श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

राम-उपदेश।

भाग 16 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 16 · अध्याय 5 / 5

राम-उपदेश।

(राय बहादुर लाला बैजनाथ द्वारा प्रकाशित उर्दू रामउपदेश से उद्धृत)

यदि उन्नति चाहते हो, तो बाह्य वस्तुओं तथा काम काज में भिन्नता और विचार तथा संकल्प में अभिन्नता करो। हिन्दुओं में वर्ण-व्यवस्था वास्तव में इस लिए है कि काम भिन्न भिन्न हों, परन्तु हृदय एक हों। किन्तु धीरे धीरे यह असली कारण लौकिक व्यवहार में गुम व लुप्त होगया, और आत्म-उन्नति के स्थान पर आत्म-अवनति आगई। मेरे प्यारो! याद रक्खो, कि शास्त्र व स्मृति तुम्हारे लिए हैं, तुम शास्त्र व स्मृति के लिए नहीं। भारतवर्ष की नदियों का प्रवाह पलट गया। पहाड़ों से हिमरेखा (glaciers) हट गई; बन कट गए, नगर बस गए; देश की दशा बदल गई, राज सत्ता पलट गई, लोगों के रंग और के और होगए; परन्तु तुम इस क्षण भंगुर संसार में जो प्रतिक्षण बदलता रहता है, पुराने रस्म व रिवाजों को जिनमें कुछ जान बाकी नहीं है, कायम रखना चाहते हो। हाय वह मनुष्य जो आगे को तो चले और पीछे को देखे कैसा बुद्धि हीन होगा? मेरे प्यारे! तुम ऋषियों की सन्तान हो, परन्तु उन के समय में नहीं रहते हो।

रेल तार, बिजली, स्टीमर सब तुम्हारे पीछे पड़े हुए हैं। तुम्हारा मुकाबला तो बीसवीं शताब्दी के यूरोप तथा अमेरिका के विज्ञान वेत्ताओं और शिल्पकारों की बुद्धि से है। याद रक्खो कि या तो अपने को वर्तमान युग में रहने के योग्य बनाओ, अथवा पितृलोक में पधारो। तुम्हें हमारा सलाम, प्रणाम है।

2 - यदि मातृ भूमि के हित (स्वदेश प्रेम) का दावा है,

तो सारे देश और उस के निवासियों के प्रति ऐसी एकदिली (हृदय) की एकता करो कि द्वैत भाव का बुलबुले के समान भी तुम्हारे और उनके बीच आवरण न रहे। यदि मैं अनुभव करलूं कि "मैं ही हिन्दुस्तान हूं, भारतवर्ष की समस्त भूमि मेरा शरीर है, मेरी आत्मा समस्त भारत की आत्मा है, यदि मैं चलता हूं, तो सारा भारतवर्ष चलता है; यदि मैं दम लेता हूं, तो सारा भारतवर्ष दम लेता है, मैं ही शंकर हूं, मैं ही शिव हूं, तो यही असली वेदान्त है। यही सच्ची मातृभूमि का हित है।

3 - संसार को सच्चा मान कर उस में कूदते हो, याद रक्खो कि फूस की आग में पच पच मरते हो, अपने शुद्ध सच्चिदानन्द स्वरूप को भूल कर नाम व रूप की कैद में फंसते हो। सत्य को जवाब देकर (छोड़ कर) असत्य (अज्ञान) में धक्के खाते हो। याद रक्खो अगर चोट पर चोट न लगे, तो मेरा नाम राम नहीं। अजगर न समझा कि मैं कृष्ण को खा गया, पर कृष्ण को पचा न सका। यही दशा तुम्हारी है। इसी विधान को जीते जी क्यों नहीं समझते। मरने पर "राम राम सत्य है," ऐसा लोग कहते हैं। जब पहिले ही समझ जाओगे कि "राम सत्य है," तो मरेंगे ही नहीं। मरते समय गीता तुम्हारे क्या काम आएगी, अपने जीवन को ही भगवत का गीत क्यों नहीं बनाते?

4 - माता छोटे बच्चे को आम चूसने को देती है। बालक आम चूसने लगता है, चूसते चूसते फल फूट पड़ा और बच्चे के हाथ पर, मुँह और कपड़ों पर रस ही रस फैल गया। अब तो न कपड़ों की सुध है, न मां की, न हाथ मुँह का होश है। रस ही रस है। इसी प्रकार यदि श्रुति भगवता का दिया हुआ यह महा वाक्य रूपी रस तुम्हारे अन्दर फूट

पड़े, तो फिर रस ही रस (ब्रह्म) हो जाओगे। मन को देव के पास ऐसे बिठाओ, कि रोम रोम में राम रच जाये, मन अमृत में भीग जाए, चित्त आनन्द में डूब जाए, इसी का नाम उपासना है। जैसे पत्थर की शिला का गंगा में शीतल होजाना, कपड़े की गुड़िया का अन्दर बाहर से जल में निचोड़ने लगना, और मिश्री की डली का गंगा रूप से हो जाना, यही तीन दर्जे उपासना के हैं।

5 - धीरे धीरे दैवी-विधान चल रहा है, परन्तु मनुष्य उससे अनभिज्ञ है। इन्द्रियों की परिच्छिन्नता में बन्द होकर नाम रूप के बालू की बुनियाद पर हवेली बनाकर वह उसमें रहता है, परन्तु अन्त में उसी के साथ बैठ जाता है। असली, हवेली जो पर्वत की शिखर पर सुदृढ़ बनी है, वह उस ज्ञानी की है, जो इस नाम रूप को झूठा और ईश्वर के नियम को जीवित जानता है। यदि इस नियम पर कि "जो सत है वह ब्रह्म है" इतनी अपेक्षा करो जितना सांसारिक मनुष्यों की राज़ी ना-राज़ी की करते हो, तो कोई बिपता तुम्हारे सिर पर नहीं आ सकती। वेद कहता है "तुम्हारी खातिर है प्रभो! मो मन ही तनबीच"। वेदों के समय में कुंवारी कन्या अग्नि की परिक्रमा देती हुई यह राग गाती थी, "हम उस एक सर्वदर्शी अपने पति के साथ एक हो जाएं, इस अपने बाप के घर (क्षणभंगुर संसार) को ऐसे छोड़ दें, जैसे दाना भूस को। और मालिक के घर में दाखिल होकर वहां से कभी न निकलें"। यही राग 'राम' के भीतर से बराबर निकल रहा है। यह शरीर फट जाए, यह सिर टूट जाय, हृदय विदीर्ण हो जाए, परन्तु तेरे अतिरिक्त अन्य कोई विचार हृदय में न उठे। यही 'राम' का कहना है। जब कभी सांसारिक मित्रों, प्रियजनों तथा कुटुम्बियों पर विश्वास करके वह प्रेम

जो ईश्वर के लिए होना चाहिये तुम उनसे करते हो, तो अवश्य धोखा खाओगे। मुसलमान कहते हैं "ला इलाह इल्लिल्ला", (एकमेवाद्वितीयम्), अर्थात् एक ईश्वर के अतिरिक्त दूसरा ईश्वर नहीं। हज़रत ईसा और श्री बुद्ध भगवान् और हमारे ऋषियों का भी किसी न किसी रूप में यही कथन है। परन्तु यदि उस कथन का प्रति उत्तर उनके सुननेवालों से उस समय में और तत्पश्चात् सारी दुनिया के तत्वज्ञानियों से हर समय व हर बार न मिलता रहे, तो वह कथन (उपदेश सदा) क़ायम ही न रहता। यही कथन दैवी-विधान है। यही हमारा आत्मा है। यही 'राम' है। यही ब्रह्म है। यही सच्चा त्याग है। कोई जाति उसे छोड़ नहीं सकती है। यही अति कठोर है परन्तु, अमर जीवन की प्राप्ति का द्वार है। जो कोई इसके अतिरिक्त और कहीं मन लगावेगा, धोखा खायेगा, दगा उठावेगा, छोड़ा (त्यागा) जावेगा, मारा जावेगा। चाहे 'राम' के निश्चय को भोले भाले चित्त का अन्ध विश्वास कहो, परन्तु उसने तो यह दृढ़ विश्वास कर लिया है कि जिसने तत्व का साक्षात्कार कर लिया, वह न मृत्यु को देखता, न रोग को। वह सब का आत्मा हुआ सब जगह मौजूद है मेरे प्यारे! इस संसार पर विश्वास करना ही मौत (मृत्यु) है। तेरा असली आत्मा तो आनन्द स्वरूप "राम" है।

(1) देखा न शब जो यार को, नूर ज़िया से कार क्या? मुर्दा की क़ब्र-तार को आवो-गया से कार क्या? (2) चाहे कोई भला कहे, ख्वाह पड़ा बुरा कहे, पल्ला छुटा जो जिस्म से, बीमो-रज़ा से कार क्या? (3) नेकी बदी खुशी गमी, जीना था बाम-यार का, जीना जलादो अब यहां पार गया से कार क्या?

(4) अहमके-कारे ही को है उल्फत मा-सिवाये-हक़, कावा-ए दिल में यह जिना, वूए-वफ़ा से कार क्या? (5) इतना लिहाज़ कर लिया, दुनिया तेरा पर भी हट, नाचूं हूं साथ 'राम' के, शर्मो-हया से कार क्या?

भावार्थः - (1) (अज्ञान की) रात्रि में यदि अपने प्यारे को हमने नहीं देखा, तो दिन की रोशनी से हमारा क्या प्रयोजन? अन्धेरे में मृतक की समाधि पर पानी और घास से क्या प्रयोजन? (2) चाहे कोई भला कहे, चाहे कोई बुरा कहे, जब इस शरीर से पहला (मोह) छूट गया, तो भय और आशा से क्या प्रयोजन? 3) पुण्य पाप और हर्ष शोक प्यारे के कोठे पर चढ़ने (ईश्वरप्राप्ति) का सोपान है। पर हम तो अपने प्यारे स्वरूप को प्राप्त हो चुके, इस लिये इस सोपान (सीढ़ी) को अब जला दो, हमें इन पग वाली सीढ़ियों से क्या प्रयोजन?। (4) अन्धे पुरुष को ही ईश्वर से अतिरिक्त वस्तु के साथ प्रीति भाती है। दिल के मन्दिर में यह व्यभिचार? ऐसी दशा में विश्वास की गन्ध से प्रयोजन क्या? (5) ऐ संसार! तेरा इतना लिहाज तो कर लिया, अब पर भी हट, अब तो मैं शुद्ध स्वरूप 'राम' के साथ नाच रहा हूं। सांसारिक लज्जा और प्रेम से मुझे क्या प्रयोजन।

प्यारे सुनो, वेदान्त केवल लफ़्ज़ी जमाखर्च (शब्द-आडम्बर) ही नहीं, बल्कि यह संसार भी कोई बस्तु नहीं। जो इसे सच्चा मानता है, वही मरता है। एक आत्म-तत्व ही अमर है, वह ही सत् है, हां हां हां। ॐ।