आनंद ।*
( इस मासिक पत्र रिसाला 'अलिफ़' में प्रकाशित स्वामी रामका प्रथम लेख )
ओ इस विषय ( लेख ) से दिल लड़ाने वाले प्यारे! ज़रा उस दिन को याद कर जब कि तेरा आनंद माता के आँचल के तले ढका था, माता की आस्तीन से बँधा था। स्वर्गीय-सुंदरियाँ बुलाती हैं, अप्सराएँ गोद में लिया चाहती हैं, किंतु तुम हो और माँ का दुपट्टा। आप छिपते हो, मुखड़ा छिपाते हो। राजा साहब बुलाते हैं, मैजिस्ट्रेट साहब याद फ़रमाते हैं; तुम्हारी बला से, तुम तकते तक नहीं; वरन् अप्सरा मुखी कपोल वालों और वैभववानों पर सचमुच पेशाव करना आप ही का काम था। एम॰ ए॰ और एल॰ एल॰ डी॰ की तुम्हारे आगे कोई विसात ही
* नोट—अमरीका जाने से पहिले स्वामी रामतीर्थ ने अपने गृहस्था-श्रम में ही उर्दू-भाषा में कई एक लेख सन 1900 के आरम्भ में लिखे थे जो मासिक पत्र रिसाला अलिफ़ में क्रमशः प्रकाशित हुए थे। उनमें सब से पहिले यह आनन्द विषय का लेख है जो रिसाला अलिफ़ के प्रथम अंक में छपा था। यद्यपि यह विषय ( आनन्द ) वही है जिसपर राम ने नये ढंग से अंग्रेज़ी भाषा में अमरीका में व्याख्यान दिया था, पर दोनों की शैली भिन्न २ और ढंग विचित्र २ हैं। अतएव इस उर्दू लेख का भी हिन्दी अनुवाद किया गया है जिससे पाठकगण राम की लेखनी से भी परिचित हो जाएँ।
नहीं। बहु-मूल्य पुस्तकें तुम्हारे ख्याल में केवल फाड़ देने को बनाई गई थीं। क्यों जी! कैसे सुखी थे उन दिनों? सब देखने वाले बलाएँ लेते हैं, भाई न्योछावर हुआ चाहते हैं, बहनें अपने आपको न्योछावर करने को तैयार हैं। पिता के प्यारे, माता की आँखों के तारे। ओढ़ने की फिकर न बिछौने का ज़िकर। सच है—
मासूम के बहिश्त सदा हम-रकाब हैं।
Heaven dwells with us in infancy.
यह वही दिन हैं जहाँ दृष्टि में न इहलोक है न परलोक, न जीव है न ईश्वर, न मैं है न तू, न गुण हैं न दोष, न धृष्टता है न लज्जा, सुंदरियों के हाव भाव और कटाक्ष निताम्त निस्सार, संसार की सुख-समृद्धि अत्यन्त निरर्थक।
आपत्ति—धन्य है वह महापुरुष जो शिशुपन से लेकर समस्त अवस्थाओं को पार करके विज्ञानस्वरूप हो दुवारा बच्चे के समान सब दुःख-सुखरूपी द्वंद्वों से छुटकारा पा चुके हैं, और इस पद्य के वाच्य हैं कि—
इंतहाए-कार जो थी इब्तिदाए-कार थी।
अर्थात् जो साधन वा कर्म का परिणाम था, वही उस का आरम्भ था।
पे पाठक! स्मरण रहे, यह महात्मा ऊपर से प्यारे-प्यारे भोले-माले वही हैं जिनका काम है ईश्वर की छाती पर कूदना। इंद्र आदिक देवता उनको हाथों पर उठाते हैं, ब्रह्मा आदिक उनपर वारे वारे जाते हैं, किंतु कैसी बेपरवाही! कि आँख उठा कर देखते भी तो नहीं। चारों वेद उन्हीं की प्रशंसा और स्तुति करते हैं।—
धूलि तिन्हांदी जे मिलै नानक दी अरदास।
आनन्द 75
कुछ बहुत समय नहीं बीतने पाता कि बच्चे का आनंद अपना मुख्य स्थान परिवर्तन करता है। अब खेल कूद में जो आनंद है वा और कहीं नहीं। यहाँ तक कि माँ भी विसर जाती है। विद्या-कला, धन-मान का तो पूछना ही क्या है।
थोड़ा समय और बीतता है कि आनन्द का चक्कर अपना केंद्र किताबों को बना लेता है। अब न खेल कूदनी है न कसरत; न माँ याद है न सौंदर्य और तमाशा।
कुछ समय के पश्चात् नौकरी आदि मिली। आनंद लक्ष्मी के कौतुक में आ स्थिर हुआ। अब रुपया की टंकार जैसा कोई राग ही नहीं, धन इकट्ठा करने से श्रेष्ठ कोई काज ही नहीं।
इस जड़ माया के आने पर चंचल माया ( स्त्री ) को लग्न में मग्न हो गया। वह रुपया जो शेष सब वस्तुओं से अधिक प्यारा था, स्त्री के लिये उस रुपये को एक प्रकार से तिलांजलि देना प्रसन्नचित्त से स्वीकार हुआ। अब कनफटे गुरुजी ( स्त्री ) के रातके एकान्त के गुरुमंत्रों में आनंद जी ने आसन जमाया। किंतु इसको चैन कहाँ!
बहूजी और बाबूजी नन्हे की वाट ताकते हैं। हाय, कब हमारे घर में बालक खेलेगा, कब उस खिलौने से चित्त बहलेगा। बाबूजी तो अखवारों और डाक्टरों से नुस्खे दरियाफ़्त करते हैं और बहूजी गंडा तावीज़ साधु-फ़क़ीर की खोज में रहती हैं कि हाय, किसी यत्न से अपने यौवन के विटप में फल लगे। ज़र ( धन ) है, जेवर ( भूषण ) है, ज़मीन है; पर एक ही वस्तु की कमी है, जिस बिना यह सब वस्तुएँ फीकी हैं। बच्चे के लिये बाबूजी अपनी अर्धांगी की उपस्थिति में दूसरा व्याह करने को तत्पर हैं।
गंगा-माई की कृपा से बालक हुआ। आँखें मलते-मलते इकलौते पुत्र का मुख देखा। ऐसा सुख फिर कब होगा। आनंद से फूले नहीं समाते। नन्हा है कि एक तमाशा है। सारे कुटुंब की जान है। उससे एक पल का वियोग दूभर है। दफ़्तर में काम करते नन्हा ही आँखों के सामने फिरता है। गृहस्थी के आनंदकी सीढ़ी का डंडा खतम हो चुका। माँ है कि इस बच्चे को चूमती नहीं, गौ की तरह चाटती है, अपनी ही जान, अपने ही देह प्राण भान करती है। दादी के प्रेम का तो कुछ पूछिए ही नहीं।
दौलत काई दुनिया में पिसर से नहीं बेहतर। राहत कोई आराम-ए-जिगर से नहीं बेहतर॥ लज़्ज़त कोई पाकीज़ा समर से नहीं बेहतर। निगहत कोई बू-ए-गुले-तर से नहीं बेहतर॥ सदियों में इलाज़े-दिले-मजरूह यही है। रहाँ है यही, राह यही, रूह यही है॥
माँ-बाप की आसायशों-राहत है पिसर से। तल्खी में भी जीने की हलावत है पिसर से॥ सूं जिस्म में आँखों में बसारत है पिसर से। अय्यामे-ज़यीफ़ी में भी ताक़त है पिसर से॥ आराम-ए-जिगर, कुव्वते-दिल, राहते-जाँ है। पीरी में यह ताक़त है कि पयमुर्दा जवाँ है॥
बच्चा कुछ बड़ा हुआ। माँ के आँचल के ओझल ज़रा मुँह छिपाया और तोतली ज़वान से पिता को कहा "पा! झात"। इतने ही में माँ और बाप दोनों को बेसुध कर दिया, मन मोह लिया, चित चुरा लिया, माता-पिता गद्गद होगए।
आनन्द 77
भई! सच कहना यह अवस्था एक साधारण संसारी पुरुष के लिये आनंद की नसेनी का ऊंचा पाया है कि नहीं? न्याय की दृष्टि से देखो, तो मानना पड़ेगा कि इस अवस्था के बाद आनंद का सूर्य शिर पर से उतर जाता है। इसके बाद इधर तो जवानी की दोपहर ढलनी आरंभ होगी, और उधर बच्चा गुदगुदी के योग्य नहीं वरन् सुधारने योग्य हो जायगा। मारे हँसी के दोहरा होकर और सारा मुँह खोलकर बेखटके ठट्ठा लगाना फिर कहाँ? उसे देख फिर उसकी शिक्षा और अध्ययन की चिंता होगी, कभी-कभी ताड़ना भी हुआ करेगी। लड़का फिर हर्षपूर्ण नहीं, वरन् चिंतापूर्ण हो जायगा।
यह वर्णन स्पष्ट सिद्ध करता है कि हमारे बाबू साहब को जीवन के सैरो-सफ़र ( यात्रा ) ने सांसारिक आनंद की चोटी पर आन पहुँचाया। इस उच्चता पर बाबू साहब को खिला हुआ कमलपुष्प मिला।
नन्हा है गोल मोल कि इक कँवल फूल है। नाज़ुक है लाल लाल अचंभा अमूल है॥
किंतु हमें बाबू साहब से क्या। हमें तो "आनंद" का इतिहास लिखना है। कैसे रूप बदले। कहाँ-कहाँ फिरा, माँ के आँचल तले, बच्चों के खेल कूद में, किताबों के पृष्ठों में, सोने की चमक-दमक में, फूलों के रंग और गंध में, मूर्तियों की मुस्कराती हुई आँखों में, स्त्री के चुंबन और आलिंगन में, और लटखंड शिशु के प्यारे प्यारे लाल लाल मुस्कराते हुए ओठों में।
ओ आनंद! क्या तू सचमुच इन्हीं स्थानों में वसता है?
दूसरा दृश्य
दोपहर का समय है। हमारे बाबू साहब कोट पगड़ी उतार दफ़्तर के काम में लगे हैं। पंखा हो रहा है। यह लो, लेमोनेड की बोतल खुली। बर्फ़ डालकर बाबू साहब ने पी ली। प्यास नहीं बुझती। हाय गरमी!
बाबू साहब की उपस्थिति ( विद्यमानता ) में सब अधीन क्लार्क लोग साँस दाबे अपने-अपने काम में लगे हैं। कोई सिर नहीं उठाता।
टन टन टन टन टन..........
बाबू साहब—रामा! सुन तो टेलीफोन क्या कहता है? क्या ख़बर है, कुशल तो है?
नौकर को इतना कहा और न मालूम क्यों, काम छोड़ लपक कर स्वयं ही सुनने लगे। सुनना था कि हाय हाय करके छाती पीटना। क्या हुआ? कैसी ख़बर थी? कैसी प्राणशोषक घटना थी? हृदय छीलने वाली आवाज़ थी? सुनते ही आशालता पर बिजली गिरी। रंग उतर गया। ओठ सूख गए। हाथ-पाँव फूल गए।—
काटो तो लहू नहीं बदन में।
सरकारी काग़ज़ और नोट जो खुले पड़े थे, संदूकचे में झटपट बंद करना चाहते हैं, किंतु मन में यह अधीरता कि हाथ काम नहीं कर सकते। यज्ञोपवीत से बँधी हुई ताली से संदूकचा बंद किया चाहते हैं, किंतु अंगुलियाँ भूल कर जाती हैं। जितनी ही शीघ्रता करते हैं उतनी ही देर हुई जाती है। बेहोशी में ही सिर पर पगड़ी और शरीर पर कोट रखा और दफ़्तर से बाहर भागे। बटन
आनंद 79
कोई लगा और कोई नहीं लगा। किसी से सलाम की न किसी से राम राम। सब विस्मित हैं, भगवान्! क्या बात है? (टेलीफ़ोन के इस कर्कश स्वर ने वही हलचल डाल दी जो वंशुरी के मनमोहक स्वर ने ब्रज की गोपिकाओं में डाली थी)।
रामा—हुज़ूर! साईस को हुकुम दिया है, वह अभी फ़िटन लाया है।
बाबू साहब—अरे जलगप, जलगप! आग-आग ...
इतना कहा और अपनी मान-प्रतिष्ठा को ताक़चे पर रख खुले बाज़ार दौड़े। एक दौड़ती हुई ट्रामगाड़ी वाले को आवाज़ दी, हाथ उठाया-ठहरो ठहरो, और घम से अपने आपको ट्रामगाड़ी में जा डाला। मारे घबराहट के ट्रामवाले को पुकार कर कहते हैं "जल्दी जल्दी", बस चलें तो चाबुक और लगाम उसके हाथ से छीनकर घोड़ों को सरपट दौड़ा दें। सामने से प्रांत के गवर्नर साहब बहादुर की गाड़ी मिली [वही गवर्नर जिनकी सेवा में भारतवर्ष के धनिक उपस्थित होकर सलाम का अवसर जब पाते हैं, तो उसके बाद वर्षों अपने हृद-मित्रों में बैठकर बड़े अभिमान से इसका ज़िक्र किया करते हैं], किंतु इस समय हमारे बाबूजी की आँखों में संसार अँधेरा रूप हो रहा है। लाट साहब की गाड़ी पास से निकल गई और इनको मालूम ही नहीं पड़ा, सलाम भला क्या करते। ट्राम के भीतर दाहिनी ओर से मीठी-मीठी आवाज़ यह क्या आ रही है?—
ज़ु'विश में होंठ ऐसे हैं नाज़ुक नफ़स के साथ। जैसे हिले नसीम से पत्ती गुलाब की॥
"हुज़ूर! आपकी तेजोमय ललाट पर विषाद (उदासीनता) क्यों है? आज मुखमंडल पर तेज क्यों नहीं बरसता? वह कांति क्या हुई? ईश्वर के लिये हमें तो दया-दृष्टि से वंचित न रखिएगा"। प्यारे पाठक! जानते हो यह किसकी आवाज़ थी? यह एक चंद्र-मुखी चंद्रवदनी उर्वशी-ईर्ष्य सुंदरी का बोलना था जिस पर बाबू साहब का चित्त चिरकाल से आसक्त था, जिसके प्रणय का ध्यान कभी छूटता ही न था, जिसका चित्र हृदय के दर्पण पर दृढ़तापूर्वक अंकित था, जो तनिक काम-धंधे का आवरण उठा और चट दृष्टि उधर पड़ी। आज वह चंद्रवदनी शुक-नयनी माधुरी हाव भाव के साथ बाबू साहब से वाग्विलास कर रही है। किंतु हाय! हृदय-कमल पर कैसी तुषार-वर्षा हो गई कि प्रकाशमान् सूर्य तो उदय हुआ, पर यह (कमल) न खिला—
लब अज़ गुफ़तन चुनां बस्तम कि गोई। दुहन बर चेहरा ज़ख़्में-बूदो-बेह शुद॥
अर्थ—मैं ने बोलने से ओष्ठ इस तरह बंद कर लिये मानो मुँह चेहरे के ऊपर एक घाव था और वह अच्छा हो गया।
नोट:—क्यों भई! अपने घर की आग बुझाने के लिये कभी तुम भी पैसे व्याकुल हुए? तुम्हारा सब सामान जल रहा है। अंतःकरण में आग लगी हुई है। तुम्हारी राजधानी (Rome) मर्टियामेंट हो रही है। आत्मा का पता नहीं। शांति लुप्त है। स्वरूप का ज्ञान खोया हुआ है। किंतु है इस आग के बुझाने की चिन्ता? नीरो (Nero) की तरह बार-बार सब अग्नि के समर्पण करना और लुब्बों में बैठकर गुलछर्रे उड़ाना कहाँ तक?
आनंद 81
चली आख़िरश फ़रके दिल को दिलोर। मिला गुल, लगी इक न दम मर की देर॥ मिला गुल, हुई मस्तो-दिलशाद थी। क़फ़स था न शीशे बद आज़ाद थी॥ यही हाल इंसान! तेरा हुआ। क़फ़स में है दुनिया के घेरा हुआ॥ मटकता है जिसके लिये दर बदर। वह आराम है क़ल्ब में जलबागर॥
तू आह्ये-खुतनी मुशक जोई अज़ सहरा। ज़ि नाफ़े-ख्वेश नदारी ख़बर, ख़ता इंजास्त॥ तात्पर्य—हे मृग तेरी सुगंध से सर्वथा यह वन भरपूर। कस्तूरी तो निकट है क्यों धावत है दूर॥
ढूँढोरा शहर में लड़का बग़ल में। ख़ुदा इस पास यह ढूँढे जंगल में॥ भुल्ली हीर फिरे विच चेले। राँझा यार बुक़ल विच खेले॥ देखता था मैं जिसे होके नदीदा हर सू। मेरी आँखों में छुपा था मुझे मालूम न था॥
वाह राम! आनंद तो क्या बताने लगे थे, ख़ूब आग लगाई।
राम—हाँ, यह आनंद कभी नहीं मिलने का, जब तक इस वाह्य परिवार, सम्पत्ति, अहं-मम को एक प्रकार अग्नि के समर्पण न कर दिया जाय, "घर जाल तमाशा डिट्ठा"। पुत्र अग्नि में भस्म हो जाय; स्त्री, माँ, अपना शरीर और
सब पिछ-लगे उड़ जायँ, राम ही राम दृष्टिगोचर हो। जैसे पठित मनुष्य के लिये लिखा हुआ ॐ (प्रणव) अक्षर झट अपने अर्थों को स्पष्ट कर देता है, वैसे ही समस्त वस्तुएँ हायरोग्लिफ़ (चित्रमय शब्द) के अनुसार दृष्टि पड़ते ही राम के दरस दिखाएँ, तब आनंद होता है।
अत्र पिताऽपिता भवति माताऽमाता लोकाऽलोकाः देवा अदेवाः वेदा अवेदाः। (बृ॰ उ॰ अ॰4 ब्रा॰3 मं॰22)
तात्पर्य—ऐसी दशा में आत्मा समस्त बंधनों रहित हुआ अपने शुद्ध स्वरूप में स्थिर होता है, अर्थात् जाग्रति में जो पिता के संबंध से नामज़द था, उस आनंद अवस्था में वह पिता पिता नहीं रहता, माता माता नहीं रहती, संसार संसार के रूप में नहीं रहता, देवता देवता नहीं रहता, ऐसे ही वेद वेद नहीं रहते; तात्पर्य यह कि जब पुरुष समस्त संबंधों और बंधनों से रहित होता है, तब आनंद का सागर उसके भीतर उमँड आता है, अर्थात् तब उसे अपने स्वरूप का अनुभव होता है, इससे पहले कभी नहीं।
सूली ऊपर प्यारे की सेज। दुरेस्त ख़ुश, क़फ़स गुल-हवस रा न दिहंद। परवाना राख्त शमा, मगस रा न दिहंद॥
अर्थ—मोती अच्छी वस्तु है, उसको लोभी की हथेली में नहीं देते; पतंग के लिये दीपक है, मक्खी को नहीं देते।
बस अज़ मुर्दन बनायँगे सागर मिरी गिल के। लबे-जानाँ के बोसे ख़ूब लेंगे ख़ाक में मिल के॥
विषयों में जो आनंद मिला, क्या वह स्त्री के रक्त-मांस हाड चाम में आलथी-पालथी लगाए हुए बैठा था? हर हर हर! बिलकुल नहीं, वह तो केवल चित्त-वृत्ति के निरोध में था, एकाग्रता में था।
आनंद 83
संसार में सब वस्तुओं से अधिक प्यारा है बच्चा। किंतु बच्चे से भी प्रियतर कोई वस्तु है कि नहीं? देख लो, इस समय समस्त संपत्ति बच्चे पर निछावर कर देने को कह रहे हैं; किंतु ऐसा प्यारा बच्चा एक और वस्तु पर सचमुच बलिदान कर रहे हैं। वह क्या? प्यारे प्राण। "वाह विंद मेरी"। हज़ारों रुपये जायँ, आभूषण जायँ, नन्हें के बचानेवालों के प्राण भी नष्ट हो जायँ, बला से; किंतु स्वयं बाबू साहिब या बहूजी आग के मुँह में नहीं कूद सकते। (इस घटना को देखकर भागवत का वह कपकपी लानेवाला दृश्य आँखों के सम्मुख खिंच गया जबकि प्यारा कृष्ण यमुनाजी में कूद पड़ा; समस्त ग्वाल-बाल और गोपियाँ किनारे खड़े हक्के-बक्के मुँह देखते रह गए; नंद और यशोदा मूर्च्छित हो गए; किंतु कालीदह-यमुनाकुंड में कोई नहीं कूदा)।
पर लो! बच्चे की जान गई, किंतु बाबू और बहू ने अपनी जान रखी। अपनी आँखों के सम्मुख अपने आत्मज को अग्नि में स्वाहा होते हुए देखा। लोकोक्ति प्रसिद्ध है, जब बंदरिया के अपने पैर जलने लगते हैं, तब बच्चों को अपने पैर के नीचे दबालिया करती है।
तनिक इस शब्द को सुनना! आग फड़फड़ाती है?— नहीं नहीं, अग्नि देवता पुकार-पुकार कर उपदेश सुनाता है।
न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति।
(यजु॰ बृ॰उ॰ अ॰ 4 ब्रा॰ 5 मं॰ 6)
अर्थ—पिसरे-खुशरू का तसर्रुफ़ कब है अपने बाप पर। बाप तो आशिक़ हुआ था एक अपने आप पर॥
कैसी सन्नाटे की हवा चलने लगी। सायँ सायँ! यह वेद का संदेशा लाई है। ललकार ललकार कर सुना रही है—
स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयत, एवमेव खलु सोम्य! तन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते, प्राणबन्धनद्धं हि सोम्य! मन इति।
(साम॰ छां॰ उ॰ प्रप्रा॰ 6 खं॰7 मं॰2)
तात्पर्य—
क़फ़स एक था आशियों से वना। लटकता गुले-ताज़ा मर्कज़ में था॥ था फूल एक पर क़फ़स हर तरफ़ थे। थे माशूक़ सब बुलबुले-वंद के॥ गुले-अक़्स की तरफ़ बुलबुल चली। चली थी न दम भर कि ठोकर लगी॥ जिसे फूल समझी थी साया ही था। यह झपटी तो तड़ शीशा सर पर लगा॥ जो दहिने को झाँका वही गुल खिला। जो वायें को दौड़ी यही हाल था॥ मुक़ाबिल उड़ी मुँह की खाई वहाँ। जो नीचे गिरी चोट आई वहाँ॥ क़फ़स के था हर सिम्त शीशा लगा। खिला फूल था वक़्त में वाह वा॥ उठा सिर को जिस आन पीछे मुड़ी। तो खंदाँ था गुल आँख उससे लड़ी॥ झपकने लगी अब भी धोका न हो। है सचमुच का गुल तो फ़क़त नाम को॥
आनंद 87
यद् यत् सुखं भवेत तत् तद् ब्रह्मैव प्रतिबिंबनात् । वृत्तिश्चेतमुर्खा स्वस्य निर्विघ्नं प्रतिबिंबनम् ॥
तात्पर्य—जब जब संसारी सुख मिलता है, उस समय अंतःकरण में ब्रह्मस्वरूप प्रतिबिंबित हुआ होता है, अर्थात् अंतःकरण में बिना अपने स्वरूप के प्रतिबिंबित हुए आनंद कदापि अनुभव नहीं होता। और यह प्रतिबिंब अंतःकरण में उस समय पड़ता है, जब चित्त वृत्तियाँ अंतर्मुख (निरोध) होती हैं और मन अचंचल होता है।
इधर क्षणभर के लिये अहं-मम भाव मिटा, भय और चिन्ता से मुक्ति मिली, नाम रूप भेद छुस हुआ; उधर आनंद ही आनंद तरङ्गायित था। इधर भ्रांति का बादल उठा, उधर आनंदरूपी चन्द्र ने मुँह दिखाया। यह चंद्र (आनंद) तेरा आत्मा है। द्वैत की लटों को मुख पर से उठा, और शोकरात्रि को पर्वदिन बना। तेा ख़ुद हिजाबे-ख़ुदी पे दिल ! अज़ मियाँ बरख़ेज़ । अर्थात्— हे दिल ! द्वैत-आवरण तू आप स्वयं है, अपने भीतर से तू उठ जाग। वर चेहरए-तेा नक़ाब ता कै। वर चश्मए-खुर सहाब ता कै॥ अर्थात् तेरे मुखमंडल पर आवरण कब तक ? सूर्य के स्रोत पर बादल कब तक ? घूँड कढके क्यों न चन मुँह उत्तो, ओईले रह्यो खलो, फ़क़ीरा ! आपे अल्लाह हो। स्वयं आँखें मीचकर अविद्या ( दुःख ) रूपी अंधकार उत्पन्न किया है। हे सूर्य ! आँखें खोल। उजाला ही उजाला हो जायगा। सब वस्तुओं को प्रकाशित ( आनंदमय ) बनानेवाला तू है।
आफ़तावी आफ़तावी आफ़ताब। ज़रेहा दारंद अज़ तो रंगो-ताब॥ अर्थात्—हे प्यारे! तू सूर्य है, तू सूर्य है, तू सूर्य है; और ये समस्त कण (सृष्टि) तुझसे ही चमक दमक पाते हैं।
न तत्र सूर्यो भाति न चंद्र तारकं नेमा विद्युतो भांति कुतोऽयमग्निः । तमेव भांतमनुभाति सर्वं तस्यभासा सर्वमिदं विभाति । ( कठ उ० अ01 व05 मं015 ) तात्पर्य—न वहाँ (वास्तविक स्वरूप में) सूर्य चमकता है, न चंद्रमा और न यह बिजलियाँ ही पर मार सकती हैं। अग्नि की ज्वाला तो फिर कहाँ ? वरन् सत्य तो यह है कि उस प्रकाशों के प्रकाश स्वरूप के तेज़ से यह सब जगत् प्रकाशित है, और उसके तेज़ से ही यह सब नाम और रूप तेजोमय हो रहे हैं ?
च—चानना कुल्ल जहान दा तूँ। तेरे आश्रय होय व्यवहार सारा॥ होवे सर्वकी आँख में देखदा हूँ। तुझे बुझदा चानना अंध्यारा॥ नित जागना सोवना ख्वाब तीनों। देख तेरे आगे होवे कई वारा॥ वुलहासाह प्रकाश स्वरूप तेरा। घट, वद्ध न होत है एकसारा॥
प्रश्न—बच्चा हर समय क्यों आनंदित रहता है, मस्त फिरता है ?
उत्तर—उसमें "मैं शरीर या बुद्धि हूँ" इस भ्रम ने घर नहीं किया होता, द्वैत की रात्रि उसके लिये अभी नहीं पड़ी।
आनंद 89
"The baby new to earth and sky What time his tender palm is prest Against the circle of his breast Has never thought that this is I" (Tennyson).
अर्थ—जो बच्चा अभी संसार में प्रकट ही हुआ है, जब उसकी कोमल कोमल हथेली को उसकी छाती से लगाया जाता है, तो उसे विचार नहीं होता कि "यह मैं हूँ" ।
प्रश्न—संसारी मनुष्य की प्रसन्नता जो इन्द्रियों के विलास से प्राप्त होती है, जुगनू की दुम की तरह चमकते ही मात क्यों पड़ जाती है ?
उत्तर—इन विषय-सुखों से द्वैत (देहाध्यास) केवल दमभर के लिये ही दूर होती है, अथवा यों कहो कि द्वैत की अँधेरी रात में केवल एक क्षण भर ही के लिये आत्मदेव (आनंद) की विजली चमक जाती है।
अविद्या रूपी रात्रि (दुख) को सदैव के लिये नाश करना चाहते हो तो "जानो अपने आपको" Know thyself. अथा तो ब्रह्मजिज्ञासा । ( वेदांत दर्शन प्रथम सूत्र )
जुस्तजू कुन, जुस्तजू कुन, जुस्तजू। दर बरे-खुद वीं कि बेरूँ नेस्त ऊ॥
अर्थ—जुस्तजू कर, जुस्तजू कर, जुस्तजू कर (अर्थात् अत्यंत अधिक खोज कर), अपने भीतर देख क्योंकि वह (प्यारा) बाहर नहीं है।
इतने पृष्ठ काले हुए। उपदेश क्या मिला ? यह कि जितनी बाहर की वस्तुएँ आनंदप्रद और हर्षदायक हैं, केवल इसलिये हैं कि आनंद की खानि जो अपना आप है, उस (हिरण्यगर्भ) से तनिक सा सोना लेकर गिलट
की गई हैं। जब यह गिलट उतर जाता है, तो मानो कलई खुली और वस्तुएँ फीकी बनीं। "हर कसे रा पिसरे-खुद वजमाल नुमायद व अक़्ले-खुद बकमाल"-प्रत्येक को अपना सुत सुंदर और अपनी बुद्धि पूर्ण प्रतीत होती है। बच्चा माँ की गोद में तोतली बोली से जब कहता है—"मेरी माँ, म्हारी माँ" तो उसमें 'मेरी' और 'म्हारी' है गोल्डन टच (Golden touch) प्यारा बना देनेवाला मंत्र। जब बड़े भाईसे एक अदा (नखरे) से कहता है "मेरी है—म्हारी है", और वह बोलता है—"नहीं मेरी है", तो इतनी शकरज़ी होती है कि नन्हें से ओंठ निकाल कर विसूरने लगता है। यह देखा और माँ ने झट चूमकर कहा—"मेरी कहनेवाले पर वारी"। वाह "मेरी" भी तो क्या जादू है ! फिर ज्यों ज्यों देखता है कि इस माँ में औरों का भी भाग है, तो उसके संबंध का नाता कमज़ोर होता जाता है, और पहला सा प्रेम नहीं रहता । जितना इसमें 'मेर' कम हुआ, उतनाही प्रेम दूर हुआ। किसी और स्त्री ने गोद ले लिया हो, तो कभी असली माँ याद ही नहीं आती। ऐ सर्वोत्तम मनुष्य ! संसार की समस्त वस्तुएँ तेरे सामने नाच नाचती वा मुजरा-तमाशा दिखलाती हैं, जिसपर तेरी कृपा-दृष्टि होती है, उसे तू मान प्रदान करता है। 'मेरी' 'हमारी' 'अपनी', इस अलंकार से सजाता है। यह मेरी वह उपाधि है, वह मान-वस्त्र है, कि जिस वस्तु को मिली, वह आनंदरूप बनी।
गुलिस्तां में जाकर हर इक गुल को देखा। न तेरी सी रंगत न तेरी सी बू है॥
गार्गन (Gargan) की आँख जिसपर पड़ती थी, पत्थर बना देती थी, मगर यह "मेरा" कहनेवाली आँख जिस वस्तु पर पड़े वह आनंद से भरी—
आनंद 91
कुरवाने-निगाहे-तो शवम बाज़ निगाहे। तात्पर्य—तेरी दृष्टि पर मैं न्योछावर हूँ । पुनः 2 अपनी दृष्टि कीजिये।
एक व्यक्ति सैर करके वापस घर आया तो कंधे पर भारी मूल्यवान् दोशाले से अपना दो डेढ़ रुपया का बूट (जूता) पोंछने लगा। किसी ने इस लापरवाही का कारण पूछा तो मालूम हुआ कि दोशाला उसके बाप का है और बूट (जूता) उसका अपना । वाह, पहले आप पीछे बाप।
ऊषा और संध्या के समय पौ फटने की लाली के रंग वह चमक दमक रखते हैं और ऐसे चित्रविचित्र होते हैं कि कृत्रिम रंग उनके सौंदर्य को कहाँ पहुँचेंगे ? किंतु ड्राइंगरूम के चित्रों के रंग अधिक चित्त-आकर्षक होते हैं। कारण ?—यही कि इनपर 'मेरे' का इतलाक़ (प्रयोग) हो सकता है। कहाँ तो आकाश के तेजस्वी (शोभायमान) तारे, और कहाँ दुलहिन की तीन गज़ चुनरी के तारे; किंतु पाठक ! सच कहना, जो रुचि इन उत्तर कथित तारों में है, वह है पूर्वकथित तारों में ? नहीं, कदापि नहीं। कारण ? बस यही कि चुनरी (चुँदरी) के तारे "मैं" और "मेरे" के हल्के (वृत) में हैं। ऐ "मैं" (आत्मा)! तेरी कारीगरी पर न्योछावर !
प्रश्न—"आं कि दिल रा मेरुबायद अज़ बरम पैदास्त कीस्त ?" कौन मेरे दिल को चुरा रहा है ? कौन ?
उत्तर—"हुस्ने-तो अज़ रूप-जानाँ मुनअक्स शुद शोर चीस्त।" तू ही प्रेम पात्र बनकर यह चोरी कर रहा
है। ह्यू एंड क्राई ( hue and cry=शोर, क्रंदन और कोलाहल ) कैसी ?
चित्त चुराने में सबसे अधिक निपुण कौन होता है ? चतुर्दश वर्षीया चंद्रवदनी ? कदापि नहीं, वरन् वह जिसपर चित्त आजमय अर्थात् जिस पर "मैं" आ जाय ।—
मेरा निरया तेरे रुख़सार को चमकाता है। तेल इस आग पे तिल आँख का टपकाता है॥
क्या लैला के सौंदर्य पर मजनूँ का जी आया ? नहीं, मजनूँ के जी आने पर लैला का सौंदर्य बना। क्या अच्छा कहा है "लैली रा बचश्मे-मजनूँ बायद दीद" लैला को मजनूँ की आँख से देखना चाहिए। गोपियों का जी श्याम वर्ण पर आया तो श्याम ने वह सुंदर रूप पाया कि तारों को लजाया— देख छवी सब तारे लाजें। नैन चकोर मुख चंद को भाजें॥
सोच कर बताओ ऐ मेरे प्राण ! अव्यक्त ईश्वर ढूँगों को क्यों इच्छित और अमीष्ट है ? किस लिये वह प्यारा है ? केवल अपने लिये। अन्न दाता है, मालिक है, दयामय है, करुणामय है, सृष्टि कर्ता (Maker) है, माता के उदर में उसने प्रतिपालन किया, शिशुपन में दूध दिया, और यह उसी की कृपा से है कि—
अब्रो-बादो-महो-खुरशीदो फ़लक दर कार अंद। ता तो नानें बकफ़ आरी व व ग़फ़लत न खुरी॥ हमा अज़ बहरे-तो सरगश्ता ओ फ़रमाँबरदार। शर्ते-इंसाफ़ न बाशद कि तो फ़रमाँ न बरी॥
अर्थ—बादल, हवा, चंद्रमा, सूर्य और आकाश सब तेरे काम के लिये हैं जिसमें तू रोटी प्राप्त करे किंतु उसको
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ग़फ़लत ( प्रमाद ) से न खाओ। यह सब तेरे लिये चक्कर लगा रहे हैं और तेरे आज्ञाकारी हैं। अतः न्याय की यह शर्त नहीं कि तू ( उस ईश्वर की ) आज्ञा न माने।
अतः इसी तरह ईसाइयों के यहाँ एक गीत (Hymn) गाया करते हैं "उसने मेरे साथ पहले प्रेम किया ( He first loved me ), मैं क्यों उससे प्रेम न करूँ" । धन्यवाद के भजन और प्रार्थना (Thanks,) मनाजातें ( स्तुतियँ ) जहाँ सुनीं, वहीं ईश्वर ने धीरे से कान में यह ध्वनि दी ।-
जमाले-हमनिशीं दर मन असर करदे। वगरना मन हमाँ खाकम कि हस्तम ॥
अर्थ--सहवासी (आत्मा) के सौंदर्य ने मेरे पर प्रभाव डाला है ( जिससे ) कि मैं जीवित बना हूँ अन्यथा मैं जैसा कि हूँ, वही खाक ( धूलि ) हूँ ।
यह निजानन्द स्वरूप केवल मेरा अपना आप क्या है ? शरीर है ?-नहीं, शरीर तो और वस्तुओं की भाँति इस आनंदस्वरूप आत्मा की छाया को लेकर प्यारा बना है । यह अन्य वस्तुओं की अपेक्षा आत्मा के ज़रा अधिक निकट रहता है, इसलिये औरों की अपेक्षा अधिक प्रिय है--
सगे-हुज़ूरी बेह अज़ बरादरे-दूरी ।
पास बैठनेवाला कुत्ता दूर के भाई से भी अच्छा है ।
जिज्ञासु--यदि आत्मा शरीर नहीं तो शरीर में कहाँ पर है ?
ज्ञानी--जो प्रियतम है, वही आत्मा है; आत्मा वह मिसरी और क़ंद है कि जिसको प्राप्त होकर शेष समस्त वस्तुएँ मधुर बनती हैं-।
जिज्ञासु--क्या वह आत्मा पाँव है कि समस्त शरीर के भार को सहारता है ? ज्ञानी--नहीं, पैर प्रियतम कहाँ । जिज्ञासु--पग नहीं तो शरीर में और कोई अंग आत्मा होगा । लो हाथ सही । ज्ञानी--हाथ भी नहीं हो सकता । हाथ से तो मस्तक बहुत अधिक प्रिय है । अस्पताल में इधर एक [unclear] हाथ कटने लगा है, रोगी बिचारा चिलचिलाता है; और उधर एक के मस्तक पर शल्य-क्रिया का कार्य हो रहा है । यह ग़रीब पहले रोगी से डाह करता है; हा दैव ! यदि मस्तक के स्थान पर मेरे हाथ पर फोड़ा होता, तो मुझे चेहरे पर धब्बा तो न लगता । ऐसे अवसर पर स्पष्ट होता है कि हाथ की अपेक्षा मस्तक अधिक प्रिय है, किंतु मस्तक प्रियतर कदाचित् नहीं । नेत्र या और कोई अंग उससे भी अधिक प्रिय होगा । जिज्ञासु--तो फिर क्या आँख या कोई और अंग प्रियतर होने के कारण आत्मा है ? ज्ञानी--नहीं, उस प्रियतर अंग से भी बढ़कर प्रिय कोई और वस्तु आप में है, सोचो ? जिज्ञासु--हाँ हाँ, अब समझे, बुद्धि । बुद्धि अवश्य आत्मा होगी, समझ में भी आ सकता है । ज्ञानी--नहीं नहीं, फिर सोचो । इससे भी अधिक प्रिय कोई और वस्तु तुम में है ? जिज्ञासु--(सोचकर) प्राण (जान)। मलका एलिज़बेथ जब मरने लगी तो चिल्लाई कि अब जितने मिनिट मुझे
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कोई डाक्टर जीवित रक्खे, उतने लाख रुपया ले । इसी तरह मेरी समझ में चाहे कैसा ही बुद्धिमान्, विद्वान् और ज्ञानवान् पुरुष कोई क्यों न हो, उसे मरने के समय यदि यह मालूम हो कि आज़ाद और स्पेंसर(Spencer)की तरह बुद्धि न्योछावर करने पर जीवन का नाता लंबा हो सकता है, तो प्राण के लिये बुद्धि से सर्वथा विच्छेद स्वीकार कर लेगा । अतः प्राण अर्थात् जान सबसे प्रिय है,यही आत्माहै।
ज्ञानी--नहीं नहीं, फिर ज़रा विचार करो ।
जिज्ञासु--विचार आगे नहीं चलता, बुद्धि यहीं तक काम करती है ।
ज्ञानी--क्या सच कहा । वस्तुतः इससे परे बुद्धि की दाल गलती ही नहीं । बुद्धि हार कर कह उठती है:--
अगर यक सरे-मूए बरतर परम । फ़रोगे-तजल्ली विसोज़द परम ॥
अर्थ--यदि एक बाल के बराबर भी मैं इससे ऊपर को उठूं, तो प्रकाश की अत्यधिकता मेरे पर को जला दे ।
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि । इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे । ( साम वेद केनोपनिषद मं० 3 )
भावार्थ--न वहाँ ( सत्यस्वरूप) में दृष्टि ही जाती है, न वाणी, न श्रोत्र और न मन, अर्थात् इंद्रियों की पहुँच से वह स्वरूप अतीत है । न हम यह जानते हैं और न समझते हैं कि किस तरह से उस स्वरूप का उपदेश किया जाय, क्योंकि वह ज्ञात और अज्ञात से भी परे है; ऐसा पहले
उन तत्वेवेत्ताओं से सुना गया है जिन्हों ने हमारे लिये इसका व्याख्यान किया है ।
जिज्ञासु--अतः प्राण ( जान ) ही प्रियतम है और यही मेरा आत्मा ( अर्थात् अपना आप ) है, क्योंकि आगे तो बुद्धि में कुछ आता ही नहीं ।
ज्ञानी--कदापि नहीं । यद्यपि बुद्धि वहाँ तक काम न करे, कोई क्षति नहीं । आत्मा बुद्धि और प्राण दोनों से परे है । और माना कि आत्मा तर्क विचार, अनुमान धारण और संकल्प से परे है किंतु उसको अस्तित्व में कुछ भी वक्तव्य नहीं । वह सत्स्वरूप है ।
जिज्ञासु--भला क्यों कर ?
ज्ञानी--लो सुनो । बहुत काल हुआ, एक विद्यार्थी का प्राण छोड़ते देखा । उसे पैरों की ओर से पीड़ा उठती थी । पहले तो पीड़ा की दौड़ केवल घुटनों तक थी, पिंड- लियाँ और पाँव अपने आप तलमलाते और झिटके खाते थे । धीरे-धीरे दर्द जंघाओं तक पहुँचा और शरीर का वहाँ तक का भाग अपने आप अधकटे मुर्गे की तरह तड़- पने लगा । पीड़ा आगे बढ़गई । अंततः पीड़ा हृदय तक पहुँची, दुःख से छुटकारा मिला । तत्काल ही लम्बी साँस के साथ उस नवयुवक की जिह्वा से ये शब्द सुनाई दिए-- " अरे मेरे प्राण कब निकलेंगे ? मेरे प्राण कब निकलेंगे ? "
ओ प्यारे ! आत्मा वह प्रियतम वस्तु है जो कहता है " मेरे प्राण " अर्थात् प्राणों का स्वामी, जिससे छूत पाकर प्राण प्रिय बनते हैं, जिस आनंद स्वरूप पर प्राण न्योछावर कर देना स्वीकार होता है, वह प्राणों का प्राण आत्मा है ।
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यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ( सामवेद, केनोपनिषद, मं० 8 )
भावार्थ--प्राणों कर जीवत नहीं, जो प्राणों के प्राण । सो परमात्मा देव तू, कर निश्चय नहीं आन ॥
यही आनंद का तुल्यार्थवाला ( Synonym ) तेरा वास्तविक अपना आप आत्मा है जिस की स्तुति वेद यों गाता है--
आनंदो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनंदाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनंदेन जातानि जीवन्ति । आनंदं प्रयन्त्यभिसंविशंतीति ॥ ( यजु० तैत्ति० उ० भृ० व० अ० 6 )
भावार्थ--है लहर एक आलम बहरे-सुरूर में । है बूदोबाश सारी उसके ज़हूर में ॥ मिटती है लहर जिसदम वह ही तो बहर है । हर चार सू है शोला मत देख तूर में ॥
In him we live, move and have our being. अर्थ--उस आत्मा में हम रहते-सहते, चलते-फिरते और अस्तित्व रखते हैं ।
खाँड का कुत्ता गधा चूहा बला । सुँह में डालो ज़ायक़ा है खाँड का ॥
खाँड का ऊँट असबाब के साथ डंडा के नीचे तोड़ा, क्या निकला ? खाँड । हाथी सिंह त राजा के तोड़ा, क्या मिला ? खाँड । रेल लठित साहब के तोड़ी, क्या मिला ? वही खाँड । क्या खाँड भी टूटी? नहीं, वह तो ज्यों की त्यों खाँड की खाँड बनी रही । टूटा क्या ? केवल नाम-रूप । इसी तरह खाँड और हलाहल के, पवन, पावक और पृथिवी
के नाम रूप (Qualities) महावाक्य "तत्त्वमसि" के हथौड़े के नीचे चकनाचूर हुए, तो क्या मिला ?--एक आत्मा--
आप ही आप हूँ याँ ग़ैर का कुछ काम नहीं । ज़ाते-मुतलक़ में मिरी शक्ल नहीं नाम नहीं ॥
श्रीमती. महारानी भारतेश्वरी ( मलिका मुअज़मा ) को देश, काल, वस्तु परिच्छेद के नीचे झाँका, तो अपने आप ही को पाया । देवी देवताओं के मुख से द्वैत रूपी देश, काल, वस्तु ( Time, space and causality ) का पर्दा दूर किया, तो मेरा शुद्ध आत्मा था । खुदाए-पाक ( परमेश्वर ) के चेहरे पर का आवरण फाड़ा तो मेरा ही तेजोमय मुख निकला ।
मनम ख़ुदा ब ब बांगे-बलंद मी गोयम । हर आँकि नूर दिहद मिहरो-माह रा ओयम ॥
अर्थ--उच्च स्वर से कहता हूँ कि मैं ख़ुदा हूँ, और जो तेजों का तेज स्वरूप आत्मा इस सूर्य और चंद्र को प्रकाश दान करता है, वह मैं हूँ ।
वह जो इस एकता को साक्षात्कार (अनुभव) कर चुका है, अर्थात् वाणी में नहीं वरन् व्यवहार में ला चुका है, उसके विज्ञान और तत्वज्ञान के भण्डार में कोई ताज़ी ख़बर नहीं रही । धर्म अपने शासकाभिमानी और ज्येष्ठताभिमानी शिर ( हाकिमाना और बुज़ुर्गाना सिर ) को उसके सम्मुख झुकाता है । चूँ और चरा, क्यों और कब आदि को उसके दरबार में प्रवेश बल नहीं । कामना रूपी घुन का कीड़ा जो राजों और रंकों को एक समान वेधा और नष्ट करता चला जावा है, ऐसे चंद्रल रूपी ज्ञानवान के पास नहीं फटक सकता ।
आनंद 69
ऐ क़ौम बहुज रफ़ता कुजायेद, कुजायेद । मादूक हर्मोज़ास्त बियायेद, बियायेद ॥ माशूक़े-तो हमसायाए-दीवार बदीवार । दर वादिये-सरगदता चरायेद चरायेद ॥ अर्थ--ऐ यात्रियो ! कहाँ जाते हो, कहाँ जाते हो ? प्यारा यहीं है । यहाँ आओ, यहाँ आओ । तुम्हारा प्यारा तो तुम्हारी दीवार से दीवार मिलाये हुए पड़ोसी बन रहा है ( अर्थात् तुम्हारे अत्यंत निकट है ) । ऐसी दशा में फिर तुम जंगल में व्याकुल क्यों फिर रहे हो ?
खेद है यदि इस अपने ही आत्मा को भूल कर कभी धूलि में, कभी रक्त मांस में, और कभी चलती हुई वायु की भांति नाशवान् लोगों की प्रशंसा में आनंद की खोज की जाय । आप ही समस्त वस्तुओं को आनंदमय बनाना, और आप ही श्वानक की तरह उनका पीछा करना ।
आप ही छाल साया को उसको पकड़ने जाय क्यों ? साया जो दौड़ता चले कीजिए वाय वाय क्यों ?
ऐ मनुष्य ! आनंद यदि प्राप्त किया चाहता है तो अपने भीतर ढूँढ ।
जुस्तजू कुन, जुस्तजू कुन, जुस्तजू । दर बरे-ख़ुद वीं हमाजा हस्त ऊ ॥
अर्थ--खोज कर, खोज कर, खोज कर, ( अर्थात् अत्यंत अधिक खोजकर ) । पार्श्व में देख,वह प्यारा वहीं है ।
अथ तो ब्रह्मजिज्ञासा । ( वेदांत दर्शन सू० 1 )
जिज्ञासु--फ़िक्रे-मुआश, ज़िक्रे बुत़ाँ, यादे-रफ़तगाँ । दुनियाँ में आकर भला क्या-क्या कोई करे ? ॥
तिसपर भी आप एक नया बोझ हमपर डाला चाहते हैं । पेट की आवश्यकताएँ (demands) बड़ी विकट हैं,
इसके धंधों से छुटकारा कहाँ ? पेट की चिंता हम न करें तो और करें क्या ? इस हेतु कि परमेश्वर की भी वही राशि ( कन्या ) है जो पेट की, हम परमेश्वर को भी अत्यंत नम्रता से प्रणाम करते हैं और झुक झुक कर दंडवत करते हैं; ( वरन् दूर ही से दंडवत करते हैं )।
ज्ञानी--क्यों प्यारे ! तुम्हारे भोजन का कौन शक्ति पाचन कराती है, क्या तुम्हारी चिंता वह शक्ति है ? तुम्हरी नस नाड़ी में कौन रक्त संचालन करता है ? क्या तुम्हारा यह प्रयत्न काम करता है ? तुम्हारे शरीर और बालों को कौन बढ़ाता है ? क्या तुम्हारे चिंता और परिश्रम का यह फल है ? तुम जब घूक निद्रा (सुपुप्ति) में अचेत पड़े पलंग पर आराम करते हो, तुम्हारे प्राणों की कौन रक्षा करता है ? भली भांति स्मरण रक्खो, यही चेतन ( शक्ति ) राम है जो तुम्हारे लिये भोजन नित्य पहुँचाता है; इसी को आपके भरण पोषण की चिंता है । आपका शरीर और प्राण, आपके स्त्री-पुत्र, धन-संपत्ति सब का आधार वही है । उस गंवार का अनुकरण मत करो जो असबाब की भरी खुर्जी घोड़े पर लाद और स्वयं सवार हो कर कहीं जा रहा था और जिसने मार्ग में कुछ तो घोड़े पर करुणा करके और कुछ असबाब के मोह के कारण " हाय मेरा असबाब, मेरा असबाब " कहकर खुर्जी सिर पर उठा ली, किंतु आप बराबर सवार रहा । बोझ तो पहले की भांति घोड़े पर ही रहा, किंतु गँवार ने अपनी गर्दन व्यर्थ में तोड़ ली ।
जिस्मो अहवालो-मालो-ज़र सब का है वार राम पर । अस्प पै साथ बोझ धर सिर पर उसे उठाए क्यों ? ॥
हाय, हाय ! आनंदराशि परमात्मा से पेट की तुलना
आनंद 101
करना ! समस्त ग्रह और राशियाँ जिस परमात्मा के एक भ्रू-संकेत में सत् असत् होती हैं--
ज़ाले-जहाँ शानो सखुन इशवा-ए-नाज़ुकी मकुन । दिल बतो नेस्त मुश्तिला तन तलमला तला तला ॥
अर्थ-- ऐ विश्व की बुढ़िया ( अर्थात् ऐ दुनिया ) ! मेरी बात सुन और नख़रे-टख़रे मत कर । मेरा दिल तेरे साथ फँसा हुआ नहीं, तन तलमला, तला, तला ( सारंगी का स्वर जिसके साथ यह पद मस्ती की दशा में गाया जाता है ) ।
वस्त्र शरीर के लिये होता है, शरीर वस्त्र के लिये नहीं । उस व्यक्ति की दशा दया के योग्य है जो सारा समय कपड़ों के बनाव श्रृंगार में खर्च कर दे, पर बीमार शरीर की ज़रा ख़बर न ले । अधिक दया के योग्य उस व्यक्ति की अवस्था है जो समस्त आयु को शरीर अर्थात् पेट के धंधों में बिता दे और आत्मा को ( जिसके समक्ष शरीर वस्त्र की हैसियत भी नहीं रख सकता ) नष्ट हो जाने दे । प्यारे ! इस मनुष्य-देह-रूपी सीप से मोती निकाल ले; फिर यह सीप चाहे टूटे, चाहे रहे, कुछ ही हो, बला से । यह मोती (आत्मज्ञान) जब मौखिक वाग्विलास से उन्नति करके अंतःकरण में घर करता है, रोम-रोम में रच जाता है, नस नाड़ियों में प्रवेश पा जाता है, तो निम्न-लिखित अनुभवावस्था का समर्थन करता है कि इधर स्वाराज्य को संभाला, अर्थात् ईश्वरीय राज्य (Kingdom of Heaven ब्रह्मलोकमें)पग रखा, अथवा सत्सिंहासन पर चरण टिका उधर प्रताप चाकर हुआ, देवते आज्ञाकारी बने, और कोई ज़रूरत न रहने पाई जो अपने आप पूरी न होगई । वह पूर्ण ज्ञानी जो इस झूठ व असत्य को शून्य कर चुका है
कि "मैं शरीर या शारीरिक हूँ," और सदा अपने स्वरूप के तेज ( Glory ) में दीप्तिवान है, अपनी महिमा में मस्त पड़ा है, कुन (आज्ञा) कहने नहीं पाता कि फियाकुनँ (आशा पूर्ति) हो आता है । उसी की दृष्टि सृष्टि बनती है, उसी की दृष्टि प्रत्यक्ष होती है । यह अलभ्य पदार्थ ऐ पाठक ! आपके भी निजी भाग में है, प्रत्येक के दाय ( अधिकार ) में है । किंतु सुना होगाकि ( Esaw sold his birth-right for a mess of pottage) हज़रत याक़ूब के बड़े भाई ईसा ने बादशाह और नवूवत जो उसका जन्म जात स्वत्व (birth right) था, शोरबे की एक रकाबी के बदले में खो दिया । शोक ! महा शोक ! कि उसका अनुकरण करके रोटी के बदले दोनों लोक में अपने लिये काँटे बोए जाएँ । ऐ प्यारे ! शारीरिक इच्छाओं के कुसंग को त्याग दें, और अपने स्वरूप को पहचान (know thyself) ।
रोगी पलँग पर एक कमरे में लेटा हुआ है । आओ, ज़रा उसकी बीमारी का हाल पूछते जाओ । दो मनुष्य सरहाने की ओर खड़े हैं, दो पैरों की ओर, दो तीन और इधर उधर सेवा में उपस्थित हैं । आप जैसे प्रतापवान् पधारे । कार्ड भेजा, उत्तर मिला, भीतर जाना नहीं मिलेगा, अधिक बीमार हैं । खैर, आग्रह करने पर आप भीतर गए । सारा शरीर उठाकर अभिवादन करना तो दूर रहा, रोगी ने आँख उठाकर भी तो न देखा । दो तीन बेर अपने अपने आने की ख़बर कान में पहुँचाई (राम राम किया ), तो बड़े नख़रे से नाक चढ़ाकर कहते हैं " हूँ ", अस्तु । गद्दैले चारों ओर बिछे हैं, तकिये धरे हैं, छोगेवाय राम- राम करने बराबर आ रहे हैं,इत्यादि । रोग भी तो अमीरी है । पर प्यारे ! रोग सहेड़कर यह वाहा प्रताप लिया गया
आनंद 103
है । धिक्कार है इस सांसारिक इच्छा ( विषम-रोग ) पर जो वाह प्रताप की इच्छुक होती है, किंतु आत्मा को नष्ट भ्रष्ट कर देती है ।
तनिक देखना, यह आनंद के बाजे कैसे बज रहे हैं ? और गीत गाती, हर्ष मनाती ये स्त्रियाँ किधर जा रही हैं ? ये शीतला की पूजा को चली हैं । एक बच्चे को चेचक ( शीतला ) निकली थी, अब रोग से कुछ निवृत्ति हुई है। स्वास्थ्य पाने का धन्यवाद अर्पण कर रही हैं । जिस इमारत की बाहरी शोभा और श्रेष्ठता को देखकर राज- कीय कोप की भ्रांति हुई थी, वह तो कीड़ों और चूर्ण चूर्ण अस्थियों का पुंज ( अर्थात् मक़बरा ) निकली । प्रियवर ! उनका अनुकरण मत करो जो पहले संकल्प (desire, हवस) रूपी वसंत रोग में फँस जाते हैं और फिर जब तनिक शिर उठाते हैं, तो शरीर में फूले नहीं समाते और भांति- भांति के भाग-विलास के सामानों से केवल यह जतलाते हैं कि हम चेचक के ( victim ) शिकार (भोज्य) थे । ( A goodly apple rotten at the core ) वे उस सुंदर सेब के समान हैं जो भीतर से सड़ा हुआ हो । अहो भाग्य उस व्यक्ति के जो इस रोग ( इच्छा ) का आखेट (शिकार) ही नहीं बना, जिसने न तो कीचड़ से अपना शरीर मलिन किया, और जो न फिर धोता फिरा--
कीच पीछलो धोयकर, आगे को न लगाओ । चंदन आत्मज्ञान तज विषय बीच मत जाओ ॥
संसार में जब किसी की एक कामना मिटती है ( जैसे परीक्षा उत्तीर्ण कर लेना या विवाह होना ), तो उसके शिर से कैसा बोझ हल्का हो जाता है, और उसे कितना आनंद प्राप्त होता है । अब उस विद्वान् के आनंद का क्या पूछना
है जिसके हृदय में किसी कामना को अब स्थान नहीं रह- गया, जिसके समस्त भार टलगए, एक इच्छा शेष नहीं रही, समस्त संकल्प नाश हो गए । अपने आपको जानने में जिसके सब कर्तव्य पूर्ण होगए--
आपूर्यमाणामचलं प्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशंति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशंति सर्वे स शांतिमाप्नोति न कामकामी ॥ ( गीता अ० 6 श्लो० 70 )
अर्थ--जिस सज्जन ने अपनी इच्छाओं को यों समेट लिया है जैसे जल से भरपूर समुद्र नदियों को अपने बीच में प्रविष्ट कर लेता है, वही सज्जन शान्ति प्राप्त करता है, दूसरा नहीं ।
शाहँशाहे-जहान है, ख़ायल हुआ है तू । पैदा कुने-ज़मान है, डायल हुआ है तू ॥ सौ बार ग़र्ज़ होवे तो धो धो पिए क़दम । क्यों चख़ों-मिहरो-माह पै मायल हुआ है तू ? ॥ ख़ंजर की क्या मज़ाल कि इक ज़ख़्म कर सके । तेरा ही है ख़याल कि घायल हुआ है तू ॥ क्या हर गदा-ओ-शाह का राज़िक़ है कोई और ? । इफ़्लासो-तंगदस्ती का क़ायल हुआ है तू ? ॥ टाइम है तेरे मुजरे के मौक़े की ताक में । क्यों डरसे उसके मुक्त में ज़ायल हुआ है तू ? ॥ हमवग़ल तुझसे रहता है हर आन राम तो । वन पर्दा अपनी वस्ल में हायल हुआ है तू ॥
अथ तो ब्रह्मजिज्ञासा ( वेदांत दर्शन सू० 1 ) जुस्तजू कुन, जुस्तजू कुन, जुस्तजू । अन्दरूनत वीं हमाँ जा हस्त ऊ ॥
आनंद 105
ज़िक्रे-बुताँ--(प्रिया-वर्णन या मृतक स्मरण)--आनंद हो, ऐ नाज़ और अदा पर मरनेवालो ! ऐ रोप और कटाक्ष पर कटनेवालो । वह चंद्रवदन जिसकी भूलसे पड़ी दृष्टि द्वारा एक रश्मि पाकर सूर्य और चंद्र प्रकाशमान हैं; फूलों के वर्ण और गंध जिसकी शक्ति से, रमणियों की मुस्कराहट जिसकी छपा से है; वह प्रमादों का प्रकाश, शोभा की खान, और सौंदर्य का प्राण तुम्हारा ही आत्मदेव है ।
वा हमा हुस्नो-खूबेम, आशिक़े-रूप कीस्तम । रस्ता ज़दामे-जिस्मोजाँ वस्ता-ए-मूए कीस्तम ॥ मस्त ज़ चूए-मन जहाँ, दरपए निगहतम रवाँ । वाला व मस्त दरपए निगहतो-चूए कीस्तम ॥ अर्थ--मैं स्वयं समस्त सौंदर्य और शोभा से संचित हूँ, फिर मैं किसके रूप का प्रेमी बनूँ ? ( अर्थात् किसी का भी नहीं ) । मैं शरीर और प्राण के बंधन से स्वतंत्र हूँ, फिर किसके केशपाश का मैं बंदी होऊँ ? (अर्थात् किसी का भी नहीं) । मेरी सुगंध से संसार मस्त होकर मेरी सुगंध का पीछा कर रहा है । मैं किसकी सुगंध का मस्ताना और आसक्त बनूँ ? ( अर्थात् किसी की सुगंध का भी नहीं ) ।
सितमस्त गर हवसत कशद कि बसैरे-सर्वो-समन दरआ । तोज़ ग़ुंचा कम नदमीदाई दरे-दिल कुशा व चमन दरआ॥ पए नाक़ह्ए-रमीदा वू मपसंद ज़हमते-जुस्तजू । व ख़याले-हल्क़ए-ज़ुल्फ़े ऊ, गिरहे,खुरद व ख़ुतन दरआ ॥ अर्थ--यदि तुझे सरो चमेली की सैर का लोभ खींचे, तो सितम है; क्योंकि तू काल से कम खिलनेवाला नहीं; केवल हृदय का द्वार खोल और अपनी वाटिका की सैर कर । ये सुगंधित नामियों ( मृगनाभि=सांसारिक भोगों )
के पीछे पड़े हुए प्यारे ! उनके ढूँढ़ने के* कए क्या मत सहन कर; उस प्यारे (परमात्मा देव) की लटों (केशों) के कुंडल के ख़याल की गिरह लगा और ऐसे तू खुतन में आ । यह Gospal ( शुभ-संवाद ) तुम्हें वेद सुनाता है— त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णोदंडेन वंचसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ॥ 3 नीलः पतंगो हरितो लोहिताक्षस्तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्रः । अनादिमत्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा ॥4॥ ( यजु० श्वेताश्वतरोपनिषद् अ० 4 मं० 3, 5 ) अर्थ--स्त्री ( प्रणयिनी ) तुम ही हो; पुरुष, कुमार और कुमारी भी तुम ही हो; बूढ़े भी तुम ही हो और दण्डे के बल तुम ही चलते हो; और तुम ही उपाधि से उत्पन्न होते हो, और तुम ही सर्व ओर मुख वाले हो, और कृष्ण वर्ण के पक्षी तुम ही बने हो, फूल तुम हो और भौंरा तुम हो, आदि--
वाँकी अदाएँ देखो, चंद का सा मुखड़ा पेखो ॥ टेक ॥ बादल में, बहते जल में, वायू में मेरी लटकें । तारों में, नायिका में, मोरों में मेरी मटकें ॥ चलना ठुमक-ठुमककर, बालकका रूप धरकर । घूँघट अवर उलटकर हँसना यह बिजली बनकर ॥ शबनम गुल और सूरज, चाकर हैं तेरे पद के । यह आन बान सजधज, ऐ राम ! तेरे सदके ॥
पस ओ प्रिया-वर्णन के ध्यान में निमग्न ? इसीलिये । जुस्तजू कुन. जुस्तजू कुन, जुस्तजू । अन्दरूनत वीं कि बेरूँ नेस्त ऊ ॥ अथा तो ब्रह्मजिज्ञासा । ( वेदांतदर्शन प्रथम सूत्र )
आनन्द 107
मृतजनों का स्मरण--ऒ प्रियजनों की मृत्यु पर रोने-चिल्लानेवाले ! ऒ रिश्तेदारों की मृत्यु पर विलाप करनेवाले ! इस रोने-धोने से यदि छुटकारा पाने का तू इच्छुक है, तो आ । अपने भीतर ( inner sanctuary ) पवित्र अंतःकरण में निद्रा कर । अमृत रूप बन । अपने असली धाम ( सच्चिदानन्द ) में निवास कर, जहाँ मृत्यु को मानो अचानक मृत्यु आ जाती है । और फिर देख कि है श्रुति का वाक्य सच कि नहीं--
अतिमुच्य धीरा प्रेत्य स्माँल्लोकादमृता भवन्ति । (सामवेद केनोपनिषद् मं० 2)
अर्थ--धीर पुरुष विषयों से निरासक्त हुए इस संसार से मुँह मोड़कर ही अमृत होते हैं, अर्थात् विषयों के पंजे से छुटकारा पाते ही तत्काल अपने अविनाशी स्वरूप से मिलाप ( अभेदता ) पा जाते हैं ।
ग़मो-ग़ुस्सा-ओ-यासो-अंदेशा हिरमाँ । हवाए-मुसर्रत उड़ा ले गई है ॥
पस इसीलिये निरर्थक कोलाहल और अंधेरी कोठरी में दिन को रात और रात को दिन करने के स्थान पर श्रुतियों की मधुर ध्वनि के द्वारा--
जुस्तजू कुन, जुस्तजू कुन, जुस्तजू । दर वरे-खुद वाँ हमाँ जा हस्त ऊ ॥
अथा तो ब्रह्मजिज्ञासा । ( वेदां० सू० 1 )
हे प्यारे ! संसार ( phenomenon ) की वस्तुएँ वस्तुतः संताप दायक नहीं हो सकतीं, हृदय की तृष्णा इनसे कभी नहीं बुझती ।
Anthony sought happiness in love, Brutus in glory, Caesar in dominion. The first found disgrace, the second disgust, the last ingratitude and each distraction. The things of the world being weighed in the balance are all found wanting. Self realisation alone will bring peace and happiness.
अर्थ--एंथोनी ने प्रीति ( प्रणय ) में, ब्रूटस ने कीर्ति में, और सीज़र ( रूम के शाह ) ने शासन-साम्राज्य बढ़ाने में आनंद ढूँढ़ा । परिणाम यह निकला कि पहिले वाले ( एंथोनी ) को अपमान और अकीर्ति लाभ हुई, दूसरे (ब्रूटस) को घृणा मिली और तीसरे (सीज़र)को घुनन्धता, एवं प्रत्येक बिना आनंद के ही नए हो गया अर्थात् मर गया । इस प्रकार इस असार संसार की सब वस्तुएँ जब अनुभव के तराज़ू में रखकर खूब तोलीं तो सब की सब निकम्मी पाईं, अर्थात् जब सांसारिक पदार्थों का भली भांति अनुभव किया तो सब के सब निकम्मे निकले । केवल आत्मानुभव ही हृदय को आनंद देने वाला निकला ।
अतः--फ़िकरे-मुआशो, फ़िकरे-बुताँ याद-ए-रफ़्तगाँ । अपना ही तू फ़रोश्ता होवे तो सब मिट ॥
अर्थ--जीविका की चिंता, प्रणयिनी सुंदरियों का श्रवणमनन, एवं लोगों का दुःखमय स्मरण, यदि तू अपने निज स्वरूप का ही प्रेमी होवे, तो सब मिट जायँ ।
अथा तो ब्रह्म जिज्ञासा । ( वेदां० सू० 1 ) जुस्तजू कुन, जुस्तजू कुन, जुस्तजू । दर वरे-खुद वाँ कि बेरूँ नेस्त ऊ ॥
आनन्द 109
जिज्ञासु--यह बहुत कठिन है, अत्यंत सूक्ष्म है, हम किस प्रकार विजय कर सकेंगे । ज्ञानी--माना कि अति सूक्ष्म है, अत्यंत कठिन है; किंतु याद रखो, इस बिना चैन भी कहीं नहीं मिलने का, यह औपधि महँगी ही सही, किंतु अद्वितीय है । भयंकर रोग की इसके अतिरिक्त और कोई चिकित्सा भी तो हो । नान्यः पंथा विमुक्तये । अर्थात् आत्मानुभव के सिवाय और कोई मार्ग मुक्ति का नहीं है । अतः जितना कठिन है, उतनी ही जिज्ञासा अधिक करो । हुदी रा तेज़तर मेख़्वां चो मोहमिल रा गिराँ बीनी । नवारा तल्ख़तर मी ज़न चो शौक़े-नग़मा कमयाबी ॥ अर्थ--जब तू ऊँट के भार को भारी देखे, तो हुद्दी ( ऊँट को चलाने की आवाज़ ) को अधिक ज़ोर से बोल, और जब तू तान का शौक़ कम पावे, तो आवाज़ को ऊँचा ( पंचम स्वर में ) खींच ।
अथा तो ब्रह्म जिज्ञासा । ( वेदांत दर्शन सू० 1 ) जुस्तजू कुन, जुस्तजू कुन, जुस्तजू । दर वरे-खुद वाँ हमाँ जा हस्त ऊ ॥
जिज्ञासु--मेरे कुछ मित्रों को एक बेर वेदांत का खब्त हुआ था, उन्होंने तो कुछ दिन टक्करें मार कर अंत में इसका पीछा छोड़ दिया, उन्हें कुछ रस आया नहीं । ज्ञानी--होगा, क्या आश्चर्य है ! उस लोमड़ी (वन- बिड़ाल ) की बात तुमने कभी नहीं सुनी जो अपने साहस की न्यूनता को छिपाने के लिये अंगूरों के सम्बन्ध में यों कह उठी कि "अभी कच्चे हैं, कौन दाँत खट्टे करे" ।
साहस-हीनता को त्याग कर धीरता के साथ श्रवण मनन और निदिध्यासन की मंज़िलों को पार करो-- आत्मा वा अरे द्रष्टव्या श्रोतव्या मंतव्या निदिध्यासितव्यः । ( यजु० बृह० अ० 4 ब्रा० 5 मं० 6 ) अर्थ--निस्संदेह यह आत्मा देखने, सुनने, मनन करने और अनुभव करने के योग्य है । वेद की वाणी झूठी नहीं है कि तुम आनंदघन हो, चेतन घन हो, सत्घन हो । परीक्षा कर लो । शोक है उस बंदी ( ग़रीबी ) पर जो कानों के बंधन के छल्ले को कर्ण-कुंडल मान बैठा हो और हाथ-पाँव की बेड़ियों को कंगन और पग भूषण ठान बैठा हो, गले का संगली को चिड़ियाघर का पट्टा ( University hoods ) स्वीकार कर चुका हो । प्यारे ! उठो, जागो । सांसारिक इच्छाओं की ज़ंजीरें एक दम तोड़ डालो; अज्ञान की निद्रा को शाक़ डालो ( shake off ); देखो तो सही, तुम्हारा तो बंधन भी तुम्हारी मुक्ति सिद्धि करता है । सूर्य में अँधेरा कैसा ?
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । ( यजु० कठो० अ० 1 व० 3 मं 14 ) अर्थ--उठो, जागो, उत्तम ज्ञानियों के निकट जाओ, और उनसे अपने स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करो ।
मिनगर वाहरख़ू पे जाँ ! कि तो ख़ास जान-ए-माई । मफ़रोश ख़ेश अरज़ाँ कि तो बस गिराँ बहाई ॥ अर्थ--हे प्राण-प्रिय ! तू हर ओर मत देख, क्योंकि तू हमारे प्राण का भी मूल तत्व है ( अर्थात् प्राण का भी प्राण है ) । और अपने आप को सस्ता मत बेच, क्योंकि तू बहु मूल्यवान् है ।
आनन्द 111
बिस्ताँ ज़ देव ख़ातिम कि तो ई वज़ाँ सुलेमाँ । बिश्कन सियाह अख़्तर कि तो आफ़ताबे-राई ॥ बगुसल ज़ बे असीलाँ मशनौ ग़रीबे-ग़ोलाँ । कि तो अज़ शरीफ़े-असिली कि तो अज़ बलंदे-जाई ॥
अर्थ--देव (कामदेव) से तू अपनी अँगूठी ले ले, क्योंकि प्राणों की शपथ तू ही सुलेमान है । और उस तिमिरांध- कार को दूर करदे, क्योंकि तू सूर्य का प्रकाश करने वाला है । नीचों से अपना संबंध तोड़ दे और छलियों ( दुष्टों ) की कलकल मत सुन, क्योंकि तू श्रेष्ठ कुल का है और तू ही उच्च पदवाला है ।
इस Superistition ( पक्षपात ) को त्याग कि "मैं शरीर और शरीरत्व हूँ, और--
जुस्तजू कुन, जुस्तजू कुन, जुस्तजू । दर वरे-खुद वाँ हमाँ जा हस्त ऊ ॥ अथा तो ब्रह्मजिज्ञासा (वेदांतदर्शन सू० 1 )
एक राजा ने दो निपुण चित्रकारों ( रवी और कवी) की परीक्षा लेनी चाही । परीक्षा की सुविधा के लिये दोनों को आज्ञा हुई कि आमने-सामने की दीवारों पर अपनी-अपनी चित्रकारी की योग्यता दर्शावें ।
आज्ञानुसार पर्दे तन गए कि एक दूसरे के काम को देखने न पाएँ । प्रति दिन दोनों आते थे और अपनी-अपनी दीवार पर काम करने के पश्चात् चले जाते थे । नियत अवधि बीतने पर राजा साहब अपने सभासदों के साथ देखने के लिये उस स्थान पर पधारे । पहिले रवी की दीवार पर से पर्दा उठाया गया । दर्शक लोग दंग रह गए ।
अहह अहह करने लगे । मुक्त कंठ से बोल उठे । चीन के चित्र भला इससे बढ़कर क्या होंगे ?
तुरा दीदा व मानी रा शुनीदा । शुनीदा कै बुवद मानिंदे-दीदा ॥ अर्थ--मैंने तुझको तो देखा है और मानी का केवल नाम सुना है । भला सुना हुआ देखे हुए के तुल्य किस प्रकार हो सकता है ?
सबओर से यह शब्द सुनाई पड़े कि "बस, हद होगई, रवी तो पूरे के पूरे अंक (full marks) ले गया । महाभारत की समस्त घटनाओं को नए सिरेसे सजीव कर दिखाया । चित्र बोलने ही चाहते हैं । इससे बढ़कर तो ख़्याल में नहीं आ सकता । रवी ही को पारितोषिक मिलना चाहिए। अब कुछ आवश्यकता नहीं कवी की कारीगरी देखने की । कमाल है, कमाल ! " तृप्त (प्रसन्न) तो राजा साहब भी ऐसे हो गए थे कि जी नहीं चाहता था कि कवी की दीवार देखने का कष्ट स्वीकार करें, किंतु कवी ने स्वयं ही पर्दा उठा दिया । पर्दा उठने की देर थी कि बस कुछ न पूछिए । चारों ओर आश्चर्य से निस्तब्धता छा गई । राजा साहब और श्रीमंत लोग दांतों तले अँगुली दावकर रह गए । कुछ पल तक तो श्वांस ( सांस ) भीतर का भीतर और बाहर का बाहर रहगया । जिधर देखो निम्न अधर ( ओष्ठ ) ऊपर के अधर से अलग । सब के सब विस्मित खड़े हैं ॥ आखिर हुआ क्या ? कवी ने सितम क्या करदिया ? राज़व क्या ढा दिया ! अजी यह सफ़ाई ! ओहो हो हो ! दृष्टि फिसली जाती है । और देखो दीवार के भीतर दो-दो गज़ घुसकर चित्र बना आया । हाय ज़ालिम ! मार डाला ।
आनन्द 113
क्या ही ठीक निकला यह वाक्य कि "जहाँ न पहुँचे रवी वहाँ पहुँचे कवी । " पाठक ! समझे कवी ने किस बात पर रवी को मात कर दिया था ? दोनों दीवारों का अंतर केवल दो गज़ के लगभग था । नियत अवकाश के भीतर रवी तो अपनी दीवार के ऊपर रंग और रोगन चढ़ाता रहा; और कवी इतना समय अपनी दीवार की सफ़ाई देने में दत्तचित्त से लगा रहा, यहाँ तक कि उसने वह दीवार स्वच्छ बना दी । जो परिणाम हुआ, वह तो आप ने देख ही लिया । इस झलकती ढलकती दीवार के मुक़ाबले रवी की दीवार खुर- दरी और मैली जान पड़ती थी । इसके अतिरिक्त रवी की सब की सब मिहनत एक सफ़ाई की बदौलत कवी ने मुफ़्त ख़रीद ली और दृक्-शास्र ( optics ) के प्रसिद्ध सिद्धांत के अनुसार जितना अंतर दीवारों के मध्य में था, उतने ही अंतर पर कवी की दीवार के भीतर चित्र दिखाई देते थे ।
हे अपरा विद्याओं के विद्यार्थियों ! हृदय-पटल पर रवी की भांति बाहरी चित्रकारी कहाँ तक पढ़े करोगे ? सतह ही सतह (पृथिवी तल) पर विविध भांति के रूप कहाँ तक भरोगे ? धसे हुए ( Crammed ) विविध वर्ण दिमाग ( मस्तिष्क ) में कब तक रंग जमाएँगे ? और, बिखरे हुए विचार ठूँस-ठूँस कर भरे हुए कब तक काम आएँगे ? ( Education ) एजूकेशन (e, out; duco, to draw) के अर्थ हैं भीतर से बाहर निकालना, न कि बाहर से भीतर ठूँसना । एजूकेशन ( शिक्षा ) के मुख्य प्रयोजन को गड़बड़ करना कब तक ? क्यों नहीं कवी की तरह उस पवित्रता
( Purity ) और आत्मज्ञान दिलाने वाली विद्या की ओर चित्त देते, जिसकी विशेषता है--
हर दम अज़ नाख़ुन ख़राशम सीना ए-आफ़्ग़ार रा । ता ज़ दिल बेरूँ कुनम ग़ैरे-ख़याले-यार रा ॥
अर्थ--मैं अपने घायल चित्त को हर दम नाख़ूनों से छीलता हूँ जिसमें यार ( प्यारे ) के ख़याल के अतिरिक्त प्रत्येक ख़याल को चित्त से बाहर निकाल दूँ ।
कहाँ तो तत्व दर्शाने वाली ब्रह्मविद्या और कहाँ रूपा- सक्त सांसारिक विद्याएँ और कलाएँ जो एक दिन भारत- वर्ष में शूद्रों के लिये विहित थीं ! आज हमारे नवयुवक इन (so called) नाम मात्र की विद्याओं और कलाओं की चाह में गिरकर अधोगति में परमगत और कुएँ की तह में तारा हो रहे हैं । Dark room (अंधेरे कमरे) की विद्या Light ( प्रकाश वा ज्ञान ) मानी गई, तो आज भी आँखों ( हृदय-नेत्रों ) को अन्धा करेगी और फल भी ।
जिस एक के जानने से समस्त न जाना हुई वस्तुएँ जानी जाती हैं, न सुनी हुई सुनी जाती है, न देखी हुई देखी जाती है, जिससे रक्षित तख़्ती ( पराकाष्ठा ) के सब चिह्न हृदय-दर्पण में उतर आते हैं, जिससे सब से बड़ा रहस्य और गुह्य भेद का साक्षात्कार हो जाता है; उस उपनिषद्विद्या ( आत्म ज्ञान ) रूपी सुरमे से क्यों नहीं हृदय के नेत्रों को प्रकाशित करते ?
येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति । (साम० छां० प्र० 6 खं० 1 मं० 3 )
अर्थ, जिस (आत्मज्ञान) से न सुना हुआ सुना हो जाता है, अज्ञात ज्ञात हो जाता है, और न जाना हुआ जाना हुआ हो जाता है ( ऐसे स्वरूप को पहचानो ) ।
आनन्द 115
आत्मानं वा विजानीयात् अन्यां वाचं विमुंचथ । Know this Atman, give up all other vain words and hear no other.
अर्थ--उस आत्मा को जानो और सब व्यर्थ गप्पें छोड़ो; उस तत्वज्ञान के सिवा और कुछ मत सुनो ।
हस्म गाओ अफ़ल राओ हालो-कील । जुम्ला रा अन्दाख़्तम दर आबे-नील ॥ हस्म राओ जिस्म रा दर याफ़्तम । ता कमाले-मारफ़त दर याफ़्तम ॥
अर्थ--विद्या और बुद्धि, चूँ और चरा ( यों क्यों ) इन सबको मैंने नील नदी में फेंक दिया । और मैंने नाम और रूप को हार दिया, तब मुझको ज्ञान की परमावस्था प्राप्त हुई ।
एक नुक़्ते विच गल्ल मुकदी है ॥ कर नुक़्ता छोड़ हिसाबाँ नूँ, कर दूर कुफ़र दियाँ बाबाँ नूँ । दे फूक हिसाब किताबाँ नूँ, कर साफ़ दिले दियाँ लब्वाँ नूँ । इक-अलिफ़ पढ़ो छुटकारा है, इक-अलिफ़ पढ़ो छुटकारा है ।
जुस्तजू कुन, जुस्तजू कुन, जुस्तजू । दर वरे-खुद वाँ हमाँ जा हस्त ऊ ॥ अथा तो ब्रह्मजिज्ञासा । ( वेदांत दर्शन सू01 )
एक व्यक्ति मंदिर में आकर धन्यवाद का प्रसाद बाँट रहा था और आनन्द मना रहा था । किसी ने इस असा- धारण आनंद का कारण पूछा,तो उत्तर दिया कि "मैंने दो बारा जीवन प्राप्त किया है । भला बचा हूँ । चोरों के पंजे से छुटकरा पाया । मेरा घोड़ा तो चोर ले गए हैं, किंतु हज़ार धन्यवाद है कि मैं घोड़े पर सवार न था, नहीं तो
मैं भी चुराया जाता, मेरी जैसी बहुमूल्य वस्तु चोरी के माल में गिनी नहीं गई, इस बात का आनंद है ।
पाठक हंसते होंगे कि विचित्र मूर्ख था । इतना न समझा कि यदि मैं घोड़े पर सवार होता, तो मेरा चुराया जाना तो एक तरफ, घोड़ा भी क्यों चुराया जाता । किंतु हाय !
हर कसे नासिह बराए-दीगराँ । नासहे-ख़ुद याफ़्तम कम दर जहाँ ॥ अर्थ--पर-उपदेश-कुशल बहुतेरे । निज आचरहिं ते नर जग थोरे ॥
अपने-अपने गिरेवान् में मुँह डालकर देखो, क्या हाल हो रहा है । सवार लुप्त है कि घोड़ा ? वह स्वर्गोपम भारतवर्ष जिसके सघन वृक्षों के समूहों में या तो कोकिला का मधुर स्वर सुनाई देता था, या शांति वर्सांती हुई वेदध्वनि; जिसकी मन्द स्पन्द पवन या तो पुष्पों की सुगन्ध को उठाए फिरता थी या पवित्र प्रणव ( ओ3म् ) की ध्वनि का; जिसके दर्पण की भांति स्वच्छ निर्मल स्रोत और नदियाँ उन महापुरुषों के अंतःकरण से अधिक निर्मल न थीं जो वहाँ रमण करते थे; जिनके सरोवरों और तीर्थों पर इधर तो खिले हुए कमल शोभायमान थे, उधर तीर्थ रूपी ज्ञानवानों के तेज वर्साते मुखारविंद; जिसके नगरों में तोते और मैना तक ब्रह्म विचार करते सुनाई देते थे; आज उस ऋषियों वाले भारतवर्ष में इस सिरे से उस सिरे तक कितने मनुष्य ऐसे मिलेंगे, जो स्वरूप में आरूढ़ हों ? कितने हस्तामलक दिखाई देंगे ? जिससे पूछो, सवार नदारद ( नहीं है ), घोड़े ही का पता देगा, अर्थात् शरीर ही का नाम और चिह्न बताएगा । अमुक फ़ल्तर में नौकर, यह वेतन, अमुक जाति, अनुक व्यक्ति का
आनन्द 117
पुत्र, अमुक निवासस्थान, यह आयु, मैं सुन्दर हूँ, मैं मर्द हूँ, मैं फ़लाँ-फ़लाँ हूँ, इत्यादि-इत्यादि । प्यारे ! यह सब तो घोड़े (शरीर) का हुलिया है, किंतु शरीर आप नहीं हो सकते । शरीर पर सवार, शरीर के स्वामी, आप कौन हैं, बताइए ? चुप, निस्तब्ध, शब्द नहीं । Lost ! Lost !! Lost !!! लुप्त ! लुप्त !! लुप्त !!! क्या लुप्त ? हू ऐंड क्राई ( hue & cry ) मचाइए, कोई ! घोड़ा खोया गया है क्या ?--नहीं, घोड़े अर्थात् शरीर का पता तो बराबर मिल रहा है, सवार (आत्मा) लुप्त है । आश्चर्य है, क्या तमाशा है ।
आँखि मा कर्दम बर ख़ुद हेच नाबीना न कर्द । दरमियानेख़ाना गुम कर्दम साहब-ख़ाना रा ॥
अर्थ--जो कुछ हमने अपने पर किया, वह किसी अंधे ने भी नहीं किया; क्योंकि घर के भीतर घर के मालिक को हमने गुम कर दिया है ।
भारतवर्ष-निवासी ! ( Know thyself ). जान अपने आप को ।-- जुस्तजू कुन, जुस्तजू कुन, जुस्तजू । दर दरूतन वाँ कि बेरूँ नेस्त ऊ ॥ अथा तो ब्रह्म जिज्ञासा । ( वेदांत दर्शन सू० 1 )
हस्ती-ओ-अदम हूँ, मस्ती हूँ, नहीं नाम मिरा । ख़ुद परस्ती व ख़ुदाई है, यह बस काम मिरा ॥ ( वहदह उपासना ) चश्मे-लैला हूँ, दिले-कैस व दस्ते-फ़रहाद । बोसा देना हो तो दे ले, है लबे-जाम मिरा ॥ नोशे-गुल हूँ, रुख़े-युसुफ़, दमे-ईसा, सरे-सरमद । तेरे सीने में वह हूँ, है वही वाम मिरा ॥
हल्क़े-मंसूर, तने-शम्स व दिल्मे-दुल्मा । वाह वा, बहर हूँ और बुदबुदा एक राम मिरा ॥
जिज्ञासु--मेरे ख़याल में तो पादरी लोग रैवरेंड स्लेटर ( Revd. slater ) और डाक्टर क्रूज़ियर ( Dr. Crozier ) आदि जैसे तत्वज्ञानी सच ही कहते हैं कि वेदांत महा स्वार्थपरायण धर्म है, अव्वल नंवर की खुदगर्ज़ी सिखाता है--अपनी ही अच्छाई की बताता है ।
ज्ञानी--संसार में कोई मनुष्य ही नहीं जो आनंद का इच्छुक न हो, सीधे या टेढ़े मार्ग से ( directly or indirectly ) सब आनंद के पीछे भटकते हैं ।
सुखं भूयात् दुःखं मा भूयात् । अर्थ--सुख हो, दुःख कदापि न हो ।
अंतर केवल इतना है कि कुछ नासमझ हैं ( क ) जो सर्वव्यापी अपने आप को भूल कर शरीर-भाव में निमग्न हैं ! एक साढ़े तीन हाथ के टापू में क़ैद रहते हैं, शेष सब सृष्टि को अपने से बिलकुल पृथक और जुदा मान कर उनसे तनिक नेह ( प्रेम ) नहीं रखते और आनंद की खोज उन भौतिक पदार्थों में करते हैं जहाँ आनंद है नहीं । इस लिये कि प्रकृति ( Nature ) के विरुद्ध आचरण करते हैं, अतः पग-पग पर ठोकरें खाते हैं और मुसीबतें झेलते हैं । इनका नाम संसार में स्वार्थपरायण (Selfish) रक्खा गया है, इसके स्थान पर कि झूठे या मूर्ख रक्खा जाता । कुछ ऐसे हैं (ख) कि अपने अनुभव या औरों के अनुभव के कारण यह जान चुके हैं कि आनंद केवल एक शरीर का भला चाहने में हमें नहीं मिलेगा । क्रिया और प्रतिक्रिया के नियम ( Law of action and reaction ) के अनुसार
आनन्द 119
"कर भला होगा भला" । या यों कहो कि यह वद है जो प्रकृति-माता ( Mother Nature ) से चपत खाकर इतना सीख चुके हैं कि आनंद लेने के लिये-" I should love others as I love myself" अर्थात् मुझे औरों से ऐसा ही प्रेम करना चाहिए जैसा कि अपने आप से।" औरों का भला करने ही में मेरा कल्याण है। मगर इतना अभी नहीं समझे कि क्यों? मैशीन ( यंत्र ) की भांति काम तो कुछ अंदा में ठीक ही कर देते हैं. किंतु भीतर जान नहीं है। कुछ ऐसे महाशय ख्याल में भी नहीं ला सकते वह हार्दिक स्वच्छता जिस से सिद्ध होता है--
" All are myself, why not love all as myself.
अर्थ--समस्त शरीर में स्वयं हूँ, या सब मेरा अपना आप हैं, तो फिर मैं क्यों न अपनी ही भांति सबसे प्रीति करूँ ? सब शरीर मेरे हैं। केवल एक शरीर को अपना मानना झूठ बोलना है, और ब्रह्मांड के राजराजेश्वर अपने नारायण रूप आत्मा को परिच्छिन्न और बद्ध मान कर कलंकित करना और आत्महत्या करना है, और बहुत भारे पाप का भागी होना है, इस लिये स्वार्थ परता क्यों ?"
रु संख्यक मनुष्य स्वार्थी ( आनंद की चाह वाले ) वैसे ही हैं जैसे गु संख्यक-मनुष्य। हाँ अंतर यह है कि रु संख्या वाले अपने स्वार्थ को पूरा करने का ढंग भी कुछ जानते हैं और गु संख्या वाले इस शैली से विलकुल अनजान हैं। उनका नाम संसार में रक्खा गया है विनीत वा सभ्य, सज्जन पुरुष, सदाचारी लोग। वाह वाह! धन्य हैं ऐसे लोग, धन्य हैं। इसके साथ साथ ये लोग सत्संग की बदौलत या लोगों में कीर्तिवान् होने की इच्छा
से या धर्म के कोदें खाकर, या स्वयं प्रकृति से पाठ पढ़कर इतना किसी अंशमें अवश्य सीख चुके हैं कि गुणन क्योंकर करना चाहिए; गु संख्या वाले मनुष्यों की तरह गुणा देने के स्थान पर घटना नहीं कर देते; परन्तु गुणा के नियम के सिद्धांत को तनिक नहीं समझते ।
समस्त संसार के सिद्धांतों का यथार्थ जानने वाला, सभ्यता रूप गुणा के सिद्धांत तो एक तरफ, घरन विकास, लोगारिथम ( Logarithms घाताङ्क गणन ) और फाटरनियन ( Quaternions ) की तह तक पहुँचा हुआ और प्रकृति का पति है वह व्यक्ति ( क ) जो जानता है ' सर्वत्र वही आत्मा ( अपना आप ) प्रकाशमान है।"
Every where the same Self is manifest
जाहाँ तहाँ, क्या फकीर क्या अमीर, क्या छोटा क्या बड़ा, क्या कैदी ( बंदी ) क्या राज मंत्री, सब एक-ही है--
सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद् दशांगुलम ॥ ( ऋवे॰ 10व॰ उप॰ अ॰ 3 मं॰ 15 )
अर्थात् सहस्रों शिर वाला, सहस्रों नेत्रों वाला, सहस्रों पैरों वाला वह पुरुष है । वह सब ओर से भूमि को व्याप्त कर दशों दिशाओं में स्थित है ।
केवल यह व्यक्ति ( क ) है जो स्वार्थपरायण नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें न अहंकार रहता है न स्वार्थ। उस व्यक्ति को आनंद की चाह भला क्यों ? वह तो स्वयं आनंद है । जिसकी चाह होती है, वह आप स्वयं है, इससे उसका नाम है स्वयंभू-खुद आ या खुदा ।
मतलब-दीदारे-हक़ दीदारे-मा । मंचप-गुफ्तारे-हक़-गुफ्तारे-मा ॥
आनन्द 121
अर्थ--हमारा दर्शन परमात्म-दर्शन का सूचक है और हमारी यातचीत ईश्वरीय वाणी का क्रांत है ।
जबकि एक स्थान की वायु सूर्य की गरमी खाकर पतली होकर ऊपर उड़ जाती है, तो उसका स्थान घेरने को अपने आप चारों ओर से वायु चल पड़ती है, उन्नति कर जाती है; इसी प्रकार ज्ञानवान् जो सर्वोन्न अवस्था को प्राप्त हो चुका है और संसार में आवागमन से मुक्त हुआ अपना स्थान खाली कर गया है, चाहे किसी से बात करे चाहे न करे, क्या शूद्र, क्या वैश्य, क्या क्षत्री, क्या ब्राह्मण, सबका आत्म होकर सब को एक पग आगे बढ़ा देता है । यह एक तिलस्मात का रिफ़ार्मर ( अद्भुत सुधारक ) है, जिसकी विद्यमानता से देश का देश तत्काल से सुधर जाता है, उन्नति पाता है ।
जिल्वे बैठन संतजन, गोह थान् सोहिन्दा । आँकि पाकीज़ा दिलसत अर विनशीनेद खामोश । हमा अज़ सीरते-साफ़ीश नसीहत शुनवंद ।
अर्थ--जो स्वच्छ चित्त और निर्मल अंतःकरण हैं, यदि वह चुप भी बैठ जायँ, तो सब उसके पवित्र स्वभाव से उपदेश सुनते हैं ।
ऐसे महात्मा की तो बोलचाल, गति और दर्शन ही जीवित उपदेश हैं, जिनकी बदौलत-- धन्यभूमी धन्यदेशकाल हो, धन-धन लोचन करिहें दरसजो ।
Archimedes ( हकीम अर्शमीदश गणिताचार्य ) कहा करता था कि I shall move the world if I get a stand point अर्थात् तुलादण्ड के सिद्धांत (Principle of the lever) के अनुसार यदि मुझे एक टेक वा आलम्बन ( फलक्रम fulcrum ) मिल जाय, तो मैं जो छोटा सा
मालूम होता हूँ, सारे संसार को हिलादूँ ।" वह आलम्बन ( टेक ) हकीम अर्शमीदश विचारे को न मिल सका। वेदांत बताता है, वह टेक क्या है ? वह तेरा ही अपना आप ( आत्मा ) है, जो स्वतः सिद्धतः सब का अधिष्ठान ( आधार और आश्रय ) और सत् है, जिसको साक्षात्कार करने से समस्त सृष्टि हिलाई जाती है । अतः अपना ही सुधार करने से संसार का सुधार होता है ।
Physician heal thyself (ऐ वैद्य ! पहले तू अपनी चिकित्सा कर । जब तक तुम्हें चोर दिखाई पड़ता है, तुम्हारे भीतर चोर अवश्य होगा; जब तक और लोग तुझ से भिन्न ( अयोग्य, खराब, सुधारने-योग्य ) दिखाई देते हैं. ऐ सुधार का बीड़ा उठाने वाले ! अपनी चिकित्सा कर, अपनी पतित अवस्था पर आठ-आठ आँसु रो; और यदि कोई रक्तबिंदु तेरे हृदय-तल में है तो उसे आँसु बनाकर आँख के रास्ते निकाल डाल; यहाँ तक कि तेरे हृदय की वाटिका सिंचित होते-होते एक दिन इस स्थान ( आनन्द ) से मुखरित हो जाय कि--
ब्रह्मैवाहमिदं जगच्च सकलं चिन्मात्र विस्तारितम् । सर्वं चैतद्विद्यया त्रिगुणया अशेषं मया कल्पितम् ॥
अर्थ--मैं और यह चिन्मात्र ( तुच्छ ) फैला हुआ समस्त संसार ब्रह्म ही है और यह सारे का सारा समस्त जगत् तीन गुणों वाली अविद्या के कारण मुझसे कल्पितहै।
ऐ गोलप-निवासियों ! तुम वेदांत को कहते हो स्वार्थी, जिस वेदांत का आदर्श ( Ideal ) है संन्यास, जिसमें बड़ाई का परिमाण ( तराजू ) है त्याग (Renunciation), बड़ा देखना हो तो यह नहीं पूछा जाता कि इसके पास
आनन्द 123
रुपया कितना है, वरन् यह कि इसकी चित्त-विशालता ( उदारता ) कितनी है ।
महीं रम्याशय्या विपुलमुपधानं भुजलता । वितानं चाकाशं व्यजनमनुकूलो ऽयमनिलः॥ स्फुरद्दीपश्चंद्रो निरति वनितासंगमुदितः । सुखं शांतः शेते मुनिरतन भूमिनृप ऽश्व ॥ ( भर्तृहरि, वैराग्यशतक श्लो॰ 64 )
अर्थ--जिसके हां भूमि ही सुन्दर शय्या, भुजा ही सरहाना ( तकिया ), आकाश ही छत (मण्डप ), अनुकूल वायु ही पँखा और प्रकाशमान चन्द्र ही दीपक है, और जो उक्त सामग्रियों से विरक्तता रूपी स्त्री के संग आनन्द मय व प्रसन्न है, ऐसा विरक्त मुनी बड़े-बड़े ऐश्वर्यवान् राजाओं के समान सुख से शयन करता है ।
खिश्त ज़ेरे-सरो वर तारक हफ्त अख्तर पाए । दस्ते-कुदरत निगरो मन्सबे-साहवजाही ॥
अर्थ--शिर के नीचे तो ईंट है और पैर सातों नक्षत्रों के ऊपर; तू इस रुतबे वाले की सामर्थ्य का अधिष्ठान और पद देख ।
सात गाँठ कौपीन में साध न माने संग । राम अमल माता फिरे गिने इन्द्र को रंक ॥
जिस वेदांत की पवित्र चौखट पर पग रखने के लिये ही आवश्यक है "इहामुत्रफलभोगविरागः" ( वेदांत सार ) अर्थात् "न केवल स्वर्ग की अप्सराओंपर आँख न डालना, वरन् इन्द्र ब्रह्मा आदिक के उत्तम ऐश्वर्यों पर लात मार देना", फिर क्या विसात कि इस संसार की नाशमान, अस्थिर क्षणभंगुर वस्तुओं के लोभ में मारे-मारे फिरना और धूलि उड़ाना--
हर पर आँख न डाले कमी दीदा तेरा । खुद से बेगाना है ऐ दोस्त दिलनासाँ तेरा ॥
हाँ, एक एतिरज़ वेदांत एक अच्चल दरजे की स्वार्थपर (खुदगर्ज़ी) विद्या है । कुछ तत्वज्ञानियों का कथन है कि जब कोई सज्जन किसी विपत्तिग्रस्त पर कृपालु होकर उसपर कृपा करता है, तो वह मिहरबा ( अनुग्रह ) उस व्यक्ति पर कुछ नहीं होता, वरन् अपने ही पर होता है । कारण यह, कि जिसे कुछ मनुष्यों का स्वभाव कोमल होते हैं, तो वह औरों के दुःखमय की दीत्र स्वीकार करलेते हैं, निकट का मनुष्य जमाई ( yawning ) लेता है, उनकी जमाई आ जाता है, अन्य रोगों से तत्काल प्रस्थित होने का तो कहना ही क्या है; वैसे ही कोमल चित्तवाला मनुष्य अपने पड़ोसियों की विपत्ति का सांसार्गिक रोग (मज़ मुतअद्दी) की भांति झट अपनी ही अंगीकार करलेता है, और फिर उस अंगीकृत रोग-संताप का मिथ्या करने के लिये गरीब पड़ोसी पर कृपा और दया करता है । यह कृपा और दया अपने ही लिये होती है, अन्य के लिये तनिक भी नहीं । जिसे दया और कृपा माने बैठो हो, यह भी तो एक प्रकार की स्वार्थपरता ही है । परन्तु वेदांत की स्वार्थपरता इससे भी गई बीती है, परले पार जाती है । यहाँ तो ये वेदांत को कुदृष्टि से देखने वाले महाशय ! ज्ञानवान् का "स्व" ( अपना आप ) इतना विस्तार पकड़ लेता है, इतना देश घेर लेता है, ऐसा विश्वाधिकार करता है कि प्रशंसा में वाणी की गति मंद और मन की कल्पना अस्पंद हो जाती है ।
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । ( य॰ तै॰ उ॰ 2-4-1 )
आनन्द 125
जहाँ से वाणी लौट आती है और जो मन के द्वारा भी अप्राप्य है ।
जिस प्रकार आपको एक शरीर विशेष के संबंध में यह ख़याल है कि "यह मेरा है", ठीक उसी वेग के साथ ज्ञानवान् समस्त सृष्टि को "मेरा" कह सकना है ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । ( गी॰ 7-7 )
अर्थ--मुझमें यह सब जगत् ऐसे ओतप्रोत है, जैसे माला के दाने-सूत्र में ।
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुयश्यति । सर्वं भूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ( य॰ ई॰ उ॰ मं॰ 6 )
अर्थ--जो सब पदार्थों को अपने आत्मा में और अपने आपको समस्त पदार्थों में देखता है, वह फिर किसी की निंदा नहीं करता, अर्थात् उसको सब अपना आप ही दिखाई देते हैं, इसलिये उससे सब के साथ ऐसी ही प्रीति उमड़ती है, जैसी कि उसका अपने आप के साथ ।
एक अवस्था ज्ञानवान् पर यह आती है कि-- पत्ती को फूल की लगा सद्मा नसीम का । शावनम का क़तरा आँख में उसकी नज़र पड़ा ॥
गुलाब की पंखड़ी पर तो कोमल पवन से ज़रा सी चोट आई किंतु हाय, यह अभेदता ! कि ज्ञानवान् के नेत्र सजल होगए ।
खूँ रगे-मजनूँ से निकला दर्द लैली की जो ली । दृश्क में तासीर है पर जज़्बे-कामिल चाहिए ॥ with nature and the God of nature.
अर्थ--( वह ज्ञानवान् ) प्रकृति और प्रकृति के स्वामी से अभेद हुआ होता है, या प्रकृति से अभेद और प्रकृति का स्वामी हुआ होता है ।
इस ज्ञानवान् के अनुभव को गेटे ( goethe ) ने यों लिखा है--
I tell you, what's man's supreme vocation Before me was no world, 'tis my creation. 'Twas I who raised the sun from out the sea The moon began her changeful course with me.
अर्थ--मनुष्य का जो सब से उत्तम व्यवहार है उसको खुल्लमखुल्ला मैं तुम्हें बतलाता हूँ । वह यह है कि संसार मुझ से पहले न था, और यह मेरा ही बनाया हुआ है, और यह मैं था जिसने सूर्य को सिंधु से उदय किया और जिसके कारण चंद्रमा ने अपना परिवर्तनशील भ्रमण मेरे साथ आरंभ किया ।
हाय स्वार्थपरता ! बतलाऊँ अपने कुफ्र की गर रम्ज़ खोल को । वे इख्तियार कह उठे इस्लाम कुछ नहीं ॥
यहीं पर वेदांत कब अलम होता है, प्यारे डाक्टर क्रोज़ियर ( Dr. Crozier ) ! वेदांत की विचित्र अनीति व अन्याय और देखो--
द्वितीयाप-दृष्टि है रोता है क्या ? आगे-आगे देखिए होता है क्या !
वह रसायनिक-दृष्टि ज्ञानवान् की जहाँ पड़ी, ईश्वर ही ईश्वर बना दिया, कोई नीचता रही न ऊँचता, बुद्धिभ्रंश ( दीवानगी ) रही न बुद्धिचातुर (होशमन्दी) ।
आनन्द 127
विद्या विनय संपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनिचैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः ॥ ( गी॰ 5-18 )
अर्थ--विद्वान् और विनयशील ब्राह्मण में; गाय, हाथी, कुत्ते, और चांडाल में पंडित ( ज्ञानवान् ) पुरुष समदर्शी होते हैं ।
उस प्रकाश की आंधी के आगे घर-बार प्यादा और सवार सब उड़गए, सुहागा फिर गया, सब सफाई होगई । आगे क्या कहूँ ! आगे क्या कहूं ?
ज्ञान की आई आंधी रे यारो, ज्ञान की अई आंधी । सकल उड़ानी भरम की टाटी क्या रानी क्या बांदी ॥
समस्त संसार ज्ञानाग्नि में जल गया । यार, पार, यार; जित बल देखा नूर जमाल ।
परमहंस के सम्मुख स्त्री आखड़ी हुई; माँ माँ ! काली काली ! कहकर चरण पकड़ लिए । मजनूँ के सामने बाप खड़ा था--
मजनूँ गुफ्ता बिगो, पिदर कीस्त ? । गैर अज़ लैली दिगर कसे चीस्त ? ॥
अर्थ--ऐ मजनूँ ! बता, तेरा पिता कौन है ? उसने कहा कि लैली के सिवा और कौन हो सकता है ( अर्थात् लैली ही है ) ।
शिवली जुमे ( शुक्रवार ) की नमाज़ के लिये इमाम बनाया गया, तो वहाँ यह मधुर वाक्य उसने गाया--
मन खुदायम, मन खुदायम, मन खुदा । फ़ारग़म अज़ किब्रो-अज़ कीनो हवा ॥
अर्थ--मैं खुदा हूँ, मैं खुदा हूँ, मैं खुदा हूँ और लालच, द्वेष और अभिमान से मैं मुक्त हूँ ।
यह सुनकर जुनेद ने शिकायत की--
आँचेः मन बा तो गुफ्तअम व नगुफ्त । तो अयानश हमी कुनी अज़हार ॥
अर्थ--जो कुछ मैं ने तुझको पोशीदगी ( एकांत ) में कहा, तू उसको खुल्लमखुल्ला प्रकट करता है ? ।
शिवली ने उत्तर दिया-- मन हमी गोयम व हमी शुनवम । नेस्त कस गैरे-मन व हर दो दयार ॥
अर्थ--मैं ही स्वयं कहता हूँ और मैं ही सुनता हूँ, मेरे सिवाय दोनों लोकों में कोई नहीं है ।
मैं तो नितांत एकांत में हूँ, अन्य कोई है ही नहीं, प्रकट करना कराना क्या अर्थ रखता है ।
तन्हास्तम, तन्हास्तम, दर बहरो बर यक्तास्तम । जुज़ मन न वाशद हेच शै मन जास्तम मन मास्तम ॥
अर्थ--मैं अकेला हूँ, मैं अकेला हूँ और जल थल में अद्वितीय हूँ; मेरे सिवाय कोई वस्तु अस्तित्व नहीं रखती, मैं स्वयं भूमि हूँ और मैं ही स्वयं जल हूँ ।
धन्य है विरक्तता ! जिसपर सहस्रों विश्वास बलिदान । धन्य है मस्ती ! जिस पर लाख न्यूटन और कैल्विन न्यौछावर ।
दर्द-मारा वे शुमा, दिरमाँ सुवादा वे शुमा । मर्ग वादा वे शुमा, जानै-सुवादा वे शुमा ॥ विश्नौ अज़ ईमाँ कि मी गोयद व आवाज़े-बलंद । वा दे ज़ुल्फ़े-काफ़ीस्त कईमाँ सुवादा वे शुमा ॥
अर्थ--ऐ प्यारे ! तेरे बिना हमको पीड़ा हो, पर तेरे सिवाय इस पीड़ा की चिकित्सा न हो । बिना तेरे हमारी मृत्यु हो, पर बिना तेरे हमारे में जान मत हो । विश्वास से
आनन्द 129
सुन जो कुछ कवि उच्च स्वर से कहता है ( अथवा जो कुछ कवि विश्वास के साथ उच्च स्वर से कहता है, उसे तू सुन ) कि तेरी दो काफ़िर ज़ुल्फ़ों के साथ मेरा यह विश्वास बिना तेरे मत हो ।
ऐ सांसारिक दृष्टि ! ऐ हाड़ चाम देखने वाली दृष्टि । मर क्यों न जाय तू कटारी पेट खाय के ?
सद शुक्र गोयम हर ज़माँ, हम चंग रा हम जाम रा । कई हर दो बुरदन्द अज़ मियाँ हम नंग रा हम नाम रा ॥ 1 ॥ दिल तंगम अज़ फ़रज़ानगी दारम सरे-दीवानगी । फ़ज़ खुद दिहम पेगानगी, हम खास रा हम आम रा ॥ 2 ॥ चूँ मुर्ग़े परंद अज़ कफ़स, दीगर नयंदशद ज़ि कस । वीनद मुवारक पेशोपस, हम दाना रा हम दाम रा ॥ 3 ॥ ऐ जाँ ! तो गर हिम्मत कुनी, दिल अज़ दो आलम बरकनी । यक बारा अज़ हम विशकनी, हम पुश्ता रा हम खाम रा ॥ 4 ॥
सिज्दा गरदानम किरा ऐ जाहिदा । खुद खुदायम खुद खुदायम खुद खुदा ॥
अर्थ--मैं चंग और प्याले को धन्यवाद देता हूँ, क्योंकि इन दोनों ने लाज शरम को मेरे हृदय से बिलकुल उठा दिया ? ॥ 1 ॥
मेरा चित्त इस बुद्धि से व्याकुल हो गया है, क्यों कि मेरे मस्तिष्क में उन्मत्तता और पागलपन समाया हुआ है, तथा विशेष और सामान्य को मैं अपने से अन्य समझता हूँ ॥ 2 ॥
जब पक्षी जाल से उड़ जाता है, तो फिर वह किसी से नहीं डरता है, तब वह जाल और दाने को आगे पीछे मुबारक समझता है ॥ 3 ॥
ऐ जान ! यदि तू साहस करे तो मेरे चित्त को दोनों लोक से उठा देवे और एक बार करे पके को बिलकुल तोड़ डाले ( अर्थात् अच्छी बुरी इच्छाओं वा फल को नाश करदे ) ॥ 4 ॥
जब मैं स्वयं ही खुदा हूँ, मैं ही खुदा हूँ; तो ऐ कर्मकांडी ( उपासक ) ! बता. मैं सिज्दा ( नमस्कार ) किसके आगे करूँ ।
नोट--इसी वर्ष लेख के आगे दूसरा लेख रिसाला अलिफ़ (मासिक पत्र) में "जीवित कौन है" है और जिस को अंग्रेज़ी भाषा में स्वामी जी महाराज ने "आत्म विकास" ( Expansion of self ) नामी दिव्य भाषण दिया है, उसका अनुवाद भाग 15 में आवेगा । स्थान कम होने से इस भाग में नहीं दिया जासका ।
मंत्री.