फैजाबाद के रईस लाला राम रघुबीर लालजी के नाम तीन पत्र।
( 7 ) 30 सितम्बर 1806
प्यारे भगवन्,
आप का 8 अगस्त का पत्र साथ शान्ति प्रकाश+ के पोस्ट कार्ड के आज 30 सितम्बर को मिला। मंसूरी इत्यादि जैसा भी कुछ होगया परमानन्द ही परमानन्द है। ......................................
टेहरी से कोई पांच मील की दूरी पर गंगा तट पर एक विशाल* मैदान (क्षेत्र) में यह शीतकाल व्यतीत होगा। राम टेहरी आगया है। अभी सरकारी कोठी भिलंग (भृगु) गंगा के तट पर (सिमलासु बाग में) उतरा हुआ है। कोई 50 डबल पृष्ठ का अंग्रेज़ी लेख Indian Review (मासिक पत्र) को भेजा जा चुका है। जब छप जायगा, उसका उर्दू अनुवाद शान्ति प्रकाश+ जी के जिम्मे है। एक
+शान्ति प्रकाश से अभिप्राय फैजाबाद के बा० सुरजन लाल जी हैं।
* यह विशाल क्षेत्र (मैदान) टेहरी से पांच मील की दूरी पर मालिदेवल ग्राम के समीप है। यहां गंगा के तट पर महाराज साहिब टेहरी एक छोटी सी कुटिया स्वामी जी के लिये बनवा रहे थे। अभी यह कुटिया आधी भी नहीं बनी थी कि स्वामी जी का शरीर भृगु गंगा में (जो सिमलासु बागीचे में महाराजा साहिब की कोठी के नीचे बह रही है) बह गया और संसार को नित्य के लिये तिलांजलि दे गया। तत्पश्चात् नारायण के एकान्त सेवन के लिये महाराज साहिब ने इस कुटि को संपूर्ण बनवा दिया और ऐसे रहते २ इस से अतिरिक्त और बहुत सी कुटियां बन गयीं। यह स्थान स्वामी रामतीर्थ के समारक में राम मठ कहा जाता था। अब कार्य की आधिकता से नारायण के अन्य देशों में अधिक रहने से रियासत की कौंसल ने उसे और कामों में लगा दिया है।
उर्दू लेख 'अर्जे-तमस्सुक' समीप ही ज़माना पत्र को जाने वाला है ..............271..............
( 8 ) 7 अक्तूबर 1806
Peace, Blessings !! Love !!! शान्ति, आशीर्वाद, प्रेम, भगवन्,
तुम्हारा प्रेम कार्ड अभी मिला !
गंगा तट पर बड़े सुन्दर स्थान पर विशाल क्षेत्र में एक छोटी सी सुन्दर कुटिया राम के शरद् ऋतु काटने के लिये महाराजा साहिब ने बनवा दी है। इस लिये अब से छे सात मास तक निम्न लिखित पता रहेगा*।
डाकखाना रियासत टेहरी गढ़वाल हिमालय,
† यह लेख सब से अन्त का है। इसी को लिखते लिखते स्वामी जी ने इस लेख के अन्त में मृत्यु को बुलाया और इसी लेख के समाप्त होने के बाद स्वामी जी का शरीर गंगा के जल प्रवाह में बह गया। यह लेख आगे 18 में दिया जायगा।
* यह पत्र स्वामी जी का सब से अन्त का है। इस से थोड़े काल ही पीछे स्वामी जी का शरीर छूट गया।