जल्वे-कुहसार।
अर्थात् भाग 3
अर्थात्
( राग भैरों-ताल धुमार )
पे दिल ऐज़ा कूए-जानां अस्त अज़ जां दम मज़न। अज़ दिलो-जानो-जहां दर पेशे-जानां दम मज़न ॥1॥ जां नदारद क़ीमते-विस्ल्यार अज़ जां वा मगो। गर चे जां दर वारूती दर राहे-जानां दम मज़न ॥2॥ गर तुरा दर्दे-स्त अज़ वै हेच अज़ दरमां मगो। दर्दे-आरा विह ज़ दर मांदां ज़ दरमां दम मज़न ॥3॥ चूं यक़ीं आमद रिहा कुन क़िस्सए-शक्को-ओ-गुमां। चूं आयां विनमूद रुख़ दीगर ज़ बुरहां दम मज़न ॥4॥ इल्मे-बेदीनां गुज़ारो-जहल रा हिकमत मख़्वां। अज़ ख़यालातो-फ़सूनो-अहले-यूनां दम मज़न ॥5॥ या लबे-मैगूं-व-रुप-ख़ूबो-ज़ुल्फ़े-दिलकशश। अज़ शराबो-शाहिदो-शम्शो-शबिस्तां दम मज़न ॥6॥ कुफ्रो-ईमां रा व पेशे-जुल्फ़ो-रूयश कुन रिहा। पेशे-जुल्फ़ो-रूप-ओ अज़ कुफ्रो-इमां दम मज़न ॥7॥ चूंकि वा-वरनयारी बूदन अज़ वसलश मगो। चूंकि बे-ओ-हम नमी वाशी ज़ि हिजरां दम मज़न ॥8॥ मिहरे-ताबां चूंकि हस्त अज़ अक्से-रूयश ता वशे। मअरबी दर पेशे-ओ अज़ मिहरे तावां दम मज़न ॥9॥
अर्थ—ऐ दिल ! यहां प्यारे की गली है। यहां अपनी जान का दम भी मत मार (अर्थात् जान का घमएड मत कर वा
जान की परवाह मत कर), और अपने प्यारे के आगे जान और जहान और दिल का दम मत मार (अर्थात् अपने प्यारे के समक्ष इस प्राण इत्यादि का घमंड मत कर अथवा अपने प्यारे के सामने इनको प्रिय मत समझ)।
(2) जान (अपने प्यारे की अपेक्षा) अधिक मूल्य नहीं रखती है, इस लिये इस जान का शोक मत कर। यदि तू अपने प्यारे के रास्ते में जान पर खेलता है, तो चुप रह (तू इस काम पर भी शेखी मत कर)।
(3) यदि तुझको (अपने प्यारे की प्रीति में) कुछ कष्ट है, तो उसकी चिकित्सा के विषय में कुछ चर्चा न कर। उसके कष्ट को अर्थात् उसकी प्रीति में जो कष्ट हो उसको भी चिकित्सा से उत्तम समझ और चिकित्सा के विषय में चर्चा न कर (अर्थात् चुप रह)।
(4) जब तुझको विश्वास हो गया तो संशय-संदेह की कहानी को छोड़ दे, जब उस (प्यारे) ने अपना मुखड़ा दिखा दिया, तो फिर हील और हुज्जत न कर।
(5) जिनका कोई धर्म ही नहीं है, ऐसे लोगों का खयाल छोड़ और मूर्खता को तत्त्वज्ञान मत कह; एवं यूनान वालों के विचारों और उनके आख्यानों का दम मत मार।
(6) मदिरा-जैसे ओष्ठ, सुंदर मुखड़ा, मन हरण जुल्फ़, मदिरा और प्रियतम और शमा और शयनागार के विषय में भी चर्चा न कर।
(7) कुफ्र और ईमान को उसके मुखड़े और जुल्फ़ के आगे छोड़ दे और उस प्यारे के जुल्फ़ और मुखड़े के सामने कुफ्र और ईमान की चर्चा न कर।
(8) क्योंकि तू उस (प्यारे) से आगे नहीं बढ़ सकेगा, इस लिये तू उसके मिलाप (दर्शन) की चर्चा मत कर, और इस हेतु कि तू उस (प्यारे) के बिना भी नहीं रह सकेगा, इस लिये वियोग की भी चर्चा न कर।
क्योंकि प्रकाशमान सूर्य उस (प्यारे) के मुखड़े की ज्योति की एक चमक है, इस लिये, ऐ मग़रवी, उसके सामने प्रकाशमान सूर्य की भी चर्चा न कर ॥8॥
राग भैरों-ताल भूप।
मयार पे वक़्त ! बहरे-गर्के मा दर शोर दरिया रा। परे-माही मगरदां बादबाने कश्तीए मा रा ॥1॥ लिवासे-मा सुबकसारां तश्नल्लुक बर नमी तावद। वुबद हमचूं हुबाब अज़ वक्षिया ख़ाली पैरहन मा रा ॥2॥ दमे-जांबख्श-तो तारंगे-हैरत रेख़्त दर आलम। ज़े मिहर आईना दर पेश-नफ़स दीदम मसीहा रा ॥3॥ अगर लब अज़ सुख़न गोई फ़रो बंदेम जां दारद। कि न बुबद अज़ नज़ाकत ताबे-विस्तन मानए मा रा ॥4॥ शवद अज़ शौलए-आवाज़े-कुलकुल वज्रे-मै रोशन। सरत गरदम मकुन ख़ामोश साक़ी ! शम्अ मीना रा ॥5॥ ग़नी सागर व कफ़ जमशेद पेशे-मैफ़रोश आमद। कि शायद दर बहाए वादागीरद मुल्के दुनिया रा ॥6॥
अर्थ—(1) ऐ नसीबे ! हमारे डुबाने के लिये दरिया को तूफान में मत ला (ऐ वक्त ! हमको डुबोने के लिये सांसारिक इच्छाओं के नद में तूफान मत बरपा कर), और ऐ मछली के पर ! हमारी नौका के बादबान को मत फेर।
(2) हम हल्के (सांसारिक संबंधों से मुक्त) लोगों का चोला संबंध की ताव नहीं ला सकता है (अर्थात् संबंधों
की ओर चलायमान नहीं हो सकता है) और हमारा फ़क़ीराना बुलबुले की तरह वक्षिया से खाली (संबंध-हीन) है।
(3) जब से तेरे प्राणदाता दम ने संसार में आश्चर्य का रंग बिखेरा है (अर्थात् आश्चर्य व्यक्त किया है) उस समय से मैं ने मसीहा को तेरे प्रेम के कारण (आईना दर पेश नफ़स) विस्मय-पूर्ण देखा है (अर्थात् ऐ सच्चे माशूक ! तेरे प्राण का दान करने वाले दम (आश्वासन) ने प्रेम के रोगियों को स्वास्थ्य दान किया है। इस लिये तेरे प्रेम के शरण अब मसीह (जिस में चमत्कार था कि वह मुर्दे को ज़िंदा कर देता था) विस्मित हो रहा है, क्योंकि अब उस का चमत्कार व्यर्थ हो गया।
(4) यदि तू कहे तो हम बात करने से ओष्ठ बंद कर रक्खें (चुप रहें), पर क्या यह उचित है ? क्योंकि तेरी सुकोमलता के कारण हमको अर्थ (रहस्य) छुपाने की शक्ति नहीं (अर्थात् स्वभावतः हमारे मुंह से तेरी प्रशंसा अवश्य निकले ही गी और तेरा रहस्य प्रकट किये बिना हम न रहेंगे)।
(5) क्योंकि मदिरा की सभा (मदिरा की) सुराही (पात्र विशेष) के शब्द की अग्नि से प्रकाशित हो जाती है इस लिये ऐ साक़ी (मध पिलाने वाले) ! मैं तुझपर न्यौछावर होता हूं, कि तू मदिरा के शीशे की ज्योति को मत बुझा (अर्थात् ऐ पूर्ण गुरु ! भगवत्प्रेम की मदिरा का दौर (प्रेम-वाहर) जारी रहे, भगवान् के लिये इसे पल भर के लिये भी बन्द न कर।
(6) ऐ धनी ! जमशेद अपने प्याले (संसार दर्शक प्याले) को हथेली पर रक्खे हुए मदिरा-विक्रेता के पास आया कि
कदाचित् मदिरा के बदले वह सुरा व्यवसायी 'दुनिया के मुल्क' को ले ले, अर्थात् भगवत्प्रेम की मदिरा इतनी मूल्यवान् है कि जमशेद उसके लेने में 'दुनिया के मुल्क' को या अपने उस प्याले को जिसमें कि सारे संसार का दृश्य दिखाई देता था, अकातर-मन से देता है ॥
गंगा ! क्या वह तेरी ही छाती है जिसके दूध से ब्रह्मविद्या का पोषण होता है ?
ऐ हिमालय ! क्या तेरी ही गोद है जिसमें ब्रह्मविद्या (गिरिजा) खेला करती है ?
क्या तुम्हें भी वह दिन स्मरण है जब पहले पहल "राम" 'पांडुवर्ण-शीतल श्वास-अश्रुपूर्ण लोचन' के साथ तुम्हारी शरण में आया था ? अकेले इन पत्थरों पर पड़े-पड़े रातें कटती थीं। आंसुओं से यह शिला तर-ब-तर होते थे, हिचकियों का तार बंधता था। हाय ! वह परम आनन्द कहां है 'जिसकी मस्ती में न कोई कल है न आज (अर्थात् जिसकी मस्ती में आज वा कल की सुध नहीं रहती) ?
हाय ! वह आनंदसागर कब मिलेगा जो सांसारिक भोगों को तृण और कूड़ा-करकट की तरह बहा ले जाता है ! ज्ञान का प्रचंड मार्तंड कब मध्याकाश पर आयगा ! शारीरिक प्रयोजन (स्वार्थ) और इंद्रियों के विषय धुंध और अंधकार के समान कब साफ़ उड़ जायेंगे ! गंगा का जल हरगह (अर्थात् कहीं पर भी, या कभी भी) गरम नहीं होता। हे भगवन् ! वह समय कब आयगा कि ब्रह्मज्ञान के उन्माद (नशा) की बदौलत राम के दिल पर स्वप्न में भी स्नेह और विराग (Favour & Frown) अधिकार पाने के अयोग्य हो जायेंगे ! पाप और शोक (Sin & Sorrow)
भूत-काल की तरह कब गप-गोते होंगे। तुरिया अवस्था क्या ग्रंथों में ही लिखी जाने को है, अन्यथा वह तुरिया कहां है ? नंगे शिर, नंगे पैर, नग्न शरीर, उपनिषदें हाथ में लिये दीवानावार (पागलसा) "राम" पहाड़ी जंगलों में फिर रहा है—
खूने-जिगर शराब तिरश्शोह है चश्मे-तर। सागर मिरा गिरौ नहीं अबरे-बहार का ॥
अर्थः—मेरे जिगर का खून तो मेरी शराब है और छलकता हुआ जल (वर्षा) मेरे अश्रुपूर्ण लोचन हैं।
नाला हाए कुल्बा-ए-अहज़ां तसल्ली बख्श नेस्त। दर बियाबां मीतवां फ़रयाद खातिर ख़्वाह कर्द ॥
अर्थ—शोक-घर में रुदन संतोप जनक नहीं है, जंगल में जाकर मन मानी पुकार कर सकते हैं (अर्थात् वन में खुले दिल से अपने प्यारे की याद में रुदन हो सकता है)।
वर्ग-हिना पै जा के लिखूं ददें-दिल की बात। शायद कि रफ़्ता-रफ़्ता लगे दिलरुबा के हात ॥
पहाड़ की खोह का, पर्वत की कंदरा का पीड़ा-पूर्ण आर्त्तनाद को सहानुभूति-पूर्ण उत्तर देना कभी नहीं भूलेगा
इश्क़ का मनसब लिखा जिसदिन मेरी तक़दीर में। आह की नक़दी मिली सबहरा मिला जागीर में ॥
"बस तख्त या तख़्ता (अर्थात् राजासिंहासन या चिता) माता-पिता ! तुम्हारा लड़का अब लौट कर नहीं जायगा। विद्यार्थी लोगों ! तुम्हारा विद्या-गुरु अब लौट कर नहीं जायगा। गृहस्थों ! तुम्हारा नाता कब तक निभेगा। 'बकरे की मां
कबतक और मनाओगी ? या तो सब संबंधों से रहित होगा या तुम्हारी आशाओं के सिर एक साथ पानी फिर जायगा। या तो राम की आनंदघन तरंगों में घर-बार (क्यों कच) निमग्न होगा (तुरीया अतीत), और या राम का शरीर गंगा की लहरों के समर्पण होगा, तन बदन (देह-भाव) का अंत होगा। मरकर तो हर एक की हड्डियां गंगा में पहुंचती हैं यदि अवरोध न हुआ और यदि शरीर-भाव की गंध बनी रह, गई तो राम की हड्डियां और मांस जीते जी मछलियों की भेंट होंगे "।
वन के परवाना तिरा आया हूं मैं पे शम्माए-तूर। बात वह फिर छिड़ न जाए यह तक़ाज़ा और है ॥
(राग आसावरी ताल यक्ता)
नैन मेरे सुख क्यों नहीं सोंदे। कढ पांधा पतरी देख दिन मेरे॥ काग मेरे घर नित उठ लौंदे। नैन मेरे सुख क्यों नहिं सोंदे॥
अगर राम के चरणों में गंगा न बही, तो राम का शरीर गंगा पर अवश्य बहेगा।
करेरथांगण्पने भुजंग-याने विहंगं चरणेम्बगांगम् ॥
आँख जल बरसा रही है। ठंठी और लंबी सांस मानो तीव्र वायु के समान मेघ का साथ दे रही है, बाहर बरसात ज़ोर पर है। कातरता और क्रंदन (अधीरता व रुदन) के साथ राम के अन्तः हृदय से यह ध्वनि निकल रही है—
राग जंगला — ताल तीन गंगा तेथों सद बलहारे जाऊं। (टेक)
हाड़ चाम सब वार के फेकूं, यही फूल बताशे लाऊं। गंगा॰ मन तेरे बंदरन को दे दूं, बुद्धि धारा में बहाऊं। गंगा॰ चित्त तेरी मछली चव जावे, अहं गिरि-गुहा में दबाऊं। गंगा॰ पाप-पुण्य सभी सुलगाकर, यह तेरी ज्योति जगाऊं। गंगा॰ तुझ में पड़ूं तो तू वन जाऊं, ऐसी डुबकी लगाऊं। गंगा॰ पंडे जल थल पवन दशों दिक्, अपने रूप बनाऊं। गंगा॰ रमण करूं सत धारा मांही, नहीं तो नाम न राम धराऊं। गंगा॰
गंगा-किनारे के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष खड़े हुए मानो संध्या कर रहे हैं और मनोहर लता-पता में रंग-रंग के फूल खिले हुए नन्हें बच्चों की भाँति मुसका रहे हैं। हवा आनकर उन्हें भूले भुला रही है। ठंढी-ठंढी पवन मंद स्पंद से दिल लुभा रही है।
बादे-सबा के भोंकों से शाखों का झूमना। और झूम झूम कर वह रुखे-गुल को चूमना॥
चारों ओर यह दशा है कि राम चिंतित है कि "पीठ किस ओर करके बैठूं"। एक से एक बढ़कर मुहाना है। पर्वतों के ढलवां पर हरे-हरे बासमती के खेत लहलहा रहे हैं। इन खेतों में पहाड़ों से उतरता हुआ निर्मल जल बह रहा है। यह जल मुक्त-पुरुषों की भाँति ब्रह्मस्वरूप श्रीभागीरथी में मिलकर उससे अभेद हो रहा है। श्रीभागीरथी की शोभा कौन वर्णन करे। क्या विराट भगवान् का हृदय-स्थान यही है ? उसका गंभीर और शीतल स्वभाव और उसकी ओंकार अनहद रूपी ध्वनि चित्त की चुलबुलाहट और मलिनता को स्वच्छ कर रहे हैं। किन्हीं-किन्हीं स्थानों पर गंगा जल के विचित्र शांति-भर कुंड बन रहे हैं। उज्जि- याली में तो चमकती दमकती गंगा है कि कोटानुकोट हीरे- मोती कूट-कूट कर भरे हैं। मेरी जान ! यह मरजान वाला
सुरमा आँखों में क्या ठंढक देता है, हृदय की आँखों को भी प्रकाशित करता है। गंगा अपनी महा शीतलता और निर्मलता से विष्णुपन दिखाती और महाशक्ति और ज़ोर-शोर से सिंह की भाँति गरजने और अस्थयों को चवाने (बहा ले जाने) से शंकरपन प्रकट करती है, विष्णु और शिव दोनों की झलक मारती हुई वावापुरी (जगत्) को कृतार्थ करने जा रही है। गंगा के तरंग इस स्थान पर निहंग के समान रव करते और वेग से छलाँगें भरते चले जा रहे हैं। यहाँ तह पर बहुत बड़े-बड़े पत्थर होंगे। लहरें भाग भाग हुए जाती हैं। मौजें किस बला के पेच खाती हैं। वह देखो, गंगा की धारा भया- नक भरना बन रही है, पानी सब का सब एकदम गिरा, फिर उछला। गंगा के आवेश-उन्मत्तता को जतलानेवाली फेन नाच रही है कि गर्जन कर रहे सिंह के बाल (Mane) लहरा रहे हैं। इस आवेश के साथ गंगा मानो यह कह रही है कि ऐ अहंकार (मृग) ! आ, मैं तेरा शिकार करूं। ऐ अज्ञान (गीदड़) ! तेरे देहाध्यास और अहंता की हड्डियाँ चवा जाऊँगी, पसलियाँ अलग-अलग कर दूँगी। ऐ मोह रूपी पत्थर ! आ, मैं तुझे चीर डालूं, पहाड़ों को काटकर आई हूँ, अब तेरी बारी है।
पर इस समय कुल अज्ञान की सेना न मालूम कहाँ अंतर्धान हो गई है, न अँधेरे का कहीं पता लगता है, न अविद्या-तिमिर का। इन हरे-भरे पहाड़ों का प्रकाश और आनंद से यों भरपूर होना किस का संकेत करता है ? यह ठंढक और आनंद क्या शुभ-संवाद सुना रहे हैं ? 'राम' की मनोकामना यहाँ पूर्ण हो जायगी, सब कामनाएँ तिरोहित हो जायँगी।
मुज़्दा ऐ दिल कि मसीहा नफ़्से-भी आयद।
कि ज़ इनफ़ासे-खुशश बूए-कसे मी आयद ॥
अर्थ - ऐ दिल ! खुश हो कि कोई मसीहा (परम ज्ञानी) आ रहा है कि उसके खुश श्वासों से किसी ब्रह्मावित की गन्ध आ रही है।
किस आनंद के साथ 'राम' स्नान करता है, जल उछालता है और आनंद-ध्वनि करता है।
(राग सिंधुरा—ताल तीन)
नदियाँ दी सरदार, गंगारानी। छींटे जलदे देन बहार, गंगारानी॰ सानूं रखं जिंदड़ी दे नाल, गंगारानी। कदे वार कदे पार, गं॰ सौसौ शांते गिन-गिन मार, गंगारानी। तेरियाँ लहरां रामस्वार, गं॰
Mother of mighty rivers, Adored by saint and Sage! The much beloved peerless Gunga, Famous from age to age.
अर्थ: - शक्तिशाली नदियों की जन्मदात्री ! ऋषि मुनियों ने तेरी आराधना की है। अत्यन्त प्रिय तथा अनुपम गंगे ! कीर्ति तेरी चिरकाल से व्यापक है।
Unconscious roll the surges down, But not unconscious thou. Dread spirit of the roaring flood, For ages worshipp'd as a God. And worshipp'd even now, Worshipp'd, and not by serf or clown, For sages of the mightiest fame, Have paid their homage to thy name;
अर्थः-तेरी लहरें अचेतन रूप से लुढ़कती फिरती हैं। परन्तु उनके समान तू भी अचेतन नहीं है ॥ (क्योंकि) तेरे गरजते हुए प्रवाह का यह भयानक रूप। चिरकाल से ईश्वर तुल्य पूजा गया है ॥ और अब भी पूजा जाता है। उस भी पूजा मूढ़ और दासों ने नहीं ॥ वरन सर्वोच्च प्रतिष्ठा वाले ऋषि-मुनियों ने भी की है। कि जो तेरे नाम के प्रेमी वा भक्त हैं ॥
(रमेशचन्द्र दत्त)
Sacred Ganga ample bosomed, Sweeps along in regal pride. Rolling down her limpid waters, Through high banks on either side.
विशाल वक्षःस्थल (भारी पाट) वाली पुनीत गंगा अपने निर्मल जल को दोनों ओर के ऊँचे तटों से उछालती हुई महानता के गौरव में बह रही है।
संध्या होने को है। एक छोटी सी पहाड़ी पर राम बैठा है। विचित्र दशा है। न तो उसे उदासी नाम दे सकते हैं, न शोक और दुःख ही है। सांसारिक लोगों वाला हर्ष भी यह नहीं है। उसे जागता नहीं कह सकते, सोया भी नहीं; क्या मालूम उन्मत्त (मख़मूरो) हो। पर यह तो कोई सांसारिक उन्माद नहीं है। क्या रसभीनी अवस्था है। दूर पेड़ों (पादपों) में से घड़ियाल और शंख की ध्वनि आने लगी। कदाचित् कोई मंदिर है। आरती हो रही है। एलो ! सामने ऊंची पहाड़ी चोटी से दो तीन फीट की उँचाई पर त्रयोदशी का चंद्रमा भी अपना चांद सा मुखड़ा लिये आ
रहा है। क्या यह आरती में सम्मिलित होने आया है ? सम्मिलित क्यों, यह तो अपने दमकते हुए प्रकाशमान शरीर की ज्योति बनाकर अपने आपको सदा शिव पर वार रहा है। आरती-रूप बन रहा है। आहा ! सारी प्रकृति आरती में सम्मिलित हो गई। चांद और से कैसी आवाज़ (ध्वनि) आने लगी। ऐ चाँद ! तू आगे बढ़ जानेवाला कौन है ? प्यारे ! अकेला मत रह। अपनी हड्डियों को और तन बदन को आग की तरह सुलगा कर तेरी तरह "राम" अपने आपको इस आरती में क्यों न वार डालेगा ? ..................... ......... ... .............. ..... ............. ..... ...................... ...... .....
उन दिनों 'राम' की खोज करता-करता एक पत्र पहाड़ों में आ मिला, उसका उत्तर—
सरे-बेसर नामा रा पैदा कुनम। आशिक़ां रा दर जहां शैदा कुनम॥
अर्थ—(यदि) मैं भेद उसी पत्र का जिस पर पता नहीं लिखा, बताऊं (तो) संसार में लोगों को आशिक़ बनाऊं।
एक पत्र मिला जिसमें (1) घर आने के विषय में प्रेरणा थी। यह पत्र तत्काल परमधाम को रवाना कर दिया गया, अर्थात् श्रीगंगाजी में प्रवाह दिया गया।
(राग आसावरी)
रे रंग नहीं मेरा कतने दा। जोरी वन्ह के भोरे न घत माए॥ पीड़ी पीड़ के जान नपीड़ लीती। माखा मास नाहीं रत्ती रत्त माए॥ चरखा वेख के रंग कुरंग होया।
सइयाँ विच वाहां केढ़ी वत माए ॥ मत्ती इश्क़ हुसैन न मत सुभे। मत्ती दें दियां दी मारी मत माए ॥
भावार्थः—हे माता ! गृहस्थ रूपी चरखा कातने की मेरी दशा नहीं, मुझे ज़बरदस्ती से इस बंधन में मत डाल। गृहस्थ के दुःख दे दे कर मेरे प्राण निचोड़ लिये हैं, अब तो शरीर में माशा भर मांस नहीं है और रत्ती भर खून नहीं है। गृहस्थ रूपी चरखे को देख कर तो मेरा रंग कुरंग (पीला) हो जाता है अब तू ही बतला कि मैं इन गृहस्थी मित्रों में कैसे बैठूं। प्रेम में, ऐ हुसन ! कोई मति नहीं सूझती, बल्कि मति देने वालों की अपनी मति मारी जाती है।
(2) लोगों के गिले-उलाहनों का डर दिखाया था। सो भगवन् ! अब तो हम हैं और गंगा—
कफ़न बांधे हुए सर पर किनारे तेरे आ बैठे। हज़ारों ताने अब हमपर लगाले जिसका जी चाहे॥ तीरों-पेकां लांछन यहां कुछ नहीं असर कर सकते !
गर न मानद दर दिलम पैकां गुनाहे तीरे नेस्त। आतिशे-सोज़ाने-मन आहन गुदाज़ उस्तादा अस्त ॥
अर्थ—यदि मेरे दिल में तीर का पैकां (फल्टा) नहीं चुभता तो तीर का दोष नहीं, क्योंकि मेरे हृदय में जो इश्क़ (प्रेम) की आग भड़क रही है, वह लोहे को गला देती है, उसने फल्टे को भी गला दिया।
तां न ख्वाहद सोख़त अज़ मा वर न ख्वाहद दाश्त दस्त। इश्क़ बस मारा चो आतिश दर क़फ़ा उस्तादा अस्त ॥
अर्थ—प्रेमाग्नि जब तक जला न लेगी, मुझको न छोड़ेगी, क्योंकि इश्क़ की आग मेरे पीछे लगी है।
तुम्हारा (राम) तो अब पूरा होगया पूरा। न वर का न घाट का (यद्यपि मालिक मलिका लाट का)
(3) किसी घर के मामले के शोक के विषय में पूछो तो महा आश्चर्य है कि तुम्हें वास्तविक घर से ग़ाफ़िल रहने का शोक नहीं।
(4) आपने सब लोगों के सांसारिक काम-काज में तन- मन से लगने का संकेत करके बुलाया चाहा है। अच्छा, यदि लोगों की बहुमति पर ही सच्चाई का निर्णय करना स्वीकार हो, तो बताइए आदम से लेकर इंदम (अब) तक बहुमति (Majority) उन लोगों की है जो वर्तमान जीवन के काम-धंधे को अपने व्यवहार से सच कहने वाले हैं या उनकी जो पृथिवी-तल की धूलि के लगभग प्रत्येक परमाणु में अपनी जिह्वा से बोल रहे हैं कि संसार झूठा है।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्त मध्यानि भारत। अव्यक्त निधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥
अर्थः - जिसका आदि और अंत अव्यक्त है, केवल मध्य मध्य व्यक्त है, ऐसे के लिये रोना धोना किस काम का ?
(5) भगवन् ! आपही की आज्ञा पालन हो रही है। अर्थात् आपसे तुरन्त (बहुत शीघ्र) मिलने का प्रयत्न हो रहा है। शरीर की दृष्टि से तो वियोग कदापि दूर नहीं हो सकता, चाहे कितने ही निकट हो जायँ, फिर भी जहाँ एक शरीर है वहाँ दूसरा शरीर नहीं आ सकता, अतः शरीर की पृथकता अनिवार्य है। वस्तुतः वियोग को दूर करने के लिये "राम" अहर्निश यत्नवान् है, द्वैत का नाम और चिह्न नहीं रहने देगा, आप का अंतरात्मा, आप के हृदय में आपकी आँखों में, वरन् सब के हृदय में सबके जिगर (यक़्त) में राम अपना
घर देखे बिना चैन नहीं लेगा। आओ, आप भी पाँच नदियों (रक्त, मूत्र, स्वेद, वीर्य और राल) के कीचड़ अर्थात् शरीर से अपने निज धाम (वास्तविक स्वरूप) की ओर प्रस्थान करो। इस पँचनद से उठकर सच्चे धाम (असली स्वरूप) की पहाड़ियों पर खिंच-खिंच कर पधारिएगा। मिलना अब केंद्र ही पर उचित है, जहाँ पर मिले फिर जुदाई नहीं हो सकती। वृत्त पर (hide and seek) छुपन लुकन खेलते-खेलते कहाँ तक निभेगी। "राम" ने तो यदि स्वयं गंगा को अपने चरणों से निकलती हुई न देखा, तो लोग उसका शरीर गंगा के ऊपर बहता हुआ अवश्य देखेंगे।
मैं कुश्तगाने-इश्क़ में सरदार ही रहा। सर भी जुदा किया तो सरे-दार ही रहा ॥
सीप से मोती निकला हुआ फिर सीप में वापस नहीं आता।
फिर जुलेखा न नींद-भर सोई। जब से यूसुफ़ को ख़्वाब में देखा ॥
गंगा में पड़ी हुई हड्डियाँ वारिसों को वापस कैसे मिल सकती हैं ? हाँ, मिलने की इच्छा रखने वाले अपनी हड्डियाँ भी गंगा के समर्पण कर दें तो कदाचित् मेल हो जाय। कुछ कठिन तो नहीं, नित्य प्राप्त की प्राप्ति है, नित्य तृप्त की तृप्ति।
इश्क़ का भनसब लिखा जिस दिन मेरी तक़दीर में। आह की नक़दी मिली स्वहरा मिला जागिर में ॥ कव सुखुकदोश रहे क़ैदिये-ज़िंदाने-वतन। वूए-गुल फांदती है वाग़ की दीवारों को ॥ खूने-आशिक़ चेह कार भी आयद। न शवद गर हिनाए-पाए-दोस्त ॥
अर्थ—आशिक़ का खून (अर्थात् प्रेमी का रुधिर) किस काम में आए यदि मित्र (प्यारे) के पैरों में मेंहदी की जगह न लगे। (अर्थात् मित्र के पैरों में लगे, इससे बढ़कर आशिक़ के खून का और कोई प्रयोग नहीं)।
शुद फ़िदाए-पाए-जानाँ जाने-मन। मुसहिफ़े-रूयश बुवद क़ुरआने-मन ॥ 1 ॥ दर सरम हरदम सरे-आज़ादगीस्त। क़ैदे-तन वाशद अकनूं ज़िंदाने-मन ॥ 2 ॥ सिजदए-मस्ताना अम वाशद नमाज़। दर्दे-दिल वा ओ बुवद ईमाने-मन ॥ 3 ॥
अर्थ—(1) मेरी जान ! प्यारे के पैरों पर फ़िदा (निछा- वर) हो गई, इस लिये उसके चेहरे की किताव (उसके मुख मंडल का दर्शन) मेरा क़ुरान है।
(2) मेरे मस्तिष्क में हर समय स्वतंत्रता का ख़याल है, शरीर की क़ैद (बंधन) अब मुझे जेल घर मालूम होती है।
(3) मेरी नमाज़ मेरा मस्ताना सिजदा है, और उसके साथ दिल का दर्द मेरा ईमान है, अर्थात् उसके प्रेम में हृदय की पीड़ा मेरा ईमान है।
ज़िकरे-खुदा व ज़िकरे-नान् मीशवद ऐ नमीशवद। इश्क़े-सनम व बीमे-जां मीशवद ऐ नमीशवद ॥
अर्थ—ऐ प्यारे ! मेरे से ईश्वर का भजन तो हो पर उदर भरण की चिन्ता कभी न हो। ऐसे ही मेरे से प्यारे का इश्क़ (प्रेम) तो हो, पर उस में प्राणों का भय कभी न हो।
मे रसी दर कावा ज़ाहिद-ज़ूद अज़ राहे-तरी। बहदे-ख़ुश्को सौमे तो बे दीदए-गिरियां अवस ॥ अर्थः-ऐ ज़ाहिद (तपस्वी) ! तू जल के मार्ग से काबे तक
शीघ्र पहुँचेगा, रोज़ा रखना और शुष्क तपस्या से कुछ न होगा जब तक कि प्रेमाश्रुओं से तेरे नेत्र पूर्ण न हों।
दर दविस्ताने-मुहब्बत अवजद अज़ खुद रफ़्तगी-अस्त। मानिये विस्मिल्ला आं फ़हमद कसे को विस्मल अस्त ॥ 1 ॥ रह नवद्दाने—मुहब्बत रा पयाम अज़ मा रसां। कांदरी रह यक फ़दम अज़ खुद गुज़श्तन मंज़िल अस्त ॥ 2 ॥
अर्थ—(1) प्रेम की पाठशाला में अवजद (क, ख,) क्या है ? आपे से बाहर अर्थात् आत्म-विस्मृत हो जाना। विस्मिल्ला के अर्थ वह जानता है जो पहले स्वयं विस्मल (घायल) हो चुका हो।
(2) प्रेम मार्ग पर चलने वालों (प्रेमियों) को हमारी ओर से संदेशा पहुँचा दो कि इस मार्ग में अपने से एक क़दम गुज़रना ही मंज़िल है।
नहीं कुछ ग़ज़ दुनिया की न मतलब लाज से मेरा। जो चाहो सो कहो कोई बसा अब तो वही मन में ॥
एक फाले साँप का पैरों-तले आना, व्याल भूपण 'राम' प्यार करने को हाथ बढ़ाता है।
मेरे प्यारे का यह भी प्यारा है। मेरी आँखों का यह भी तारा है॥
साँप का दौड़ जाना।
अपरोक्त]—घना जंगल, जल का किनारा, वनोपवन खिला हुआ, एकांत, कुछ उपनिषदें समाप्त। ⋯⋯⋯⋯⋯
ऐ वाक्-शक्ति ! तुझ में है बल उस आनंद को बयान करने का ? धन्य हूँ मैं ! कृत कृत्य हूँ मैं !
जिस प्यारे का घूंघट में से कभी हाथ, कभी पैर, कभी
आँख, कभी कान कठिनता के साथ दिखाई देता था, दिल खोलकर उस दुलारे का एकत्व लाभ हुआ। हम नंगे वह नंगा, छाती छाती पर है। ऐ हाड़-चाम के जिगर कलेजे ! तुम बीच में से उठ जाओ। भेद-भाव ! हट। फ़ासले ! भाग। दूरी ! दूर हो। हम यार, यार हम। यह शादी है कि शादी-मर्ग। आँसू क्यों छमाछम वरस रहे हैं ? ⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯ क्या यह विवाह के अवसर पर की भड़ी है कि मन के मर जाने का शोक (मातम) है ? संस्कारों का अंतिम संस्कार हो गया। इच्छाओं पर भरी पड़ी। दुःख-दरिद्र उजाला आते ही अँधेरे की तरह उड़ गए। भले-बुरे कर्मों का बेड़ा डूब गया।
बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का। जो चीरा तो एक क़तरए-खूँ न निकला ॥ शुक्र है, आई ख़बर यार के आ जाने की। अब कोई राह नहीं है मेरे तरसाने की ॥ आप ही यार हूँ मैं ख़त-ओ-किताबत कैसी। मस्ती-प मुल हूँ मैं हाजत नहीं मयखाने की ॥
वह तुरिया जो उनन्ता (पक्षी) की भाँति तिरोहित (अदृश्य) थी, हम स्वयं ही निकले; जिसको अन्य पुरुष की भाँति स्मरण करते थे, वह उत्तम पुरुष अर्थात् मैं ही निकला। अन्य पुरुष अब अंतर्धान। ॐ हम, हम ॐ। हम न तुम दफ़्तर गुम। ॐ ! ॐ ॥ ॐ ॥॥
आँसुओं की भड़ी है कि अभेदता का आनंद दिलानेवाली वरसात ? ऐ सिर ! तेरा होना भी आज सफल है। आँखों ! तुम भी धन्य हो गईं। कानों ! तुम्हारा भी पुरुषार्थ पूरा हुआ। यह शादी (मिलाप, वा अभेदता) मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो। मुबारक का शब्द भी आज कृतार्थ हुआ।
शाद बाश ऐ अशअशे-सौदाए-मा। ऐ दवाए-जुम्ला दर्ददाए मा॥ ऐ दवाए-नखवतो-नामूसे-मा। ऐ तो अफ़लातूँ ओ जालीनूसे-मा ॥ 1 ॥
अर्थः-(1) ऐ मेरे पगलेपन के कारण ! ऐ मेरे समस्त रोगों की औषधि ! ऐ मेरे अभिमान और मान की औषधि (दवा) ! ऐ मेरे लिये जालीनूस और अफ़लातून ! तू आनन्दवान हो।
(2) ऐ मेरी विच्छिप्तता (वा पगलेपन) के कारण ! आनंदवान हो। तू ही तो मेरे समस्त रोगों की औषधि है।
तू ही मेरे अभिमान और मान की औषधि है, तू ही मेरे लिये अफ़लातून और जालीनूस है।
अहंकार का गुड्डा और बुद्धि की गुड़िया जल गए। अरे मेघो ! तुम्हारा यह काला बादल बरसाना धन्य हो। यह मस्ती भरे नैनों का आवण धन्य (मुबारक) है।—
यार असाडे ने अंगिया सिलाया। असां खोल तनी गल ला लिया॥ असां घुट जानी गल ला लिया।
मस्त दिहाड़े सावन दे आए। सावन यार मिलावन दे आए॥
भाग ले ओ यार ! भाग। कहाँ भागेगा, आकाश पर छुपेगा ? मैं वहां मौजूद। कैलास पर नट जा, मैं वहाँ उप- स्थित। समुद्र में जा लेट, तुझ से पहले पहुँचा हूँ। अग्नि में घुस जा, मेरा ही मुख है। समस्त शरीरों में मैं, समस्त नाम और रूपों में मैं, सारे शरीर और नाम-रूप यह स्वतः मैं। कौन बोले ? कौन कहे ? गूँगे का गुड़। अहा, हा, हा, हा,
हा ! मैं कैसा सुंदर हूँ। मेरी सोहनी सूरत, मेरी मोहनी मूरत, मेरी झलक, मेरी डलक, मेरा सौन्दर्य, मेरा लावण्य ! इसको मेरी आँख के सिवा कोई आँख देखने की ताब नहीं ला सकती।
मैं अपनी महिमा में मस्त पड़ा हूँ। पर हाय मेरे सौंदर्य का कोई ख़रीदार नहीं, मेरे यौवन का आहक कोई नहीं। इस अनमोल हीरे को कौन ख़रीदे ?
मुल घत सी आन के कौन केहड़ा, नहीं दिसदा दूसरा होर कोई।
मैं स्वयं ही आशिक़ हूँ, स्वयं ही माशूक़। आशिक़ हूँ कि माशूक़ हूँ ? मैं तो इश्क़ हूँ। ⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯ ⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯
बाहर जब दृष्टि जाती है, हर पत्ती और फूल 'तू ही' 'तू ही' के स्वर से स्वागत करता है। भीतर से आनंद के बादल अपनी गरज में सब कुछ निमग्न कर रहे हैं। धीरे-धीरे अंग ढीले (गति-हीन)। देश-काल कहाँ चल गए ? फ़ासला, दूरी और भीतर-बाहर कैसे ? अब आगे वर्णन कौन करे ? ⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯ ⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯
कई दिन इसी दशा में बीत गए, किंतु रात-दिन दिन-रात किसके ?
जित बल देखाँ तूँ ही तूँ। ताना पेटा रूँ।
तीसरे पहर का समय होगा। एक काठ के भूले पर ठीक बीच में राम नग्न बैठा है। और मेघ के स्वरूप में मेघनाद की भांति ऊपर से कड़क रहा है; बिजली बनकर अपने तेज की चमक से जल और पापाण पर दमक रहा है; पानी बन
कर अपनी वौछार से सभस्त प्राणियों को अपने-अपने घोंसलों में घुसेड़ रहा है। आकाश और भूमि और पहाड़ कोई दृष्टिगोचर नहीं होता। जल ही जल है। मानो गंगा भी भूमि से उठकर आकाश तक जा चढ़ी है जिससे कि अपने घर, 'राम', में आराम करे। इन सव को तो घर मिल गप्प, अव घरहीन राम कहां विश्राम करे?
न िशमने कि कुनम मकाँ, नं पेर कि वर परम अज़ मियाँ।
अर्थः—न घर है कि जहां मैं विश्राम करूं और न पर है कि जिस से मैं अपने भीतर से वाहिर आऊं।
राम, जल शयन नारायण उस जल में व्याप रहा है। वादलों पर चल रहा है, समुद्र को रस्य वना रहा है। कभी वर्षा आती है कभी घूप, किंतु राम के यहां न कुछ चढ़ता है न उतरता।
जद पाया भेद कलंदर दा। राह खोजिया अपने अंदर दा॥ सुखवासी हो उस मंदिर दा। जित्थे कदे न चढ़दी लहँदी है॥ मुँह आई बात न रहँदी है॥ 1॥
दुनियां नहीं पार्वती है, भंग बूटी हर समय घोट रही है। शिव की आँख खुली, चट प्याला हाज़िर (उपस्थित)। ज़रा होश आया, नशे में बहाया।
आ मेरे भँगड़ा! तू आ, भंग पी जा। आ मेरे भँगड़ा! निशंग भंग पी जा॥1॥
भर-भर देनियां मैं भंग दे प्याले। निशंग भंग पीजा, निहंग भंग पीजा॥2॥
भंग घोटनेवाली मक्ति नहीं, यह तो स्वयं भंग और मदिरा है। भंग और मदिरा नहीं, यह तो भंग और मदिरा का मद (नशा) और मस्ती है, यह तो स्वयँ मैं हूँ।
न है कुछ तमन्ना न कुछ जुस्तजू है। कि वहदत में साक़ी न सागर न वू है॥ मिली दिल को आंख जभी मारफ़त की। जिधर देखता हूं, सनम रू वरू है॥ गुलिस्तां में जाकर हर इक गुल को देखा। तो मेरी ही रंगत व मेरी ही वू है॥ मिरा तेरा उठ्ठा, हुए एक ही हम। रही कुछ न हसरत न कुछ आरजू है॥
भर दे नी कटोरा भंग दा। तेरा केडी गल्लूं जिया संग दा?॥
एक अनूठा स्वप्न—गोल चंद (जिसको सर्व साधारण कृष्ण परमात्मा कहते हैं) राम से छुप्पन-लुक्कन (hide and seek) खेलता है। ढूँढते-ढूँढते हार करः—
राम—"अरे कहां छुप रहा? न वाहर है न भीतर है। अंतर्धान कहां हो गया? वड़ा अंधेर है। हाय हाय!......... हां! हां!! हां!!! अब लगा पता। किवाड़ की आड़ में घुसे खड़े थे आप। वाहर निकल गोलू! अब जाता कहां है? कान खींचकर चपत जड़ा। "मुँह फेर दूँगा! ............................................................"
इतने में झट आंख खुल गई। अपना कान दर्द कर रहा था, और अपने ही गालपर (थप्पड़ मारता हुआ) हाथ था। इस स्वप्न का वर्णन जो वताए (अर्थात् इस स्वप्न का रहस्य जो बूझे) वही यूसुफ़।
एक पत्रों कुछ प्रश्न उठाए हुए इस आनंद-गंगा में स्नान करने आ गया। प्रश्नों के उत्तर।
"क्या राम अकेला है?"
(1) कोई विद्यार्थी साथ नहीं, नौकर पास नहीं। वस्ती वहुत दूर है, आदमी का नाम काफ़ूर है। तारों-भरी रात आधी इधर है आधी उधर है। विलकुल सुनसान है, विया- वान है, सन्नाटे की अवस्था है। पर क्या हम अकेले हैं? अकेली हमारी वला। अभी वर्षा वांदी स्नान कराकर गई है, हवा लौंडी चारों ओर दौड़ रही है, सामने गंगा अपनी गंग गंग गंग की रागनी अलाप रही है, सैकड़ों सेवक चहुँ ओर की झाड़ियों में आराम कर रहे हैं। लो, यह शब्द किधर से आया? कोई वनपशु झाड़ियों में से बोल उठा है- "उपस्थित"। हम अकेले क्यों? पर हां, हम अकेले ही हैं। यह सेवक सेवक और नहीं, हम ही हैं। गहन वृच्च (तरुवर) नहीं, हम ही हैं। हवा नहीं हम हैं। गंगा कहाँ? हम हैं। तारे-वारे और चाँद नहीं, हम हैं। खुदा नहीं हम। माशूक़ और वस्ल (मिलाप) कैसा? प्यारी और प्रणय कैसा? हम ही हम। अरे एकांत का खयाल भी हम से भाग गया अकेले का शब्द भी अकेला छोड़ गया।—
तनहास्तम तनहास्तम चि बुलअज्ज़व तनहास्तम। जुज़ मन न वाशद हेच शै यकतास्तम तनहास्तम॥
अर्थः—मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, कैसे आश्चर्य की वात है कि मैं अकेला हूं। मेरे विना कोई वस्तु नहीं है, मैं अद्वितीय हूं, अकेला हूं॥
है नारा ओ है नारा ज़नो नीज़ है स्वहरा। अशजारो-कुहिस्तानों-शबो रोज़ नगारा॥1॥
वाद अंजमों-गंगाजलो-अवरो-महे-ताबां। माशूक़ो-खुदा खास विसालो दमे-हिजरां॥ काग़ज़ क़लम चश्मतो-मज़मूनो-तो खुद जां। "राम" अस्त हमा, नस्त दिगर, आस्त, हमा आँ॥
अर्थ- यह गरज, यह गरजनेवाला, और साथ. इस के यह वन, वृच्च, पर्वत, दिन रात, पवन, तारे, गंगा जल, मेघ व प्रकाशमान् चन्द्रमा, माशूक़ (प्रिय) व स्वयं परमात्मा, मिलाप व वियोग, काग़ज़, लेखनी, नेत्र, विषय और तू स्वयं यह सव 'राम' है, इतर कुछ नहीं है, वही है, सब वही है।
क्या राम वेकार है?
(2) मन का मानसरोवर अमृत से लवालव हो रहा है। आनंद की नदी हृदय में से वह रही है। अंतःकरण कृतकृत्य और गद्गद है। विष्णु के भीतर सतोगुण इतना भरा कि समा न सका। उस सतोगुण के स्रोत से पैरों की राह सतो- गुण की गंगा जारी हो गई। ठीक इस भाँति परम आनंद से भरपूर राम भगवान् जिसका ब्रह्मानंद समेटे से सिमटता नहीं पूर्ण आनंद का स्रोत वनकर आनंद की नदी संसार को भेज रहा है। प्रफुल्लता और विश्रांति की प्रभात पवन प्रेषित कर रहा है। कौन कहता है, वह वेकार वैठा है?
(राग खरवा-ताल दादरा)
अलाया इह-हुस्साक़ी मये वाक़्ई वचश अज़ मा। कि रोज़ अफ़ज़ूं शवद इश्क़त कुनद आसाँत मुश्किलहा॥1॥ व हुस्ने-मौज खेज़े-मन कि शुद तुर्फ़ा नक़्शे-मन। ज़ मौजे-खूवी ए वहरम चेशोर उफ़्ताद दर दिलहा॥2॥ शवे-महतावोचादे-खुश लवे-दरिया सनम दर वर। वसाँ दानंद हाले-मा राग़ोने-तमव्वजहा॥3॥
मरा दर मंज़िले-जानाँ हमा पेशं हमा शादी। अरस बेहूदा मी नालद कुजा वंदेम महे मिलदा॥4॥ हमा कारम ज़ ये कामी व खुश कामी कशीद आखिर। निहां चूं मानद ई राज़े कि बूदा शमप-महफ़िल हा॥5॥ हुज़ूरी चे एमी स्याही अज़ो गायव नई पे जाँ। तुई उज़्या, तुई मौला. तुई दुनिया व माफ़ीहा॥6॥ य सिद्क़े-दिल अनलहक़्क़ गो, चुनीनत् राम फ़रमायद। कि दर यक दम ज़दन गर्दद वसालो-क़ितप-मंज़लहा॥7॥
अर्थ-1- सावधान पे सुरा पिलानेवाले! (अमर) मदिरा हम से चख जिसमें तेरा प्रेम नित्य प्रति उन्नति करता रहे और तेरी कठिनताओं को सरल कर देवे (यहां ईश्वर-प्रेम में निमग्न पुरुष अपने गुरु से कहता है कि हम से प्रेम-वूँद चख जिसमें हृदय की सव ग्रंथियां खुल जाँय और सच्चा रहस्य प्रकट हो जाय)।
2-मेरी लदरार्ता हुई सुंदर्ता के कारण, जो कि मेरा एक विचित्र पर्दा वन गई है, और मेरे प्रेम-सागर की सुंदरता की लहर से दिलों में कितना शोर उपस्थित हो गया है, अर्थात् कितने दिल व्याकुल हो गए हैं।
3- जव उजेली रात और मन भावती वायु, नदी का तट और प्यारा पहलू में हो, तो हमारी ऐसी दशा को लहरों में ढूँढे हुए लोग (संसार की कामनाओं और प्रलोभनों में व्यथित लोग) क्या जानें।
4- मुफ़को प्यारे की मंज़िल में अत्यंत सुख और अत्यंत प्रसन्नता है। घंटा व्यर्थ कोलाहल करता है, हम चलने को ऊँट कहां वांधें? (अर्थात् हमको तो यहां ही प्यारे का मिलाप हो गया, इस में हमें अत्यंत प्रसन्नता है, अव नाना उपदेश
का कोलाहल मुफ़्त में है, हम यहां से नहीं टल सकते अथवा अव श्वांस का कोलाहल व्यर्थ है, हमको जाना-आना शेष नहीं रहा)।
5—मेरे सव काम जो कि अपूर्ण थे, अव पूर्ण हो गप! यह भेद क्योंकर छिपा रह सकता है, क्योंकि यह अव मह- फ़िलों की शमा (सभाओं का दीपक) हो गया है अर्थात् मेरी सव कामनाएँ प्यारे के मिलने से पूरी हो गई हैं,यह वात छुपी नहीं रह सकती।
6-ऐ प्यारे! तू प्रभुत्व क्या चाहता है? तू उस से दूर नहीं (क्योंकि वह हर एक के भीतर मौजूद है),तू ही आखिरत है, तू ही मौला है, तू ही दुनिया (लोक) है. तू ही माफ़ीहा (परलोक) है।
7—राम यह आज्ञा (तुम्हें) देता है कि सच्चे चित्त से शिवोऽहं कहो, क्यों थोड़ी सी देर में शिवोऽहं का एक दम मारने से (अर्थात् एक वार शिवोऽहं कहने से) प्यारे का मिलाप हो जायगा और मंज़लें (मुरादें) तै हो जायंगी।
No sin, no grief, no pain, Safe in my happy self. My fears are fled my doubts are slain My day of triumph come. मैं अपने आनन्द स्वरूप आत्मा में सुरक्षित हूं। वहां न पाप है, न दुःख है, न दर्द है॥ मेरा भय भाग गया, मेरे संशय नाश होगए। (इस प्रकार) मेरी विजय प्राप्ति का दिन आगया। O Grave! where is thy victory? O Death! where is thy sting?
अो चिता! (अव वता) कहां है तेरी जय? अो मृत्यु! (अव वता) कहां है तेरी वेदना?
My self to me my kingdom is Such perfect joy therein I find No wordly wave my mind can toss. To me no gain to me no loss. I fear no foe, I scorn no friend, I dread no death, I fear no end.
मुझे मेरा आत्मा मेरा साम्राज्य है। इस प्रकार पूर्ण आनन्द में उस में पाता हूं। कोई सांसारिक तरंग मेरे चित्त को विचलित नहीं कर सकती। मेरे नज़दीक न लाभ है न हानि (हानि लाभ समान है)। मुझे किसी शत्रु का त्रास नहीं, किसी मित्र से घृणा नहीं। न मुझे नाश का डर है, न मृत्यु का भय।
मैंने कहा कि रंजो-राम मिटत हैं किस तरह कहो। सीना लगा के सीने स मह ने वता दिया कि यों॥
राम वेकार कभी नहीं, संसार भर में निकम्मे काम राम ही करता है।
मिहर सरगश्ता कि आफ़ताव कुजास्त। आव हर सू दवां कि आव कुजास्त॥1॥ मवाव दोशम ज़ द दा में पुरसीद। कि पे जहां वो चिगो कि मवाव कुजास्त॥2॥ मस्त पुरसां कि मस्त रा दीदी? या रव! आँ चे खुदो-खराव कुजास्त॥3॥ वादा दर मयकदा हमे गरददद। गिर्दे-मज्लिस कि गो शराव कुजास्त॥4॥
यारे-खुद वेनक़्राव मे गरददद। कि मर आँ यारे-वेनक़्राव कुजास्त॥5॥
अर्थ 1—भास्कर व्याकुल हो रहा है कि सूर्य कहां है, पानी हर तरफ़ भाग रहा (वहता फिरता) है कि पानी कहाँ है?
2—कल रात मेरी नींद मेरी आँख से पूछती थी कि ऐ जगत् की देखनेवाली (आँख)! तू वता कि नींद कहां है?
3—मस्त लोग पूछ रहे हैं कि तुमने मस्त को देखा? हे ईश्वर! वह वेखुद और खराव (वदमस्त) कहां है?
4—मदिरा मद्यालय में सभा के चारों ओर दौड़ती हुई पूछती फिरती है कि मदिरा कहां है?
5—अपना यार (प्राप्तव्य) यद्यपि वेनक़्राव (वेपर्दा) फिरता है, किंतु फिर पूछता है कि वह वेनक़्राव कहां है?
चूं कार मरदम भी कुनंद अज़ दस्तो पा हरकत कुनंद। वेकार माँदम जाय-हरकत हम मनम हर जा स्तम॥1॥ अज़ खुद चहा वेरूँ जहम, गो मन कुजा हरकत कुनम। अज़ वहरचे कार-कुनम मन रूहे-मतलवहास्तम॥2॥
अर्थ 1—लोग जव कोई काम करते हैं, तो हाथ और पैर चलाते हैं,मैं हाथ पैर चलाने से वेकार हूं, क्योंकि हर जगह मैं खुद मौजूद हूं। अर्थात् मनुष्य जव काम करता है, तो चेष्टा करता है, आता जाता है, किंतु मैं कहीं आता जाता नहीं, इस लिये कि हर जगह मौजूद हूं।
2—मैं अपने से वाहर क्यों कूदूं और चेष्टा करूं? किस लिये कोई काम करूं? इस लिये कि समस्त आशाओं की जान तो मैं हूँ।
क्या यह अहंकार (अनानीयत) है?
घमंडी और अहंकारी कौन है? जो अविद्या (गाढ़े अन्ध- कार) में फँसा हो।
आँ कस कि नदानद व नदानद कि नदानद।
अर्थः—वह मनुष्य जो नहीं जानता और इस बात को भी नहीं जानता है कि मैं नहीं जानता हूं।
अहंकारी वह है जो पद से,कुल से,रुपया से,विद्या से या चमड़े की रंगत से या श्रेणी से फटी-पुरानी बड़ाई की खिलअत (उपाधि) उधार मांगकर पहन रहा हो और उसपर मुग्ध हो। अर्थात् हो तो वास्तव में भीख मांगनेवाला,पर इस अपनी वास्त- विक दरिद्रता को सम्मान क्या कारण ख़याल कर बैठा हो। फ़रऊन और नमरूद ने खुदाई दावा किया था। नास्तिकता और भूल के होते हुए भी वह धन्य थे कि एक वेर महावाक्य "शिवोऽहं" "अनलहक़्क़" तो वोल उठे। उनकी नास्तिकता और भूल केवल यह थी कि उन्होंने अपने पवित्र स्वरूप को लांछन लगाया, अपने आप को परिच्छिन्न वनाया, अपने आपको "वहदहू ला शरीक" (एकमेवाद्वितीयं) न जाना, सच्ची मंज़लत (पराकाष्टा) को न पहचाना, अपना सांभी- दार एक दूसरा ईश्वर कल्पना करके उसकी नक़ल उतारना या बरावरी करना चाहा, सच्ची बड़ाई को छोड़कर बनावटी घमंड स्वीकार किया, शरीरत्व में फँसे, पैर के जूते को सिर पर चढ़ाया, अपने पैरों आप कुल्हाड़ा मारा, और अपने आप ईश्वर के साथ दूसरे को सम्मिलित करने वाले और सन्मार्ग से फिरने वाले बने। किंतु "राम" जो स्वयं गुलों (पुष्पों) की श्वास, अरुण कपोल वालों में प्राण की
श्वास फूकने वाला और मंसूर को सरदार तथा विजयी बनाने वाला है। इस "राम" को क्या पड़ा है कि अपनी निजी ज्येष्ठता तथा तेज और प्रताप को छोड़ कर भिच्चा वृत्ति अर्थात् घमंड और अहंकार स्वीकार करे।
नमरूद शुद मरदूद चूँ बूदश निगह महदूद चूँ। मारा तकव्वुर कै सज़द चूँ किबरिया मौला स्तम॥
अर्थः—नमरूद की दृष्टि जव परिच्छिन्न हुई तो वह मरदूद हो गया, हमें भला यह घमंड कैसे उचित है जव कि हम स्वयं ज्येष्ठ, (सर्व शिरोमणि) और ईश्वर वास्तव में हैं।
यह पागलपन न हो।
प्रायः बुद्धिमानों के द्वारा यह शिकायत सुनने में आई कि 'राम' को सन्निपात [मालाखोलिया] की वीमारी हो गई है, विच्चिप्तता [पागलपना] का रोग हो चला है। वर्तमान काल के तर्कशास्त्रियों का अग्रगण्य "जे॰ एस॰ मिल" लिखता है कि दो वातों में एक को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने का अधिकार केवल उस व्यक्ति को होता है जो दोनों विषयों से भली से भली भाँति परिचित हो। केवल एक ही ओर का ज्ञान रखनेवाला दोनों की तुलना करने की योग्यता नहीं रखता। ऐ मिल,डैविड ह्यूम (David Hume)के अनुयायी! अर्थात् बुद्धि और तर्क-संपन्न व्यक्तियों! क्या तुमने कभी इस दीवानेपन का आनन्द चखा? इस पागलपन का अनुभव किया! इस सौंदाईपन का स्वाद लिया?—कभी नहीं।
दिल के जाने की खवर आक़िल का क्या जाने वला। किस तरह जाता है दिल वेदिल से पूछा चाहिए॥
अतः तुम्हें कोई अधिकार नहीं इस सदाशुभ पागलपन पर अत्तर रखने का (अर्थात् कोई लांछन लगाने का) ऐ आनंद (Ecstasy-वेखुदी) पर आसक्त लोगो! जाओ मदिरा तुम्हें स्मरण कर रही है, संगीत-श्रवण चुला रहा है, सुस्वादु भोजन तैयार पड़े हैं, सुंदरी रमणियाँ प्रतीच्चा में खड़ी हैं। जाओ, पर सुनो तो सही, सुंदरियों में. संगीत-श्रवण में, शराव और कवाव में, मध-मांस में, या अन्य विषयों में वह क्या है जो तुम्हें रात-दिन अपना दास वनाए रखती है? प्यारो! वह 'राम' के पागलपन की ज़रा सी झलक है और वस। तुम्हें लज्जा नहीं आती, फ़ीकर के भूत (मदिरा) से कृत्रिम उन्माद (पागलपन) उधार माँगते हो। क्षण-भर के आनंद (वेखुदी, दीवानेपन) के लिये रक्त और हाड चाम के वारे-न्योरे जाते हो, स्त्रियों के निकम्मे होते हो, भाँति-भाँति के विषयों में फँस जाते हो। आओ, जगत् के सम्राट को जो मस्ती (दीवानापन) नसीव नहीं है, राम उसका दान करता है।
राम दीवाना है व लेकिन वात कहता है ठिकाने की। जामे-शराव चहददत वाला। पी-पी हरदम रहो मतवाला॥ पी मैं वारी लाके डींक। अल्ला शाहरग थीं नज़दीक॥ सुन सुन सुन ले 'राम' दोहाई। वे अंता! क्यों अंत है चाई॥ ज़ात पाक नूँ ला न लीक। अल्ला शाहरग थीं नज़दीक॥
रो रो कर रुपया को इकट्ठा करना और उससे जुदा होते समय फिर रोना, यह रुपया के पीछे पागल बनना अनुचित
है। अपने स्वरूप के धन को सँभालो। वात-चात में लोग क्या कहेंगे "हाय! अमुक व्यक्ति क्या कहेगा?" इस भय से सूखते जाना, औरों की आंखों से हर वात का अंदाज़ा लगाना, केवल जनता की बुद्धि से (सम्मति से) सोचना,अपनी निजी आँख और निजी समझ को खोकर मूखे और पागल वनना अनुचित है। मिटाओ द्वैत का नाम और चिन्ह, और अपने आपको वहाल करो। क्लाक (घंटा घड़ी) के पिंडुलम के अनुसार दुःख और सुख में कंपित और थरथराते रहना हताश कर देनेवाला पागलपन है। इसे जाने दो। अपने अकाल स्वरूप में स्थिति होने दो। हाँ, 'राम' दीवाना है अर्थात् बुद्धि से परे उसका निवास है। व्यर्थ जगत् पड़ा रचना और उसमें स्वयं लुत हो जाना, ऐसी चेष्टाएँ दीवानों का काम नहीं तो और किस का है?
दीवाना अम दीवाना अम वा अन्क़ो हुश वेगाना अम। वेहूदा आलम भी कुनम ई कर्दमो मन खास्तम॥
अर्थ-मैं पागल हूँ, मैं पागल हूँ, बुद्धि और होश से परे हूँ। व्यर्थ संसार रचता हूं, और इसे रच कर इस से पृथक रहता हूं।
सौदाई नहीं, सौ+दाई (सौ दाँव जानने वाला) है; पागल नहीं, पा+गल (रहस्य का पाने वाला) है।
मीरा 'राम' की दीवानी, दुनिया वावरी कहे। होशो-खिरद से हमको सरोकार कुछ नहीं। इन दोनों साहिवों को हमारा सलाम है॥
अर्थः—चेतना और बुद्धि से हमारा कोई संबंध नहीं, इन दोनों व्यक्तियों को हमारा नमस्कार है।
गर तबीबे रा रसद ज़ां साँ जिनूँ। दफ़्तरे-तिब रा फ़रोशोयद व खूँ॥ जनूने को कि अज़ क़ैदे-खिरद वेहूँ कशम पा रा। कुनम ज़ंजीरे-पाए ख्वेशतन दामाने-सहरा रा॥
अर्थ—(1) यदि वैद्य को इस पागलपन का भेद मिल जाय तो अपने वैदिक के दफ़्तर को अपने रुधिर से धो डाले।
(2) वह पगलापन कि जिससे मैं अपने पाओं को बुद्धि के वन्धन से छुड़ा लूं और जंगल के पले (छोर) को अपने पाओं की ज़ंजीर वना लूं अर्थात् नित्य जंगल में ही रहूं।
(राग जोग—ताल तीन)
आ दे मुक़ाम उत्ते आ, मेरे प्यारिया! टेक पागल असली पागल होजा, मस्त अलस्त सफ़ा, मेरे प्यारिया! ज़ाहिर सूरत दौला-मौला, वातिन खास खुदा, मेरे प्यारिया! पुस्तक-पोथी छुट गंगा विच, दम-दम अलख जगा, मेरे प्यारियां! सेहली-टोपी लाह दे सिर तों, लूँड मुँड हो जा, मेरे प्यारिया! इज़्ज़त फोकी फूक दुनी दी, अक्क धतूरा खा, मेरे प्यारिया! फगड़े भेड़े फैसल तेरे, लेखा पाक चुका, मेरे प्यारिया! परदे फाड़ दुई दे सारे, इक्को इक लखा, मेरे प्यारिया!
आपे भुल भुलावें आप, आपे वंन खुदा, मेरे प्यारिया! बुक्कल विच तेरा प्यारा लेटे, खोल तनी गल्ल ला, मेरे प्यारिया!
दिल व इस्तदलाल वस्तम माँदम अज़ मक़्सूद दूर। नर्दवाँ कर्दम तसव्वर राहे-नाहमवार रा॥
अर्थः—युक्ति और तर्क में मैं ने अपने मन को वाँध दिया (प्रवृत कर लिया) है और इस तरह लच्च्य से दूर गया हूं। और इस तर्क रूपी टेढ़े मार्ग को मैं ने (अपने लच्च्य के पहुं- चने की) सांढ़ी मान ली है।
अक़ल नक़ल नहीं चाहिए हमको, पागलपन दरकार। हमें इक पागलपन दरकार॥ छोड़ पवाड़े झगड़े सारे, गोता वहदत अंदर मार। हमें इक पागलपन दरकार॥ लाख उपाव करले प्यारे, कदी न मिलसी यार। हमें इक पागलपन दरकार॥ वेखुद होजा देख तमाशा, आपे खुद दिलदार। हमें इक पागलपन दरकार॥
राम मैदानों में।
एक जगह से शिकायत-भरा खत आया कि राम ने विसार क्यों दिया है", उसका "उत्तर"— "...................................................................."
मन आँ ताक़त कुजा दारम कि पैमाँ रा निगह दारम; विया पे साक़ी वो विशकन वयक पैमाना पैमानम।
अर्थ—मेरे में वह शक्ति कहां कि जिस से इन्कार पूरा करने का ख्याल रक्खूँ। ऐ प्रेम मद पिलाने वाले [साक़ी=गुरु]! आ, मेरे इस पैमां [इन्कार] को तू एक पैमाने [प्रेम प्याले] से तोड़ दे।
कोई कार्ड-लिफ़ाफ़ा पास न था और न कोई पैसा-वैसा ही पास था —
दिरमो दाम अपने पास कहाँ; नील के घोंसले में मांस कहाँ।
इस समय संयोग से एक किताब में से दो टिकट मिल गए और उधर आपका अवश्य उत्तर चाहनेवाला पत्र मिला। उत्तर लिखा गया है। इसी ढंग पर अन्य काम-धंधे भी होते हैं।
आज लैम्प में तेल नहीं और तेल मँगाने को दाम भी नहीं। पर ऐसी बातों से यह परिणाम न निकाल लेना कि हाय हाय! राम तंगदस्त और दुखिया है।
तवंगरों को मुबारक हो शमअ-काफ़ूरी। क़दम से यार के रोशन ग़रीबख़ाना हुआ॥
प्रकृति राम की सहस्र प्राण से दासी है। प्रतिक्षण राम की सेवा करने की धुन में रहती है। आज लैम्प इस लिये नहीं जलाया कि कदाचित् राम सैर को जाने से न रुक जाय? दिन भर पढ़ता रहा, अब फिर पढ़ने-लिखने लग गया, तो स्वास्थ्य में बाधा पड़ जायगी।
इश्क़ के बीमार को अल्ला शिफ़ा करे।
आज रात नदी पर चाँदनी का आनंद दिखाया चाहती है। राम चरम सीमा (पर्ले दर्जे) की अमीरी और वाद-
शाही करता है। जब मुद्रा सम्मुख आते हैं, फटपट उनको मुक्त कर देता है और फिर इस आनंद और बेफ़िकरी से काटता है कि महाराजाधिराजों (शहंशाहों) के तेज और प्रताप को हँसी के योग्य (ridiculous) बना देता है।
भला भला, जानियाँ! मौजां लुट्टियां जानियां। खुशी रहना कार है, सोग सोगियां द्वार है॥
पहले तो बड़ी चिंता के साथ आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयत्न हुआ करता था, अब आवश्यकताएँ बेचारी अपने आप पूरी होकर सामने आ जायँ, तो उन पर आँख पड़ जाती है, अन्यथा उनके भाग्य में "राम" की तवज्जोह कहाँ? वह आवश्यकताएँ जो अभी पूरी नहीं हुईं (अधूरी हैं), उनसे पूरे राम को क्या प्रयोजन?
भेस बदले महफ़िले-अहबाब में बैठे थे हम; वह समझते थे यह कोई अपरा सा और है।
यह शिक्षा विद्यार्थियों को क्यों नहीं दी जाती कि जब किसी आवश्यकता को दूर करने के समान मौजूद न हों तो वह आवश्यकता ही अनुभव होने न पाए। खूब याद रक्खो कि सामानों के मौजूद न होने में जो आवश्यकता अनुभव होती है, वह केवल झूठी होती है।
जज साहिब जब कचहरी में विराजमान होते हैं, तो उनको कमरे के भारने बुहारने या मेज़ कुर्सी सजाने, दवात क़लम लाने और मुक़द्दमा-बाज़ों को बुलाने का कुछ खयाल नहीं होना चाहिए। उनको तो केवल विवेक और न्याय के लिये अपने मन और मस्तिष्क को शांत और प्रफुल्ल रखना ही काम है। अन्य धंधे जज साहब के कष्ट उठाए बिना अपने आप निभ जायँगे, मुक़द्दमेंबाज़ अपने आप ही नियत
तारीख़ पर उपस्थित हो जायँगे। वकील लोग भी अपने आप पधारेंगे। मेज़ कुर्सी दवात क़लम भी चपरासी लोग समय पर अपने आप तैयार कर रक्खेंगे।
ऐ सत्य के जिज्ञासुओ! राम तुमको विश्वास दिलाता है कि यदि तुम शारीरिक परिश्रम में रात दिन लगे रहोगे, तो तुम्हारी शारीरिक आवश्यकताएँ अपने आप निवृत्त पड़ी होंगी। तुम्हें कुछ आवश्यकता नहीं कि तुम अपने असली आसन को छोड़ कर चपरासी और दास लोगों के काम को अपना धर्म मान बैठो।
संसार में नियम है कि ज्यों ज्यों मनुष्य का पद ऊँचा है शारीरिक श्रम और स्थूल काम से उपरामता मिलती जाती है। जैसे जज इस तरह का कोई काम नहीं करता, चूँकि जज की उपस्थिति ही से सब काम पड़े होते हैं। जज का साक्षी होना ही चपरासियों को, मुक़द्दमे बाज़ों को, अर्ज़ी नवीसों इत्यादि की हलचल में डाल देता है। वैसे ही सच्ची भक्ता की पूँछ को उतारकर सच्चाई के उन्माद (नशे) में मग्न और मस्त की साक्षी रूप स्थिति का होना ही काम धंधे को पड़ा चलाता है। जिस साक्षी के भय से चंद्र सूर्य प्रकाश करते हैं, जिसके भय से नदियाँ बहती हैं, जिसकी आशंका से वायु चलती है, फिर साक्षी को कामना और चिंता से क्या प्रयोजन?
राग भैरवी (ताल शूल)
ये उर से मिहर आ चमका, अहाहाहा! अहाहाहां॥ उधर मह चीम से लपका, अहाहाहा! अहाहाहा॥ हुवा अठखेलियां करती है मेरे इक इशारे से। है क़ांढ़ा मौत पर मेरा, अहाहाहा! अहाहाहा॥
इक़ाई ज़ात में मेरी असंख्यों रंग हैं पैदा। मज़े करता हूँ मैं क्या क्या, अहाहाहा! अहाहाहा॥ कहूँ क्या हाल इस दिलका कि शादी मौज मारे है। है इक उमड़ा हुआ दरिया, अहाहाहा! अहाहाहा॥ यह जिसमें "राम" पे बदगो! तसव्वुर महज़ है तेरा। हमारा बिगड़ता है क्या, अहाहाहा! अहाहाहा॥
राग जोग-ताल धमार।
गुल को शमीम आब गुहर और ज़र को मैं देता हूँ जबकि देखूं उठाकर नज़र को मैं। शाहों को रोब और हसीनों को हुस्नो-नाज़ देता बहादुरी हूँ चला शेर-नर को मैं। सूरज को सोना चाँद को चाँदी तो दे चुके फिर भी तवाफ़ करते हैं देखूं जिधर को मैं। अवरूप-कहकशां भी अनोखी कमंद है वैक़ैद हो असीर जो देखूँ उधर को मैं। तारे झमक झमक के बुलाते हैं "राम" को आँखों में उनकी रहता हूँ जाऊं किधर को मैं।
राग बरवा ताल मुग़लई।
आप ही डाल साया को उसको पकड़ने जाय क्यों? साया जो दौड़ता चले कीजिए वाय वाय क्यों? दीदेह-दिल हुआ जो वा खुद गया हुस्ने-दिलरुवा। यार खड़ा हो सामने आँख न फिर लड़ाए क्यों? गंजे-निहां के कुफ़्ल पर सिर ही तो मुहरे-शाह है। तोड़ के कुफ़्लो मुहर को कंज को खुद न पाए क्यों? अहलो-अयालो-माले-ज़र सब का है यार राम पर। अस्प पै साथ बोझ धर सर पै उसे उठाए क्यों?
'जब वह जमाले-दिलफ़रोज़ सूरते-मिहरे-नीमरोज़, आप ही हो नज़ारासोज़ पर्दे में मुँह छुपाए क्यों? दश्नप रामज़ा जांस्तां नाविके-नाज़-वेपनाह। तेरा ही अक्से-रुख़ सही सामने तेरे आप क्यों?'
राग पीलू, ताल भप
आप में यार देखकर आईना पुर सफ़ा कि यों। मारे खुशी के क्या कहूँ शशदर सा रह गया कि यों। रो के जो इख़्तिमास की दिल से न भूलियो कभी, पर्दा हटा दुई मिटा मुझे भुला दिया कि यों। मैंने कहा कि रंजे-ग़म मिटते हैं किस तरह कहो सीना लगा के सीने से मुझ ने बता दिया कि यों। गर्मी हो इस बला की हाय भुनते हो जिससे मद्दोज़न अपनी ही आयो-ताव है, खुदही हूँ देखता कि यों। दुनिया व ख़ाकवत बना वाह वा जो जहूल ने किया तारों सा मिहरे-'राम' ने पल में उड़ा दिया कि यों।
शरीर कठिन रोग से पीड़ित होता है। ज्वर, खाँसी, पीड़ा और पेचिश अपने अपने बल की परीक्षा करते हैं। उस अवसर पर राम का गाना।
वाह वा ऐ तप व रेज़श वाह वा। हम्वाज़ा ऐ ददों-पेचिश वाह वा॥ ऐ बलाए नागहानी वाह वा। वेलकम! ऐ मर्गे-जवानी, वाह वा॥ यह भँवर, यह लहरे वर्षा वाह वा। वहरे-महरे-राम में क्या वाह वा॥ खाँड का कुत्ता, गधा, चूहा, बला। मुँह में डालो ज़ायका है खाँड का॥
पगड़ी पाजामा दुपट्टा अंगरखा। गौर से देखा तो सब कुछ सूत था॥
दामनी तोड़ी व माला को गड़ा। पर निगाहे-हक़ में है वही तिला॥
मोतिया बिंद दिल की आँखों से हटा। मज़ो-सिहत बिन राहते-राम था॥
सोने को क्या परवाह, आभूषण रहे चाहे न रहे। सोने की दृष्टि से तो ज़ेवर कभी हुआ ही नहीं। सोने के ज़ेवर के ऊपर भी सोना, नीचे भी सोना, चारों ओर भी सोना और बीच में भी सोना, हर ओर सोना ही सोना है। आभूषण तो केवल नाम मात्र है। सोना सब दशाओं में एकरस है। मुझ में नाम और रूप ही कभी स्थित नहीं हुए, तो नाम रूप के परिवर्तन और रूपांतर रोग और नीरोग का क्या प्रवेश है? यह मेरी एक विचित्र आश्चर्य महिमा का चमत्कार है कि मैं सब में भिन्न भिन्न "अहं" कल्पित कर देता हूँ जिससे यह सब लीला व्यक्तियों में विभक्त होकर मेरा तरह का आखेट हो जाती है। एक दूसरे को अफसर- मातहत गुरु-शिष्य शासक-शासित, दुःखी-सुखी स्वीकार करके मदारी की पुतलियों की तरह खेल दिखाने लगते हैं।
यह मेरी काल्पनिक बनावट मेरे पर तो (प्रतिबिम्ब वा आभास) के कारण अपने आपको कुछ मान बैठी है। इसके कारण मुझ में कदापि भिन्नता नहीं आती, क्योंकि समस्त अस्तित्व और सृष्टि जो इंद्रिय गोचर है, मुझसे है। पिंजरे में चिड़िया उछलती है, कूदती है, प्रसन्न होती है, शोक भी मानती है, किंतु व्याध जानता है कि इस में क्या बल है, चुप तमाशा देखा करता है। आनंदस्वरूप मैं सदा एकांत
हूँ। आप ही आप मेरे में नानत्व (द्वैत) का बाधक होना क्या अर्थ रखता है?
अंदर बाहर ऊपर नीचे आगे पीछे हम ही हम। उर में सिर में नर में सुर में पुर में गिर में हम ही हम॥
समुद्र की सैर।
समुद्र के किनारे राम खड़ा है। पेच खाती हुई तरंगें चरणों में लहरा रही हैं। तेज़ हवा कपड़े उड़ा रही है। समुद्र का गंभीर गर्जन जगत् के ख़याल को लीन कर रहा है।
शरीर में गति नहीं। क्या दशा है। राम कहाँ है!.....
जिस तरफ़ अब निगाह जावे है। आब (जल) ही आब नज़र आवे है॥
विशाल, विशाल सागर; सब जल ही जल, जल ही जल, शुष्क धरती के ख़याल को चित्त-पटल से धो रहा है। बड़े बड़े नगर और बाज़ार, सड़कें, एवं नागरिकों के परस्पर में लड़ाई झगड़े, कोलाहल आदि यहाँ पर स्वप्न से प्रतीत हो रहे हैं। समुद्र के सामने संसार कोई वस्तु नहीं जान पड़ता।
लेकिन जब दृष्टि तनिक ऊपर उठा कर देखते हैं, तो चारों ओर तना हुआ नीला वर्ण महाकाश का तट हीन सागर ऐसा विशाल विशाल, विशाल, दिखाई पड़ता है कि उसमें धरती वाला बड़ा सागर बिलकुल डूब जाता है, नाम और चिन्ह सब खो बैठता है।
आनंद यह है कि अनंत महाकाश स्वयं आनंदस्वरूप राम में तुच्छ और अदृश्य हो जाता है। जैसे सूर्य की किरणों
में मृगतृष्णा दिखाई देती है, वैसे ही इतना बड़ा महाकाश राम के प्रकाश में भान होता है।
आफ़ताबम् आफ़ताबम् आफ़ताब। ज़रों हा दारंद अज़ मन रंगो ताब॥
अर्थः—मैं सूर्य हूँ, मैं सूर्य हूँ, मैं सूर्य हूँ, और सब पदार्थ मेरे से ही चमक दमक पाते हैं।
राग कौंसिया—ताल तीन।
शुद्ध सच्चिदानंद ब्रह्म हूँ अजर अमर अज अविनाशी। जासु ज्ञान से मोक्ष हो जावे कट जावे यम की फाँसी॥ अनादि ब्रह्म अद्वैत द्वैत का जामें नाम निशान नहीं, अखंड सदा सुख जाका कोई आदि मध्य अवसान नहीं। निर्गुण निर्विकल्प निरुपमा जाकी कोई शान नहीं, निर्विकार निरवयव माया का जामें रंचक भान नहीं। यही ब्रह्म हूँ मनन निरंतर करें मोक्ष-हित संन्यासी, शुद्ध सच्चिदानंद ब्रह्म हूँ अजर अमर अज अविनाशी॥1॥ सर्वदेशी हूँ, ब्रह्म हमारा एक जगह अस्थान नहीं, रमा हूँ सच में मुझसे कोई भिन्न वस्तु इंसान नहीं। देख विचारो सिवाय ब्रह्म के हुआ कभी कुछ आन नहीं, कभी न छूटे पीड़ दुःख से जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं। ब्रह्म ज्ञान हो जिसे उसे नहीं पड़े भोगनी चौरासी, शुद्ध सच्चिदानंद ब्रह्म हूँ अजर अमर अज अविनाशी॥2॥ अदृष्ट अगोचर सदा दृष्ट में जा का कोई आकार नहीं, 'नेति नेति' कह निगम अद्वैश्वर पाते जिसका पार नहीं। अलख ब्रह्म लियो जान जगत् नहीं, कार नहीं कोई यार नहीं, आँख खोल दिल की टुक प्यारे कौन तरफ़ गुलज़ार नहीं। सत्यरूप आनंदराशि हूँ कहें जिसे घट घट बासी, शुद्ध सच्चिदानंद ब्रह्म हूँ अजर अमर अज अविनाशी॥3॥
कश्मीर-पर्यटन।
हवाए खुश, फ़िज़ाए खुश, सदाए-आवाज़ारे खुश। बहारे खुश, नगारे खुश, चनारे-सायादारे खुश॥
अर्थः—उत्तम पवन है, उत्तम खुला मैदान है, उत्तम शब्द भरनों का है, उत्तम ऋतु है, उत्तम भाँति भाँति रूप रंग है, और उत्तम छायादार चुनार के पेड़ हैं।
ऐ राम! यह निर्दयता ठीक नहीं। प्रकृति ने तेरे लिये विविध वर्ण के दुपट्टे रँगवाए हैं, नए-नए पहनावे (वस्त्र) पहने हैं, और तू उसकी ओर अर्ध-दृष्टि भी नहीं डालता। यह जुल्म (निर्दयता) मत कर। चल दर्शन दे।
हमा आहुवाने-सहरा सरहा निहादा बर कफ़। ब उमेद-आँकि रोज़े व शिकार ख़्वाही आमद॥
अर्थ-जंगल के समस्त मृग शिरों को हाथ पर लिए हुए इस आशा से खड़े हैं कि कदाचित् तू किसी दिन उनकी ओर शिकार के लिये आयगा।
अज़ीज़ा वक़्ते-साअत मी शुमारंद। रफ़ीक़ाँ चश्मे-दिल दर इंतज़ारंद॥
अर्थः— प्रियजन समय और घड़ियाँ गिन रहे हैं और मित्रगण हृदय और नेत्रों से (उसके आगमन की) प्रतीक्षा कर रहे हैं।
सरव क़दा चमाँ चमाँ, बर लबे-जू रवाँ रवाँ। अर्शे-रहे-तो कुमरियाँ, तालाप-शां बः पा कुशा॥3॥
अर्थः—ऐ नदी तट पर ठुमक २ चलने वाले सरव पेड़
जैसे क़द वाले प्यारे! तेरी राह का बिछौना (बुलबुल) बन गई हैं, उनके भाग्य के तारे को तू अपने पाँवों से प्रकाशित कर।
प्रथम दृश्य।
पहाड़ी खेत थिएटर की बेंचों के ढंग पर सज्जित हैं। एक के पीछे दूसरा अधिक ऊँचाई पर बिछा हुआ है। पानी ऊपर से गिरता हुआ सारे के सारे एक बेंच पर एकसाँ फिर जाता है। वहाँ के हरित धानों को सिंचन करने के बाद दूसरी बेंच पर उतरता है, और इसी प्रकार तीसरी पर। प्रातःकाल में हरे-भरे खेत में पानी की सफ़ेद झलक इस प्रकार मालूम देती है जैसे किसी प्यारे प्रेमपात्र के गोरे शरीर का हरित वस्त्रों में दृष्टिगोचर होना। किंतु दोपहर को दूर से देखा जाय तो सफ़ेद पानी ही पानी दिखाई देता है और पहाड़ चाँदी का सा बन जाता है।
एक हरे तख़्ते पर से राम जा रहा है। स्वच्छ निर्मल हरा मैदान है। प्रफुल्लित करनेवाली वायु अविराम गति से हर समय चलती रहती है। विस्तृत मैदान आकाश मण्डल (Horizon) के सदृश नहीं है वरन् उस सुंदरी के मस्तक की भाँति गोलाकार है जो सौंदर्य-मद में मस्त होकर चंद्रमा को आँखें दिखा रही हो। घास क्या है, अत्यंत नरम साफ़ चादरें बिछी हैं। जान पड़ता है, परियां (अप्सराएँ) इसी स्थान पर नाचकर देवराज इंद्र के "खुशनूदी-मिज़ाज के परवाने" [प्रसन्न करने के पात्र] प्राप्त किया करती हैं।
(राग भैरवी-ताल शूल) भला हुआ हरि बीखरो, सिर से टली बलाय। (टेक) जैसे थे वैसे भए अब कछु कहा न जाय॥
मुख से जपूं न कर जपूं, उर से जपूं न राम। राम सदा हम को भजें, हम पावें विश्राम॥ राम मरे तो हम मरे! हमरी मरे बलाय। सत पुरुष लियो जान जब, मेर न मारा जाय॥ हद टप्पे सो औलिया, बेहद टप्पे सो पीर। हद बेहद दोनों टप्पे, ताका नाम फ़क़ीर॥ हद हद करदे सब गए, बेहद गया न कोय। हद बेहद मैदान में, रहो कबीरा सोय॥ मन पैसो निर्मल भयो, जैसे गंगा-नीर। पीछे पीछे हरि फिरे, कहत कबीर कबीर॥
द्वितीय दृश्य।
सुरा के प्याले के रूप में पहाड़ों की आकृति, ठीक बीच में शुद्ध शीतल जल, पानी अत्यन्त मीठा स्वाद, अमृत का स्रोत। वृक्ष अत्यंत ऊंचे घन के छायावाले। बेलें, प्राकृतिक हिंडोलों की शोभा दे रही हैं। आनंद-दायक झूलने लटक रहे हैं। राम झूलता है और गाता है।—
(राग पीलू-ताल धमार)
दरिया से हुबाब की है यह सदा, तुम और नहीं हम और नहीं। मुझको न समझ अपने से जुदा, तुम और नहीं हम और नहीं॥ जब गुंचा चमन में सुबह को खिला, सब कान में गुल के यह कहने लगा। हाँ, आज यह उक़दा है हम पै खुला, तुम और नहीं हम और नहीं॥
आईना मुक़ाबिले-रुख़ जो रखा, फटट बोल उठा यों अक्स उसका। क्यों देखके हैरां यार हुआ, तुम और नहीं हम और नहीं॥ नासूत में आके यही देखा, है मेरी ही ज़ात से नश्वो-नुमा। जैसे पंबह से तार का हो रिश्ता, तुम और नहीं हम और नहीं॥ तू क्यों समझा मुझे गैर बता, अपना रुखे-ज़ेबा न हम से छुपा। चिक़ पर्दा उठा टुक सामने आ, तुम और नहीं हम और नहीं॥ दाने ने भला ख़िरमन से कहा, चुप रह इस जा नहीं चूनोचरा। बहुदत की झलक कसरत में दिखा, तुम और नहीं हम और नहीं॥
इधर-उधर राम की सेना कलोल कर रही है। छोटे-छोटे मुमूलों ऐसे वर्ण-वर्ण के विहंग (परिन्दे) बेल बूटों पर फुदक रहे हैं। और प्रसन्नता-पूर्ण ध्वनि में चहचहा रहे हैं।
सफ़ेद-सफ़ेद भाग के भीतर से नीला पानी इस प्रकार झलक रहा है जैसे गोरे रंग पर नीली नीली रगें। किसी किसी स्थान पर पानी के नीचे पत्थरों की यह चमक है कि यदि "सर्वस्व अपना घर न समझनेवाला" कोई मनुष्य यहां हो, तो तत्काल उसके चित्त में यही आय कि जैसे बने इन पत्थर के टुकड़ों को चुरा कर घर अवश्य-अवश्य ले जाऊँ। किंतु घर कैसा? यह वह स्थान है कि जब एक बेर देखा,
तो यहीं घर कर बैठने की इच्छा होती है, छोड़ने को जी नहीं चाहता। हाय रे संसार की कामना और वासना! तेरे फंसे कैसे दृढ़ हैं, ऐसे आनंद के अंक (आलिंगन वा चुंगल) से भी लोगों को खींच ले जाती है; फिर गर्मी में रुलाती है और मिट्टी में मिलाती है।
प्रश्न—यहाँ लोक परलोक लुप्त है, आनंद ही आनंद है। स्वर्ग या बहिश्त कहीं इसी का नाम न हो?
राम—हाँ! खूब समझे। शुभ कर्मोंवाला भाग्यशाली जगत्-जंजाल से छुट्टी पाकर कहीं इधर आता है, कुछ देर आराम करता है, फिर पूर्वले संस्कारों से खिंचा हुआ गिर जाता है। अतएव यही स्वर्ग है।
अगर फ़िरदौस बर रूए-ज़मीन अस्त। हमीनस्तो-हमीनस्तो-हमीनस्त॥
अर्थ—यदि स्वर्ग भूमि पर हो, तो यहीं है, यहीं है।
किंतु मेरा स्थान (परमधाम) यह नहीं, क्योंकि मेरे आनंद का वह आकपर्ण है कि संसार की कोई कामना उस पर अधिकार नहीं जमा सकती और उससे तृप्ति हटा सकती; वहाँ से लौट आने के क्या अर्थ?
बख़्शत दे बारावाँ कि ज़रा देख लें चमन। जाते हैं वाँ जहाँ से फिर आया न जायगा॥
(राग सोरठ—ताल तीन)
मान मान मान कहा मान ले मेरा। जान जान जान रूप जान ले मेरा॥ जाने बिना स्वरूप ग़म न जायगा कभी।
कहते हैं वेद बार बार बात यह सभी॥ नैनन के नैन जो है सो नैनन के चैन है। जिसके बगैर शरीर में न पलक चैन है॥ ऐ प्यारी जान! जान तू भूपों का भूप है। नाचत है प्रकृति सदा मुजरा अनूप है॥
तृतीय दृश्य।
कुकरनाग के समीप एक पहाड़ी चोटी पर "राम" आसन जमाए बैठा है। चारों ओर पहाड़ों पर क्यारियों के ऊपर क्या- रियाँ हैं कि कुर्सियाँ बिछी हैं। उन कुर्सियों पर पवन, वरुण, आदित्य, कुबेर आदि देवता गण विराजमान हैं। शाहंशाह राम का इजलास (दरबार) लगा है। नीचे मैदान में धानी हरे लाल पीले रंगों के क़ालीन और गलीचे (घास) बिछे हुए हैं। इस कौतुकालय में कंचनियाँ (नदियाँ) विचित्र वाँकपन से नाच रही हैं और कृतज्ञता-सूचक कलकल नाद (शब्द) करती हुई मन लुभा रही हैं। बाहरी मनोहरता! जिसने निकट जाकर आँख लड़ाई उसी से यह सौहार्द (मित्रता) कि हाँ मेरे हृदय, यकृत में तेरा स्थान है (स्वच्छता)। बेलों के हार डाले, लाल पीले नीले फूल कानों में पहने, झूम-झूम कर ये ऊंचे-ऊंचे वृक्ष क्या कर रहे हैं? नदियों के सौंदर्य की प्रशंसा कर रहे हैं (वा नदियों के सौन्दर्य की शोभा बढ़ा रहे हैं)।
दिलबर दिलरुबाए-मन मेकुनद अज़ वराय-मन। नक्शो-निगारो-रंगो-बू ताज़ा बताज़ा नौ बनौ॥
अर्थ—दिल का लेनेवाला मेरे लिये नए-नए बनाव-श्रृंगार करता है जिससे दिल को ले ले।
ठीक नहीं कहा, जिनको हम (नदियाँ) चतुर कंचनियां समझे थे, वे नाग और नागिनियाँ हैं; काट खानेवाले (अत्यंत शीतल) सर्प हैं कि लहराते-लहराते, बल खाते, साँ साँ मचाते चले जा रहे हैं। शंकर (अमरनाथ) ने अपने साँप भेजे हैं कि रामके आगे नाच दिखाएँ।
सैर कर और दूर से गुल देख उस गुलिस्तार के। पर बना अपने गले का इन को मत जिन्हार हार॥
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे। होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे॥ होता है निहां ख़ाक में सहरा मेरे होते। घिसता है जबीं ख़ाक पै दरिया मेरे आगे॥ जुज़ नाम नहीं सूरते-आलम मेरे नज़दीक। जुज़ वह्म नहीं हस्तिए-अशिया मेरे आगे॥
चतुर्थ दृश्य।
सड़क के दोनों किनारों पर आमने-सामने पंक्तियों में शमशाद [वृक्ष विशेष] आकाश से बातें करते हुए खड़े हैं, मानों लम्बे क़द वाले प्यारे [प्रेम पात्र] हैं कि हरित वस्त्र धारण किए हुए शरीर से शरीर मिलाप राम की प्रतीक्षा में पंक्ति बांधे हैं। विचित्र दृश्य है। किन्हीं किन्हीं स्थानों पर तो शमशाद ऐसे सटे खड़े हैं कि बेचारों का कंधे से कंधा छिलता है, और यों आकाश में सिर किए हैं कि यदि उदया- चल निर्मल हो और सड़क पर ठहर कर आकाश की ओर दृष्टि उठाई जाय, तो भुवन भास्कर (रोज़े-रौशन) में दिन दोपहर के समय तारों का दिखाई देना कुछ बड़ी बात नहीं है।
एक दिन ऐसी सड़क पर अनंत नाग के निकट घोड़े पर सवार "राम" जा रहा था। बादल घिर रहे थे। हवा शमशादों की ज़ुल्फ़ों से अठखेलियाँ कर रही थी। एकाएक घटा समस्त आकाश में छा गई।
यह आई, यह आई, यह आई घटा। गुलिस्तान-ए-आलम पै छाई घटा॥ घटा काली-काली धनुप लाल लाल। कन्हैया के अधरू पै जैसे गुलाल॥
पीछे से एक खुश ध्वनि की आवाज़ निकली। वायु पर सवार होकर फैलने लगी। बादलों तक गुंजार से समस्त लोक भर गया। यह एक पर्वतीय बालक वाँसुरी बजा रहा था। कैसा समा बंध गया। आहा, हा, हा! दिल के सातों परदे तक वह सुरें धँस गई। अब किस में शक्ति थी कि घोड़ा बढ़ाकर आगे निकल जाय। ध्वनि की ताल के साथ घोड़े का पग उठने लगा। मील एक चले गए और ख़याल तक नहीं आया।
अब ज़रा और कीजिए, उस वाँसुरी से गोलचंद (कृष्णचन्द्र) का गोपियों को साँप की तरह बिलों से खींच लाना और दीवार पर चित्र चत् बनाए रखना क्या कठिन था?
एक दिल था सो वह भी खो बैठे। अच्छे ख़ासे फ़क़ीर हो बैठे॥ अब चिठाएँगे आप को किस जा। एक मुद्दत के दिल को रो बैठे॥ आँ शोलारू ब गमज़ा दिलम रा कबाब कर्द। मारा चिः कर्द? खानए-खुद रा ख़राब कर्द॥
अर्थ—उस प्रकाश स्वरूप प्यारे ने अपने एक संकेत (इशारे) से मेरे चित्त को जला दिया। इससे हमारा क्या किया, (उलटा) अपना ही घर उसने बरबाद कर दिया।
पंचम दृश्य
दोनों ओर हरे-भरे पहाड़, घन की छाया, बीच में नहर के तट पर राम जा रहा है। हरी-हरी कोंपलों, प्यारी प्यारी पत्तियों, मनोहर वालछड़ (सुंवुल) और नरम २ घास से आँखें कृतार्थ हो रही हैं, और चित्त प्रफुल्लित। पग-पग पर झरनों की बहामे और टेढ़े-तिछे प्राकृतिक वाग़ोंचे निजानन्द के नशे में भरपूर कर रहे हैं। हरे-भरे वृक्षों के झुरमुट कानों में फूल, गले में बेलों के हार डालकर चढ़ती जवानी के खुमार में बरातियों का सा शृंगार कर रहे हैं।
वर लबे-जूए-जहां वा साज़ो-बर्गे ताज़ाई। हर ज़मां आयद ख़रामां यारे-खुश रफ्तारे मा॥
अर्थ—संसार की नहर के किनारे नये २ सामानों के साथ हर समय मेरा अच्छी चालवाला मित्र ठुमक २ आता है।
प्राकृतिक सुन्दर पुष्प रामकी एक मधुर दृष्टि पर अपना यौवन बेचने को मीना बाज़ार लगाए पेरे के पेरे जमाए जमा हैं।
यूनानी मैथालोजी से सुना है कि सौंदर्य की परी फ़न में से उत्पन्न हुई थी। किंतु "शुनीदा कै बुवद मानिंदे-दीदा (अर्थात् सुना हुआ कैसे देखा हुआ हो सकता है) यहां झरनों की फ़न प्रत्यक्ष नृत्य करती देखलो।
पानी इतना तो गहरा किंतु निर्मल पेसा कि प्यारी गंगी (गंगाजी) स्मरण आती है। गोपियां यदि यहां नहातीं, तो
गोलचंद को कभी आवश्यकता न पड़ती कि इन को नग्न शरीर देखने के लिये पानी से बाहर निकलने का कष्ट देता। यह झलकते-झलकते ऊंचे झरने! चाँदी की कमंद और रस्से मालूम देते हैं कि जिनको पकड़कर परलोक (स्वर्ग) को चढ़ जांय, या यह हीरे के गातवाली कंचनियां (चादरें) हैं, जो शिर के बल नृत्य करती हुई सेवा में भूमि चूम रही हैं और अत्यंत सुरीली आवाज़ से राम की महिमा के गीत गाती जाती हैं।—
आय अज़ बराए दीदनम बी आयद अज़ फ़रसंग हा। बेखुद शुदा अज़ खुर्रमी गालतां शवद बर संगहा॥
अर्थः—जल मेरे दर्शनार्थ पत्थरों से निकल रहा है, और प्रसन्नता में मुग्ध हुआ पत्थरों पर पेच खा रहा है।
आज व्यायाम नहीं किया, आओ कुछ देर झरने के नीचे छाती रखते हैं, पर्याप्त व्यायाम हो जायगा। अपनी छाती के छेत्र और जल की गति के वर्ग इत्यादि पर गणित शास्त्र की रीति से जल का दबाव मालूम करेंगे, किंतु उफ़! यह ज़ोर का पानी, यह तो कुल गणित-सणित को बहाए ले जा रहा है, ईंटों से भी चढ़ बढ़के है। इसके आगे छाती रखने से तो यही उत्तम होगा कि चार-पाँच पत्थर मारकर कलेजा चीर दिया जाय। रे पानी! तेरी नरमी, जो मासिल्ख उदाहरण है, आज क्या हुई? तुम्हारी शीतलता कहाँ बह गई कि इस गरमा-गरमी के साथ दौड़े जा रहे हो? यह आवेशोत्तेजन, यह तुंदी तेज़ी, यह गरमी क्यों?
जल का उत्तर—(अ) मैं तो सदा शीतल हूँ। स्पर्श करके देख लो। बदन ठर (ठिठुर) न जाय तो सही। यह गरमी बरमी तमाशा करने वाले की समझ में है।
(अ) मैं तो प्रतिक्षण नरम ही हूँ। आपकी ज़बर्दस्ती है कि उलटा मुझ में कठोरता आरोपित था कल्पित हुई है।
प्यारे पाठको! ज़रा विचार करना, संसार-समुद्र की तीक्ष्णता और कटुता कहाँ! तुम्हारी कृपा है कि जगत् धुँधला और अंधकारपूर्ण दृष्टिगोचर होता है।
खंजर की क्या मजाल, कि इक ज़ख्म कर सके। तेरा ही है ख़याल कि घायल हुआ है तू॥ बादा अज़ मा मस्त शुद नै मा अज़ मै। हम अज़ मा दां बूए-गुल आवाज़े-नै॥
अर्थः—मय हमसे मस्त होती है न कि हम मय से। (इसी प्रकार) हम ही से पुष्प-गन्ध और बाँसुरी की ध्वनि तू समझ।
तुम ही जगत् बन रहे हो।
प्रश्न—यदि वास्तव में यही बात है, तो क्या कारण सफ़ाई स्पष्ट नहीं होती। मैं ही जगत् का मूल और फिर मैं ही भय करूं? समझ में नहीं आता। आपकी इन शांतिपूर्ण बातों से हमारे हृदय की तपन नहीं बुझती। माया बड़ी प्रबल है, क्या करें?
जे हर रोज़े-सरद नासह गरमी-ए-इश्क़म न गर्दद कम। नियंदाज़द अज़ जोशे-रौशतन सेलाबे-दरिया रा॥
अर्थः—उपदेश करने वालों की ठंढी बातों से मेरे इश्क़ (प्रेम) की गरमी कम नहीं होती। अपने निजी जोश से नदी की बाढ़ का अन्दाज़ा नहीं लग सकता। बाढ़ का वेग नदी को रोक नहीं देता।
राम:—सच है। जब तक अपने आपको स्वयं लेक्चर न दोगे, दिल की तपन क्यों बुझने की है?—
तो खुद हिजाबे-खुदी पे दिल! अज़ मियाँ बरखेज़। अर्थः—अपना आवरण तू आप बना हुआ है, अतएव ऐ दिल! अपने भीतर से तू आप जाग।
हमबग़ल तुझसे रहता है, हर आन राम तो। बन पर्दा अपनी वस्ल में हायल हुआ है तू॥ अपने हाथों से अपना मुँह कब तक ढाँपोगे?
बर चेहरा-ए-तो नक़्क़ाब ता कै। बर चश्मा-ए-खोर सहाब ता कै॥
अर्थ—तेरे चेहरे पर पर्दा कब तक रहेगा, सूर्य पर बादल कब तक रहेगा?
साहस से काम लो। माया कुछ वस्तु नहीं। ज़रा से पत्ते की ओट में पहाड़ को छिपा रहे हो। जब साहस का सागर प्रवाह (बाढ़ वा उभार) पर आता है तो कौनसा हिमालय है जिसको कूड़ा कर्कट की तरह बहाकर आगे नहीं ले जा सकता। वह कौन-सा समुद्र है जिसे तुम नहीं सुखा सकते, वह कौन-सा सूर्य है जिसे परमाणु नहीं बना सकते! वह कौनसा उक़दा है जो वा हो नहीं सकता। हिम्मत करे इंसान तो क्या हो नहीं सकता॥
प्रश्न—पर्दे और घूंघट का काम ही क्या, निरवयव और
निराकार में हाथ पाँव की चर्चा ही क्या अर्थ रखती है! एक ही पवित्रात्मा में ये कहां से आ गए? वह कौन-सी शक्ति थी जिसने सर्व शक्तिमान पर अधिकार प्राप्त किया! और
यह किस प्रकार हो सकता है कि मेरा ही चेहरा अपने आप को ढाँप ले!
हिजाबे-जलवा हम यकसर हुज़ूमे-जलवा हस्त ईंजाँ। नकाबे-नेस्त दरिया रा मगर तूफ़ाने-उर्यानी॥
अर्थ—उसके तेज का पुञ्ज ही तेज का पर्दा बना हुआ है जिस प्रकार कि नदी को और कोई पर्दा नहीं बल्कि नदी की बाढ़ ही नदी का पर्दा हो जाती है।
चादर से मौज की न छिपे चेहरा आब का। बुरक़ा हुबाब का न हो बुरक़ा हुबाब का॥ जब वह जमाले-दिल फ़रोज़ सूरते-मिहरे नीमरोज़। आपही हो नज़ारासोज़ पर्दे में मुँह छुपाए क्यों?॥
चेहरए-नूरानी पर से जुल्मते-काकुल (काली जुल्फ) दूर करो। और दीदा-ए-दिल में सुर्मा दो।
अर्थात् सुन्दर मुख पर से अंधकार का आवरण दूर करो और हृदय नेत्र में ज्ञान का काजल डालो।
हिजाबे-नौ उरूसानी अज़ शौहरे-खुद नमी मानद। अगर मानद शबे मानद शबे-दीगर नमी मानद॥
अर्थ—नई दुल्हिन की लज्जा अपने पति के साथ तो नहीं रहती, और यदि रहती भी है तो केवल एक रात रहती है, दूसरी रात नहीं रहती।
अलो—मिक़्राज़े-मौज दामने-दरिया कतर गई। बहदत का बुक़ा फट गया सारी सतर गई॥
गला फाड़-फाड़कर अब (जल) पुकार रहा है— मनम खुदा ओ बवाँगे-बलंद मीगोयम। हर आँ कि नूर दिहद मिहरो-माह रा ओयम॥
अर्थ—मैं पुकार पुकार कर कहता हूं कि मैं खुदा हूं जो चंद्रमा और सूर्य को प्रकाश देता है, वही मैं हूं।
प्रश्न—तुम तमाशा देखने आये हो कि सब वस्तुओं को खा जाने? सब की शोभा, सबकी चमक दमक तुमही हो! तुम इस कवि-वाक्य के अनुरूप हो क्या—
चाँदनी देखे अगर वह महजबीं तालाब पर। अक्से-रुख की ताब पानी फेर दे महताब पर॥
राम—क्या आज इस कवि-वाक्य के अनुरूप हुआ हूं? मेरे विषय में वेद कहता चला आता है।
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्र तारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥ (मुण्डक उप० खं० 2 मं० 10)
अर्थः—न वहां सूर्य चमकता है, न चन्द्र और तारे, न ही ये बिजलियां चमकती हैं, यह अग्नि तो कहां!। उसी के ही चमकने पर यह सब कुछ चमकता है, उसी ही चमक से यह सब चमक रहा है॥ 10॥
(राग पहाड़ी-ताल चलंत)
(1) पहाड़ों का यों लंबी ताने यह सोना। वह गुंजान दरख्तों का दोशाला होना॥ वह दामन में सब्ज़ा की, मर्खमल बिछौना। नदी का बिछौने की भालर पिरोना॥ यह राह ऊ मुजस्सम यह आराम मैं हूं। कहां कोहो-दरिया, यहां मैं ही मैं हूं॥
नोट—भालरदार मखमल के बिछौने पर दोशाला ओढ़े कुंभकर्ण की तरह लंबे पर्वतीय श्रृंखला का विस्तारित होना ठीक ही मस्ती (धन सुषुप्ति-आनंदमय कोप) का स्वरूप है। इस सुषुप्ति या आनंदमय कोप में प्रकाश या आनंद (कूटस्थ) में हूँ। मुझे जानने पर यह सुषुप्ति रूप पहाड़ नदी आदि कहां रहने पाते हैं? सत्यता का पता लगते ही भ्रांति पला- यित हो जाती है।
पे ज़ रूयत गुलिस्तां हा शर्मसार। दर गुलो-गुलज़ार चूनत याफ़्तम॥
अर्थ—जब मैंने तुझको बाग़ में देखा तो, बाग़ को शर्मिंदा पाया।(तेरा सा सौंदर्य बाग़ में कहां)।
[2] सफ़ेद-सफ़ेद बादल कभी घोड़े के रूप में,कभी रेल के रूप में, कभी मनुष्य की आकृति में पहाड़ों पर हाथी की मस्त चाल से चलते हुए स्वप्नावस्था की चंचलदशा दिखा रहे हैं। प्रकृति इस अवस्था में भी स्त्रियोंवाले हाव-भाव नहीं छोड़ती। अपने प्रियतम "राम" की आनंद दृष्टि प्राप्त करने के लिये कभी रोती है कभी हँसती है—
(2) यह पर्वत की छाती पै बादल का फिरना। वह दम भर में अंबरों से पर्वत का घिरना॥ गरजना, चमकना, कड़कना, नखिरना। छमाछम छमाछम यह बूंदों का गिरना॥ अरूसे-फलक का वह हँसना यह रोना। मेरे ही लिये है फ़क़त. जान खोना॥
[3] कोसों तक कुदरती गुलज़ार (प्राकृतिक वाटिका) का चले जाना, वर्ण-वर्ण के फूल चारों ओर खिले हुए—
(3) यह वादी का रंगीन गुलों से लहकना। फ़िज़ा का यह बू से सरापा महकना॥ यह बुलबुल सा खुशदांलबों का चहकना। वह आवाज़े-नै का बहर सू लपकना॥
गुलों की यह कसरत इरम (स्वर्ग) रूबरू है। यह मेरी ही रंगत, यह मेरी ही बू है॥
[4] एक और मनोहर स्थान—
(4) जो जू और चश्मा हैं नग़मा सरा है। किस अंदाज़ से आब बल खा रहा है॥ यह तकियों पै तकिए हैं रेशम बिछा है। सुहाना समा मन लुभाना समा है॥
जिधर देखता हूँ, जहाँ देखता हूँ। मैं अपनी ही ताब और शां देखता हूँ॥
[5] झरनों की बहार (फुहार)
(5) नहीं चादरें नाचते सीम-तन हैं। यह आवाज़! पाज़ेब हैं नाराज़न हैं॥ पहाड़ों के दाने ज़मुरुद फ़िगन हैं। सफ़ाई अहा! रूप-मह पुर-शिकन हैं॥
समाही में गुल चूमता वांसा लता। मैं शमशाद हूँ झूमकर वाद देता॥
[6] बड़े-बड़े ऊँचे पहाड़ों को कशमीर में "पीर" कहते हैं (जैसे पीर पंचाल, पीर भुंजाल, रतन-पीर आदि)। इसका कारण यह विदित होता है कि जैसे पीर (बुड्ढा) सफ़ेद सिर वाला होता है, इन पहाड़ों की चोटियां भी बर्फ़ के कारण प्रायः सफ़ेद ही रहती हैं।
किंतु आनंद यह है, क्या जानें इन पीरों ने धूप में बाल सफ़ेद किए हैं, सिर तो बुड्ढे हो गए, किंतु युवापन की सब उमंगें जी में हैं। इनके हृदय हरे भरे हैं, अर्थात् चोटियों को छोड़ कर नीचे से अत्यंत ही हरे-भरे हैं। बाहर का यह कथन इन पर घटित होता है—
पीरी में न किस तरह करूँ पेशे-जहाँ की। दिन ढलते ही होता है तमाशा शुज़री का॥
देवदार के ऊँचे वृक्ष सुरा की सुराहियों की सूरत (आकृति) रखते हैं। इन में स्थान-स्थान पर कल कल नाद करते हुए सोते (स्रोत) बह रहे हैं, मानों बोतलों में से कुल कुल के साथ सुरा निकल रही है। यह मूर्तिमान मस्ती राम ही की एक मौज है।
(6) मेरे साहने एक महफ़िल सजी है। हैं सब सीम बर पीर, पुर सब्ज़ जी है॥ शजर क्या हैं! मीना पै मीना धरी है। न झरनों का झरना है, कुल कुल लगी है॥
लुंढाये ये शीशे कि बह निकलीं लहरें। है मस्ती मुजस्सिम यह या अपनी लहरें॥
[7] श्रीनगर से अनंतनाग को नौका (किश्ती) में जाना—
(7) रवाँ आबे-दरिया है किश्ती रवाँ है। सदा नुज़हत आमेज़ सुबहदम व ज़ाँ है॥ यह लहरों पै सूरज का जलवा अयाँ है। बलंदी पै बर्फ़ एक तजल्ली फ़शाँ है॥
ज़हूर अपने ही नूर का तूर पर है। पदीद अपनी ही दीद कुल बहरो-बर है॥
[8] झील डल में इधर-उधर सुजिंत पहाड़ों का प्रतिबिंब पड़ रहा है और पानी को हवा हिला रही है;(इस रूप) में हलकी हवा के झोंकों से इतने बड़े पहाड़ हिलते दृष्टिगोचर होते हैं। क्या आनंद है, आश्चर्य है।
(8) डलकता है 'डल' दीदए-महलक्षा सा। धड़कता है दिल आईना पुर सफ़ा का॥ हिलाता है कोहों को सदमा हवा का। खिले हैं कँवल फूल, है इक बलाका॥
यह सूरज की किरणों के चप्पे लगे हैं। अजब! नावें भी हम हैं खुद खे रहे हैं॥
सूर्य नौका की भांति डल में कंपित दिखाई देता है। और उसी सूर्य की किरणें चप्पों के समान नौका चलाने वाली हैं। मैं ही वह सूर्य हूँ जो नौका बना है, मैं ही खेने के औज़ार (हथ्यार) हूँ।
[9] अमरनाथ की चढ़ाई, पूर्णमासी की रात—
(9) चढ़ाई मुसीबत, उतरना यह मुश्किल। फिसलनी बरफ़ तिसपै आफ़त यह बादल॥ क़यामत यह सर्दी, कि बचना है बातिल। यह बू बूटियों की कि घबरा गया दिल॥
यह दिल लेना, जां लेना किसकी अदा है? (शिवजी जो मेरा ही अन्तरात्मा है) मिरी जां की जां जिसपै शोखी फ़िदा है।(पार्वतीजी)
[10] पूर्णमासी की रात—
(10) अजब लुत्फ़ है कोह पर चाँदनी का। यह नेचर ने ओढ़ा है जाली दुपट्टा॥
दिखाता है आधा, छिपाता है आधा। दुपट्टे ने जोवन किया है दो बाला॥
नशे में जवानी.के माशूक़ नेचर। है लिपटी हुई 'राम' से मस्त होकर॥
[11] अमरनाथ का अत्यंत विस्तृत ईश्वरीय हाल (जिसे लोग गुफा कहते हैं)
(11) बरफ़ जिसमें सुस्ती है, जड़ता है, लाशै। अमर लिंग अस्तादा चेतन की जा है॥ मिले प्यार, हो वस्ल, सब फ़ासला तै। यही रूप दायम अमरनाथ का है॥
वह आए उपासक, तश्नागुन मिटा सब। रहा 'राम' ही 'राम' में तू मिटा जब॥
हे राम।
(राग जंगला-ताल धमार)
हरसू कि दवीदेम हमा सूए-तो दीदेम। हरजा कि रसीदेम सरे-कूए-तो दीदेम॥ 1॥
हर क़िबला कि युगज़ीद दिल अज़ बहरे-अबादत। आँ क़िबलए-दिल रा खमे-अबरूए-तो दीदेम॥ 2॥
हर सर्वे रवाँ रा कि दरीं गुलशने-दहर अस्त। बर रुस्तए-बुस्ताने-लबे-जूए-तो दीदेम॥ 3॥
अज़ बादे-सबा बूए-खुश्त दोश शमीदेम। वा बादे-सबा क़ाफ़िला-ए-बूए-तो दीदेम॥ 4॥
रूप हमा खूबाने-जहाँ रा ब तमाशा। दीदेम वले अज़ आईना-ए-रूप-तो दीदेम॥ 5॥
ता दीदए-शुहलाए-बुताने-हमा आलम। कर देम नज़र नर्गिसे-जादूए-तो दीदेम॥ 6॥
ता मिहरे-रुखत बर हमा ज़र्रात न ताबद। ज़र्रांते-जहाँ रा ब तगो-पूए तो दीदेम॥ 7॥
अर्थ—(1) जिस ओर हम दौड़े, वह सब दिशाएँ तेरी ही देखीं (अर्थात् सब ओर तू ही था)। और जिस स्थान पर हम पहुँचे वह सब तेरी ही गली का सिरा देखा (अर्थात् सर्वत्र तुझे ही पाया)।
(2) जिस उपासना के स्थान को हृदय ने प्रार्थना के लिये ग्रहण किया उस हृदय के पवित्रधाम को तेरी भ्रू का खम (झुकाव) देखा (अर्थात् उस स्थान पर तू ही झांकता दृष्टिगोचर हुआ)॥
(3) हर सर्व-रवाँ (प्रिय वृक्ष अर्थात् प्रेमपात्र) को जो कि इस संसार वाटिका में है, उसको तेरी नदी-तट की बाटिका का उगा हुआ देखा (अर्थात् जो भी इस जगत् में प्यारा दृष्टिगोचर हुआ, वह सब तेरे ही से प्रकटीकृत हुआ दिखाई दिया)।
(4) कल रात हमने प्राची-समीर से तेरी सुगंध सूँघी और उस प्राची-पवन के साथ तेरी सुगंध का समूह देखा (अर्थात् उसमें तेरी ही सुगंध बसी हुई थी)।
(5) संसार के समस्त सुंदर पुरुषों के मुखमंडलों को कौतूहल (कौतुक) के लिये हमने देखा, किंतु तेरे मुखड़े के दर्पण से उनको देखा (अर्थात् इन समस्त सुंदरों में तेरा ही रूप पाया)।
(6) समस्त संसार के प्यारों की मस्त आँख में हमने अब देखा तो तेरी जादू भरी नरगिस (आंख) देखी।
(7) जब तक तेरे मुखमंडल का सूर्य समस्त परमाणुओं पर न चमके, तब तक संसार के परमाणुओं को तेरी ही ओर दौड़ते हुए देखा (अर्थात् जब तक तेरी किरण न पड़े तब तक सत्यका जिज्ञासु तेरा ही इच्छुक रहेगा)
(राग भैरवी-ताल दादरा) सेर नियम सेर नियम अज़ लब-खंदाने-तो। पे कि हज़ार आफ़री बर लब-दंदाने तो॥1॥ सोसने-तेरे कशीद खूँने समन रा बरेख़्त। तेग़ व सोसन कि दाद! नर्गिसे-खूँख़ोर-तो॥2॥ आईनए जाँ शुदस्त चेहरए-तावाने-तो। हर दो यक बूदा पस जाने-मन व जाने-तो॥3॥
अर्थ - (1) तुमको हँसते हुए देखकर मैं तृप्त नहीं हुआ हूं, मैं तृप्त नहीं हुआ हूं, पर प्यारे! तेरे अधर और दांतो पर बलिहार।
(2) सोसन (पुष्प विशेष) ने तरवार खींचकर मेरा खून बहाया, सोसन को तरवार किसने दी! तेरी नर्गिस (पुष्प विशेष जिससे तात्पर्य नेत्र है क्योंकि नेत्रों की आकृति की तुलना नर्गिस के पुष्प से की जाती है) ने दी जो कि रक्त की प्यासी है।
(3) तेरा चमकता हुआ मुखड़ा प्राण का दर्पण है। मेरे प्राण और तेरे, दोनों एक हैं, क्योंकि तेरे मुखड़े में मेरे प्राण दिखाई देते हैं।
ॐ! ॐ!! ॐ!!!
वनवास।
(राग परबा-ताल धमार)
रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहां कोई न हो। दुश्मने-जाँ हो न कोई मिहरवां कोई न हो॥1॥ पड़िए गर बीमार तो आकर कोई पूछे न बात। और गर मरजाइए तो नौहा-ख़्वाँ कोई न हो॥2॥ रुख़सत ऐ ज़िंदा! जनूँ ज़ंजीरे दर खड़काए है। मुज्दाह ख़ारे-दश्त! फिर तलवा मिरा खुजलाए है॥3॥ फिर बहार आई चमन में ज़ख़्में गुल आले हुए। फिर मिरे दागो-जनूँ आतश के परकाले हुए॥4॥
जीते राम की हड्डियां गंगा में पड़े दो वर्ष वीत गए। कश्मीर यात्रा को लगभग एक वर्ष हो चुका है।
किसी व्यक्ति को मालूम हो जाय कि यह मृगतृष्णा है, फिर वहां पानी भरने क्यों जायगा? यदि किसी के मारे-बांधे चला भी जाय, तो उसका पग उत्साह से नहीं उठेगा।
संसार के विषयों की असलीयत खुल गई, संसार की वस्तुओं की क़लई उतर गई, तो उन में जी कैसे लगे? जो कुम्हार अपने चक्कर को चलाते चलाते छोड़कर अलग अपनी गद्दी पर जा बैठा हो वह चक्कर पिछले धक्के (inertia) के कारण कुछ देर अवश्य चलता रहता है। किंतु कब तक? उसकी गति मंद पड़ती जायगी और धीरे धीरे मालिक के हाथों बिना वह चक्कर शीघ्र थम जायगा।
जिस शरीर का कर्ता-भोक्ता जीव अपनी सच्ची गद्दी पर आसन ग्रहण कर चुका हो, वह शरीर कब तक कुम्हार के चक्कर की भांति घूमेगा? सांसारिक संबंध ढीले पड़ते जायेंगे और धीरे धीरे विदेह।
कब सुबुकदोश रहे क़ैदिए-ज़िंदाने-वतन। वुस्अते फ़ुर्सत-ए-याप की दीवारों को॥
अकबर का बाप हुमायूँ बादशाह मर गया, लेकिन कई दिन तक लोग मुल्लाशिकबी कवि को (जिसकी आकृति हुमायूँ से बहुत मिलती थी) राज सिंहासन पर बैठा हुआ पाकर यही समझते रहे कि हुमायूँ जीवित है और राज कर रहा है। पर कहां तक छिपे? ज्ञात हो ही गया। ज्ञान होते ही ज्ञानी तो शरीर छोड़ बैठा, मर गया, किंतु सांसारिकों की दृष्टि में काम-काज करता मालूम होता है। निभेगी कहां तक?
कई तारे आकाश पर टूट पड़ने के बाद भी इस भूमि के निवासियों को दूरता के कारण सैकड़ों वरन् सहस्रों वर्षों तक दृष्ट पड़े आते हैं, पर एक दिन टूटते दृष्ट आ ही जाते हैं। जो रोटी एक बार खाई जाय फिर हाथ में कैसे रह सकती है? अहंकार को जब शिवोऽहम् ने खा लिया, तो फिर क्या काम देगा।
मन अज़ आं हुस्ने-रोज़ अफ़ज़ूँ कि यूसुफ़ दाश्त दानिस्तम कि इश्क़ अज़ पर्दए-इस्मत बुरूँ आरद ज़ुलेख़ा रा।
अर्थ—मैं यूसुफ़ के प्रतिदिन बढ़ने वाले सौंदर्य से जान गया था कि प्रेम ज़ुलेख़ा को सतीत्व के पर्दे से बाहर निकालेगा।
मैं जो शौक़ से क़दम बढ़ा के चला। लगी रस्ते में कहने यह बादे-सबा॥ तुझे ज़िंदा न छोड़ेगी नाज़ो-अदा। मुझे उस गुले-होशरुबा की क़सम॥
अंततः आया वह दिन कि काम काज छूट गए।
दिलबरा चूँ रुख नमूदी शुद नमाज़े-मन क़ज़ा। आफ़ताए चूँ बरायद सिज्दा कै बाशद रवा॥ अर्थ—प्यारे! जब तू ने मुखड़ा दिखाया, मैंने नमाज़ क़ज़ा की (नहीं पढ़ी)। जब सूर्य निकल आता है तो नमाज़ ठीक नहीं होती (तेरा मुखड़ा सूर्य के समान है)।
इश्क़ के मकतब में मेरी आज बिस्मिल्लाह है। मुँह से कहता हूँ अलिफ़ दिल से निकलती आह है॥ अर्थ—मेरी बेख़ुदी ने मुझको मसीह (श्रद्धा करनेवाले) से बेपर्दा कर दिया। मेरा दर्द (बेख़ुदी) स्वयं मेरी दशा होगया।
जिस प्रकार मृतक को इस संसार से प्रेत जानकर लोग कीर्तन करते हुए घर से बाहर छोड़ आते हैं। सब प्रियजन और परिजन मारू राग गाते हुए राम को गंगा की ओर रवाना कर आए।
(राग मालकौंस-ताल रूप) मना! तैने राम न जानिया रे! राम न जानिया रे। मना! तैने राम न जानिया रे॥ जैसे मोती ओस का रे, तैसे यह संसार। देखत ही को झिलमिला रे, जात न लागी बार॥ मना! तैने राम न जानिया रे। सोने का गढ़ लंक बनायो, सोने का दरबार। रत्ती एक सोना न मिला रे, रावन मरती बार॥ मना तैने राम न जानिया रे॥ दिन गँवाया खेल में रे, रैन गँवाई सोय। सूरदास भजो भगवंता, होनी होय सो होय॥ मना तैने राम न जानिया रे॥
राम न जानियारे! मना! तैने राम न जानियारे॥ रेलवे स्टेशन के प्लेटफ़ार्मों पर प्रेम-भरे हृद मित्र रो रहे हैं और गा रहे हैं।
(राग भैरों-ताल शूल)
अलविदा ऐ मेरी रियाज़ी! अलविदा। अलविदा ऐ प्यारी रावी! अलविदा॥ अलविदा ऐ अहले-ख़ाना! अलविदा। अलविदा मासूमे-नादाँ! अलविदा॥ अलविदा ऐ दोस्तो-दुश्मन! अलविदा॥ अलविदा ऐ शीत उष्ण! अलविदा॥ अलविदा ऐ कुतुबो-तदरीस! अलविदा। अलविदा ऐ ख़ुबसो तक़दीस! अलविदा॥ अलविदा ऐ दिल! ख़ुदा! ले अलविदा। अलविदा राम! अलविदा,ऐ अलविदा!॥
कैसा चालाकी में तू थकता है ऐ दस्ते-अनूँ। दस तो क्या इक तार भी चाक्री नहीं दस्तार में॥ दीवानगी से दोश पै जुन्नार भी नहीं। यानी हमारी जेब में इक तार भी नहीं॥
जब जेब ही नहीं तो तार कैसा? यारो! वतन से हम गए, हम से वतन गया। नक़्शा हमारे रहने का जंगल में बन गया॥ पैरहन में बदरम दम बदम अज़ धायते-शौक़। कि वजूदम हमा आ गश्त व मन ई पैरहनम॥
अर्थः—ईश्वरी लगन की अधिकता से मैं अपने वस्त्र को दिन प्रति दिन फाड़े डालता हूं। क्योंकि मेरा वजूद (हस्ती) सब वही हो गया और (व्यक्ति गत) में यह वस्त्र हूं।
मुझे इस दर्द में लज़्ज़त है ऐ जोश-जनूँ अच्छा। मेरे ज़ख़्मे-जिगर के हर घड़ी टाँके उधेड़े जा॥ रहा है होश कुछ बाक़ी उसे भी अब निबेड़े जा। यही आहंग ए मुतरब पिसर! तुक और छेड़े जा।
दर दिलम इश्क़ जि़ लैला काफ़ीस्त। ख़्वाहिशे-वस्ल ज़ना ना इंसाफ़ीस्त॥
अर्थः—मेरे दिल में लैली का प्रेम काफी (पर्याप्त) है इस लिये दूसरों से मिलने की इच्छा अन्याय है।
पेश आमदम शहे बंदा रा गुफ़्तम शहा कम कुन बला। गुफ़्ता बरो गर आशिक़ी हर दम बला अफ़ज़ूँ कुनम॥
अर्थ—सम्मुख उपस्थित होकर मैंने कहा कि ऐ सौंदर्य के बादशाह! बला को कम करो। जवाब दिया कि यदि तू आशिक़ है तो हर वक़्त बला को मैं अधिक करूंगा।
(राग जोग-ताल धमार)
जीने का न अंदोह न मरने का ज़रा ग़म। यकसाँ है उन्हें ज़िंदगी और मौत का आलम॥ वाक़िफ़ न बरस से न महीने से वह इक़दम। शव की न मुसीबत न कहीं रोज़ का मातम॥ दिन रात घड़ी पहर महो-साल में खुश हैं। पूरे हैं वही मर्द जो हर हाल में खुश हैं॥1॥ कुछ उनको तलब घर की न बाहर से उन्हें काम। तकिया की न ख़्वाहिश है न विस्तर से उन्हें काम॥ अस्थल की हवस दिलमें न मंदिर से उन्हें काम। मुफ़लिस से न मतलब न तवंगर से उन्हें काम॥ मैदान में बाज़ार में चौपड़ में खुश हैं। पूरे हैं वही मर्द जो हर हाल में खुश हैं॥2॥
चनके लिये तो—
(राग पीलू-ताल चलंत)
गर न्यामतें खाता रहा दौलत के दस्तरख़्वान पर। मेवे मिठाई दूध घी हलवा-ओ-तुर्शी और शक्कर॥ वर बांध झोली भीख की टुकड़े के ऊपर धर नज़र। हो कर गदा फिरने लगा कूचा बकूचा दर बदर॥ गर यों हुआ तो क्या हुआ और वों हुआ तो क्या हुआ॥1॥
था एक दिन वह धूम का निकले था जब असवार हो। हर दम पुकारे था नक़ीव "आगे बढ़ो, पीछे हटो"॥ या एक दिन देखा उसे तनहा पड़ा फिरता है वह। बस क्या ख़ुशी क्या ना ख़ुशी,यकसाँ है सब पे दोस्तो!॥ गर यों हुआ तो क्या हुआ और वों हुआ तो क्या हुआ॥2॥
या इशारतों के ठाठ थे, या पेश के असबाब थे। साक़ी सुराही गुलबदन जामो-शराबे नाब थे॥ या बेकसी की दर्द से बेहाल थे बेताब थे। कुछ रह नहीं जाता यहां आख़िर को नक़्शे-आब थे॥ वार यों हुआ तो क्या हुआ और वों हुआ तो क्या हुआ॥3॥
एक वह दिन था जब ठंढे लंबे सांस खींचता, पीली रंगत के साथ छुप-छुपकर तार-तार रोता-धोता, गंगा में डूबने की कामना से "राम" यहां आया था—
बजहे-ज़र अज़ रूए दारद चश्मे-लू लू बारे मन। क़ल्बे-मन नक़दे-रवां जाँ रूप-दर बाज़ारे-मन॥1॥ पेश जाँ कि बैज़र-ज़री क़ितद बर तिश्ते-ज़र। दर ख़रोश आयद ख़रूस अज़ नालाहाए-ज़ोरे-मन॥
अर्थ—(1) इश्क़ की वजह से मेरी आंख जो मोती बर-
साती है, सोने का मूल्य रखती है, और मेरा हृदय भी इसक (प्रेम) के कारण मेरे बाज़ार में सिक्के की तरह जारी है।
(2) पहले इसके कि श्वेत रजतवर्ण प्रभात आकाश पर प्रकट हो, मुर्ग मेरे आर्तनाद से शोर डालने लग जाता है (अर्थात् मेरे आर्तनाद से मुर्ग जागता है और बोलता है कि प्रभात हो गया)
"गंगा! तेथों सद बलिहारे जाऊं, गंगा, तेथों सद बलिहारे जाऊं।"
आज वह समय है कि उसी गीली गंगी (अर्थात् श्रीगंगाजी) में कपड़ा-लत्ता, वरन् शरीर का प्रत्येक रोम डाल परम आनंद के साथ मौज में लहरा-लहरा कर गा रहा है।
"सद बलिहारे जा गंगे! मेथों सद बलहारे जा।" इत्यादि
हाजी बशुए-कावा रवद अज़ बराय हज। अलहमद गो कि कावा बियायद बशुए-मा॥
अर्थः—यात्री यात्रा के लिये काबा की ओर जाता है परमात्मा का धन्यवाद दे कि काबा मेरी ओर आता है।
(राग सोरठ-ताल मुग़लई)
बाज़ आमदम बाज़ आमदम ता वक़्त रा मेग़्रूं कुनम। बाज़ आमदम बाज़ आमदम ता दर्दे-दिल अफ़ज़ूँ कुनम॥1॥ बाज़ आमदम बाज़ आमदम ता बहरे-चीमापाने-दिल। अज़ अश्के-चश्मो आहे-शब चज़ ख़ूँ जिगर माज़ूँ कुनम॥2॥ बाज़ आमदम बाज़ आमदम ता दिलबर आ दिलवर अहम्। बज़ हरचे जुज़ दिलवर बुवद अज़ शहरे-दिल बेरूं कुनम॥3॥ बाज़ आमदम बाज़ आमदम चीज़े नदारम जुज़ अलिफ़। आहे-अलिफ़ पैदा शवद चूं रास्त पुश्ते नूँ कुनम॥4॥
बाज़ आमदम बाज़ आमदम दिल दादए-शोरीदए। ख़ुद रा मगर लैली कुनां आं यार रा मजनूँ कुनम॥5॥ गुफ़्तम शहा दर हिज्रे-तो बस ख़तरा हा वारीदा अम। गुफ़्ता चि ग़म हर ख़तरा रा मन लो लुए मकनूँ कुनम॥6॥ गुफ़्तम शहा चूँ हाज़री फ़र्दो चिः हाजत वादा रा। गुफ़्ता बरो, ख़ुद रा बवीं, ता वादा रा अकनूँ कुनम॥7॥ गुफ़्तम शहा दर पर्दहा ख़ुदरा चरा दारीनिहां। गुफ़्ता कि गर बेरूं शवम सीसद चो तो मजनूँ कुनम॥8॥
अर्थ—(1) मैं फिर लौट आया हूँ, मैं फिर लौट आया हूँ, जिससे समय को धन्य बनाऊँ। मैं फिर लौट आया हूँ, मैं लौट आया हूँ, जिससे हृदय की पीड़ा बढ़ाऊँ।
(2) मैं फिर लौट आया हूँ मैं लौट आया हूँ जिस से हृदय के बीमार के लिये अपनी आँख के आंसू रात की आह और रोदन और यक़ृत के रक्त से माजून बनाऊँ।
(3) मैं बार बार लौट आया हूँ जिस में चित्त को उस दिलबर (प्यारे) से लगाऊँ और जो कुछ दिलबर के अतिरिक्त हो, उसको हृदय के नगर से बाहर निकाल दूँ।
(4) मैं बार बार लौट आया हूँ जिस में सिवाय अलिफ़ (अद्वैत) के और कोई वस्तु न रखूँ और जब मैं नून (अहंकार) की पीठ को सीधा करूँ तो अलिफ़ जैसा (।) सीधा आकार उत्पन्न हो जाय।
(5) मैं बार-बार वापस आया हूँ क्योंकि मैं आशिक़ (प्रेमी) और पागल हूँ किंतु अपने आपको लैली बनाए हुए हूँ, जिस में उस प्यारे को मजनूँ बनाऊँ।
(6) मैंने कहा, ऐ बादशाह! तेरी जुदाई में मैंने बहुत से
आँसू गिराए हैं, उसने उत्तर दिया कि कुछ चिंता न कर मैं तेरे (आँसू के) प्रत्येक बूँद को गुप्त मोती (दुर्रे नासुफ़्ता) बना दूंगा।
(7) मैंने कहा, ऐ बादशाह! जब कि तू उपस्थित है तो कल पर वादा पूरा करने की क्या आवश्यकता है? उसने उत्तर दिया कि जा, अपने आपको देख, जिस से कि मैं अभी का वादा (दर्शन का इक़रार तत्काल) पूरा करूँ।
(8) मैंने कहा, ऐ बादशाह! तू अपने आपको पर्दों में क्यों छिपाए रखता है? उसने उत्तर दिया कि यदि मैं बाहर प्रकट हो जाऊँ तो तुझ जैसे तीन हज़ार (कई लोगों) को मजनूँ बना दूँ।
बादलों की गरज के उत्तर में गूंजने वाले पहाड़, सदैव प्रसन्नता में सिर के बाल नाचने वाल झरने और आनंद-दायिनी गंगा की आवाज़ यह गीत गा रहे हैं—
(राग आसा-ताल दादरा)
गंगा का है किनार, अजब सबज़ा ज़ार है। बादल की है बहार हवा खुशगवार है॥ क्या खुशनुमा पहाड़ पे वह चश्मसार है। गंगाध्वनी सुरीली है क्या लुत्फ़दार है॥ आ, देख ले बहार कि कैसी बहार है॥1॥
वक्ते-सबाहे-ईद तमाशा तयार है। गुलगूना मुँह पे मल के खड़ा गुल अज़ार है॥ शाहे-फ़लक से या जो हुई आँख चार है। मारे-शर्म के चेहरा वन सुख नार है॥ आ, देखले बहार कि कैसी बहार है॥2॥
क़तरे हैं ओस के कि दुरों की क़तार है। किरणों की उन में बल वे नज़ाकत यह तार है॥ मुर्ग़ाने-ख़ुश नवा! तुम्हें काहे की आर है। गाओ बजाओ, शब का मिटा दिल से बार है॥ आ, देखले बहार कि कैसी बहार है॥3॥
माशूक़ ऐसे दरख़्तों पे बेलों का हार है। मैं मैं ग़लत है, ज़ुल्फ़ का पेचां यह मार है॥ वाह वा, सजे सजाए हैं, कैसा शृंगार है। अशज़ार में चमकता है ख़ुश आवशार है॥ आ, देखले बहार कि कैसी बहार है॥4॥
अशज़ार सर हिलाते हैं, क्या मस्त वार हैं। हर रंग के गुलों से चमन लाला ज़ार है॥ भौंरे जो गूंजत हैं पढ़े ज़र-निगार हैं। आनंद से भरी यह सदा औक़्क़ार है॥ आ, देखले बहार कि कैसी बहार है॥5॥
गंगा के रू-सफ़ा से फिसलती न मर नज़र। लहरों पै अक्स मिह्र का क्यों बेक़रार है॥ विष्णु के शिव के घर का असासा यह गंग है। यां मौसमे-ख़िज़ाँ में भी फ़सले-बहार है॥ आ, देखले बहार कि कैसी बहार है॥6॥
साक़ी वह मैं पिलाता है, तुर्शी को हार है। दिलदारे-ख़ुश अदा तो सदा हमकनार है॥ वाह क्या मज़ा से खाने को ग़म का शिकार है। दर्शन शराबे-नाब सख़ुन दिल के पार है॥ आ, देखले बहार कि कैसी बहार है॥7॥
बाहर निगाह कीजिये तो गुलज़ार है खिला। अंदर सफ़र की तो भला हद कहाँ, दिला॥ कालिज क़दीम का यह सरे-मू नहीं हिला। पढ़ाता मारफ़त का सबक़ मेरा "यार" है॥ आ, देखले बहार कि कैसी बहार है॥8॥
पे जाँ! वया वया कि ई दुनियाए-दीगरअस्त। आवे-दिगर हवाए-दिगर, जाय-दीगरस्त॥ ख़ूवाँ ज़ ख़्वेश दूरोंदर जुह्ल अफ़ग़नंद। ख़ूवअस्तो-जहल दूर कुनद जाय दीगरस्त॥
साधू फ़क़ीर का तो इसी पर मदार है। आ, देख ले बहार कि कैसी बहार है॥9॥
मस्ती मुदाम कार यही रोज़गार है। गुलवीं निगाह पड़ते ही फिर किसका ख़ार है॥ क्यों ग़म से तू निज़ार है क्यों दिलफ़िगार है। जब राम क़ल्ब में तेरे ख़ुद यारे-ग़ार है॥ आ, देख ले बहार कि कैसी बहार है॥10॥
गंगोत्तरी का रस्ता।
केवल कमर पर कपड़ा ओढ़े राम चला जा रहा है और गा रहा है! क्या?—"ॐ"
एक स्थान पर तो दस मील तक अत्यंत ऊंची दीवारों की तरह एक दूसरे के आमने सामने पहाड़ों का सिलसिला चला गया है। इनके बीच में एक ओर पहाड़ से टकराती अकोले खाती गंगा बही जाती है, दूसरी ओर ढालू पहाड़ में एक पतली पगडंडी खुदी हुई है। रात के दो या तीन बजे का
समय होगा। सन्नाटा छाया हुआ है। बादल घिरा हुआ है। पत्ता पँख नहीं मारता। पे लो! विजली चमकी, बादल कड़का, वर्षा पहाड़ों से बल प्रयोग करने लगी। मार्ग पर पत्थर और वृक्ष गिरने लगे-अरा, रा, धम; अरा, रा, धम। राम के सिर पर छाता नहीं। पांव बिलकुल नंगे हैं। हाथ में छड़ी भी नहीं। गरम कपड़े का सहारा नहीं।
बफ़सुरदनम हमा तन अलम व तरद्द आवला दरख़्दम। चो गुवारे-नाला फ़सुर्दनम चो सर्फ़्ते-नंगे-रवानियम॥ न नशीमने कि कुनम मक़ाँ न परे कि बर परम अज़ मियाँ। न कुनी व इश्वाए-इम्तहाँ, सितम आशियाने-रहाईयम॥
अर्थ—मुरझाने में तो यह सारा शरीर, शोक स्वरूप है। चलते चलते पांव में छाले पड़ गए हैं, रोने के गुवार की तरह मेरा मुरझाना है। और लज्जा के आँसू की तरह मेरा टपकना (चलना) है।
(2) न कोई घोंसला (घर) है कि जहां मैं ठहर जाऊं, और न पर ही है कि जिससे मैं उड़ जाऊं। ओ हो आश्चर्य (दुःख) है कि तू परीक्षा के नखरे में मेरी मुक्ति होने नहीं देता।
दश्ते-पैमाई से है अपने वियावां नाज़ां। अपने पावोस से है ख़ारे-मुग़ीलां नाज़ां॥
यह वह स्थान है कि जहां दिन दोपहर को भी मनुष्य की गति (गुज़र) कम होती है। यहां अंधेरी रात में कौन चल रहा है? उसके सिवा और कौन होगा जो सुषुप्ति की घोर निशा में भी जागता है। सदोदितोऽहं सदोदितोऽहं
इसी दशा में चलते-चलते टूटी हुई सड़क सामने मिलती है। मार्ग बंद है, परंतु वह कौन-सी रुकावट है जो राम को
रोक सकती है। कांटेदार झाड़ियों को पकड़-पकड़ कर, पत्थरों को टटोल-टटोल कर राम पहाड़ के ऊपर चढ़ रहा है, जहां बकरी (अजा) की गति कठिन है, राम मौजूद है।
व जहाने-जलवा रसीदाअम, दह हज़ार पर्दा दरीदाअम। समरे-निहाले-हक़ीक़तम, चमने—यह्वारे-ख़ुदाइयम॥1॥ सरे—कावा गरमे-फ़सूने-मन, दिले-दैर जोशशे-ख़ूने मन। मगुज़र ज़ सैरे-जुनूने-मन, कि क़यामते-हमा जाइयम॥2॥
अर्थ—(1) अनुभव के संसार में मैं पहुंच गया हूं, हज़ारों पर्दे फाड़े हैं, तत्व के पेड़ का मैं फल हूं और ईश्वरीय वसंत की वाटिका हूं।
(2) मेरे जादू भरे मंत्र से काबे में धूम है,अर्थात् मेरा ध्यान करते ही काबा का सर जलने लगता है। मन्दिर का दिल मेरे खून का जोश है, अर्थात् देवताओं के दिलों में मेरा रुधिर जोश मारता है। मेरे जनून की सैर न कर, मैं हर जगह (काबा और दैर) की क़यामत हूं। अर्थात् मेरे दर्शन से सब नानत्व नष्ट होजाता है।
पहाड़ की चोटी पर किस ज़ोर से ॐ! ॐ! ॐ!!! की ध्वनि सुनाई दे रही है। अरे पिछली रात के सोने वालो! क्या यह कूक तुम्हारे कानों तक नहीं पहुँची? तुम्हारी नींद अभी तक नहीं खुली? बादलो जाओ, संसार भर में ढिंढोरा फेर दो, ॐ। विजली! दौड़ो। प्रकाश के अक्षरों में लिखकर दिखादो, "ॐ"।
उत्तर में बादल गरज-गरज कर पत्थरों को जगाते हैं। विजली वृक्षों और जानवरों को प्रकाश से जगमगा देती है। राम की आशाको प्रकाश ने आँखों पर स्वीकार किया। आकाश ने शिर पर स्वीकार किया— "भारत जागा, जागा, जागा"।
पर्वतीय रहस्य.
फ़लक गुफ्त अहसन मलक गुफ्त, ज़ेह।
अर्थः—आकाश से ध्वनि आई, बहुत खूब। देवता से ध्वनि आई, शाबास।
ऐ ग़ुलामी ! अरे दासपन ! अभी दुर्बलता ! अब समय है । बांधो बिस्तर, उठाओ लता-पता । भागो, छोड़ो मुक्त पुरुषों के देश को ।
बादल तुम्हारे शोक में रो भी रहे हैं । वह जाओ गंगा में, डूब मरो समुद्र में, गल आओ हिमालय में ।
इस भयानक और शंका-पूर्ण अवसर पर राम निश्शंक-भाव से मृत्यु को डांट रहा है । क्या उसे प्राणों का भय नहीं है ? जिससे कोई स्थान खाली ही नहीं है, उसको भय कहां । मृत्यु की है शक्ति रामकी आज्ञा के बिना दम मारने ( श्वास लेने ) की ! राम का यह शरीर नहीं गिरेगा जब तक भारत सुधर न जायगा ।
यह शरीर कट भी जायगा, तो भी इसकी हड्डियां दधीचि की हड्डियों की तरह किसी न किसी इंद्र का वज्र बनकर द्वैत के राक्षस को चकनाचूर कर ही देंगी । यह शरीर मर जायगा, तो भी इसका ब्रह्मवाण चूकेगा नहीं ।
अश्वत्थामा के "ब्रह्मशर" की तरह राम का "ब्रह्मवाण" द्वैतदृष्टि और द्वैतज्ञान के वंश का बीज शेष नहीं छोड़ेगा । गर्भ में जो भेद रूपी बच्चे-कच्चे हैं, उनको भी उड़ा देगा ।
इस शुद्ध फुरना के आगे कौन ठहर सकता है ? यह ज्ञानगोला ( Star-shell ) खाली जानेवाला नहीं । गधे के शिरवाले अहंकार रूपी रावनका बंद बंद जुदा ।
पड़ा नफ़स को कि रावन है हमसे काम नहीं । जला के ख़ाक न करदूं तो "राम" नाम नहीं ॥
क्या पे सब्ज़ खिंगे-मन चिनह वर आसमां हा सुम । वखेज़ पे मुर्दा दुनिया ! कुम बद्ज़नी कुम बद्ज़नी कुम ॥
अर्थः—ऐ मेरे सब्ज घोड़े (मन) ! आ, आकाश पर अपनी टाप रख ( अर्थात् लोक परलोक से ऊपर उठ ) । ऐ मुर्दा ( मृतक ) सृष्टि ! उठ, मेरी आज्ञा से उठ, मेरी आज्ञा से उठ ।
प्रभात का वेला है । ख़ुद मस्ती में झूमता हुआ "राम" जा रहा है । किसी समय मौज में नाचने लग पड़ता है ।
चारों ओर पहाड़ियों को सफ़ेद ( वर्फ़ की ) साड़ियां ओढ़े देखकर मारे क्रोध के मुख तमतमाने लगा ।—
"तुमने विधवा का चेप क्यों धारण कर रक्खा है ? देखती नहीं हो, कौन आ रहा है ?"
पहाड़ियों से ठँढी "आह" ( शीतल वायु ) निकलती है— "हाय ! रँगरेज़ जल गया, आज अभी तक नहीं आया ।"
राम के दृष्टि उठाते ही कांपता-कांपता लाल रँगरेज़ आता है । तत्काल पहाड़ियों के दुपट्टे भगवे होगए ।
रंग दे रे रँगरेज़ ! चुनरिया रंग दे । माही की चदरिया हमरी चुनरिया, दोनों को जोगिया रँग दे । रंग दे रे रँगरेज़ ! चुनरिया रंग दे ॥
मैं पिया तोरे रँग में समाय रही । और रंग मोहे काहे प्रिय होवे, मैं पिया तोरे रग में समाय रही ॥ रंग वही रँगरेज़ वही, मैं चटक चुनरिया रँगाय रही । मैं पिया तोरे रँग में समाय रही ॥ हमरे पिया हम पियाकी री सजनी, पिया पर जियरा गँवाय रही । मैं पिया तोरे रँग में समाय रही ॥