श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

प्रस्तावना

भाग 17-18 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 17-18 · अध्याय 1 / 15

प्रस्तावना

भगत धन्ना राम जी की संक्षिप्त जीवनी ।

भगत धन्ना राम जी जिन्हें तीर्थ राम जी के बचपन (बाल्यावस्था) में ही उन के गुरु होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था जाति के अरोड़ा और संज्ञा में मनोच थे। भारत में (विशेष करके पञ्जाव में) यह जाति अपने को क्षत्रि वंश से निकली मानती है। पर जिन २ नगरों में यह जाति क्षत्रिय मानी जाती है, वहां २ भी उच्च वा उत्तम श्रेणी के क्षत्रियों में इस की गणना नहीं होती वल्कि क्षत्रिय वंश के अन्तर्गत खत्रियों से भी नीच मानी जाती है, और द्विज ब्राह्मणों से तो कई गुणा अधम समझी जाती है।

तीर्थ राम जी जाति के ब्राह्मण और उत्तम कुल के गोस्वामी थे, जो पञ्जाव में द्विजों के गुरु वराने से प्रसिद्ध हैं। ऐसी उत्तम द्विज कुल की सन्तान का गुरु बनना भगत धन्नाराम जी जैसे के लिये कुछ कम सौभाग्य का अवसर नहीं था। इस लिये ऐसी अवस्था में यदि वह बड़े भारी भाग्य शाली कहे वा समझे जायं, तो किंचित् अनुचित न होगा।

भगत धन्ना राम जी के पिता का नाम लाला जवाहर मल था। भगत जी का जन्मकाल कार्त्तिक संवत् 1800 से

बतलाया जाता है। भगत जी के जन्म लेने के कुछ काल पश्चात् ही उनकी पूज्य माता का देहान्त हो गया, अर्थात् भगत जी अभी किञ्चित् सचेत भी होने न पाये थे कि उन्हें अपनी परम प्यारी माता के प्रेम भरे आञ्चल से सदा के लिये पृथक हो जाना पड़ा और माता की प्रेम भरी गोद देर तक नसीब न हुई।

इस छोटी सी आयु में भगत जी को उन की प्रेम भरी भूआ (पिता की भगनी) और दादी ने पाला पोसा। बाल्या- वस्था (लड़कपन) में वहां की रीति स्वाजानुसार वह पाधा के पास पढ़ने को बिठाये गये, अर्थात् हिन्दी वा देशी भाषा की पाठशाला में प्रविष्ट किये गये। दो चार वर्ष तक निरन्तर उन्हों ने वहां लएडे (देशी अक्षर जिस से दुकान्दार लोग अपना हिसाब किताव लिखते और पत्र व्यवहार करते हैं) और देशी हिसाब किताव खूब सीखा, मानो दुकान्दारी के हिसाब किताव में अच्छे दत्त (प्रवीण) होगये।

भगत जी के मुखार्विंद तथा गुसाईं तीर्थराम जी की अपनी नोट बुक से मालूम हुआ कि बाल्यावस्था में ही भगत जी बड़े होन्हार (आशान्वित) और करामाती थे। उन का पाधा जब लड़कों को छुट्टी दिया करता था, तो वह प्रायः कुछ आशान्वित लड़कों को गणित के कुछ प्रश्नों को मुखागर पूछने के लिये रोक लिया करता था, और जो लड़का उनके प्रश्न का पहिले उत्तर देता उसे तत्काल छुट्टी मिल जाती और शेष लड़के तत्पश्चात् बारी बारी छुट्टी पाते थे। प्रत्येक वार भगत जी ही इन प्रश्नों के उत्तर देने में प्रथम रहते और सब लड़कों से पहिले छुट्टी पाया करते थे, मानों अपने सब सहपाठियों में प्रथम थे।

एक बार सहपाठियों ने परस्पर मिल कर भगतजी पर कोई झूठा दोप आरोपन करना चाहा जिससे, वह सब से पहिले घर जाने न पाये। इस प्रकार एक विद्यार्थी ने भगत जी की शिकायत की और शेप सब विद्यार्थियों ने उस का समर्थन किया। इस पर पाधा जी ने दूसरे लड़के से भगत जी की पीठ पर पाँच चपत ज़ोर से लगवाये जिन के चिह्न बहुत काल तक उन के शरीर पर बने रहे। पाधा जी का नाम वाशी पाधा था। चूंकि यह सब दण्ड भगत जी को बिना उनके अपराध और बिना ठीक २ जाँच के मिला था इस लिये वह हताश चित्त से घर पहुँचे। और घर में प्रविष्ट होते ही रो कर अपने पिता जी से यों कहने लगे:—"देखो! वाशी पाधा जी ने बिना किसी अपराध के नाहक सखत चपत दूसरों से मेरी पीठ पर लगवाये हैं, इस लिये मैं भविष्य को पाधे (पाठशाला) में कभी नहीं जाऊंगा। यदि आप मेरा इस पाठशाला में जाना बन्द करदोगे, तो मैं घर में रहूंगा, अन्यथा नित्य के लिये घर से बाहर चला जाऊंगा।" इस पर पिता ने उसे सन्तुष्ट किया और प्रतिज्ञा की कि "हम तुम्हारा पाधे (पाठशाला) जाना नितान्त रोक देंगे, तुम घर से बाहिर कहीं मत जाओ।" तदनुसार भगत जी का पाधे जाना बिल्कुल बन्द होगया।

पाठशाला जाना तो बंद होगया, पर जैसा भगत जी का अपना कथन है, उस अनापराधी को अन्याय पूर्वक दण्ड देने का फल पाधा जी को यह मिला कि उन का बड़ा पुत्र शीतला के रोग से ग्रस्त होकर मर गया और तत्पश्चात् पाधा के शेप पुत्र भी बारी २ एक के बाद दूसरे करके उसी रोग से मृत्यु को प्राप्त होगये। फिर उन की प्यारी अर्धांगी

परलोक सिधार गई, और अर्धांगी की मृत्यु के थोड़े काल पीछे आप स्वयं भी स्वर्गवास हो गये। तात्पर्य यह कि दो मास के भीतर २ ही पाधा जी का सारा वंश नष्ट हो गया।

इन्हीं दिनों में गुजरांवाले के एक और धनाढ्य पाधा रत्न ने भी अपने पुत्र के कहने पर भगत जी को बिना उस के अपराध के मारा था, जिस का फल उन्हें भी यह मिला कि पाधा जी का इकलौता पुत्र (सर्वदयाल) हैज़ा (विपूचिका) की बीमारी से मर गया। और शेप वंश का भी वही हाल हुआ जो वाशी पांधा के वंश के साथ हुआ था।

पाधे से उठने अर्थात् पाठशाला छोड़ने के बाद भगत जी को उनके पिता ने ठठेरे (कसेरा) का काम सीखने के लिये एक अच्छे अभ्यासी (प्रवीण) ठठेरे के सुपुर्द कर दिया। थोड़े काल के भीतर ही भगत जी ने उस काम से अच्छी मुहारत हासिल करली और अपनी रोज़ी (जीविका) कमाने के योग्य होगये। उन्हीं दिनों में भगत जी को व्यायाम और कुश्ती से बड़ी रुचि थी। सायंकाल जब ठठेरे के कार्य से अवकाश पाते, भट अखाड़े में पहुँच जाते और वहां प्रत्येक प्रकार का व्यायाम करते थे। जो रुपया या सवा रुपया प्रति दिन कमाते वह सब इसी पहलवानी (मल्ल-युद्ध) में खर्च कर देते थे। इस प्रकार जब युवावस्था को पहुंचे, अर्थात् जब वह लग भग 16 वर्प के हुए, तो एक बार वैशाखी के मेले पर पंजाब के कटास राज तीर्थ की यात्रा को गये। यह तीर्थ भारतवर्प की चक्षु कहलाता है, और पिंड दादन खाँ नगर से लगभग 15 मील की दूरी पर है। वैशाखी के दिन हिन्दुओं का मेला यहां बड़ी धूम धाम से लगता है और इस मेले पर अनेक साधु महात्मा आते हैं। यह तीर्थ

यात्रा समाप्त करके भगत जी जब कटास राज से पिण्ड दादन खाँ को वापिस आये तो उन का चित्त वहां ही रह जाने को चाहने लगा। और वहां ठठेरे का काम अधिक देख कर उन्हों ने उसी वृत्ति की दुकान खोल ली, और स्थाई रूप से बसना शुरु कर लिया।

इस नगर (पिंड दादन खां) में कुश्ती (मल्ल युद्ध) की वज़ूश का रवाज नहीं था। केवल भुंगलियों और मुगदर इत्यादि से व्यायाम करते थे। भगत जी इस कुश्ती के व्यवसाय में अति निपुण वो थे ही, अपने अभ्यास (शौक़) के कारण इस नगर में भी कुश्ती की वज़ूश का रिवाज डाल दिया और इस काम के लिये एक बड़ा अखाड़ा बनवा डाला। इस अखाड़े में वह आप भी प्रति दिन मल्ल-युद्ध करते और कई एक अन्य युवकों को भी खूब वज़ूश कराते थे। इन की देखा देखी इन के अखाड़े की तर्ज़ पर उस कस्बे (नगर) में कई एक और अखाड़े भी बन गये। थोड़े काल के बाद उन्हें एक बड़े शक्तिशाली मल्ल (पेहलवान) से मल्ल-युद्ध करना पड़ा। यह मल्ल भगत जी से त्रिगुणे कद का और मोटा ताज़ा था, तथापि अखाड़े में भगत जी ने उसे खूब पिछाड़ा। और एक घंटे के अन्दर २ चित्त कर दिया। यह आश्चर्यजनक जीत भगत जी को शारीरिक बल से नहीं हुई थी वहिक, जैसा उन्हों ने वर्णन किया, यह सब परमात्मा पर पूर्ण विश्वास रखने का परिणाम था।

इस युवावस्था में भगत जी जैसे कि वलवान् और पहल्वान (मल्ल) थे, वैसे ही चित्त के बड़े शूर वीर और उदार थे। जो कुछ कमाते वह कुछ खुद खाते और बहुत खी रक़म साधु महात्माओं की सेवा में खर्च कर देते थे। और इरादे (संकल्प)

या हठ के भी इतने पक्के थे कि जो मन में ठान लेते उसे ज़रूर निभा कर दिखा देते थे। एक पक्के इरादे की मदद से उन्हों ने ऐसे २ अजीव स्वभाव डाल लिये कि जो दूसरों को आश्चर्य किये विना न रहते। दृष्टान्त रूप से कितने समय तक वह केवल पाखाने जाते और पेशाव (लघुशंका) कदापि न जाते थे। ऐसे ही भोजन करते तो पानी नितान्त न पीते थे। एक बार ऐसा स्वभाव डाला कि दिन भर हंसते ही रहे, और फिर ऐसा मौन साधा कि नितान्त चुप रहे। कभी शीतकाला में नितान्त कपड़े न पहन कर नंगे तन जीवन व्यतीत करने लगे। और कभी गर्म ऋतु में कपड़ों के भार से अपने को लाद लिया करते। तात्पर्य यह कि अपने अत्यन्त विचित्र स्वभाव भगत जी ने डाले हुए थे जिन से उनके संकल्प की दृढ़ता का काफी प्रमाण मिलता है।

बाल्यावस्था में ही भगत जी की रुचि कथा सुनने की थी। जहां कहीं कथा होती, वहां वे अपने साथियों समेत जाते, और जब उन के साथी कथा के समय बात चीत करते या शोर मचाते, तो भगत जी उन को चुप करा देते थे; बहुत ध्यान से आप कथा सुनने और दूसरों को भी चित्त लगाकर सुनने के लिये कहते थे। संक्षेप से यह कि उन की रुचि धर्म के कार्यों में पहिले ही से थी। और प्रेम व भक्ति की कथा से उन के चित्त पर इतना प्रभाव पड़ता था कि एक बार रास मण्डल में सुदामा भक्त की बेपरवाही और उस पर कृष्ण महाराज की अधीनता को देखकर उन की आंखों में प्रेम के आँसु भर आये।

इसी प्रकार जब एक ओर से शारीरिक बल और दूसरी ओर से चित्त की एकाग्रता में उन्नति पाने लगे, तो भगत जी

में कविता बनाने की योग्यता (शक्ति) प्रकट होने लगी। जब किंचित भी वह समाहित चित्त होते तो भट कविता उन के मुख से बिना यत्न निकल पड़ती। इन्हीं दिनों उन की लेखनी से दो सीहरफियां (कवितायं) निकली थीं, जिन के विपय में गोस्वामी तीर्थराम (पीछे स्वामी रामतीर्थ) जी अपनी लेखनी से यों लिखते हैं:—"यद्यपि इन सीहरफियों (कविताओं) के पद्यों में मधुर स्वर और छन्द (Metre and Bright muse) इत्यादि अधिक नहीं हैं तथापि प्रशंसनीय बात यह है कि इन में परिश्रम का तो नाम तक भी खर्च नहीं हुआ, जैसा कि अन्य कवियों के विपय में देखा जाता है। दृष्टान्त रूप से फ़रदौसी को लीजिये कि तीस वर्प में केवल साठ हज़ार कविता बनाने पर भी, कि जिनका परिमाण (अन्दाज़ा) पाँच या छे पद्य प्रति दिन होता है, फिर भी उन में यह गुण वा लक्षण नहीं पाये जाते।"

लगभग इन्हीं दिनों में भगत जी को योग वासिष्ट की कथा सुनने का समागम हुआ जिस से उन्हें प्रथम ही प्रथम यह पता लगा कि "मनुप्य सब कुछ कर सकता है और यह कि जीव वास्तव में ब्रह्म रूप है।" इस रहस्य को पाते ही भगत जी प्रत्येक को कभी सुन्दर, कभी ईश्वर, कभी ब्रह्म के नाम से पुकारते, और लोग उनको भी इन्हीं नामों से बुलाते थे। उस समय के परिचित लोग अभी तक भगत जी को ईश्वर (खुदा) के नाम से पुकारते हैं।

इस प्रकार बात चीत में तो वह यद्यपि प्रत्येक को ईश्वर के नाम से पुकारते या स्वयं भी ईश्वर कहलाते थे, पर भीतर की आँख (हृदय नेत्र) पूरी २ खुली नहीं थी, अर्थात् उक्त रहस्य का पूरा पूरा साक्षात्कार अभी तक नहीं हुआ था।

इस लिये हरदम उन के चित्त में अशान्ति सी बनी रहती थी। और जब पिण्ड दादन खाँ में बहुत काल रहने पर भी किसी से उनके चित्त की शान्ति न हुई, तो फिर वह उस नगर को छोड़कर शान्ति और आनन्द की ढूँढ में गुजरांवाले आये और यहां उन को कुछ महात्माओं के दर्शन हुए। भगत जी को बड़ा अशान्त व अस्थिर चित्त देख कर एक महात्मा ने पूछा कि "ऐ प्यारे! तुम विस्मित और अशान्त क्यों और किस लिये हो?" भगत जी ने सविनय उत्तर दिया कि "महाराज! सांसारिक सुख के सब साधन तो प्राप्त हैं, पर चित्त फिर भी अस्थिर और अशान्त हुए जाता है"। महात्मा जी ने कहा कि "मन को तुम अपने साची आत्मा में स्थिर करो"। उसी वक्त भगत जी ने मन को अपने स्वरूप के ध्यान में लगाया। और (भगत जी के कथनानुसार) उनका मन इस ध्यान में ऐसा लीन हो गया कि तीन चार घंटे तक उनको किसी प्रकार की सुध बुध न रही। जब चार घंटे के बाद मन ध्यान से उतरा, तो महात्मा जी को सामने उपस्थित न पाया। जब भगत जी ने साथ के दुकान्दार से पूछा तो उत्तर मिला कि "आप तो चार घंटे के बाद होश में आये हैं, और महात्मा जी तो केवल थोड़ी देर बैठ कर चले गये थे। हम हैरान (विस्मित) हैं कि आप इतनी देर तक कैसे लीन व समाहित चित्त बैठे रहे।" यह उत्तर सुन कर भगत जी खुश हुए और महात्मा के चले जाने का किंचित् शोक न किया, वहिक दिल में यह विचार जमाने लगे कि "चलो, अब मन के एकाग्र करने का उपाय तो अच्छी तरह आ ही गया है, अब किसी और बात की हमें परवाह नहीं।" तब से भगत जी एकाग्रचित्त रहने के बड़े उत्सुक होगये, और प्रति दिन नियम पूर्वक अभ्यास में बैठने लगे। इस प्रकार

अभ्यास करते करते उन्हें थोड़ा ही समय बीता था कि उन महात्मा जी के पुनः दर्शन हुए कि जिन की आज्ञानुसार चलने से उनका समाहित चित्त हो गया था। अब तो भगत जी उनके साथ हो लिये, और उनके सहचारी बन कर जंगलों में जाकर खूब एकान्त अभ्यास करने लगे।

अधिकतर अभ्यास भगत जी को अनाहत शब्द का रहता था। जब जंगलों में उन महात्मा जी की संगति देर तक की और एकान्त अभ्यास खूब किया, तो उन्हें मन, वाणी की कुछ सिद्धियां प्राप्त हो गईं, अर्थात् जिस को वह जो कुछ कहते या जिस के विपय में जैसा भी वह खयाल करते, वह तत्काल पूरा हो जाता था, और जिस किसी को वह कोई शाप देते, वह भी तत्काल फल ले आता था। तत्पश्चात् भगत जी जंगल को छोड़ कर अपने सांसारिक घर (गुजरांवाले) में आगये, और शनैः शनैः इन सिद्धियों के कारण अपने नगर में प्रख्यात होने लगे।

लगभग इन्हीं दिनों में गोस्वामी तीर्थराम जी को इन के पूज्य पिता जी गुजरांवाले हाई स्कूल की स्पेश्यल क्लास (Special class) में पढ़ने के लिये अपने परम मित्र भगत घन्नाराम जी के निरीक्षण में छोड़ गये। भगत जी की अनोखी व निराली प्रकृति और वाणी की सिद्धियों ने भोले भाले वालक तीर्थराम जी के चित्त पर कुछ अजीव प्रभाव डाला। भगत जी से वह ऐसा डरने लगे जैसे साक्षात् परमेश्वर से कोई आस्तक पुरुप डरता है, और प्रति दिन भगत जी की वाणी की सिद्धि और अन्य गुणों को देख कर वालक तीर्थराम जी के चित्त में यह ख्याल जम गया कि भगत जी साक्षात् ईश्वर का अवतार हैं।

भगत जी यद्यपि सर्व साधारण की दृष्टि में जाति के अरोड़े और छोटी वृत्ति (व्यवसाय) वाले ठठेरा थे, पर तीर्थराम जी के चित्त को वह परम ज्ञानी और भगवान् के साक्षात् अवतार भान होते थे। भगत धन्नाराम की जीवनी के विषय जो नोट गोस्वामी तीर्थराम जी ने अपनी नोट बुक में दर्ज कर रक्खे हैं उन से स्पष्ट सिद्ध हो रहा है कि गोस्वामी जी अपने गृहस्थाश्रम के समय भगत जी को केवल अपना गुरु ही नहीं मानते थे वहिक साक्षात् ईश्वर का अवतार भी उन्हें समझते थे। और यह गुरु-शिष्य भाव गोस्वामी जी के चित्त में तब तक ही रहा जब उन के भीतर निजानन्द ने अपना रंग व सिक्का न जमा लिया था। जब अनन्य गुरु-भक्ति से अन्तः करण शुद्ध होकर तीर्थराम जी के चित्त में निजानन्द तरंगायित हुआ, तो फिर कहां का गुरु और कहां का चेला, कहां का ईश्वर, और कहां का ईश्वर-अवतार, सब के सब द्वैत ख्याल स्वतः तुम दवाये अपने २ घोंसलों (आलनों, विश्राम स्थान) में छुप गये। और छुपे भी ऐसे कि नितान्त शशी-भृगवत् लुप्त हो गये। स्वामी राम के चित्त की यह उन्नति का क्रम उन के अपने पत्रों से स्पष्ट विदित हो रहा है, और पाठक को पूर्ण निश्चय दिला रहा है कि जब तीर्थराम जी का चित्त निजानन्द में तरंगायित होने लगा तो फिर प्रति दिन भगत जी को पत्र लिखने स्वतः बन्द हो गये। और कभी कभी भगत जी के पत्र के उत्तर में यदि कुछ लिखा भी जाता, तो वह उपदेश के रूप में निकलता, गुरु-शिष्य के भाव से या भगत जी से किसी प्रकार के उपदेश या आशा की आशा रखते हुए कदापि न लिखा होता था। प्रथम तो पत्र लिखने ही बंद होगये। द्वितीय यदि भगत जी के अनेक पत्रों के उत्तर में राम कुछ लिखते भी, तो अति संक्षेप वा उपदेश युक्त।

दृष्टान्त रूप से नवम्बर सन् 1887 का पत्र लो। जब भगत जी ने तीर्थराम जी से शायद लगातार पत्र न लिखने या प्रत्येक पत्र का उत्तर न भेजने का कारण पूछा तो राम ने उत्तर दिया कि:—"………यद्यपि मैं ने इतने दिन कोई पत्र नहीं लिखा, पर आप के स्वरूप में लीन रहने के सिवा कोई और काम भी मैं ने नहीं किया। जब अपना आप हो गये, तो पत्र किस को लिखें?"

इस तिथि (तारीख) के बाद तीर्थ राम जी के भीतर त्याग और वैराग्य की उमंगें जोश मारने लगीं और उन पर हार्दिक संन्यास आच्छादित होगया। इस के बाद जो पत्र भगत जी को लिखे गये, उनमें या तो भगत जी की युक्तियों और प्रश्नों के प्रबल उत्तर हैं और या दिल पर चोट लगाने वाले प्रेम भरे उपदेश; पर किसी प्रकार का सांसारिक उद्देश्य वा सम्बन्ध उन में नहीं। इस के अतिरिक्त जो मासिक धन सहायता के रूप में कभी २ भगत जी की सेवा में भेजा जाता था, जिसे स्वामी जी "भेंट करूंगा वा अर्ज़ करूंगा" के वाक्य से अपने पत्रों में संकेत करते थे, वह भी भेजना नितान्त बन्द होगया। और जब भगत जी ने इस सब का कारण पूछा तो मार्च सन् 1886 में उन की सेवा में राम जी यों लिखते हैं कि:—

"अर्ज़ (निवेदन) यों है कि यहां किसी प्रकार का अनुमान तो दौड़ाया नहीं गया। सत्तर से भी एक दो कम रुपये महीने के मिले, उस में से कोड़ी तो एकत्र करनी नहीं, जो जो आवश्यकताएं सामने आईं, भुगत गईं। बाकी आवश्यकताओं को उत्तर देना अर्थात् पर हटाना पड़ा। केवल 12) रुपय घर भेज गये, जहां आठ मनुष्य खाने वाले हैं।

गृहस्थी स्त्रियों, बच्चों और बूढ़ों को अधिक ज़रूरत होती है और साधुओं की अपेक्षा अत्यन्त हाजत मन्द (दीन, अकिञ्चन) होते हैं, जिन साधुओं के लिये मधु मक्खियों के समान अनेक पुष्पों से मधुकरी लाना भूपण है, और जो हो रहा है अति उत्तम और उचित हो रहा है।"

अब दशा नितान्त उलट हो गई। गोस्वामी तीर्थराम जी को भगत जी से उपदेश वा शिक्षा मिलने के स्थान पर उलटा भगत जी को तीर्थ राम जी से उपदेश वा शिक्षा मिलने लगे। अर्थात् जो नदी कि पहिले किंचित सूखी और किंचित् पानी की धारा से तीर्थराम जी की ओर बहती थी वह अब अनन्त उपदेशों के जल से परिपूर्ण होकर उलटी भगत जी की ओर बहने लगी। पंजाबी रवायत (आख्यान) के अनुसार "हेठले ऊपर और ऊपले हेठ हो गये" जो नीचे थे वह ऊपर और जो ऊपर थे वह नीचे होगये।

गुरु जो कि था वह तो गुड ही रहा। परंतु उसका चेला शकर होगया॥

जिस प्रकार स्कूल में जो लड़के कि अभी प्रविष्ट ही हुए होते हैं, उन को लोअर प्राइमरी (छोटी कक्षाओं) के अध्यापक भारी विद्वान् और ज्ञानी वहिक देवता नज़र आते हैं। परन्तु जब उन में से कुछ चतुर (आशान्वित होन्हार) लड़के शिक्षा पाते पाते वा उस में उन्नति करते करते हाई स्कूल वा कालिज तक पहुंच जाते हैं, तो फिर उनको अपने पूर्व अध्यापकों की योग्यता वा विद्या से पूर्ण परिचय मिल जाता है; यद्यपि प्रणाम वा नमस्कार करना तो कुछ काल तक पूर्व वत् वैसे ही चला जाता है, परन्तु भीतरी विचार का रंग ढंग कुछ और ही हो जाता है; और यद्यपि छोटी

श्रेणी के अध्यापकों का अहंकार विद्या में उन्नति न पाने के कारण कम नहीं होता (चाहे उस का विद्यार्थी लोअर प्राइमर से उत्तीर्ण हुआ पेम, ए पास भी क्यों न कर लॅ), परन्तु विद्यार्थी के चित्त की दशा विद्या में उन्नति पाने के कारण नितान्त बदल जाती है। और यदि ऐसा कोई एम, ए पास हुआ विद्यार्थी कदाचित् निरीक्षक (Inspector) के पद पर नियुक्त होजाय और निरीक्षक की अवस्था में वह अपने लोअर-प्राइमरी के पुराने अध्यापकों की परीक्षा निमित्त उन छोटी कक्षाओं में जावे, तो उन्हीं अध्यापकों को अपने भूत पूर्व शिष्य के आगे सिर झुकाना पड़ता है। और चाहे निरीक्षक को वह अध्यापक लोग चित्त से अपना पुराना शिष्य ही समझते हों और अपनी अध्यापकता के अहंकार में फूले न समांते हों, पर वास्तव में प्रत्यक्ष रूप से वह सब अध्यापक उस अपने भूत पूर्व विद्यार्थी के सामने पाठशाला के विद्यार्थी ठहरते हैं, और उसके अधीन सेवक होते हैं। ठीक यही हाल भगत जी और गोस्वामी राम जी के विपय देखा जाता है। जब तीर्थराम जी धार्मिक शिक्षा में अभी बच्चे थे, उस समय नितान्त निराली और अजीव प्रकृति तथा रिद्धि सिद्धि वाला पुरुष उन्हें पूर्ण महात्मा और भगवान् का अवतार दिखाई देता था, इसी से भगत धन्ना राम जी को वह अपना परम गुरु समझते और साक्षात् भगवान् के अवतार के समान उनकी पूजा, सेवा करते थे। पर यों यों आशान्वित (होन्हार) राम ने आध्यात्मिक और मानसिक शिक्षा में उन्नति पाई, और उन्नति करते करते आध्यात्मिक शिक्षा का एम, ए पास कर लिया (अर्थात् निजानन्द में मस्त व मग्न होकर संन्यासी भी हो गये), और भगत जी अपनी उसी रिद्धि सिद्धि की कुरसी पर ही

जमे रहे, तो परिणाम यह निकला कि शिष्य महाराज तो विरक्तात्मा और मस्त स्वरूप हुए समस्त जगत के स्वामी वा सम्राट होगये, और भगतजी जैसे लाखों उनकी मस्ती (निजानन्द) से आकर्पित होकर उमके शिष्य वा भक्त हो गये।

यद्यपि भगत जी आगे उन्नति करने से रुक गये जिस से उन की प्रसिद्धि भी बहुत धीमी पड़ गई, तथापि वर्तमान काल के लाखों साधुओं और करोड़ों गृहस्थियों से अब भी अत्युत्तम और श्रेष्ठ हैं; यद्यपि पहिले के समान वह मस्त, शान्त और उदार चित्त नहीं देखे जाते, तथापि जो शान्त, सन्तुष्ट और उदार दशा उनके चित्त की अब भी पाई जाती है, वह भी बहुत कम महात्माओं में दिखाई देती है। वाल्य-ब्रह्मचारी होने के कारण तो वह करोड़ों गृहस्थों से अधिक पूजनीय और प्रशंसनीय हैं ही, पर अपनी सूक्ष्म बुद्धि, सादगी वा सरलता के कारण भी अनेक पण्डितों और महात्माओं से अब भी अधिक है। और वैसे, राम के कारण तो वह प्रत्येक के विशेपतः राम भक्तों के, पूजनीय ही हैं।

आज कल भगत जी गुजरांवाला में पुरानी मण्डी के समीप रहते हैं। आयु लगभग 80 वर्प के है। अब भी बल में आज कल के साधारण नव-युवकों से यदि अधिक नहीं तो कम भी नहीं है। अच्छे चलते फिरते हैं। सारे जीवन में शायद दो बार ही घोड़े पर चढ़े होंगे। सारा काम अपने सम्बन्ध में स्वयं आप करते हैं। साहस में किसी तरह से कम नहीं, यद्यपि उदारता वैसा नहीं। फिर भी धन्य हैं यह कि जिन को राम जैसे शिष्य मिले और धन्य हैं राम कि जिन्हों ने इन के आश्रय से वह उन्नति पाई जिससे राम स्वयं और उन के कारण भगत जी दोनों जगत-विख्यात हो गये। स्वामी नारायण,

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श्री स्वामी रामतीर्थ।

आगरा 1909