियन लोग और उनके चेले चांटे कुछ हिंदू यदि इंद्रिय-जन्य विषयों के स्वप्न और ख़याल मात्र होने का चर्चा सुनकर हँस देते हैं, तो उसके यह अर्थ है कि उनको जागना घुग जान पड़ता है। स्वप्न का शशक बनने में स्वाद लेते हैं, रात से विशेष प्रेम रखते हैं, और अँधेरे में चलना-फिरना पसंद करते हैं।
आधे संसार पर सब समय रात रहती है, और आधे जगत् में दिन। दूसरे शब्दों में आधा जगत् प्रति समय स्वप्न में रहता है। और स्वप्न और सुषुप्ति का साम्राज्य विश्वव्याप्त होने से कुछ संशय नहीं। बड़े आश्चर्य की बात है कि योरपवालों ने आत्मा का तत्त्व वर्णन करते समय
स्वप्न और सुषुप्ति को किसी गणना और पंक्ति में नहीं लिया, और अपूर्ण ( hypotheses, data ) बुन्याद पर अपने पुराने तत्त्वज्ञान को चलाना चाहा है। प्रश्न की शर्तों को अधूरा रखकर तात्विक ग्रन्थि को हल किया चाहते हैं। जाग्रत् के स्थूल शरीर और प्रत्यक्ष संसार में पाश्चात्य लोगों की दौड़-धूप निस्संदेह एक दृष्टि से प्रशंसा-योग्य है, किंतु मानसिक संसार और सूक्ष्म शरीर में उनके अनुसंधान का बहुत कम प्रवेश है। आत्म-अनुभव और आत्म-साक्षात्कार का उनके यहाँ पता नहीं मिलता। धर्म का पैग़म्बर (Prophet) योरप में अभी तक एक भी उत्पन्न नहीं हुआ। संसार के जितने धर्म के पैग़म्बर ( नेता वा संस्थापक ) हैं, सब के सब एशिया से ही निकले हैं।
निदान, विशेष समयों पर सच तो प्रत्येक की जिह्वा से निकल ही जाता है। शेक्सपीयर ( Shakespeare ) कहता है—
"We are such stuff as dreams are made of" अर्थात् हम उस तत्त्व से बने हुए हैं जिससे स्वप्न बने हैं।
टेनिसन ( Tennyson ) लिखता है—
Dreams are true while they last, and do we not live in dreams ?
अर्थात्—स्वप्न सच्चे या असली होते हैं, जब तक कि वे रहते हैं ( अर्थात् जब तक स्वप्न की अवस्था वर्तमान रहती है, वह स्वप्न सच्चा वा असली ज्ञात होता है ) और क्या हम स्वयं स्वप्न में नहीं रहते ?
प्रश्न—देश, काल, वस्तु तो नित्य और स्थिर हैं। अन्य वस्तुएँ परिवर्तित होती हैं, ये परिवर्तित नहीं होते।
शेष सब वस्तुएँ देश, काल, वस्तु के द्वारा वर्णन की जाती हैं। सब व्यवहार इत्यादि का निर्भर इन्हीं पर है। आप देश, काल, वस्तु को अन्य वस्तुओं के समूह में क्यों गणना करते हैं ?
उत्तर—आप यह बतलाइए, तुम्हारे देश, काल, वस्तु का नित्य और स्थिरपन स्वप्न और सुषुप्ति में कहाँ जाता है ? जाग्रत् के अनुभव को सत्य स्वीकार करते हो, पर क्या सुषुप्ति तुम्हारी वैसी ही, वरन् जाग्रत् से भी बढ़कर बलवान्, अवस्था नहीं है ? सुषुप्ति का तुम पर क्या अधिकार नहीं है ? जितनी देर जाग्रत् अवस्था रहती है, लगभग उतनी ही देर सुषुप्ति का राज्य रहता है। बाल्यावस्था का काल तो सब का सब एक लंबी सुषुप्ति होता है, मृत्यु के पश्चात् बहुत देर सुषुप्ति का राज्य रहता है। इस सुषुप्ति के अनुभव को किसी गणना-पंक्ति में न लाना न्याय की हत्या करना है। सुषुप्ति तुम्हारी मुश्कें कसकर, हाथ-पाँव बाँध- कर यह पाठ नित्य पढ़ाती है कि देश काल वस्तु सत्य नहीं, सत्य नहीं, केवल देखने मात्र के हैं, दिखावटी हैं।
पोल निकाल्यो जगत् का, सुषुप्त्यवस्था माहिं। नाम रूप संसार की, जाहिं गंध भी नाहिं ॥
यदि स्वप्न और सुषुप्ति के अनुभव को आप जाकर कह देते हो कि यह झूठ है, तो जाग्रत् के अनुभव को भी झूठ कह देना आवश्यक है; क्योंकि स्वप्न और सुषुप्ति के विश्वास से यह भी उड़ जाता है। जाग्रत् का जगत् यदि सच्चा होता, तो सुषुप्ति अवस्था में भी बना रहता, क्योंकि "सत्य तो वह है जो सदा एक रस, स्थिर और विद्यमान रहे" ।
" एकरूपेण अवस्थितो योऽर्थः स परमार्थः। "
( शांकर शारीरिक भाष्य 2-1-11 )
यह जो आपने कहा कि अन्य वस्तुओं की अपेक्षा देश काल वस्तु नित्य और स्थिर हैं, इसी से तो कैंट (Kant) ने सिद्ध किया है कि देश, काल, वस्तु केवल कल्पित ( ख़याली ) हैं। हाँ यदि व्यवहार में इनको अन्य पदार्थों की अपेक्षा नित्य और स्थिर मान लिया जाय, तो उसपर सुनिएगा—
रेखागणित ( Analytical Geometry ) में समस्त बिंदु, समस्त रेखाएँ, समस्त धरातल और समस्त पदार्थों के भुजयुग्म सीमाएँ ( Coordinates ) कल्पित अक्षों (axis) के विचार से स्थिर और नियत होते हैं। सब साध्य और प्रश्न इन्हीं अक्षों पर निर्भर होते हैं। सब प्रश्न इन्हीं अक्षों (axis) की बदौलत हल होते हैं। रेखा- गणित के समस्त अभ्यास इन्हीं अक्षों पर अवलंबित होते हैं। यह सब कुछ तो सही, किंतु बोर्ड पर उस्तर (झाड़न) फेरा, तो "जित्थे गई सोहनी ओथे महींवाल" मज़ेदार हिंदसों के आकार चित्र-विचित्र वक्र रेखाएँ ( Curves ), शंकुच्छिन्न ( Conic Sections ), कातन्वली ( Catenary ), घाताङ्कगणन ( Logarithms ) अवलूत, अनवलूत (evoluts, involutes) अर्थात् अनुवक्र कैन्द्रिक, वक्र कैन्द्रिक, सर्पिल ( spirals ), ये सब के सब अक्षों ( ध्रुवों ) को अपने साथ ही ले मरे। जहाँ नाव डूबी, खेने के औज़ार चप्पा वाँस आदि भी साथ ही निमग्न।
मेरे प्राणप्रिय ! तेरे श्यामसुंदर स्वरूप के बोर्ड पर अविद्या की खरियामट्टी से अनेक प्रकार के रूप ( चित्र )
खिंचे हुए हैं, कई प्रश्न हल हो रहे हैं, कई अज्ञात रूप स, त्र, ज संचित हैं, असंख्य ज्ञात परिमाणों ( Known quan- tities) की भरमार है। अन्ततः हल करते-करते गणित के तत्त्वशास्त्र ने सिद्ध कर दिया है कि—
स ( देश ) = 1
त्र ( काल ) = 1
ज ( वस्तु ) = 1
हाँ ठीक है, बिल्कुल दुरुस्त है। देश-काल-वस्तु का भेद मुझ देशकालानवच्छिन्न और सर्व-क्रिया-रहित में कहाँ ?—
सत्यमित्येतावदिदं सर्वमिदं सर्वमस्मि ।
ऋग्वेद की श्रुति का उपदेश है—"इस वाक्य से सच कहा जाता है, जो कुछ कि यह सब है, यह सब तू है।" अब सुख से चगलें बजाओ, आनंद करो। बोर्ड को साफ़ करो और ध्रुवों ( अक्षों ) को भी साथ ही मिटा दो। चलो पास ! पास हो गए। धन्य हो ! यद्यपि पास तो पहले ही थे, दूरता का तो पता ही न था ।—
ये कि उमरे-दर पप ओ मेदवीदम सू वस्तू। नागहानिश यास्तम् वादिल निशस्ता रूवरू ॥ 1 ॥ आख़िरत अमरश वदीदम मोतकिफ़ दर कूए-दिल। गश्ते विसयागी दवीदम दर पप ओ कू वक्कू ॥ 2 ॥ दिल गशिफ्त आराम चूँ. आरामे दिल दर वरगरिफ़्त। जाँ चूँ जानाँ रा वदीद आसूदा गश्त अज़ जुस्तजू ॥ 3 ॥ ये कि उमरे आज़ूए-वस्ले-ओ बूदत चरा। अज़ पए आँ आरज़ू न गुज़श्ती अज़ हर आरज़ू ॥ 4 ॥ ता बके सर चश्मे-खुद रा वमिल अंपाशतन। जूए-खुद रा पाक कुन ता आयद आबे-आवजू ॥ 5 ॥
आबे-हैवाँ दर दरूँ वाँगे बराए क़तरए। रेख़्ता दर पेशो-हर नादाँ व दाना आबरू ॥ 6 ॥ मुतरब्बे-आँ मज्लिसी दफ़ रा मनिह हर जा गिरौ। तालिबे-आँ बादए विश्कन सुराही-ओ-सबू ॥ 7 ॥ नाज़िरे-आँ मंज़री बरदार अज़ आलम नज़र। आशिक़े-आँ शाहदी बरदोज़ चश्म अज़ ग़ैरे-ऊ ॥ 8 ॥ नेस्त वे ओ हेच ताबे रुए अज़ वै वर मताव। वे वयत चूँ नेस्त आघे दस्त रा अज़ वै मशो ॥ 9 ॥
अर्थ—मैं जो समस्त आयु उसके पीछे हर ओर दौड़ता फिरता था, मैंने एकाएक उसको हृदय में सम्मुख बैठा हुआ पाया ॥ 1 ॥
अन्ततः मैंने उसको हृदय के एक कोने में विराजमान देखा, यद्यपि मैं उसके लिये गली-गली बहुतेरा दौड़ा ॥ 2 ॥
जब मेरे हृदय ने सुहृत्तम को पार्श्व में पा लिया, तो उसको आनंद मिल गया। और प्राण ने जब (अपने प्यारे) को देखा, तो जिज्ञासा से मुक्ति मिली ॥ 3 ॥
ऐ जिज्ञासु ! तुझे जो समस्त आयु उसके मिलाप (साक्षात्कार) की लालसा थी, तो तूने उस लालसा को पूर्ण करने के लिये क्यों न प्रत्येक लालसा को छोड़ दिया ॥ 4 ॥
तू कब तक अपने स्रोत के मुख को कीचड़ से बंद करता रहेगा (पाटता रहेगा) ? अपनी नहर को साफ़ कर ( अर्थात् अपने अंतःकरण को शुद्ध कर ) जिससे सभी नदी का पानी उसमें आए ॥ 5 ॥
अमृत तेरे भीतर है और फिर तू इसके एक बूँद के लिये प्रत्येक बुद्धिमान् और मूर्ख के सामने अपनी अप्रतिष्ठा कर रहा है ॥ 6 ॥
यदि तू सच्ची सभा का गायक ( अर्थात् यदि तू वास्तविक भेद का समाचार देनेवाला ) है, तो दफ़ ( एक बाजा ) को हरएक स्थान पर गिरवी मत रख ( अर्थात् प्रत्येक स्थान पर उस वास्तविक भेद का कोलाहल मत मचा )। यदि तू उस (वास्तविक निजानन्द रूपी) सुरा का इच्छुक है, तो ( सांसारिक सुरा की ) सुराही और मटका तोड़ डाल ॥ 7 ॥
यदि तू उस रहस्य ( देखने-योग्य अवस्था ) का देखने- वाला है, तो संसार की ओर से मुँह फेर ले। यदि तू उस ( वास्तविक ) साक्षी ( भगवान् ) का प्रेमी है, तो जो कुछ उसके अतिरिक्त है, उसकी ओर से आँख सी ले ( बन्द कर ले ) ॥ 8 ॥
उसके बिना कोई वस्तु ज्योतिर्मय नहीं हो सकती, उसकी ओर से मुँह मत फेर। इस हेतु से कि उसके बिना तेरे लिये कोई ज्योति ( या प्रकाश ) नहीं, इसलिये उससे हाथ मत धो ( अर्थात् अलग मत हो ) ॥ 9 ॥
ठोकर खा खा ठाकुर डिट्ठा ठाकुर ठीकर माँहि। ठीकर भजदा टुटदा सड़दा ठाकुरां इकसे थांहि॥ ठौर ठौर विच ठड्ख्या ठाकुर ठाकुर बाहर नाँहि। ठग्ग ठीक ठाकुर ही ठाकुर ठाकुर ही जहाँ ताँहि॥ ठाकुर राम नचावे नाचे वह जांदा जाँ बाँहि॥
मान मान मान कहा मान ले मेरा। जान जान जान रूप जान ले तरा॥ जाने बिना स्वरूप न प्रम जावेगा कमी। कहते हैं बार बार वेद बात यह सभी॥
नैनन के नैन जो है सो नैनन के नैन है। जिसके बिना शरीर में न पलक चैन है॥ ऐ प्यारी जान ! जान तू भूपों का भूप है। नाचे है प्रकृति ही सदा मुजरा अनूप है॥
समीक्षक—अभी अभी आपने स्वीकार कर लिया था कि ऐक्शन ( क्रिया ) और रि-ऐक्शन ( प्रतिक्रिया ) दोनों से संसार आविर्भूत होता है, इससे तो स्पष्ट द्वैतवाद सिद्ध होता है, अब आप आवश्यक परिणाम से भागते हो, एकता ही की बात को दबाए जाते हो।
राम—हाँ हाँ ! वह प्रसंग पूरा नहीं होने पाया था कि आपने और प्रश्न उपस्थित कर दिए। और—
तुम तो कहते हो रहे पासे अब लेकिन कहाँ ; हर्फ़े-मतलब का ज़ुबाँ पर बार बार आने को है।
अस्तु। अब ऐक्शन और रि-ऐक्शन की दशा सुनो—
ऐक्शन और रि-ऐक्शन सदैव समान और प्रतिरोधी ( equal and opposite ) होते हैं, बल्कि एक ही होते हैं। कल-शास्त्र के प्रायः प्रश्नों में जिसे एक ओर से ऐक्शन गिना जाता है उसी को दूसरी ओर से रि-ऐक्शन भी गिना जाता है। एक ही घटना या कर्म एक शरीर के विचार से ऐक्शन ( क्रिया ) कहलाता है और दूसरे शरीर के विचार से रि-ऐक्शन ( प्रतिक्रिया ) नाम पाता है। ऐक्शन ( कर्तृप्रधान क्रिया ) और रि-ऐक्शन ( कर्म- प्रधान-प्रतिक्रिया ) दोनों शरीर सजातीय (एक-तत्त्व-विशिष्ट) ही होते हैं। अब संसार जो ऐक्शन और रि-ऐक्शन का फल माना गया है, वह ऐक्शन बाहर से चेतन की ओर से
माना गया है, और रि-ऐक्शन भीतर से कर्ता ( subject ) की ओर से। यहाँ पर यह आवश्यक उपलब्ध होता है कि ऐक्शन का स्रोत जो चेतन है, तो रि-ऐक्शन का स्रोत भी चेतन ही होना चाहिए।
[ मीठा उदाहरण है—संस्कृत भाषण करनेवाला यदि संस्कृत का ज्ञाता है, तो उस भाषण को समझनेवाला भी अवश्य संस्कृतज्ञ होना चाहिए—
कुनद हमजिंस वा हमजिंस परवाज़। कबूतर या कबूतर बाज़ वा बाज़॥
अर्थात् एक जातिवाला अपनी ही जातिवाले के साथ उड़ता है, कबूतर कबूतर के साथ और बाज़ बाज़ के साथ। ]
बाहर ( क्रिया का स्रोत वा आधार ) यदि चेतन ही चेतन है, तो भीतर ( प्रतिक्रिया का आधार ) भी चेतन ही चेतन होना चाहिए।—
न आसमानो न मह आफ़तावो-खुर्दे-वरी। न अंजुमो न मलायक, न कस अयाँ न निहाँ ॥ 1 ॥ न दोज़खों न बहिश्तो न मुल्क है ममलूक। चले यकेस्त कि दर जुम्ला ज़ाहिर हस्तो-निहाँ ॥ 2 ॥ दो कौन ओस्त वले गुल-अज़च कमाल अस्त इ। न अफ़ल दानिदा-नै वहम नै ख़िरद न वयाँ ॥ 3 ॥ चंगुना अफ़ल वरद पै कमाले-हसरते-ओम्त। न ज़ाहिरस्तो-न बातिन न आशकारो-निहाँ ॥ 4 ॥
अर्थ न आकाश है, न चंद्रमा है, न सूर्य और न उत्तम स्वर्ग है, न बड़ तारा है, न फ़रिश्ता, न कोई प्रकट है, न छिपा है ॥ 1 ॥
न नरक है न स्वर्ग है, न मुल्क है न प्रजा है ; किन्तु वह एक है जो सब में प्रकट और छिपा है ॥ 2 ॥
दोनों लाक वही है ; किन्तु आश्चर्य और निपुणता यही है कि न उसको बुद्धि जानती है, न समझ और न वाक्-शक्ति ॥ 3 ॥
बुद्धि उसका खोज कैसे लगा सकती है ? ( अर्थात् कदापि नहीं लगा सकती ), इसलिये उसको इसका अत्यंत शोक है कि वह न बाहर है न भीतर, और न प्रत्यक्ष है न अप्रत्यक्ष ॥ 4 ॥
समीक्षक—अस्तु, इतना तो मान लिया कि भीतर भी चेतन है और बाहर भी चेतन है, किन्तु अद्वैन इससे भी सिद्ध नहीं होता। यद्यपि वास्तव में चेतन ही ऐक्शन का कारण है और चेतन ही रि-ऐक्शन का और इस पारस्परिक संघर्षण से संसार आविर्भूत होता है। किन्तु चेतन फिर भी दो रहते हैं, एक भीतरवाला और दूसरा बाहरवाला।
राम—चेतन दो नहीं,
जब किसी को ध्रुव-तारा दिखाना होता है, तो उत्तर की ओर उसका मुँह करके कहा करते हैं, वह देख सप्तर्षि ( तारों का पुंज जो पाश्चात्य लोगों के यहाँ Bear है )। ये सप्तर्षि पहले दिखा देने से ध्रुव का पता लगना सहज हो जाता है। ऐसे 'भीतर चेतन' और 'बाहर चेतन', यह वाह्य द्वैत केवल इसलिये दिखाया गया है कि अद्वैत (ध्रुव) का ठीक-ठीक पता सहज में लग जाय।
( 1 ) शब्द 'भीतर' और 'बाहर' अंतःकरण (बुद्धि, मन intellect and understanding ) के भेद (partition) से बोले गए थे ; किंतु अनुभव के प्रकाश से मन ( अंतःकरण ) की सत्यता देखी जाय, तो यह अन्तर ( परदा ) ऐसे
असत् है जैसे अँधेरे को दीपक से देखा जाय तो असत् होता है। वास्तव में व्यवधान (Line of demarcation) ही कोई नहीं, तो बाहर और भीतर फैला। 'बाहर का चेतन' और 'भीतर का चेतन' यह द्वैत किस प्रकार हो सकता है ?
इस विषय को पुराण की एक कथा ख़ूब स्पष्ट करती है। भस्मासुर दैत्य को शिवजी (कारण शरीर के प्रकाशक) ने यह वर (boon) दान दिया कि "जिसपर तू हाथ रखेगा, वह भस्म हो जायगा।" यह शक्ति पाते ही भस्मासुर ने अपने उपकारी पर ही शक्ति की परीक्षा करने को विचारा अर्थात् स्वयं शिवजी पर हाथ साफ़ करने की सूझी।
कस नयामोस्त हमेतीर अज़ मन। कि मरा आख़िरत निशाना न कर्द ॥
अर्थ—किसी ऐसे मनुष्य ने मुझसे वाण-विद्या नहीं सीखी कि जिसने मुझको अन्त में लक्ष्य न बनाया हो।
शिवजी आगे-आगे दौड़ने लगा और भस्मासुर हाथ बढ़ाए पीछे-पीछे हो लिया। शिवशंकर भगवान् वह पकड़ा गया ! वह जलकर राख हुआ ! वह वश में आ गया ! वह भस्म हुआ ! नहीं नहीं, बच निकला। भस्मासुर किस अपवित्र दृष्टि से शंकर की माया का लालच कर रहा है। क्या सचमुच शिवजी का संहार करेगा ?
आहा ! क्या आत्मा को प्रफुल्लित कर देनेवाला स्वर सुनाई दिया ! यह प्राणप्रद स्वर किधर से आया ? वह देखो, पवित्रता की मूर्ति, नख-शिख वांतिमान, सुंदरियों की मुकुटमणि "मनमोहिनी" किस हृदय-हारिणी गति से नृत्य कर रही है, [ यह "मोहिनी-अवतार" भगवान् विष्णु ( सतोगुण के प्रकाशक ) ने शिवजी की जान बचाने
के लिये धारा है ] भस्मासुर (मन-) मोहिनी की मन- लुभावनी पवित्रता पर दृष्टि डालते ही अपने आप से बेसुध हो गया। मोहनी ने उस दैत्य के अपवित्र हृदय से द्वैत को ऐसा धो दिया और उसके रोम-रोम में ऐसा आश्चर्यजनक प्रवेश किया कि भस्मासुर मानों मोहनी का छाया-चित्र बन गया। मोहनी नाचते-नाचते हाथ-पाँव को जिस प्रकार हिलाती थी, उसी का अनुकरण भस्मासुर करने लगा। मोहनी ने अपने दोनों हाथों को अर्द्धचक्र बनाते मिलाया, भस्मासुर ने भी ऐसा ही किया। मोहनी ने एक बाहु से सुंदर धनुप बनाया, भस्मासुर ने भी यही किया। धीरे-धीरे मोहनी ने अपना हाथ शिर पर रखा, विह्वलता की तरंग में भस्मासुर ने भी अपने शिर पर हाथ रखा। ए ला, झट भस्म ! छुट्टी।
इस दृष्टांत का दार्ष्टांत यह है। नममय कारण-शरीर ( अज्ञान ) पर आत्मा रूपी सूर्य की कृपादृष्टि पड़ी, तो जैसे सूर्य के तेज से बर्फ़ पिघल पड़ती है, वैसे ही शिव ( आत्मा ) की कृपादृष्टि की बदौलत कारण-शरीर से मन ( सूक्ष्म शरीर ) रूपी भस्मासुर उत्पन्न हुआ। अब वस्तुतः तो समस्त शिव ही शिव है, आत्मा ही आत्मा है, किंतु मन ( भस्मासुर ) को आत्मा ही की कृपा से यह शक्ति ( सत्ता ) प्राप्त है कि जहाँ हाथ डाले, राख बना दे। तुम्हारी आँख के सामने क्या है ? आत्मा ( शिव )। मन ( भस्मासुर ) ने वहाँ छाया डाली तो वृक्ष दृष्टिगोचर होने लगा। आत्मा (शिव) क्या भस्म हो गया ! नहीं, भाग गया। दाहिनी ओर क्या है ? आत्मा ( शिव )। मन (भस्मासुर) ने छाया डाली, दीवाल दिखाई देने लगी। आत्मा (शिव) अंतर्धान। किंतु आत्मा ( शिव ) मरा किसी प्रकार से,
नहीं ; क्योंकि वृक्ष और दीवार के नाम रूप में भी सत्-चित्- आनंद रूप से वह झलक मार रहा है। तुम्हारे शिर की ओर क्या है ? आत्मा ( शिव )। मन ( भस्मासुर ) ने छाया डाली। चंद्रमा दिखाई पड़ने लगा ; आत्मा विलीन। बाज़ार विचरण को जाओ। चारों ओर क्या है ? आत्मा ही आत्मा।
किंतु मन-भस्मासुर हाथ फेरता जाता है, सुर्दा मैटर ही मैटर ( माया, नामरूप ) दिखाई पड़ता है। आत्मा भागा हुआ।
बचपन से लेकर बुढ़ापे तक चाहे स्वप्नावस्था में, चाहे जाग्रतावस्था में जो कुछ देखा सुना या किया कराया केवल आत्मा ही आत्मा है, किंतु मन ( भस्मासुर ) ने आत्मा न देखा।
संस्कृत-ज्योतिष-शास्त्रवालों के यहाँ एक ही सूर्य भिन्न-भिन्न राशियों में भिन्न-भिन्न नाम पाता है। वैसे ही एक आत्मा जो कारण-शरीर ( अज्ञान, सुषुप्ति ) पर प्रकाशमान होने के विचार से शिव कहलाता है, जाग्रत् अवस्था पर प्रकाशमान होने के विचार से विष्णु नाम से अभिहित होता है। मन-भस्मासुर का अंत करने के लिये जाग्रतावस्था में सतोगुण की अधिकता के समय यही आत्मा ( विष्णु ) मोहनी-अवतार से अनहद-ध्वनि सुनाना आरंभ करता है अर्थात् श्रुति ( उपनिषद ) रूपी मोहनी- अवतार मन-भस्मासुर को विह्वल बनाता है, अपने साथ-साथ नाच नचाता है, कई प्रकार के आरंभिक वाक्यों से बहलाता-बहलाता अन्त में शिर पर हाथ धरता है, अर्थात् "तत्त्वमसि", "अहं ब्रह्मास्मि"। इस अवसर पर भस्मासुर भी अपने शिर पर हाथ धरता है "अहं ब्रह्मास्मि"।
यह ब्रह्माकार वृत्ति मन-भस्मासुर का नाश करती है और शिव ही शिव, एक शिव ही शिव शेष रह जाता है।
टूटी ग्रन्थि अविद्या नाशी, ठाकुर सत्य नाम अविनाशी। लै मुझमें सब गंवाएँ बाकी, वासुदेव सोऽहं कर झाकी॥
Then shall I be free When I shall cease to be.
अर्थ—जब मेरी परिच्छिन्नता दूर होगी तब मैं स्वतंत्र हूँगा।
( 2 ) भीतर और बाहर एक ही चेतन होने का सर्व-साधारण की समझ में आनेवाला प्रमाण :—एक व्यक्ति 'क' की गर्दन पर खुजलाहट हुई, अब उसी व्यक्ति का हाथ तो ठीक उचित स्थान पर आवश्यकता के अनुसार खुज- लाएगा, अन्य व्यक्ति 'ख' ठीक-ठीक रीति से वांछित समय पर कभी नहीं खुजला सकता। निस्संदेह पहले व्यक्ति 'क' के बतलाने और जतलाने से दूसरा मनुष्य 'ख' यदि किसी अंश में लामान्वित हो सके तो हो सके, पर अपने आप कोई सहायता नहीं कर सकता। किंतु प्रथम व्यक्ति 'क' के समझाने से सहायता पाना तो यही अर्थ रखता है कि वह व्यक्ति 'क' स्वयं अपनी सहायता कर रहा है। दूसरा व्यक्ति 'ख' तो एक प्रकार वस 'क' के औज़ार या हाथ का काम दे रहा है।
अतः जैसे गर्दन ( अर्थात् आवश्यकता को अनुभव करनेवाला ) और हाथ ( अर्थात् आवश्यकता को दूर करने- वाला ) इन दोनों का अधिष्ठान चेतन एक ही है ( चाहे मनुष्य सोया पड़ा हो, इधर मुँह पर मक्खी बैठनी है, उधर हाथ अपने आप उसे उड़ाने के लिये उठ आता है।)
जैसे ही, ऐ प्यारे ! वह सत्ता ( चेतन ), जो ( तेरे ) इस एक शरीर के भीतर शासक है, वही सूर्य चन्द्र आदि समस्त सृष्टि की स्वामिनी है । सारी रात तुम निद्रा-भर सो लेते हो, उधर सवेरे के समय तुम्हारे इस शरीर के भीतर ज्योति की खुजली जान पड़ती है, इधर इस खुजली को दूर करने के लिये सूर्य हाथ की भाँति झट आ उपस्थित होता है । मेरे प्रियतम ! शंका और सन्देह मन से मिटा दो । जिस तुम्हारे सच्चे अपने आप का खुजली अनुभव करनेवाला यह शरीर है, उस ही तुम्हारे सच्चे अपने आप का सूर्यरूपी खुजलानेवाला हाथ है ।
मसारवी
आँ माहे मुश्तरीम्न वयाज़ार आमदा । ख़ुद रा ज़ि दस्ते-ख्वेश ख़रीदार आमदा ॥ 1 ॥ महबूब ग़ैना अस्त मुहिब्बे-जमाले-ख़ेश । मतलूबे-ख्वेश रास्त तलबगार आमदा ॥ 2 ॥ ज़द हल्क़ा दोश बर दरे-दिल यारे-मानवी । गुफ्तम कि कीस्त ? गुफ्त कि दरवाज़ कुन, तुई ॥ 3 ॥ नक़्क़ाश गश्ता नक़्शो-नगार अस्त ख़ेगुमाँ । मानी निहाँ शुद अस्त दरीं नक़्शे-मानवी ॥ 4 ॥
अर्थ—वह प्यारा ( प्रेमपात्र ) स्वयं बाज़ार में ख़रीदार होकर आया हुआ है और अपने हाथ से अपनी ही ख़रीदारी कर रहा है ॥ 1 ॥
अपने ही सौंदर्य का आसक्त वह ( प्रेमी ही ) स्वयं हो गया है और अपने प्राप्तव्य का स्वयं ही चाहनेवाला बन गया है ॥ 2 ॥
मेरे सुहृन्मित्र ने कल रात्रि को हृदय-द्वार पर कुंडी
खटखटाई । मैंने पूछा—कौन है ? उसने उत्तर दिया कि पट खोल, तू ही है ॥ 3 ॥
नक़्क़ाश ( ईश्वर ) ही निस्सन्देह यह चित्र हो गया है और इस चित्र के भीतर में असली चित्रकार स्वयं छिपा हुआ है ॥ 4 ॥
दोश आँ सनम बेगानावश बिगुज़श्त अज़ मन चूँ परी । कर्दम सलामश लेकिन ओ दादा जवाबे-सरसरी ॥ 1 ॥ गुफ्तम चरा बेगानअ ? गुफ्ता कि तू दीवानअ । मन कीस्तम तू कीस्ती, दर ख़ुद चरा मी नंगरी ॥ 2 ॥ तू अव्वली ओ आख़िरी, तू बातनी ओ ज़ाहिरी । तू क़ासिदी ओ मक़्सदी, तू नाज़िरी ओ मंज़री ॥ 3 ॥
अर्थ—कल रात को वह प्यारा अन्य की भाँति मेरे पास से परी की तरह निकल गया । मैंने उसको अभिवादन किया, किन्तु उसने सरसरी ( साधारण ) उत्तर दिया ॥ 1 ॥
मैंने कहा तू बेगाना ( अन्य ) क्यों बन गया ? उसने उत्तर दिया तू पागल हो गया है । मैं कौन हूँ, तू कौन है, यह अपने भीतर क्यों नहीं देखता है ?
तू ही आदि है तू ही अन्त है, तू ही बाहर है तू ही भीतर है, तू ही उपदेशक है तू ही उपदेश है और तू ही देखनेवाला और दर्शन-योग्य है ।
कौए की दोनों आँखों में एक ही मर्दमक होती है । बाई आँख से देखता है तो नेत्र इधर फेर लेता है, दाहिनी आँख से देखते समय उधर फेर लेता है । तुम ही सूर्य-रूपी दाहिनी आँख में प्रकाशमान हो, तुम ही मनुष्य-रूपी बाई आँख में आश्चर्य का तमाशा हो । डाइनैमो ( dynamo ) से जो शक्ति निकलती है, वही वृत्त पूरा करके उसमें लौट
आती है । इधर बालक जन्म लेता है, उधर बालिका जन्म लेती है, पुरुषों और स्त्रियों की संख्या समुदाय रूप से समान रहती है । जिन देशों में शीत अधिक होता है, उन देशों के पशुओं के शरीर गरम लोमसंकुल होते हैं, मानों लिहाफ़ और तोशक साथ ही लेकर उत्पन्न होते हैं ।
संसार की प्रत्येक घटना का अपने इर्द-गिर्द के ठीक उपयुक्त होना [ The fittest thing in the fittest place— जिसका नाम, चाहे ग़लत हो चाहे ठीक, डिज़ाइन (design) रखा गया है ] दृढ़ सिद्ध करता है कि खुजली और नख-रूपी समस्त सृष्टि में एक ही चेतन है । घटनाओं ( phenomena ) में वही चेतन विराजमान होता है, जो उनके इर्द-गिर्द ( circumstances ) में । सब एक ही एक का प्रादुर्भाव है । वह जो तेरा सच्चा अपना आप है, वही समस्त सृष्टि का आत्मा है । जो घटना अनुपयुक्त जान पड़ती है, जो बात अनुचित समझ में आती है, जो काम अशोभित प्रतीत होता है, वह केवल विज्ञान-शास्त्र का पर्याप्त ज्ञान न होने के कारण से है, घटनाओं की तह से अनजान होने के कारण से है, जानकारी की कमी के कारण से है । अन्यथा हे प्यारो ! प्रत्येक घटना, प्रत्येक काम, प्रत्येक बात, प्रत्येक पत्ता, प्रत्येक तारा सानों स्वर मिला हुआ गीत अलाप-अलापकर सुना रहा है कि सब का स्वरूप मेरा ही है, सब का आत्मा मेरा ही आत्मा है । एक, एक, एक ।
There is not the smallest orb which thou behold'st. But in his motion like an angel sings, Still quivering to the young eyed cherubin; (Merchant of Venice.)
अर्थ—छोटे से छोटा मंडल भी, जो तू देखता है, ऐसा नहीं है कि अपनी गति में देवदूत की भाँति न गाता हो और अभी तक एक प्रकाशमान नेत्रवाले देवदूत की तरह न थरथराता हो ।
ऐ मेरे प्राण ! यह एक छोटा सा शरीर है । इसको तू कहता है "मेरा है" । यदि तुझे इसके अंगों और नाड़ी-नसों का पूरा-पूरा तत्त्व ज्ञात हो तो भी तेरा है; और यदि तूने कालिज में इतनी शिक्षा नहीं पाई कि जिससे रंगों पट्टों आदि की समस्त गति और स्थिरता का यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो, तो इस अज्ञानता के होते हुए भी शरीर तेरा है । इसमें तुझे कुछ संशय नहीं । वैसे ही समस्त संसार, चाहे तुझे इसके प्रत्येक कुंज और ऊसरों का पता हो, तेरा है, और चाहे तुझे एक गाँव की भी पूरी-पूरी जानकारी न हो, तिस पर भी तेरा है । तेरे राजाधिराजेश्वर होने में कुछ भी संशय नहीं ।
नेस्त ग़ैर अज़ हस्तिए तो दर जहाँ मौजूद हेन्च । ख्वाह दर इनकार कोशो, ख्वाह दर इक़्रार बाश ॥
अर्थ—तेरे अस्तित्व के सिवाय संसार में कुछ भी विद्यमान नहीं है, चाहे तू इस बात को अंगीकार कर, चाहे न कर ।
यदि तुझे अपना प्रकाशस्वरूप दिखाई नहीं देता, तो भी तेरा है और यदि आरसी में दिखाई देता भी तेरा है । यदि स्वप्न में सुखकर और चित्ताकर्षक घटनायें उपस्थित हैं, तो तेरे विचार हैं और यदि महाभयावने रूप विद्यमान हैं, तो तेरी करतूत हैं । वैसे ही संसार में चाहे मनभावती घटनाएँ हों, चाहे विपत्तियाँ और आफ़तें हों, सब तेरी ही बनाई हुई हैं—
Joy ! Joy ! I triumph now ; no more I know. Myself as simply me I burn with love. The centre is within me ; and its wonder Lies as a circle everywhere about me. Joy! Joy! no mortal thought can fathom me. I am the merchant and the pearl atonce. Lo ! time and space lie crouching at my feet Joy! Joy! when I would revel in a rapture, I plung into myself and all things know.
अर्थ—आनंद ! आनंद !! मैंने अब विजय पाई है, अब मैं अपने आप को केवल एक परिच्छिन्न व्यक्ति ( अहंकार ) नहीं समझता । मेरे भीतर अब प्रेम की ज्वाला भड़क उठी है, विश्व केंद्र मेरे भीतर है और उसका विचित्र खेल वृत्त के समान सर्वत्र मेरे चहुँओर वर्तमान है । आनंद ! आनंद !! अब कोई मरणशील ( मानवी ) विचार मेरी तह को नहीं पहुँच सकता, मैं जौहरी और जवाहर दोनों एक साथ ही हूँ । देखो, देश-काल मेरे चरणों पर गिर रहे हैं । आनंद ! आनंद !! अब जब मैं समाधिस्थ दशा में मग्न होना चाहता हूँ, तो झट अपने भीतर गोता लगाता हूँ, अर्थात् अपनी वृत्ति को अपने भीतर लय कर देता हूँ और प्रत्येक वस्तु को जान लेता हूँ ( अर्थात् सर्वज्ञ हो जाता हूँ ) ।
गुफ्तमश ख्वाहम कि बीनम मर तुरा ऐ नाज़नीं । गुफ्त गर ख्वाही मरा बीनी, बरो ख़ुद रा बबीं ॥ गुफ्तमश वा तो निशस्तन आरज़ू दारम बसे । गुफ्त गर बाशद तुरा ईं आरज़ू वा ख़ुद, नशीं ॥
गुफ्तमश काँ नक़्शगोई वर मिसाले-नक़्शे-तो । गुफ्त ज़ाहिर शुद व नक़्शे-ख़्वेशतन नक़्श आफ़रीं ॥ गुफ्तमश गोई कि आदम जमए क़ुल्हे आलम अस्त । गुफ्त जमए आदम अस्त ओ जमए रब्बुल आलमीन ॥ गुफ्तमश हम मन तो अम, हम जुमला तो, ख़ेदीदो गुफ्त । बर तो ओ बर दीदनत बादा हज़ारा आफ़रीं ॥
अर्थ—मैंने उस ( यार ) को कहा कि मैं ऐ प्यारे ! तुझको देखना चाहता हूँ । उसने उत्तर दिया कि यदि तू मेरे देखने की कामना रखता है, तो जा अपने आपको देख ( जो तेरा वास्तविक स्वरूप है, वही मैं हूँ ) ॥ 1 ॥
मैंने उसको कहा कि ऐ प्यारे ! मैं तेरे पास बैठने की बहुत इच्छा रखता हूँ । उसने कहा, यदि तुझे यह इच्छा है तो तू जा अपने साथ बैठ ( मैं वही ही हूँ ) ॥ 2 ॥
मैंने उसको कहा कि ऐ प्यारे ! तू ऐसा रूप बता जो तेरे रूप के सदृश हो । उसने उत्तर दिया कि मेरे अपने चित्र ( रूप ) से असली चित्रकार स्वतः प्रकट हुआ है ॥ 3 ॥
मैंने उसको कहा कि क्या तू यह कहता है कि मनुष्य सारे संसार का समास है ? उसने उत्तर दिया कि संसार का समास तो क्या, वरन् संसारों के स्वामी ( सब लोगों के स्वामी ईश्वर परमात्मा ) का भी समास है ( अर्थात् ईश्वर के स्वरूप और गुणों का भंडार भी मनुष्य ही है ) ॥ 4 ॥
मैंने उसको कहा कि फिर मैं ही तू हूँ और सब कुछ भी तू है । तिसपर वह हँसा और बोला कि तुझ पर और तेरे ऐसे देखने पर हज़ार-हज़ार बेर बलिहार ।
यदि यह शरीर सुंदर है तो उसे देख देख तू प्रसन्न होता है, हर्ष से प्रफुल्ल हो जाता है । यदि यह काला है, तो
ऐ कृष्ण ! तू इस काले-भोंतले ही को "मेरा" होने के कारण सुंदर निश्चय करता है—
काला हरना जंगल त्यागना ओह भी छलबल ख़ूब करे । काला हस्ती रहे फ़ौजन में, फ़ौजन का शृंगार करे ॥ काला बादर लरजे गरजे, जहाँ पड़े, तहाँ छल करे । काला खाँडा रहे मियाँ में जहाँ पड़े दो टूक करे ॥ काली ढार मर्द के कंधे जहाँ लड़े तहाँ ओट करे । काला नाग बाँबी का राजा जिसका काटा तुरत मरे ॥ काला डोल कुएँ के अन्दर जिसका पानी शांत करे । काली भैंस बजर का बट, दूध शक्ति बल अधिक करे ॥ काला तवा रसोई भीतर स्वाकर रोटी ख़लक जिए । काली कोकिल कूहे कूके जिसका शब्द तन मन हरे ॥ काला है तेरे नैनन सुरमा, तू काले का नाम धरे ? काला है तेरे नैनन तारा, तू काले का नाम धरे ? काले तेरे बाल साँप से, तू काले का नाम धरे ?
गोरी री तुम गोरम गोरी; बात करे गुरु ज्ञान की चेरी । दाँत दामिनी चमक दमक में; नैन बने जानो आम की कैरी । इतना गुमान कहा करे राधा, खोल घूँघट सुख देखन दे री ।
जानां—हा लिवासे बशरी में बख़ुदा नूरे-ख़ुदा; सुनते भी हाँ कुछ ? आरिफ़ तुम्हें क्या कहते हैं ?
हमसे खुल जाओ बख़ल्क़ते भजन भक्ती एक दिन । वरना हम छेड़ेंगे रखकर उज़्रे मस्ती एक दिन ॥
माधुरी छवि से परदा दूर करो । हठ अब छोड़ो । बहुत इनकार अच्छा नहीं । मान जाओ । समस्त सृष्टि का आत्मा तुम ही हो । तुम्हें ने—
मुसद्दस ( ताल बड़हंस )
कहीं कैवाँ सितारा होके अपना नूर चमकाया । ज़ोहल में जा कहीं चमका, कहीं मरीख़ में आया ॥ कहीं सूरज हो क्या क्या तेज़ जलवा आप दिखलाया । कहीं हो चाँद चमका औ कहीं ख़ुद बन गया साया ॥ तूही बातिन में पिनहाँ है, तू ज़ाहिर हर मकाँ पर है । तू मुनियों के मनों में है, तू रिंदों की ज़ुबाँ पर है ॥ 1 ॥ तेरा ही हुक्म है इन्दर जो बरसाता है यह पानी । हवा अठखेलियाँ करती है तेरे ज़ेर निगरानी ॥ तजल्ली आतिशे-सोज़ाँ में तेरी ही है नूरानी । पड़ा फिरता है मारा-मारा, डर से मर्गे-हैवानी ॥ तूही बातिन में पिनहाँ है तू ज़ाहिर हर मकाँ पर है । तू मुनियों के मनों में है, तू रिंदों की ज़ुबाँ पर है ॥ 2 ॥ तूही आँखों में नूरे मरदमक हो आप चमका है । तूही हो अक़्ल का जौहर सभों में सब के दमका है ॥ तेरे ही नूर का जलवा है क़तरे में जो नम का है । तू शैनक़्क़ हर चमन की है, तू दिलबर जामे-जम का है ॥ तूही बातिन में पिनहाँ है, तू ज़ाहिर हर मकाँ पर है । तू मुनियों के मनों में है, तू मस्तों की ज़ुबाँ पर है ॥ 3 ॥ कहीं ताऊसे-ज़री बाल बनकर रक़्स करता है । दिखाकर नाच अपना मोरनी पर आप मरता है ॥ कहीं हो फ़ाख़्ता कू कू की-सी आवाज़ करता है । कहीं घुनघुन है ख़द है बाग़वाँ फिर उससे डरता है ॥ तू ही बातिन में पिनहाँ है, तू ज़ाहिर हर मकाँ पर है । तू मुनियों के मनों में है तू रिंदों की ज़ुबाँ पर है ॥ 4 ॥
कहीं शाही बना शाह पर, कहीं शिकरा है मस्ताना । शिकारी आप बनता है, कहीं है आब और दाना ॥ लटक से चाल चलता है कहीं माशूक़े जानाना । सनम तू ब्राह्मण नाक़ूस तू, ख़ुद तू है बुतख़ाना ॥ तू ही बातिन में पिनहाँ है, तू ज़ाहिर हर मकाँ पर है । तू मुनियों के मनों में है, तू रिंदों की ज़ुबाँ पर है ॥ 5 ॥ तू ही याक़ूत में रौशन, तू ही पुखराज औ दुर में । तू ही लाले बदख़शाँ में, तूही है ख़ुद समुंदर में ॥ तू ही कुहसारो-दरिया में, तूही दीवार में दर में । तू ही सहरा में आबादी में तेरा नूर नैयर में ॥ तू ही बातिन में पिनहाँ है, तू ज़ाहिर हर मकाँ पर है । तू मुनियों के मनों में है, तू रिंदों की ज़ुबाँ पर है ॥ 6 ॥ ( बज़्ल-उल-विष्णु )
प्यारे ! तुम्हारा क्या अधिकार है अपने आपको एक शरीर की अहंता ( ममता ) में पड़ा गलाने का ! तुम्हें क्य उचित है आत्महत्या करना ? समस्त देश-काल तुम्हारा ही शरीर है, तुम ही हो । जिधर दृष्टि डालो, तुम्हारी ही शान है । यदि दुनिया बुरी ( काली ) है, तो तुम हो; यदि भली ( गोरी ) है, तो तुम हो, सब तुम्हारा ही जलाल है । चाहे कोई तारे गिन सके, चाहे कोई सिर के बाल भी न गिन सके, किन्तु हो सब तुम ही तुम । यह भी तुम और वह भी तुम । चाहे कहीं ऐसी कला का आविष्कार हो जाय, जिससे सूर्य तक पहुँचना संभव हो, चाहे आँख के तारे को भी देखना नसीब न हो सके, किन्तु हो सब तुम ही तुम, यह भी तुम और वह भी तुम । चाहे तुमको प्रत्येक पत्ते और पुष्प की बनावट से पूरी-पूरी
जानकारी हो जाय, चाहे तुमको सूक्ष्म-शरीरी मनुष्य का भी पता न लगे, किन्तु हो सब तुम ही तुम ।
कोई-कोई मन ( heart ) को इन्द्रियों का राजा बताते हैं और कोई मस्तिष्क को सम्राट् का नाम देते हैं । कोई आकाश को घूमता मानते थे, कोई भूमि को घूमता सिद्ध कर बैठे; किंतु चाहे यों हो चाहे वों हो, बुद्धि इधर चक्कर खाती हुई जाय, चाहे उधर घबराती हुई फिरे; ( बचपन और सुषुप्ति में ) कुछ विवेक और समझ न हो या ( जाग्रत् में ) भूमि और आकाश के क़ुलाबे मिलाए जायँ, तुम्हारे पवित्र स्वरूप सदा एकरस, क्यों कब के प्रश्न से मुक्त, अविनाशी, निर्विकार, त्रिगुणातीत हैं ।
Spirit, Infinite, Eternal, Unchangeable in its Being, Wisdom, Power, Holiness, Justice Goodness and Truth.
अर्थात्—आत्मा अपने स्वरूप में अपरिच्छिन्न, अनादि, अपरिवर्तनशील, ज्ञानस्वरूप, शक्तिस्वरूप, पवित्रस्वरूप, न्यायस्वरूप कल्याणस्वरूप और सत्यस्वरूप है ।
ख्वाह फिरता है फ़लक और ख्वाह फिरती है ज़मीं; दख़ल मेरी ज़ात में हरगिज़ तग़ैयुर को नहीं ।
यदि विज्ञान में कोई नई बात मिली है तो वह तेरे ही प्रकाशस्वरूप के किसी तिल ( ख़ाल ) का पता लगा है, तेरी ही कान्ति स्पष्ट हुई है, तेरा ही सौंदर्य प्रकट ( विद्यमान ) हुआ है ।
तत्त्ववेत्तागण भूत-काल में एक दूसरे से बाज़ी बाँध-बाँधकर अद्वैत सिद्धांत को सिद्ध करते रहे और भविष्य-काल में तत्त्ववेत्ता लोग अद्वैत का मिथ्या करते-करते पागल हो जायँगे । तत्त्वज्ञान के सहस्रों परिवर्तन हो चुके और लाखों आयँगे । रीतियों के सैंकड़ों जन दव चुके और
भविष्य में हज़ारों अपने-अपने अवसर पर हरे-भरे होकर आज दिन पत्थर के कोयलों की खानें बन जायँगे । असंख्य साम्राज्य धरती-तल पर हो गए और करोड़ों अपने-अपने समय पर बहार दिखाकर फिर तबाह हो जायँगे । पीछे बुद्धि के तोते उड़ते आए और आगे को होश उड़ते रहेंगे । चाहे तत्त्वज्ञान इसको सिद्ध करने में सफलीभूत हो सके, चाहे बेहोश होकर गिर पड़े, किंतु एकमात्र सत्यात्मा, अपरिवर्तनशील, ज्ञानस्वरूप, आनंदस्वरूप मेरा पवित्र-स्वरूप ज्यों का त्यों चला आया है और रहेगा—
मुद्दते शुद कि मी रसद अज़ ग़ैब । लहज़ा लहज़ा वगोशे होश ख़िताब ॥ कि जुज़ो-नेस्त दर सराय वुजूद । ग़ैरे-हक़ीक़त कसे दिगर मौजूद ॥
अर्थ—बहुत समय हुआ कि अंतरिक्ष से प्रतिक्षण अंतःकरण में यह ध्वनि सुनाई देती रहती है कि उसके सिवाय इस अस्तित्व की सराय में वस्तुतः और कोई उपस्थित नहीं है ।
सीन समा सब से सिर भारू कोई न रहसी आकी जे । उदय अस्त लों राज जिन्हाँ दा, सो भी रलसन खाकी जे ॥ काल-कला ते बचत न कोई ब्रह्मा विष्णु पिनाकी जे । एक आनँदराशी अज अविनाशी हम रह जाना बाकी जे ॥
'अल्हक़्क़ वजूदु मुत्लक़ु व मा सिवाहु ख़याल़ुमुज़ख़्ज़ुफ़ा तिलु'
अर्थ—ईश्वर एक सत्यस्वरूप है, इसके अतिरिक्त विचार करना केवल परिहास और मिथ्या है ।
यदि देखने में अत्यन्त निकृष्ट ( भोंडा ), तीक्ष्ण-स्वभाव, काला भौंराला व्यक्ति है, तो वह तुम्हारा ही अपना आप है । इस तथ्य से तुम मुक्त नहीं ।
अतः घृणा कैसी ? और यदि कोई सुंदर स्वरूप, शुक्र-समान सृष्टि की शोभा और अति विलास-भरी अप्सरावत् है, तो तुम्हारा ही अपना आप है । वह स्वयं तुम्हीं हो तुम्हीं हो, फिर आसक्ति ( प्रणय ) किससे ? मोह क्यों ? तुम्हारी ज्ञानेंद्रियाँ जो उसे अलग दिखाती हैं, सरासर झूठ बोलनेवाली हैं । इनका विश्वास मत करो । तुम सब शरीरों की जान हो । सब तुम हो, सब तुम हो ।
Space nud Time! now I see it is true, what I guessed at What I guessed when I loaf'd on the grass, What I guessed while I lay alone in my bed, And again as I walk'd the beach under the paling stars of the morning.
Where the panther walks to and fro on a limb overhead, where the buck turns furiously on the hunter, Where the rattle-snake suns his flabby length on a rock, where the otter is feeding on fish, Over the growing sugar, over the yellow-flowered cotton plant, over the rice in its low moist field
Scaling mountains, putting myself cautiously up, holding on by low, scragged limbs, Where the quail is whistling betwixt the woods and the wheat-lot. Where the brook puts out the roots of the old tree and flows to the meadow, Under Niagra, the cataract falling like a veil over my countenance, At the festivals, with black gaurd gibes, ironical license, bull dances, drinking, laughter,
At apple-peelings wanting kisses for all the red fruits I find,
Where the burial coaches enter the arched gates of a cemetary Where the splash of swimmers and divers cools the warm noon, Throught the gymnasium, through the curtain'd Saloon, through the office or public hall; Pleas'd with the native, and pleas'd with the foreign, pleas'd with the new and old,
Wandering the same afternoon, with my face turn'd up to the clouds, or down a lane or along the beach, My right and left arms round the sides of two friends and I in the middle. By the cot in the hospital, reaching lemonade to a feverish patient.
Speeding amid the seven satellites and the broad ring, and the diameter of eighty thousand miles, Speeding with toil'd meteors, throwingfire balls like the rest, Carrying the crescent child that carries its own full mother in its belly. Storming, enjoying, planning, loving, cautioning, Backing and filling, appearing and disappearing, I tread day and nights such roads. I fly those flights of a fluid and swallowing soul, My course runs below the soundings of plummets (Whalt Whitman)
अर्थ—ऐ देश-काल ! जो कुछ मैंने कल्पना किया था, उसे अब मैं सच निकाला देखता हूँ—अर्थात् जो अनुमान कि घास पर फिरते हुए या अकेले अपने बिस्तरे पर लेटे
हुए या प्रातःकाल ओझल होते हुए तारों के नीचे, तट पर वायु, सेवन करते हुए मैंने ( अपने मन में ) किये थे, वह सब के सब सच निकले ।
जहाँ कि चीता अपने सिर के बल इधर-उधर वायु-सेवन करता है, जहाँ बारासिंगा तुंदी से शिकारी पर उलटा आक्रमण करता है, जहाँ फुंकारें मारनेवाला साँप एक चट्टान पर धूप में लेटता है, जहाँ उदबिलाव मछलियों को गटक कर रहा है, उगते हुए गन्नों पर, पीले फूलवाले कपास के पौदे पर, ढालू और गीले धान के खेतों में
पहाड़ों पर यत्न से अपने छोटे दुबले बाहुओं से पकड़-पकड़कर चढ़ते हुए जहाँ बटेर जंगलों और खेतों के बीच में सीटी बजाता है, जहाँ सोता ( नाला ) पुराने वृक्ष की जड़ों को उलाड़ता है और चरागाह की ओर बहता है, जहाँ 'नयाग्रा' के तले झरना इस प्रकार गिरता है जैसे मेरे मुखमंडल पर परदा; उन मेलों में जहाँ बदमाश ताने मारते हैं, जहाँ फब्तियाँ और व्यंग्य पर्ण कूट वाक्य खुले तौर पर उड़ते हैं, जहाँ साँडों का नाच होता है; मदिरा का खूब पान होता है, हँसी-ठठोली होती है; सेव छीलते हुए लोग उन सब लाल फलों का चुंबन चाहते हैं जो मुझे मिलते हैं ।
जहाँ कि समाधिस्थान के महराबदार दरवाज़े में शव-वाली गाड़ियाँ प्रविष्ट होती हैं, जहाँ तैराकों और गोताखोरों के नहाने की छींटों से दोपहर ठंडी हो जाती है, जमनास्टिक या व्यायाम के स्थान में से, परदेदार चौड़े कमरे में से, दफ्तर या पब्लिक हाल में से, देशी और परदेशी नए
और पुराने दोनों से प्रसन्न होते हुए ··· ··· ··· ··· ··· ··· ··· उसी तीसरे प्रहर को बादलों की ओर ऊपर मुंह करते, कभी कूचे के नीचे ( दक्षिण की ओर ) और कभी समुद्र के किनारे किनारे आवारा फिरते हुए, मेरे दहिने और बाएँ बाहु दो मित्रों की जंघाओं के चहुँओर (अर्थात् मित्रों को अपने पार्श्व में लिए हुए) और मैं उनके बीच में होकर; हस्पताल में उग्र-पीड़ित रोगों की चारपाई के निकट लेमोनेड पहुँचाते हुए
··· ··· ··· ··· ··· ··· सातों नक्षत्रों, चौदे वृत्त में से और अस्सी हज़ार मीलों के व्यास में से तेज़ गमन करते हुए, पुच्छल तारों के साथ जो अवशिष्ट तारों की भाँति आग के गोले फेंकते हैं, तेज़ जाते हुए, उस नए चाँद जैसे बच्चे को ले जाते हुए जो अपनी माता को पूरा-पूरा अपने साथ पेट में लिए हुए होता है, गुल-शोर मचाते हुए, आनंद मनाते हुए, तजबीज़ें करते हुए, [unclear] करते हुए, बचाव करते हुए, आश्रय देते हुए, पूर्ण पूरा करते हुए, प्रकट और परोक्ष होते हुए, मैं रात दिन ऐसे रास्तों में चलता हूँ ( या ऐसे मार्ग से करता हूँ ) । मैं एक द्रव और द्रवी हुई आत्मा की उड़ान उड़ता हूँ ( अर्थात् जैसे एक द्रव तत्काल गर्मी से उड़ जाता है और उड़ता दिखाई नहीं देता, जैसे एक द्रवी हुई आत्मा शरीर से मृत्यु समय उड़ जाती है, मगर उड़ती दिखाई नहीं देती, ऐसे ही मैं भी उड़ता फिरता हूँ ) । मेरा मार्ग पलमट ( भूमि का आकर्षण जाँचने का यंत्र ) की आवाज़ों से भी नीचे जाता है (अर्थात् मेरा चलने का मार्ग इतना दूर और गहरा है कि कोई थाह ही नहीं लगा सकता और न कोई यंत्र बता सकता है ) । ( वहाल्ट विहटमैन )
तजल्ली हास्त हक़ रा दर नक़्शे-ज़ाते-इन्सानी । शह्दे-ग़ैव गर रुचाही व खूब है जास्त इमकानी ॥1॥ हिजाबे-जलवा हम यकसर हुज़ूमे-जलवा हस्त हैं जा । नक़्शे-नेस्त दरिया रा मगर तूफ़ाने-उरयानी ॥2॥ कमाले-खुद शिनासी शुद दलीले-कुदरते आरिफ़ । तू गर है रम्ज़ वशनासी तू नीज़ पे वेखबर आनी ॥3॥ चमन रा शोख़ी अज़ नाज़त फ़लक हा पर्दए-साज़त । दो आलम महव अंदाज़त व फ़ह्म पे ख़तरा नादानी ॥4॥
अर्थ—मानुषी स्वरूप के पर्दे में ईश्वरीय तेज निहित है । यदि तू उस अव्यक्त की साक्षी चांहता है ( अर्थात् यदि तू उस छिपे हुए स्वरूप का अनुभव करना चाहता है ) तो यहाँ ही उसका अनुभव होना संभव है ।
यहाँ तेज का समूह ( पुंज ) ही तेज-स्वरूप का पर्दा बना हुआ है ( अर्थात् प्रकाश की अधिकता ने ही प्रकाश के स्रोत को छिपा रखा है ) । जैसे नदी को कोई पर्दा छिपाए हुए नहीं है, सिवाय नंगेपन के तूफ़ान के ॥ 2 ॥
ज्ञानी की तर्क-शक्ति उसके स्वरूप-ज्ञान ( उसके नंगा होने ) का कमाल है । तू यदि इस भेद को जान ले, तो पे भूले हुए ! तू भी वही हो जाय ॥ 3 ॥
बाग़ का शोख़ी तेरे ही नाज़ ( हाव-भाव ) के कारण है और आकाश तेरे ही वाजे के पर्दे हैं, ऐ ना समझी के बिंदु ( ऐ भोले पुरुष ) ! तू समझ कि दोनों लोक तेरे ही नज़रे पर लट्टू हो गए हैं ( या मिट गए हैं ) ।
प्रश्न—सर्व खल्विदं ब्रह्म ।
अर्थ—हरचे आयद दर नज़र अज़ खैरो-शर; जुमला ज़ाते-हक़ धुवद पे बेखबर !
अर्थात् ऐ बेखबर, जो कुछ भलाई और बुराई दृष्टि- गोचर होती है वह सब ईश्वर का स्वरूप है ।—
"वन तृण पर्वत है पद्वक्ष"
एक ही चेतन प्रत्येक वस्तु में, बिना ह्रास और वृद्धि के, ज्यों का त्यों विद्यमान है ।
व नामे अं कि ओ नामे नदारद । वहर नामे कि ख्वानी सर बरआयद ॥
अर्थ—यद्यपि वह कोई नाम नहीं रखता, फिर भी जिस नाम से तू उसको बुलाए, तो वह सिर निकालता है ( प्रकट हो जाता है ) ।
इनकी, संक्षेप में, तनिक व्याख्या कर दो ।
उत्तर—पहले यह स्वल्प रूप से वर्णित हो चुका है कि— तदंतरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य वाह्यतः । ( ईशा॰ उप॰ ) अर्थात् एक ही चेतन ( आत्मा ) सब के भीतर है और वही चेतन सब के बाहर है । और यह चेतन मेरा वास्तविक अपना आप है । जैसे स्वप्न में एक ही पुरुष पदार्थ ( object ) बन जाता है और इधर देखनेवाला ( subject ) बन जाता है, वैसे ही जाग्रत् में भी यही चेतन उधर ऐक्शन ( क्रिया ) बनकर आता है और इधर रि-ऐक्शन ( प्रति-क्रिया ) बनता है । यही चेतन ऐक्शन और रि-ऐक्शन के द्वारा विविध प्रकार के नाम-रूपों में दृश्यमान होता है । इस एक ही चेतन के बाहरी में द्वैतपन पर संसार का दृश्य निर्भर है । एक हाथ इधर से आया, एक उधर से आया; ताली बजी; किंतु दोनों हाथ एक ही पुरुष के थे । वैसे दोनों ओर चेतन एक ही है ।
गंगा की एक लहर इधर से आई, दूसरी उधर से आई । दोनों के टकराने से फेन और बुलबुले आदि उत्पन्न हो गए । किंतु दोनों लहरें एक ही गंगा की हैं । वैसे ही संसार-रूपी फेन बुलबुले दिखाई देने में ऐक्शन ( क्रिया ) और रि-ऐक्शन ( प्रति-क्रिया ) रूपी लहरों का स्रोत एक ही चेतन है ।
माया
संध्या
गंगा की ठंडी छाती से आती है खुश हवा । है भीने-भीने बाग़ का साँस इसमें मिल रहा ॥ गंगा के राम-रोम में रचने लगा वह बहर । आया जुवार ज़ोर का लहरों पै लेके लहर ॥ देखो तो कैले शौक़ से आते जहाज़ हैं । मारे खुशी के सीटी बजाते जहाज़ हैं ॥ शादी ज़मी की प लो ! फ़लक से हुई-हुई । वह सायबाँ तनात है जब ही तनी हुई ॥ दुल्हा के सिर पै तारों का सेहरा खिला-खिला । दुल्हिन के वक्षे-दिल ने चिराग़ाँ खिला दिया ॥
[ स्थान—ईडन गार्डेन, कलकत्ता ]
है क्या सुहाना बाग़ में मैदाने-दिलकुशा । और हाशिया है बेंचों का सब्ज़ा पै वाह वाँ ॥ मजमा हुजूम लोगों का भरकर लगा है यह । मैदान आदमी से लबालब भरा है यह ॥ बेंचों पै बाज़ बैठे हैं, अक्सर हैं खुश खड़े । वाँके जवान बाग़ में हैं टहलते पड़े ॥
मैदाँ के पार सड़क पै है बग्गियों की भीड़ । घोड़ों की सरकशी है लगामों की दे न पीड़ ॥ शौक़ीन कलकत्ता के हैं मौजूद सब यहाँ । हर रंग ढंग वज़ा के मिलते हैं अब यहाँ ॥
काम हम सब को देखते हैं, यह देखते कहाँ ? आँखें तनी हुई हैं, यह क्या पीर क्या जवाँ ॥ मर्कज़ है सब निगाहों का उजला चबूतरा । खुश बंद वाज़ा गोरों का जिस्में है वज्र रहा ॥ गाते फुला-फुला के हैं वह गालें गोरयाँ । क्या रोशनी में सुर्ख़ दमकती हैं कुर्तियाँ ॥ ऐ लोगो ! तुमको क्या है जो हिलते ज़रा नहीं । क्या तुमने लाल कुर्तों को देखा कभी नहीं ?
पर्दा इसरार इसमें क्या है, करो गौर तो सही । इस टिकटिकी में क्या है, करो गौर तो सही ॥ गोरों की कुर्तियों को हैं गो तक रहे ज़रूर । लेकिन नज़र से कुर्तियाँ गोरे तो सब हैं दूर ॥ लहरा रहा है पर्दा-सा सब को निगाह पर । इस पर्दा से पिरोई है हर एक की नज़र ॥ यह पर्दा तन रहा है अजब ठाठ-बाट का । जिसमें ज़िमीं ज़माँओ-मकाँ है समा रहा ॥ पर्दा है बिला छेद कि सीवन कहीं नहीं । लेकिन मुटाई पूछो तो असला नहीं नहीं ॥ पर्दा सितम है सहर के नक्शो-निगार हैं । हर आँख के लिये याँ अलहदा ही कार हैं ॥
सब सामईं के सामने पर्दा है यह पड़ा । हर एक की निगाह में नक़्शा बना दिया ॥ पर्दों से राग के है यह पर्दा अजब पड़ा । गंधर्व-नगर का है कि मेराज का मज़ा ॥ जादू है, हिप्नोटिज़्म है, पर्दा सुराव है । क्या सच है, रंग-ढंग ये सब नक़्शे-आब है ? रमिए तो यार पर्दे में, देखें तो कैफ़ियत । आँखें सिली हैं पर्दे से क्यों ? क्या है माहियत ? दीदों में और रंगों में क्या है सुनासिवत ? * * * * * * लाठी है ह्वाए-दहर, पानी बन जाओ । मौजों की तरह लड़ो, मगर एक ही रहो ॥ साथ है सूरज के सूरत आफ़री । नक़्श पर नक़्श शैदा हो गया ॥
प्राकृतिक प्रमाण—मैं साक्षी चेतन हूँ, यह सिद्धांत है जिसका खंडन नहीं हो सकता किंतु अपने आपको केवल साक्षी मात्र, निःसंबंध, नपुंसक ठहराना संतोष नहीं लाता—निर्जन एकांत की भाँति अप्रिय प्रतीत होता है । इससे सिद्ध होता है कि हमारी प्रकृति इस बात की सवादार नहीं कि अपने आपको केवल ऐक्शन ( क्रिया ) या केवल रि-ऐक्शन ( प्रति-क्रिया ) का स्रोत मानने पर इतिश्री की जाय । जब तक अनुभव स्वरूप के साथ एकता न होगी, चित्त को चैन नहीं पड़ने की । अब ज़रा और विचार कीजिए !
गुलाब का फूल सामने रखा है, इसकी रंगत इसका एक गुण है;
यह गुण देखनेवाले ( subject ) की ओर से रि-ऐक्शन ( प्रति-क्रिया ) का परिणाम है । जैसे आरसी में पान खाई हुई प्रिया के ओष्ठ प्रिया के आरसी देखने का परिणाम है ।
फूल की गंध उसका एक गुण है । यह भी देखनेवाले ( subject ) की ओर से रि-ऐक्शन का परिणाम है ।
फूल की कोमलता भी एक गुण है, जो देखनेवाले के रि-ऐक्शन का परिणाम है । फूल का रूप भी एक गुण है, जो देखनेवाले के रि-ऐक्शन का परिणाम है । निदान फूल के समस्त गुण ( नाम-रूप ) देखनेवाले की ओर से रि-ऐक्शन ( प्रति-क्रिया ) होने के पश्चात् प्रतीत होते हैं । अब खुब सोच-विचारकर बताइए कि "फूल केवल इन गुणों के समुच्चय को ही कहते हैं, अथवा फूल में कुछ और भी तत्व है ?"
प्रत्यक्ष में तो यही ज्ञात होता है कि यदि फूल की रंगत, गंध, आकार, कोमलता, स्वाद, परिमाण इत्यादि ( नाम-रूप ) गुणों का ख़याल मन से दूर कर दिया जाय, तो कुछ भी शेष न रहेगा; शून्य ही हाथ आएगा । आरंभ में तो यही अनुमान घेर लेता है कि पुष्प केवल गुणों के पुंज का ही नाम है; किंतु वेदांत यह कहता है कि प्यारे ! फूल के समस्त गुण तो निःसंदेह तुमने एक प्रकार अपने भीतर से उगले हैं, और फूल, फूल की दृष्टि से, तेरे रि-ऐक्शन ( प्रति-क्रिया ) के दिए हुए गुणों का ऋणी है । किंतु जिसको तू फूल मान रहा है, उसने फूल की दृष्टि से प्रतीत होने से पहले तेरी नासिका पर प्रभाव डाला, तेरी आँख पर काम किया, तेरी घ्राणेंद्रिय पर ऐक्शन किया, तेरी रसना-इंद्रिय पर प्रभाव डालने की योग्यता
दिल में । बुरे स्वभाववाले पुरुष में भी, जो शोक करता रहता है, वैसी ही पूर्ण और भरपूर है जैसे कि एक मग्न ( आनंदित ) देवदूत में जो प्रार्थना और उपासना करता रहता और ( प्रेम में ) जलता रहता है । उस (पूर्ण सत्ता) की दृष्टि में न कोई उत्तम है न अधम; न बड़ा है न छोटा । वह सब को पूर्ण करती है, सीमाबद्ध करती ( या स्वयं उछलती और भड़कती है ), सब को मिलाती ( जोड़ती ) है और सब को एक समान करती है । ( अलक्ज़ेन्डर पोप )
उक्त तथ्य को हम इस प्रकार निरूपण करेंगे— फूल = गुण ( = फूल ) + अ
[ गुण (= फूल ) भेद से तात्पर्य है वह गुण जिनकी बदौलत 'फूल' नाम दिया जाता है और अ से प्रयोजन है चेतन, जो गुणों से परे है । ]
यह आम का फल दृष्टिगोचर हो रहा है । यह गुलाब के फूल से क्यों भिन्न है ?
अपने गुणों के कारण । फल के गुण और हैं और फूल के और । फूल सूँघने की वस्तु है, फल खाने या चूसने की । रंगत में, आकृति में, नाम में, सूक्ष्मता या स्थूलता में, प्रभावों में और प्रयोग में पृथकता है । इसलिये फल और फूल दोनों एक ही नहीं कहला सकते । संक्षेप से यह कि भिन्नता ( पृथकता differentiation ) का कारण गुण ( नाम-रूपादि ) हैं जो कि अनुभव करनेवाले की ओर से रि-ऐक्शन का परिणाम हैं । क्या फूल की वास्त- विक सत्ता चेतन, ऐक्शन का कारण ( जो फूल के गुणों से परे है ), फल की वास्तविक सत्ता चेतन ऐक्शन के कारण से ( जो फूल के गुणों से पृथक् है ) भिन्नता नहीं रखती ?
वेदांत का यह उत्तर है कि फूल के वास्तविक स्वरूप और फल के वास्तविक स्वरूप में कोई अंतर नहीं है । जैसे अँगूठी और कंगन में भिन्नता केवल गुणों के कारण से है, अपने असली स्वरूप ( सोने ) में कुछ भी भेद नहीं है । अँगूठी अँगुली में पहनी जायगी, कंगन कलाई में पहना जायगा । दोनों की आकृतियाँ और बनावट आदि पृथक्- पृथक् हैं, किंतु हैं दोनों सोना एक ही । वैसे एक ही चेतन आत्मा ( अ ) गुलाब की असली सत्ता है और आम की भी वास्तविक सत्ता है । अतः वेदांत के मत से आम का समीकरण (Equation) उक्त निरूपणानुसार इस प्रकार होगा—
आम का फल = गुण ( = फल ) + अ
[ गुण ( = फल ) से तात्पर्य है वे गुण, जैसे मिठास, पीली रंगत आदि, जो इस फल को संसार की समस्त अन्य वस्तुओं से न्यारा कराते हैं । यह भी स्मरण रहे कि समस्त गुण अनुभवकर्ता के रि-ऐक्शन का परिणाम ही होते हैं । ]
यदि आम के फल की वास्तविक सत्ता ( अ ) को गुलाब के फूल की वास्तविक सत्ता से अभेद मानने में आपत्ति हो, तो लीजिए इसे अ से निरूपण नहीं करेंगे, अ¹ से इसका निरालापन जतलाएँगे । इस रूप में आम का समीकरण (Equation) निम्नानुसार होगा—
आम का फल = गुण ( = फल ) + अ¹ इसी प्रकार मिसरी को मिसरी ठहरानेवाले आरोपित गुणों ( गुण = म ) से परे जो मिसरी का स्वरूप है, उसे फूल और फल के स्वरूप से पृथक् अ² मानने पर मिसरी का समीकरण निम्नानुसार होगा—
मिसरी = गुण ( = म ) + अ² *
* नोट—गुणों के आरोपित होने के विषय में कुछ अक्षर लिख देना उचित है । मिसरी का ( सब से बड़ा गुण ) मीठापन खानेवाले की अवस्था पर निर्भर है । अतएव कुछ अवस्थाओं में मिसरी कड़वी लगती है । वह दर्पण जो मनुष्य के लिये स्वच्छ निर्मल है, च्यूँटी की आँख को गंदा ही गंदा दिखाई देता है । जहाँ मनुष्य के लिये पता लगाना असंभव होता है, गंधवाला कुत्ता भट शिकार को सूँघ लेता है । च्यूँटियाँ आने- वाली वर्षा को जान जाती हैं, अंडे छूह में लिए दौड़ती दिखाई देती हैं । किसी वस्तु की मोटाई और लम्बाई-चौड़ाई जिसे मनुष्य कुछ विचार करता है, हाथी की आँख उसे कुछ और ही ठानती है । मेंढक की आँख यह गवाही देती है कि पानी में तो सब वस्तुएँ साफ़-साफ़ होती हैं, पर पानी के बाहर सब पर धुँधलापन छा रहा है । जो वस्तुएँ साधारण मनुष्यों को सफ़ेद-सफ़ेद दिखाई देती हैं, कुछ अवस्थाओं में कुछ लोगों को पीली- पीली दिखाई देती हैं । माता-पिता को किवाड़े दीवार चारपाई ज्ञात होती है, किंतु नन्हा बच्चा कुछ भी अनुभव नहीं करता, चाहे उसकी आँखें खुली हों और जाग रहा हो । आँखों की बनावट यदि दूरदर्शक, दूरदर्शक केलाइडस्कोप ( Kaleidoscope ) या Look & Laugh ( "देखो और हँसो" खिलौना ) के नियम पर हो, तो संसार बिलकुल और का और हो जाय । कानों की बनावट में तनिक-सा परिवर्तन घनने का चित्र ही पलट दे । जहाँ कीड़े से बढ़ते-बढ़ते मनुष्य तक विकास हुआ है, तो क्या मालूम भविष्य में कोई ऐसा और विकास का चक्र आ जाय कि मनुष्यों के इंद्रिय और मस्तिष्क उलट-पलटकर नए रंग-ढंग अनुभव करने लगें । इन उदाहरणों ( दृष्टांतों ) से स्पष्ट होता है कि वस्तुओं के गुण वास्तविक नहीं होते, बरन् अनुभव करनेवाले पर अवलंबित होते हैं और उनकी प्रतीति सदा अनुभव करनेवाले के आश्रय है ।
विभिन्न पदार्थों में वास्तविक स्वरूप को विभिन्न मानने पर प्रत्येक पदार्थ के लिये एक नया समीकरण होगा—
भौंरा = गुण ( = भ ) + अ² सिंह = गुण ( = स ) + अ⁴ गंगा = गुण ( = ग ) + अ⁵ हिमालय = गुण ( = ह ) + अ⁶ लेखनी = गुण ( = ल ) + अ⁷
इस हिसाब से अ¹, अ², अ³, अ⁴, अ⁵ आदि से निरूपित चेतन असंख्य निश्चित होते हैं और विभिन्न मानने पड़ते हैं । किंतु चेतन को गुणों से परे स्वीकार कर चुके हैं ।
और यह बात निश्चित है कि भिन्नता का कारण केवल गुण होते हैं । गुणों ही की तुलना से भेद का पता लगता है । क्योंकि तुलना करना और वस्तुओं की भिन्नता को स्थिर या स्वीकार करना बुद्धि का काम है और बुद्धि की पहुँच गुणों से परे नहीं ।
अतः चेतन जो गुणों से परे है, भिन्नता और पृथकता की सीमा में नहीं, इसलिये चेतन विभिन्न नहीं हो सकते और जब चेतन में भिन्नता की गति नहीं तो असंख्य होना क्या अर्थ रखता है ?
किंतु उपर्युक्त कल्पना अ¹ अ², अ³, अ⁴, अ⁵ आदि से विविध शरीरों में विविध चेतन का होना पाया जाता है अर्थात् एक मिथ्या परिणाम तक पहुँचाती है, अतः उपर्युक्त
कल्पना मिथ्या है; अर्थात् आम के नाम-रूप ( गुणों ) में जो ( सत्, चित्, आनंद ) चेतन संसर्ग कर रहा है उसे अ से निरूपण करके फिर मिसरी के नाम-रूप ( गुणों ) में जो चेतन अ संसर्ग कर रहा है, उसे अ चेतन से विशिष्ट ठहराना और भौंरा ( अ² ) सिंह ( अ⁴ ) गंगा ( अ⁵ ) आदि में अलग-अलग चेतन मानना बिलकुल अनुचित है । एक ही चेतन गुलाब में, आम में, मिसरी में, भौंरा, सिंह, गंगा आदि में विद्यमान है; अ पर कल्पित चिह्न बनाना अनुचित है ।
अतः अ = अ¹ अ² अ³ अ⁴ अ⁵ ··· ··· ··· ··· सर्वं खल्विदं ब्रह्म । ( साम॰ छां॰ प्र॰ 3 खं॰ 14 मं॰ 1 ) एकस्तथा सर्वभूतांतरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च । ( यजु॰ कां॰ अ॰ वं॰ 5 अ॰ 1 मं॰ 6 )
अर्थ—यह सब ( नाम-रूप जगत् ) ब्रह्म ही है । जैसे अग्नि सब संसार में व्यापक होकर नाना रूप में प्रकट हो जाती है, वैसे ही एक आत्मा सब नाम-रूपों के भीतर व्यापक होता हुआ प्रत्येक नाम-रूप में होकर बाहर प्रकट हुआ है ।
एक ही गेली ( लकड़ी ) में बढ़ई चार जोड़ी खिड़वाड़ तैयार करने का अंदाज़ा लगाता है । यदि मेज़ें बनानी स्वीकार हों, तो इसी गेली में तीन मेज़ों का तख़- मीना निकालता है । बढ़ई के ख़याल में नौ कुर्सियाँ इसी गेली से निकल आती हैं । उसी गेली से छः बेंचें निकल आती हैं । उसी गेली में 15 स्टूल कल्पित होते हैं । उसी गेली में तो तख़तपोश पाए जाते हैं और चीरने-फाड़ने के बिना ही उसी गेली में 12 ब्लैकबोर्ड दृष्टिगोचर होते हैं ।
वैसे एक ही ब्रह्म ( चेतन ) रूपी गेली, जिसमें वास्तविक दृष्टि से कोई किसी प्रकार का परिवर्तन घटित नहीं होता, भाँति-भाँति के रूपों का कारण (अधिष्ठान) है । फिर जैसे एक ही सफ़ेद कागज़ पर अपने मन में चित्रकार कभी राम की, कभी कृष्ण की, कभी कालीदह की, कभी वृंदावन की, कभी काशी की तस्वीरें खींच रहा हो और उसी स्वच्छ कागज़ पर गणितज्ञ अपने ख़याल में त्रिकोण, वर्ग, वृत्त, अंडाकार आदि शक्लें बड़ा बना रहा हो और उसी सफ़ेद कागज़ पर कोई और व्यक्ति मनुष्य-गणना और गृह-गणना के कोष्ठक बना रहा हो, वैसे एक ही चेतन ( ब्रह्म ) अद्वैत-स्वरूप में वैकुंठवासी अपने स्वर्ग के विविध रंगों के नज़ारे जमा रहा है और उसी चेतन ( ब्रह्म ) अद्वैत-स्वरूप में संसारी विविध भाँति के चित्र कल्पित कर रहा है और उसी चेतन (ब्रह्म) अद्वैत-स्वरूप में नारकी अपने नरक की प्रज्वालत अग्नि देख रहा है ।
विविध धर्मों में बहुत-सी ऐसी किंवदंतियाँ चली आती हैं कि वे व्यक्ति जो अत्यंत सज्जन हो गए, अत्यंत पवित्र बन गए, सांसारिक इच्छाओं और शारीरिक बंधनों से बिलकुल विमुक्त हो गए बेहद सुधर गए, बिलकुल और के और हो गए, वे तत्काल स्वर्ग को चढ़ाए गए । साधा- रणतया ऐसी किंवदंतियाँ चाहे मिथ्या हों, किंतु वेदांत की दृष्टि से असंभव नहीं हैं । स्वर्ग के चढ़ाए जाने के यह अर्थ हैं कि उनके भीतर में इतना परिवर्तन हो गया कि सफ़ेद कागज़-रूपी चेतन में सांसारिक चित्रों को देखने के स्थान पर मनोहर वैकुंठ के चित्र देखने लगे और अपने शरीर को मनुष्य के स्थान पर देवता का शरीर पाया ।
पर यह संसार देखा तो क्या और नरक-स्वर्ग देखे तो क्या, वास्तविक तत्व न यह है, न वह है । जितनी द्वैत या नानात्व और भेद-दृष्टि है, वास्तविक दृष्टि से सब असत्य और निर्मूल है ।
"मिथ्या" किसको कहते हैं ? जो वस्तु दिखाई तो दे, किंतु जब उसके अधिष्ठान को देखा जाय तो न रहे । जैसे चाँदी जो सीप में दृष्टिगोचर होती है, सीप ( अधिष्ठान ) को देखने पर नहीं रहती, या साँप जो रस्सी में दिखाई देता है, रस्सी ( अधिष्ठान ) को देखते ही नहीं रहता । अतः वेदांत-शास्त्र के शब्दों में "मिथ्या" वह है जो अपने अधिष्ठान में अत्यंताभाव का प्रतियोगी है ।
सर्वेषामपि भावनामाश्रयत्वेन सम्मते । प्रतियोगित्वमत्यंताभावं प्रतिमृषात्मता ॥ 11 ॥ अंशिनः स्वांशगात्यंताभावस्य प्रतियोगिनः । अंशित्वादितरांशीव दिगेवैव गुणादिषु ॥ 12 ॥ ( चित्सुखी )
अर्थ—संसार की समस्त वस्तुओं के लिये आश्रय का होना आवश्यक है, किंतु प्रत्येक वस्तु के अपने आश्रय में उस वस्तु का अत्यंताभाव पाया जाता है । अतः सांसारिक वस्तुओं का अस्तित्व असल आश्रय में उनके अत्यंताभाव का प्रतियोगी है । और यही है वस्तुओं का मिथ्या होना ।
व्याख्या—सामान्य दृष्टि से कंगन का आश्रय सोना है, पट का आश्रय सूत है, आदि । पट के मिथ्या होने के यह अर्थ है कि जिस आश्रय ( अर्थात् सूत ) में विद्यमान होने का पट को दावा है, उस आश्रय अर्थात् सूत का तार-तार पुकार रहा है कि मुझमें पट नहीं है । स्वर्णकार
की दृष्टि से जो कंगन विद्यमान है, उसका आश्रय सोना है, किंतु सराफ़ की दृष्टि कहती है कि स्वर्ण की दृष्टि से कभी कंगन हुआ ही नहीं ।
अब पट आदि का अस्तित्व अपने आश्रय ( सूत ) के बिना और कहीं कदापि कल्पित नहीं हो सकता ( इस बात से इंकार करना ऐसा है जैसे दावात का हाथी हो जाना स्वीकार कर बैठना ) ।
और पट आदि के निज आश्रय का अस्तित्व उन वस्तुओं को अपने में कदापि आश्रय नहीं देता । अतः वस्तुओं की प्रतीति का निर्मूल ( मिथ्या ) होना उचित प्रतीत होता है और इस परिणाम से किसी प्रकार बचाव नहीं हो सकता, यदि रोटी खाई न जाय तो पेट पर बाँधनी होगी ।
ऊपर दिखा आए हैं कि संसार की समस्त वस्तुओं का वास्तविक आश्रय एक ब्रह्म ही ब्रह्म है जिसको अ से निरूपण किया जा चुका है । इस ब्रह्म को समस्त गुणों का आश्रय और समस्त वस्तुओं का अधिष्ठान क्यों कहा गया था ?—संसारक नाप-रूप की आवश्यकतानुसार ।
अन्यथा अद्वैत-स्वरूप ( ब्रह्म ) की दृष्टि से आश्रय होना-ह्वाना क्या अर्थ रखता है ? ( 1 ) ब्रह्म को निर्गुण स्वीकार किया गया था । जब ब्रह्म में गुणों का प्रवेश ही नहीं, तो आश्रय होने का गुण भी उसमें क्यों ? ब्रह्म का रूप रेख छेख नहीं, उसका आकार नहीं और उसमें कोई राह नहीं, कोई छिद्र नहीं, तो संसार उसमें किधर से घुस सकता है ? जगत् की उसमें गुंजायश कहाँ ?
समस्त नाम-रूप इधर तो बिना आश्रय के रह नहीं सकते और उधर आश्रय ( ब्रह्म ) अन्य को आश्रय नहीं
देता । इधर तो तीक्ष्ण धूप और कृपाण-धारा कंठ पर करने को खड़े हैं और उधर जूठे मशक कुतर गए हैं । अतः नाम- रूप संसार को 'अलअतश-अलअतश' ( राम-राम सत्य है ) कहते हुए मिथ्यापन के कर्बला ( मरघट ) में खेत रह जाना ( शहीद हो जाना ) आवश्यक प्रतीत होता है ।
लोभी पुरुष सीप को चाँदी पड़ा देखे, डरपोक व्यक्ति रस्सी को साँप पड़ा कहे; पर सीप चाँदी को और रस्सी साँप को अपने बीच में कब घुसने देते हैं । राम ( परमेश्वर ) में लोक और परलोक का प्रवेश होना क्या अर्थ रखता है ?
12 वें श्लोक का तात्पर्य—जो वस्तुएँ परमाणुओं से बनी हैं ( और परमाणुओं से निर्मित संसार में क्या नहीं है ? ) वे प्रतियोगी हैं अपने अत्यंताभाव की जो उनके आश्रय ( परमाणुओं ) में है । जितनी परमाणुओं से युक्त ( वा विभाग-योग्य ) वस्तुओं की परीक्षा करोगे, उनका यही हाल पाओगे । अतः सब की सब वस्तुओं का मिथ्या होना स्पष्ट है ।
व्याख्या—भूमि छोटे-छोटे परमाणुओं से निर्मित है, पानी नन्हें-नन्हें बिंदुओं से बना होता है, काल सैकंड पल आदि खंडों से बनता है, शक्ति ( Force ) सदैव अपने असंख्य विभिन्न परमाणुओं ( components ) का प्राप्त- फल ( resultant ) या मिश्रण होती है । वैशेषिक मत का यह सिद्धांत प्रत्यक्षतः समस्त सृष्टि पर लागू है । वेदांत का इसमें यह कथन है—"माना कि समस्त वस्तुओं का प्रत्यक्षतः आधार या आश्रय उनके परमाणु हैं, किंतु आश्चर्य है कि आश्रय की ओर से कभी आश्रित (अधिष्ठेय) हुआ ही नहीं ।"
( 1 ) वर्फ़ पिघली पानी बन गया, पानी से भाप बन गई, किंतु आश्रय के विश्वास से H₂O (हाइड्रोजन+ (ऑक्सीजन) न वर्फ़ थी, न पानी और न भाप ।
H₂O (हाइड्रोजन+ऑक्सीजन का मिश्रण) ज्यों का त्यों ज्यों-त्यों बना रहा । परिवर्तन या परिणाम केवल नाम- रूप ( माया ) में हुआ ।
( 2 ) हीरा—स्वच्छ निर्मल, अत्यंत चमक-दमक, महान् आब-ताब, वज्रादपि कठोर, अल्प-लभ्य, बहुमूल्य । एक बेर अनमोल हीरा ( कोहनूर ) का मूल्य आधे जगत् की संपत्ति लगाई गई थी ।
ग्रेफ़ाइट, कोयला और दीपक का काजल—अत्यंत काले और ऐसे नरम कि काग़ज़ आदि पर अपना चिह्न छोड़ दें, सब स्थान पर अधिकता से उपस्थित और मुफ़्त के मोल प्राप्त ।
विज्ञान दिखाता है कि तात्विक-दृष्टि से यह परस्पर विरुद्ध गुण ( धर्म ) वाली वस्तुएँ बिलकुल एक ही हैं, एक ही कार्बन हैं । यदि एक ही हैं, तो इनमें विस्मित कर देनेवाली भिन्नता कहाँ से आई ? केवल परमाणुओं की लगावट बनावट रूप (Form-माया) के कारण । Form ( माया-आकृति ) विचित्र विस्मयोत्पादक है जो एक ही कार्बन को इधर हीरा और उधर कोयला कर दिखाती है ।
( 3 ) डाक्टर 'पालकेयर्स' का एक उदाहरण इस माया की सारी माया खोल देता है ।
कल्पना करो, हमारे पास काग़ज़ या लकड़ी की बनी हुई एक समानांतर-चतुर्भुज ( 3 x 5 ) है, और दो एक
जैसी समकोण त्रिकोण हैं जिनके कर्ण ( hypotenuse ) 5 हैं और बराबर भुजें (sides) 3 हैं ।
समानांतर-चतुर्भुज के दोनों ओर त्रिकोणों को इस प्रकार लगाओ कि समानांतर-चतुर्भुज की बड़ी भुजाओं पर त्रिकोणों के कर्ण ( hypotenuse ) अनुरूप हो जायँ । ऐसा करने से एक षट्कोण (षट्भुज) बन जायगा जिसका प्रत्येक भुज 3 है । समानांतर-चतुर्भुज समान-चतुर्भुज की अवस्था (आकार) से लुप्त हो गया और त्रिभुज त्रिभुजों के रूप में न रहे । एक नया रूप प्रकट हो आया । एक षट्कोण (षट्भुज) लब्ध हुआ जो अपने अंगों ( चतुर्भुजों और त्रिभुजों ) के गुण को खो बैठा है, और अब ऐसे गुण रखता है जो उसके अंगों ( चतुर्भुजों और त्रिभुजों ) में विद्यमान न थे ।
त्रिभुजों के और चतुर्भुज के लम्बे भुज ( कर्ण ) 5 इस वर्तमान षट्कोण ( वा षट्भुज ) में नितांत नहीं । षट्कोण छः अधिक कोण ( बहिर्लंब-obtuse angles ) रखता है यद्यपि त्रिभुजों में दो-दो न्यून कोण (acute angles) पाये जाते थे और चतुर्भुज में चार समकोण (right angles) । न तो त्रिभुजें समभुज थीं और न समानांतर-चतुर्भुज, किंतु षट्भुज ( षट्कोण ) समभुज है ।
( 4 ) हाइड्रोजन के गुण और हैं, ऑक्सीजन के और । किंतु उन तत्वों से मिश्रित जल बिलकुल अलग-थलग है, वस्तु ही निराली है । यह निरालापन, यह अनोखापन (विचित्रता) कहाँ से आई ? केवल रूप (Form-माया) से । कुछ लोगों का ख़याल है कि मिश्र-पदार्थ के विशेष गुण पहले किसी न किसी गुप्त रूप से अपने अपने आश्रय में अ- वश्य विद्यमान रहते हैं, किंतु उपर्लिखित रेखागणित का उदाहरण इस विचार का स्पष्ट खंडन करता है । षट्कोण ( षडंश: ) एक नितांत नया रूप है जो न तो अपने इस अंश में निहित था और न उस अंश में छिपा बैठा था ।
अतः समस्त ब्रह्मांड केवल नाम-रूप का खेल है, और सब के सब आश्रय ( ब्रह्म ) में निष्ठा हुए पर तो जगत्-वगत् न कभी हुआ था, न है, न होगा ।
आप ही आप हूँ याँ ग़ैर का कुछ काम नहीं । ज़ाते मुतलक़ में मेरी शक्ल नहीं नाम नहीं ॥
भेदोऽयं मिथ्याधर्मि प्रतिमट्टविषयज्ञानज्ञान वेद्यो । धर्म्यादिभेदसिद्धिः पुनरपि च तथेत्यापत्तेश्चानवस्था । ("स्वराज्यसिद्धिः" वार्तिककार सुरेश्वराचार्य(मंडनमिश्र)कृत)
अर्थ—वस्तुओं का पारस्परिक भेद तो तब उत्पन्न होता है, जब उनकी परस्पर तुलना की जाय, किंतु परस्पर तुलना तब हो सकती है जब उन वस्तुओं में पहले भिन्नता और भेद-भावना हो । इसी प्रकार यह भेद और भेद-भावना तुलना का परिणाम है और तुलना फिर भिन्नता और भेद-भावना के बाद आती है । यह चक्र ( अनवस्था दोष ) नानात्व ( द्वैत ) को घेरे हुए है ।
श्रीगोविंदपादाचार्य जी कहते हैं—
उत्तमार्थानि पुष्पाणि वर्तंते सूत्रके यथा । उत्तमाद्यास्तथा देहा वर्तंते मयि सर्वगे ॥
अर्थ—जैसे एक धागे में उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ प्रकार के फूल गूँथे हुए हैं, वैसे सब में सामनेवाले मुझ ( आत्मा ) में उत्तम मध्यम और कनिष्ठ शरीर पिरोए हुए हैं ।
यथा न संस्पृशेत् सूत्रं पुष्पाणामुत्तमादिता । तथा नैकं सर्वगं मां देहानामुत्तमादिता ॥
अर्थ—जैसे फूलों की उत्तमता, मध्यमता, और कनिष्ठता तार पर कुछ प्रभाव नहीं डालती, वैसे शरीरों का उत्तम, मध्यम और कनिष्ठपन मुझ सर्वव्यापक आत्मा का तनिक भी बिगाड़ नहीं कर सकता ।
पुष्पेषु तेषु नष्टेषु यद्वत् सूत्रं न नश्यति । तथा देहेषु नष्टेषु नैव नश्यामि सर्वगः ॥
अर्थ—जैसे उन समस्त फूलों के नष्ट हो जाने पर तार को कुछ हानि नहीं, वैसे शरीरों के नाश हो जाने से मुझ सर्वगत आत्मा को तनिक भी क्षति नहीं पहुँचती ।
की करदा नी ! की कारदा, तुसी पुछाखां दिलबर की करदा ( टेक ) इक्से घर विच वसदयां रसदयां, नहीं हुँदा चित्र परदा । की करदा॰ ॥ 1 ॥ विच मसीत नमाज़ गुज़ारे, बुतखाने जा चड़दा । की करदा॰ ॥ 2 ॥ आप इको, कई लाख घर अन्दर, मालिक हर घर घर दा । की करदा॰ ॥ 3 ॥ मैं जित वल देखां, उत वल ओही, हर इक दी संगत करदा । की करदा॰ ॥ 4 ॥ मूसा ते फ़रऔन बना के, दो होके क्यों लड़दा । की करदा॰ ॥ 5 ॥
अर्थ—एक ही घर में रहते हुए पड़ोसी [unclear] हुआ बताता मगर मेरा [unclear] में दिल रूगी घर में रहने हुए पड़ोस में दिशा हुआ है; इसलिये ऐ लोगो ! तुम इस दिलबर ( प्यारे आत्मा ) को पूछो कि तू यह क्या मुक्तन- [unclear] गंज कर रहा है ॥ 1 ॥
कहीं तो मस्जिद में दिनपहर बैठा रहता है और वहाँ नमाज़ होती है और कहीं मन्दिरों में दर्शिप हुआ है जहाँ मूर्ति पूजा हो रही है; इसलिये ऐ लोगो ! दिलबर को पूछो कि तू क्या कर रहा है ॥ 2 ॥
आप स्वयं तो एक अद्वितीय है मगर लाखों घरों (दिलों) के अन्दर प्रविष्ट हुआ हुआ हर एक घर का स्वामी बना हुआ है; इसलिये ऐ लोगो ! तुम दर्याफ़्त करो कि यह दिलबर (प्यारा) क्या कर रहा है ॥ 3 ॥
जिधर मैं देखता हूँ उधर दिलबर ही नज़र आता है और हर एक के साथ वही (मित्र बैठा) नज़र आता है; इसलिये ऐ लोगो ! आप दर्याफ़्त करो कि दिलबर (ईश्वर) क्या कर रहा है ॥ 4 ॥
मुसलमानों में हज़रत मूसा और हज़रत फ़रऔन हुए हैं जिनमें खूब भगड़ा हुआ था इन दोनों को बनाकर या इस तरह से आप ही दो रूप होकर यह दिलबर क्यों लड़ता और लड़ाता है; इसलिये ऐ लोगो ! आप दर्याफ़्त करो कि यह दिलबर क्या करता है ॥ 5 ॥
सुना रहा विच हर हर बरदे, मुझी फिरे लुराई जे । की करदा घे परचाही जे ॥
अर्थ—मैंने ऊपर दृष्टि उठाकर देखा और समस्त आकाश में मुझे एक ही दिखाई दिया । मैंने नीचे दृष्टि की और समस्त मौजों में एक ही देख पड़ा । मैंने उसके मन में ( अर्थात् भीतर ) देखा । उसमें सृष्टियाँ भरी हुई थीं और एक आकाश स्वप्नों से भरपूर उसमें पाया और उन स्वप्नों में सिवाय एक के और कोई न था ( या और कोई दिखाई न दिया ) । ऐ प्यारे ! पृथ्वी, वायु, अग्नि और जल तेरे भय के मारे पिघल जाते हैं और तुझ तक पहुँचने से पहले काँपते हुए एक में मिल जाते हैं । आकाश पृथ्वी हो जायँगे और पृथ्वी आकाश हो जायगी, तो भी वह एक स्थिर रहेगा और मेरा जीवन तेरे साथ एक होगा ।
एक साधु की गुदड़ी ( कन्था ) चोरी हो गई । किसने चुराई ? कौन चोर पड़ा ? एक कान्सटेबिल ( कदाचित् परीक्षा के लिये चुरा ली होगी ! ) । चौकीदार ही चोर बन गया ( न जाने किस विचार से ) । साधु पुलीस-स्टेशन ( थाने ) के कहीं आस-पास ही रहता था । मौज में आकर रिपोर्ट लिखवाने गया—"लुट गया ! लुट गया !! गरीब लुट गया !!!"
चोरी-गए माल की रिपोर्ट
थानेदार—तुम्हारा क्या गया है ? साधु—सब कुछ । एक तो रज़ाई खो गई है । थानेदार—और क्या ? साधु—बिछौना । " और क्या ? " चादर । " और क्या ? " कोट और अँगरखा । " और क्या ? " तकिया । " और क्या ? " आसन ।
थानेदार—कुछ और ? साधु—हाँ, छतरी भी जाती रही है । थानेदार—बस इतना ही कि कुछ और भी ? साधु—हुज़ूर ! धोती भी चोरी हो गई । थानेदार—खूब स्मरण कर ले । साधु—और... ... ... ... और ... ... ... ... ...
वह कान्सटेबिल जिसने चोरी की थी, पास ही खड़ा था । चोरी-गए माल की इतनी लंबी तालिका (फ़ेहरिस्त) सुनकर बेवस हँस पड़ा और गाली देकर बोला—"और- और बोले जाता है ! तेरा चोरी गया माल बस भी होगा कि नहीं ? तेरी झोंपड़ी है कि सौदागर की कोठी ? इतना असबाब कहाँ से आ गया ?"
यह कहकर पुलिसमैन (कान्सटेबिल) साधु की गुदड़ी उठा लाया और थानेदार की ओर मुख करके बोला— "हुज़ूर बस, केवल इतना तो इसका चोरी-गया सब माल है और इसने दर्जन भर चीज़ें गिन मारीं ।"
थानेदार—( साधु से ) क्या तू पहचान सकता है कि यह गुदड़ी तेरी है ?
साधु—हाँ मेरी है; और किसकी ?
इतना कहा और झटपट गुदड़ी कंधे पर डाल थाने से बाहर दौड़ चला ।
थानेदार ने सिपाहियों को आज्ञा दी, इसे चट पकड़ लो जाने न पाए । और साधु को धमकाकर कहा—"तेरा चालान होगा, तूने झूठी रिपोर्ट क्यों लिखवाई ? हमको धोका देना चाहा ?"
साधु, जो देह और प्राण की चिंता एवं पाप-पुण्य के बंधन से बिलकुल मुक्त था, भय और आशा से आबद्ध
( थानेदार ) की सत्ता को क्या समझता था, मुसकाकर उत्तर दिया—"हम झूठ बोलनेवाले नहीं हैं ।"
यह कहा और उसी गुदड़ी को ओढ़कर बताया— "यह देखो मेरी रज़ाई ।" उसी गुदड़ी को नीचे बिछाकर बताया "यह देखो मेरा बिछौना ।" धूप में उसी गुदड़ी को सिर पर रखकर कहा—"यह देखो मेरी छतरी ।" गुदड़ी को तहाकर नीचे डाला, और ऊपर बैठकर कहा—"यह देखो मेरा आसन ।" इत्यादि ।
वह व्यक्ति जिसने विश्व के आश्रयदाता ( ब्रह्म ) का जाना है, उसका तो सभी कुछ ब्रह्म ही ब्रह्म हो गया । संबंधी और निकटवर्ती हैं तो ब्रह्म; शासक और शासित हैं तो ब्रह्म; प्रेम करनेवाले या वैर रखनेवाले हैं तो ब्रह्म; माता, बहन, भाई हैं तो ब्रह्म; उसके बाग़ और विटप ब्रह्म; उसकी लेखनी और कृपाण ब्रह्म । उसके लिये तो ब्रह्म ही साधु की गुदड़ी है । सारा घर बार जायदाद ब्रह्म है । अपना तो प्रभात और सायं यही है ।—
हवे साक़ी मिरा हम जामो-हम नुक़लस्तो-हम बादा ।
अर्थ—साक़ी ( मस्ती की शराब पिलानेवाले ) का ओठ जो है, वही मेरा प्याला, नुक़ल और शराब है । तूं बिन मेरा सगा न कोई, अम्मा बाचल बहन न भाई । प्यारे ! बसकर बहुती होई, तेरा इश्क़ मेरी दिलजोई ॥ मैं विच मैं न रह गई राई, जब कि प्यारे संग प्रीति लगाई । कदे जा आसमाने वैहन्दे हो, कदे इस जग दे दुःख सहन दे हो ॥ कदे पीरे मुग़ाँ हो वैहन्दे हो, मैं ताँ इक से नांच नचाई । मैं विच मैं न रह गई राई, जद कि पिया संग प्रीति लगाई ॥
ऐसा साधु रंक से राव तक की परवाह न रखने- वाला अपने अनुभव से सिद्ध करता है कि एक ही तत्व
( ब्रह्म ) प्रत्येक रंग में प्रकट हो रहा है; वही सूर्य बनकर चमकता है, वही अंधकार ( अज्ञान ) बनी सागर बनकर उछलता है; फूल में, काँटों में, नृत्य और बुलबुल की चोंच में, जल में, थल में, नगर में, उजाड़ में, हर मकान में, हर काल में एक ही परब्रह्म अभिव्यक्त और अभिमात रूप से शोभायमान है । उस एक ही इंद्रजाली ( मदारी ) के पिटारे ( थैले ) में प्रत्येक वस्तु मिल रही है ।—
असद्ग्राहाश्चयीणां च न वान्मनसां व्रजेत् । ( मनु॰ अ॰ 6 )
तात्पर्य—इस पहचानवाला पाँचों इंद्रिय और मन बुद्धि ( इन सातों द्वारों ) से वास्तविक सत् ( ब्रह्म ) के बिना कुछ व्यवहार नहीं करता-अर्थात् देखता है तो ब्रह्म, सुनता है तो ब्रह्म, छूता है तो ब्रह्म, जो कुछ छूता है उसको ब्रह्म ही जानता है, जो कुछ चखता है उसे ब्रह्म ही पहचानता है, सोचता है तो ब्रह्म, समझता है तो ब्रह्म ।
खांड का कुत्ता, गधा, चूहा, बिला । मुँए में डाले ज़ायक़ा है खांड का ॥
प्राणवान् खांड ही से व्यवहार रखता है, कुत्ता, गधा, चूहा, बिला आदि नाम-रूपों से लड़ाई-दंगा नहीं रखता ।
चाक्षुष दृष्टिको अत्यंत छलनेवाले (optical illusions) और अद्भुत चित्र देखने-सुनने में आए—
( 1 ) दाहिनी ओर से देखो तो राजा साहेब हाथी पर जा रहे हैं, बाईं ओर से देखो तो घोड़े की लगाम पकड़े साईस खड़ा है, आनंद यह कि चित्र एक ही है ।
( 2 ) चित्र कमरे में लटक रहा है, किंतु उत्तमता यह कि सारे कमरे में कोई कहीं पर खड़ा हो, यही निश्चय होगा कि मुझसे आँखें लड़ा रहा है । यदि सौ मनुष्य एक ही समय वहाँ विद्यमान हों, तो उनमें से प्रत्येक को पूरा-पूरा
विश्वास होगा कि आँखें केवल मेरे ही साथ दो-चार हैं मेरे ही ओर टकटकी लगाए तस्वीर घूर रही है ।
( 3 ) किंतु बहुत काल की बात है कि एक अँगरेज़ी- पत्र में एक आश्चर्यमय अनोखे चित्र का विज्ञापन पढ़ा जिसका नाम ( title ) था "Here is the Bohemian with His Family, Where is the Cat ?" अर्थात् यह देखो बोहेमिया का निवासी अपने बाल-बच्चों सहित विद्यमान है, पर बताओ बिल्ली कहाँ है ?
इस चित्र में आनंद की बात यह थी कि जो मनुष्य उसे हाथ में लेकर ध्यान से देखना आरंभ करता था, उसे बोहेमिया का निवासी अपने स्त्री और पुत्रादिकों सहित तत्काल दृष्टिगोचर हो जाता था, रहट चलना भी दिखाई दे जाता था, लहलहाते खेत और छायावाले वृक्ष भी दृष्टि में चढ़ जाते थे, नदी का दृश्य भी आँखों-तले फिर जाता था । इसके अतिरिक्त हरियाली और पशु-पक्षी आदि बीसियों वस्तुएँ दीदों (नेत्रों) में समा जाती थीं, किंतु बिल्ली का नाम-चिह्न न मिलता । बिल्ली छूट, कहीं न मिलती थी, घंटों ढूँढा करो, ढूँढने में कोई बात बाक़ी न रक्खे, काग़ज़-भर के इस सिरे से उस सिरे तक छान डालो, किंतु बिल्ली के दर्शन मिलना दुर्लभ ।
अंततः हारकर क्रोध से चित्र को दे पटका, तो ए लो ! ग़ज़ब हो गया ! आश्चर्य ! विस्मय ! बोहेमिया का निवासी क्या हुआ ? उसकी स्त्री और बच्चे कहाँ हैं ? रहट, खेत, पशु-पक्षी, उनमें से कुछ भी सामने न रहा । समस्त काग़ज़ बिल्ली ही बिल्ली बन गया । एक बिल्ली ने सब काग़ज़ को घेर लिया । जब बिल्ली ग़ायब, तो बाक़ी सब की सफ़ाई हो गई ।—
अब हम थे तब तुम नहीं, अब तुम हो हम नाहिं । यह उदाहरण शुक्ल यजुर्वेद संहिता के चालीसवें अध्याय के अधो-लिखित मंत्र का अर्थ उजलाता है—
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥
अर्थ—जो कुछ देखे जगत् में, सब ईश्वर में जांप । करो तैन इच्छ त्याग से, धन लालच से काँप ॥
इस मंत्र में सब संन्यास (त्याग) का वास्तविक सुंदर वर्णन किया है, साधु की यथार्थता बतलाई है ।
मंत्र का तात्पर्य—(मंत्र का दूसरा भाग) यदि तुझको आनंद की कामना है तो सांसारिक पदार्थों में मत ढूँढ़ । रुपया में आनंद नहीं मिलेगा, ख्याति में नहीं मिलेगा, विषय भोग तुम्हें चोर पातक में फँसाएगा, विषय-भावना के पीछे लगकर पछताना पड़ेगा, अज्ञान के मिथ्या पाश में फँसकर शोक के सिवा कुछ हाथ न आएगा । संसार के मरे में आकर पछतावे ( पश्चात्ताप ) के हाथ मलते रह जाओगे । संसाररूपी बोहेमिया के चित्र में सब्र आनंद का पता नहीं मिलने का ! आनंद-प्राप्ति का यदि कोई मार्ग है तो केवल एक त्याग है । त्याग बिना आनंद कभी नहीं मिल सकता ।
न कर्मणा न प्रजया न धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः । ( श्रुति )
अर्थ—न कर्म से, न संतान से, न धन से, वरन् केवल एक त्याग के द्वारा मनुष्य अमृतत्व को पा सकता है ।
( श्रुति का प्रथम भाग ) इस त्याग के अर्थ मंत्र के पहले भाग में दिखाए हैं अर्थात् वह त्याग जिससे समस्त दुःख दूर होते हैं, अंतःकरण की उस निर्मलता का नाम है जिससे अंतर्दृष्टि नाम-रूप संसार को, बोहेमिया के निवासी
और उसके कुटुंब के मित्र की भाँति, बिलकुल त्याग कर देती है, दृष्टि को भ्रांति में डालनेवाले नाम-रूपों से विमुक्ति हो जाती है, और एक आनंद (आत्मा) ही आनंद (आत्मा) बदार दिखाता है। यह सब कुछ ईश्वर (आत्मा) में ढक जाता है, जगत् का जगत्पन अँधेरे की भाँति प्रकाश (आत्मा) में लुप्त हो जाता है, सब संबंध मिट जाते हैं, सब बंधन छुट जाते हैं, नानात्व का चिह्न शेष नहीं रहता।
दीदए-दिल हुआ जो वा-खुद गया हुस्ने-दिलरुबा। यार खड़ा हो सामने, आँख न फिर लड़ाए क्यों?
वर आबे-हयाते-तो जहाँ हमचो हुबाब अस्त। ओ नीज़ चो बरबाद शवद वर सरश आब अस्त॥
अर्थ—तेरे जीवन के जल पर संसार बुलबुले के समान है, ज्योंही कि वह नष्ट होता है, उसके सर पर पानी होता है (अर्थात् जब वह टूटता है, तो पानी हो जाता है)।
शिवं सर्वगतं शांतं बोधात्मकमजं शुभम्। तदेक भावनं राम! कर्मत्याग इति स्मृतः॥
( योगवासिष्ठ निर्वाण प्रकरण )
अर्थ—हे रामचंद्र! एक, सर्वगत, शांत, अज, आनंद और कल्याण-स्वरूप शिव को जान सब ओर से आँख फेरकर उसी एक तत्त्व-स्वरूप में भावित होना, इसी का नाम कर्मत्याग या संन्यास है।
—:o:—
वेदांत-सिद्धांत-मुक्तावली
श्रेष्ठमद्वय वस्त्वेव सद्ग्ये दृढ़निश्चयः। प्राप्य चानंदमात्मानं सोऽहमद्वय विग्रहः॥
अर्थ—वह एक "मैं" जो यद्यपि एकमेवाद्वितीय हूँ, किंतु एक बेर द्वैत का पक्का विश्वासी हो गया था, अब आनंद (आत्मा) का अनुभव करके वही अद्वितीय-स्वरूप हूँ।
नास्ति ब्रह्म सदानंदमिति मे दुर्मतिः स्थिता। क गता सा न जानामि यदाहं तद्रूपः स्थितः॥
अर्थ—"ब्रह्म सदानंद-स्वरूप नहीं है," यह मेरी दुर्मति थी। किंतु अब तो मैं वही ब्रह्म हूँ, न जाने वह दुर्मति कहाँ उड़ गई।
संसाररोगसंग्रस्तो दुःखराशिरिवापरः। आत्मबोधसमुन्मेषादानंदाब्धिरहं स्थितः॥
अर्थ—संसार-रोग (नाम रूप) में ग्रसित हुआ मैं अन्य हो गया था, दुःखों की राशि और शोक का पहाड़ बन गया था। किंतु अब आत्मबोध के उन्मेष से आनंद का सागर बन गया हूँ।
येाहमल्पेपि विषये रागवानतिविह्वलः। आनंदात्मनि संप्राप्ते स रागः क्वगतोऽधुना॥
अर्थ—वे नाशवान् तुच्छ वस्तुएँ मेरे हृदय को विह्वल कर देती थीं; किंतु अब वह हलचल सब मिट गई, क्योंकि आनंदात्मा में स्वयं हूँ।
स्त्री-सुख हुए दुःख दूर हुए, देख मुख महवूब दे चन्द नूँ जी। रैन चाँदनी देखके दुःख जेही, पाया चित चकोर आनंद नूँ जी। निंद्रा कत्त पटाड़ी पूर लीती, आगे झूर दी साँ हक तंद नूँ जी। हुई मंगलाचार जैकार बोलो, लड्डा अंदरों बालमुकुंद नूँ जी॥
यो वा एतदक्षरं गार्ग्य विदित्वास्मॉल्लोकात्प्रैति स कृपणः। ( श्रुतिः )
वेद कहते हैं—"जो व्यक्ति आत्मज्ञान को प्राप्त नहीं करता और प्रत्यक्ष जगत् से मुख नहीं मोड़ता, वह कृपण (कंजूस-
नीच) है।" जैसे कंजूस धन-संपत्ति होने पर भी मक्खियाँ मारता रहता है और कष्ट सहता है, वैसे ही आत्मानंद के होते हुए में दुःख और शोक के गढ़े में गिरा था, धन्य है, अब छुटकारा मिला, कृपणता और नीचता से अब मुक्ति मिल।—
बुल्हा शाह मुबारकाँ लख देवो। होई शांत जानी गल लाए के जी॥
अहसुल्हास वनोयेद मुबारक बादम। फ़ज़ सनमखानए-तन दर हरमे-जाँ रफ्तम॥
अर्थ—ऐ लोगो! मुझको मुबारकबाद दो कि प्यारे के शरीर-रूपी मंदिर से अब उसके प्राण के हरम में चला गया हूँ, अर्थात् शारीरिक दृष्टि से उठकर आत्मिक दृष्टि में मग्न हो गया हूँ।
विशुद्धोऽस्मि विमुक्तोऽस्मि पूर्णात्पूर्णतमाकृतिः। असंस्पृश्य समात्मानमंतर्ब्रह्मांड कोट्यः॥
अर्थ—मैं विशुद्ध हूँ, विमुक्त हूँ पूर्ण (आकाश) से बढ़कर पूर्णतम (सर्व व्यापक) हूँ। असंख्य ब्रह्मांड मुझमें पड़े हैं, मैं असंस्पृश्य हूँ, मेरा स्वरूप निर्लिप्त है।
परिणाम
वहाँ, जहाँ पर "कहाँ"? निहाँ (छिपा) है— ( यहाँ वहाँ या कहीं न )। तब, जबकि "कब" भ्रम और भ्रांति है— ( अब तब और कभी न )। था, है, और होगा। क्या? कौन? जिसमें "क्या? कौन?" नष्ट है। अल्ला-अल्ला, खैर सल्ला—अर्थात् राम-राम, छुट्टी मिली।
बहृदत नामा
फकीरा! आपे अल्लाह हो। ( टेक ) आपे लाड़ा, आपे लाड़ी, आपे मापे हो॥1॥ आप वधाइयाँ, आप स्यापे, आप अलापे हो॥2॥ राँझा तूँही, तूँही राँझा, भुल हीर न वेले रो॥3॥ तेरे जिहा सानूं प्थे ओथे, कोई न आपे ओ॥4॥ घुंड कढ़ के, क्यों चन मांह उत्ते, आहळे रह्यों खलो॥5॥ तूँही सब दी जान प्यारी, तैनूं ताना लगे न को॥6॥ बोली ताना, यारो सेवा, जो देखें तूं सो॥7॥
अर्थ—आप ही तू स्वयं पति, आप ही पत्नी, और आप ही पिता माता है। इस लिये ऐ प्यारे! तू आप ही ईश्वर हो, अर्थात् वस्तुतः अपने आपको ही तू ईश्वर निश्चय कर॥1॥
आप ही तू बधाई ( आशीर्वाद ), आप ही स्यापा और आप ही तू रोने पीटने का आलाप है। इसलिये ऐ प्यारे! अपने आपको ही तू प्रभु अनुभव कर॥2॥
वास्तव में तू ही राँझा और तू ही हीर है अपने आपको भूलकर तू हीर की खातिर वन वन में व्यर्थ मत रोदन कर॥3॥
तेरे जैसा यहाँ वहाँ इमें कोई नहीं दीखता, इस लिये तू अपने आपको ही ईश्वर निश्चय कर॥4॥
अपने चन्द्रमुख पर घूँघट निकालकर तू एक ओर क्यों खड़ा हो रहा है? ऐ प्यारे! अपने आप को ईश्वर निश्चय कर॥5॥
तू ही सब की प्यारी जान है, तुझ कोई बोली-ठोली नहीं लग सकती है। इस लिये तू अपने आप को ईश्वर निश्चय कर॥6॥
बल्कि बोली-ठोली, मित्रता, सेवा इत्यादि जो दीखता है, वह सब तू ही है। इस लिये अपने आप को ईश्वर निश्चय कर॥7॥
सूली सलीब, ज़हर दे मुके, कदे न मुकदा जो॥8॥ मुकल विच बड़ यार! जो सुत्ते, ओथे तेरी लो॥9॥ तूही मस्ती दिच शराबाँ, हर गुल दी खुशबो॥10॥ राग रब्ब दी मिट्ठी सुर तूं, लै कलेजा टो॥11॥ लाड लीड़े, यूसफ घुट मिल लै, दूई दे पट ढो॥12॥ आठवें अर्श तेरा नूर चमकदा, होर भी ऊँचा हो॥13॥ यह दुन्या तेरे नौंहां दे विच, हथ गल ते रख न रो॥14॥ जे रब भालें बाहिर किधरे, वस गल्लों मुँह धो॥15॥
सली-सलीब और ज़हर के अन्त होने पर जो कदापि नहीं अन्त होता, वह तू है। इस लिये तू ही ईश्वर है, ऐसा निश्चय कर॥8॥
प्यारे की बगल में प्रवेश होकर जब सोये तो वहाँ तेरा ही प्रकाश पाया, अत एव तू अपने आप को ईश्वर समझ॥9॥
शराब में मस्ती और पुष्प में गन्ध तू है, इसलिये अपने आप का तू अनुभव कर॥10॥
कलेजे में चुटकियाँ भरनेवाली जो राग-रब्ब की मीठी स्वर है वह तू है, अत एव तू अपने आप को ईश्वर समझ॥11॥
द्वैत के वस्त्र उतारकर तू अपने प्यारे आत्मा ( यूसफ़ ) को घुट कर मिल और इसप्रकार अपने आप को ईश्वर अनुभव कर॥12॥
आठवें आकाश पर तेरा ही प्रकाश चमकता है, और तू इससे भी ऊपर हो और इस प्रकार अपने आप को ईश्वर अनुभव कर॥13॥
यह संसार तेरे नाखुनों का खेल है, तू खुद पर हाथ रखकर मत रो, बल्कि अपने आप को ईश्वर निश्चय कर॥14॥
यदि तू अपने से बाहिर कहीं ईश्वर ढूंढना चाहता है, तो इस बात से तू रो और ऐ फकीर! तू अपने आप को ईश्वर मान कर॥15॥
तू मौला नहीं वन्दा चन्दा, झूठ दो छड देखो॥16॥ पवन इन्दर तेरी पण्डाँ ढोंदे, क्यों, तैनूं किते न ढो॥17॥ काहनूं पया खेड़ना है भौं भौं विलयां, बैठ निचल्ला हो॥18॥ तेरे तारे सूरज थई थई नचदे, तू वद जाकर चौ॥19॥ पचे न तैनूं सुख वे ओड़क, पड़ो गिरानी खो॥20॥ दुःखहर्ता ते सुखकर्ता, तैनूं ताप गये कद पोह॥21॥ चोर न पये, तैनूं भूत न चमड़े, होर गयो क्यों हो॥22॥
तू स्वयं मालिक व प्रभु है, नौकर चाकर तू नहीं है। अपने आप को वह जीव मानने का जो तेरा झूठा स्वभाव है इसे तू छोड़ और अपने आप को ईश्वर निश्चय कर॥16॥
पवन और इन्द्र देवता तो तेरा बोझ उठाते हैं फिर तेरी सेवा क्यों नहीं कभी करते? बल्कि सर्व प्रकार से वे तेरी सेवा करते हैं, इसलिये तू अपने आप को ईश्वर निश्चय कर॥17॥
प्यारे को इधर उधर ढूंढने की जो घूमन घेरी खेल है, उस खेल को व्यर्थ तू क्यों खेलता है! स्थिर होकर बैठ और अपने स्वरूप का अनुभव कर॥18॥
तेरे आश्रय तारे और सूर्य थई थई नाच रहे हैं। तू स्वयं स्थिर होकर बैठा रह और इस तरह अपने स्वरूप का अनुभव कर॥19॥
तुझे अनन्त दुख पचता नहीं है, इस बदहज़मी को तू दूर कर और अपने आप को ईश्वर निश्चय कर॥20॥
तू स्वयं दुःखहर्ता और सुखकर्ता है, तुझे कब तीनों ताप तपा सकते हैं! तू ईश्वर है, ऐसा निश्चय कर॥21॥
तुझे चोर नहीं पकड़ते और न भूत प्रेत तुझे चमट सकते हैं, फिर तू अपने से इतर क्यों हो रहा है? और अपने आप में क्यों नहीं आता॥22॥
तूं साक्षी केड़ां कईयां मारें, धुन यककर चख़ियाँ है सो॥23॥ सुहियाँ तैनूं भऊ न खान्दे, लुक लुक कैंद न हो॥24॥ वहदत नूं कर कसरत देखें, गयों भैंठा किधरों हो॥25॥ ताज तख्त छड ठट्ठो मल्लों, एस गल्लों तूं रो॥26॥ छड़ के घर दियां लण्डां खोरां, की लोए चवाचें तो॥27॥ तेरे घर विच राम वसेंदा, हाय कुट कुट भर न भो॥28॥ राम रहीम सब वन्दे तेरे, तेथों वड्डा न को॥29॥
तूं साक्षी कौन सी कहियों मार रहा है अर्थात् कौन सा परिश्रम कर रहा है जो अभ धड़कर सोने लगा है? ऐ प्यारे, शीघ्र उठ और अपने आप को ईश्वर अनुभव कर॥23॥
स्वतंत्र ( आज़ाद ) देश में तुझे कोई राक्षस इत्यादि तो नहीं खाते, इसलिये छिप छिप कर कैंद मत हो बल्कि अपने आप को ईश्वर निश्चय करके मुक्त हो॥24॥
एकता को तू नाना करके देवता है। भँगे नेत्रवाला तू कहाँ से हो गया है? हृदय के नेत्र खोलकर तू अपने आप को ईश्वर अनुभव कर॥25॥
निज राज्य का ताज और तख्त छोड़कर छोटी सी कुटिया तू ने ले ली है, इस मूर्खता पर तू रोदन मत कर और अपने स्वरूप का तू अनुभव कर॥26॥
निज घर के स्वादिष्ठ भोजन छोड़कर फूस व दूड़ी को तू क्यों चबा रहा है? क्यों नहीं अपने को आनन्द स्वरूप आत्मा अनुभव करता?॥27॥
तेरे घट में राम बस रहा है। हाय, वहाँ खुस खुट खुटकर मत भर, बल्कि उस स्वरूप का अनुभव कर॥28॥
राम, रहीम सब तेरे बन्दे ( सेवक ) हैं तुझसे बड़ा कोई नहीं है, इस लिये तू अपने आप को ईश्वर निश्चय कर॥29॥
आप भगीरथ, आप ही तीरथ, वन गंगा मल धो॥30॥ पईं फाडा होर्वां रब करके, नद्दा सूरज हो॥31॥ छड मौहरा, सुन 'राम' दुहाई, अपना आप न को॥32॥
गंगा को स्वर्ग से लानेवाला राजा भगीरथ तू आप है और आप ही तू तीर्थ है। स्वयं गंगा रूप डेकर तू सब मल धो और इस तरह अपने आप को ईश्वर अनुभव कर॥30॥
ईश्वर करे तेरे सब पड़े स्खलें और तू सर्वेश्वर नितान्त नद्दा हो॥31॥
तू संसार-रूपी खेल वा विषयभोग-रूपी विष को त्याग, ऐसी राम की पुकार है; इसे छन, बल्कि अपने आप को ईश्वर निश्चय करके निज स्वरूप का साक्षात्कार कर और अपने आप का नाश मत कर॥32॥
ॐ ॐ ॐ ॐ
राम राम राम